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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
शेष रह गयी यादें/कुँवर पाल सिंह
ऐसी करनी कर चले... : दया दीक्षित
  आज नवम्बर की दस तारीख है, और मैं अभी भी सात और आठ नवम्बर २००९ की तिथियों को लेकर मस्त-व्यस्त थी। इन तिथियों में लखनऊ का कथाक्रम का वार्षिकोत्सव पिछले सालों की भव्यता के साथ इस बार भी सम्पन्न हुआ। राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, निर्मला जैन जैसे दिग्गज साहित्यकारों को सुनना गुनना अपने आप में उपलब्धिपूर्ण था। गत दिवस की तरह ही आज मैं पूर्ण उल्लास के साथ समारोह की चर्चा कॉलेज में अपने विभागीय सदस्यों के साथ कर रही थी। इसी मनः स्थिति में रहीम का दोहा गुनगुनाती हुई शोधकक्ष में प्रविष्ट हुई। वहाँ पहले से ही बैठे विभागीय सदस्य ने मुझसे कहा-'आपको तो मालूम हो गया होगा?'

'क्या?' मैंने सहज भाव से प्रश्न किया। ''यही कि प्रो.के.पी. सिंह नहीं रहे।'' उनकी बात को न समझते हुए मैंने पुनः प्रश्न किया कौन? जवाब में उन्होंने कहा-'अलीगढ़ में प्रोपफेसर कुँवरपाल सिंह आपके वर्तमान साहित्य में समय-संवाद...! उनकी बात मेरे लिए अप्रत्याशित थी। मैं स्तब्ध अवाक! जड़ सी हो गई! विश्वास नहीं हो पाया! बड़ी मुश्किल से पूछ पाई-'कब'? और वे कह रहे थे-''अमर उजाला में समाचार था। रविवार आठ नवम्बर २००९ को वे नहीं रहे।'' मैं अन्यमनस्क सी सदमे जैसी स्थिति में रिसर्चरूम में अपनी सीट पर बैठ गई। ऐसा लगा जैसे अचानक दीवार से टकरा गई हूँ चलते-चलते! कुँवरपाल जी नहीं रहे... कुँवरपाल जी... बार-बार मस्तिष्क में यही शब्द गूँज रहे थे। कुँवरपाल सिंह... ऐसी शख्सियतों में से एक जिनके लिए यह मायने नहीं रखता कि सामने वाला जान-पहचान का है या एकदम अंजान-अपरिचित। किसी का सहयोग सहायता या परोपकार करना है, तो बस करना है! अब उन लोगों में से एक जो अपने '८ामीर' ;अन्तरात्माद्ध की आवा८ा सुनते हैं! उसी की मानते हैं। उसी को सुरक्षित बचाए रखते हैं ८िांदगी की आखिरी साँसों तक!

सबसे पहला रिश्ता मुझ जैसी अपरिचित के साथ बना था पहली बार सन्‌ २००० में। यह बात अलग है कि आज तक कभी उन्हें देखा नहीं, उनसे औपचारिक बातें तक न कर सकी! नमिता जी को पफोन करते हुए अगर कभी उन्होंने मोबाइल उठाया ;यह भी पाँच वर्षों में मात्रा दो या तीन बारद्ध तो नमस्कार भर हुआ, और मैं संकोचपूर्वक यही कहती-'जी, नमिता जी से बात करनी है! और वे मोबाइल नमिता जी को दे देते...।
बात कर रही थी सन्‌ २००० की। तब यू.जी.सी से मुझे प्रोजेक्ट मिला था 'पंत जी की प्रगतिवादी चेतना...' पर। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत किए गए मेरे प्रयासों में से एक था, एक प्रश्नावली द्वारा अधिकारी-विद्वानों-विदुषियों से समाधान प्राप्त करने का...। जगह-जगह प्रश्नावली प्रेषित की, किंतु उत्तर कहीं से भी नहीं आया। उन्हीं दिनों बी.एच.यू. में रिैशर कोर्स करने गई थी। वहाँ वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. दूधनाथ सिंह से इस संबंध में बात हुई...। वहीं के प्रोपफेसर अवधेश प्रधान ने मुझे बहुत सहयोग दिया। साथ ही प्रो. कुँवरपाल सिंह का भी एड्रेस नोट कराया यह कहते हुए कि 'इन्हें भी आप प्रश्नावली प्रेषित कर सकती हैं।'

