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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
ब्लॉगनामा
और अब नामवर सिंह का ब्लॉग! : प्रतिभा कुशवाहा
  मंह-मंह बेल कचेलियां, माधव मास/सुरभि-सुरभि से सुलग रही हर साँस/लुनित सिवान, संझाती, कुसुम उजास/ससि-पाण्डुर क्षिति में द्घुलता आकाश
यह पंक्तियाँ हैं देंसवबीांण्इसवहेचवजण्बवउ से और यह पोस्ट है सुप्रसि( आलोचक और अब ब्लागर डॉ. नामवर सिंह के ब्लॉग से। २८ अक्टूबर की इस पोस्ट को देखकर बरबस मुँह से निकल गया कि नामवर जी! आप भी। और याद आ गया संगम नगरी में २३ अक्टूबर को साहित्यकारों और ब्लॉगारों का हंगामीकृत सम्मेलन जिसका शोर एक पखवाड़े तक नहीं थमा था। नॉन ब्लॉगरों को सम्मेलन की अध्यक्षता सौंपना, ब्लॉगरों में गुटबाजी, हिन्दूवादी ब्लॉगरों को सम्मेलन से दूर रखना, महिला ब्लागरों की नाममात्रा

sउपस्थिति और साथ ही महिला ब्लॉगरों द्वारा अपराध्ी ब्लॉगरों ;यौन शोषण के आरोपीद्ध को सम्मेलन में आमंत्रिात करना। 'हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों से परहेज, नामवर सिंह का आतंक और सैरसपाटा यानी इलाहाबाद ब्लागर सम्मेलन' शीर्षक से सुरेश चिपलूनकर की एक पोस्ट जिसमें बुलावे को लेकर बरता गया गया भेदभाव पर प्रश्न उठाये गये है। वहीं इलाहाबादी अड्डा से हिमांशु पाण्डेय बोले- जानबूझकर दूर रखे गये हिन्दूवादी ब्लॉगर। इन तमाम खामियों के चलते महिलाओं के सामुदायिक ब्लॉग से रचना ने ब्लॉगरों के उद्देश्य की याद दिलाई-'ब्लागरों का र्ध्म होना चाहिए कि जो सही ना लगे उसके खिलापफ इस सार्वजनिक मंच पर आवाज उठाएँ और मैं नारी ब्लॉग के माध्यम से इलाहाबाद में हुई मीट के प्रति अपना असंतोष दर्ज कराती हूँ।'
तो इन सभी विरोधें एवं ब्लाग जगत को साहित्य न मानने के बीच ये तमाम रचनाकार ब्लॉगिंग की दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। और कमोबेश ब्लॉग जगत में इनका स्वागत भी हो रहा है। तो क्या लेखक ब्लॉग को अपनी ;उच्चद्ध श्रेणी में लाने के प्रयास में हैं? ब्लॉग में इनके प्रवेश से ब्लॉगरों एवं इनके पाठकों की क्या प्रतिक्रिया होगी? इसका उत्तर हमें शिवमूर्ति के ब्लॉग ेीपअउनतजपण्इसवहेचवजण्बवउ की एक पोस्ट पर एक पाठक की टिप्पणी से स्पष्ट हो सकता है- 'मैं एक सामान्या पाठक हूँ, लेकिन सामान्य पाठक के नजरिए से यहाँ पढ़ने लायक कुछ भी नहीं मिलता।' पाठक की यह टिप्पणी कहानीकार शिवमूर्ति के एक विचारात्मक पोस्ट पर थी जिसका शीर्षक था-'लेखक, आलोचकों ने मिलकर भगाया पाठकों को'। शिवमूर्ति ने सितंबर में ब्लॉग जगत में दस्तक दी है। तो अब इन लेखकों और रचनाकारों को यहाँ पाठकों की रूचि-अभिरूचि का ख्याल रखना पडेग़ा। कथादेश में