दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
वाद विवाद ओर सवाद
कथा-आलोचना के नए संदभ
 
अजय वर्मा
एक धुंधलके में डूबी युवा कहानी विमर्शों की रोशनी में सापफ होने लगी है- खासकर 'परिकथा' और 'पाखी' के परिचर्चाओं-संवादों के बाद। पिछले अंक में 'पीढ़ियाँ : आमने सामने' के तहत बातचीत में काशीनाथ सिंह ने युवा कहानी के चेहरे को एक तरह से स्पष्ट कर दिया-दो भागों में विभाजित कर। अब उस पूरी बातचीत और युवा कहानी के ताप-तेवर पर तीव्र प्रतिक्रियाएँ आयी हैं, जिसे हम आगामी अंकों में भी जारी रखेगें। इस विमर्श पर कोई भी लेखक या सुधी पाठक अपने विचार रख सकता है। अजय वर्मा का लेख युवा कहानी पर है न कि पिछले अंक में प्रकाशित बातचीत पर।

लोचना के प्रति जो स्थापित मान्यताएँ हैं उनमें एक आश्वस्ति है कि लिखित शब्द ही आलोचना में हस्तक्षेप करते हैं और आज के सायबर कल्चर की देन ब्लॉग लेखन वगैरह से आलोचना की सेहत पर कोई पफ़र्क नहीं पड़ता। यह एक द्घातक किस्म की आश्वस्ति है क्योंकि ब्लॉग आज के समय की तकनीक का एक अहम नमूना है और इसे महत्वहीन, अगंभीर मानकर इसकी उपेक्षा करना शुतुरमुर्ग वाली मूर्खता होगी। भले ही तकनीकि संदेश नहीं होती, पर ऐसी तकनीकि जो न प्रामाणिकता, न लेखकीय-आलोचकीय ईमानदारी के लिए गुंजाइश छोड़ती है, संदेश को भ्रमपूर्ण, उच्छृंखल और उद्दंड तो बना ही सकती है और यह स्थिति रचना और आलोचना दोनों को ताबूत में बंद करने की कोशिश की चेतावनी है। इसीलिए इस लेख का आधार ब्लॉग पर पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के कहानीकारों के बीच छिड़ी बहस है।
नई सदी में कथाकारों की जो नयी पीढ़ी आयी उसने विस्पफोटक रूप में अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज करायी और पूरे साहित्य-संसार में एक हलचल पैदा की। इन कहानीकारों ने अपनी मस्ती भरी वर्णन-शैली, नए वस्तुगत संदर्भों और ताजगी भरी भाषा के साथ एक ऐसे समय और परिवेश से संद्घर्ष करना शुरू किया जिसमें पिछली सारी मान्यताएँ और बोध ध्वस्त हो रहे थे। जीवन के प्रति दृष्टिकोण और भाषा की संरचना का जो एक दायरा बन गया था वह नए समय की चुनौतियों, बाजार और उपभोक्तावाद की अदम्य लालसाओं से उत्पन्न आपा-धापी और सूचना प्रौद्योगिकी की अनियंत्रिात छलांग के सामने बेबस साबित हो रहा था। मनुष्य रुग्ण लोगों की भीड़ में बदल गया। वैश्विक स्तर पर चल रही पूँजीवादी साजिश के ऊपर पड़ी लुभावनी परतों के नीचे का यथार्थ बहुत पेचीदा है और नए कहानीकारों ने इस पेचीदे यथार्थ का साक्षात्कार ही नहीं किया बल्कि उसे विविध कोणों से अपनी रचनाओं में चित्रिात भी किया। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि पुरानी पीढ़ी के अधिकतर रचनाकार आज के नए संकटों की ठीक-ठीक पहचान करने में कुछ असमर्थ साबित हुए क्योंकि वे लंबे समय से, यानी नई कहानी के दौर से ही सामाजिक-राजनीतिक मोहभंग के शिकार रहे और जनवादी कहानी के तक आते-आते यह मोहभंग बोसीदा हो गया था। मगर इसका यह अर्थ नहीं कि पुरानी पीढ़ी के कथाकारों के पास जो जीवनानुभव की विरासत, काल का जो ऐतिहासिक बोध और मानवीय मूल्यों की समझ थी उसकी प्रासंगिकता खत्म हो गयी। नयी पीढ़ी के साथ यह सुविधा थी कि वह इस विरासत को अर्जित करते हुए नए समय के साथ उसके मेल तथा विरोधाभास की पड़ताल कर सकती थी तथा जीवन और इतिहास के प्रति अपनी समझ को समृ( कर सकती थी। कतिपय कथाकारों ने निश्चय ही इस सुविधा का लाभ उठाया और इससे उनकी सृजनात्मक प्रतिभा और अधिक निखर कर सामने आयी। किंतु यह खेदजनक है कि अधिकतर नये कथाकारों ने पुरानी पीढ़ी के प्रति ध्वंसात्मक और हिकारत भरा रवैया अपना लिया, इसका वीभत्स रूप मुझे तब दिखलाई पड़ा जब एक नवोदित कथाकार ने एक अनौपचारिक बातचीत में अति उत्साही भाव से द्घोषणा की कि आज प्रेमचंद होते तो वे भी हमारे सामने पानी भरते। मुझे लगा था कि उन कथाकार महोदय से पूछँू कि क्या आज गाँधी होते तो आपकी तर्ज पर वे भी राहुल गाँधी के सामने पानी नहीं भरते? मगर उनकी आक्रामकता, न सुनने और न समझने की हठधर्मिता और आत्म केंद्रित रुख को भांपकर मुझे लगा कि शब्दों का अपव्यय होगा, आज वैसे ही शब्द कम हो रहे हैं। बिल्कुल इसी तरह की छिछली टिप्पणी ब्लॉग पर वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह के बारे में चंदन पांडे द्वारा की गयी है।
