दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
संवाद
'अतीत में हैं सारे
सवालों के जवाब'

मेडिकल का प्रोपफेशन छोड़कर सिनेमा में आए चन्द्रप्रकाश द्विवेद्वी ऐसे विरल पिफल्मकारों में से हैं जिनके पास मजबूत वैचारिकता, गहन अध्ययन, तीक्ष्ण दृष्टि और सरोकारी संवेदना है। चन्द्रप्रकाश पीरियड पिफल्में बनाते हैं। अतीत में गहरी दिलचस्पी है क्योंकि इन्हें लगता है- बहुत सारे सवालों का जवाब अतीत में ही है। रंगमंच से तपकर निकले चन्द्रप्रकाश की लोकप्रियता 'चाणक्य' धारावाहिक से परवान चढ़ी जिसका निर्देशन करने के साथ-साथ उन्होंने मुख्य भूमिका भी निभाई थी। इसके बाद अमृता प्रीतम के उपन्यास पर 'पिंजर' पिफल्म लेकर आए। कर्ण के जीवन चरित्रा पर 'मृत्युंजय' का भी निर्माण किया जिसे कापफी सराहना मिली। इन दिनों वो काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'काशी का अस्सी' और सम्राट अशोक के पुत्रा कुणाल पर केंद्रित पिफल्म बनाने के लिए शोधरत हैं। पेश है इनसे अनीश अंकुर की बातचीत-चन्द्र प्रकाश जी आप अपने बारे में बताएँ कि आप पिफल्मों की तरपफ कैसे आए? आज के सिनेमा को आप कैसे देखते हैं? क्या वो सही दिशा में जा रहा है?
मैं मुम्बई शहर में बड़ा हुआ और मुझे कभी ऐसा नहीें लगा कि हमारा सिनेमा गलत दिशा में है। सिनेमा में कोई सुधारक या आंदोलन करने के लिए नहीं आया था मैं। मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा कि टीवी जिस तरह से दिखाया जा रहा है वहाँ पर भारतीयता के लिए अवसर है। किसी तरह का अभाव नहीं था लेकिन उस दिशा में उस समय के लेखक-निर्देशक बहुत ज्यादा काम नहीं कर रहे थे। 'रामायण' और 'महाभारत' को टीवी पर दिखाने का विचार स्वर्गीय राजीव गाँधी और उनके सलाहकारों ने किया था लेकिन बाद में सरकार ने पफंडिग किया 'डिस्कवरी ऑपफ इंडिया' को। इससे पहले जब 'हम लोग' दिखाया जा रहा था उसी वक्त मेरे मन में 'चाणक्य' बनाने का विचार आया था। बहुत संद्घर्ष के बाद मुझे अनुमति मिली कि मैं 'चाणक्य' बनाऊँ जिसको बनाने में मुझे बहुत मजा आया। पिफर मैने लगातार कई काम किया। 'मृत्युंजय' बनाया शिवाजी सामंत के उपन्यास पर।
आपने पिफल्म को ही क्यों चुना अपनी बात रखने के लिए? सुना है कि आपने अपनी शुरुआत नाटक से की थी?
मैंने पहला नाटक इसलिए लिखा क्योंकि मुझे नाटक करना था। मैं कोई लेखक नहीं था लेकिन जब नाटक लिखा तो लगा कि मेरे अंदर एक लेखक है। सालों बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं नाटक नहीं, स्क्रीनप्ले लिख रहा था जो विजुअली बहुत रिच होते थे लेकिन उनका मंचन बहुत सपफल नहीं होता था। हमेशा होता ये था कि मैं निर्देशक का पुरस्कार लेता था, अभिनेता का लेता था लेकिन टीम का कभी न लेता था। वजह ये कि जो मेरा दृश्य-बंध था वो सिनेमा के लिए ज्यादा उपयोगी था बजाय नाटकों के। सिनेमा में आने के बाद मुझे ये अहसास हुआ। जब भी मैं जीता तो विचार की ताकत से जीता और वहाँ मेरी थीम ऐतिहासिक थी। मैंने ऐसी कल्पना की थी कि वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों अगर एक दूसरे के सामने आ जाएँ तो क्या होगा? क्यों? इसलिए कि वाल्मीकि ने एक रामायण लिखी थी जो उसके समय की आवश्यकता थी। उन्होंने राजा राम की कहानी लिखी, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की नहीं। कालांतर में जाकर एक तुलसीदास उनको मर्यादा के तौर पर स्थापित करता है। वो तुलसी के समाज की आवश्यकता थी। मेरे लिए ये विषय सोशल स्टडीज का था। लेखक जब लिख रहा होता है तो उसमें समाज का अक्स होता है। आज से पचास साल पहले सिनेमा कितना प्रभावी था, टीवी कितना प्रभावी था? लेकिन आज साहित्य की जगह समाज ले रहा है। हमारे यहाँ सास-बहू सीरियल के लोकप्रिय हो जाने को भी मैं 'सोशल इंडीकेटर' के तौर पर देख रहा हूँ न कि लेखकों के दर्शन के तौर पर। कौन ऐसा समाज है जो ऐसे 'वर्ल्ड ऑपफ पफैंटेसी' में जी रहा है। वो सामाजिक सच्चाई से क्यों कट गया है? क्या उसे अपनी सामाजिक सच्चाई अच्छी नहीं लग रही है? इसलिए वो ऐसी जगह की कल्पना कर रहा है जो एक्जिस्ट ही नहीं करता। मुझसे अगर कोई ये पूछे कि कोई समाज कैसा है? तो मैं उससे कहूँगा कि आप मुझे अपना सिनेमा दिखा दीजिए मैं समझ जाऊँगा कि आपका समाज कैसा है? उस समय जो व्यक्ति एक कविता लिख रहा है वो बीस साल बाद उसका इतिहास है। समाज के साथ उसका संबंध, उसकी इच्छाएँ, परिवार के साथ उसका संबंध सब उसकी अभिव्यक्ति है।
क्या कारण है कि आपकी दिलचस्पी भारत के अतीत में ज्यादा है, खासकर पाटलिपुत्रा के समय के अतीत के बारे में? आपने 'चााणक्य' बनायी, पिफर आप 'पाटलिपुत्रा' बनाने जा रहे हैं। हिन्दुस्तान के उस दौर के अतीत में ऐसा क्या है जो बार-बार आपका ध्यान आकर्षित करता है?
