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तुम कितना भी कहो शैलेश! मैं इसका समर्थन नहीं कर सकता।''
''क्यों? इसमें गलत बात क्या है?''
''गलत बात कैसे नहीं है? कॉलेज में मानवता पर कई व्याख्यान बद्घारने वाले तुम्हें यह शोभा देता है क्या?''
''असल में मानवता क्या है, यह तुम जानते हो क्या? जानते तो पिफर ऐसा नहीं कहते।''
''हाँ, यह सब तुम्हीं से सीखना पड़ेगा न, तो पिफर बता ही दो।''
''क्या भीख माँगते पिफरने वाले बच्चों को आश्रय प्रदान करना मानवता नहीं है? असामाजिक तत्वों के चंगुल में पफँसने वाले नन्हें बच्चों को एक श्रमिक शक्ति के रूप में बदलने के प्रयास की प्रशंसा करने के स्थान पर इसकी निंदा क्यों कर रहे हो सुरेन्द्र?''
''कोमल और मासूम बच्चों को कड़ी धूप में तुम्हारी कंपनी के बैनर पकड़ाकर खड़ा रखना अमानुष नहीं? पैर दुखते हुए भी द्घंटों तक खड़े रहने में कितना कष्ट होता है, यह वातानुकूलित कमरों में रहने वाले, ए.सी. कार में द्घूमने वाले तुम क्या जानो?'' |
तुम कितना भी कहो शैलेश! मैं इसका समर्थन नहीं कर सकता।''
''क्यों? इसमें गलत बात क्या है?''
''गलत बात कैसे नहीं है? कॉलेज में मानवता पर कई व्याख्यान बद्घारने वाले तुम्हें यह शोभा देता है क्या?''
''असल में मानवता क्या है, यह तुम जानते हो क्या? जानते तो पिफर ऐसा नहीं कहते।''
''हाँ, यह सब तुम्हीं से सीखना पड़ेगा न, तो पिफर बता ही दो।''
''क्या भीख माँगते पिफरने वाले बच्चों को आश्रय प्रदान करना मानवता नहीं है? असामाजिक तत्वों के चंगुल में पफँसने वाले नन्हें बच्चों को एक श्रमिक शक्ति के रूप में बदलने के प्रयास की प्रशंसा करने के स्थान पर इसकी निंदा क्यों कर रहे हो सुरेन्द्र?''
''कोमल और मासूम बच्चों को कड़ी धूप में तुम्हारी कंपनी के बैनर पकड़ाकर खड़ा रखना अमानुष नहीं? पैर दुखते हुए भी द्घंटों तक खड़े रहने में कितना कष्ट होता है, यह वातानुकूलित कमरों में रहने वाले, ए.सी. कार में द्घूमने वाले तुम क्या जानो?''
''मेहनत के बिना कुछ भी संभव नहीं है। रोजी-रोटी के लिए इतना-सा श्रम किए बगैर कैसे चलेगा? अब रही मेरी वातानुकूलित जीवन-शैली। इसके बारे में तुम्हें कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। तुम तो बिना कोई तकलीपफ उठाए बड़े आराम से स्नातकोत्तर स्तर तक पढ़ाई कर चुके हो। तुम्हारी तुलना में कष्ट क्या होता है, यह मैं ही कहीं बेहतर रूप में जानता हूँ। पल-पल किसी न किसी बाधा का सामना करते हुए, पफीस के लिए, पुस्तकों के लिए और अन्य खर्चों के लिए कभी पेपर ब्वाय, कभी काउंटर पर सेल्समैन, कभी पार्टटाइम टाइपिस्ट और कभी ट्यूशन देने वाला मास्टर... इस प्रकार अनेक रूप धारण करने के बाद आखिर एमबीए उपाधि हासिल कर पाया हूँ। श्रम के सौन्दर्य के बारे में तुम्हारे जैसे व्यक्तियों से लेक्चर सुनने की गत अभी मेरी नहीं बनी है।''
''यह क्या शैलेश! इतने ताव में क्यों आते हो? अगर शांति से विचार करो तो मेरी बात तुम समझ सकोगे। कम खर्च से ज्यादा प्रचार पाने के विचार के लिए तुम्हारा एमबीए वाला दिमाग वाकई प्रशंसनीय है। पर जरा उन मासूम बच्चों की ओर से भी देखो। तब मेरा प्वाइंट तुम्हें समझ में आएगा। मेरी व्यथा का तुम्हें पता चलेगा।''