बहरहाल प्रारंभिक दौर में नए कहानीकारों की जो कहानियाँ आयीं उनमें संभावनाएँ थीं और इन्हीं को लक्षित करके वरिष्ठ कथाकारों ने इनका उत्साह बढ़ाया, उम्मीद व्यक्त की कि नये समय और परिवेश की चुनौतियों से ये कथाकार रू-ब-रू होंगे, अनुभूति को रचनात्मक बनाकर आज के जीवन के संदर्भ में कहानी की सार्थकता की तलाश करेंगे। केवल तथ्यों, सूचनाओं और वस्तु-संदर्भों के संकलन से कहानी नहीं बनती, अनुभूति को भाव के उत्कर्ष पर ले जाना पड़ता है और पिफर उसे रचनात्मक बनाना पड़ता है और लेखक की अनुभूति सामान्य मनुष्य की अनुभूति से, उसके संद्घर्षों, दुख-दर्द, आनंद इत्यादि से जुड़ती है। इसके आभाव में कथाकार की अनुभूति सिपर्फ़ तथ्यों, सूचनाओं और ब्योरों का संकलन बनकर रह जाती है। दुर्भाग्य से नयी पीढ़ी के कहानीकारों में जो संभावनाएँ थीं, उनका उपयोग करने के बजाय वे ब्योरों और तथ्यों के संकलन और भाषा के खेल दिखाने भर को कहानी कला का उत्कर्ष समझ बैठे। इस प्रकार का साहित्य आईने की तरह होता है जो प्रतिबिम्ब भर दिखला सकता है, अपना कोई रुख, कोई भाव प्रकट नहीं कर सकता। उदय प्रकाश, अखिलेश, शिवमूर्ति, सृंजय आदि ने जब यथार्थ को देखने के खुले नजरिये और नयी भाषा, नये शिल्प का प्रयोग किया तो उसका मुख्य कारण यह था कि पिछले दौर की क्रांतिकारी कहानियों में लेखक का ही रुख दिखलाई पड़ता था, कहानी किस प्रकार अपना रुख प्रकट करेगी इसके लिए कोई संभावना ही नहीं रह गयी थी। अब न तो कहानी का रुख दिखलाई पड़ रहा है, न कथाकार का। इस प्रश्न से ही नये कहानीकारों ने पीछा छुड़ा लिया है। ऐसा लगता है कि ये सिपर्फ़ भाषा का खेल दिखाने और आज के जीवन की आकर्षक छवियों के मजे लेने के लिए लिखते हैं। इस बिन्दु पर आकर संभावनाओं की जीवनी शक्ति क्षीण होने लगी है और कहानी मरे हुए रूपकों, थका देने वाली सूचनाओं और विवरणों के बोझ तले दबती जा रही है। भाषा और शिल्प का खेल दिखाना उसकी रचनात्मक दरिद्रता का सूचक है। यहाँ मैं पुनः दुहराना चाहता हूँ कि ये बातें नयी पीढ़ी के सभी कथाकारों पर लागू नहीं होतीं बल्कि कहानी के मैदान में उमड़ आयी भीड़ पर लागू होती है और यह सब जानते हैं कि भीड़ का कोई अनुशासन, दायित्व-बोध और विवेक नहीं होता।
इसीलिए जब काशीनाथ सिंह जैसे वरिष्ठ कथाकार को ''दो रुपल्ली पाने वाला मास्टर'' कहकर चंदन पाण्डेय उनकी खिल्ली उड़ाता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। इससे यह मालूम पड़ता है कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्रा में जो उत्तर-आधुनिक प्रवृत्तियाँ जड़ जमा चुकी हैं उससे आज का साहित्य भी अछूता नहीं रह गया है। चंदन पाण्डेय की ही हाल की दो कहानियों- 'सिटी पब्लिक स्कूल वाराणसी' और 'जंक्शन' को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। 'सिटी पब्लिक स्कूल...' उस छोटे से नवधनिक और चरम भोगवादी समाज की जीवनशैली, मनुष्य को मनुष्य नहीं समझने वाली अमानवीय प्रवृत्ति का भव्यीकरण है। यह किसके लिए लिखी गयी है? चंदन उस समाज का क्रिटीक नहीं प्रस्तुत करते, उसके प्रति ललक पैदा करते हैं, वही ललक जो टी.वी. सीरियल में पैदा की जाती है, यानी जो जीवन हम जी नहीं सकते उसे ध्वनि, प्रकाश और रंगों की छवियों में जीने की कल्पना करके एक मिथ्या और क्षणिक तुष्टि पाते हैं। इसी प्रकार 'जंक्शन' कहानी में अमानवीयता को अपनी कल्पना से वे इतनी दूर उड़ा ले जाते हैं कि जीवन की जमीन से कहानी के पाँव ही उखड़ जाते हैं। अमानवीयता का चित्राण जब अतिरंजना के चरम को पार कर जाता है तब वह तमाशे में बदल जाता है और उसकी मार्मिकता नष्ट हो जाती है। व्यापक मनुष्य समुदाय की पीड़ा, उसकी त्राासदियाँ और संद्घर्ष खेल बन जाते हैं, यह सिपर्फ़ एक कलात्मक उत्पाद भर रह जाता है। ठोस विचारधारा वाले लेखन और कलावाद के बीच बड़ी बारीक लकीर होती है, यथार्थ को सृजनात्मक बनाने का काम बेहद संवेदनशील होता है। चंदन पाण्डेय की प्रारंभिक कहानियों में भी यथार्थ को लेकर अतिरंजना है मगर चूंकि केन्द्र में जीवन है इसलिए उन कहानियों ने आकर्षित किया। मैं नयी सदी की अच्छी कहानियों में उन्हें पाता हूँ, पर बाद की जिन कहानियों का जिक्र मैंने ऊपर किया है वे जीवन से बहुत दूर हो गई हैं। पता नहीं कृष्णमोहन जैसे आलोचक किस बिना पर 'जंक्शन' पर लिखते हुए चंदन पाण्डेय को उदय प्रकाश से बड़ा कहानीकार साबित कर देते हैं। दरअसल जिस प्रकार चंदन की कहानी अतिरंजना की सीमा को पार कर जाती है उसी प्रकार कृष्णमोहन की आलोचना भी जमीन से ऊपर उठ जाती है। इस न्यायशास्त्रावादी आलोचना को पढ़कर यही मालूम पड़ता है कि कृष्णमोहन के ब्योरों-विवरणों को बटोर कर उन पर अपनी राय चिपका दी है। ऐसी आलोचना अपने साथ-साथ रचना को भी लेकर गर्त में डूब जाती है।
जिस तरह आलोचना सुनकर आज के कथाकार रियेक्ट कर रहे हैं उससे उनका आत्मविश्वास नहीं, आत्ममुग्ध और आत्मनिष्ठ आक्रामकता जाहिर होती है। यह वैचारिक खोखलेपन का परिचायक है। 'हर जिक्र को धुएँ में उड़ाना' मस्ती और वैचारिक दृढ़ता का परिचायक है पर 'हर किसी को ठेंगे पर रखना'- इसे क्या कहा जाय? नयी पीढ़ी के रचनाकारों ने जब कहानी के क्षेत्रा में हलचल मचाई तो इन्हें पर्याप्त महत्व मिला, प्रशंसा मिली, स्वयं काशीनाथ सिंह ने 'वागर्थ' के नवलेखन विशेषांक में इनकी तारीपफ की। इस पीढ़ी की रचनात्मकता को सामने लाने का श्रेय रवीन्द्र कालिया को है और वे स्वयं उसी पीढ़ी के श्रेष्ठ लेखक हैं जिस पीढ़ी के काशीनाथ सिंह। निश्चय ही कालिया जी का यह काम इतिहास में दर्ज होने लायक है मगर कभी-कभी इतिहास पलटवार करता है जैसा कि सोवियत संद्घ के इतिहास ने गोर्बाचोव पर किया। उन्होंने भी अच्छी नीयत से परिवर्तन की शुरुआत की थी पर इतिहास ने उन्हें सोवियत संद्घ का विनाशक बना दिया।
