दिसम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
यात्रा- संस्मरण
रोम्यारोलां के देश में
संतोष श्रीवास्तव

मैं जैसे पहाड़ों का सीना चीरती, हर मिनट पर एक टनल पार करती पीसा से पूरे ३५० किलोमीटर का सपफ़र करती बढ़ती चली जा रही हूँ रोम्यारोलां के ांस की ओर... जिनकी कलम से शब्दों के पफूल खिलते थे। पफूल ही दौलत है ांस की। ांस यानी परफ्रय़ूम... मैं रास्ते के तमाम शहर समानोवादो, अलबेंगा, विनती विलीगा पार कर सानरीनो गाँव की पफूलों भरी वादी में पहुँची हूँ। चारों ओर पफूल ही पफूल पीले, गुलाबी, लाल, सपफेद। पहाड़ों पर ग्रीन हाउसे८ा में खिले पफूलों का अंबार लगा है। हवा खुशबू से लदी इतराती द्घूम रही है... 'हवा हूँ हवा मैं बसंती हवा हूँ।'
यहाँ किसानों की मुख्य खेती पफूल ही है। बहारों के गु८ार जाने पर सारे पफूल तोड़कर कांसग्राम नामक जगह में भेज दिए जाते हैं जहाँ परफ्रयूम की पफैक्ट्री है। मैंने बहुत पहले ांस के बारे में एक लेख पढ़ा था कि मध्यकालीन ांस में खूब सजी, रंगीन पोशाकें पहनी जाती थीं मानो हर कोई राजद्घराने का हो। हर जगह सिपर्फ बनाव श्रृंगार और मेकअप के किस्से थे लेकिन वे एक-एक पोशाक कई-कई दिन बिना नहाए पहने रहते थे। अपना मेकअप तक नहीं उतारते थे, उसी पर और पोत लेते थे। कई स्त्रिायाँ तो अपनी सारी उम्र बिना नहाए ही गु८ाार देती थीं। कई पुरुष जीवन में पहली और आखिरी बार तब नहाते थे जब वे सेना में भर्ती होते थे क्योंकि उस समय उनकी पूरी देह बिना कपड़ों के ही पानी में डुबोकर परीक्षण से गु८ारती थी। अमीर द्घरानों के ांसीसी भी द्घर में बड़े-बड़े गमले रखते थे और उसी में लद्घुशंका, दीर्द्घशंका कर लेते थे। उस पर मिट्टी ढंक कर उसे खाद बनने को छोड़ देते थे। यानी गाँधीजी की परंपरा के हामी। सामान्य द्घराने के लोग यह क्रिया द्घाट मैदान में निपटाते थे। द्घरों में बाथरूम, टॉयलेट होते ही नहीं थे। नहाने का चलन न होने के कारण शरीर की गंध से छुटकारे का एक ही तरीका था कि उसे बनावटी खुशबू से तर रखा जाए लेकिन खुशबू टिकाऊ हो यह भी ८ारूरी था और इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर परफ्रय़ूम का जन्म हुआ। मुझे एक साथ दो ची८ों याद आ गईं। एक तो इसी परफ्रय़ूम को लेकर बनी पिफल्म 'परफ्रय़ूम, द स्टोरी ऑपफ ए मर्डरर' जिसमें नायक एक के बाद एक सुंदरियों का अपहरण कर उनके साथ संभोग करता है और संभोग के दौरान निकले पसीने को एकत्रा कर उससे परफ्रय़ूम बनाता है। यह परफ्रय़ूम यौन उत्तेजना के लिए इस्तेमाल किया जाता है। और दूसरा वह लेख जो आंद्रे जींद ने लिखा है... लेख नहीं शायद प्रबंध है वह... 'यौन याचना में पसीने की गंध' ांसीसी स्त्रिायाँ पसीने की गंध से उत्तेजित हो जाती हैं। पुरुषों के लिए भी एक परफ्रय़ूम ऐसा है जिसमें सिपर्फ़ पसीने की गंध रहती है। उन्नीसवीं शताब्दी से ांस के लोगों ने नहाना शुरू कर दिया।
''आपको सुनकर ताज्जुब होगा कि मेरी ऐटोनियो जैसी सुंदरी ने पूरी उम्र कभी नहाया ही नहीं।''
