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कथाकार डॉ. शरद सिंह के समीक्षित उपन्यास 'पचकौड़ी' का प्रारंभ यों होता है-'उसका नाम था पचकौड़ी। न आगे कुछ, न पीछे कुछ। कहने को नाम भर, लेकिन जो सुने वह पूछे बिना न रह सके कि भैया, तुम कौन जाति हो?' नाम के साथ उपनाम के तौर पर गोत्रा आदि का उपयोग करने की शुरुआत करके व्यक्ति की जाति जानने संबंधी चिन्ता से हमारे पूर्वजों ने कापफी हद तक हमें मुक्त रखा है। आज यद्यपि सामाजिक सामंजस्य की बात कापफी उछाली जाती है, तथापि किसी भी व्यक्ति से परिचित होने के क्रम में उसकी जाति को जानने की चिन्ता इस देश के हर नागरिक की पहली चिन्ता है। उपन्यास के प्रमुख पात्रा की हैसियत से पचकौड़ी एक अर्थ में स्वयं उपन्यासकार को ही एक |
'चुनौती देता प्रतीत होता है। यह कि यह मात्रा संयोग है या कथाकार के सब-कॉन्शस में पैठी परंपरावादी सवर्ण सोच कि ब्राह्मण परिवार के बजाय दलित परिवार में जन्म लिया लिख देने के बाद पचकौड़ी को ठाकुर परिवार में पहुँचाने जैसा साहसिक कदम उठाना उन्हें असंभव जान पड़ा? और शेष समाज के लिए यह कि पचकौड़ी को क्या माना जाय-जन्मना ब्राह्मण होने के नाते अगड़ा या यथार्थतः शोषित होने और वैसा ही जीवन जीने को शापित होने के नाते पिछड़ा? निःसन्देह पचकौड़ी दलित-विमर्श का हकदार नहीं है क्योंकि वह दलित नहीं है, 'न जन्मना न कर्मणा'ऋ जनमा वह ब्राह्मण परिवार में है और पला वह सामन्तों के बीच है।
'पचकौड़ी' से जुड़े कुछेक प्रारंभिक प्रसंग अनायास ही बाबा नागार्जुन के 'बलचनमा' की याद दिलाते से लगते हैं और भय पैदा करते हैं कि शरद सिंह का 'रमासुत' नागार्जुन के 'बालचन्द्र' का क्लोन न बनकर रह जाएऋ लेकिन 'पचकौड़ी' 'बलचनमा' जैसे संद्घर्षों से लगभग अछूता रहता है और सहृदया ठकुराइन की ममत्वभरी सहानुभूति व भाग्य के सहारे अपने विकास का रास्ता तय करता रहता है। वह शायद इसलिए कि साहित्य, सत्ता और पत्राकारिता में यह काल संभवतः वैसे संद्घर्षों का रह ही नहीं गया है, शॉर्टकट में ढल गया है। छल-छआपूर्ण व्यवहार और देह की छीना-झपटी के बगैर किसी भी सांसारिक सुख की जैसे कल्पना ही असंभव है। उपन्यास यह कहता-सा लगता है कि पचकौड़ी और शेपफाली परिहार जैसे ग्रासरूट लेवल के हर पुरुष और हर स्त्राी की सपफलता के पीछे शुरुआती तौर पर उनके यौन व शारीरिक शोषण तथा बाद में उनके द्वारा अपने यौनांगों का उपयोग होने देने की समझौतावादी सोच को विकसित कर लेना है।
'अपनी बात' के अन्तर्गत डॉ. शरद सिंह का कहना है कि 'मेरा यह उपन्यास जिन पात्राों पर केंद्रित है, ये कहीं न कहीं अपने जीवन में उलझन-भरे प्रसंगों से जुड़े हुए हैं। जो अन्य लोगों के लिए अनुचित है, वह इनके लिए उचित है।' उपन्यास के ऐसे पात्राों में मुख्यतः दो को ही इस वक्तव्य के समक्ष रखा जा सकता है-पचकौड़ी को और शेपफाली को। शेष पात्रा जो कुछ भी अनुचित कर रहे हैं उसका औचित्य सिपर्फ इतना है कि वे जीवन को भोग रहे हैं या पिफर प्राप्त सुविधाओं को बचाए रखने का उद्यम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए चेतन, यथेष्ट शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद रोजगार न पाने के कारण उसने 'भैयाजी' के छत्रा-तले अपनी सुरक्षा निश्चित कर ली है। ठकुराइन से उसके शारीरिक संबंध बन जाने के पीछे क्या उलझन है? यहाँ तक कि ठकुराइन भी अनायास प्राप्त सहानुभूति के वशीभूत ही उसकी झोली में आ पड़ती है, पति के कुकृत्यों के खिलापफ मोर्चाबंदी अथवा अपनी दैहिक-इच्छापूर्ति की भावना के वशीभूत नहीं। यह एक अलग बात है
