दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
पुस्तक के बहाने
बेहतर विकल्प की तलाश
श्रीभगवान सिंह

समय-प्रवाह के प्रभावान्तर्गत हर युग, हर पीढ़ी के समक्ष नई-नई समस्याएँ आती रहती हैं और उनसे निपटने का कोई-न-कोई विकल्प उस युग के दार्शनिक, मनीषी तलाशते रहते हैं। औद्योगिक क्रांति की कोख से उपजे पूंजीवादी शोषण-दोहन के बरक्स जो सबसे जबर्दस्त विकल्प उन्नीसवीं सदी में सामने आया वह था कार्ल मार्क्स-एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित 'वैज्ञानिक समाजवाद' जिसे उनके यूरोपीय इतिहास सम्मत वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार सबसे पहले औद्योगिक क्रांति की जन्मभूमि इंग्लैंड में आना चाहिए था। लेकिन जीवन-समाज का विकास किसी तय पफार्मूले के अधीन नहीं होता ओर उस वैज्ञानिक समाजवाद का स्वप्न साकार हुआ बीसवीं सदी के दूसरे दशक में रूस जैसे औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े देश में।
१९१७ में लेनिन के नेतृत्व में सम्पन्न हुई बोल्शेविक क्रांति जिसके परिणामस्वरूप शोषण विषमता से मुक्त किसानों-मजदूरों का राज्य रूस में स्थापित हुआ तो वही विश्व के समताप्रेमी बु(जिीवियों की दृष्टि में मार्क्सवाद या वैज्ञानिक समाजवाद का व्यावहारिक पर्याय बन गया। लेनिन से लेकर स्तालिन तक यानी १९५३ तक सोवियत संद्घ समाजवादी क्रांति का प्रथम प्रयोग स्थल होने के कारण समता प्रेमियों के लिए समाजवाद का क्रियात्मक मॉडल बना रहा। स्वतंत्राता की कीमत पर समानता स्थापित करने वाली इस व्यवस्था के विरु( कोई अंदरूनी आवाज उठी भी, तो उसे रूस के अंदर बुर्जुवा, प्रतिक्रियावादी कह कर दबा दिया गया, तो बाहर के समाजवाद प्रेमियों द्वारा उसे पूंजीवादियों का दुष्प्रचार कह कर अनसुना-अनदेखा कर दिया गया और दूसरे देशों में भी पूंजीवादी-सामंतवादी व्यवस्था के बरक्स सोवियत समाजवाद जैसा विकल्प लाने का स्वप्न देखा जाता रहा।
लेकिन स्तालिन की मृत्यु के बाद ;मार्च १९५३द्ध उनके खुश्चेव जैसे उत्तराधिकारी के द्वारा जब स्तालिन कालीन सोवियत समाजवाद के अलोकतांत्रिाक, दमनकारी चरित्रा का उद्द्घाटन होने लगा तो इस विकल्प से समानता के साथ-साथ स्वतंत्राता भी चाहने वालों का मोहभंग होने लगाऋ हालांकि भारत में राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादी चिंतक चालीस के दशक से ही सोवियत समाजवाद के इस अलोकतांत्रिाक चरित्रा को बेनकाब करने लगे थेऋ गाँधी जी ने १९३१ में ही हिंसा एवं बल प्रयोग पर टिकी सोवियत व्यवस्था के स्थायित्व को लेकर अपनी आशंका प्रकट कर दी थी, अमेरिकी पत्राकार लूई पिफशर ने 'गाँधी और स्तालिन' जैसी पुस्तक तथा अंग्रेजी लेखक जार्ज आरवेल ने 'एनिमल पफार्म' तथा '१९८४' जैसे उपन्यास लिखकर सोवियत समाजवाद के स्वतंत्राता विरोधी चरित्रा को बेनकाब कर दिया था। मतलब यह कि सोवियत समाजवाद के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को उद्द्घाटित करने का एक लम्बा सिलसिला रहा है। इस सिलसिले में ही एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रसि( समाजशास्त्राी डॉ. पूरन चंद जोशी की पुस्तक 'यादों से रची यात्राा' प्रकाशित होकर हमारे सामने आयी है। इसका विशेष महत्व इस बात में है कि एक मार्क्सवादी बौ(कि के रूप में पहचान रखने वाले डॉ. जोशी सोवियत समाजवाद का दूसरे देशों में विकल्प न बन पाने के कारणों का बहुत गहराई में वस्तुनिष्ठ ढंग से विश्लेषण करते हैं।