कोच में बैठे सहयात्राी अजय की बात पर नाक चढ़ाकर छीः छीः करने लगे। अब तो ांस परिवर्तन के बेहतरीन दौर से गु८ारकर खूबसूरत और विकसित राष्ट्रों में गिना जाता है। ांस का क्षेत्रापफल दो लाख १२ ह८ाार ७६० स्क्वेयर माइल है। ५६ मिलियन की आबादी है। ेंच भाषा और करेंसी यूरो है। राजधानी पेरिस है। परफ्रय़ूम के साथ ही ांस वाइन और शैंपेन के लिए भी जाना जाता है।
दक्षिणी ांस अपेक्षाकृत अधिक खूबसूरत है। मेपल दरख़्तों से सजी सड़क ख़्वाब की गलियों में प्रवेश कराती है। गैम्बलिंग के लिए प्रसि( मोंटिकार्लो कसीनो में दिन में भी बत्तियाँ जगमगा रही हैं। एक्रो पोलीस एरिया के बाद आता है नीस शहर। नीस ांस का सबसे बड़ा टूरिस्ट रिसॉर्ट भी कहा जाता है। देख रही हूँ नीला पारदर्शी पानी, दूर तक पफैले समुद्री तट... तटों पर रेत नहीं गोल पत्थर हैं। जैसे शंकरजी की बटैया हों। खिली धूप में नंग धड़ंग लेटे युवा स्त्राी पुरुष नागा बाबाओं की याद दिलाते हैं। इलाहाबाद में कुंभ मेले के दौरान ऐसे नागाओं की टोली संगम पर दिखाई देते हैं। पर वे अपने को विदेह कहते हैं यानी देह के एहसास से दूर लेकिन यहाँ तो देह से देह को रचती पूरी संस्कृति दिखाई दे रही है।
मेरे साथ आये कुछ लोगों ने वॉटर ग्लाइडिंग भी की। मैं पत्थरों के बिछौने पर बैठी देर तक यह रोमांचकारी करतब देखती रही। मुझे समंदर ८यादा आकर्षित नहीं करता। गंभीर जल का ऊबा हुआ पफैलाव या न जाने किस बात पर तट पर सिर धुनती लहरें... थोड़ी देर तक तट पर चहलक़दमी कर मैं उस नग्न लोक से निकल सड़क पार कर प्लास मसीना स्क्वेयर आ गई हूँ। बीचों बीच पार्क है। पार्क में विशाल जल स्तर पर एक साथ छूटते ढेर सारे पफ़व्वारे... पाम के सद्घन दरख़्तों से छायादार है यह पार्क। कई विदेशी जोड़े बैठे हैं। मैं भी बेंच के कोने में बैठ गई।
नीस अंग्रेजों के द्वारा विकसित किया गया है। सन १७७५ की गर्मियों में ब्रिटेन की रानी नीस के समुद्री तट पर विश्राम करने आई थी। उसे नीले सागर पर उठती सपफ़ेद लहरें, पाम के दरख़्त, गोल चिकने पत्थरों से भरा तट ऐसा भाया कि नीस का कायाकल्प हो गया। हमारा खूबसूरत होटल इसीलिए पर्यटकों से भरा रहता है क्योंकि वह नीस के समुद्री तट के उस पार है और बालकनी पर खड़े होकर लहरों के मचलते रूप का न८ाारा किया जा सकता है।
नीस के केन्स... बस रात्रिा बसेरा। होटल रिलाइंस मरकरी के पाँचवें माले की बालकनी से मैं खड़ी होकर पिफर समुद्र के करीब खुद को पाती हूँ। रात साढ़े नौ बजे सूरज डूबने के बाद जगर मगर लाइट में सागर तट बहुत खूबसूरत दिखाई दे रहा था। इंटरकॉम पर अजय था-
''पैकिंग खोलिएगा मत मैडम, सुबह ही पेरिस के लिए रवाना होना है।''
मैं अलसायी हुई पलँग पर आ लेटी। नींद कोसों दूर थी। समुद्र जो अपनी गर्जना के साथ बगल में मौजूद था।
सुबह ब्रेक पफ़ास्ट के बाद मैं 'कार्ड की' काउंटर पर देने आई तो रिसेप्शनिस्ट ने पूछा-''आप नहीं गईं बोमोनाडे?''
''बोमोनाडे?'' मैंने आश्चर्य से पूछा
''सी बीच मैडम... सी बीच का ही नाम है बोमोनाडे।'' और देर तक वह हँसती रही। उसकी खूबसूरत हँसी में गुलाबों की ता८ागी थी।
कोच एकदम खड़ी सड़क पर ते८ाी से बढ़ने लगी। इतनी ते८ा रफ्ऱतार कि मिनटों में चढ़ाई पार कर ली। यहाँ के पफूलों की तरह ही रंग बिरंगी और खूबसूरत हैं यहाँ की सड़कें। और जब ये सड़कें पेरिस की ओर जाती हों तो क्या कहने...।
सीमोन और सार्त्रा का पेरिस..........
