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इन दिनों इंटरनेट पर साहित्य का प्रकाशन बड़ी तादाद में हो रहा है। प्रिंट के समानांतर इंटरनेट की इन अभिव्यक्तियों का मूल्यांकन होना अभी बाकी है। इंटरनेट की इन अभिव्यक्तियों में 'प्रतिलिपि' ;ूूूण्चतंजपसपचपण्पदद्ध जैसी गंभीर ई-पत्रिाकाओं को देखकर, सिपर्फ प्रिंट को साहित्य का पर्याय मानने वाले लोगों को भी सुखद अचरज हो सकता है। गिरिराज किराडू और राहुल सोनी के संपादन में यह ई-मैगजीन हिन्दी और अंग्रेजी की सामग्री प्रकाशित करती है। पहले द्वैमासिक छपने वाली यह पत्रिाका अब तिमाही प्रकाशित होती है। इस पत्रिाका के हर अंक में एक महत्वपूर्ण विषय को केन्द्रीय थीम बनाया जाता है। इसके अलावा कई विधाओं की जरूरी रचनाएँ भी प्रकाशित होती हैं। 'प्रतिलिपि' के आठवें अंक का केन्द्रीय थीम 'आत्म और उसका अनुवाद' है। |
'अनुवाद और हिंसा' शीर्षक से प्रकाशित इस अंक के संपादकीय में ठीक कहा गया है कि अनुवाद और मूल के बीच कुछ वैसी नैतिक, भावात्मक हायरार्की रही है जैसी आत्म और अन्य, स्वदेश और परदेश के बीच रही है। इसे पलटकर अनुवाद के पक्ष में हुआ जा सकता है। लेकिन उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के लंबे सिलसिले के बाद यह कह पाना कठिन है कि अनुवाद सदैव एक 'मानवतावादी' कर्म है। शायद उसके आत्मछल उतने ही उजागर हैं, जितने स्वयं मानवतावाद के। अनुवाद, जैसा कि बहुत सारे अध्ययनों ने सि( किया है, अन्य को अभिव्यक्त करने की बजाय उसे अनुकूलित और नियंत्रिात करने और अंततः उसका मनचाहा प्रतिनिधि बनने की सुव्यस्थित परियोजनाओं का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण रहा है। लेकिन, बावजूद इसके अनुवाद में उम्मीद रहती है। यहाँ हम हर कृतित्व को अमौलिक मानने वाली संस्कृत परम्परा और हर 'ऑरिजनरी वृत्तांत' को संदेह से देखने वाले उत्तर-संरचनावादियों के साथ-साथ बोर्खेज जैसे लेखकों का भी स्मरण कर सकते हैं, जिन्होंने 'मूल' और 'अनुवाद', 'मौलिक' और 'अमौलिक' की पारस्परिक तथाकथित-ता को विसर्जित कर दिया।
'प्रतिलिपि' के इस अंक में अन्य कई अच्छी रचनाओं के अलावा इतिहासकार रामचंद्र गुहा का एक बहसतलब आलेख, प्रेमचंद गाँधी के सुंदर अनुवाद में प्रकाशित है। 'द्विभाषी बौ(किता का उत्थान और पतन' शीर्षक आलेख में गुहा का इसरार है कि भारत में बीसवीं सदी के आरंभिक से सातवें-आठवें दशक के दौरान राजनीति, समाज-विज्ञान, कला-साहित्य आदि विभिन्न अनुशासनों और कार्य-व्यवहारों में द्विभाषी बु(जिीवियों की अहम भूमिका रही है, जबकि मौजूदा दौर में कामचलाऊ द्विभाषी बौ(किों की संख्या में बढ़ोतरी हुयी है। लिहाजा, बौ(कि और संवेदनात्मक द्विभाषियता का ''ास हुआ है। द्विभाषियकता के क्षरण के नतीजतन उच्चस्तरीय ज्ञानोत्पादन में कमी के साथ-साथ समाज में कट्टरता का मजबूत होना भी शामिल है। गुहा ने जोर देकर कहा है कि ''एकाधिक भाषा में सहज होना सिपर्फ कुशलता का मसला नहीं है बल्कि संवेदनशीलता की भी बात है। एक लेखक, उसका लेखन और उसके पाठक, सब इस तथ्य से लाभान्वित होते हैं कि संकेतित व्यक्ति एक से अधिक भाषाओं या एक बड़े सांस्कृतिक विश्व का जानकार है।
निश्चित रूप से बच्चन का हिन्दी काव्य किसी ना किसी स्तर पर कैम्ब्रिज में डब्लू बी यीट्स पर किये गए शोधकार्य से प्रभावित रहा होगा। इसी प्रकार उनका अध्यापन या समय-समय पर अंग्रेजी में किया गया लेखन निश्चित रूप से हिन्दी साहित्य में उनके गहरे डूबे रहने के कारण समृ( हुआ होगा। संभवतः द्विभाषावाद से संब( मसले का जबर्दस्त उदाहरण है प्रेमचंद के 'गोदान' का विन्यास। १९३६ में प्रकाशित यह उपन्यास आधुनिक हिन्दी उपन्यास का आधार रूप है, जबकि प्रेमचंद ने इस उपन्यास की रूपरेखा अंग्रेजी में बनाई थी।''