यह पुस्तक डॉ. जोशी के पूर्व प्रकाशित लेखों का संग्रह है। इनमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जवाहरलाल नेहरू, के.पी.एस. मेनन, प्रो. आशाराम, प्रो. धूर्जटि मुकर्जी, भीष्म साहनी तथा कई विदेशी लेखकों द्वारा समाजवादी सोवियत संद्घ की की गई यात्रााओं के कारण जो आँखों देखे अनुभव लिखित रूप में सामने आये, उनके आलोक में सोवियत समाजवाद की उपलब्धियों और सीमाओं का विवेचन किया गया है। साथ ही सोवियत समाजवादी व्यवस्था के ध्वंस के बाद उसके विकल्प स्वरूप उभरे नव उदारवाद-भूमंडलीकरण की बाजारवादी मंशा को उद्द्घाटित करते हुए कुछ मार्क्स के बुनियादी विचारों तो कुछ गाँधी के विचारों के मेल से एक नये विकल्प का प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया गया है।
पुस्तक के आरंभिक अध्यायों में डॉ. जोशी रूसी क्रांति तथा सोवियत समाजवादी व्यवस्था की उन महनीय उपलब्धियों को सामने रखते हैं जिनसे वे कापफी लम्बे अरसे तक अभिभूत रहे। उनके अनुसार ''रूसी क्रांति की सबसे महत्‌ भूमिका यही थी कि उसने श्रमिक जनसाधारण को इतिहास के हाशिए से इतिहास की मुख्य प्रेरक शक्ति, मुख्यकर्ता के रूप में इतिहास के केंद्र में प्रतिष्ठित किया। रूसी क्रांति मुख्या रूप से हमेशा इसलिए याद की जाएगी, अमर रहेगी कि उसने श्रमिक जनता में आत्मसम्मान जगाया और अदम्य आत्मविश्वास पैदा किया और उसकी सर्जनात्मक ऊर्जा, उनमें निहित रचनात्मक अंतः शक्ति को नये समाज नये अर्थतंत्रा, नयी राज्यव्यस्था, नयी संस्कृति के निर्माण का मुख्य माध्यम बनाया। ऐसा कोई भी काम नहीं जिसे श्रमिक नहीं कर सकते, उपलब्धियों और सपफलताओं के ऐसे कोई शिखर नहीं हैं जिन तक श्रमिक अपने श्रम, उद्यम और प्रतिभा से नहीं पहुँच सकते।''
रूसी क्रांति की उपलब्धियों को पुष्ट करने के लिए डॉ. जाेशी जवाहरलाल नेहरू, रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा की गयी रूसी यात्रााओं से अर्जित अनुभव को उद्धृत करते हुए रूसी क्रांति के महत्व को एक काल विशेष में द्घटित द्घटना तक सीमित नहीं करते, बल्कि एक परिवर्तन-प्रतीक के रूप में उसकी निरंतरता के बने रहने की उम्मीद करते हैं- ''यह एक ऐसा शिव धनुष है जिसे हर युग में तोड़ने का स्वांग कई धनुष-भंग यज्ञ में एकत्रा राजा करेंगे, लेकिन तोड़ने के लिए हिम्मत जुटानी है स्वयं श्रमिक जनसाधारण को अपनी सामूहिक शक्ति के बल पर। रूसी क्रांति इस अर्थ में एक ही बार में समाप्त होने वाली क्रांति नहीं, हर पीढ़ी के श्रमिकों को अपनी सामूहिक शक्ति के बल पर समर्थ बनने का आह्‌वान है।'' ;पृ. ३२द्ध
