दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
अदबी हयात
संवाद का वैभव
राजीव रंजन गिरि

इस साल को हिन्दी के चार श्रेष्ठ कवियों का शताब्दी वर्ष होने का गौरव प्राप्त है। शमशेर बहादुर सिंह, सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल एक ही साल पैदा हुए थे। यह सोचकर सुखद अनुभूति होती है कि आधुनिक हिन्दी कविता के निर्माण में, एक ही वर्ष जन्म लिए, इन कवियों का खास योगदान है। 'तद्भव' के संपादक अखिलेश ने इन्हें उचित ही 'आधुनिक हिन्दी के महाकवि' कहकर नवाजा है। इन चारों कवियों के साथ गजानन माधव मुक्तिबोध और त्रिालोचन का नाम जोड़ने पर, इससे बने समुच्चय से, हिन्दी की आधुनिक कविता का विस्तृत वितान निर्मित होता है।

इस शताब्दी वर्ष के मौके पर 'तद्भव' ;अंक-बाईसद्ध ने 'महाकवियों की मैत्राी' शीर्षक से केदारनाथ अग्रवाल के नाम नागार्जुन, अज्ञेय और शमशेर के पत्रा प्रकाशित किया है। इन पत्राों को केदारनाथ अग्रवाल के आत्मीय रहे, अशोक त्रिापाठी ने उपलब्ध कराया है। अशोक जी ने केदारनाथ अग्रवाल और रामविलास शर्मा के पत्राों को संपादित कर और इस प्रक्रिया पर सुचिंतित भूमिका लिखकर 'मित्रा-संवाद ;दो खण्डद्ध नाम से प्रकाशित कराया है।

किसी भी दौर की पृष्ठभूमि और रचनाकारों की मानसिक बुनावट को समझने में इन पत्राों से कापफी मदद मिलती है। कई मामलों में ये चिट्ठियाँ प्रामाणिक स्रोत का काम करती हैं। तकनीक के विकास और विस्तार ने संपर्क की सुविधा मुहैया कराया है। पर इसका एक बुरा असर पत्रा-लेखन पर भी पड़ा है।
इन पत्राों का दायरा निजी जिंदगी के कुशल क्षेम से लेकर युग के समूचे परिदृश्य के कई आयामों को समेटकर हमारे सामने लाता है। इन पत्राों से गुजरकर भौगोलिक दूरी के बावजूद, एक-दूसरे के जीवन में इनकी साझेदारी को महसूस किए बिना नहीं रहा जा सकता। इन पत्राों की भाषा ऐसी है गोया एक-दूसरे से बतिया रहे हों। बाबा नागार्जुन अपने सहमना केदार को निराला के निधन की बाबत लिखते हैं-''निराला चले गए हैं। श्रा( समारोह के नाम पर जो पंडाल सजाया गया दारागंज में, लगता था बारात की अभ्यर्थना के लिए किसी लक्ष्मीवाहन ने विद्युत्पर्व का आयोजन किया है। सेठ गोविन्द दास अध्यक्ष थे। अमृतलाल नागर, जानकी बल्लभ, श्रीकृष्णदास, नागार्जुन, शमशेर आदि सभी दर्शकों में बैठे थे। दुलारेलाल भार्गव ने भी श्र(ांजलि दी, उसकी उपस्थिति हमें असह्‌य लगी। निराला के जीते जी जिनकी नजरें मिलाने की हिम्मत न हुई, वे ही अब आगे-आगे हैं। अंधेरी और बदबूदार गली के उस मकान में वर्षों वह तिल-तिल करके छीजते रहे। हमने उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया था। समाज का और सरकार का रुख यही था कि निराला जल्द मर क्यों नहीं जाते! जो कुछ देना था वह दे चुके अब क्यों जी रहे हैं? हम प्रगतिशील भी समाजवादी भावनाओं की गाढ़ी पिनक में ऊँद्घते रहे। शौकिया और वक्ती तौर पर निराला की दुर्दशा के बारे में इधर-उधर बातें करते रहे, मास्को पेकिंग में दावतें उड़ाते रहे। इस अवसर पर हमें अपनी गलती भी खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए, हमने क्या कम लापरवाही दिखलायी है?'' सन्‌ बासठ की लड़ाई से आहत नागार्जुन ने लिखा है, ''यह निश्चित है कि 'भाई-भाई' के नारे आगे हमें उस तरह नहीं छलेंगे। यह मैं चीन के संदर्भ में लिख रहा हूँ। कल का प्रगतिशील कवि पहले राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय बाद में। तुमने पूछा है, मैं यहाँ कर क्या रहा हूँ? कुछ नहीं कर सका हूँ भाई। छिटपुट काम किए हैं। उपन्यास लिखना चाहता था बैठकर तो देश की सीमा के अंदर दुश्मन द्घुस आए। चित्त किस कदर विक्षुब्ध हुआ यह तुम भुक्तभोगी के नाते ज्यादा समझ सकोगे-

