दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
मेरी बात/अपूर्व जोशी
यह कागज किसी बेहतर काम में आए
 
वानी बाबू की एक कविता है- कागज पर जगह कम है/मन बहुत ज्यादा नम है/मन का गीलापन/दुख की कालिमा द्घुलमिल कर इतने हैं/धरती के सात समुन्दर मिलकर जितने हैं/इनको लिखकर कौन चुकाएगा/तो मत लिखो/यह कागज किसी बेहतर काम में आएगा।
गत पखवाड़े की कई द्घटनाओं ने मुझे यह कविता याद दिला दी। इतना कुछ चल रहा है दिल में, दिमाग में कि उसको लिखने बैठा तो कागज कम पढ़ जाएँगे पिफर भी मन का विषाद नहीं समाप्त हो सकेगा। ओबामा यानी सबसे ताकतवर मुल्क के राष्ट्रपति हमारे देश पधारे। पूरी भारत सरकार उनके सामने
बिछ गई। उनका स्वागत करने स्वयं देश के प्रधानमंत्राी हवाई अड्डे जा पहुँचे। तमाम स्थापित परंपराओं और अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीकों को दरकिनार कर मनमोहन सिंह ने ओबामा की आगवानी की। अपने देश में भारी पराजय का सामना कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने देशवासियों के लिए पचास हजार नौकरियों का जुगाड़ भारत से किया। बदले में संयुक्त राष्ट्र संद्घ की सुरक्षा परिषद पर भारत के दावे को अमेरिकी समर्थन का आश्वासन मात्रा दे चले गए। संसद में दिए अपने भाषण में वह भारत के गौरवशाली अतीत और भविष्य में विश्व शक्ति बनने की बात कहना नहीं भूले। तालियों की लगातार गड़गड़ाहट से हमारे सांसदों के उत्साह का अंदाज लगाया जा सकता था। मैं तब से इस सोच में डूबा हूँ कि आखिर हमारा सच क्या है? क्या वाकई हमारा अतीत इतना गौरवशाली रहा है कि हम उस पर गर्व कर सकें? और क्या हमारा भविष्य इतना उज्ज्वल है कि विश्व शक्ति बनने का ख्वाब जो हमें दिखाया जा रहा है, पूरा हो सकेगा? महाभारत-रामायण से लेकर अंग्रेजों के आगमन से पूर्व तक का हमारा इतिहास प्रपंच और धोखे से भरा नजर आता है। वर्तमान की बात करें तो शायनिंग इंडिया और भूख से खिलखिलाते भारत के बीच का पफर्क इतना ज्यादा बढ़ गया है कि दोनों एक दूसरे को देख-समझ नहीं पा रहे हैं। बीच में है मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग वालों का भारत जो केवल अच्छा देखना और सुनना चाहता है, चाहे वह झूठ ही क्यों न हो। एक भारत है उनका जो हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी दो जून की रोटी नहीं जुटा पाते हैं। ऐसे करीब ४० से ५० करोड़ हैं। इस भारत में निठारी है, कालाहांडी है, विदर्भ है और नंदीग्राम है। यह वह भारत है जहाँ इंडिया का संविधान लागू नहीं होता। पिफर एक भारत है उनका जो उसे इंडिया कहना पसंद करते हैं। यह उनका देश है जिनके पास अरबों-खरबों की दौलत है। यह मुकेश अंबानी का देश है। उसी मुकेश अंबानी का जो अपनी पत्नी को जन्मदिन के दिन कई सौ करोड़ का उड़न खटोला उपहार में देते हैं और जिनका द्घर, जिसमें वह अपने पाँच सदस्यीय परिवार के साथ कई सौ कर्मचारी समेत रहते हैं और जिसकी कीमत कई खरब बताई जाती है। यह वह भारत है जिसकी सोच वर्ल्ड बैंक के नुमाईंदे रह चुके मनमोहन सिंह से मेल खाती है। वही मनमोहन सिंह जिनकी आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के चलते भारत और इंडिया के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। इस भारत और इंडिया के बीच एक और देश है। उनका जो मध्यवर्गीय कहलाए जाते हैं। जिनकी कोई सोच नहीं होती और जो किसी भी कीमत में इस शायनिंग इंडिया का हिस्सा बन जाना चाहते हैं। यही वह बात है जिससे मन का गीलापन और गीला होता है!
इसी पखवाड़े ओबामा की यात्राा के बाद देश के एक शीर्ष उद्योगपति ने कुछ ऐसा कह डाला कि मन उस पर भी कुछ लिखने को बेताब है। देवभूमि की माटी पर कदम रखने के साथ ही टाटा समूह के मालिक रतन टाटा कुछ भावुक हो गए। और भावुकता की रौ में बह रिश्वतखोरी पर ऐसा कुछ बोल गए जिसमें भले ही नया कुछ नहीं था लेकिन ब्रेकिंग न्यूज का पूरा मसाला जरूर था। उनका कथन था कि टाटा एयरलाइंस को लाइसेंस इसलिए नहीं मिला क्योंकि उन्होंने १५ करोड़ की रिश्वत एक मंत्राी को नहीं दी। अब यह शोध का विषय हो सकता है कि रतन टाटा एक दशक बाद क्यों यह सब बोले और क्यों नहीं उन्होंने समय रहते इस मंत्राी के खिलापफ आवाज बुलंद की? टाटा इस कथन के बाद दो एक दिन सुर्खियों में बने रहे। उनके कथन का अधिकतम असर इतना ही होना था। उनके बयान