''सुरेन्द्र! यदि उन बच्चों के प्रति तुम्हारी व्यथा सच्ची है तो बताओ कि उनके लिए तुमने क्या किया है? उनके हाथ में एक रुपया थमाकर हाथ झाड़ने के अलावा उन्हें एक जिंदगी देने के लिए तुमने या तुम्हारी भावुकता को बाँटने वाले तुम्हारे मित्राों ने कहीं कोई निर्माणात्मक कार्य हाथ में कभी लिया है? बताओ न।''
''हे भगवान! मैंने मधुमक्खियों के छत्ते को छेड़ा है।'' सुरेन्द्र ने सोचा। चर्चा का रुख बदलने के लिए उसने कहा, ''इस तरह वाद-विवाद का कोई अंत नहीं है। अब हरिता और बच्चों के बारे में सुनाओ।''
उनकी बातचीत की दिशा परिवार की बातों की ओर बदल गई।
सुरेन्द्र और शैलेश बचपन के दोस्त थे। दोनों ने उस्मानिया विश्वविद्यालय में ही पढ़ा था। कॉलेज के दिनों से ही उनके बीच मतभेद थे। पिफर भी उनकी मैत्राी अटूट थी। यही तो आश्चर्य की बात थी। जिंदगी की राह में एक बंगलूर पहुँच गया तो दूसरा मुंबई में धकेल दिया गया।
सुरेन्द्र मुंबई की एक प्राइवेट संस्था में अधिकारी था। शैलेश बंगलूर की इलैक्ट्रानिक उत्पाद बनाने वाली एक संस्था में उपाध्यक्ष ;विपणन और प्रशासनद्ध के पद पर था।
शैलेश मुंबई में अपने नये उत्पाद को बाजार में उतारने के काम से आया था। सुबह से ही वह कंपनी के अधिकारियों और व्यापारियों के साथ बैठकें, विज्ञापन एजेंसी को परामर्श, पत्राकार-वार्ता... इन सबमें बेहद व्यस्त था।
इतने व्यस्त कार्यक्रम में भी शैलेश ने अपने बचपन के दोस्त के लिए एक शाम आवंटित कर रखी थी। सुरेन्द्र ने बहुत आग्रह किया कि वह चला आए, पर समय की कमी के कारण शैलेश ने सुरेन्द्र को ही अपने होटल में डिनर पर बुलाया था।
उस अवसर पर यद्यपि उनका वार्तालाप कुछ गरमाहट के साथ शुरू हुआ, पिफर भी एक-दूसरे के परिवार के हालचाल पूछने-बताने तक आकर वह आत्मीयता के साथ समाप्त हुआ। रात के दस बज गए थे, इसलिए सुरेन्द्र अनमना-सा ही उठ गया और मुंबई से बाहर एक उपनगर में स्थित अपने फ्रलैट के लिए रवाना हो गया।
सुरेन्द्र तो चला गया था, पर उसने जो मुद्दे उठाए थे, वे शैलेश का पीछा नहीं छोड़ रहे थे। उस दिन की उन द्घटनाओं का मनन करने पर...
सारी मुंबई में अपने नये उत्पाद के बैनर! हर सौ मीटर के पफासले पर दो-दो बच्चे उनका बैनर पकड़कर खड़े थे। इस नई प(ति से सबका ध्यान उस ओर आकृष्ट हुआ था। टीवी या होर्डिंग से उन्हें इतना प्रचार नहीं मिल सकता था। और ऊपर से खर्च तो कई गुना अधिक हो जाता। इसके परिणामस्वरूप...!
व्यापारियों ने उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दिखाई!
लाखों में आदेश मिल गए!
व्यवसाय में भारी सपफलता हासिल हुई।
पर... सुरेन्द्र की आलोचना जो थी!
उसने तो यूँ इस अंदाज में बात की थी, परंतु क्या वास्तव में उसने उन बच्चों के प्रति सहानुभूति से ही इस प्रचार-माध्यम का चयन किया था? उसकी अंतरात्मा ने उत्तर दिया-''नहीं।''
उसने केवल खर्च कम करने के लिए ही यह निर्णय लिया था। पिफर भी जो व्यय हुआ, उसमें से उन बच्चों को क्या मिला? शायद दस प्रतिशत भी नहीं। इसका मतलब... उसमें से नब्बे प्रतिशत रकम बच्चों की सप्लाई करने वालों और विज्ञापन एजेंसी वालों ने डकार लिया। यही न...?
