दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
चिट्ठी आई है
आलोचना के आकर्षण
''पाखी' तीसरे वर्ष में को प्रवेश कर गयी है, यह महत्वपूर्ण है उनके लिए भी जो उसके लेखक रहे हैं और उनके लिए भी जो उसके पाठक हैं। नामवर सिंह केंद्रित विशेषांक जोशी स्मृति को ताजा रखेगा। आज प्रायः प्रत्येक साहित्यकार साहित्य में दखल राजनेता की मुद्रा में रखना पसंद करता है। वह दल बल से अपने होने को मनवा कर दम लेता है। कदाचित डॉ. नामवर सिंह उनमें से नहीं हैं। उनका हिन्दी आलोचना में अपना ही आकर्षण है।
 
राजेन्द्र मोहन भटनागर, उदयपुर, राजस्थान.
 
युवाओं की दृष्टि बिल्कुल साफ

सितंबर २०१० के 'पाखी' में आगामी अंक से अपूर्व जोशी की द्घोषणा प्रेम भारद्वाज प्रति उनके प्रेम, आपके श्रम की सार्थकता को पहचानने की उनकी योग्यता और समूह के प्रति समर्पण को, उनके निर्छद्म स्वीकार को ही नहीं उद्द्घोषित करती बल्कि यह भी उद्द्घोषणा है कि अपूर्व ने ऐसा करके एक और इतिहास रचा है। मेरी हार्दिक बधाई।

सितंबर अंक में बिल्कुल नई पीढ़ी की रचनाओं ने यह सि( कर दिया कि इन युवाओं की दृष्टि बिल्कुल सापफ है और हिन्दी साहित्य उनसे उज्ज्वल भविष्य की आशा कर सकता है बशर्ते ये साहित्यिक राजनीति में उलझकर न रह जाएँ। पिफर भी अंक की कहानियों के विषय में मेरा निजी विचार है कि 'सड़क जाम' ;दिलीप कुमारद्ध इनमें श्रेष्ठतम कहानी है। जयश्री राय के पास मंजी हुई भाषा और आकर्षक शिल्प है और यदि वह अपनी आगे की कहानियों में उसे बरकरार रख सकीं तब उनके उल्लेखनीय कथाकार होने की संभावना से अस्वीकार नहीं, लेकिन 'आदमी का बच्चा' मुझे बेहद कृत्रिाम कहानी प्रतीत हुई, जिसमें 'कपफन' का प्रभाव भी परिलक्षित है। इसी विषय वस्तु पर ;बिल्कुल इसी तर्ज कीद्ध एक कहानी पहले भी पढ़ी थी, कब-कहाँ याद नहीं। लेकिन हम यह मानने को विवश हैं कि मौलिकता विषय वस्तु की नहीं, अभिव्यक्ति की होती है। इसी प्रकार 'सॉरी माँ' ;स्मिता श्रीवास्तवद्ध से बेहतर कहानी है 'केशव बाबू, क्यों केशव बाबू हैं' ;उन्मेष कुमार सिन्हाद्ध। चूंकि इन कहानियों का चयन एक विद्वत दल ने किया है, इसलिए उनके निर्णय को स्वीकारना ही होगा। अंक की सभी कविताएँ महत्वपूर्ण हैं।

रूप सिंह चंदेल, सादतपुर, दिल्ली

'अरे इन दोउन राह न पायी'

