दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
ख़बरनामा
त्रिादिवसीय अखिल भारतीय परिसंवाद
 
भारतीय लोकतंत्रा और हिन्दी साहित्य
के स्नातकोत्तर महाविद्यालय, इटावा, उप्र में हिन्दी विभाग के सौजन्य से 'भारतीय लोकतंत्रा और हिन्दी साहित्य' विषय पर त्रिादिवसीय अखिल भारतीय परिसंवाद का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम १९, २० एवं २१ अक्टूबर तक चला। कानपुर विश्वविद्यालय के कुल सचिव महेश चंद्र ने अपने उद्द्घाटन भाषण में कहा कि भारतीय लोकतंत्रा विविध्ता में एकता का प्रतीक है और हिन्दी साहित्य ने लोकतंत्रा के इस स्वरूप को समृ( बनाने में महत्वपूर्ण
योगदान दिया है। राँची से आए प्रो. रविभूषण नेअपने बीज वक्तव्य में कहा कि पूरा साहित्य लोकतंत्रा के साथ ही होता है लेकिन राजनीति सदैव साहित्य में पलीता लगाती है। इसलिए आज भारतीय लोकतंत्रा गंभीर रूप से संकटग्रस्त दिखाई देता है। हमें निराला की यह बात स्वीकारनी होगी कि आलोचना और असहमति जनतंत्रा की आत्मा होती है। असहमति से ही लोकतंत्रा का विकास होता है। वाराणसी के प्रो. चौथीराम यादव का कहना था कि गाँध्ी, प्रेमचंद और अंबेडकर के सपनों का लोकतंत्रा भारत में नहीं बन पाया। आज का साहित्य उतना जनतांत्रिाक नहीं है जितना भक्तिकालीन साहित्य था। राजसत्ता और ज्ञानसत्ता की सामंती निरंकुशता को खत्म करने के लिए कबीर जैसा मुखर स्वर चाहिए। तीन दिवसीय कार्यक्रम में देश के विभिन्न शहरों से आमंत्रिात वक्ताओं ने अपने-अपने विचार रखे। जिनमें प्रमुख रूप से कथाकार दिनेश पालीवाल, सत्यकाम, अश्विनी पराशर, अजय विसारिया, पंकज चतुर्वेदी, यतीन्द्र तिवारी, रमेश रावत, रमेश कुंतल मेद्घ, सूर्यप्रसाद दीक्षित, विद्याकांत तिवारी, अजय तिवारी आदि शामिल थे। इस गोष्ठी में महाविद्यालय की स्त्राी विमर्श पर आधरित पुस्तक 'अध्ययन' का विमोचन भी किया गया। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. मौकम सिंह ने सभी का आभार जताया।
 
साझी विरासत और कबीर की कविता
 
उदयपुर में प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की चर्चित कृति 'अकथ कहानी प्रेम की' के सन्दर्भ में परिसंवाद का आयोजन किया गया। इसमें आलोचक प्रो. नवलकिशोर ने कहा कि इस पुस्तक का महत्त्व इसलिए है कि लेखक ने कबीर के माध्यम से उनके समय के र्ध्म, दर्शन और संस्कृति की पड़ताल बेहद विश्वसनीय ढंग से की है। परिसंवाद का विषय 'साझी विरासत और कबीर की कविता' था। इस विषय पर डॉ. माध्व हाड़ा ने बताया कि वर्णाश्रम जैसी हमारी गढ़ी गई कई पूर्व धरणाओं को यह पुस्तक झटका देती है। संयोजन कर रहे दिल्ली के डॉ. पल्लव ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आलोचना को सभ्यता समीक्षा कहा था, सभ्यता समीक्षा के स्तर को प्राप्त करने वाली दुर्लभ आलोचना पुस्तकों में से है जो कवि रूप में कबीर को सुस्थापित करती है।
स्वयं पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि अपनी परम्पराओं को लेकर जैसा विचित्रा रवैया भारत में है वैसा और किसी औपनिवेशिक समाज में नहीं मिलता। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आई.वी. त्रिावेदी ने की। इस अवसर पर मेवाड़ के विख्यात प्राच्यविद मुनि जिन विजय की स्मृति को स्थाई बनाने के लिए प्रतिवर्ष 'मुनि जिन विजय स्मृति' व्याख्यानमाला का आयोजन मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय द्वारा किए जाने का निर्णय लिया गया।
 