इसके बावजूद मैं ज्ञानरंजन जी की इस बात से अभी भी असहमत हूँ कि नये कथाकारों की कहानियाँ मनुष्य विरोधी हैं। अभी इनकी रचनात्मक संभावनाएँ बची हुई हैं। यह कुछ-कुछ उसी तरह का पफतवा है जैसा विजय देवनारायण साही ने नयी कहानी के दौर में राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर को नीरज जैसे मंचीय गीतकार की पंक्ति में खड़ा करने के लिए दिया था। नये कथाकारों को आश्वस्त होना चाहिए कि उन्हें उस तरह के विरोध का शिकार नहीं होना पड़ा जिस तरह के विरोध और संद्घर्ष का शिकार पुरानी पीढ़ी के लेखकों को होना पड़ा था। इन्हें बहुत थोड़े से प्रयास में बहुत सपफलता, स्नेह और सम्मान मिला। दो-चार ठहरी हुई मानसिकता के लेखकों-आलोचकों को छोड़ दिया जाय तो तकरीबन सबने इनकी रचनात्मकता को बहुत कम समय में पहचाना। अब जब इनकी रचनाओं से जीवन दूर होता जा रहा है और भाषा-शिल्प की कलाबाजियाँ ज्यादा दिखलाई दे रही हैं तो प्रश्न तो उठेंगे ही। इसलिए प्रश्न उठते हैं तो इन्हें चिढ़ने के बजाय अपनी अनुभूति, संवेदना और जीवनानुभव को सामाजिक-मानवीय परिप्रेक्ष्यों से जोड़कर रचनात्मक बनाना चाहिए। पफैंटेसी को भाषाई खेल बनाने के बजाय उसके माध्यम से आज के जीवन के जरूरी प्रश्नों से टकराना चाहिए। नये कहानीकार प्रश्नों से पीछे हटते जा रहे हैं। वे कथ्य और शिल्प, भाषा सबमें सुविधाभोगी होते जा रहे हैं। इनकी जिस बेलौस, मस्ती भरी और हर पिफक्र को धुएँ में उड़ाने वाले अक्खड़पन ने इन्हें पहचान दिलाई वही अब उलटकर वार करेगी क्योंकि इनकी सार्थकता तय नहीं हो पा रही है। दिक्कत की बात है कि इसकी परवाह करने के बजाय अधिकतर कथाकार 'यु(ं देहि' की मुद्रा अपना रहे हैं और आलोचकों से मूल्यांकन के बजाय अपनी प्रशंसा भर सुनना चाहते हैं। वे भूल रहे हैं कि अच्छे लेखक की पहचान की कसौटी 'वाह-वाह' नहीं निर्मम मूल्यांकन होता है। मगर इनकी आत्ममुग्ध प्रवृत्ति ने इनमें भयानक हठधर्मिता पैदा कर दी है। थोड़ी सी आलोचना से ये जिस तरह बौखला उठते हैं उससे प्रतीत होता है कि इनमें भारी विक्षोभ है और विक्षोभ में रचना नहीं हो सकती। अनुभव और यथार्थ को लेकर जो विक्षोभ लेखक के भीतर उत्पन्न होता है वह रचनात्मक नहीं होता। रचनात्मक तब होता है जब विक्षोभ वैचारिक स्थिति को प्राप्त कर लेता है।
यहाँ इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि इनके भीतर जो आक्रामकता है वह विक्षोभजनित है तो विक्षोभ आ कहाँ से रहा है। आज के अस्त-व्यस्त और भयंकर लालसाओं से भरे जीवन ने जो विक्षोभ पैदा किया है, नये कथाकार खुद उसी के शिकार हैं। जिसके प्रति उन्हें आलोचनात्मक होना चाहिए वे खुद उसी को अपनाने हेतु बेचैन हो रहे हैं, जब वे आज के चरम भोगवाद और पूंजीतंत्रा के तिकड़मों के बारे में लिखते हैं तो उनकी पक्षधरता पेचीदगी भरी हो जाती है, इससे यह पता चलता है कि वे इनके प्रति आकर्षण का रुख रखते हैं इसलिए अपनी कहानियों में उस जीवन को जीने की कोशिश करते हैं जिनके प्रति इन्हें आलोचनात्मक होना चाहिए। मैं विरोध नहीं आलोचनात्मक शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ। इसके निहितार्थ बतलाने की जरूरत नहीं समझता।
एक भ्रम पाल लिया है कि पिछली पीढ़ी नये रचनाकारों से टकरा रही है। पीढ़ियों के संद्घर्ष जैसी कोई बात ही नहीं है। वास्तव में कुछ निजी असहमतियों को छोड़ दिया जाय तो साहित्य में पीढ़ियों का संद्घर्ष कभी नहीं होता, बदलते समय के कारण मूल्यों, अवधारणाओं और उनको देखने के नजरिये में अंतर होता है। इसे संद्घर्ष इसलिए भी नहीं कहना चाहिए कि नयी पीढ़ी के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य-बोध की जड़ें भी परंपरा में ही होती हैं, भाषा की भी, भले ही नयी पीढ़ी परंपरा के प्रति आलोचनात्मक रवैया बरतती हो और यह जरूरी भी है। पर जो लोग यह समझते हैं कि सामयिकता कोई नायाब प्रवृत्ति होती है वे उतना ही गलत सोचते हैं जितना परंपरावादी लोग सामयिकता को अजनबी और मूल्यहीन समझकर गलती करते हैं। ज्ञानरंजन जैसे कथाकार जब कहते हैं कि नये कथाकारों की कहानियाँ मनुष्य विरोधी हैं तो इस वक्तव्य के पीछे यही जड़ प्रवृत्ति काम करती है। यह एक अजीब बात लग सकती है पर सच्चाई है कि हिन्दी के वामपंथी चिंतक-लेखक पूंजीवाद का विरोध करते-करते आधुनिकता का विरोध करने लगते हैं और बाजारवाद और वैश्वीकरण का विरोध करते समय पारंपरिक मूल्य-बोध और भाषा के संस्कार के प्रति इतने कट्टर हो जाते हैं कि उनके सामने संद्घ परिवार और स्वदेशी मंच के लोग भी हतप्रभ हो जाएँ। हिन्दी