'पाखी' अगस्त २०१० में कृष्ण बिहारी का लिखा हुआ लेख 'अरे इन दोउन राह न पायी' शीर्षक ने आकर्षित किया। कबीर की ये प्रसि( पंक्तियाँ तो विसंगतियों पर हरदम सीधी चोट करती है। मगर इस बार वे कौन खास लोग हैं जो गुमराह हो गए हैं! नया ज्ञानोदय के सुपर बेवपफाई विशेषांक-२ में विभूतिनारायण राय का साक्षात्कार कई सवाल छोड़ गया। वर्तमान साहित्य के भूतपूर्व संपादक कई चर्चित उपन्यासों के लेखक और वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय ने अपने बेहद संतुलित और गरिमापूर्ण साक्षात्कार में 'छिनाल' जैसे निचले स्तर के शब्द को पैबंद की तरह क्यों चस्पां किया! लेखिकाओं का खदबदाना तो लाजिमी था और पाठिकाओं का भी। साहित्य की दुनिया में शब्दों का भारी भूचाल आना और साहित्य के तंदूर में रोटियाँ सेंक लेना भी उतना ही जरूरी था। ऐसे में बहती गंगा में हाथ न धोकर कृष्ण बिहारी ने लीक से हटकर अपनी बात कहने का साहस किया है!

'लेखक ने दूरदर्शिता के साथ लिखा कि गाली का जवाब गोली नहीं है और अगर एक ने अपनी गरिमा का ध्यान नहीं रखा तो क्या सारे साहित्यकार ही अपने शब्दों की गरिमा छोड़कर साहित्य के नाम पर होने वाली राजनीति के अखाड़े में कूद पड़ेंगे! लेखक ने कुछ चर्चित कहानीकारों को भी न बख्शते हुए लेख को मजबूत और दूरदर्शिता पूर्ण तर्कों के साथ प्रस्तुत किया है! सचमुच इतने बवंडरों के बीच जब सभी नामी-गिरामी एक ही नाव के नाविक हों तो कुछ बचे खुचे लोगों का राह पाना कठिन और असमंजसपूर्ण हो जाता है। ऐसे में अपनी बात कहने का साहस करना भी चुनौतीपूर्ण कार्य होता है! कृष्ण बिहारी ने एक अशोभनीय शब्द के लिए साहित्यकारों के अशोभनीय हो जाने पर बिना लाग-लपेट के अपनी आपत्तिदर्ज कराई है। उनका यह कहना कि मैं भीड़ के सच को सच नहीं मानता इसलिए भीड़ भी मुझे अपने साथ रखने में अपना कोई हित नहीं देख पाती। यह बात एक सार्थक बहस को आयाम देने के प्रति लेखक की प्रतिब(ता का सबूत है। इन्हीं सब तूपफानों के बीच 'हंस' का भी सितंबर अंक आ गया। जिसमें राजेन्द्र जी ने अपने संपादकीय में विभूति नारायण को पर्याप्त जगह दी थी और उनकी कही बात का सही पोस्ट मार्टम भी किया था। कृष्ण बिहारी के लेख और राजेन्द्र यादव के विचारों में बहुत समानताएँ हैं। एक अरब सागर के पार तो दूसरा हिन्दुस्तान में है। क्या दो लेखक एक ही तरीके से विचारों को जीते हैं?

