दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
संपादकीय/प्रेम भरद्वाज
कौन नायक? कौन खलनायक?
हाशिए पर हर्फ
सवालों से बचने के इस दौर में भी हम उसके सैलाब में पफंसे हुए हैं। कई बार अनचाही चीजों से दामन बचाने की कोशिश में हम और उलझते चले जाते हैं। जैसा कि उस दिन हुआ। तेरह नवंबर को। वसुंधरा का मेवाड़ इंस्टीट्यूट। प्रभाष जोशी की प्रथम पुण्य स्मृति। वहाँ बातें बहुत हुईं। अच्छी-अच्छी। खरी-खरी भी। लेकिन श्रवण गर्ग की बात ने मेरे भीतर बेचैनी पैदा कर दी जो इस समय-समाज में रहने वाले कई और लोगों की भी हो सकती है। गर्ग साहब का कहना था- सवाल ये नहीं है कि पैसे देकर जो राजनेताओं ने चुनाव के दौरान खबरें छपवायी या मीडिया ने एक 'डील' के तहत छापी उसे कैसे रोका जाए? शायद उससे बड़ा सवाल यह है कि वर्तमान समय में हमारे नायक कौन हैं? हैं भी या नहीं। सबसे बड़ी विडंबना जिन प्रतिनिधियों ने पैसे देकर अखबारों में खबरें छपवायीं और सत्ता हासिल किया। उन्हीं लोगों से हम यह आस लगाए बैठे हैं कि वो इस मामले में इंसापफ करते हुए कोई सख्त कदम उठाएँगे।

गर्ग साहब के दोनों सवाल पफन काढ़े हुए जैसे हमारे सामने पफूंपफकार मार रहे हैं। कहना न होगा ये सवाल हमें लगातार डस भी रहे हैं। डंक-दर-डंक। लेकिन हम बजाय छटपटाने या सांप को मारने के अपने भीतर पफैल रहे जहर से बेपरवाह खुद के मरने का इंतजार कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया को हमने मानो अपना प्रारब्ध मान लिया है। हमारी उदासीनता की वजह से भी जहरीले पफूंपफकारों की भयावहता में इजापफा हुआ है।

बहरहाल, सवाल अपनी जगह कायम है- कौन है आज के दौर का नायक? और अगर कोई नायक सामने नहीं है तो इसका मतलब है हम एक नायक विहीन समाज में जी रहे हैं। किसी ने लिखा है- अभागा है वो देश जिसका कोई नायक नहीं है। अगर हम बीसवीं शताब्दी पर नजर डालें। वहाँ नायकों की कमी नहीं। स्वतंत्राता आंदोलन ने कई नायक दिए- लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, महात्मा गाँधी, शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद। नेहरू और लोहिया भी नायक के तौर पर सामने आए। आजादी के बाद सर्वमान्य नायक जिन्हें लोक नायक भी कहा गया वो जय प्रकाश नारायण थे- संपूर्ण क्रांति का आएॅान करने वाले ७४ के आंदोलन के कद का कोई दूसरा आंदोलन भी नहीं हुआ। मंडल आंदोलन का नाम लिया जा सकता है। मगर उसका दायरा बेहद सीमित था। उस आंदोलन के नायक का तो पता नहीं मगर खलनायक के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्राी विश्वनाथ प्रताप सिंह को ख्याति मिली। जेपी के चेलों को जब सत्ता मिली तो संपूर्ण क्रांति दिमाग में कहीं नहीं बची रह गई थी।

पहले जरा अतीत के नायकों की सूरते हाल पर नजर डाली जाए। इतिहास में दर्ज टीपू सुल्तान भी एक हीरो थे अपने दौर के। उनके वारिस कुछ साल पहले सड़कों पर रिक्शा खींचते देखे गए। महात्मा गाँधी केवल श्र(ांजलि देने, अदालतों, दफ्रतरों की दीवारों पर टाँगने, नोट पर छापने और भाषणों-लेखों में उ(ृत करने भर के लिए रह गए हैं। यही उनकी प्रासंगिकता बची है। उनके नाम को भुनाया खूब गया। वरन वो अपने जीवन काल के अंतिम सालों में ही अप्रासंगिक हो चले थे। उनकी स्थिति महाभारत के भीष्म पितामह की सी हो गई थी जिनकी कोई नहीं सुनता था। सुधीर चन्द्र ने लिखा है- 'गाँधी के नाम पर सब कुछ निछावर करने वालों ने कुर्बानियां जो भी की हो, उन लोगों ने अपने को वैसा बनाने की कोशिश नहीं की जैसा बनकर ही गाँधी का स्वराज हासिल हो सकता था।'' रहे होंगे गाँधी अपने दौर के नायक। आज कीतारीख में तो एक पफसाना भर है- मजबूरी का नया नाम। आज के जो गाँधी हैं वो सत्ता के प्रतीक हैं। गाँधी के अर्थ और संदर्भ बदल गए हैं। जिस गाँधी ने कभी टोपी नहीं पहनी, उनके नाम पर गाँधी टोपी की परंपरा का आगाज हुआ जो अब लुप्तप्राय है। आजकल टोपी पहनी नहीं, पहनाई जाती है।