क्या यह शोषण नहीं था? क्या इसके लिए उसने सहयोग नहीं दिया था?
शैलेश के मन में उथल-पुथल मच गई थी। सोचते-सोचते कच्ची नींद से ही सुबह हो गई। वह सुबह वाली फ्रलाइट में बंगलूर वापस चला गया।
ऑपिफस में सभी ने उसकी प्रशंसा की।
लागत बचाने का माध्यम! अधिकतम क्षेत्रा में विज्ञापन! प्रारंभ में ही लाखों के आदेश!
प्रबंध निदेशक बहुत खुश हुए। स्वयं शैलेश के केबिन में आकर उन्होंने बधाई दी।
शैलेश सभी की शुभकामनाएँ स्वीकार करता रहा। पर उसके मन के अंदर कुछ कुलबुलाहट-सी महसूस हो रही थी। मुंबई एअरपोर्ट से नरीमन पाइंट तक बैनर पकड़कर खड़े हुए बच्चे ही उसकी आँखों के सामने झूल रहे थे।
उसको यूँ एहसास हो रहा था जैसे थके हुए उनके चेहरों ने उसको दोषी के रूप में खड़ा कर दिया है।
वह रोज कम से कम सात बजे तक दफ्रतर में रहता था। पर उस दिन वह छह बजे ही द्घर पहुँच गया।
''लगता है, आज सूरज पूरब में डूब गया है। छह बजे ही आप द्घर पहुँच गए हैं।''
शैलेश ने कोई जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप अपने कमरे में चला गया।
''क्या हुआ? आप ऐसे क्यों हैं?'' श्रीमती परेशान हो रही थी।
''अच्छी कॉपफी बनाओ हरिता! इस बीच में ेश हो जाता हूँ।''
''हाँ, अब बताइए। बात क्या है?'' कॉपफी और बिस्कुट का प्लेट हाथ में देते हुए हरिता ने पूछा।
शैलेश ने एक द्घूँट कॉपफी पी ली और बिस्कुट मुँह में डाल लिया। पिफर कहने लगा। नया उत्पाद लाँच करना, कंपनी के काम, अपनी मुंबई यात्राा, प्रचार के माध्यम के रूप में बच्चों का उपयोग, रात को सुरेन्द्र के साथ बहस... ये सारी बातें उसने बता दीं।
''हरिता! मुझे लगता है, मैं कसूरवार हूँ।''
''सुनिए, ऐसे बड़े पद पर काम करते हुए इतने संवेदनशील होने से कैसे काम चलेगा? मैं समझती हूँ कि मैनेजमेंट के शब्दकोश में रहमोकरम के लिए कोई स्थान नहीं है।''
''अच्छी बात है कि मैंने कभी तुमसे जो कहा था, वही अब मुझे वापस सुना रही हो। पर मैंने तुमसे जब यह कहा था, उस समय का संदर्भ बिलकुल दूसरा था। आज की स्थिति उससे बिलकुल अलग है। मेरी व्यथा यही है कि अपनी गलती को सुधारने के लिए मेरे लिए क्या करना ठीक रहेगा।''
''यदि आप यह न समझें कि मैं आपके कामकाज में हस्तक्षेप कर रही हूँ तो क्या मैं एक बात कह सकती हूँ?''
''कहो।''
''प्रतिस्पर्धा की इस दुनिया में प्रचार का जो महत्व है उसे हम इनकार नहीं कर सकते। कम खर्च से अधिक लाभ पाने का विचार कोई जुर्म नहीं है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि मैं शोषण का समर्थन कर रही हूँ। आप जरा सोचिए कि शोषण को कैसे रोका जा सकता है। कोई न कोई उपाय जरूर सूझेगा।''
''मेरे दिमाग ने काम करने से मना कर दिया, तभी तो मैं तुम्हारी सहायता माँग रहा हूँ। तुम भी एमबीए कर चुकी हो। जरा-सी मेरी मदद नहीं कर सकती हो?''
''आपकी कंपनी से आपको वेतन मिलता है, मुझे नहीं। उपाय आपको मैं सुझाऊँ और सारा श्रेय आप ले लेंगे?''