'अरे इन दोउन राह न पायी' में लेखक ने 'छिनाल' शब्द को कड़ुआ सच कहने का साहस किया है। यह भी तो कड़ुवा सच है कि आज जब स्त्राी अपने सचों को शब्दों की उजली मुहर लगाकर उनको पुख्ता करने का साहस कर रही है तो इसके ठीक विपरीत वह 'छिनाल' जैसे शब्दों का सामना भी उसी बहादुरी से क्यों नहीं करती है। कब तक वह सती और सतीत्व जैसे तिलिस्मी आवरण में कायरों की तरह छुपती रहेगी और पुरुषों के कंधों पर अपनी ठुड्ढी रखकर रोती रहेगी। सच तो यह है कि बहुत से कड़ुवे सचों से टकराने का जज्बा ही अंततः कोई राह दे पाएगा और तभी शायद दोनों को राह भी मिल पाएगी। प्रज्ञा पांडे, लखनऊ, उ.प्र. तथाकथित जद्दोजहद से बाहर पाखी के नवंबर, २०१० अंक में मेरी कविताएँ छपीं। परंतु कवि परिचय में दो बातें ऐसी छपी हैं जिनके बारे में मैं चाहता हूँ कि सुधार की जरूरत है। एक तो यह कि मेरे शोध का विषय 'नामवर सिंह का रचनात्मक संद्घर्ष' नहीं, बल्कि 'नामवर सिंह का आलोचनात्मक संद्घर्ष' है। दूसरी बात जो आपने अपनी तरपफ से मेरे बारे में लिखी है कि- 'साहित्य जगत में जगह बनाने के लिए जद्दोजहद।' लेकिन आपको यह जानकर शायद हताशा हो कि कम से कम मेरे बारे में यह बात सच नहीं है। मैं पिछले दस-पंद्रह वर्षों से चुपचाप लिख रहा हूँ क्योंकि इस तथाकथित जद्दोजहद से मुझे द्घृणा है। और द्घृणा इसलिए है क्योंकि इस तथाकथित जद्दोजहद में शामिल होकर साहित्यकार अक्सर नैतिकता और आत्म सम्मान की सारी हदें पार कर लेते हैं। मेरी समझ से साहित्यकार के नाते अगर मेरी कोई जद्दोजहद है और हो सकती है तो यही कि मैं- जिंदगी में साहित्य के लिए जगह बनाने की... और साहित्य में जिंदगी के लिए जगह बनाने की जद्दोजहद करूँ। अगर मेरी कोई जद्दोजहद है तो बस यही है, और कुछ नहीं। मैं न तो कवि या कि साहित्यकार होने के दंभ और विशिष्टता बोध से ग्रसित हूँ और न ही कम प्रसि( होने की हीनता से। अच्छा और सार्थक लिखने की कोशिश करता हूँ। कभी-कभी सपफल भी होता हूँ। बहुत प्रसि( नहीं हूँ, लेकिन संतुष्ट हूँ और खुश भी। कुमार विश्वबंधु, कोलकाता

एक दिन में शिखर पुरुष नहीं सर्वप्रथम 'पाखी' के नामवरी अंक के लिए बहुत-बहुत बधाई। ऐसा शोधपरक अंक निकाला है कि हिन्दी साहित्य ही नहीं वरन हर विषय क्षेत्रा के बालक, युवा, बूढ़ों सभी को अपने-अपने काम, रुचि की चीजें एक ही स्थान पर मिल गई हैं। वास्तव में इस अंक के माध्यम से पूरी तरह स्पष्ट हुआ कि किस तरह एक साधारण व्यक्तित्व स्वाध्याय, अध्ययनपरकता, विशिष्ट दृष्टिकोण को विकसित करता हुआ अति असाधारण बनकर पूरे देश को ही नहीं वरन्‌ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिन्दी की भरपूर सेवा कर रहा है। ऐसे व्यक्तित्व को नमन। नामवर जी की आलोचना के जो एक प्रमुख आलेख ;देखिए नाम याद नहीं आ रहा, उन व्यक्ति का, यह हाल हैद्ध शिखर पुरुष के आलोचकाें का के अतिरिक्त सब ठीक रहा। वह छिद्रान्वेषण अधिक रहा। बिहार लोकसेवा आयोग हो या कोई भी वहाँ पारदर्शिता के साथ-साथ योग्यतम्‌ का चयन ही होता है। नामवर जी से अपेक्षा रखी कि वह आपका ही चयन करें तो वह उचित नहीं।

बाकी दक्षिण भारत के विश्वविद्यालयों आदि में जो अध्यक्षता की ललक तथा 'तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी' वह आश्चर्य पैदा करती है। पर यदि ऐसा है तो यह मानवीय कमजोरियाँ बताती हैं कि शिखर व्यक्तित्व एक दिन में नहीं बनता। अपितु वर्षों की साधना तपस्या और कमियों को दूर करते जाते से बनता है। मैं खुद मानता हूँ मोक्षगामिनी माता जी ;नामवर जी की स्व. पत्नीद्ध के साथ नामवर जी जरा भी न्याय नहीं कर पाए। काशी के पत्रा, 'द्घर का जोगी जोगड़ा' पर जो बनारस और उसके आसपास के क्षेत्रा की परंपराएँ एवं आज भी वहाँ की द्घरेलू महिलाओं की स्थिति और पिछड़ापन जानते हैं उस हिसाब से तो उन्होंने बेहद सम्मान और बेहतर दर्जा माता जी को दिया।
संदीप अवस्थी, अजमेर, राजस्थान साहित्य सेवा की कलई खुली