ांस की पफैशन राजधानी पेरिस मेरे जेहन में कई बातों को लेकर एक पूरे के पूरे वजूद के समान मौजूद रही। पेरिस पहुँचते ही लगा जैसे बरसों पहले संजोया ख़्वाब हकीकत में बदलने को बस तैयार ही है। इस शहर में परफ्रय़ूम और पफूलों की खुशबू से लदी हवाएँ हर वक़्त चलती हैं। यही वो जगह है, जहाँ अस्तित्ववाद के मसीहा दार्शनिक ज्यां पॉल सार्त्रा ने अपनी प्रेमिका सीमोन द बोउवार के साथ प्रेम का इतिहास रचा था। ांस की लेखिका 'सीमोन द बोउवार' ने धारा के विरु( अपनी जीवन नैया को खेया और तमाम दुनिया की पीड़ित स्त्राी के मार्मिक इतिहास को अपनी विश्व चर्चित कृति 'द सेकेंड सेक्स' के जरिए बयान किया। सीमोन और सार्त्रा जीवन भर साथ रहे पर उन्होंने कभी द्घर नहीं बसाया। दोनों होटल में रहते थे और रेस्तरां में भोजन करते थे। कहवाद्घरों में द्घंटों दर्शन पर बहस करते थे। सारी रात पेरिस की सड़कों पर एक दूसरे का हाथ थामे द्घूमते थे। मैं उन्हीं सड़कों पर चल रही हूँ और रोमांचित हो रही हूँ।
पेरिस की आबादी दस मिलियन है। यहाँ शाम साढ़े नौ बजे ढलते सूरज के साथ दबे पाँव आती है और तुरंत रात में बदल जाती है। जब यहाँ शाम का ९ः३० बजता है तब भारत में शाम के छह बजते हैं... तो सूरज की द्घड़ी में तो कोई अंतर नहीं है। वह अपने हिसाब से हर जगह एक ही समय डूबता है। रिंग रोड मुख्य सड़क है जहाँ से किसी भी दिशा में जाने के लिए एंट्री लेनी पड़ती है। सड़कों पर इंडिकेटर लगे हैं जिन पर हैं सड़कों के नाम, माइल में दूरियाँ, यदि दुर्द्घटना हुई है तो किस एरिया में, ट्रेपिफक जाम है तो उसका कारण आदि दर्शाया जाता है। सेन नदी पेरिस के किनारे-किनारे बहती है। ''पेरिस में हम तीन रातें गुजारेंगे। अभी हम होटल मरकरी एकॉर चल रहे हैं। वहीं तीन रातों के लिए ठहरेंगे।'' अजय ने कहा और भारतीय रेस्तरां के सामने कोच रुकवाकर डिनर का आमंत्राण दिया।
अपने कमरे में आकर सामान खोलकर मैं पूरे आराम के मूड में थी।
आज मुझे भारत से आए तेरह दिन हो गये। यानी २८ मई तारीख़ है आज! मैं यहाँ की कुदरत को आँखों से बूंद-बूंद पी रही हूँ। हर बूंद एक न८म बनकर मेरे दिल में उतरती जा रही है। और उतर रहा है यहाँ का इतिहास भी या शायद मैं ही इतिहास में उतर रही हूँ। जिस तरह ांसीसी लेखिका सीमोन ने मुझे बहुत प्रभावित किया है उसी तरह जॉन ऑपफ आर्क ने भी मुझे मथ डाला है। बर्नार्ड शॉ ने जॉन के जीवन पर आधारित नाटक लिखा है 'सेंट जॉन।' जॉन के दिल दहला देने वाले अंत ने मुझे विवश किया है ांस का आरेलिआँ शहर देखने के लिए। आरेलिआं के पास लोयार नदी बहती है जिसकी लहरें साक्षी हैं उन्नीस वर्षीय जॉन के ८िान्दा दहन की। और इस बात की भी कि किस तरह जॉन ने अपनी साथिनों के साथ नाव में बैठकर लोयार नदी को पार कर अचानक अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया था। उस समय ांस पर अंग्रेजी शासन था। जॉन ने ही ांस के राजा को गुलामी की ८ांजीर तोड़ने के लिए उकसाया था। ांसीसी सेना में देश प्रेम का संचार किया था और रानी लक्ष्मीबाई की तरह यु( भी किया था लेकिन ांसीसियों को उसका सेनापति बनना, हथियार उठाना, मर्दाने वस्त्रा पहनना मंजूर न था। अतः उन्होंने उसे गिरफ्ऱतार कर पचास ह८ाार पौंड में अंग्रेजों को बेच दिया। अंग्रेजों ने उस पर मुक़दमा चलाया