'सपने इंकलाब के यहाँ वहाँ भर गया/वो माओ कहाँ हैं, वो माओ मार गया।' मेरे लिए तो यह संभव नहीं रहा कि आगे कभी मैं 'लाल पान की बादशाह' ;चीनी मांधाताद्ध को क्षमा करूँ!'

'दुश्मन अज्ञेय

शीत यु( के दौर में हिन्दी साहित्य में भी शीत यु( का माहौल बना हुआ था। प्रगतिवादी खेमा और परिमल के बीच शीतयु( तो था हीऋ पर प्रगतिवादी समूह में, द्घोषित रूप से, सबसे बड़े 'दुश्मन' माने गए-अज्ञेय। केदारनाथ अग्रवाल के नाम अज्ञेय जी के छपे पत्राों में इसकी झलकियाँ देखी जा सकती हैं। अज्ञेय लिखते हैं कि 'नदी के द्वीप' पढ़कर क्या करेंगे। 'दुश्मन' आप पहले ही माने बैठे हैं, जो गालियाँ पढ़कर देंगे, बिना पढ़े ही दे लीजिए- आपका परिश्रम बचेगा! बल्कि गालियाँ देने का परिश्रम क्यों कीजिए : वे तो सब मेरी परिचित ही हैंऋ कोई नयी गाली आप देने लगे तो 'डीवियेशनिस्ट' न हो जायेंगे! ;और यह भी सवाल है कि अपनी कोई रचना आप मुझे क्यों भेजें- वह तो जहाँ भेजेंगे वहीं भेजेंगे।

मेरा तो लक्षणा व्यंजना में भी विश्वास हैऋ इसलिए कह गया यह सबऋ लेकिन आप यह न देखना चाहें तो अभिद्या में ही कहूँ कि आपकी कई रचनाएँ मुझे बहुत पसंद हैं और उन्हें 'प्रतीक' में छाप कर मुझे बड़ा संतोष होता इसलिए और भी अधिक कि इस प्रकार वे अधिक उर्वर क्षेत्रा में पहुँच पातीं।'' दूसरे पत्रा में अज्ञेय ने लिखा है कि ''आपने ;केदारनाथ अग्रवालद्ध मुझसे अपनी पुस्तकें न भेजने की शिकायत की है। मैं अपने स्नेहीजनों को पुस्तकें स्वयं भेजता हूँ, वह स्नेह की अभिव्यक्ति होती है। साहित्यिकों में भी उन्हें भेजता हूँ जो पढ़ेंगे या पढ़ना चाहेंगे। आप इस श्रेणी में हैं, आप इस श्रेणी में हैं, इसका कभी कोई संकेत नहीं मिला। यह जानता हूँ कि आपकी बिरादरी के लोग प्रकट गालियाँ देते हैं और मुझे निरंतर पेवसंजम और सपुनपकंजम करते हैं क्योंकि मैं ;आप ही के शब्दों में!द्ध 'दुश्मन' जो ठहरा-पर चोरी छिपे मेरी पुस्तकें पढ़ते हैं- अधिकतर गालियाँ देकर अपना 'धर्म' निबाह चुकने के बाद! यह जानता तो हूँ, पर इसके लिए किताबें बाँटने का दम्भ क्यों करूँ? आपको मेरे संग्रह में कविताएँ देने या न देने के प्रश्न पर 'अनुमति' लेनी पड़ी थी। मेरा साहित्य पढ़ने की अनुमति आपने ले ली? मुझे सूचित कीजिएगा, कौन-सी पुस्तक पढ़ने की अनुमति मिली, कौन सी आप पढ़ना चाहेंगेऋ मैं सहर्ष भेजूँगा। यह जानते हुए भी कि उसके बाद आपको उसके संबंध में क्या राय प्रगट करनी होगी। स्वयं आपने कभी पुस्तक भेजी, यह नहीं पूछूँगा, क्योंकि मैं साहित्यिक मात्रा से नहीं मांगता, केवल स्नेहियों से मांग सकता हूँ!'' इस 'दुश्मनी' के रिश्ते में भी दोनों में पत्रााचार होता रहा। अज्ञेय ने केदार को अपनी किताब भेजी और केदार ने उन्हें अपनी कविताएँ। नतीजतन अज्ञेय को 'बड़ी प्रसन्नता हुई, कुछ संकोच भी उन बातों से जो आपने ;केदारद्ध मेरे ;अज्ञेयद्ध लेखन के बारे में लिखी हैं।' पिफर अज्ञेय ने लिखा कि ''मतैक्य कहाँ होता है? होता है तो स्थायी कब होता है? और जहाँ यह निश्चय होता है कि सदा सर्वदा संपूर्ण मतैक्य रहेगा ही रहेगा, वहाँ स्वास्थ्य कहाँ होता है?''