पुस्तक के आरंभ में डॉ. जोशी रूसी क्रांति के साथ-साथ स्तालिन के नेतृत्व में हुए विकास कार्यों का भी सकारात्मक चित्रा प्रस्तुत करते हैं, साथ ही वे सिक्के के उस दूसरे पक्ष को भी ईमानदारी से सामने रखते हैं जो स्तालिन के नेतृत्व में मार्क्सवाद-लेनिनवाद के विकृत हुए रूपों का है- ''स्तालिन ने जब मार्क्सवाद, कम्युनिज्म और कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता को स्वीकार किया तो वह मार्क्सवाद के मूल प्रेरणास्रोत, विवेकवाद और प्रबु(वाद के कठिन रास्ते से लेनिन की तरह मार्क्सवाद तक नहीं पहुँचे थे। वे एक छलांग में धार्मिक 'प्रीस्ट' से मार्क्सवादी 'प्रीस्ट' में तबदील हो गये। यही नहीं, उन्होंने मार्क्सवाद को भी धार्मिक पाठ के ही साँचे में एक नये प्रकार के धार्मिक पंथ या संप्रदाय के रूप में ढाल दिया। लेनिन के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी में अपेक्षाकृत स्वतंत्रा वैचारिक संवाद और तीव्र विचार-विमर्श संगठन की मुख्यधारा था। स्तालिन के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी धार्मिक संगठनों के पैटर्न पर नेतृत्व से कार्यकर्ताओं तक के एकतरपफा संदेश-संप्रेषण या वैचारिक प्रवचन का माध्यम बन गयी। एक आधुनिक राजनीतिक संगठन का यह कायाकल्प जो स्तालिन के नेतृत्व में रूस में हुआ, विश्वभर की कम्युनिस्ट पार्टियों का 'मॉडल' बन कर विश्वव्यापी हो गया। स्तालिन के नेतृत्व में इस महा-परिवर्तन के कारण रूस स्वयं अपने देश में ही विवेकवाद और प्रबु(वाद के प्रतिनिधि चिंतकों बेलिन्सकी, चेर्नीशेवस्की आदि की परंपराओं से कट गया।'' ;पृ. ६३द्ध
डॉ. जोशी ने स्तालिन कालीन सोवियत समाजवाद के जिस यथार्थ को सामने रखा है, उससे अब भी हमारे देश के स्तालिन प्रेमी तिलमिला उठते हैं, कारण कि वे सत्य को भी अपने मनपसंद साँचे में ग्रहण करने में विश्वास करते हैं। किंतु डॉ. जोशी का कथन शत-प्रतिशत दुरुस्त है कि स्तालिन का समाजवादी संगठन ही समाजवाद का विश्वव्यापी मॉडल बन गया- अगर विश्वव्यापी कहने में अतिरेक हो, तो वह भारतव्यापी रहा ही जिसके प्रभाव से भारत का न केवल कम्युनिस्ट आंदोलन, बल्कि उसके कब्जे में आ गया प्रगतिशील साहित्य आंदोलन भी कट्टरता, संकीर्णता का शिकार हुआ। बौ(कि ईमानदारी और साहस के साथ डॉ. जोशी, के. पी. एस. मेनन, प्रो. आशाराम, प्रो. धूर्जटि मुकर्जी आदि के हवाले इन तथ्यों को सामने रखते हैं। मिसाल के लिए द्रष्टव्य है विवेचन का एक टुकड़ा- ''भारतीय राजदूत होने के नाते के.पी.एस. मेनन इस बात के प्रत्यक्षदर्शी थे कि स्तालिनवाद से प्रभावित और संचालित नीतियों ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के चरित्रा और महत्व तथा गाँधी जैसे महान नेता के बारे में रूस की समझ और मूल्यांकन पर कितना नकारात्मक और दोनों के लिए अनिष्टकारी प्रभाव डाला। इस एकदम नकारात्मक, संकीर्णताग्रस्त और यथार्थ से कटी हुई समझ और मूल्यांकन से भारत के प्रगतिशील आंदोलन का कितना अनिष्ट हुआ इसका पूरी तरह जायजा अभी भी नहीं लिया गया है। भारत के प्रगतिशील आंदोलन का एक शक्तिशाली हिस्सा स्तालिनवादी दृष्टि, अवधारणाओं और रणनीति से गंभीर रूप से प्रभावित था और स्तालिन तथा स्तालिनवादियों से भारत के मसलों पर भी प्रेरणा और निर्देश लेने पर जोर देता था। जब भारतीय प्रगतिशील आंदोलन के अंदर वैचारिक विभाजन और टकराव निर्णायक बिंदु पर पहुँचा तो स्तालिन और उनके संकीर्ण दृष्टि सहयोगियों के हस्तक्षेप ने ही कट्टरपंथियों और संकीर्ण दृष्टि तत्वों द्वारा भारतीय प्रगतिशील आंदोलन का संपूर्ण वर्चस्व हासिल करने में निर्णायक भूमिका निभाई। इस हस्तक्षेप के द्घातक परिणाम भारतीय प्रगतिशील आज तक भुगत रहे हैं। ...आजादी के बाद पैदा हुई राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुकूल अपने को न ढालने और आजादी के पफल राष्ट्रीय राज्य के अभ्युदय के बाद निर्माण और विकास की नई संभावनाओं और अवसरों का लाभ न उठा पाने के कारण भारतीय प्रगतिशील नेतृत्व और आंदोलन ने जो अवसर खोये, जो अपरिमेय नुकसान उठाया, उसकी क्षतिपूर्ति आज तक नहीं हुई है। इन खोये हुए अवसरों के इतिहास पर अभी पर्दा ही पड़ा हुआ है।''