'पाखी' सितंबर अंक का संपादकीय 'है एक मंजिल...' संवेदनाओं से सराबोर और सरोकारों से जुड़ा हुआ है। जयश्री राय की 'आदमी का बच्चा' प्रेमचंद की 'कपफन' की याद भर दिला गया। दिलीप कुमार 'सड़क जाम' के बहाने छात्रा-राजनीति की एक अन्य परत खोलने का दुःसाहस कर गए। बावजूद सवाल यह भी है कि 'सड़क जाम' से क्या समस्या हल होगी? उन्मेषकुमार सिन्हा 'केशवबाबू, क्यों केशवबाबू हैं' के बहाने जीवन के अनेक पफलक खोलने में कामयाब हुए हैं। कस्बों के ये केशवबाबू हर कहीं दिखते तो हैं ही, बस दृष्टि की जरूरत है। अमरकांत जी की 'जिंदगी और जोंक' का पुर्नप्रकाशन उसे पुनः जीवंत बना गया।
कविताओं का कैनवास भी वस्तुतः गौर करने लायक है। निशांत की लंबी कविता 'मैं में हम-हम में मैं' एक साथ अनेक स्थितियों को रेखांकित और प्रश्नांकित करती है। मनोज कुमार झा, कुमार अनुपम, रोहित प्रकाश, आशुतोष चंदन, मृत्युंजय प्रभाकर की कविताएँ आश्वस्त करती हैं कि निराला, नागार्जुन की विरासत सुरक्षित रहेगी।
विभूतिनारायण राय/रवीन्द्र कालिया विवाद के बहाने साहित्य सेवा की कलई खुल रही है। अब, इसी अंक में कृष्ण बिहारी एक तरह की बात कह रहे हैं, तो स्वतंत्रा मिश्र दूसरी प्रकार से। ऐसे में यही कहना ठीक है कि अरे इन दोउन राह न पाई...। वैसे इस विवाद से यह सीख तो मिलती ही है कि साहित्यिकों को बड़बोलेपन और नकचढ़ेपन से बचना चाहिए। चितरंजन भारती, पंचग्राम, असम

पाठकों के मन पर विशेष छाप

'पाखी' का सितंबर अंक पढ़ा/पत्रिाका ज्ञानवर्(क तथा साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मानदण्डों को स्थापित करने तथा उसी प्रकार समसमायिक जनचेतना की संवाहिका है। साहित्य के विविध आयामों का उचित समन्वय उसका प्रस्तुतीकरण वाकई प्रशंसनीय हैं। शोध साहित्य के प्रति रुचि एवं कुछ अलग करने की प्रवृत्ति ने 'पाखी' को कापफी ऊँचे पायदान तक पहुँचा दिया है। संपादकीय 'है एक मंजिल जो मुझे बुलाती है', जयश्री राय की कहानी 'आदमी का बच्चा' तथा अमरकांत की कहानी 'जिंदगी और जोंक' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। राजेन्द्र कौड़ा की कविता 'मछली' मन को प्रभावित करती है। समयानुसार परिवर्तनवादी वास्तविकता से अवगत कराने का प्रयास आपकी तन्मयता को दर्शाता है। दो वर्ष की कम अवधि में 'पाखी' ने पाठकों के मन पर विशेष छाप छोड़ी है।

