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दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
लघु-कथाएं
दहशत
कमल चोपड़ा
 
ममी अभी दरवाजे पर ही खड़ी थी। मोड़ से मुड़कर वह वापिस द्घर की ओर भागकर आता दिखाई दिया। बेतहाशा दौड़ने के कारण गिर पड़ा। द्घुटने बुरी तरह छिल गये। कंधों पर भारी बस्ता लदा होने के कारण उठने में दिक्कत हुई। द्घुटनों से रिसते खून और पफूली हुई साँस की परवाह किये बगैर लपककर वह द्घर के अंदर आ द्घुसा- मम्मी, दंगाई आ रहे हैं। जल्दी से दरवाजा बन्द कर लो। माँ का कलेजा धक्क से रह गया- अब क्या हुआ? अब तो कुछ दिन से शांति थी। मुए न खुद चैन से रहते हैं न किसी को दो दिन चैन से रहने देते हैं...। वह चौंकन्नी हो गई थी। दरवाजा अंदर से बंद करके खींचकर देखा, ठीक से बंद हो गया कि नहीं। खिड़कियाँ बंद करते हुए बोली- शाबू, तू अंदर वाले कमरे में जाकर छिप जा। वह छत पर जा चढ़ीं, छज्जे की ओर बढ़ने लगी। दूर से आती 'हर हर महादेव' के जयकारों की आवाज से उसकी रूह काँप कर रह गई। दो साल पहले हुए दंगे में उसका पति मारा गया था। किसी तरह उस आद्घात से उबरकर जीने की कोशिश कर रही थी कि अब ये नई मुसीबत। डरते-डरते उसने छज्जे पर से बाहर की ओर झांका। 'हर-हर महादेव' के नारे लगाता, गाता, झूमता जलूस चला आ रहा था। रथनुमा सवारी पर सजी-धजी सुंदर सी मूर्ति को रखकर ले जाया जा रहा था। भक्तगण श्र(ा से झूम रहे थे। उसकी जान में जान आई। माँ ने राहत की साँस ली। पीछे मुड़कर देखा तो शाबू खड़ा था जो दबे पाँव पीछे-पीछे छत पर चला आया था- अरे, ये तो शोभायात्राा निकल रही है। ये दंगाई जत्था नहीं भक्तजनों का समूह है। 'हर-हर महादेव' तो भगवान का नाम है। अल्लाह हो अकबर की तरह भगवान के नाम का जयकारा है। पर शाबू अभी भी कांप रहा था। १६००/११४, त्रिानगर, दिल्ली-११००३५
 
दीन धर्म
 

मिट्टी के तेल का डिब्बा, माचिस और त्रिाशूल लेकर नपफरत और गुस्से से लगभग काँपता हुआ दूसरे धर्म वालों को सबक सिखाने के लिए ज्यों ही वह अपने द्घर से निकला, उसने देखा सामने से एक आदमी उसके आठ वर्षीय लड़के को उठाकर लिए आ रहा है। लड़के की टाँग पर पट्टियाँ बंधी हुई थीं, ''जरूर यह दूसरे धर्म वालों का काम होगा।'' ''क्या हुआ मेरे बच्चे को...'' तड़प कर पूछा बच्चे की माँ और उसने। बच्चे को बिस्तर पर लिटाकर उस आदमी ने बड़े इत्मीनान से कहा- ''आप लोग खुशकिस्मत हैं क्योंकि आप एक बहुत नेक, जज्बाती और रहम दिल बेटे के माँ-बाप हैं। एक कुत्ते के पिल्ले को कार की चपेट में आने से बचाने के चक्कर में चोट खा बैठा है, आपका बेटा...। द्घबराने की कोई बात नहीं... दो-तीन हफ्रते में सब ठीक हो जाएगा...।'' मिट्टी के तेल का डिब्बा और त्रिाशूल छूटकर नीचे जा गिरे थे। वह अपने लड़के के पास गया तो वह बोला, ''पापा... आज ये अंकल ना होते तो मैं भी....। मैंने पिल्ले को तो बचा लिया पर कार की ब्रेक की तेज आवाज से डरकर वहाँ द्घूम रहा एक आवारा सांड द्घबराकर अंधाधुंध भागने लगा। कार मुझे गिराकर भाग गयी... मैं वहाँ पड़ा था... अगर ये अंकल ना बचाते तो सांड मुझे मार डालता। मेरी ये पट्टी भी इन्होंने ही करवाई...। तड़पकर रह गया वह- एक मेरा बेटा है जो एक पिल्ले के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहा है और एक मैं हूँ? और ये आदमी...'' ''आपकी बड़ी मेहरबानी... आपका शुभनाम?'' ''जी, शकील अहमद'' वह आदमी बोला। १६००/११४, त्रिानगर, दिल्ली-११००३५

 
 
 
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