और उसे साधारण स्त्राी नहीं मानते हुए मायाविनी, डाकिनी, पिशाचिनी सि( कर दिया और आरेलिआं शहर में ह८ाारों लोगों के सामने उसे एक खंभे में बाँधकर ८िान्दा जला डाला। मैं लोयार नदी में जैसे जॉन के जलते शरीर का अक़्स देख रही हूँ। पर मैं इतनी विचलित क्यों हूँ। मेरे देश में भी ग्रामीण क्षेत्राों, आदिवासी इलाकों में औरत को डाकिनी, चुड़ैल आदि की उपाधि से विभूषित कर पत्थर मार मार कर मार डाला जाता है। पूरे विश्व में औरतें लगभग एक जैसे अत्याचारों का शिकार हैं।
''चलिए , आईपिफल टॉवर से हमें लोकल गाइड पिकअप करना है जो हमें सिटी टूर कराएगी।''
पेरिस की ओर लौटते हुए अजय ने कहा। कोच अब पेरिस की सड़कों पर दौड़ रही थी। पेरिस बेहद खुला-बसा सापफ़ सुथरा शहर है। सड़कों के किनारे छायादार दरख़्तोंदार हैं। दरख़्तों की डालियाँ पीले, बैंगनी पफूलों से ऊटी पड़ी हैं। एक ही सड़क पर दूर-दूर तक कई आड़े टेढ़े पुल जैसे भूल-भुलैया हों। कहीं से गाड़ी आ रही है, कहीं से जा रही है। पेरिस में अकेला आदमी गाड़ी नहीं चला सकता। उसे चार आदमी और बिठाने पड़ते हैं। चाहे वे अजनबी क्यों न हो। ऐसा शायद प्रदूषण रहित शहर बनाने के लिए किया हो। पूरे शहर में चार सौ पार्क भी शायद यही सोच बनाये गये हों। सामने आईपिफल टॉवर था। विशाल एरिया पे बना बेहद विशाल टॉवर। पेरिस की राज्यक्रांति की सौवीं वर्षगांठ सेलिब्रेट करने के लिए इसे बनाया गया था। १८८९ का समय था इसलिए इसे तोड़ा नहीं गया। इसकी ऊँचाई तीन हजार बीस मीटर है और व८ान दस ह८ाार टन। यह पूरा धातु का बना है। इसे यदि पेंट किया जाये तो ५० हजार टन पेंट लगता है। चार मं८िाल के इस टॉवर को देखने के लिए हम टिकट लेकर लाल, पीली गोल गेंद जैसी लिफ्रट से पहली मंजिल पर गये। विशल मंजिल की बालकनी से पूरे शहर का न८ाारा किया जा सकता है। जितने ऊपर जायेंगे। दृश्य उतने ही छोटे होते जायेंगे। बाहर मैदान में टॉवर का खिलौना और की चेन बिक रही थी लेकिन महँगे... गाइड का नाम जेनिस था। मोटी, गोरी और खुशमिजाज लड़की थी जेनिस। उसने पेरिस का चप्पा-चप्पा द्घुमाते हुए बड़े विस्तार से जानकारी दी।
हम एवेन्यू बोर्दनास एरिया से गु८ार रहे थे। जहाँ कापफ़ी खूबसूरत इमारतें हैं। सामने है मिलिट्री स्कूल जो १७५१ में गरीब विद्यार्थियों के लिए खोला गया था। नेपोलियन बोनापार्ट यहीं पढ़ता था। यहीं से ट्रेनिंग लेकर वह बीस साल की उम्र में सेना का सेनापति बना था। ५१ साल की उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। मैंने मन ही मन नेपोलियन महान को याद किया। ांस की राज्यक्रांति मैंने एम.ए. में विस्तार से पढ़ी थी। एक जगह से आईपिफल टॉवर का व्यू बड़ा शानदार लग रहा था। वहीं द्घास के मैदान में प्रथम विश्व यु( में शहीद हुए मार्शल जॉपफ़ल की काले द्घोड़े पर बनी मूर्ति है। जॉपफ़ल को ३२ भाषाएँ आती थीं और जीवन भर वह शांति का संदेश लोगों को देता रहा। हम वहाँ से चले तो मिलिट्री स्कूल पिफर आ गया। यानी एक बहुत बड़े क्षेत्रापफल में बनी है इसकी भूरे रंग की ेंच स्टाइल की बिल्डिंग। तीन तरपफ द्घड़ियाँ लगी हैं और ग्राउंड वॉल पर कुछ विशेष व्यक्तित्वों की मूर्त्तियाँ भी। वहीं बाजू में यूनेस्को बिल्डिंग है जो गोलाकार है। खरे २४ कैरेट सोने से बना ग्रैण्ड डोम ऑपफ़ इनवेलिड्स अद्भुत