केदारनाथ अग्रवाल द्वारा 'प्रतीक' हेतु भेजी गयी ओम शंकर खरे की कहानी को लौटाते हुए 'प्रयोगवादी' अज्ञेय ने स्पष्ट किया है कि खरे जी लिख सकते हैं, अगर प्रभाव डालना चाहने और अति कौशल प्रदर्शन की प्रवृत्ति से बच सकें। जो प्रयोग भीतरी आवश्यकता से प्रेरित हो, वही सपफल हो सकता है।''

तुम्हारा शमशेरशमशेर द्वारा अपने दोस्त केदार को लिखे पत्रा में शमशेर की कविता की खुशबू महकती बिना नहीं रह सकती।
इन्होंने रागनीदेवी का नृत्य देखने के बाद लिखा कि रागनी के बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगाऋ लेकिन तुम गोपीनाथ को नहीं जानते-शायद। अगर तुम उसके किसी भी डांस पोज की पफोटो देखो तो तुम्हें धोखा हो जाएगा कि यह अजंता गुहा का पफोटो तो नहीं है या बंगाल आर्ट की कोई पिक्चर है। जी हाँ। लेकिन वाह, जिस्म में क्या मोड़-तोड़ दिखाता है। बाज दपफे आप कहेंगे कि यह चल रहा है। गंवार की तरह। लेकिन नहीं, उसका हर एक डग ताल पर है और पिफर जब वह झननन झन करके मैदान में आता है और पिफर जब नाच के चक्कर शुरू होते हैं और बाँहें और उंगलियाँ ताल को मानो चुटकी से पकड़ती हैं, और पैर के एड़ी और पंजे ताल को पानी कर देते हैं, तब कमर का और कमर के साथ गरदन का और भौहों का और आँखों को पुतलियों का- और वह गजब का नर्तन कि बस रागनी देवी एक कोने में खड़ी रह जाती हैं। उन दोनों का 'शिव पार्वती' नाच-क्या पूछते हो। पहले सती तपस्या, पिफर सती का प्रेम नृत्य, पिफर शिवजी का प्रेमोन्मादमय तांडव नृत्य पिफर दोनों का सम्मिलन नृत्य। यह चीजें बयान करने की हैं?

अपने मित्रा रचनाकारों की खूबियाँ बताते और वह खूबी खुद के लिए जरूरी मानते हुए शमशेर लिखते हैं ''काश कि मैं उतना ंिबपसम होता जितना तुम, इतना सशक्त जितना रामविलास, छंद और तुक पर उतना अधिकार जितना त्रिालोचन का है, इतना समझता होता बहुत सी बातों को जितना मेरे कई दोस्त यहाँ और अन्य स्थानों में। खैर। पिफर भी मैं टूटा-पफूटा जैसा मुझसे बनेगा लिखूँगा।''

;लेखक उभरते हुए युवा आलोचक हैंद्ध
६८०, वेस्ट परमानंद ;नियर किंग्सवे कैम्पद्ध, दिल्ली-९
मो. ०९८६८१७५६०१

 
 
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