प्रकाश चंद्रपुर, महाराष्ट्र

पुराने लोगों की मजबूत परंपरा

'पाखी' का मैंने दूसरा अंक खरीदा था जिसमें मृत्युंजय मिश्र की कहानी 'कबिरा इस संसार में' छपी थी, और तब से इस सोनचिरइया के नये-नये पंख देखता आ रहा हूँ। अच्छा लगता है नये-नये लोगों को पुराने दरख़्तों के बीच आसमान की ओर झाँकते हुए देखना। तो इन नये लोगों के बीच जिनमें निशांत, सुरेश सेन निशांत, आशुतोष चंदन, मंजुलिका पाण्डेय सरीखे ढेर सारे रचनाकारों के उभरते हुए नाम हैं तो दूसरी तरपफ पुराने लोगों की मजबूत परंपरा और यहाँ तक कि नामवर सिंह और संजीव पर केंद्रित विशेषांक को ग़ालिब के इस शेर के माध्यम से कहें तो- रेख़्ते के तुम्ही उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब' कहते हैं अगले जमाने में कोई 'मीर' भी था। और 'पाखी' को तो हम लोग ऐसे ही देखना चाहते हैं-'मैंने उसको/जब-जब देखा/लोहा देखा/लोहा जैसा/तपते देखा/गलते देखा/ढलते देखा/मैंने उसको/गोली जैसे/चलते देखा।'

शैलेन्द्र कुमार शुक्ल, बनारस, उ.प्र.

नामवर का पर्याय आलोचना

जब पढ़ती हूँ, पत्रिाका 'पाखी' के प्रति रचनात्मकता के नये जोश में प्रेम भारद्वाज का संपादकीय, तब खिल-खिल उठती है, शब्द-यज्ञ की पूरी परिभाषा, परिवेश और उनकी दक्षता। दूसरी ओर संपादक जब कहते हैं- 'एक शब्द साध्क के अन्तः जगत में प्रवेश भी शब्दों के जरिए ही संभव है।' वह और भी सि( होता है, नामवर जी के प्रति अरुण कमल की प्रकाशित कविता से। अभिभूत होती हूँ, इस तापपूर्ण कविता में एक शिखर आलोचक का प्रतिबिंबित होती बौ(कि प्रतिभा की चरम उजास से। क्योंकि नामवर जी का पर्याय ही आलोचना है या पिफर आलोचना का पर्याय नामवर जी। नामवर सिंह पर केंद्रित यह अंक संग्रहणीय है। पहल, पूर्वग्रह एवं वसुध और अब 'पाखी' का यह अंक मेरे निजी पुस्तकालय की ध्रोहर बन गई है। प्रस्तुत अंक के विभिन्न स्तंभों के माध्यम से नामवर जी को जानना कापफी सुखद है। उफर्जामय है। खासकर संस्मरण स्तंभ, आकलन, पुस्तक के बहाने आदि।

उत्तिमा केसरी, पूर्णियां, बिहार

माँ के दर्द को सामने लाने वाली कहानी

सितंबर अंक में कुछ पुरस्कृत कहानियाँ थीं। पर जयश्री राय की 'आदमी का बच्चा' बहुत अच्छी लगी, इसी तरह दिलीप कुमार की 'सड़क जाम' उससे भी अच्छी लगी जिसे प्रथम पुरस्कार मिला है। यह पात्रा आलोक के सरगना होने, न होने के कशमकश की कहानी है। इस कशमकश को बहुत अच्छे ढंग से बताया गया है, मेरी ओर से बधाई! 'सॉरी माँ' जो स्मिता श्रीवास्तव ने लिखी है, ये एक आत्मकथ्य टाइप की कहानी है। एक औरत जो बच्ची से माँ बनकर अपना और अपनी माँ के दर्द को समाज के सामने लाती है, को अच्छी तरह व्यक्त की गई कहानी है। अमरकांत जी बड़े शीर्षस्थ कथाकार हैं। '८िांदगी और जोंक' एक प्रभावशाली कहानी है जो मैंने पहले भी पढ़ी है पर दोबारा पढ़कर अच्छा लगा।

ईश्वरचंद्र सक्सेना, कोटा,राजस्थान
 
तारिक असलम 'तस्नीम', पटना, बिहार
 
 
 
 
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