मुझे लगता है कि हमारी बहुत सारी चीजों के जवाब अतीत में हैं। आपका पर्यावरण, विचार, सोच कैसे बनती है? उसका सीधा संबंध अतीत से है। जो व्यक्ति पहला कवि था वो आज भी आपको प्रभावित कर रहा है। अगर नहीं कर कहा होता तो आज आप उसकी बात नहीं करते। उस आदिम आदमी का संद्घर्ष जो बैलगाड़ी लेकर पाटलिपुत्रा की गलियों से गुजरता था और जो आज कार लेकर पाटलिपुत्रा की गलियों से गुजर रहा है, दोनों के संद्घर्ष के सिपर्फ साधन बदल गए हैं बाकी इच्छाएँ, वही हैं। वो तब भी अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा था, आज भी लड़ रहा है। तब भी रोजी रोटी कमाना उसके लिए एक मुश्किल बात थी आज भी है। पर वो अपने को कैसे लड़ रहा था, वो इंडीकेटर है। क्यों २५०० साल बाद भी कौटिल्य हमें रेलीवेन्ट लगता है? एक व्यक्ति २५०० साल पीछे अपने समाज, अपने देश के बारे में सोच रहा है कि अगर मुझे एक राज्य बनाना है तो कैसे बनाऊँ? और अगर अब नीतीश कुमार अपने प्रशासन के बारे में सोचते हैं तो क्या उसमें कोई कनेक्शन है? उस कनेक्शन से हम कुछ ले सकते हैं? मुझे लगता है कि वो गंगा जो बह रही है उसका पानी कहाँ से आ रहा है?
मुझसे अक्सर पिफल्म इंडस्ट्री वाले कहते हैं कि तुम 'पीरियड' पिफल्म क्यों बनाते हो? मैं कहता हूँ कि इसके दो मतलब हो सकते हैं एक या तो मेरे पास ऐसा कुछ है जो दूसरों के पास नहीं है या पिफर मैं पागल हो रहा हूँ। अभी तक मुझे किसी ने पागल नहीं कहा है तो इसका मतलब है कि मैं कुछ ऐसा देख पा रहा हूँ जो दूसरे नहीं देख पा रहे है। दूसरी बात ये कि बाजार मुझसे कहता है कि उधर मत देखो क्योंकि वो तुम्हें रिटर्न नहीं दे पाएगा। पर मैं लगा रहा क्योंकि मैं वो जगह ढूँढ़ रहा हूँ जहाँ से रिटर्न्स आएँ। बल्कि मैं ये मानता हूँ कि इस देश में जब कभी बड़ी कहानियाँ आएँगी तो वो हमारे अतीत से आएँगी। और ऐसी कहानियाँ पिछले ५० साल के इतिहास में बहुत कम हैं लेकिन पिछले ५०० साल के इतिहास में बहुत ज्यादा हैं।
तो आखिर चाणक्य और चंद्रगुप्त के शासनकाल में ऐसा क्या है जो बेहद उल्लेखनीय है? वो क्या चीज थी, आपकी नजर में, जिसने उसे पूरे हिन्दूस्तान पर उसे राज करने योग्य बनाया?
मैं इतिहासकार विल्सन स्मिथ का एक वाक्य तुम्हें देता हूँ। उन्होंने लिखा कि आश्चर्य होता है कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अपने तमाम मीडियम ऑपफ कम्युनिकेशन के साथ भारत के उतने बड़े भू-भाग पर राज नहीं कर पाई और अकबर इतनी बड़ी जमीन पर राज करने का स्वप्न तक कभी नहीं देख पाया, उस पर चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने द्घोड़े की पीठ पर बैठकर कैसे राज किया? आज जब हमारे पास इंटरनेट है, मोबाइल है, एयरक्राफ्रट है तो भी हम उतने सपफल नहीं हैं, तो या तो हमने जो कहानियाँ सुनी वो झूठ है या पिफर ऐसा कुछ है जो हम समझ नहीं पा रहे हैं। मैं यही चीज ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा हूँ।
पिफल्म पत्रिाका 'कथाचित्रा' में मैंने आपका लंबा इंटरव्यू पढ़ा था उसमें आपने चाणक्य के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि ''चाणक्य की मूल चिंता 'नेशन बिल्ंिडग' की थी कि वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात कर रहे थे''। अब 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' जिस अर्थ में इस्तेमाल होता है ;चन्द्रप्रकाश द्विवेदी यहाँ कहते हैं भाजपा का राष्ट्रवादद्ध उसके केंद्र में ब्राह्मणवाद है। जबकि चाणक्य और चन्द्रगुप्त की तमाम परियोजना के मूल में ब्राह्मणवाद विरोध था। इन दो अंतर्विरोधी धाराओं का कैसे संयोजन करेंगे?
पुराणों की अगर मानें तो वो एक ब्राह्मण की बात करता है, एक चन्द्रगुप्त की बात करता है। किसी ने हमको ये कहानी नहीं सुनाई कि जब चन्द्रगुप्त के जन्म को लेकर विवाद हुआ तो ब्राह्मणों ने ये कहा कि चाणक्य ने एक ऐसे व्यक्ति को राज दे दिया जो क्षत्रिाय नहीं है। 'ब्राह्मणिकल सोर्सेज' चन्द्रगुप्त को क्षत्रिाय नहीं मानती। ये हमारा दुर्भाग्य है कि जो भी सम्राट बना उस पर क्षत्रिायता थोप दी गयी। चन्द्रगुप्त को शूद्र राजा माना जाता था। ब्राह्मणों ने कई गाँवों ने चन्द्रगुप्त का विरोध किया कि कोई शूद्र हम पर कैसे राज कर सकता है? श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुस्तक 'चन्द्रगुप्त मौर्य एण्ड हिज टाइम्स' के एपेंडिक्स में लिखा है कि चाणक्य ने बड़ी आसानी से उन ब्राह्मणों को जवाब दिया कि जो भी चन्द्रगुप्त का विरोध करता है वो यहाँ से चला जाए। वो चन्द्रगुप्त, जिसके गुरु को आप एक सनातनी के रूप में देखते हैं, वो जब मर रहा है तो ऐसा क्या है कि वो जैन बन जाता है? और उसका पोता जो है वो बौ( है। हम मानते हैं कि दूसरे देशों में अशोक बौ( धर्म को लेकर गए। यानी अलग-अलग पीढ़ी में लोगों की उपासना प(ति बदल गयी। सबने वो डिसाइड किया जो उनके उपासना प(ति के लिए अच्छा था। लेकिन राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिए क्या अच्छा है ये दूसरा मुद्दा है। चाणक्य ने ये बात बहुत कैटेगेरिकली कही। सो ये दो बातें बहुत अलग हैं जिसको हम मिला रहे हैं।