डूम है। साढ़े बारह किलो सोना लगा है इसे बनाने में। इसमें नेपोलियन बोनापार्ट की बॉडी सात कॉपिफन में दपफ़नाई गई है। यह सातवीं सदी में बनाया गया था। लेकिन जब १८१५ में वाटरलू के यु( में ब्रिटिश सेना से नेपोलियन हार गया और उसे सेंट हेलेना के द्वीप ले गये तब उसने ांस में बिताये महत्वपूर्ण दिनों को याद करते हुए बड़ी शिद्दत से अपनी इच्छा प्रगट की कि उसे ांस में ही दपफ़नाया जाये। तब उसकी बॉडी यहाँ लाई गई और पूरे सम्मान के साथ दपफ़नाई गई। उसी रास्ते पर है मिलिट्री अस्पताल, १९०० ेंको राशन अलायन, चार सुनहली मूर्तियाँ बनी हैं। लेकिन सोने की नहीं सिपर्फ रंग सुनहरा है। यह सेन नदी पर बना खूबसूरत पुल है जिस पर इन मूर्तियों को लगाया गया है। वैसे सेन नदी पर ३८ पुल हैं। यह सबसे बड़ा, शानदार... आधुनिक रोशनी से रात को जगमगाने वाला पुल है। दोनों ओर काले लैंप पोस्ट पर सपफेद रोशनी के हंडे लगे हैं। पूरा का पूरा पुल पार होते ही आता है आर्ट एग्जिवीशन हॉल... चौड़ी सड़कें चेस्टनर के दरख़्तों की छाया तले धूप के पफूल से सजी हैं। मैंने यहाँ बड़े-बड़े फ्रलैट्स में जो बाल्कनियाँ देखीं वे सभी लोहे की बनी हैं और उन पर काला पेंट है। हम जॉर्ज एवेन्यू स्ट्रीट से गु८ार रहे हैं, जो यहाँ की सबसे महंगे बाजार वाली सड़क कहलाती है। एक गेटवे ऑपफ़ इंडिया जैसा गेट देखा 'आर्च ऑपफ गेट... नेपोलियन ने इसकी नींव रखी और बनकर तैयार हुआ १८३६ में। यह १६५ पफीट ऊँचा है और २६४ सीढ़ियाँ हैं ऊपर जाने के लिए। इस गेट पर ांस के लिए शहीद हुए सैनिकों के नाम लिखे हैं। वाटर लू यु( के समय के शहीदों की मूर्तियाँ भी गेट की दीवार पर उभरी हुई हैं। यहाँ से बारह रास्ते विभिन्न दिशाओं को जाते हैं।
जेसिका बता रही है कि यहाँ पोलीस को चिकिन कहते हैं। और यह इतनी सारी पोलीस गाड़ियाँ जो खड़ी हैं वे पहली जून को ट्रेन शुरू होने की सौवीं जयंती की तैयारियों के लिए खड़ी हैं। सड़कों पर अस्थाई ट्रैक डाले जा रहे हैं। और सौ साल पुरानी ट्रेन से लेकर २१वीं सदी की ट्रेन के विभिन्न मॉडल उन ट्रेकों पर खड़े हैं। मैं लंदन जाने वाली सुपरपफास्ट यूरोस्टार ट्रेन भी देख रही हूँ। शाही ठाठ और सुख सुविधाओं वाली यह ट्रेन इंग्लिश चैनल के नीचे बनी सुरंग में से सीधे लंदन जाती है। आज पूरा विश्व भूमंडलीकरण के बुखार में जकड़ा है। मैक्डोनल, पी८ाा हट, प्लेनेट हॉलीवुड जैसी बड़ी कंपनियों की दुकानें यहाँ भी दिखाई दे रही हैं। पूरे वर्ल्ड में इनकी चेन है। नीचे बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल हैं। मॉल के ऊपर मालिकों के रहने के आलीशान द्घर जिनमें शानदार बगीचे और स्विमिंग पूल भी हैं। एकदम पॉश इलाका... सड़कों पर पफूलों की क्यारियाँ पफव्वारे... १९५८ में बनी जनरल शारद गॉल की मूर्ति... एक गोल द्घेरे में जहाँ पफूल ही पफूल खिले हैं। प्लेस डीला कॉनकॉ स्क्वेयर... लुई १६वें को यहाँ मार कर उसकी बीवी मारिया आंटिनेट को कैद कर लिया गया था। वह महल भी देख रही हूँ मैं... ऑर्से म्यू८िायम जहाँ तमाम पेंटिग्स रखी हैं। लूवरे म्यू८िायम... विश्वविख्यात सुंदरी मोनालीसा की पेंटिंग यहीं है। चेहरे पर दर्द लेकिन आँखों में हँसी। संसार की मरीचिका का एहसास दिलाती है यह पेंटिंग। दुख से भरे इस जीवन में हमें हँसते रहना पड़ता है, बेवजह। यह म्यू८िायम १७९३ में बना है। हँसते हुए जेसिका कहती है कि-