''मजाक छोड़ो हरिता! मैं गंभीरता से कह रहा हूँ। अगर चाहो तो तुम्हें परामर्श-शुल्क दिलवाऊँगा।''
''मैंने तो यूँ ही कहा जनाब! हमारे बीच आपस में पफीस की क्या जरूरत है? आपका वेतन मेरा नहीं है क्या? अगर श्रेय आप लेंगे तो वह क्या मेरा नहीं होगा? थोड़ा-सा समय दीजिए। कुछ न कुछ सोचूँगी। अब ऑपिफस की बातें रहने दीजिए, मुझे रसोई शुरू करनी है। बच्चे ट्यूशन से आते ही होंगे।''
हरिता रसोई द्घर में चली गई।
उसने एमबीए करने के बाद कुछ समय के लिए नौकरी की थी। पतिदेव अपनी नौकरी में नई बुलंदियाँ छूने लगे थे और आर्थिक तौर पर हालत कुछ मजबूत हो गए थे। बच्चों की परवरिश के लिए भी समय नहीं मिल रहा था, सो इतने कारणों से उसने अपनी नौकरी से त्याग-पत्रा दे दिया था। वह अपनी सुविधा के अनुसार कुछ स्वैच्छिक संस्थाओं को परामर्श और सहयोग दिया करती, पर उसकी पहली वरीयता उसका अपना परिवार ही रहता।
अगले दिन जैसे ही शैलेश दफ्रतर से आया, नाश्ता और कॉपफी लेने के बाद हरिता ने अपनी योजना की रूपरेखा और ब्योरा लिखा हुआ पत्राक पति के हाथ में थमा दिया।
''आज विज्ञापन के क्षेत्रा में करोड़ों का टर्नओवर है। पर यह विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे में है। विदेशी कंपनियाँ अपने उत्पादों के साथ ही सहायक तौर पर विज्ञापन कंपनियाँ भी ले आयीं। वे प्रारंभ में देशी कंपनियों के साथ हाथ मिलाती हैं। यहाँ के व्यापार और बाजार के तौर-तरीके सब जानने-समझने के बाद देशी कंपनी से अलग होकर अपना खुद का कारोबार शुरू कर देती हैं। वैश्वीकारण और उदारीकरण की कृपा से आज हमारे देश की कंपनियाँ बंद होने के कगार पर हैं। बड़ी-बड़ी विज्ञापन एजेंसियाँ भी जब तक किसी न किसी विज्ञापन संस्था के साथ संबंध स्थापित नहीं करतीं, तब तक खड़ी न हो पाने की दुर्दशा आज उत्पन्न हो गई है। पफाइव स्टार संस्कृति के कारण पाखंड और दिखावा लाजिमी हो गया है। इसके कारण विज्ञापन की दरें आसमान को छूने लगी हैं। उत्पादन के व्यय से भी बढ़कर उसके विज्ञापन का खर्च है। इससे नुकसान होता है अपने देश के उपभोक्ताओं को। लाभ मिलता है विदेशी कंपनियों और विज्ञापन संस्थाओं को।''
''तुम्हारा अध्ययन तो कमाल का है हरिता! लगता है, यह कोई लेख है। मेरी समस्या का समाधान कहाँ है?''