आपके सामने राष्ट्र का एक अलग बिम्ब बनता है मेरे सामने एक अलग बिम्ब बनता है। पफलां दल सांप्रदायिक है जैसे बी.जे.पी। वैसे मैं उसका कोई समर्थक नहीं लेकिन आप मुझे बताइए कि लोग चुनाव किस मुद्दे पर लड़ रहे हैं? विकास कोई आधार नहीं, शिक्षा कोई आधार नहीं। इसलिए कि वो समाज में एक रेस्टलेसनेस ला सकते हैं। अगर हम प्रगतिशील नहीं हैं तो उसका कारण या तो समाज है या पिफर मेरा पड़ोसी जो मुझे डिस्टर्ब कर रहा है। हम नहीं सोचते कि हमने क्या किया। हम अपने विरोधियों में से दानव पैदा कर रहे हैं। जो मेरे से अलग विचार रखता है वो मेरे लिए राक्षस है और उस राक्षस को मैं जितना बड़ा बनाऊँगा, जितना उसका दावनीकरण करूँगा मुझे उतना पफायदा है। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी तो राइटिस्ट थिंकर है तो उसका दानवीकरण करूँगा। जबकि हमें एक साथ बैठना चाहिए और बातें करना चाहिए।
अपने देश में बहुत सारी असहमतियों के साथ रहने की परंपरा है खुद पिफल्म 'पिंजर' भी इसी नोट पर खत्म होता है। वेद,उपनिषद रहा है तो इसके खिलापफ लोकायत, चार्वाक, न्याय, सांख्य और वैशेषिक भी रहा है।
बु( ने कहा था किसी भी एक विचार से बहुत ज्यादा प्रेम या निष्ठा आपके सोचने की स्वतंत्राता छीन लेती है। जब हम एक विचार पर स्थिर हो जाते हैं तो आपने आपनी प्रगति रोक दी। इसलिए वेद प्रमाण नहीं हैं, तो बु( भी प्रमाण नहीं हैं और यही भारतीय दर्शन की सबसे महान सोच है।
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद राष्ट्र की अवधारणा बदल गयी है या खतरे में पड़ गयी है। २००७ में राष्ट्र को नये सिरे से परिभाषित किया जा रहा है। खुद आप भले अतीत को रिडिपफाइन करने की बात कहते हैं पर मूल चिंता तो दरअसल वर्तमान व भविष्य ही होता है। यदि मैं पूछूँ की चंद्रप्रकाश द्विवेदी के सपनों का भारत कैसा हो तो आप क्या कहेंगे?
विनोद दुआ ने अपने एक लेख में सापफ कहा था कि हम लोग ये बात समझ लें कि हमारा देश सलाद के एक बाउल की तरह है जिसमें मूली है, गाजर है, टमाटर है। टमाटर को टमाटर रहने दो, गाजर को गाजर रहने दो और मूली को मूली रहने दो। मुझसे ये उम्मीद छोड़ दो कि तुम्हारी बकरीद में मैं शामिल हूँगा या पिफर अपनी दीवाली में शामिल होने के लिए निमंत्राण दूँगा। क्योंकि सह-अस्तित्व के लिए ये दिखाना जरूरी नहीं है कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। तो आप अगर इतना भी कर पाएँ कि हम आपको जीने का पूरा अधिकार दे रहे हैं तो चलेगा। प्रश्न ये भी है कि क्या एक ही अल्पसंख्यक हैं देश में? जब भी देश के संदर्भ में आप सोचते हैं तो जेहन में सिपर्फ हिन्दू और मुसलमान आते हैं। क्या दूसरे अल्पसंख्यक नहीं हैं देश में? कभी भाषायी अल्पसंख्यकता है, कभी धार्मिक अल्पसंख्यकता। हम दूसरों की बात क्यों नहीं करें? अगर ग्लोब को बाँट दें तो वहाँ पर भी एक अल्पसंख्यकता होगी। ग्लोब की सीमा इसलिए मारी जा रही है ताकि मुझे सीमा क्रॉस करते समय चुंगी न देना पड़े। उनके व्यापार का, साम्राज्य का विस्तार। ये ठीक उस तरह से है जैसे एक व्यक्ति जमीन जोतता जाता था। अब व्यापार का विस्तार हो रहा है और उसमें जो भी सीमाएँ बाधक होंगी उन सबको ध्वस्त करता जाएगा। मुझे अगर माइक्रोसॉफ्रट का विंडो चाहिए, वो अगर धर्म के आधार पर तय होगा तो वो मुझे कभी नहीं मिलेगा। सो जो कुछ भी मेरे जीवन में आवश्यक है वो सब बदलता जाएगा। इसको आप रोक नहीं पाएँगे। मैं एक समाज बनता देख रहा हूँ जिसमें व्यक्ति जरूरी है न कि धर्म। जैसे आपके रेस का जेनेटिक कोड, क्या ये बदल जाएगा? मतलब एथनिक आइडेंटिटी। संभवतः मैं ऐसा समाज बनता देख रहा हूँ जो कि मोर डिवाइन बाइ रेस दैन रिलीजन।
आपने हाल ही में कहा था कि तमाम संस्थाएँ ध्वस्त हो चुकी हैं चाहे वो राजनीति हो, शिक्षा या अन्य कोई संस्था। संस्थाएँ नहीं रह गयी हैं उसकी जगह व्यक्ति को प्रधानता मिलने लगी है। अब तक बॉलीवुड में व्यक्तित्व प्रधान रहा है लेकिन अब विचार को केंद्र में लाने की जरूरत है जाहिर है विचार आएगा तो उसे पफॉलोअप करने वाली संस्था, संगठन की जरूरत होगी। तो ले-देकर जो आप बात कह रहे हैं चाहे वो इंटरव्यू हो या सिनेमा में वो है कि एक पूरी 'पाराडाइम शिफ्रट' की जरूरत है? अभी सिनेमा की जो वर्तमान स्थिति है, पूंजी और बाजार का इतना ज्यादा दबाव है तो आप विचार को केंद्र में लाने की बात सोच भी कैसे सकते हैं?
जब आइन्सटीन ने म्त्र डब्२ लिखा तो मुझे लगता है कि वो भी एक आँषि हैं। न्यूटन भी मेरे लिए आँषि हैं, मार्क्स भी मेरे लिए आँषि ही हैं। इसलिए कि वो सब समाज के लिए सोच रहे हैं। मार्क्स अगर पूंजीवाद के खिलापफ हैं तो उनको लगता है कि पूंजीवाद ठीक नहीं है। जो सच है वही टिकेगा। आप दूसरों का रास्ता बंद कर दें तो ये ठीक नहीं है। ये मेरी किताब है और ये आखिरी किताब है। अगर आपने इसको नहीं माना है। अगर आपने इसको नहीं माना तो मेरी आपसे नहीं बनेगी।
अब एक दूसरा सवाल। जैसे आपने 'पिंजर' के लिए एक्टर के तौर पर लिया मनोज वाजपेयी को। अमूमन जो लोग पिफल्में बनाते हैं उनमें देखें यदि साल की फ्रलॉप पिफल्मों की सूची बनाएँ तो सबसे ज्यादा उन हीरो की पिफल्में रही हैं जो चॉकलेटी चेहरे वाले खानदानी एक्टर्स रहे हैं। जैसे देखिए अभिषेक बच्चन की शुरुआत की बहुत सारी पिफल्में फ्रलॉप हुईं पिफर भी हीरो वही बने रहेंगे। पर आप जैसे लोगों की एक दो पिफल्मों के साथ ऐसा हो जाए तो रेस से बाहर होने का खतरा बना रहता है। तो वो कौन सा छुपा हुआ हाथ-ीपककमद पिेज. है जो ये सब कुछ बनाए रखता है?