कि अनायास प्राप्त संसर्ग के सुख को वह अपनी जरूरत महसूस करने लगती है और बार-बार उसे भोगती है। ठकुराइन का पचकौड़ी के सामने चेतन के साथ अपने देह-संबंधों को बताना अनेक दृष्टि से एक अविश्वसनीय हादसा है। मनोवैज्ञानिक सत्य तो यही है कि स्त्राी अपने विवाहेतर संबंधों को छिपाए रखने में ही अपनी सामाजिक सुरक्षा देखती है। लेकिन आज की स्त्राी शायद कुछ ज्यादा ही दुस्साहसी हो उठी है। उसने मनोविज्ञान के पुराने सभी सि(ान्तों को धता बताकर अपने लिए नए क्षितिज गढ़ लिए हैं। तभी तो '...मैं चाहती हूँ कि सारी दुनिया को पता चले कि मैं किन यातनाओं को जी रही हूँ और मैंने जीवित रहने के कौन-से रास्ते ढूँढ़ निकाले हैं। देखना, एक न एक दिन मैं तुम्हारे भैयाजी को भी सबकुछ बता दूँगी, सब-कुछ!' ठकुराइन ने उत्तेजित स्वर में कहा और इसके बाद उन्होंने अपने और चेतन के बारे में सबकुछ पचकौड़ी को बता दिया। ;पृष्ठ ११४द्ध यानी कि उसने जान लिया है कि अपने राजनीतिक जीवन और सामाजिक प्रतिष्ठा को बचाए रखने की कवायद में 'भैयाजी' जिन भोगों में लिप्त हैं, उनसे निर्लिप्त रहने का दबाव वे उसपर नहीं बना सकते हैं।
'कमोबेश जो निर्बल हैं, लाचार हैं और जिसमें अपना स्वतंत्रा अस्तित्व स्थापित करने की उत्कट इच्छा है, उसे किसी न किसी रूप में हर कदम पर शोषण का शिकार होना पड़ता है।' उपन्यास के फ्रलैप-एक की इस द्घोषणा में शोषण से उनका तात्पर्य दैहिक-शोषण उतना नहीं लगता जितना यौन-शोषण लगता है, इस बात का पता उपन्यास में छितरे पड़े ऐसे अनेक शोषणों से दो-चार होने पर आसानी से चल जाता है। उपन्यास अनेक यौन-संसर्गों और दैहिक-शोषणों को अपनी काया में समेटे हुए है। इनमें पहला है- ट्रक-ड्राइवर द्वारा बालवय पचकौड़ी का बलात्कारऋ उस समय जब वह यह भी नहीं जानता था कि यह सब होता क्या है। ;पृष्ठ २६द्ध दूसरा है-सुहाग की रात को पति ;दलपतद्ध द्वारा पत्नी ;अनुराधाद्ध के साथ असपफल सहवास। ;पृष्ठ ९७द्ध तीसरा है-ठकुराइन के साथ द्घर के एक नौकर चेतन द्वारा संसर्ग।
;पृष्ठ ११०द्ध चौथा-पार्टी की महिला शाखा की अध्यक्ष रत्ना दीदी द्वारा पचकौड़ी का बलात्कार। ;पृष्ठ १८६द्ध पाँचवा-पार्टी के ही एक अन्य पुरुष नेता द्वारा पचकौड़ी से संसर्ग। ;पृष्ठ १८८द्ध छठा-न्यूज चैनल ए टु जैड के चीपफ एडीटर अश्विनी नाइक और चैनल की रिपोर्टर व पेज-थ्री सेलिब्रिटी शेपफाली परिहार के अंतरंग क्षण। ;पृष्ठ २०१द्ध सातवाँ-साहित्य संपादक विकलजी द्वारा भोली-भाली कस्बाई बाला शेपफाली का यौन-शोषण। ;पृष्ठ २०६द्ध आठवाँ-अर्थशास्त्रा के प्राध्यापक जयेश द्वारा शेपफाली के 'स्त्राीत्व' को जाँचने और जाँचकर अमान्य कर देने का दृश्य ;पृष्ठ २१०द्ध ...आदि-आदि। इनके अलावा किशोरवय पचकौड़ी की प्रथम यौनानुभूति और तदन्तर्गत हस्तमैथुन ;पृष्ठ ७०द्ध का उल्लेख भी उपन्यास में संभवतः कहानी और पात्राों के चरित्रा-विकास की आवश्यकता के मद्देनजर ही किया गया है।