''इतनी जल्दबाजी न करें प्राणनाथ! इसे पूरा पढ़ लीजिए। उसके बाद बात करेंगे।''
शैलेश आगे पढ़ने लगा।
''विज्ञापन के बजट के लिए करोड़ों का व्यय करके विदेशी कंपनियों और पाँचसितारा होटल और विदेशी संस्कृति का पोषण करने की अपेक्षा हमें अपनी मानव-शक्ति का उपयोग निर्माणात्मक रूप में कर लेना चाहिए। अनाथ बच्चों को एक नया जीवन देना चाहिए। उनकी न्यूनतम आवश्यकताएँ जैसे-भोजन, आवास, कपड़ा और शिक्षा की सुविधा प्रदान करके उनकी श्रमशक्ति का उपयोग प्रचार के क्षेत्रा में कर लेना चाहिए। इस योजना के लिए मूलधन कंपनी दे दें, तो बच्चों के श्रम के अनुरूप वेतन देना होगा और इस प्रयोजन हेतु स्थापित संस्था के प्रबंध के लिए होने वाले दैनंदिन व्यय का वहन भी करना होगा। उनकी शिक्षा और खेल-कूद में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो, इसके लिए छुट्टियों अथवा रविवार के दिनों में इन नन्हें-मुन्नों का उपयोग प्रचार के लिए कर लेना चाहिए। उन्हें कोई तकलीपफ न हो, इसके लिए आवश्यक सुविधाएँ मुहैया करनी चाहिए। बैठने के लिए कुर्सी, धूप से बचने के लिए छतरी और अच्छे-से यूनिपफार्म की व्यवस्था करनी होगी।''
मोटे तौर पर हरिता की योजना यही थी।
शैलेश अपनी पत्नी की निपुणता पर चकित हो गया। एक पढ़ी-लिखी गृहिणी नौकरी किए बिना भी अपनी अक्ल का उपयोग कितने बेहतर ढंग से कर सकती है, यह हरिता की योजना साबित कर रही थी। एक ओर समाज-सेवा और दूसरी ओर वाणिज्य। दोनों का समन्वय उसने दिखा दिया। यदि ईमानदारी से अमल किया जाए तो इस योजना का लाभ साधारण नहीं होगा। सभी राजधानियों में इसे लागू किया जा सकेगा। केवल बच्चों के शारीरिक श्रम ही नहीं, बल्कि उनकी सृजन-क्षमता का भी उपयोग प्रचार के क्षेत्रा में बखूबी संभव होगा। कॉपी राइटिंग, आर्ट वर्क जैसे विभागों में भी उनके हुनर का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
हरिता की बनाई योजना में थोड़ा-सा सुधार अपनी ओर से कर शैलेश ने वह अपनी कंपनी के मैनेजमेंट के सामने प्रस्तुत की। इस योजना को लागू करने से कंपनी का खर्च कम होगा और साथ ही आयकर में भी रियायत मिलने की संभावना होगी, इसलिए मैनेजमेंट ने उसके प्रति अनुकूल प्रतिक्रिया दिखाई। इस संबंध में अध्ययन करने के लिए निदेशकों की एक समिति गठित की गई। शैलेश उस समिति का सचिव बनाया गया। हरिता उसमें विशेष आमंत्रिात थी। दो महीने के अंदर ही योजना को अंतिम रूप दिया गया।
''वंडर किड्स पफाउंडेशन'' नाम से एक ट्रस्ट का पंजीकरण किया गया। ट्रस्ट प्रारंभ में अपने क्रियाकलाप बंगलूर, हैदराबाद और मुंबई में शुरू करेगा। उसके बाद सुविधा के अनुसार अन्य शहरों में इसका विस्तार किया जाएगा।
१४ नवंबर। बाल दिवस!
'वंडर किड्स पफाउंडेशन' का उद्द्घाटन समारोह!
स्थानीय अनाथाश्रम के बच्चों, कंपनी के कर्मचारीगण और उनके पारिवारिक सदस्यों के साथ 'रवीन्द्र सौध' खचाखच भर गया था। सभी गणमान्य अतिथि आ चुके थे। अब केवल माननीय समाज कल्याण मंत्राी महोदय का आगमन ही बाकी था। कंपनी के प्रबंध निदेशक, शैलेश और अन्य अधिकारी मंत्राी महोदय की अगवानी और स्वागत के लिए तैयार खड़े थे। भले ही कुछ विलंब क्यों न हुआ हो, पर आखिर मंत्राी जी पधार चुके थे। सभा का शुभारंभ हुआ।