मनोज से पूछो वो डिस्ट्रीब्यूटर के सामने बैठना नहीं चाहता था। डिस्ट्रीब्यूटर कहते थे कि कौन देखना चाहता है ऐसे चेहरे को? यानी आप देश के ९० पफीसदी लोग जो आपकी खूबसूरती के मापदण्ड पर खरा नहीं उतरते, आप उनको रिजेक्ट करते हैं। हम आप जैसे व्यक्ति को देखना नहीं चाहते। दर्शक भी 'ब्यूटीपफुल इमेजेज' में ट्रैप में आ गए हैं।
बहुत मुश्किल है। इतनी मेंटल एक्टीविटी। अलग-अलग विषयों पर काम करने के बाद जब मैं बाजार के पास जाता हूँ तो बाजार कहता है हमें इसकी जरूरत नहीं है। सिपर्फ कुछ लोग ये तय कर रहे होते हैं और मुझे ये मौका नहीं दिया जा रहा कि मैं अपने दर्शकों से खुद को कनेक्ट कर सकूँ। जब मैं एक्टर के पास जाता हूँ और कहता हूँ कि सर! मुझे पीरियड पिफल्म बनाना है तो जवाब आता है ये प्रोग्रेस का साइन नहीं है। देश बार-बार अपने अतीत के व्यक्तित्व, चेहरे को नकार रहा है। उसका मूल्यांकन नहीं हो रहा क्यों? क्योंकि अब हम सिविलाइजेशन में रह रहे हैं। मुझे लगता है कि अष्टावक्र की कहानी लोगों को सुनानी इसलिए जरूरी है कि वह कई चीजों को सापफ कर सकता है। बॉडी शेप कोई मायने नहीं रखता महत्व रखता है आपका विचार। लेकिन सवाल ये है कि कोई मुझे कुछ कहने देगा। कहेंगे कि आप एक टेढ़े-मेढ़े आदमी की कहानी सुना रहे हैं जिसने भारतीय चिंतन में हंगामा खड़ा कर दिया। ये क्राइसिस है और इसे मैं 'क्राइसिस ऑपफ पफेथ' कहता हूँ।
जैसे आप कह रहे थे कि किसी राजनेता के लिए कॉंस्टीट्यून्सी की जरूरत होती है लेकिन उसे कम से कम चुनावों में ही,जनता का समर्थन हासिल करना पड़ता है। हिन्दी पिफल्मों के कितने हीरो को लोग कितना भी रिजेक्ट करें हीरो पैरवीपुत्रा ही बने रहेंगे। अभिषेक बच्चन यदि सामान्य द्घर के होते तो क्या इतनी पिफल्में पिटने के बाद भी चलते? आपको नहीं लगता कि पॉलिटिक्स से भी कम डेमोक्रेटिक स्पेस है बॉलीवुड में?
उत्तराधिकार। एक नेता के बेटे को उसकी कांस्टीट्यून्सी बड़ी आसानी से मिल जाती है। जिनके पास ये उत्तराधिकार नहीं है उनको संद्घर्ष करना पड़ता है। हम वो लोग हैं जिनका कोई क्षेत्रा नहीं है और हम लोग उसके लिए लड़ रहे हैं। वो चाहे राजकुमार हिरानी हों या अनुराग कश्यप। हमारा कोई क्षेत्रा नहीं है किसी पिफल्म पफैमिली को बिलाँग नहीं करते इसलिए जो सहयोग उन्हें बहुत आसानी से हमें मिल जाता है वो हमें नहीं मिल पाता। एक सपफल व्यक्ति के बेटे के लिए पिफल्म बनाना बहुत आसान है। मुझे अगर हिन्दी पिफल्म के बड़े सितारे चाहिए तो सबसे पहले मुझे उनके सेक्रेटरी के साथ दो साल बिताने पड़ेंगे तब जाकर मैं अभिनेता तक सिपर्फ अपनी बात रख सकता हूँ। इसलिए कि 'प्रॉसेस ऑपफ इलिमिनेशन' वहीं से तय होता है। वहाँ परिचय में पूछा जाएगा कि क्या नाम है आपका? चन्द्रप्रकाश द्विवेदी? बहुत पुराना नाम है? इसका एक आधार बताता हूँ। 'पिफल्म इन्पफॉरमेशन' नाम की एक मैगजीन है। हाल में गोविंदा की एक पिफल्म आई थी 'सुख' जो असपफल रही। असपफलता पर मेरी कोई टिप्पणी है, पिफल्म में गोविंदा का नाम है चंद्र प्रकाश। मेरी मित्रा कोमल नंदिता ने मैगजीन में 'सुख' का रिव्यू लिखा था कि जिस पिफल्म के नायक का नाम चंद्र प्रकाश है वो पिफल्म कितनी आउटडेटेड होगी, इसका अंदाजा दर्शक खुद लगा सकते हैं। मैंने कोमल को पफोन किया तुम्हारे ऐसा लिखने से मैं अपना नाम नहीं बदल लूँगा। ये सिपर्फ विचार का मामला है। अगर आप 'याज्ञवल्क्य' कहेंगे तो लोग आपसे पूछेंगे कि आप कौन सी प्रजाति के हैं। यानी यहाँ नाम भी 'मार्केट सैवी' है। कल मैं अपना नाम मैक्डॉनल्ड रख लूँ तो बहुत लोग खुश हो जाएँगे।
ये समर्थन थोड़े ही है, ये तो इंपोज्ड-थोपा हुआ- है जनता पर जिसे आप कह रहे हैं कि जनता लेजिटिमाइज करती है वो तो दरअसल थोपा हुआ है। ये अभिषेक-ऐश्वर्या की शादी में आम लोगों की दिलचस्पी का मामला नहीं है। यदि आप बार-बार एक ही चीज तमाम चैनल पर, अखबार के पहले पन्ने पर दिखाएँगे तो मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं रह जाता। मीडिया व सिनेमा दोनों के पीछे मार्केट और उससे जुड़ा क्लास तो एक ही है?