के वामपंथी परंपरा और आधुनिकता के प्रसंग में ऐतिहासिक विरोधाभास के शिकार हैं। ज्ञानरंजन की बहुचर्चित कहानी 'पिता' इसी विरोधाभास का उदाहरण है। पिता जिस प्रकार भौतिक सुविधाओं और तकनीक के कारण गहरे तौर पर विक्षुब्ध हैं उससे उनका कठमुल्लापन ही जाहिर होता है इसलिए ज्ञानरंजन आज की कहानियों को मनुष्य विरोधी कहते हैं तो इसमें कुछ भी असहज नहीं है। मगर पुरानी पीढ़ी के अधिकतर लोग नये कहानीकारों में संभावनाएँ देखकर ही उनसे शिकायत करते हैं और यह सिपर्फ़ शिकायत नहीं है, एक लेखक, पाठक या आलोचक के रूप में उनकी माँग भी है। पिफर इस माँग को उन्हीं तक क्यों सीमित समझें, यह पूरे युग की माँग है, हिन्दी के उस पूरे पाठक वर्ग की चिंता इसमें शामिल है जिसने नये कहानीकारों को अपना पूरा स्नेह और समर्थन दिया है।
किसी समय विशेष की रचना पर कोई भी बात आलोचना की भूमिका की पड़ताल के बगैर पूरी नहीं हो सकती। भले ही दोनों भिन्न और स्वतंत्रा विधाएँ हैं लेकिन ये दोनों एक-दूसरे की ओर पीठ करके नहीं चल सकतीं। रचना में संकेतों में जो अर्थ निहित होते हैं उन्हें सामने लाना और जीवन तथा कला दोनों ही स्तरों पर रचना की सार्थकता की पड़ताल करना आलोचना का दायित्व है। हिन्दी आलोचना का आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जो एक स्वतंत्रा आधार बनाया था उसे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, देवीशंकर अवस्थी और नामवर सिंह ने आगे बढ़ाया, युग और संवेदना के दबाव में नई प्रवृत्तियों को शामिल किया, कुछ पुरानी चीजों से अलग हुए। पर आज हिन्दी आलोचना जिस मुकाम पर पहुँच गयी है वहाँ उसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है, यह बात यहाँ विशेषतौर पर कहानी की आलोचना के बारे में कही जा रही है। पश्चिम में उत्तर संरचनावाद के शोरगुल से आलोचना की कई धाराएँ प्रस्पफुटित हुईं और हिन्दी में भी आलोचना के जनतंत्रा के नाम पर कई भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ आ गयीं जैसे विमर्शवादी, पाठकवादी आलोचना, पुनर्पाठ इत्यादि। हिन्दी की रचनात्मकता और सांस्कृतिक मिजाज को परखे बगैर इन प्रवृत्तियों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है, यह समझे बगैर कि विमर्श, पुनर्पाठ या पाठकीय प्रतिक्रियाएँ आलोचना नहीं, आलोचना के लिए कच्चे माल की तरह हैं। पुनर्पाठ में किसी रचना की सामयिक प्रासंगिकता खोजी जाती है, विमर्श में रचना में निहित विभिन्न अर्थ-छवियों की तलाश होती है और पाठकीय प्रतिक्रिया रचना को पढ़ने के बाद के त्वरित फ्रलैशेज हैं जिन्हें रचनात्मक बनना बाकी होता है। जैसे कोई द्घटना या प्रसंग रचनाकार को आलोड़ित करता है और उसके बाद रचनाकार अपने जीवनानुभव, अनुभूति और संवेदना के योग से उसे रचनात्मक बनाता है उसी प्रकार आलोचक इन प(तियों का प्रयोग करते हुए रचना के समग्र मूल्यांकन की ओर बढ़ता है। जाहिर है कि यह मूल्यांकन आलोचक की निजी और त्वरित प्रतिक्रिया से संभव नहीं होता, इसमें सामयिक बोध और ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया शामिल होती है। इसीलिए आलोचना को 'सहयोगी प्रयास' से 'एकालाप' तक लाने के बावजूद नामवर जी यह स्वीकार करते हैं कि एकालाप में भी संवाद तो होता ही है, भले ही वह अपने आप से ही हो। जाहिर बात है कि अपने आप से भी संवाद होगा तो उससे संबंधित युग के जीवन से जुड़े प्रश्नों से आलोचक को टकराना पड़ेगा और यही जहमत आज के नए आलोचक नहीं उठा पा रहे हैं। उनमें एक जल्दबाजी, एक विक्षोभ दिखलाई देता है इसलिए आलोचक रचना के वस्तु-संदर्भों को ही दुहराकर अपने आलोचना-कर्म को धन्य कर देते हैं। जबकि इसे आलोचना कहने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, यह विमर्श या पुनर्पाठ भी नहीं है। यह रचना की टीका है। आलोचना की अपनी मौलिकता होती है, पर टीका तो टीका है।
आज आलोचना अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक जिम्मेदारी से तो दूर हो ही गयी है, रचना के प्रति अपने दायित्व से भी मुक्त हो गयी है। आलोचक उसे पॉपुलर बनाने पर तुला हुआ है और बाजार, वैश्वीकरण, नव धार्मिक अंधवाद जैसे जिन पॉपुलर मूल्यों के प्रति आलोचनात्मक होने का दावा आलोचक कर रहा है वास्तव में वह इसी पॉपुलर कल्चर के पीछे भाग रहा है। इसलिए आज पफतवेबाजी, अनर्गल और अभद्र टिप्पणियों, लंबे-लंबे विवरणों और छिछली भाषा को आलोचना के रूप में स्थापित किया जा रहा है। आज की कहानी की आलोचना इसी तरह हो रही है। इसलिए जब यह प्रश्न किया जाता है कि रचना जीवन से दूर होकर कितने दिनों तक टिक पाएगी तो आलोचना के बारे में भी बात होनी चाहिए कि आज के समय में इसका क्या रूप होगा, क्या दिशा होगी और आने वाले समय में आलोचना कहीं टीका बनकर तो नहीं रह जाएगी। कृष्णमोहन जैसे आलोचक की आलोचना का जो एक नमूना पीछे प्रस्तुत किया गया है उससे तो यही आशंका होती है।