गाँधी के बाद अगर किसी के नाम को बहुत ज्यादा राजनीति के बाजार में बेचा गया तो वो राम मनोहर लोहिया का है। लोहिया की सारी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलापफ आम आदमी के लिए थी। उस दौर में उनके ढेरों अनुयायी भी थे। लोहिया आम आदमी के संद्घर्ष के प्रतीक बन गए थे। लेकिन वो प्रतीक इस कदर समाप्त हो जाएगा इसका अनुमान किसी को नहीं था। जिस लोहिया के मरने पर उसके बैंक खाते में महज सात सौ रुपये थे। उनके शिष्यों ने आज अरबों रुपये अर्जित कर लिए। लोहिया के समाजवाद को उनके चेलों ने कॉरपोरेट कल्चर में तब्दील कर दिया। लोहिया अक्सर कहा करते थे- 'कोई व्यक्ति, भ्रष्ट नहीं होता, सत्ता का वैभव उसे भ्रष्ट बना देता है। उनके इस कथन को उनके ही सबसे ज्यादा चरितार्थ किया है।

देश के कुछ और भी नायक थे जिन्हें लोग अब भूलने लगे हैं। १९७१ यु( के नायक, शहीद अब्दुल हामिद के वारिस पिछले दिनों नौकरी और मदद के लिए परेशान थे। शहीद अलबर्ट एक्का की पत्नी खेतों में मजदूरी करती थी।

सबसे बड़ी विडंबना कि सिनेमा के नायक भी अब नायक जैसे नहीं रहे-नायक खलनायक का भेद मिट गया है। जो अमिताभ बच्चन आज नायक बनकर सिल्वर स्क्रिन पर सत्तर के दशक में उभरे थे वो धंधेबाज बन गए हैं। अमिताभ ने अपनी शुरुआती पिफल्मों में आम आदमी और उसके संद्घर्ष को परदे पर प्रस्तुत कर के अपार लोकप्रियता अर्जित की। बाद की पिफल्मों में वह महलों में रहने वाले पात्रा को अभीनीत करने लगे। यह कहीं न कहीं एक प्रतिभाशाली व्यक्ति की त्राासदी है। सच कहा गया है सिनेमा राग-दरबारी नहीं है। अलबत्ता आम आदमी का लोकगीत है। लेकिन अपफसोस कि सिनेमा में आम आदमी गायब है, और उसका नायक भी। अब तो पिफल्मों के नायक अनिवार्य रूप से अमीर होते हैं। पहले की पिफल्मों में अमीर खलनायक हुआ करता था और अमीर खलनायकों की पिटाई पर सिनेमाद्घरों में तालियां बजती थीं। असल में सिनेमा ने अधिकतम लोगों तक पहुँचने के लिए आम आदमी को नायक बनाकर प्रस्तुत किया। लेकिन १९९० के बाद उदारवादी दौर में स्थितियां उलट गयीं। मणि रत्नम की पिफल्म 'गुरु' का नायक अमीर है। वह पिफल्म सपफल रही। आज की तारीख में गरीब आदमी इसलिए भी पिफल्मों का नायक नहीं होता क्योंकि वह अब खुद अमीर बनने की कलाबाजी में शामिल है।

नायक कौन है, इस मामले को बाजार और विज्ञापन ने उलझा दिया है। बाजार ने ब्रांड एम्बेस्डर पैदा किया है- शाहरुख खान, सचिन, धोनी, अमिताभ बच्चन से लेकर विपाशा और राखी सावंत तक। सच तो यह है कि नायक की अवधारणा अब धीरे-धीरे समाप्त हो रही है- व्यक्ति में सामूहिकता-समाजिकता की जगह व्यक्तिकता ने ले ली है। 'हम' का क्षरण हुआ है और वह 'मैं' में तब्दील हो गया है। कोई भी व्यक्ति किसी का नायकत्व स्वीकारने को तैयार नहीं है। अलबत्ता खलनायकों की तादाद बढ़ी है। सत्ता-विपक्ष और जनता के इस मामले में अलग-अलग मापदंड हैं। सुरेश कलमाडी, मनमोहन सिंह, शरद पवार, माओवादी, चिदबंरम में नायक कौन है, खलनायक कौन इसे आप ही तय करें।
 
 
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