प्रार्थना की गई। दीप प्रज्जवलन के उपरांत कंपनी के प्रबंध निदेशक ने अपना भाषण शुरू किया। सभी अतिथियों का स्वागत कर, पफाउंडेशन की पृष्ठभूमि और उसके कार्यकलापों के बारे में उन्होंने इस प्रकार विवरण दियाः
''हमारी कंपनी का लक्ष्य लाभार्जन जरूर है, पर हमें अपने सामाजिक दायित्व का भी एहसास है। हमने अपने नये उत्पाद को प्रस्तुत करते समय विज्ञापन के लिए एक नूतन प्रक्रिया का चयन कर लिया है। उसके बाद इस विषय से संबंधित आत्ममंथन ही इस विशाल और उदात्त योजना के लिए नींव रहा है। इस कार्य की बुनियाद डाली हमारे वाइस प्रेसिडेंट शैलेश जी ने और इसकी रूपरेखा बनाई उनकी धर्मपत्नी श्रीमती हरिता देवी जी ने। अपने पति को विचार के अनुरूप आचरण करने योग्य योजना बनाकर हरिता जी ने यह साबित कर दिया कि वे सचमुच अर्धांगिनी हैं।''
दर्शकों की तालियों से सारा भवन प्रतिध्वनित हुआ।
''ऊँचे पदों पर कार्यरत एग्जीक्यूटिव भी जो नहीं कर पाते, ऐसा कार्य एक गृहिणी ने कर दिखाया है। बच्चों की भलाई के प्रति माँ का ही अधिक ध्यान रहता है, इसका यह एक सुंदर उदाहरण है। हाँ, मगर यहाँ पर बच्चों के माता-पिता नहीं हैं। यह आधार, यह संबल उन्हें 'वंडर किड्स पफाउंडेशन' प्रदान करेगा।''
पुनः तालियाँ बजीं।
''हमने संकल्प किया है कि अनाथ बच्चों को एक बेहतर जीवन प्रदान करने के लिए उनकी सेवा में हम भागीदार बनें। एक ओर अनाथ बच्चों को आश्रय प्रदान कर, उनकी शिक्षा और अन्य दायित्व स्वीकार करते हुए तथा दूसरी ओर उनकी श्रमशक्ति का उपयोग उन्हीं की भलाई के लिए करना और उनकी अपनी शक्ति से ही उनकी प्रगति का सोपान निर्मित करना इस ट्रस्ट का लक्ष्य है। हमारी कंपनी के विधि अधिकारियों और सरकार के अपफसरों के साथ भली-भांति विचार-विमर्श करने के पश्चात् ही इस ट्रस्ट के कार्यकलापों की सीमा निर्धारित की गई है। इस विषय में माननीय समाज-कल्याण मंत्राी महोदय को उनके सहयोग के लिए मैं धन्यवाद देता हूँ।''
तालियाँ बज रही थीं।
''इस ट्रस्ट की सेवाएँ अन्य कंपनियों के लिए भी उपलब्ध हो सकती हैं। हमारी संस्था भी जब ट्रस्ट की सेवाएँ लेगी, तब उन्हें उचित पारिश्रमिक अदा करेगी। इस स्वैच्छिक संस्था को जो चंदा दिया जाता है उस पर आयकर में रियायत मिलती है। इस प्रकार प्रचार और विज्ञापन के लिए होने वाले खर्च के विषय में एक सामाजिक उद्देश्य रखा गया है। ट्रस्ट के विद्यालय भवन और छात्राावास बनवाने का कार्य अगले महीने में प्रारंभ होगा और छह महीने के अंदर पूरा किया जाएगा। बच्चों का चयन करने के बाद आगामी शिक्षावर्ष के प्रारंभ में ट्रस्ट अपना कार्य शुरू करेगा।
इस संस्था के प्रबंधन के लिए हम श्रीमती हरिता देवी जी को कार्यपालक अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करते हैं।''
तालियों की गड़गड़ाहट चरम पर थी। दो मिनट के लिए पूरे हाल में कोलाहल छा गया था। सबकी आँखें हरिता पर टिक गई थीं।
एम.डी. साहब ने अपनी बात जारी रखी।
''श्रीमती हरिता देवी जी अपनी मानस-पुत्राी इस संस्था की सुरक्षा स्वयं ही भली-भांति कर पाएँगी, इस विचार से हमारे निदेशक मंडल ने यह निर्णय ले लिया है।''
तालियाँ थम नहीं रही थीं।
हरिता दर्शकों के बीच अग्रिम पंक्ति में बैठी हुई थी। उसके आश्चर्य और आनंद की सीमा नहीं थी। उसकी आँखें अश्रुओं से भर गई थीं। इस स्थिति पर उसे संदेह भी हो रहा था कि क्या यह सच है? इतना बड़ा दायित्व न देने के लिए वह अपने पति से अनुरोध करने लगी।