बनारस में काव्यपाठ
 
आज से करीब ५८ साल पहले एक शोध् छात्रा की ओर से ऐसा ही आयोजन हुआ था। जिसमें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, र्ध्मवीर भारती आदि कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया था। मैं जिस शोध् छात्रा की बात कर रहा हूँ वो नामवर सिंह थे। उस गोष्ठी में एक कवि छा गया था जिसकी आज हम शताब्दी मना रहे हैं वो नागार्जुन थे।' उक्त बातें कवि केदारनाथ सिंह ने नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय, पफैज,
शमशेर, नेपाली के जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के 'शोधर्थियों द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहीं। एक नवंबर को वाराणसी में युवा कवियों के काव्यपाठ के इस आयोजन की अध्यक्षता कवि ज्ञानेंद्रपति ने की। इस में हिन्दी के २९ युवा कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। प्रमुख कवियों में शैलेय, प्रेमरंजन अनिमेष, श्रीप्रकाश शुक्ल, पंकज चतुर्वेदी, आशीष त्रिापाठी आदि शामिल थे। कार्यक्रम में आतंकवाद, प्रेम, हिंसा, स्त्राी जीवन और आदिवासी समाज के प्रति गहरी संवेदना वाली कविताओं का पाठ किया गया। इस अवसर पर स्मरणीय छह कवियों- नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय, पफैज, शमशेर, नेपाली के एक-एक प्रतिनिध्ि कविताओं का पाठ क्रमशः किरण तिवारी, विशाल, विजय रंजन, आदित्य विक्रम सिंह, श्रुति कुमुद और बृजेश पांडेय ने किया। दो सत्राों में चले इस काव्य पाठ का संचालन रविशंकर उपाध्याय ने किया। कार्यक्रम में मैनेजर पांडेय, बलराज पांडेय, वशिष्ठ नारायण, वाचस्पति, दीनबंध्ु तिवारी आदि उपस्थित थे।
 
उन्हें लेखक बनना था
 
कथा-शिल्पी शैलेश मटियानी के ७९वें जन्मदिन १४ अक्टूबर को उनकी स्मृति में रामगढ़, उत्तराखण्ड में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें स्व. मटियानी का भावपूर्ण स्मरण किया गया। 'शैलेश की याद' शीर्षक से यह कार्यक्रम महादेवी वर्मा सृजन पीठ, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के रामगढ़, नैनीताल स्थित 'शैलेश मटियानी स्मृति पुस्तकालय' में आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए 'समयांतर' के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में लेखक बनने का निर्णय किया था
और दुनिया की कोई चीज उन्हें लेखक बनने से नहीं रोक पाई। समाज में तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाने वाला हर छोटा काम करने के बावजूद वह कभी यह नहीं भुला पाए कि उन्हें लेखक बनना है। दुख की बात है कि पुरस्कारों, अकादमियों, खरीदों के नाम पर करोड़ों का वारा-न्यारा करने वाली केंद्र और राज्य की अनगिनत अकादमियों और संस्थानों तथा विश्वविद्यालय उनके लिए ऐसी व्यवस्था नहीं कर पाए कि वह आर्थिक झंझटों से मुक्त, अपने अंतिम दिनों में ही सही, कुछ मर्जी के मुताबिक लिख पाते।'
मटियानी को याद करते हुए महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक बटरोही ने कहा कि जोड़-तोड़ वाले राजनैतिक समाज के अंतर्गत रहने वाले संवेदनशील लोगों के लिए जो लोग जिंदगी भर लीक के समानांतर अपना अलग रास्ता तराशते रह जाते हैं। अंततः वे एक दिन अकेले पड़ जाते हैं और पागलपन के अलावा तब उनके पास कुछ और नहीं बचता। प्रो. मध्ुबाला नयाल ने कहा कि कहानी की समानांतर धरा में शहरी परिवेश भी था और ग्रामीण अंचल भी। शैलेश मटियानी इन दोनों धाराओं से बिलकुल अलग पात्रा, परिवेश, स्थितियाँ और जीवन के चित्राण में संलग्न थे। इसके अतिरिक्त डॉ. अमरेंद्र कुमार शर्मा, डॉ. दीपा काण्डपाल, डॉ. दीपक प्रकाश त्यागी, डॉ. अनिल त्रिापाठी आदि ने भी मटियानी जी पर अपने-अपने विचार रखे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड के उच्च शिक्षा मंत्राी गोविंद सिंह बिष्ट थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजेन्द्र कैड़ा ने किया।
 