प्रश्नावली प्रेषित करने की बात पर मुझे उन विद्वानों की सूची याद हो आई जिन्हें प्रेषित की थी...। उसी उदासीन मनःस्थिति में मैंने एक प्रश्नावली अलीगढ़ के पते पर प्रो. कुँवरपाल सिंह को प्रेषित कर दी...। उसके बाद दिन बीतने थे, बीत गए। आशा के विपरीत मुझे शीद्घ्र ही एक भारी लिपफापफा प्राप्त हुआ...। सुखद आश्चर्य से मैंने देखा करीब पाँच पृष्ठों में मेरे प्रश्नों का समाधान प्रोपफेसर कुँवरपाल जी ने प्रेषित किया था। ...न कोई जान पहचान न सोर्स सिपफारिश! आज के समय में जबकि प्रगाढ़ रिश्ते भी समयाभाव की भेंट चढ़ रहे हैं, जबकि इस प्रकार के इंसानी दायित्वों का निर्वाह मूर्खतापूर्ण और द्घाटे का सौदा माना जाता है, ऐसे आत्मकेंद्रित और स्वार्थी समय में प्रोपफेसर साहब का समयसाध्य और विद्वत्तापूर्ण पाँच पृष्ठीय समाधान मेरे लिए सौगात से कम नहीं था। यह तो बहुत बाद में जाना कि प्रोपफेसर साहब ऐसे ही इंसानी तकाजों को पूरा करते रहते हैं जिन्हें चतुर विद्वत्समाज सिरपिफरी बेवकूपफी समझ कर इन कामों से पल्ला झाड़ते हुए मुँह मोड़े रहता है। यह वह विद्वत्समाज है जिसके खाने की और दिखाने की दंतपंक्तियों में जमीन आसामन का अंतर है।

ऐसा नहीं था कि लोगों ने प्रो. कुँवरपाल जी को इस तरह की 'नेकी कर दरिया में डाल'... वाली प्रवृत्ति के लिए रोका टोका न हो, लेकिन ऐसे लोगों के लिए हमेशा ही उनका एक वाक्य होता था 'मैं तो द्घाटे का सौदा करता हूँ।' सच ही तो है आज के उपभोगी समय में पूरे समर्पण के साथ निःस्वार्थ भाव से साहित्य सेवा करना द्घाटे का सौदा ही तो है! आखिर क्या मिलता था प्रोपफेसर साहब को उन अंजान शिक्षार्थियों, शोधार्थियों से जो न जाने कहाँ-कहाँ से उनके पास प्रकट हो जाते थे। कोई महाराष्ट्र से, कोई उड़ीसा, राजस्थान से... शोध किसी के सुपरवी८ान में कर रहा है, गाइडेंस प्रोपफेसर साहब से ले रहा है। और प्रोपफेसर साहब तो कहते ही हैं कि 'मैं तो द्घाटे का सौदा करता हूँ...।' गाइड तो करते ही थे, कई बार रहने खाने का प्रबंध भी अपने ही यहाँ कर देते थे...।

यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि एक समय मृतप्राय हो चुकी 'वर्तमान साहित्य' मासिक पत्रिाका को कुँवरपाल जी और उनकी पत्नी डॉ. नमिता सिंह ने कितने जतन से तन, मन, धन लगाकर प्राण संजीवनी प्रदान की थी। तब से लेकर आज तक 'वर्तमान साहित्य' अग्रपंक्ति की साहित्यिक पत्रिाकाओं में प्रतिष्ठित है। बिना किसी गुटबाजी के, बिना किसी पक्ष-विपक्ष के सामयिक सामग्री से भरपूर! और कुँवरपाल जी तो लिखते ही समय-संवाद थे। सामयिक और आसन्न संकटों पर हमेशा ही उनकी न८ार रही। एक बेचैनी के साथ वे इन संकटों की, इनमें पफंसे साधारण जन की, और इनसे निकलने के तौर-तरीकों की बात करते देखे जा सकते हैं। समस्या चाहे नक्सलाहट मूवमेन्ट या आतंकी गतिविधियों की हो, विस्थापन या किसानों की आत्महत्या की हो, भ्रष्ट राजनीति की हो, भाषा या सांप्रदायिकता की हो, स्त्राी या दलितों की हो, शीर्ष साहित्यकारों की उपेक्षा की हो या शोध-अनुसंधान के गिरते स्तर की हो... जैसे उन्हें यही सब दिखता था। इन चिंताओं से उत्पन्न एक असंतोष को उन्होंने हमेशा जिया... उनकी बेचैन कलम हरदम इनहीं विसंगतियों से जूझती रही

सर्वाधिक कष्ट उन्हें इस बात को लेकर रहा कि विदेशी पूँजीवादी ताकतों ने हरचंद कोशिश की है देश और उसकी संप्रभुता समृ(ि को तोड़ने, खोखला करने की। कोढ़ में खाज की तरह दुखद यह कि देश की उत्तरदायी शक्तियाँ ही विदेशियों को अपने यहाँ यह खेल खेलने के लिए आमंत्रिात करती हैं। इन सब बातों को लेकर प्रोपफेसर साहब अपने अंतिम समय तक बहुत उद्विग्न रहे।... उद्विग्नता बहुत स्वाभाविक थी। वे उस किसान वर्ग का सर्वनाश कैसे देख सकते थे, जिसमें वे स्वयं आते थे। कुँवरपाल गाँव के साधारण किसान परिवार के पुत्रा थे। गाँव भी ऐसा विकट कि वहाँ से शिक्षा के लिए मीलों का सपफर तय करके विद्यालय आना होता था। किसी तरह अपनी माध्यमिक स्तर तक की पढ़ाई उन्होंने की। पढ़ने में कुशाग्र युवा कुँवरपाल की उच्चतर शिक्षा अधिकांशतः छात्रावृत्ति का आश्रय लेकर हुई। बीच में एकाधबार छात्रावृत्ति के रुक जाने पर मित्राों के सहयोग से उन्होंने पढ़ाई को जारी रखा। विनम्र किंतु अन्याय, अनीति को सहन न कर पाने तथा उसके प्रखर प्रतिरोध करने की वजहों से वे सक्रिय छात्रा राजनीति में ही नहीं बल्कि तत्कालीन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रबल वेग से चलने वाले किसान आंदोलन में भी अग्रणी और जिम्मेदार पद पर रहे।