'यदि एक पुरुष स्वयं को परिस्थितियों के अनुरूप ढालकर जिंदगी जीने के लिए संद्घर्ष करता है, चाहे वह रास्ता किसी अन्य पुरुष की कामेच्छा शांत करना हो, या किसी स्त्राी की दैहिक इच्छा पूरी करना, तो उसे उसके जीवन को किसी स्त्राी के जीवन से कितना अलग माना जा सकता है? किसी हद तक एक समान।' ;पृष्ठ ८द्ध 'अपनी बात' में डॉ. शरद सिंह का यह कथन उपन्यास के उन प्रसंगों की ओर संकेत करता है जिनमें से पहला पार्टी के एक पुरुष नेता का विधायक-पद के उम्मीदवार पचकौड़ी से यह वार्तालाप हैः 'कुछ देर पीने-पिलाने के बाद नेताजी उठे और अपना तहमद खोलते हुए बोले, ''कब तक बैठे रहोगे? चलो, अब शुरू हो जाओ।''
पचकौड़ी को एक रत्ती समझ में नहीं आया था कि 'शुरू होने' से नेताजी का क्या तात्पर्य है।
''तुम तो औरतों जैसे नखरे दिखा रहे हो या पिफर हिचकते हो?'' नेताजी ने अजीब स्वर में कहा था और उसके बाद पचकौड़ी की बाँह पकड़कर उसे कुर्सी से उठाते हुए बोले थे, ''चलो तुम झुको, पहले मैं शुरू करता हूँ।''
पचकौड़ी हिचका था, लेकिन जिस रास्ते पर वह बढ़ चुका था उससे पीछे हटना किसी भी कीमत पर उसे स्वीकार्य नहीं था। ;पृष्ठ १८८द्ध तथा दूसरा यह कि 'उसने पहली बार अपना कौमार्य उस ट्रक ड्राइवर के हाथों खोया था, लेकिन वह उसकी समझ से परे था ;किंतु आज किसी स्त्राी के संसर्ग का पहला अनुभव भी उसके लिए बलात्कार से कम नहीं था। वह पुरुष होकर भी बलत्कृत हुआ था... वह समझ गया था कि यदि उसे जीना है और दुनिया के सामने सम्मान से जीना है तो पर्दे के पीछे बहुत कुछ खोने को तैयार रहना होगा।' ;पृष्ठ १८७द्ध
इन प्रसंगों के अतिरिक्त उपन्यास में मानव-व्यवहार के अन्य अनेक पहलुओं का भी बड़ा ही सटीक चित्राण हुआ है। न सिपर्फ चित्राण बल्कि कथानुरूप विमर्श या पिफर उसके प्रयास भी। उपन्यास का बड़ा हिस्सा भैयाजी के माध्यम से कस्बाई राजनीति की उठा-पटक तथा ठाकुर उदय प्रताप सिंह व भैयाजी के माध्यम से वसुंधरा आदि यानी कि द्घर-समाज में स्त्रिायों के प्रति दमनपूर्ण रवैये की कथा कहता है। इन्हीं के बीच पचकौड़ी और ठकुराइन के चरित्रा भी विकसित होते हैं तथा परिस्थितिजन्य पारस्परिक समझबूझ, स्नेह व सम्मान भी।
पूरा उपन्यास 'वह लड़का', 'अबूझ प्रश्न', 'भला और वह क्या करती', 'एक और करवट', 'कोई तो बात थी उसमें' तथा 'टी आर पी' कुल छः उपखण्डों में मुख्यतः तीन-दैव-कोपित पचकौड़ी की, पितृसत्तात्मक शोषण की शिकार वसुंधरा यानी ठकुराइन की तथा पुरुषसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा शोषित शेपफाली परिहार की जीवन-गाथाओं को अपने आप में समेटे हुए हैऋ और उसका समापन होता है 'और अब...' जैसे सकारात्मक और सुखद खण्ड पर। संबंधों को लगभग समाप्ति के कगार पर पहुँच चुके पारिवारिक-रिश्तेदारों ;पचकौड़ी के चाचा-चाची व मौसीद्ध, स्वार्थ और पाशविकता से पूर्ण सहानुभूति दर्शाने वालों ;ट्रक-ड्राइवर और भैयाजीद्ध, शोषण को आज भी अपना अधिकार मानने वाले सामन्तों ;चाचा ठाकुर और महेन्द्रद्ध, कामकाजी महिलाओं के प्रति कामुक नजरिया रखने वाले लोगों ;भैयाजी, वकील, अश्विन नाइक आदिद्ध के अलावा 'पचकौड़ी' में बलात्कार के मामलों को दबाने, चुनावों में खड़ा करने हेतु उम्मीदवारों को तय करने, टी वी चैनलों की टी आर पी बढ़ाने के लिए किए जाने वाली करतूतों आदि आम सामाजिक जीवन से जुड़े कितने ही कार्य-व्यवहारों का खुलासा होता है।