अविनाश अपने कॉलम 'अविनाश का मुहल्ला' के जरिए कुछ ऐसा ही कहते नजर आते हैं- 'हिन्दी के जो परिचित लेखक ब्लाग लेखन में सक्रीय हो रहे हैं, उनसे यही गुजारिश की जा सकती है कि जो औपचारिकता वे आमतौर पर लेखन में बरतते हैं, ब्लागिंग में उसे एक अनौपचारिक शिल्प दे। इससे वे अपनी भाषा में चड्ढी पहन कर पफूल खिला सकेंगे और जब भी कोई द्घटना द्घटेगी, वे ठीक उसी वक्त हैरान हो सकेंगे।'
६ नवम्बर को प्रभाष जी की खबर आयी। आध्ी रात से ब्लागरों ने जो सक्रियता दिखाई वह सुबह तक ब्लॉगर पोस्टों के माध्यम से हमें प्रभाष जी को जानने का एक व्यापक पफलक प्रदान कर गई। उनके बारे में हर छोटी-बड़ी बातों को हम जान पाये। यह ब्लॉगरों की किसी विशिष्ट व्यक्ति की मृत्यु पर एक व्यापक प्रतिक्रिया थी। ब्लॉग के माध्यम से इतनी त्वरित एवं भावभीनी श्र(ांजलि कहीं देखने को नहीं मिली। हर पोस्ट में हर व्यक्ति ने अपने आँखों देखी लिखी। वैसे रविवार डॉट काम पर अपने विवादास्पद साक्षात्कार के बाद ब्लागरों को कापफी मसाला दे चुके थे प्रभाषजी। और अब जब वे नहीं रहे तब इन्ही ब्लॉगरों के बीच उन्हें अच्छा और बुरा सि( करने का ब्लॉग यु( जारी हो गया। अगर मुहल्ला लाइव की बात करें तो यहाँ आलोक श्रीवास्तव की पोस्ट हो या पिफर गिरीश पंकज, रवीश, दिवांग, ओम थानवी, हरिवंश, प्रमोद रंजन व सुरेन्द्र किशोर की, सभी ने प्रभाषजी पर खूब लिखा। और इस लिखने-दिखाने में जो तू, तू-मैं, मैं मची उसने कईयों को आहत भी किया। अरूण महेश्वरी ;कार्यकारी अध्यक्ष, जलेस, पश्चिमी बंगालद्ध की टिप्पणी को जगदीश्वर चतुर्वेदी ने अपने ब्लॉग रंहंकपेीूंतबींजनतअमकपण्इसवहेचवजण्बवउ पर प्रकाशित किया-'भारत के दीनहीन और उत्पीड़ित जनों के पक्ष में प्रभाष जी ने हमेशा पूरी बुलंदी से अपनी आवाज उठायी। इस अर्थ में वे मूलरूप से एक उत्कट वामपंथी थे।' प्रेस विज्ञप्ति के रूप में प्रकाशित इस पंक्ति पर एक पाठक एकलव्य की तीखी टिप्पणी है-'जाति की पहचान किस तरह विचारों पर हावी हो जाती है। प्रभाष जोशी ने जिंदगी भर कम्युस्टिों के बारे में जूते और गाली की भाषा में बात की। लेकिन वही पंडित प्रभाष जोशी जलेस के सवर्ण लेखकों के लिए इतने महान हो जाते हैं।' 'जितने ब्लाग उतनी बातें' की तजर् पर कहें तो प्रभाषजी की मृत्यु के बहाने बाहर बनते-बिगड़ते समीकरण ब्लॉगिंग दुनिया में छाये रहे। और आगे भी किसी ऐसे वाक्या से हमारा तआरुपफ हो जाए तो ब्लॉगिंग का बढ़ता प्रभाव ही समझिए।
;पुनश्च : देंसवबीांण्इसवहेचवजण्बवउ के संदर्भ में नामवर जी को कुछ जानकारी नहीं है और बकौल नामवर सिंह वह ब्लॉग की दुनिया से पूरी तरह अपरिचित हैं- सं.द्ध

 
 
 
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