सवाल अभिषेक-ऐश्वर्या का नहीं है। मीडिया में बैठे लोग ये तय करते हैं कि क्या दिखाया जाएगा? हमारे साथ समस्या ये है कि हम अपने भीतर बैठे उस आदिम राजा को आइडेंटिपफाई नहीं कर रहे जो हर किसी का दमन, हर किसी पर रूल करना चाहता है। मुझे स्वतंत्राता दीजिए और मुझ पर से विवेक और अंकुश हटा दिया जाए तो मैं क्या करूँगा? मैं सिपर्फ अपने सिनेमा की बात करूँगा और दुनिया मुझे कहे कि मैं महान हूँ। ये बात हर व्यक्ति में इतनी बड़ी है। मैं क्यों कहता हूँ कि मैं इंडियन हूँ क्योंकि पूरे भारतीय चिंतन में खुद को पहचानने पर जोर दिया गया है। 'नो योरसेल्पफ' यदि आप खुद जानेंगे तभी खुद को बदल पाएँगे। मुझे लगता है उपनिषद का काल भयंकर उथल-पुथल का होगा। सामाजिक टकराहटों का होगा वरना एक आदमी सोचता कि जो मुझमें है वो उसमें है वो एक यूनीपफाईंग पफैक्टर ढ़ँूढ़ रहा है। क्यों कृष्ण कहते हैं कि मरने वाला एवं मारने वाला एक ही है। 'वी आर ट्राइंग टू पफाइंड आउट समथिंग विच यूनाइट अस' जब भी मैं सोच रहा हूँ कि एक एंकर हो तो मैं क्यों की रहा हूँ। हमारे यहाँ बहुत पहले कह दिया गया।
मैं ब्रह्मात्मज को कह रहा था कि हमारे गाँव कापफी पीछे हैं। मैं जब गया से गुजर रहा था तो लगा कि इन गाँवों को बदलने में ५० साल लगेंगे जब तक कि कोई महारथी न आ जाए और एक झटके में बदल दे। क्योंकि उनकी सोच भी वैसी ही है। जो आदमी जहाँ खड़ा है वहीं थूक रहा है। समझ नहीं आता कि इसमें वायरस है, वैक्टीरिया है, वो खुद मर रहा है। देखो सूरत में जब तक महामारी नहीं आयी वो शहर जागा नहीं वरना वह वैसे ही कूड़ा-करकट वाला शहर था। सिविलाइजेशन के ग्रोथ में कुछ लोग कापफी आगे निकल गए हैं कुछ पीछे रह गए। क्यों निकल गए? क्योंकि उनके पास साधन है। कुछ ने पुरुषार्थ से पाया कुछ को उनकी परंपरा में मिला। ऐसा तो नहीं है कि यहाँ से आई.ए.एस वगैरह नहीं आ रहे? यहाँ डॉक्टर नहीं हैं? लेकिन यहाँ डिस्ट्रीब्यूशन ऑपफ वेल्थ कापफी असमान है। वो चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते।
यही असमान प्रकृति सिनेमा में भी है। गरीब के लिए सिनेमा बन नहीं रहा। कहीं ऐसा तो नहीं कि शाहरुख को चमकते वस्त्राों में देख गाँव का लड़का अपनी आकांक्षा को थोड़ा सहला लेता है। हो ये रहा है कि शाहरुख का चरित्रा नहीं, व्यक्ति के तौर पर बड़ा बन रहा है। जबकि भरतमुनि व विश्व के सारे नाटककार एक चरित्रा को सामने रख रहे थे, अभिनेता को नहीं। ठीक वैसे ही मुन्ना भाई एवं संजय दत्त को मिला रहे हैं।
आखिर सोचने का काम, रिसर्च का काम बॉलीवुड में इतना कम क्यों होता है? साहित्य में आप देखें कापफी कुछ नए ढ़ंग से सोचने, विचारने, रिसर्च का काम हो रहा है। ज्यादातर इस पफील्ड में भेंड़चाल वाले लोग हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो अलग ढंग से काम में लगे हैं। आप जैसे लोग माइक्रोस्कोपिक मॉइनॉरिटी में क्यों हैं?
सवाल ये है कि क्या पश्चिम में ऐसा नहीं होता होगा। पिफर वो लोग हमसे आगे कैसे निकल गए? उनके पास हथियार था शिक्षा। उन्होंने जिस तरह शिक्षा पर जोर दिया वो हम लोग नहीं कर पाए। अभी तक ऐसा दर्शक वर्ग तैयार नहीं हुआ है जो लगातार बदलने वाली चीजों को स्वीकार कर सके। बॉलीवुड के सबसे कम लोकतांत्रिाक होने का सीधा सा कारण है कि आज अगर आप एक होटल बनवाएँ बैंक से लोन लेकर तो १०-२० साल उस होटल का आपको रिटर्न मिलता है। सिनेमा अभी भी कुछ लोगों के हाथ में है। उड़ीसा में बैठा एक डिस्ट्रीब्यूटर तय करता है कि जनता को क्या देखना है। जनता भी ये तय नहीं करती। क्या हमने कभी ये कल्पना की थी कि दौ सौ व्यक्तियों का एक ऑडिएंस आएगा। मैं ये भी कहता हूँ कि आप ७५ का एक थियेटर बना दो। टैक्स एक्जेम्प्ट कर दो। उसके साथ एक रेस्टोरेंट जोड़ दो। ताकि वो जगह खुद सेल्पफ-एपफीशिएंट हो जाए। हम लोगों के यहाँ कोई कुछ सोचने को तैयार नहीं है। हो सकता है कि ये द्घाटे का सौदा हो। लेकिन अगर एक कुनिका वर्मा कोई अच्छी पिफल्म बनाती है और पटना में दिन में सिपर्फ ७५ लोग उसे देखना चाहते हैं तो उनको ये स्पेस मिलना चाहिए। क्यों आज मुंबई में पृथ्वी थियेटर के अलावा कोई थियेटर नहीं है। मैंने मंत्रिायों को समझाने की कोशिश की। कुछ मत करो उसके साथ खाने-पीने की दुकान जोड़ दो जहाँ लोग खा-पी सकें। जिसको खाना हो वो खाए-पीए जिसको देखना हो वहाँ जाए। शायद रास्ता निकल सकता था लेकिन हम वो रास्ता ढ़ूँढ़ नहीं रहे हैं। हम वही १२०० का थियेटर, ४०० का मल्टीप्लेक्स लेकर चल रहे हैं। एक बात और, टी.