छह युवा साहित्यकार सम्मानित
 
लखनऊ स्थित संस्था 'भाऊराव देवरस सेवा न्यास' ने छह युवा साहित्यकारों को सम्मानित किया। भोजपुरी कवि मनोज भावुक को भोजपुरी भाषा में उल्लेखनीय योगदान के लिए 'पं. प्रताप नारायण मिश्र स्मृति' युवा साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया गया। पहली बार किसी भोजपुरी साहित्यकार को यह सम्मान मिला है। काव्य के लिए अरविंद कुमार सोनकर, कथा साहित्य के लिए दिनेश कर्नाटक, बाल साहित्य के लिए गीतिका सिंह, पत्राकारिता के लिए डॉ. मुकुल श्रीवास्तव और संस्कृत के लिए डॉ. ध्ीरेन्द्र झा को सम्मान दिया गया।
'भाऊराव देवरस सेवा न्यास' पंद्रह वर्षों से अखिल भारतीय स्तर पर भारतीय साहित्य के विविध् विधओं के सृजनात्मक एवं विचारात्मक रचना करने वाले सात युवा साहित्यकारों को सम्मानित करता आ रहा है। इस बार रंगमंच के लिए किसी भी प्रविष्टि को पुरस्कार लायक नहीं पाया गया। सम्मान समारोह की अध्यक्षता विनोद शंकर चौबे ने की।
 
जननाट्य शैली को पुनर्जीवित किया
 
उदयपुर में कवि, चिन्तक नन्द चतुर्वेदी ने 'शिवराम स्मृति' कार्यक्रम के अवसर पर कहा कि शिवराम ने नाटकों के नये स्वरूप को विकसित किया। उनका सदैव यह प्रयास रहा कि नाटक दर्शकों के साथ-साथ आम प्रेक्षक वर्ग तक भी पहुँचे। इस दृष्टि से उनके नाटक पूर्ण सपफल रहे हैं। नन्द चतुर्वेदी ने उनके लोकप्रिय नाटकों 'जनता पागल हो गई है', 'पुनर्नव', 'गटक चूरमा' आदि का जिक्र किया। आलोचक प्रो. नवलकिशोर ने अपने वक्तव्य में कहा कि शिवराम सच्चे मायने में एक सपफल नाटककार होने के साथ-साथ अच्छे रंगकर्मी भी थे। उनके नाटक उत्तरोत्तर नवप्रयोग को सार्थक करते रहे। लोक कलाविद डॉ. महेंद्र भानावत ने कहा कि नाटकों को लोक से जोड़े रखना वाकई मुश्किल है और शिवराम ने अपने नाटकों के साथ हमेशा लोक-चिन्ता को सर्वोपरि रखा। उनकी यही खासियत उन्हें अन्य रचनाकारों से पृथक पहचान देती है। डॉ. मलय पानेरी, पल्लव, हिमांशु पंड्या, ममता पानेरी ने भी इस संदर्भ में अपने महत्वपूर्ण विचार रखे।
 
कथाकार नावरिया सम्मानित
 
दलित साहित्य एवं सांस्कृतिक अकादमी, देहरादून की ओर से प्रतिवर्ष दिया जाने वाला 'डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय साहित्य सम्मान' युवा कथाकार अजय नावरिया और 'वीरांगना झलकारी बाई वीरता सम्मान' दलित स्त्राी आंदोलन की अगुवा लेखिका अनीता भारती को दिया जाएगा। दलित साहित्य एवं सांस्कृतिकअकादमी की ओर से प्रतिवर्ष एक साहित्यकार को 'डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय साहित्य सम्मान' दिया जाता है। अब तक यह सम्मान 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव, आलोचक डॉ. नामवर सिंह, प्रो. रामशरण जोशी व दलित चिंतक प्रो. तेजसिंह को प्रदान किया जा चुका है। वहीं अकादमी की ओर से वर्ष २०१० का 'वीरांगना झलकारी बाई वीरता सम्मान' स्त्राी अध्किारों के लिए संद्घर्ष करने वाली लेखिका अनिता भारती को अगले माह होने वाले समारोह में दिया जाएगा। समारोह में रूपनारायण सोनकर के नये उपन्यास 'सूअरदान' का लोकार्पण भी किया जाएगा।
 