''हम जिस पुल को पार कर रहे हैं वह पेरिस का सबसे पुराना पुल है लेकिन नाम है न्यू ब्रिज।''
सभी हँसने लगते हैं। मैं कहती हूँ... ''यह बात मैं अपने यात्राा वर्णन में जरूर लिखूँगी।''
''वह खिलखिला पड़ती है... ओ... राइटर्स से बचकर रहना चाहिए। सूरज की किरणों से भी अधिक ते८ा उनकी लेखनी होती है।''
अब जो सामने इमारत है वो २००० साल पहले जब रोमन यहाँ आये थे तब १६०५ में बनी थी 'लादेना सित्ते आयरलैंड' अब यहाँ पफूलों की नर्सरी है। आयरलैंड में हमने तब प्रवेश किया जब पूरा लंबा पुल पार कर लिया। वहीं ११०३ में बना विख्यात नॉट्रेदाम चर्च है। इसे पूरा होने में १७० साल लगे। यह चर्च गोथिक कला का सुंदर नमूना है। जेसिका हमें ेंच साहित्य अकादमी भी ले जा रही है। नाम सुनते ही मैं खुश हो गई हूँ। रास्ते में देख रही हूँ लेटिन क्वार्टर, गुलाबी संगमरमर से बना सेंट माइकल पफाउंटेन... यहीं टकसाल भी थी, पहले... अब नहीं है। हम रॉयल ब्रिज से गु८ार रहे हैं, कितनी द्घटनाओं का साक्षी है यह ब्रिज। १५वीं सदी की जॉन ऑपफ आर्क की मूर्त्ति गहरे भिगो जाती है मुझे। दुबारा याद आ जाती है जॉन ऑपफ आर्क की कहानी! १७वीं सदी में बनी मीनार जिस पर हरे रंग की नेपोलियन की मूर्ति बनी है और वह कभी न भुलाया जा सकने वाला वेन्डोम स्क्वेयर जहाँ के सबसे महंगे रेस्तरां में चर्चित डायना और पत्राकार डोडी ने अपनी ८िान्दगी का आखिरी लंच लिया था। ३१ अगस्त १९९७ का दिन था। लंच लेकर वे अपनी शानदार कार में आ बैठे थे। लेकिन उनके तमाम किस्सों को जानने के इच्छुक पत्राकारों की भीड़ उनके पीछे लग गई थी। जिससे बचने के लिए ड्राइवर ने कार पफुर्ती से टनल की ओर मोड़ी थी। और असावधानी में कार की दीवार से टकरा जाने के कारण डोडी और डायना काल के गाल में समा गये थे।... यह टनल रॉयल ब्रिज के नीचे बनी है... इसीलिए तो कह रही हूँ मैं कि रॉयल ब्रिज कितनी द्घटनाओं का साक्षी है। टनल से हम भी गु८ारे... लगा जैसे एक इतिहास जी रही हूँ मैं।
लाइम स्टोन से बना इटैलियन स्टाइल का ऑपेरा हाउस... कितना पुराना लेकिन अब भी नया नया सा। १८७५ में बने इस ऑपेरा हाउस के ऊपर एक बड़ी मूर्ति बनी है सुनहरे रंग की... और सुंदर सुनहली कार्विंग मन मोह लेती हैं। जैसे जगर मगर सोने की नगरी द्वारका में सुदामा आ गये हों। पेरिस की ८यादातर इमारतों में सुनहरे रंग का प्रयोग हुआ है। हँसमुख जेसिका जहाँ हमसे विदा लेती है वह इंडियन ;भारतीय...द्ध मार्केट है। ...दुकानों के शोरूम में भारतीय औरतों के साड़ी पहने मॉडल हैं। यहाँ बनारसी सिल्क साड़ियों का भारत से आयात होता है। जेसिका के उतर जाने से कोच सूनी हो गई।
पूरा बा८ाार पार कर कोच एक दूसरे बा८ाार में आ गई है जो पूरा परफ्रय़ूम की दुकानों से सजा है। हमारा ड्यूटी ी बेनेलेक्स में परफ्रय़ूम की शॉपिंग करने का पहले से तय था। शॉप के दरवा८ो पर एक हँसमुख पारसी खड़ा था जो हमें अंदर ले गया। वह शॉप का मेन दुकानदार था। काउंटर पर हमें तमाम परफ्रय़ूम की जानकारी देने से पहले उसने 'ईचक दाना, बीचक दाना दाने ऊपर दाना...' गाकर सुनाया। वह राजकपूर का पफैन था और भारतीय पिफल्मों का शौकीन। पूछने लगा-''बताइये... यह गाना पिफल्म में किसने गाया है?''