आन्नद कॉलेज, हजारीबाग, झारखण्ड
मो. ०९४७०५०३९९१

अपने अहं की चिंता

दनेश कर्नाटक

ढ़ियाँ आमने-सामने में की गयी बातचीत 'हाइजैक की गयी युवा कहानी' को पढ़ने के तुरंत बाद जो प्रतिक्रिया मस्तिष्क में आयी, वह थी कि यह बातचीत, इसकी दिशा तथा निष्कर्ष 'तहलका प्रकरण' से पैदा हुए तीखे मतभेदों की परिणति है। भले ही, इसका उद्देश्य युवा कहानी की सामर्थ्य, सीमा तथा काल निर्धारण रहा हो, पर यह अपनी खुन्नस निकालने तक सिमट कर रह गयी। यह बातचीत हमारे वरिष्ठ तथा कनिष्ठ साहित्यकर्मियों की साइकी को समझने में भी सहायक है तथा साबित करती है कि यहाँ बहुत हद तक कृतियों का मूल्यांकन उनके ताप को देखकर नहीं होता, बल्कि रचनाकारों के आपसी संबंध, क्षेत्रा, पद तथा पफायदे के आधार पर होता है। लोग कहने को कितनी बड़ी बातें करते हों मगर उनके लिए महत्वपूर्ण रचना के पीछे का व्यक्ति है, रचना नहीं। वे मानकर चलते हैं, रचना को तो हम जैसा चाहेंगे वैसा साबित कर देंगे। हमारा मन हुआ तो हम उसे महान, कालजयी, अपूर्व बता देंगे। वरना तीन कौड़ी की साबित कर देंगे। देखें बलराज पाण्डेय पेज नं. ६२ में बच्चन सिंह जी के हवाले से सापफ-सापफ कह रहे हैं... 'इनकी इतनी पीठ न ठोक दें कि ये दूसरे रास्ते पकड़ लें। ऐसा हुआ भी।' आगे वे कहते हैं कि मैंने चन्दन से कहा तुम यह काम एक हत्या से भी चला सकते थे। लेकिन इन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।' यानी लेखक इनके कहे अनुसार अपनी कहानी लिखे, वरना उसने दूसरा रास्ता पकड़ लिया! लेकिन क्या इस रवैये से कहानी तथा उसके लेखक का भविष्य तय होगा। बात सापफ है, मठाधीशों से चीजें तय नहीं होगी! जो पाठकों के दिलों को छू पायेगा उनको बेचैन कर पायेगा और रचता रह सकेगा... अंततः वही बचेगा!
काशीनाथ जी ने 'वागर्थ' के युवा कहानी विशेषांक में कहा कि युवा कहानीकार जो यहाँ-वहाँ बिखरे थे, उन्हें रवीन्द्र कालिया का इंतजार था। अब वे कहते हैं कि वे ऐसा नहीं कह रहे। सवाल उठेगा तब उन्होंने ऐसा क्यों कहा और अब वे वैसा क्यों नहीं कहना चाहते? वे जब जैसा कहें, यह उनका हक हैं, लेकिन क्या कोई इस बात से इंकार कर सकता है कि रवीन्द्र कालिया, हरिनारायण तथा प्रभाकर श्रोत्रिाय अपनी-अपनी तरह से युवा लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को सामने लाए। ;रवीन्द्र कालिया 'वागर्थ' तथा 'नया ज्ञानोदय', 'कथादेश' की नवलेखन सिरीज तथा प्रभाकर श्रोत्रिाय के समय में ज्ञानपीठ में 'नवलेखन पुरस्कार' आरंभ हुए तथा छह युवा कहानीकारों के कहानी-संग्रह सामने आएद्ध इसके बाद प्रत्येक महत्वपूर्ण पत्रिाका ने युवा कहानी पर अंक निकाले या अभी भी निकाल रहे हैं।
दरअसल युवा कहानी ने एक बहुत बड़े स्पेस को भरा है। कहा जा सकता है कि जिस तरह का यह समय है, उसको व्यक्त करने के लिए कहानी सब से मुपफीद विधा साबित हुई। इधर के दो दशकों में जीवन तथा समाज में जो बदलाव आए उसके अनुभव पिछली पीढ़ी के पास नहीं थे। उनके अनुभव अपने समय के थे जिसमें वर्तमान नहीं दिखायी देता था। इसलिए कईयों ने लिखना छोड़ दिया था और पिछली पीढ़ी के वे लोग जो अभी लिख रहें हैं चाहे वे गोविन्द मिश्र, असगर व८ााहत, दूधनाथ सिंह, गिरिराज किशोर, रमेशचन्द्र साह, सुभाष पंत, विद्यासागर नौटियाल, अमरीक सिंह दीप आदि हों या ठीक पीछे की पीढ़ी के संजीव, शिवमूर्ति, महेश कटारे, योगेन्द्र आहूजा, भालचन्द्र जोशी, प्रियंवद, शैलेन्द्र सागर, जयनंदन, उदयप्रकाश, लता शर्मा, गोविन्द उपाध्याय, ओमा शर्मा तथा देवेन्द्र ;कई महत्वपूर्ण नाम छूट सकते हैं!द्ध आदि हों इसलिए लगातार अच्छा लिख रहे हैं क्योंकि वे जीवन से जुड़े हुए हैं। युवा पीढ़ी इस जीवन को देख तथा भोग रही थी, इसलिए उसके पास कहने को बहुत कुछ था। इस पीढ़ी ने जीवन के हर क्षेत्रा पर कहानियाँ लिखी। और एक तरह से हिन्दी कहानी की परंपरा को आगे बढ़ाने काम किया। इसलिए अगर रोहिणी अग्रवाल को युवा कहानी में बहुत बड़ी सामर्थ्य दिखाई देती है तथा वे कहती हैं कि युवा कहानी ने पुरानी परंपरा का विस्तार करते हुए मानवीय संबंधों की जटिलता को समझना शुरू किया है तो वे ठीक कहती हैं।
बातचीत के इस मैदान में एक तरपफ काशीनाथ सिंहजी के नेतृत्व में गोपेश्वर सिंह, बलराज पाण्डेय तथा आशीष त्रिापाठी युवा कहानी को ध्वस्त करने तथा रोहिणी अग्रवाल व राकेश बिहारी युवा कहानी का पक्ष रखने के लिए तैनात दिखायी देते हैं। बातचीत में सहजता नहीं है, इसलिए सभी के चेहरों के भाव ऐसे नजर आते हैं, मानो वे किसी अजीब मुसीबत में पफंसे हों। नामवर जी के चेहरे में निरपेक्षता का भाव है, जबकि पे्रम भारद्वाज के चेहरे में हल्की सी मुस्कान है जो बातचीत का संचालक होने के नाते स्वाभाविक सी लगती है। मजे की बात तो यह है कि ये लोग युवा पीढ़ी पर हमला करने के लिए पिछली पीढ़ी के प्रतिनिधि रचनाकारों की अच्छी कहानियों पर चर्चा करते हैं, जबकि जानबूझकर युवा पीढ़ी की अच्छी कहानियों पर चर्चा करने के बजाय उनकी कमजोर कहानियों पर चर्चा करते हैं। कितना अच्छा होता अगर वे कुछ कहानीकारों की ऐसी-तैसी करने के बजाय युवा कहानी के विस्तृत परिदृश्य को खोलते। सवाल यह है कि अभी दस साल में सामने आयी इस पीढ़ी की सभी कहानियाँ उल्लेखनीय कैसे हो सकती हैं, जबकि महान कहानीकारों की प्रतिनिधि कहानी के तौर पर हम उनकी चार-पाँच कहानियों गिनाते आए हैं।
बातचीत में कुछ कहानीकारों को 'हाइजैकर' कहा गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे कुछ लोग कहानी के हाइजैकर हो सकते हैं। कहानी क्या कोई प्लेन है, जिसे हाईजैक किया जा सकता है। पिफर चंदन पाण्डेय ने 'नकार' तथा 'भूलना' जैसी कहानियाँ लिखकर तथा कुणाल ने 'सनातन बाबू का दाम्पत्य' तथा 'डूब' जैसी कहानियों से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। जब चन्द्रधर शर्मा गुलेरी को हम उनकी एक कहानी की वजह से याद कर सकते हैं तो इन युवा कहानीकारों के बारे में कहीं हम लोग अपना पफैसला सुनाने की जल्दबाजी में तो नहीं हैं। काशीनाथ सिंह जी ने युवा कहानी में दो तरह की धारा का उल्लेख किया है, एक वो जो ग्लोबलाइज हैं तथा दूसरे वे जो देशज हैं। समझ में नहीं आता कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में कहानी के ग्लोबलाइज होने से उन्हें क्या दिक्कत हो सकती है। आज के दौर का कहानीकार आंचलिक भी होगा, ग्लोबलाइज भी होगा और देशज भी होगा। बल्कि युवा कहानी में दो नहीं कई धाराएँ हो सकती हैं, बशर्ते हम पूरे युवा कहानी परिदृश्य पर नजर डालें।