डॉ. जोशी की बात पर यकीन करें तो मानना पड़ेगा कि 'खोये हुए अवसरों के इतिहास पर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ है', किंतु उनके उपरोक्त विवेचन से जितना पर्दा हटता है, उससे सापफ है कि न केवल रूस में, बल्कि भारत जैसे देश में भी कम्युनिस्टों, प्रगतिशीलों द्वारा स्तालिनवाद को ही मार्क्सवाद का पर्याय समझ लिया गया। कितनी बड़ी विडम्बना हुई कि जिन मार्क्स ने धर्म को अपफीम कह कर इस वास्तविकता का ज्ञान कराया कि कैसे धर्म का इस्तेमाल लोगों को विवेकहीन संज्ञाहीन बनाने में होता रहा, उन्हीं मार्क्स के स(ांतों को स्तालिनवाद के रूप में ढाल कर रूसी और भारतीय कम्युनिस्टों ने एक धर्मपंथ में ढालते हुए अपफीम बना दिया। मास्को भारत के कम्युनिस्टों के लिए 'मक्का' बन गया और यह कहावत चल पड़ी कि 'जब मास्को में वर्षा होती है, तब भारत में कम्युनिस्ट लोग छाता तान लेते हैं।' कहने की आवश्यकता नहीं कि अपफीम जैसा होकर धर्म किस कदर विकृत, पतित हुआऋ ठीक वैसे ही स्तालिनवाद के रूप में निःशेष हुआ मार्क्सवाद भी सोवियत संद्घ के पतन का कारण बना और वही भारत के कम्युनिस्टों के लिए भी वर्षों से एक ही जगह पर कदमताल करते रहने का कारण बना हुआ है। इस कम्युनिस्ट आंदोलन में बु(जिीवियों की क्या हैसियत रही, उसे लेखक धूर्जटि बाबू जैसे समाजवाद प्रेमी बु(जिीवी के हवाले बताते हैं- ''कम्युनिस्ट आंदोलन में तो बु(जिीवी पार्टी का बंदी ;कैप्टिवद्ध है या महज पार्टी लाइन का व्याख्याता, प्रवचनकार, टीकाकार या प्रचारक। इस सब में बु(जिीवी की जगह कहाँ है। ;पृ. ७८द्ध
स्वतंत्रा चिंतन एवं प्रबु(ता के दमन पर खड़ी सोवियत समाजवादी व्यवस्था का अंत एक दिन होना ही था जो कतिपय समाजवाद प्रेमियों, स्वप्नदर्शियों के लिए बहुत बड़ा सदमा था। इसके विकल्प के रूप में गोर्वाचोव और पिफर येलत्सिन के नेतृत्व में जो नव उदारवाद आया वह और द्घातक सि( हुआ। स्तालिनवाद तो सिपर्फ सोवियत संद्घ या कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए विध्वंसक साबित हुआ जबकि यह नवउदारवाद बाजारवाद की शक्ल लेते हुए पूरे विश्व के लिए संहारक सि( हो रहा है। डॉ. जोशी इस नवउदारवाद की असलियत को भी बेनकाब करने से नहीं चूकते- ''आर्थिक पुनर्गठन के नाम पर नवउदारवादी सुधारों का आर्थिक पैकेज तो बड़े जोर शोर से लागू किया गया। अर्थतंत्रा पर राज्य का नियंत्राण हटा कर उद्योग और खेती के भी निजीकरण का अभियान भी तेजी से लागू हुआ। इन सुधारों ने नयी खुशहाली के सब्जबाग तो जनता को अवश्य दिखाये लेकिन इनका नतीजा आशा के बिलकुल विपरीत हुआ। ...रूस में समाजवाद से मोहभंग में सत्तर साल लगे। नवउदारवाद से मोहभंग में एक दशक भी नहीं लगा। यह मोहभंग रूस तक ही सीमित नहीं था। कई अन्य देशों का यही कड़वा अनुभव था। यह मोहभंग आज की भयंकर आर्थिक मंदी के पफलस्वरूप नवउदारवाद से विश्वव्यापी मोहभंग का ही पूर्वाभास था।'' ;पृ. १७२द्ध