किसी ने मीना कुमारी, किसी ने बैजन्तीमाला कहा। अनिल ने नरगिस कहा। पारसी व्यक्ति बहुत खुश हुआ और अनिल को एक बॉटल परफ्रय़ूम गिफ्ऱट में दी। मैंने भी गिफ्ऱट में देने के लिए परफ्रय़ूम खरीदे। पर लोगों की खरीदारी क्या इतनी जल्दी खत्म होनी थी। द्घंटों लगा दिये। तब तक मैं पारसी से बातें करती रही। हेमंत के बारे में सुनकर वह उदास हो गया। बोला-''अगर हेमंत होता तो मैं अपनी बेटी की शादी का प्रपो८ाल रखता। मुझे इंडियन्स बहुत पसंद हैं।'' मैं उदास हो गई। वह इधर-उधर की बातों से मेरा मन बहलाता रहा। अब वह मुझसे हिन्दी में बात कर रहा था। उसकी हिन्दी सुन मैं दंग रह गई। मुझे प्यास लगी थी। वह दौड़कर जि से मिनरल वॉटर की बॉटल निकाल लाया। इतने दिनों की मौन यात्राा के बाद ये दो द्घंटे अच्छे बीते।
शाम छह बजे होटल लौट आये। शाम क्या थी दोपहर ही थी। सूरज बीचोंबीच चमक रहा था। सभी अपने-अपने कमरों में एन ईवनिंग इन पेरिस... यानी कि पारादीलातेन शो... में जाने के लिए तैयार हो रहे थे। १८८९ में बना पारादीलातेन पेरिस का सबसे रोमांचक और हसीन कैबरे शो है। जहाँ डिनर और शैम्पेन भी सर्व की जाएगी, पर कैबरे शो में अकेले तो नहीं जाया जाता। वैसे भी इस शो में सभी को शादी के समारोह में पहनकर जाने वाली ड्रेस, ज्वैलरी आदि से लैस होकर जाना था। पुरुष सूटेड बूटेड... औरतें साड़ियाँ जेबर... कोच चली गई। मैं होटल के लाउंच में अकेली रह गई। वैसे भी मुझे नाच गाने ८यादा नहीं लुभाते... या यूँ कहूँ तड़क भड़क वाले समारोहों में जाना मुझे पसंद नहीं। मैंने सात यूरो का पफोन कार्ड खरीद कर मुम्बई और अहमदाबाद बात की। प्रमिला का नंबर बहुत लगाती रही पर लगा नहीं। कमरे में लौटकर मैंने चाय बनाई और बिस्किट, नमकीन चाय के साथ खाकर भरपूर सोने के मूड में बिस्तर पर आ गई। बहुत दिनों बाद आरामदायक नींद आई।
सुबह चार बजे नींद खुल गई। मैं अभी ेश होकर चाय की केटली ऑन कर ही रही थी कि सुबह हो गई। सूरज कितनी मुस्तैदी से यहाँ कर्म के लिए लोगों को प्रेरित करता रहता है। इसीलिए यूरोपीय देश इतने समृ( हैं। मैंने यहाँ इटली को छोड़कर और कहीं भी इक्का-दुक्का भिखारी से ८यादा नहीं देखे। कहीं एक भी झोपड़ीपट्टी नहीं देखी... कहीं पफुटपाथों पर रात को सोते लोग नहीं देखे... कहीं भी सार्वजनिक नल के पास खाली बाल्टियों की कतार नहीं देखी। लोगों को इधर-उधर कचरा पफेंकते, थूकते नहीं देखा... सड़क पर आवारा कुत्तों की पफौज नहीं देखी... मानती हूँ भारत में ही सर्वप्रथम सभ्यता का उदय हुआ पर इन देशों जैसा क्यों नहीं है भारत। चाय पीते हुए और खिड़की पर सूरज की दस्तक सुन कहाँ से कहाँ पहुँच गई थी। आज तो यूरो डि८ानी जाना था। सुबह आठ बजे होटल से निकले तो साढ़े दस बजे यूरो डिजनी पहुँच पाये। रास्ते में पिफर उन्हीं खयालों ने धर दबोचा। हरे कपड़ों में हरी कचरा गाड़ी ले जाते जमादार मुस्तैदी से शहर की सड़कें, पफुटपाथ सापफ़ कर रहे थे। सापफ़ पफुटपाथों पर जवान लड़के लड़कियाँ रोलर स्कैटिंग करते सर्र से निकल जाते थे। कुछ के कंधों पर तो स्कूल बैग भी था।