उपन्यास बहुत-ही खुले तौर पर आज की स्त्राी के ही नहीं पुरुष के भी उस मनोविज्ञान को प्रस्तुत करता है जिसके चलते किसी समय में 'तुष्टि और सुरक्षा' के सि(ान्त की उत्पत्ति और स्थापना हुई थी। पचकौड़ी और ठकुराइन की मानसिकता के बारे में ऊपर लिखा जा चुका है। अब जरा बरास्ता शेपफाली आज की कामकाजी युवतियों की मानसिकता को भी जान लें-'...एक बार उसने सोचा कि उसे शादी कर लेनी चाहिए। उसके पास एक पति होगा, एक-दो बच्चे होंगे तो उसका जीवन पटरी पर आ जाएगा। पति नामक पुरुष उसके साथ हर रात संभोग करना चाहेगा तो कर लेगा किंतु उसकी बहुत-सारी समस्याओं से भी उसे निजात दिला देगा।'
उपन्यास का पटाक्षेप शेपफाली को माध्यम बनाकर चले गए पचकौड़ी के कूटनीतिक दाँव से होता है जिसमें उसके सरपरस्त भैयाजी के धुर राजनीतिक विरोधी और उसके खुद के राजनीतिक कैरिअर के लिए खतरा बन चुके सज्जन प्रसाद दुबे तो चारों खाने चित होते ही हैं, ए टु जैड चैनल के मालिक सुजीत पालीवाल को भी लाभ की प्राप्ति होती है तथा अपने एकाकीपन से द्घबराकर शादी का पफैसला कर चुकी और इस दिशा में अपने साथ के कई युवकों को 'ट्राई' कर चुकी शेपफाली परिहार को भी सुख की अनुभूति होती है-'एक दिन जब शेपफाली अपने द्घर में सुबह की चाय पी रही थी, किसी ने दरवाजे की द्घंटी बजाई। शेपफाली ने मैजिक आई से देखा, बुकेवाला लड़का बुके लेकर खड़ा था। शेपफाली ने दरवाजा खोला और बुके ले लिया। लाल-गुलाबों वाला प्यारा-सा बुके।
किसने भेजा होगा? सोचती हुई शेपफाली बुके को टटोलने लगी। पफूलों के बीच कागज की एक स्लिप बरामद हुई। स्लिप पर पेन से लिखा थाः 'आभारी हूँ। काश! कभी मैं आपके इस आभार का आँण उतार सकूँ-पचकौड़ी।' नाम के नीचे मोबाइल नंबर लिखा हुआ था।
शेपफाली अनायास मुस्करा दी। उसने बुके को एक ओर मेज पर रख दिया और स्लिप बाएँ हाथ में पकड़कर दाएँ हाथ से अपने मोबाइल पफोन से स्लिप पर लिखा पचकौड़ी का मोबाइल नंबर डायल करने लगी। पचकौड़ी को उस समय पता नहीं था कि उसके जीवन का एक और आश्चर्य उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।
'पचकौड़ी' शोषित-वर्ग में उभरती सामाजिक व राजनीतिक समझ के नितान्त सामयिक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत होता है। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में शोषित को वह ऐसी शक्ति के रूप में उभरता दिखाता है जिसके बिना शोषक अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर पाएगा। सभ्य समाज के लोग जिसे 'खोना' कहते हैं वह उनसे जबरन छीना जा चुका होता हैऋ शायद इसीलिए निश्ंिचत भाव से वे बेहतर जीवन की ओर उन्मुख हो पाते हैं और प्राप्त बेहतर जीवन को बचाए-बनाए रखने योग्य सावधानी बरतना भी सीख जाते हैं। बकौल पचकौड़ी-''...सहानुभूति से पेट नहीं भरा करता है और न ही सिर को छत मिलती है।'' यही आज का सच भी प्रतीत होता है।
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