वी पर पहले बूढ़े होते थे। एक माँ होती थी जिसकी उम्र ५० साल होती थी, एक दादी होती थी जिसकी उम्र ७०-८० साल होती थी। लेकिन अब क्या हो रहा है कि आपके पास एक दादी है जिसकी उम्र २४ साल है और उसकी गणना ठीक १८० साल के भीष्म पितामह की तरह है। उसके चेहरे पर एक भी झुर्री नहीं है। आश्चर्य करने वाली बात ये है कि हम सब खुशी-खुशी इसे एक्सेप्ट कर रहे हैं। क्या इसका मतलब ये है कि चेहरा-मोहरा बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह गया? अचानक क्या हुआ हिन्दुस्तान को, ये समाज वैज्ञानिकों को ढ़ूँढ़ना होगा। जब 'डिस्कवरी ऑपफ इंडिया' बन रहा था तो उसमें ज्यादातर अभिनेता ४०-५० साल से उपर के थे। रामायण बन रहा था तो उसमें दशरथ बूढ़े थे। महाभारत बन रहा था तो उसमें सपफेद दाढ़ियों के साथ बड़े-बड़े कैरेक्टर थे। अब अगर वो बने तो क्या गाँधारी २४ साल की होगी? भीष्म की उम्र क्या होगी। क्या वो दाढ़ी लगाकर १८० साल का रहेगा या वैसा ही जवान रहेगा। क्यों? ये सवाल उठता है इसलिए की डायनेमिक्स बदल गए हैं टी.वी में। इसके मतलब हैं। क्या दर्शक सीरियस है या दर्शक सीरियस नहीं है या पिफर दर्शक के लिए कोई महत्व नहीं रखता कि उसके बाल सफेद हैं या काले। दर्शक अगर रस देख रहा है तो वो रस क्या है? क्या वो रस उसके भीतर का अभाव है जिसकी पूर्ति हो रही है। तो पिफर वो अभाव क्या है? क्या वो वैसे ही जीना चाहता है जैसे उसका पात्रा जी रहा है। क्या वो उसकी पफैन्टेसीज को शेयर कर रहा है। बहुत सारे सवाल हैं जिन पर कायदे से सोचा जाना चाहिए। कोई दूसरा देश होता तो वहाँ सोशल डायनेमिक्स पर रिसर्च शुरू हो गया होता। मैं लड़ता था जब मैं टी.वी का हेड था। मुझे आप बताएँ कि अगर हममें से कोई कोट पहनकर मई के महीने में निकले तो क्या हालत होगी। पर आज टी.वी का हर आदमी कोट पहना हुआ है और कोई बैठता नहीं है। सब खड़े होकर बातें करते हैं। किसी के किचेन में कोई काम नहीं होता। किचेन में काम भी हो रहा है तो महिलाएँ ऐसी-ऐसी भव्य साड़ियाँ पहनी हुई होती हैं इतने गहनों से लदी होती हैं कि लगता है जैसे किसी विवाह में जाना हो। कभी किसी छौंक से धुँआ नहीं उठता। एक आर्टिपिफशियल मोड पर नहीं चली गयी है जिंदगी?
जब पफोटोग्रापफी का आविष्कार हुआ तो पेंटिंग की विधा कापफी बदल गयी। पहले पेंटर्स लोगों की हूबहू तस्वीरें बनाते थे। पफोटोग्रापफी के बाद 'एब्सट्रेक्ट' से लेकर 'क्यूबिज्म' तक तरह तरह की चीजें आ गयीं। पहले मनोरंजन के लिए नाटक था अब सिनेमा आ गया। अब मनोरंजन द्घर बैठे सुलभ हो गया है टेलीविजन व सैकड़ों चैनल के माध्यम से। अब क्या सही वक्त नहीं है कि सिनेमा को ठहर कर अपनी मनोरंजन प्रदान करने वाली भूमिका पर पुनर्विचार करना चाहिए? जैसे एक उदाहरण दूँ जब मनोरंजन का प्रधान माध्यम सिनेमा थिएटर से सिनेमा की ओर हो रहा था उस वक्त महान नाटककार बर्तोल्तब्रेख्त ने थिएटर के डिडैक्टिक स्वरूप में बदलने की बात की। मतलब ऐसा थिएटर जो लोगों का शिक्षण-प्रशिक्षण कर सके।
मनोरंजन सिपर्फ एक व्हीकल था। मुझे यहाँ से लुधियाना जाना है पर अब लुधियाना मेरा डेस्टीनेशन नहीं रह गया है। हमने रेडियो का आविष्कार क्यों किया? सिपर्फ संवाद के लिए। मैं कब उससे बातें करूँगा ये मुझे नहीं मालूम तो मैं क्या करता हूँ बीच में गाने बजाता हूँ ताकि वो मुझसे जुड़ा रहे। लेकिन जब देश आजाद हुआ तो तीन चीजों पर ध्यान जाना था। पहला था शिक्षा? पिफर प्रसार, और पिफर प्रचार। आजादी के १०-२० साल के बाद क्या हुआ प्रसार? शिक्षा और उसके बाद क्या हुआ? प्रचार, प्रसार और शिक्षा गायब। न्यूज चैनल को देखिए तो वो ड्रामा चैनल होते जा रहे हैं। 'हत्यारा कौन' 'क्राइम रिपोर्टर' न्यूज कहने का तरीका भी ड्रामेटिक हो गया है। जिस चैनल का काम सिपर्फ सूचना देना था अब उसके पंक्चुएशन, पॉज, एक्सप्रेशन इस तरह के हो गए हैं कि अब वो ड्रामा लगता है। ये उसकी मजबूरी हो गई है क्योंकि इसके बिना वो दूसरे चैनल से कम्पटीट नहीं कर सकता। ठीक वैसे ही जैसे मुंबई में अगर आपको ट्रेन से यात्राा करनी है तो बिना धक्का दिए आप यात्राा नहीं कर सकते।
पूरे हिन्दी सिनेमा में देखें तो एक ओर करण जौहर, यश चोपड़ा वाला 'पफॉरेन टेरीटरीज' को ध्यान में रखने वाला 'क्रॉस ओवर' सिनेमाा द्घई के शब्दों में कहें तो '' मैं बिहार यूपी के चवन्निया दर्शकों के लिए सिनेमा नहीं बनाता'' ये दो किस्म के दर्शकों का समूह है और यह एक बिग डिवाइड बनता जा रहा है। इनकी पिफल्में यहाँ सपफल हो गयीं तो ठीक वरना बाहर का मार्केट तो है ही। इनकी पिफल्मों में कॉरपोरेट ब्रांडिंग ज्यादा होती है। कॉरपोरेट से जुड़ा हुआ जो मिडिल क्लास है उसी के लिए बनाते हैं ये पिफल्में। ये जो डिवाइड है जिसके एक ओर चंद्र प्रकाश द्विवेदी, राजकुमार हिरानी जैसे लोग तो दूसरी ओर करण जौहर, यश चोपड़ा जैसे। हर चीज में डिवाइड है। अमीर-गरीब का डिवाइड। साहित्य में डिवाइड। दो तरह का वर्ग है। सिनेमा में अब तक ये डिवीजन सतह पर नहीं आया था लेकिन क्या अब वो डिवीजन शार्प होता जा रहा है?