आशीष त्रिापाठी का कहना है कि युवा कहानी के जरिए दलित तथा स्त्राी-विमर्श को करारी चोट पहुँचाने काम हुआ है। उनकी बात से ऐसा लगता है मानो किसी भी आंदोलन तथा विमर्श को लगातार चलते रहना चाहिए। क्या यह संभव है? छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कहानी आदि आंदोलन क्या हमेशा चलते रह सकते हैं? मेरे ख्याल से ये अपने आने वाली पीढ़ी को प्रेरित कर उनकी लेखनी में जगह बना लेते हैं। दलित तथा स्त्राी विमर्श अपना काम कर चुका है। अब इनको रचनाओं में देखने का समय आ गया हैं।
इस सामूहिक हमले से विचलित हुई रोहिणी अग्रवाल भी डगमगा गयी और इसके लिए उन्होंने मनोज कुमार पाण्डेय की 'जींस' कहानी को चुन लिया। उनका यह कहना तो ठीक है कि अपने शिल्प के कारण कहानी अपने किसी किरदार को यादगार नहीं बना पाती है और उसकी चीजें आपको बहुत समय तक याद नहीं रह पाती लेकिन उन्होंने कहानी के निष्कर्ष को लेकर जो बातें की हैं उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। कहानी का नैरेटर अंत में दादी के अमानवीय तथा क्रूर होने की वजह पता लगा लेता है, इसलिए उसके प्रति अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाता है। यह तो कहानी का अपने कथानक से आगे जाना हुआ। यह एक मानवीय एप्रोच है। लेकिन पता नहीं क्यों वे इसे नृःशंस बर्बरता का विस्तार करने वाली कहानी साबित करने में तुली हैं।
राकेश बिहारी ने ठीक कहा है कि जब आप आलोचना करते हैं तो स्पेसपिफक होइये। सामूहिक आलोचना ठीक नहीं है। इसके दो कारण हैं या तो हमने सब को पढ़ा नहीं या हम नाम लेने का खतरा उठाना नहीं चाहते। लेकिन वे युवा कहानी का जो काल निर्धारण करते हैं, उस पर अभी बातचीत की गुंजाइश है, वे जब युवा कहानी के स्रोत पर बात करते हैं तो 'कथादेश' के २००४ अंक पर आकर रुक जाते हैं। पता नहीं वे 'कथादेश' के २००५ के नवलेखन अंक की चर्चा क्यों नहीं करना चाहते? वे 'कथादेश' के २००६ की अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत हुई रणेन्द्र की 'रात बाकी' का जिक्र नहीं करते। वे २००७ के 'नया ज्ञानोदय' तथा २००८ के प्रगतिशील 'वसुधा' तथा 'कथाक्रम' के युवा कहानी पर केंद्रित अंकों का जिक्र नहीं करते। वे 'परिकथा' के नवलेखन अंकों की चर्चा नहीं करते। उन्हें दुख है कि चार नामों के कारण १६ महत्वपूर्ण लोग इग्नोर हो जाते हैं।
भारत भवन भोपाल ने पिछले दिनों भोपाल में युवा कहानी पर केंद्रित एक कार्यक्रम 'युवा-२' आयोजित करवाया था, इसमें हुए पहले आयोजन युवा-१ में उन्होंने पाँच युवा कहानीकारों चंदन पाण्डेय, शशिभूषण द्विवेदी, मनोज कुमार पाण्डेय, राकेश मिश्र तथा अल्पना मिश्र को आमंत्रिात किया था। अभी हाल में हुए युवा-२ आयोजन में उन्होंने आकांक्षा पारे, पराग मांदले, पंकज सुबीर, प्रभात रंजन, किसलय पंचोली, रवि बुले, रविन्द्र आरोही, गौरव सोलंकी, दिनेश कर्नाटक, राहुल सिंह, गजल जैगम, राजुला शाह, मंजुलिका पाण्डेय, आशुतोष भारद्वाज, श्रीकांत दुबे, विमलचन्द्र पाण्डेय, रजनी गुप्त, राहुल ब्रजमोहन, कुणाल सिंह तथा विमलेश त्रिापाठी को कहानी पाठ हेतु आमंत्रिात किया था। इस सूची को देखने पर हमें युवा कहानी के कई महत्वपूर्ण नाम इसमें नहीं दिखायी देते हैं। यानी यह सूची अधूरी है, कई लोग युवा कहानी में सक्रिय हैं। यानी युवा कहानी पर बात करने के लिए आपको चालीस से पचास लोगों को प्रतिनिधि कहानीकार के रूप में लेना होगा। तभी युवा कहानी का पूरा परिदृश्य आपके सामने स्पष्ट हो सकेगा। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब इस बातचीत में किसी भी व्यक्ति ने हाल में पहले 'अकार' पिफर 'कथादेश' में छपी अरूण कुमार असपफल की बहुचर्चित कहानी पाँच का सिक्का, प्रगतिशील 'वसुधा' में छपी दीपक श्रीवास्तव की 'महत्तम समापवर्तक' जिसे हाल में रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार दिया गया, अभी जून में नया ज्ञानोदय के युवा पीढ़ी विशेषांक में छपी ज्योति चावला की कहानी 'अंधेरे की कोई शक्ल नहीं होती' तथा कथादेश जुलाई अंक में छपी संजीव कुमार की 'साक्षी' का जिक्र नहीं किया। मैं जानता हूँ हर व्यक्ति के लिए हर कहानी पढ़ना संभव नहीं है, लेकिन जो लोग युवा कहानी पर अधिकार पूर्वक बात करने का दम भरते हैं कम से कम उन्हें तो इन सब कहानियों को देखना ही होगा। लेकिन लगता है, हर आदमी अधिक मेहनत से बचना चाहता है, इसलिए कुछ नामों को बुदबुदाकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेना चाहता है। ऐसे माहौल में हमारे जैसे दूर बैठे लोगों की प्रगतिशील 'वसुधा' में छपी 'रौखड़' लोक गंगा में छपी 'काली कुमाऊं का शेरदा' तथा नया ज्ञानोदय में छपी 'आते रहना' जैसी कहानियों में से 'रौखड़' की 'पाखी' के प्रेरणास्रोत रहे सुप्रसि( कहानीकार भालचन्द्र जोशी, पफोन कर के सराहना करते हों, या महेश कटारे तथा रमाकांत श्रीवास्तव को यह पसंद आती हो और पाठकों की प्रतिक्रिया का सिलसिला आज भी न रुक रहा हो, और हमारे आलोचकों का ध्यान उनकी ओर न जा रहा हो तो उसमें कौन से आश्चर्य की बात है!
मुझे लगता है, हमें युवा कहानी या हिन्दी साहित्य पर बात करते समय चार पत्रिाकाओं, चार रचनाकारों, चार राज्यों, चार साहित्यिक केन्द्रों तक सिमटकर नहीं रहना चाहिए। हमें बड़ा सोचना तथा समझना होगा! यदि हम ऐसा नहीं कर सकते तो हमें साहित्य का ढोंग करना छोड़ देना चाहिए। हिन्दी बारह राज्यों तथा पचास से साठ करोड़ लोगों की भाषा है। प्रवासियों को भी जोड़ दें तो यह आँकड़ा कापफी बढ़ जाएगा। जब प्रत्येक हजार लोगों के पीछे स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों को बढ़ाने की बात हो रही है तो क्या हिन्दी में आप १ करोड़ लोगों के पीछे एक कहानीकार तक का अनुपात नहीं बनाना चाहते। ऐसे में आप हिन्द तथा हिन्दी साहित्य का भला कैसे कर पाएँगे। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कई लोग साहित्य में यही सब कर रहे हैं।