तंगी और अभावों से जूझते पफाकामस्ती में मस्त कुँवरपाल सिंह अभावों को यह कहकर पटखनी देते रहे कि ''मैं तो किसान का बेटा हूँ।'' ग्रामीण और उसमें भी साधारण रहगुजर वाले किसान काश्तकारों का अभावों से चोली-दामन का साथ होता है। यही साथ उन्हें 'थोड़े में गु८ाारा' करने की अपूर्व सामर्थ्य से जोड़ देता है। अपने समय-समाज और देश की जरूरतों के लिए लड़ने वाले इस परिपक्व विचारधारा के नौजवान के प्रति यदि नमिता जैसी प्रगतिशील विचारधारा तथा कई प्रभावी संगठनों की सक्रिय सदस्या का झुकाव, लगाव मित्राता हो गई, तो यह स्वाभाविक ही था। एक ही विचारधारा के ये संपोषक बहुत तीव्रता के साथ प्रगाढ़ मैत्राी में आब( हो गए। आखिरकार यह पहाड़ी ब्राह्मण परिवार की बेटी, सुमित्राानंदन पंत की नातिन नमिता, कुँवरपाल सिंह के साथ विवाह बंधन में बंधकर नमिता सिंह हो गई। विवाह बाकायदा दोनों परिवारों की रजामंदी के साथ पारंपरिक ढंग से संपन्न हुआ। प्रोपफेसर साहब जिस डेमोक्रेसी की बात बराबर संगठन और अपने सृजन में करते रहे, वह डेमोक्रेसी उनके द्घर में पूरी तरह काबिज रही। बहसें भाषा को लेकर होती थीं, साम्प्रदायिकता पर, राजनीति पर होती थीं, न कि इस बात पर कि किसने कितना पैसा कहाँ और क्यों खर्च कर दिया...। अपने बच्चों से बेहद प्यार करने वाले प्रोपफेसर साहब अगर कभी बच्चों से म८ााक करते या उनका म८ााक बनाते थे।

प्रो. कुँवरपाल सिंह के कुछ काम बेहद यादगार रहे। जिनमें अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी में हिन्दी भाषा को प्रभावी ढंग से लागू करवाना, आजीवन सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए सतत प्रयास करना, कई समाजसेवी संगठनों में सक्रिय योगदान प्रमुख हैं। ए.एम.यू. में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष तथा प्रोपफेसर रह चुके कुँवरपाल जी की देश-विदेश में कई व्याख्यानमालाएँ हुईं हैं। कई आयोगों के प्रमुख पदों पर रहते हुए भी सदैव निष्पक्ष एवं पारदर्शी रहे। यू.जी.सी. के कई सेमिनार उन्होंने तब आयोजित किए जब उच्च शिक्षा में प्रायः एक उदासीन भाव था संगोष्ठी, सेमिनारों के प्रति। पढ़ने-लिखने को समर्पित कुँवरपाल सिंह की दर्जनों पुस्तकें एवं महत्वपूर्ण शोधपत्रा साहित्य जगत की उपलब्ध्यिों में से एक हैं।
प्रोपफेसर साहब की सदाशयी और परोपकारी वृत्ति, उनका गंभीर चिंतक रूप तथा मनुष्यता के समर्पित जीवन लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है, अनुकरणीय है।

उन्होंने सही अर्थों में समाज आँण उतारा है, यहाँ तक कि मरणोपरांत उनके देहदान के संकल्प ने चिकित्सा जगत में नई संभावनाओं, खोजों के द्वार ही नहीं खोले हैं, युग दधीचि ऐसे ही लोग तो कहलाते हैं। धर्म निरपेक्षता के लिए आजन्म कृतसंकल्प प्रो. कुँवरपाल ने सदा सर्वदा मानव धर्म का निर्वाह किया, धर्म के नाम पर वे 'मानव धर्म' के मुरीद रहे, तभी तो उनकी अंतिम इच्छानुसार उनके कीर्ति शेष हो जाने पर किसी भी कर्मकांड को संपादित नहीं किया गया। उनके व्यक्ति और कृतिकार की इन्हीं विशेषताओं ने एक बहुत बड़ा 'जन परिवार' बना लिया है, जिसमें पर्याप्त विस्तार हुआ है। आज उनके यशःकाय हो जाने पर यह जन परिवार अश्रुनम आँखों से उन्हें भावांजलि अर्पित कर रहा है। कबीर के दोहे की एक पंक्ति उन पर बिल्कुल सटीक बैठती है-'कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसा हम रोए/ऐसी करनी कर चले, हम हँसे जग रोए।

 
 
 
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