मैं इस डिवीजन को शार्प होता नहीं देखता। मैं जब टीवी पर काम करता था तब हमारी भाषा थी- मैं कुछ डिसाइड नहीं करता बल्कि मार्केट डिसाइड करता है। मार्केट के पास चेहरे हैं। इसका अपना सोशल डायनेमिक्स है जो डिसाइडिंग पफैक्टर हो गया है। आपकी वैल्यू आउटडेटेड हो चुकी है। जो सिनेमा देखने आ रहे हैं वो सिपर्फ मनोरंजन के लिए आ रहे हैं सोचने विचारने के लिए नहीं। जो सोचना विचारना चाहता है उनके लिए द्घर पर किताबें बहुत हैं। पिफर एक आंदोलन ये भी शुरू होगा कि साहित्य की जरूरत नहीं है। जब शादियों की खबर पहले पन्ने पर आ जाती है तो इसका मतलब है कि समाज को उसका समर्थन है। आप ऐसा एक अखबार नहीं निकाल सकते जिसमें सिनेमा की खबर नहीं है। मैं देख रहा हूँ कि हर प्रयत्न के बावजूद क्यों श्याम बेनेगल २५ साल तक अपनी 'उपरांत' के लिए डोनर का इंतजार करता है। क्यों गोविंद निहलाणी बैठे रहते हैं?
मैं २० साल तक के लिए खटना नहीं चाहता इसलिए मैं बने बनाए 'पफार्मूले ऑपफ सक्सेस' पर चलूँगा। एक राजकुमार हीरानी आता है सपफल हो जाता है। लेकिन अगर उसके पास मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस की सपफलता नहीं होती तो वह यह कहानी किसी को सुनाता ही नहीं कि एक आदमी को गाँधी दिखाई देता है। आज विशाल भारद्वाज नयी विजुअल गढ़ रहा है, उसकी पिफल्मों में हिंसा-प्रतिहिंसा है। कहीं वो समाज में बैठे हुए गुस्से को आवाज देने की कोशिश कर रहा है। प्रकाश झा के सिनेमा की वोकैब्यूलरी बिल्कुल अलग है। दुनिया में कहीं भी उनका सिनेमा लगा दो, टाइटिल हटा दो और किसी हिन्दुस्तानी को बुलाओ वो कहेगा शायद ये प्रकाश झा की पिफल्म है क्योंकि उनकी पिफल्मों में ऐ सोशल कांशसनेस है। वो कुछ कहने की कोशिश कर रहे हैं जिसको वो एक ड्रामैटिक अंदाज में कह रहे हैं, दामुल के अंदाज में नहीं। उनको ये पता है कि अब मुझे १० करोड़ नहीं डुबोना है पर वो 'दामुल' से हट गए हैं मैं ऐसा नहीं मानता। बुनियादी सेंसिबिलिटी वही है।
जैसे आपने सोशल इंडीकेटर वाली बात की। आजादी के पश्चात ज्यादातर रोमांटिक किस्म की पिफल्में बनने लगीं। हालांकि सीरियस पिफल्मकार विमल राय, आँत्विक द्घटक आदि उस वक्त भी अलग ढ़ंग से सोच रहे थे। हिन्दी पिफल्मों ने रोमांटिक पिफल्मों के माध्यम से नये आजाद हुए हिन्दुस्तान की आकांक्षा, ख्वाहिश को दिलीप कुमार, राजकपूर व देवानन्द की तिकड़ी अभिव्यक्त करती है। पिफर एक वक्त आता है जब आजादी के स्वप्नों से मोहभंग की प्रक्रिया में जे.पी मूवमेंट पैदा होता है और सिनेमा लगभग इसी वक्त 'जंजीर' पिफल्म से 'यंग्रीयंग मैन' को सामने लाता है। लोगों का गुस्सा आक्रोश नब्बे के दशक तक आते-आते स्ट्रेशन में तब्दील हो जाता है जो 'डर' पिफल्म के शाहरुख खान के रूप में सामने आता है। हिन्दुस्तानी समाज के हर संक्रमणश्ील मोड़ को कोई न कोई पिफल्म अभिव्यक्त करती है। लेकिन अभी हिन्दुस्तान में चारों ओर जो अराजकता, जो उलझन तथा इससे निकल पाने की जो बेचैनी, छटपटाहट है कोई रास्ता नहीं मिल रहा। इस सेंसिबिलिटी को कोई पिफल्मकार क्यों नहीं पकड़ पा रहा?