ग्राम/पो.आ.-रानीबाग, जिला-नैनीताल,
उत्तराखण्ड पिन-२६ ३१ २६
मो. ०९४११७ ९३१९०

युवा साथियों को सलाम

संदीप अवस्थी

 

खी के नवंबर अंक में पीढ़ियाँ आमने-सामने की चर्चा पढ़ी। पढ़ते ही प्रश्न आया जिनको कहानी को हाइजैक होने से रोकने का रास्ता दिखाने का कार्य करना था उन्होंने क्यों नहीं किया? गोपेश्वर सिंह, बलराज पाण्डेय, काशीनाथ सिंह कहीं अधिक दोषी हैं। आप पहचान ही नहीं पाए बदलते वक्त की नब्ज। तभी तो तथाकथित हाइजैकर्स की शुरुआत में वाराणसी में हुई गोष्ठी में स्वयं गुरु काशीनाथ जी ने पीठ ठोंकी। और अब उन्हें ही आप गरियाते हैं!!! ठीक है गलती होती ही आगे सुधारने के लिए हैं। पर यही हम जो देश भर में, बिखरे-बिखरे युवा आलोचक, लेखक, कहानीकार हैं, कहना चाहते हैं कि गलती वरिष्ठ पीढ़ी की है। जिसने अपनी इच्छापूर्ति और अपना ही स्कूल आगे बढ़ाने के लिए सोच समझकर ऐसे नौसिखिए लोगों की जमात खड़ी की जो आगे भस्मासुर की तरह उन्हें समेट सब कुछ, गंभीर चिंतन, गाँव, समस्याएँ, संबंध समाप्त करने पर आमादा हैं, पर आज काशीवासी हो या कहीं और के, विष्णुजी कहाँ से लाएँगे! जो इन सबका शमन ;दमन नहींद्ध कर सकें।
चूक इन्हीं लोगों से हुई और भाई प्रेम भारद्वाज जी चूक आपसे भी इस बार हुई। युवा पीढ़ी का एकमात्रा प्रतिनिधित्व आपको राकेश बिहारी जी, जैसे गऊ इंसान से ही मिला। जो बहस के शुरू में ही हथियार डाल बैठे कि, 'मैं एकमात्रा साहित्य का अध्यापक नहीं हूँ और साहित्य का परंपरागत विद्यार्थी भी नहीं हूँ।' अरे मेरे भाई, साहित्य उसका है जिसमें सूक्ष्म दृष्टि, संवेदना, शब्द भंडार और अध्ययनशीलता है। असंख्य ऐसे साहित्य के प्रोपफेसर, अध्यापक, विद्यार्थी हैं जो एक कहानी ढंग से नहीं लिख सकते। उनमें से एक-दो तो इसी गोष्ठी में थे।
बहरहाल राकेश बिहारी के रूप में एकमात्रा युवास्वर का प्रतिरोध यहीं समाप्त हो गया। और सभी ने काशीनाथ जी की बॉसशिप में, बलराज पांडेय, गोपेश्वर सिंह जैसे उनके दाँये बाँये के हाथों युवा प्रतिभाओं का कत्लेआम, चरित्राहनन, दुर्गति करने का सामूहिक प्रयास शुरू किया जो बेहद अपफसोस की बात है सपफल नहीं हो सका। क्योंकि न्यूटन के तृतीय नियम 'क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।' से आप जानते हैं कि जब तक दमदार प्रतिपक्ष नहीं होगा तब तक आप कितना ही ग्रुपबाजी और लॉबिंग करें आप दूसरे का स्वर दबा नहीं सकते और अपनी बात मनवा नहीं सकते।
तो यह खिसियाए हुए, हड़बड़ाए से भौंचक लोग आज जब युवा कथाकारों की पूरी खेप को आन, बान और शान के साथ, बिना जी हजूरी या चमचागिरी को बढ़ता देख रहे हैं, तो इनकी पीड़ा समझी जा सकती है। कुछ एक दो कहानियों में समाप्त हो जाने वाले नाम छोड़ दीजिए, बाकी तो युवाओं ने पूरा मैदान मार लिया है। पिछले वर्ष की परिचर्चा और आज की परिचर्चा के बीच दृश्य बदल चुका है। युवा लेखक हर क्षेत्रा में गंभीरता, जिम्मेदारी और परिपक्वता के साथ लिख रहा है, छप रहा है, सराहा जा रहा है और तमाम विषम परिस्थितियों के बाद भी आगे बढ़ रहा है। जबकि इससे पहले की जो वरिष्ठ पीढ़ी थी, जिनमें यह लोग भी थे, वह अपना अधिकांश समय जन संपर्क बढ़ाने, ग्रुप में रहने और रसरंजत में देती थी।
परिचर्चा में आश्चर्य हुआ रोहिनी जी जैसी प्रखर विदुषी महिला भी इनके प्रभामंडल के आगे यह तय नहीं कर पाए कि उन्हें युवाओं का पक्ष लेना है या वरिष्ठों का? मेरे खयाल से उन्हें निष्पक्ष रहते हुए युवाओं की अच्छाइयों, खूबियों को खुलकर रखना चाहिए था। पिछले वर्ष की परिचर्चा में कविता, वंदना राग ने बड़े ही साहसपूर्वक, दृढ़तापूर्वक युवाओं का प्रतिनिधित्व किया था।
भले आशीष त्रिापाठी, इन्हें मैं समझदार, बु(जिीवी मानता था, के लिए इतना कहूंगा 'द्घर का भेदी लंका ढाए' की उक्ति इनके ऊपर पूरी तरह खरी उतरती है। भाई आशीष, अपनी उम्र, अपने तजुर्बे और अपने अब तक के लेखक ;चाटुकारिता छोड़ दें तोद्ध से किसका प्रतिनिधित्व करते हैं? युवाओं की जमात का, युवा लेखकों का और मित्रा राकेश बिहारी ने उन्हें एक बार अपने सँग समझने की बात भी कही। पर पूरी परिचर्चा में यह व्यक्ति वरिष्ठ आलोचकों के साथ खड़ा नजर आया उनकी हाँ में हाँ मिलाता हुआ। जयचंद, विभीषण जैसा कार्य करके इन महानुभाव ने अपनी थोड़ी अर्पित प्रतिष्ठा स्वयं मिट्टी में मिला ली। पूरी चर्चा में कोई महत्वपूर्ण टिप्पणी युवा कहानीकारों की सकारात्मक भूमिका को लेकर इसने नहीं की। इन्हें शायद अपने युवा होने, और अपने समकालीन मित्रा लेखक लेखिकाओं के सकारात्मक पहलुओं पर बोलने में शर्म आती है। यह सज्जन पूरी तरह काशी जी की गैंग का जागरूक सदस्य बनकर ही व्यवहार करते रहे पर शुक्र है इनके अध्ययन मनन के स्तर का एक भी काम की बात यह नहीं कर सके, सिवाय इसके कि, '........काशीनाथ जी ने सापफ बात कही है देशज और बड़ों से कटे हुए कथाकारों की।' यह खुद भी इसमें से किस श्रेणी में आते हैं यह इनसे मैं पूछना भी नहीं बल्कि आपकी पत्रिाका के माध्यम से देश को बताना चाहता हूं। चाटुकारिता, वरिष्ठों की खड़ाऊ वंदना करता ऐसा चारण ;मातृद्ध दूसरा नहीं देखा मैंने।
बहरहाल, पाखी ने आयोजन किया। वह सार्थक इसीलिए भी बन गया कि अपने आप युवा कथाकारों को सिरे से खारिज करते यह खिसियाएँ हुए अपने आप बाहर होते कुछ लोग सामने आ गए।
पूरी परिचर्चा से ध्यानपूर्वक दो से अधिक बार पढ़ने के बाद अपने आप ध्वनि निकल के जयद्घोष कर रही है कि हम युवा लेखक अब पूरी सजगता, हौसलों, स्वाभिमान के साथ अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रहे हैं। इस बात का पुख्ता सबूत इस बातचीत में बुजुर्गों और उनके चमचों की जमात में मची खलबली है। अब सिंहासन खाली करो, युवाओं की बारी है। ऐसे युवा जो आजीविका के लिए, मूल्य संकलन के लिए, बेरोजगारी के लिए संद्घर्ष करते हुए लिख रहा है, बेहतर छप रहा है और चुपचाप चला जा रहा है। सलाम है ऐसे हमारे युवा साथियों को।