डि८ानीलैंड मैं आना नहीं चाहती थी। बच्चों के लिए यह जगह ठीक है। पिफर सोचा सारा दिन होटल में अकेली क्या करूँगी। अब आ गई हूँ तो वही मन से मजबूर... न सिंड्रोला के महल में मन लगा, न और कहीं पर पूरे डि८ानीलैंड की ट्रेन से यात्राा में म८ाा आया। लोग डि८ानीलैंड के पात्राों से मिल रहे थे। अलादीन की कहानियों को जीता जागता देख रहे थे। तरह-तरह की राइड्स ले रहे थे। एलिस इन वन्डरलैंड, पिनोरवीओ और स्नो व्हाइट चाँद की सैर, स्टीम ट्रेन और वाईल्ड वेस्ट के दृश्य सब नकली... नाटकीय आभास... जैसे किसी खिलौने से बच्चे का मन बहलाया जा रहा हो। लेकिन हाँ... डि८ानी की परेड आकर्षक लगी। वैसे भी मेले वग़ैरह में जाने से मेरा मन द्घबराता है। मंडला में दीपावली के बाद दूज का मेला लगता था दस दिनों का... उसमें भी तरह-तरह के झूले होते थे। अब उन्हीं मेलों का आधुनिकीकरण कर दिया गया है स्थाई रूप से बसाये गये डि८ानीलैंड में। मुम्बई में भी तो है एस एल वर्ल्ड और डि८ानीलैंड, वॉटर पार्क।
लौटते हुए सेन नदी का सपफ़र क्रू८ा से तय किया। हम ऊपर टैरेस पर खुले में बैठे। नदी की शांत लहरों पर क्रू८ा का चलना पता ही नहीं चल रहा था। कमेंट्री का कैसेट ब८ा रहा था जिसमें बताया जा रहा था कि दाहिने और बायें कौन-कौन सी इमारतें हैं। ेंच और अंग्रेजी भाषा में कमेंट्री चल रही थी। पेरिस की इमारतें, आईपिफल टॉवर ढेर-सारे पुल...पुलों के खंभों पर राजा महाराजाओं की मूर्तियाँ जड़ी थीं सपफेद पत्थर से बनी। पत्थर के पक्के सीढ़ीदार तट पर कई जोड़े मस्ती कर रहे थे। आज पेरिस में छुट्टी का दिन था। कुछ सामूहिक नृत्य कर रहे थे। संगीत और आर्क्रेस्ट्रा बज रहा था। एक अकेला आदमी सुनसान किनारे पर खड़ा वायलिन बजा रहा था। लगा जैसे हवा मेरे कानों के पास गुनगुनाती हुई सिम्पफ़नी बजा रही है।
डिनर के बाद जब हम होटल में वापिस लौट रहे थे तो ग्रुप के एक सदस्य को रास्ते में एरिक ने छोड़ दिया था। वह पान पराग का डिब्बा तलाशने दुकानों की ओर द्घंटे भर से गायब था। ...समय की पाबंदी यात्राा के समय ८ारूरी होती है।
आज पेरिस में आख़िरी सुबह है ये। नाश्ते के बाद हमने अपना सामान कोच के लिए भिजवाया और न८ादीक ही कोरा शॉपिंग सेंटर पैदल ही गये। कोरा की पूरे विश्व में शाखाएँ हैं। वैसा ही बड़ा, भव्य था मॉल जैसा मैंने मॉरीशस में देखा था। मैंने चॉकलेट खरीदी। जब मैं कोच की ओर लौट रही थी, गेट पर खड़ी एक ांसीसी युवती ने हाथ हिलाकर मुझे आखिरी विदाई दी। गेट से वह युवती ते८ाी से चलती हुई पफूलों से लदे पेड़ के पास गई और डाल झुकाकर पंजों के बल उचक उचककर पफूल तोड़ने लगी। पफूल तोड़कर डलिया में रखती उसे देख मुझे पंतजी की कविता याद आ गई। पफूलों की सुगंध मेरे मन में उतर गई या यूँ कहूँ कि पफूलों के इस देश में पफूलों भरी ही रही मेरी विदाई...

१०२, सद्गुरु गार्डन, तरुन भारत सोसाइटी, निकट बी.एम.सी. स्कूल, चकाला, अंधेरी ;पूर्वद्ध, मुम्बई
मो. ०९८६९०४१७०७

 
 
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