रामचंद्र गुहा इस नतीजे पर आने से पहले गाँधी और टैगोर के बीच के संवाद का जिक्र किया है। गाँधी जी ने अप्रैल १९२१ में, उड़ीसा में एक भाषण में अंग्रेजी शिक्षा को 'बेहद गंभीर बुराई' कहा। इन्होंने कहा कि 'बालगंगाधर तिलक और राजा राममोहन राय और भी महान व्यक्ति हो सकते थे, अगर उन्हें अंग्रेजी शिक्षा की छूत की बीमारी न लगी होती।' गाँधी जी की राय में ये दो प्रभावशाली और प्रतिष्ठित भारतीय, जनता को प्रभावित करने के मामले में चैतन्य, शंकर, कबीर और नानक की तुलना में बहुत बौने थे। महात्मा गाँधी के मुताबिक ''शंकर जो काम अकेले कर सकते थे, वह अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों की पूरी पफौज नहीं कर सकती। मैं और भी मिसालें दे सकता हूँ। क्या गुरु गोविंद सिंह अंग्रेजी शिक्षा की उपज थे? क्या कोई एक भी अंग्रेजी जानने वाला भारतीय है जो उस महान गुरुनानक के समकक्ष हो, जिन्होंने एक वीर और बलिदानी धर्म की स्थापना की? ...अगर जाति को पुनर्जीवित करना है तो वह अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से नहीं किया जा सकता।'' गाँधी जी ने तर्क दिया कि ''वाे तमाम अंधविश्वास जो भारत को प्रभावित करते हैं उनमें से एक भी ऐसा नहीं है, जिससे मुक्ति के लिए, स्वतंत्राता और सही दिशा में चिंतन के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जरूरत हो। अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित शिक्षा प(ति का परिणाम यह है कि भारतीय शरीर, मानस और आत्मा को वह बौना कर रही है। ....मेरी यह पक्की राय है कि जिस ढंग से अंग्रेजी शिक्षा दी जा रही है, उसने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को कमजोर बना दिया है।''
गाँधी जी के इस मत से रवीन्द्रनाथ टैगोर ने असहमति जाहिर करते हुए लिखा कि ''राममोहन राय पश्चिम का स्वीकार करते हैं तो यह बिल्कुल स्वाभाविक हो सकता है, इसलिए नहीं कि उनकी शिक्षा पूरी तरह पूर्वी रही, बल्कि उनके भीतर तो भारतीय मनीषा की समूची विरासत मौजूद है। वे बचपन में कभी पश्चिम जाकर नहीं पढ़े और इसलिए उनके पास वो प्रतिष्ठा है जिससे वो पश्चिम के मित्रा हो सकते हैं। अगर उन्हें आधुनिक भारत नहीं समझ सकता है तो इसका मतलब यही है कि उनकी अपनी सच्चाई के शु( प्रकाश को एक पल के लिए भावनाओं के तूपफानी बादलों ने ढंक लिया है।''
गाँधी और टैगोर के बीच हुए इस विचारोत्तेजक संवाद का हवाला देकर रामचंद्र गुहा ने जो नतीजा पेश किया है, उससे इत्तेपफाक रखना मुश्किल है। गुहा से पूछा जा सकता है कि 'द्विभाषी बौ(कि' होने में दूसरी भाषा कौन? क्या इसमें वैसे लोग आ सकते हैं जो दो, तीन या अधिक भारतीय भाषाएँ जानते हों? क्या आदिवासियों की कई भाषाओं को जानने वाला, गुहा द्वारा निर्धारित कैटगरी 'द्विभाषी बौ(कि' की श्रेणी में आएगा? आखिरकार द्विभाषी या बहुभाषी में अंग्रेजी भाषा ही अनविार्यतः क्यों हो? ऐसा लगता है कि गुहा ने भाषा वर्चस्वकारी भूमिका, सत्ता-संरचना के साथ उसके रिश्ते को नजर अंदाज कर अपनी स्थापना पेश की है। साथ ही किसी उपन्यास की रूपरेखा अंग्रेजी में बनाए जाने को रामचंद्र गुहा ने जिस तरह देखा है, वह दूर की कौड़ी ही प्रतीत होता है। अधिक भाषाओं का ज्ञान निश्चित तौर पर लाभदायक होता है पर इसके साथ यह भी ध्यान रखना होगा कि अपनी भाषा की धारा सूखे नहीं।
मौलिक होना मैनेरिज्म नहीं