डंगवाल का एकल काव्यपाठ
 
वीरेन डंगवाल एकल काव्यपाठ का आयोजन वीएनएसडी कालेज, कानपुर के हिंदी विभाग में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार गिरिराज किशोर ने की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि साहित्य संवेदनाओं से अलग हो रहा है। युवा पीढ़ी साहित्य से कट रही है। इसके पहले प्रबंध् समिति के मंत्राी वीरेंद्र जीत सिंह, प्राचार्य डॉ. एस के सिंह, हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. सुध दीक्षित ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए। वीरेन डंगवाल ने अपने काव्य संकलन 'इसी दुनिया में', 'दुश्चक्र में सृष्टा' और 'स्याही ताल' की चुनिंदा कविताओं का पाठ किया। अलग-अलग मूड की कविताओं ने एक संपूर्णता पैदा कर दी। उन्होंने पीटी ऊषा, इंद्र, पपीता, हाथी, समोसे, अपना द्घर, मंगलेश डबराल की चिट्ठी आदि कविताओं का पाठ किया।
 
विश्वास को सम्मान
 
हिन्दी गीतकार एवं संचालक डॉ. कुमार विश्वास को इस वर्ष के डॉ. उर्मिलेश सम्मान' के लिए चयनित किया गया है। यह पुरस्कार हर वर्ष देश के शीर्षस्थ गीतकारों में से एक को प्रदान किया जाता है। प्रसि( मुक्तक 'कोई दीवाना कहता है' के रचयिता डॉ. कुमार विश्वास के गीत युवा पीढ़ी की जुबान पर पिछले एक दशक से चढ़े हुए हैं। हिन्दी कविता और गीत को तकनीकी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक पहुंचाने में डॉ. कुमार विश्वास का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। गत वषोर्ं में यह पुरस्कार डॉ. कुंअर बेचैन और सोम ठाकुर को प्रदान किया जा चुका है। यह पुरस्कार हिन्दी गीतकार डॉ. उर्मिलेश 'शंखधर' की स्मृति में दिया जाता है। डॉ. उर्मिलेश की स्मृतियों को ताजा रखने के लिए 'डॉ. उर्मिलेश जन-चेतना समिति' हर वर्ष 'राष्ट्रीय गीतकार डॉ. उर्मिलेश गीत-श्री सम्मान' प्रदान करता है। डॉ. विश्वास को यह पुरस्कार बदायूं महोत्सव के दौरान १५ नवम्बर को बदायूं में प्रदान किया जाएगा।
 
अखिल भारतीय लद्घुकथा सम्मेलन
 
नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिाका 'हम सब साथ साथ' ने देश भर से चयनित लद्घुकथाकारों के सम्मान में समारोह आयोजित किया। इस अवसर पर साहित्यकार चित्राा मुद्गल ;मुख्य अतिथिद्ध, कैपिटल रिपोर्टर के संपादक सुरजीत सिंह जोबन ;अध्यक्षद्ध एवं कथाकार बलराम व ए. पी. सक्सेना ;विशिष्ट अतिथिद्ध के रूप में उपस्थित थे। इस मौके पर चित्राा मुद्गल ने 'हम सब साथ साथ' पत्रिाका के इस कदम की सराहना करते हुए लद्घुकथा के विकास पर संतोष व्यक्त किया और कहा कि इसकी दशा व दिशा दोनों ही ठीक है। सुरजीत सिंह जोबन ने कहा कि लद्घुकथा अपने आप में संपूर्ण कहानी समाहित किए हुए रहती है।
इस समारोह के लिए उ.प्र., म.प्र., राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, प. बंगाल एवं दिल्ली से दो दर्जन से भी अध्कि लद्घुकथाकारों का चयन किया गया था। इन कथाकारों ने अपनी श्रेष्ठ लद्घुकथाओं का पाठ किया। उसके पश्चात्‌ उन्हें स्मृति चिन्ह, प्रमाणपत्रा, पुस्तकें प्रदान कर सम्मानित किया गया। समारोह का सपफल संचालन विनोद बब्बर एवं विवेक मिश्र ने किया एवं पत्रिाका के कार्यकारी संपादक किशोर श्रीवास्तव ने आभार व्यक्त किया।
 