के तुरंत बाद ब्रांडेड योग गुरु रामदेव ने मोर्चा संभाल लिया। उनकी आपबीती भी कुछ ऐसी ही है। बाबा ने मात्रा सात वर्षों में इस गरीब मुल्क की जनता को योग के जरिए रोग मुक्त रहने का ऐसा मंत्रा दिया कि जनता भले ही रोग मुक्त हुई हो या नहीं, बाबा जरूर अरबपति हो गए हैं। आज उनके पास ऐशो आराम के तमाम साधन मौजूद हैं। वह निजी जहाज में उड़ते हैं। उनके प्रशंसक उन्हें करोड़ों का हेलीकाप्टर उपहार में दे डालते हैं। बाबा देश और समाज में व्याप्त हर बुराई पर न केवल जमकर प्रहार कर रहे हैं बल्कि उनका इलाज भी करने का दावा करते देश भर में द्घूम रहे हैं। उन्होंने 'भारत स्वाभिमान मंच' का गठन किया है जिसके जरिए वह राजनीति का शु(किरण करने जा रहे हैं। २०१४ के आम चुनाव में वह अपने प्रत्याशी उतारने की योजना बना चुके हैं। उनसे यह पूछने का साहस कोई नहीं कर रहा कि स्वयं उनके आर्थिक साम्राज्य में मजदूरों को न्यून्तम मजदूरी तक क्यों नहीं दी जाती? क्यों वह एक ही झटके में सौ से ज्यादा कर्मचारियों को दिव्य योग पफार्मेसी की नौकरी से निकाल देते हैं? और क्यों नहीं वह उत्तराखण्ड सरकार के श्रम विभाग के आदेशों की परवाह करते? स्वयं की जान को गंभीर खतरा बताने वाले स्वामी रामदेव की बाबत खुपिफया एजेंसियां प्रतिकूल रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी हैं जिनमें बाबा के मुख्य सुरक्षा अधिकारी पर बाबा को जान से मारने की धमकी वाली अलकायदा की पफर्जी ईमेल भेजने का जिम्मेदार बताया गया है। बाबा से पूछे जाने वाले ऐसे कई और भी प्रश्न हैं जिन्हें कोई पूछना नहीं चाहता। और सच तो यह है कि ऐसे प्रश्न पूछने वाले अब गिनती के ही बचे हैं क्योंकि भ्रष्ट आचरण के दोषी हम सभी हैं। जब अपना दामन ही दागदार है तो दूसरे पर उंगली कैसे उठाएं?
कवि ने लिखा 'यह कागज किसी बेहतर काम में आएगा।' आज के संदर्भ में यह ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। अब भ्रष्ट आचरण मुद्दा ही नहीं रहा है। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों ने एक ऐसे भारत को जन्म दे दिया है जिसका प्रतिनिधित्व हमारा मध्यवर्ग करता है। वही मध्यवर्ग जो भारत के साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहता है। उसका हमेशा येन-केन-प्रकारेण इंडिया का हिस्सा बनना भर है।
आज जो भुखमरी और महंगाई का तांडव हम देख रहे हैं वह नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्राी के तौर पर मनमोहन सिंह की नवउदार आर्थिक नीतियों का ही परिणाम है। कैसी त्राासदी है कि जिस वर्ल्ड बैंक के मुलाजिम रहे हमारे प्रधानमंत्राी ने आर्थिक सुधारों का पिटारा खोला था आज वही वर्ल्ड बैंक कहने लगा है कि विकास के नाम पर कृषि से मुँह मोड़ना ठीक नहीं है और दोनों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। यानी पहले जिसने चोरी करने के गुर सिखाए अब पुलिस बनने प्रशिक्षण भी वही देगा। और त्राासदी की इंतिहा यह कि हमारा मध्यवर्गीय समाज इस कड़वे सच से रू-ब-रू ही नहीं होना चाहता। वह इस बेहूदगी को सच समझ खुशपफहमी में जीवन काट लेना चाहता है कि हमारी प्रति व्यक्ति आय में निरंतर वृ(ि और जी.डी.पी. में वृ(ि शीद्घ्र ही इस मुल्क को विश्व की तीसरी बड़ी ताकत बना देगी।
राजेश रेड्डी की एक ग़८ाल है- 'बिल आखिर बिक ही जाती है बगावत/अब हर इक बागी का कोई दाम तय है/हिरन सोने का चाहेगी जो सीता/बिछड़ जाएँगे उससे राम, तय है/हमारे मध्यवर्गीय समाज में हर सीता सोने का दिल चाहती है और हर राम उसकी यह चाहत पूरी करने की जद्दोजहद में है चाहे इसके लिए रावण के साथ दोस्ती का हाथ ही क्यों न बढ़ाना पड़े। ऐसे में लिखते रहने भर से कुछ होने वाला नहीं है। सच तो यह भी है जो ऐसा कुछ लिख रहे हैं उनमें से भी अध्िाकांश बिकने को तैयार हैं। सभी ने अपनी-अपनी दुकाने सजा रखी है। बहुत भयावह परिदृश्य है। बचपन में केन्द्रीय विद्यालय रानीखेत के प्रांगण में रोज सुबह बगैर अर्थ समझे गाते थे 'जन गण मन अधिनायक जय हो, भारत भाग्य विधाता'। जब मतलब समझ में आया तभी से इस विधाता को ढूंढ़ रहा हूँ लेकिन कहीं ढूंढ़े नहीं मिल रहा। जो मिल रहा है वह जन गण का नहीं बल्कि शायनिंग इंडिया का विधाता निकल जाता है। कौन ढूंढ़़ पाएगा भारत के भाग्य विधाता को?
 
 
 
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