आस्था, ६६/२६, न्यू कॉलोनी, रामगंज, अजमेर, राजस्थान, मो. ०८००३५१२३९४

 

 

अच्छी कहानियों पर आलोचकों की नजर नहीं

 

रूपलाल बेदिया

स अंक में पीढ़ियाँ आमने-सामने के तहत 'हाइजैक की गयी युवा कहानी' पर कुछ न कहा जाए तो बात अधूरी रह जाएगी। इस विमर्श में कई बातें उभरकर सामने आयीं। बातचीत की शुरुआत करते हुए आपने ;प्रेम भारद्वाजद्ध रोहिणी अग्रवाल से सबसे पहले अपनी बात रखने का आग्रह किया। आपने बताया कि वे युवा कहानीकारों को 'कापफी' पढ़ती हैं। लेकिन उन्होंने लेखिकाओं तक ही अपनी बात सीमित रखी। वह तो बाद में आपके द्वारा याद दिलाये जाने पर सिपर्फ चार युवा कहानीकारों का नाम ले पायीं। लेखिकाओं में से भी केवल तीन के नाम गिना पायीं। क्या इसी को 'कापफी' पढ़ना कहते हैं? दूसरी बात है कि उनकी बात स्त्राी-पुरुष संबंधों तक ही सिमटकर रह गयी। सच कहें तो युवा कहानी की कई प्रवृत्तियाँ एक साथ दिखाई पड़ती है। बलराज पाण्डेय की इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि युवा कथाकारों में समय और समाज को लेकर ज्यादा चिंता नहीं दिखाई देती है। संभवतः यही कारण है कि कुछ युवा कहानीकार कथा तत्व से ज्यादा भाषाई चमत्कार पैदा करने में विश्वास रखते हैं। कुछ चर्चित युवा कथाकार में न आदमी दिखाई देता है और न आदमी का जीवन। तभी तो आशीष त्रिापाठी कहते हैं कि ;वेद्ध 'जीवन लिखने के लिए नहीं भाषा लिखने के लिए कहानी लिखते हैं। ये जीवन नहीं जानते। ये जीवन लिखना भी नहीं चाहते। ये भाषा लिखना जानते हैं। इनका लक्ष्य जीवन लिखना नहीं, भाषा लिखना है।' लेकिन विडम्बना देखिए कि कुछ आलोचकों द्वारा इन्हीं कहानियों को खूब हवा दी जा रही है। इन कहानीकारों एवं आलोचकों का पाठकों से कोई मतलब नहीं होता। इसके इतर कुछ ऐसे भी युवा कहानीकार हैं जो समय और समाज की चिंता तथा कहानीपन के साथ कहानियाँ लिख रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि पाठकों द्वारा पसंद किये जाने के बावजूद आलोचकों की नजर उन कहानियों पर नहीं पड़ती। पफलतः उनकी चर्चा नहीं हो पाती और वे कथाकार किनारे पड़े रहते हैं। इसलिए काशीनाथ सिंह ने सही कहा है कि युवा कहानी कुछ कहानीकारों द्वारा हाइजैक कर ली गयी है। मैं यह नहीं कहता कि कहानी में अच्छी भाषा और शिल्प मायने नहीं रखते, पर इनके आधिक्य के कारण कहानी बोझिल हो जाती है और कथा तत्व गौण हो जाने के कारण कहानी की प्रवाहमानता रुक जाती है। इसीलिए काशीनाथ सिंह को कहना पड़ा, 'उनकी ;युवा कहानीद्ध ज्यादातर कहानियों को पढ़ते समय मुझे लगता है कि मैं चल नहीं रहा हूँ। आगे नहीं बढ़ पा रहा हूँ। एक ही जगह खड़े हम कहीं नहीं पहुँच पा रहे हैं।' उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात उठायी है कि युवा कहानियों में प्रतिरोध ;गलोबलाइजेशन काद्ध नहीं दिखाई देता है। असल में आज कहानी में किसी बात को यथाव्‌त लिख देने की प्रवृत्ति चल पड़ी है। जो हो रहा है, जैसे दिख रहा है, बस, उसे वैसे ही लिख दिया। और शान से कहा जाता है कि यथार्थ की कहानी लिख रहे हैं। अगर कोई कहानीकार अपनी कहानी में समय और समाज को दिशा देने की चेष्टा करता है तो सम्पादकों-आलोचकों को वह कहानी उपदेशात्मक लगने लगता है। ऐसे में जब प्रतिरोध कहीं दिखाई न दे तो कहानी में कहाँ से आएगा और कौन जोखिम मोल लेना चाहेगा! दूसरी बात है कि युवा भी उसी ग्लोबलाइजेशन का हिस्सा हैं, पिफर वे उसका प्रतिरोध क्यों करेंगे। पिफर भी प्रतिरोधात्मक और मानवीय मूल्यों की कहानियाँ ही लम्बे समय तक जीवित रहेंगी, ऐसी आशा की जा सकती है, भले ही इस समय उनकी नोटिस नहीं ली जा रही हो।
इस बातचीत में सिपर्फ एक युवा कहानीकार राकेश बिहारी को आपने शामिल किया, लेकिन उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी से अपनी बातें रखीं। साहित्य का विद्यार्थी एवं प्राध्यापक न रहते हुए भी उनका गहन अध्ययन दृष्टिगोचर होता है। उनकी इस बात से सहमत हूँ कि युवाओं में आलोचना की सहनशीलता खत्म हो गयी है। बलराज पाण्डेय ने भी चन्दन पाण्डेय के बारे में ऐसी ही बातें कही हैं। कुणाल सिंह की वादाखिलापफी से हैरत हुई। उन्हें पाठकों को बताना चाहिए कि वे इस बातचीत में शामिल क्यों नहीं हुए। कुल मिलाकर इस बार का यह विमर्श ज्यादा सार्थक रहा। इसमें भाग लेने वालों एवं पाखी परिवार को इसके लिए साधुवाद!

५८५/बी, डीएस, कालोनी, हीरापुर, धनबाद-८२६००१, ;झारखण्डद्ध

 
 
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