दुर्ग, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाली पत्रिाका 'झांपी' ;जमुना प्रसाद कसार, सिकोलाभाठा, प्रेमनगर, दुर्गद्ध के चौथे अंक में छत्तीसगढ़ के दस साहित्यकारों के साक्षात्कार और उनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। 'छत्तीसगढ़ के नक्षत्रा' के रूप में प्रस्तुत इस अंक में मुकुटद्घर पाण्डेय, गजानन माधव मुक्तिबोध, हरि ठाकुर, नारायण लाल परमार, लाला जगदलपुरी, विनोद कुमार शुक्ल, श्यामलाल चतुर्वेदी, दानेश्वर शर्मा, त्रिाभुवन पाण्डेय और स्वयं प्रकाशक जमुना प्रसाद कसार भी हैं। इस अंक में, हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताते हैं कि 'प्रत्येक रचना की रचना-प्रक्रिया रचना के साथ समाप्त हो जाती है। रचना-प्रक्रिया का कभी दुहराव नहीं होता, अगर दुहराव होता तो रचना-प्रक्रिया एक साँचा होतीं और कविताएँ साँचे में ढली होतीं। योजना बनाकर लिखना रचना को सीमित करता है। रचना में रचना का सम्पूर्ण अर्थ जैसा कुछ नहीं होता। उसमें अर्थ की गुंजाइश हमेशा होती है। जैसे किसी कुएँ में पानी झिरता है और कुआँ सूखता नहीं। अर्थ की गुंजाइश में अर्थ की जगह बनी रहती है। जिस रचना में अर्थ की गुंजाइश न हो, वह समाप्त हो जाती है। इस दृष्टि से कविता लिखना मुझे कठिन लगता है। मौलिक होना मैनेरिज्म नहीं है। कविता एक स्पफुरण है और कविता का होना ऐसा होना होता है कि उसके और होने की संभावनाएँ उसमें टिमटिमाती रहती हैं।'
अपने व्यक्तिगत जीवन के संद्घर्ष के बारे में बताते हुए कहते हैं कि ''विचारधारा के चलते संगठन की दृष्टि से लेखकों का इकट्ठा होना तो ठीक है। यही समुदाय जब गुटबाजी में बदलता है तो लेखक, संपादक, आलोचक अपने व्यवहार में, वक्तव्य में, लेखन में क्रूर और हिंसक भी हो जाते हैं। मैं भी आहत हुआ हूँ। कई बार मुझे लगा कि कविता लिखने जैसा काम कोई अपराध करने जैसा है। और कटद्घरे में खड़ा कर दिया गया है। लोग मापिफया की तरह मौका देखकर उग्र हो जाते हैं और दुर्व्यवहार करते हैं। तब अपनी कविता का सहारा अपने लिए उतना न बनता हो लेकिन अपनी कविता के लिए दूसरों की कविता सहारा बनती है। हमारे कवि होने का सहारा दूसरे की कविता ही तो है।''
समकालीन विमर्शों पर नजरिया
'शब्द संगत' के नये अंक में कवि-आलोचक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने युवा कवि सत्यवान से बातचीत के दौरान स्त्राी-दलित विमर्शों के प्रति अपनी राय जाहिर की है। बकौल विश्वनाथ प्रसाद तिवारी दोनों ही उत्तर आधुनिक विमर्श हैं और जरूरी विमर्श हैं। शताब्दियों से ये दोनों हमारे समाज में उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं। समाज में इन्हें सही और सम्मानित स्थान मिलना चाहिए। मगर साहित्य की स्थिति ठीक-ठीक वही नहीं होती जो कि समाज की होती है। साहित्य भाषा का संसार है। इसमें किसी वर्ग के लिए आरक्षण या कोटा निर्धारित नहीं किया जा सकता। इसमें नारीवादी लेखिकाएँ और दलित लेखक अपने-अपने वर्गों का आत्मीय चित्राण करें तो उपयुक्त है।
लेकिन उन्हें किसी प्रकार की राजनीतिक मांग से परहेज करना चाहिए। यदि वे पुरुष और सवर्ण लेखकों का विरोध करते हुए चाहेंगे कि वे उनके बारे में न लिखें तो यह उनकी संकीर्णता होगी। ...भाषा का संसार होने के कारण साहित्य की अपनी कुछ विशिष्टताएँ होती हैं जिसमें संवेदनशीलता, परकाया प्रवेश और भाषा की सर्जनात्मक शक्ति को महत्व देना ही होता है। यदि दलित और नारीवादी लेखक-लेखिका इनको महत्व नहीं देते तो इन विमर्शों को भी महत्व नहीं मिलेगा।
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