मैं कई बार सोचता हूँ कि यश चोपड़ा और उनके समकालीन लोगों ने विभाजन पर पिफल्में क्यों नहीं बनायीं जबकि वो उनकी आँखों के सामने हुआ। २००७ में पिफल्ममेकर कहता है कि मेरा काम रिपफॉर्मिस्ट का नहीं है, मेरा काम थिंकर का नहीं है। मैं अपनी पूंजी लगा रहा हूँ और मुझे वो वापस चाहिए। कोई एक व्यक्ति अपने विल से, गुस्से से समाज को बदल देगा? हम सब जानते हैं ऐसा नहीं होने वाला। पर वो एक ग्रुप के लेखकों ने अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व के साथ ऐसी केमिस्ट्री तैयार की जिसने हम लोगों को एक महानायक दिया और आज भी वो जो चरित्रा निभा रहे हैं उसमें जीते हैं। लेकिन जब हमें न्यूयार्क की गलियाँ, गया की गलियों से ज्यादा अच्छी लगने लगें तो मनोचिकित्सकों को सोचना शुरू कर देना चाहिए कि हमने कब-क्यों अपनी सोशल रियलिटी से भागना शुरू कर दिया है। क्या हम इन रियलिटीज को बदल पायेंगे या पिफर हम एक मसीहा के इंतजार में हैं और जब हम उसको बदलने की बात नहीं करते तो सिनेमा भी हमारे लिए अपफीम साबित हो रहा है जैसे धर्म को अपफीम कहा जाता था। इन दिनों मैं उपनिषद पढ़ रहा हूँ तो लगता है कि आनंद कहाँ है? वहाँ है या यहाँ है? हमने इसे स्वीकार कर दिया है कि यह यहाँ है। अब आप इतने बड़े चिंतन को क्या कहेंगे कि जो कहता है कि आनंद तुम्हारे भीतर है। मुझे लगता है कि शुरू में अगर ये पिफल्में बनी होतीं जिनका नायक कोई अमिताभ बच्चन होता और वो दर्शकों के सामने विचार की एक परंपरा रखता तो हो सकता है कि सिनेमा का शेप दूसरा हो सकता था। मैंने चाणक्य बनाते समय शेखर कपूर से कहा था कि इस देश के व्यक्ति को आत्मविश्वास की जरूरत है, वो कुछ भी कर सकता है। हमारे आदिग्रंथ कह रहे हैं यू आर दी सुप्रीम पॉसिबिलिटी, यू आर द मैनिपफेस्टेशन ऑपफ दैट इनपफाइनाइट डिवाइन' जो सब कुछ कर सकता है। मैंने जब चाणक्य बनाया था तो ये कहना चाह रहा था कि एक सामान्य व्यक्ति जिसके पास न सेना है न साधन है सिपर्फ संकल्प है, उद्देश्य है। वो आदमी धोती पहनता है, कंधे पर गमछा रखता है। उसके शिष्य जो भिक्षा मांगकर लाते हैं वो खाता है। कुटिया में रहता है। मुझे याद है मेरे एक दोस्त ने चाणक्य पर नाटक लिखा था। उसमें कहा था कि चंद्रगुप्त बहुत नाराज हैं। नाराजगी की वजह थी कि चाणक्य तय करता था कि चंद्रगुप्त कहाँ सोएगा? क्या खाएगा? किससे प्रेम करेगा? विवाह करेगा? तो वो चाणक्य से कह देता है ये है राजा बनने का सुख? चाणक्य जवाब देता है ''चंद्रगुप्त! मैंने तुम्हें साम्राज्य देने का वादा किया था सुख देने का नहीं। राजा होना सुखी होने का रास्ता नहीं है।'' तू समझ ले कि सुख बाहर नहीं है वो भीतर है। क्यों हिमालय पर रहने वाला आदमी सुखी है जब आप वहाँ जाते हैं तो वो आपको देखकर मुस्कुराता है? यानी हमारी सोच में कोई गड़बड़ है।
मैं नहीं जानता पिछले ५० सालों में हिन्दुस्तान की पहचान परिभाषित करने के लिए आपकी तरह और पिफल्मकार चिंतित या परेशान रहते हैं या नहीं कि क्या है हमारी आइडेंटी? विशेषकर ग्लोबलाइजेशन के बाद पूरी दुनिया में 'नेशन' और इसके संदर्भ में जो आइडेंटिटी पॉलिटिक्स चल रही है?
कुछ दिनों पहले ही उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने कहा कि संस्कृत बैलगाड़ी की भाषा है। मेरे पिताजी संस्कृत के शिक्षक थे और उन्होंने ये तय किया कि मैं अपने बेटों को संस्कृत नहीं पढ़ाऊँगा क्योंकि इससे उनकी जीविका नहीं चलने वाली। मैं जब ग्रंथों को पढ़ता हूँ तो मुझे उसे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना पड़ता है। ग्रंथों को डिकोड करने की कोशिश लगभग समाप्त हो चुकी है।

२०५, द्घरौंदा अपार्टमेंट, पश्चिमी लोहानीपुर, कदमकुंआ, पटना-३
मो. ०९८३५४३०५४८

 
मैंने चाणक्य में ये कहना चाहा था कि एक सामान्य व्यक्ति जिसके पास न सेना है न साधन है सिपर्फ संकल्प है, उद्देश्य है, वो आदमी धोती पहनता है, कंधे पर गमछा रखता है। उसके शिष्य जो भिक्षा मांगकर लाते हैं वो खाता है। कुटिया में रहता है। मेरे एक दोस्त ने चाणक्य पर नाटक लिखा था। उसमें कहा था कि चन्द्रगुप्त बहुत नाराज हैं। नाराजगी की वजह थी कि चाणक्य तय करता था कि चन्द्रगुप्त कहाँ सोएगा? क्या खाएगा? किससे प्रेम करेगा? किससे विवाह करेगा? तो वो चाणक्य से कह देता है- ये है राजा बनने का सुख? चाणक्य जवाब देता है ''चन्द्रगुप्त! मैंने तुम्हें साम्राज्य देने का वादा किया था सुख देने का नहीं। राजा होना सुखी होने का रास्ता नहीं है।''
 
अलग-अलग विषयों पर काम करने के बाद जब मैं बाजार के पास जाता हूँ तो बाजार कहता है हमें इसकी जरूरत नहीं है। सिपर्फ कुछ लोग ये तय कर रहे होते हैं और मुझे ये मौका नहीं दिया जा रहा कि मैं अपने दर्शकों से खुद को कनेक्ट कर सकूँ। जब मैं एक्टर के पास जाता हूँ और कहता हूँ कि सर! मुझे पीरियड पिफल्म बनाना है तो जवाब आता है ये प्रोग्रेस का साइन नहीं है। देश बार-बार अपने अतीत के व्यक्तित्व, चेहरे को नकार रहा है। उसका मूल्यांकन नहीं हो रहा क्यों? क्योंकि अब हम सिविलाइजेशन में रह रहे हैं। मुझे लगता है कि अष्टावक्र की कहानी लोगों को सुनानी इसलिए जरूरी है कि वह कई चीजों को सापफ कर सकता है
 
मुझसे अक्सर पिफल्म इंडस्ट्री वाले कहते हैं कि तुम 'पीरियड' पिफल्म क्यों बनाते हो? मैं कहता हूँ कि इसके दो मतलब हो सकते हैं। एक या तो मेरे पास ऐसा कुछ है जो दूसरों के पास नहीं है या पिफर मैं पागल हो रहा हूँ। अभी तक तो मुझे किसी ने पागल नहीं कहा है, तो इसका मतलब है कि मैं कुछ ऐसा देख पा रहा हूँ जो दूसरे नहीं देख पा रहे हैं। दूसरी बात ये कि बाजार मुझसे कहता है कि उधर मत देखो क्योंकि वो तुम्हें रिटर्न नहीं दे पाएगा। पर मैं लगा रहा क्योंकि मैं वो जगह ढूँढ़ रहा हूँ जहाँ से रिटर्न्स आएँ। बल्कि मैं ये मानता हूँ कि इस देश में जब कभी बड़ी कहानियाँ आएँगी तो वो हमारे अतीत से आएगी। और ऐसी कहानियाँ पिछले ५० साल के इतिहास में बहुत कम हैं लेकिन पिछले ५०० साल के इतिहास में बहुत ज्यादा हैं।
 
 
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