''यह आवश्यक नहीं कि श्रीमती हरिता देवी जी अपने द्घरेलू कामकाज छोड़ दें। हमारे लिए इतना ही पर्याप्त होगा यदि वे पर्यवेक्षण करते हुए अपना परामर्श और सहयोग प्रदान करती रहें। ट्रस्ट अपने कार्यकलाप ठीक से कर सके, इसके लिए आवश्यक कर्मचारियों की नियुक्ति कंपनी करेगी। इसलिए मैं श्रीमती हरिता देवी जी से प्रार्थना करता हूँ कि वे कृपया मंच पर आकर अपनी स्वीकृति व्यक्त करें।''
धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए हरिता मंच पर आई। मंत्राी महोदय के करकमलों से उसको पुष्पगुच्छ दिया गया।
हरिता ने पहले अतिथिगण और समूची सभा का अभिवादन किया और पिफर अपना वक्तव्य शुरू किया।
''मैं विश्वास नहीं कर पा रही हूँ कि यूँ ही हम पति-पत्नी के बीच जो बातचीत शुरू हुई थी, वह आगे चलकर इतना विराट रूप धारण करेगी। इसके लिए मैं कंपनी के प्रबंधक-वर्ग का अभिनंदन करती हूँ। आज जबकि समाज से कुछ न कुछ ऐंठने के सिवाय समाज को कुछ प्रतिदान देने की प्रवृत्ति कहीं नजर नहीं आती, इस कंपनी ने यह सि( कर दिया है कि यह लीक से हटकर कुछ अलग है। और इस प्रकार इस कंपनी ने अपनी ईमानदारी का इजहार कर दिया है। इतनी बड़ी जिम्मेदारी मुझे सौंपने के लिए मैं कंपनी की बहुत-बहुत आभारी हूँ। मैं उन्हें आश्वस्त करती हूँ कि उन्होंने मुझ पर जो विश्वास जताया है, भरोसा दिखाया है, उसे मैं कभी व्यर्थ नहीं होने दूँगी। इस सभा के जरिए इस बात का मैं विश्वास दिलाना चाहती हूँ। ट्रस्ट के कार्यकलापों की सपफलता के लिए मैं भरसक प्रयास करूँगी। मुझे यह सम्मान देने के लिए मैनेजमेंट के प्रति एक बार पिफर मैं अपना आभार प्रकट करती हूँ।''
अबकी बार तालियों का क्रम शैलेश ने शुरू कर दिया। उसे बड़ी खुशी हो रही थी।
उसको अपनी पत्नी पर अभिमान हो रहा था। उन दोनों की आँखों में एक अजीब-सी आभा थी। कुछ हासिल करने का संतोष दोनों के चेहरों पर झलक रहा था।
कुछ ही महीनों के बाद कंपनी ने एक और उत्पाद को बाजार में उतारा। अबकी बार हैदराबाद में एअरपोर्ट से लेकर रवीन्द्र भारती तक जाने के मार्ग में हर पचास गज की दूरी पर एक बैनर था। उसे पकड़कर आराम कुर्सियों पर नन्हे-नन्हे प्यारे-प्यारे बच्चे बैठे हुए थे। वे कंपनी के नाम से युक्त रंग-बिरंगे टी-शर्ट पहने हुए थे। उसके ऊपर छाया देती हुई इन्द्रधनुष की तरह बड़ी-बड़ी रंगीन छतरियाँ थीं। हर छतरी पर नये उत्पाद के बारे में ब्योरा दिया गया था। उन नन्हे-मुन्नों के चेहरों पर थकान नहीं थी और कुछ कर लेने का भाव प्रस्पफुटित हो रहा था। उनकी आँखों में एक नई चमक थी।
शैलेश टैंकबंड पर अपनी कार में जा रहा था। रात हो रही थी। उसे हुसैन सागर के विशाल जलाशय पर से आती हुई मादक शीतल पवन के साथ मनमोहक सरगम सुनाई देने लगी थी। साथ ही, कहीं दूर आसमान में नन्हे-नन्हे, प्यारे-प्यारे सितारे झिलमिला रहे थे।
अनुवादक : डॉ. के.वी. नरसिंह राव तेलुगू और हिन्दी भाषा के बीच अनुवाद के जरिए सेतू का काम। हिन्दी तेलुगू में कुछ कहानियाँ-कविताएँ प्रकाशित। भारतीय रिजर्व बैंक के उप महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त।
बी-२०४, नेमिनाथ टॉवर, एवरशाइन सिटी, वसई ;पूर्वद्ध-४०१२०८, ठाणे, महाराष्ट्र
मो. ०९३२३९०७२९८
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