इस प्रकार डॉ. जोशी पूंजीवाद के विकल्प में आये सोवियत समाजवाद, पिफर नव उदारवाद की खामियों, विपफलताओं का कच्चा चिट्ठा पेश करते हुए आज की वैचारिक और नैतिक शून्य दुनिया के सामने विकल्प के लिए पुनः मार्क्स की ओर गमन करते हुए दिखाई देते हैं- ''मार्क्स का निम्न विचार मानव-जाति की अनमोल उपलब्धि है और आज की स्थिति के लिए अत्यंत प्रासंगिक है- 'मानव जाति अपने सामने कभी ऐसी समस्याएँ नहीं पेश करती है जिनको हल करने की उसे क्षमता न हो।' मार्क्स की विचार-प(ति में ही समस्याओं के समाधान की संभावनाओं का भी संकेत मिलता है।'' ;पृ. १७३द्ध
मार्क्स की विचार-प(ति को लेकर डॉ. जोशी आशावादी हैं इसलिए कि उन्होंने मार्क्स को वाया स्तालिनवाद नहीं जाना है, बल्कि वे मार्क्सवाद से होते हुए स्तालिनवाद तक पहुँचे हैं। इसलिए उनका स्तालिनवाद की विपफलता को मार्क्सवाद की विपफलता का पर्याय न समझना उचित ही है। किंतु विचारणीय है कि आज भी मार्क्सवाद को अपनाने का दावा करने वाली व्यवस्थाएँ या पार्टियाँ नवउदारवाद की कोख से पैदा होती जा रही बाजारीकरण की शक्तियों का विकल्प क्यों नहीं तैयार कर पातीं? वस्तुतः देखा जाए तो उपभोक्तावाद को खाद-पानी देने वाली बाजारीकरण की शक्तियों को रोकने, निस्तेज करने के लिए मनुष्य के अंदर जिन अपरिग्रह, आवश्यकताओं पर नियंत्राण, इंद्रिय-संयम जैसे गुणों को विकसित करना आवश्यक है, उसका कोई स्पष्ट संकेत मार्क्सवाद में है ही नहीं। इस कमी को महसूस करने के कारण ही डॉ. जोशी उस लेख के अंत में गाँधी के इस विचार को सामने रखते हैं- ''प्रकृति हर एक मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए यथेष्ट सामग्री मुहैया करती है पर थोड़े से लोगों के लोभ के लिए कदापि नहीं।''
गाँधी के इस विचार में मानव-सभ्यता के बचे रहने की संभावना डॉ. जोशी को दिखाई पड़ती है जो उनकी इस टिप्पणी से स्पष्ट है- ''इस लेख का समापन हम महात्मा गाँधी के उस अमर वचन से करते हैं जो कहा तो बीसवीं सदी में गया था किंतु जो इक्कीसवीं सदी में नयी सभ्यता, विकल्प की नयी राह की खोज का आधार वाक्य बन सकता है।'' ;पृ. १७८द्ध गाँधी के इस विचार-सूत्रा को पकड़ते हुए डॉ. जोशी अंततः नये विकल्प के लिए गाँधी प्रणीत ग्राम एवं किसान प्रधान व्यवस्था के प्रति अपना सकारात्मक दृष्टिकोण प्रकट करते हैं- ''जिस तरह गाँधी जी का यूटोपिया भारतीय ग्राम और किसान केंद्रित था, उसी तरह अब जो नया यूटोपिया बनेगा, वह भी सुदूर और पिछड़े क्षेत्राों में ग्राम और किसान केंद्रित ही होगा।'' ;पृ. २२२द्ध
इस प्रकार देखा जाए तो 'यादों से रची यात्राा' समाजवाद, नवउदारवाद, उपभोक्तावाद आदि की गहरी वैचारिक पड़ताल करते हुए ऐसे नवीनतम, बेहतर विकल्प की तलाश की यात्राा है जो स्वतंत्राता, समानता, स्वावलम्बन, आवश्यकता-लोभ नियंत्राण से युक्त तथा बाजारीकरण, शहरीकरण, उपभोक्तावाद की संहारक शक्तियों से मुक्त समाज को मूर्त करने वाला हो।

२०५, श्याम अपार्टमेंट, बड़ी खंजरपुर, भागलपुर ;बिहारद्ध- ८१२००१
मो. ०९८०१०५५३९५

 
 
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