सामासिक संस्कृति की समरसता
 
भारतीय समाज तमाम भौतिक समृ(ि की ग्लोबल आँधी के बावजूद सामासिक संस्कृति की समरसता में ही जीता-जागता है। इस वास्तविकता को समकालीन स्त्राी लेखन ने पूरी संवेदनशीलता से रूपायित किया है।' यह कथन कथाकार चित्राा मुद्गल का है जो 'नई धरा' पत्रिाका द्वारा आयोजित 'उदयराज सिंह स्मारक व्याख्यान' के तहत 'हिन्दी समाज और स्त्राी-लेखन' विषय पर बतौर
'मुख्य अतिथि बोल रही थी। इस अवसर पर चित्राा मुद्गल को 'उदयसिंह स्मृति सम्मान' से विभूषित किया गया। सम्मानस्वरूप उन्हें एक लाख की राशि, शॉल, प्रतीक चिन्ह एवं सम्मान पत्रा प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त उपन्यासकार भगवतीशरण मिश्र, आलोचक डॉ. गोपाल राय एवं लेखक जियालाल आर्य को 'नई धरा रचना सम्मान' से सम्मानित किया गया। जिसके तहत लेखकों को २५-२५ हजार की राशि प्रदान की गयी। नई दिल्ली में १६ नवंबर को आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि डॉ. रामदरश मिश्र ने एवं मंच संचालन 'नई धरा' के संपादक शिवनारायण ने किया।
 
सोहन शर्मा का निधन
 
हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार व गंभीर मार्क्सवादी विचारक डॉ. सोहन शर्मा का २१ अक्टूबर को निध्न हो गया। वे पिछले एक वर्ष से पफेपफड़ों के कैंसर से जूझ रहे थे। डॉ. सोहन शर्मा ने अब तक बीसेक किताबें लिखी हैं। उनके कहानी संग्रहों में 'बपर्फ का चाकू', 'जूनी लकड़ियों का गठ्ठर', 'आमने-सामने', 'आध्े उखड़े नख की पीड़ा', 'अपनी जगह पर', 'स्याह होती ध्ूप' आदि तथा कविता संग्रहों में 'थमना मत गोदावरी' है। उनके बहुचर्चित उपन्यास 'मीणा द्घाटी' और 'समरवंशी' हैं। उनकी वैचारिक पुस्तकों में 'विकल्प के पक्ष में' चर्चित रही। उन्होंने 'सही समझ' पत्रिाका का भी कई वर्षों तक संपादन किया, जिसमें उन्होंने युवा स्वर को प्रमुखता दी। भारत सरकार की बैंकों के कार्यान्वयन में राजभाषा नीति को लागू करवाने में उनकी महती भूमिका रही।
 
अनामिका को स्पंदन पुरस्कार
 

ललित कलाओं के लिए समर्पित संस्था स्पंदन, भोपाल द्वारा दिए जाने वाले प्रमुख पुरस्कारों की द्घोषणा कर दी गई। सभी पुरस्कार दिसंबर में भोपाल में दिए जायेंगे। इन पुरस्कारों में स्पंदन कृति पुरस्कार-२०१० के लिए कवयित्राी अनामिका एवं लेखक बद्रीनारायण को चुना गया है। स्पंदन आलोचना पुरस्कार-२०१० के लिए आलोचक रोहिणी अग्रवाल का चयन किया गया। स्पंदन सृजनात्मक पत्राकारिता पुरस्कार-२०१० के लिए संपादक अजेय कुमार को एवं स्पंदन चित्राकला पुरस्कार-२०१० को चित्राकार मनीष पुष्कले को दिया जाएगा। इन सभी पुरस्कारों के लिए ग्यारह हजार की राशि, शॉल एवं स्मृति चिन्ह दिया जाना निश्चित किया गया है।

 
कथाकार मनमोहन सम्मानित
 
पिछले दिनों कला को समर्पित मुंबई की नॉन प्रॉपिफट आर्गनाइजेशन ग्लोबल आर्ट पफाउंडेशन ने कला समीक्षक एवं कथाकार मनमोहन सरल को एक समारोह में सम्मानित किया। आयोजन में पिफल्मकार किरण शान्ताराम ने उन्हें सम्मानित किया। उनके कार्यों एवं योगदान की चर्चा रामजी शर्मा, पृथ्वी सोनी, द्घनश्याम गुप्ता आदि ने की। इस समारोह में एक साथ ३५ कलाकारों की कला प्रदर्शनी भी लगाई गई। सामाजिक कार्यकर्ता निशा सुमन जैन समारोह की विशिष्ट अतिथि थीं। अभी हाल ही में उन्हें महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी ने २००८-०९ के मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार से सम्मानित किया है।
प्रस्तुति : प्रतिभा कुशवाहा
 
 
 
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