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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
मीमांसा
तुलसी के तमाम पहलुओं पर प्रकाश : प्रतिभा कुशवाहा
  तुलसी के समग्र काव्य को डॉ शैल कुमारी ने जिस मनोयोग एवं कुशलता से आलोचना पुस्तक में प्रस्तुुत किया है यह सराहनीय है। भारतीय जनमानस के मन-मस्तिष्क में रचे बसे व्यापक साहित्य को समीक्षित करना सरल काम नहीं था। तभी ऐसी किसी आशंका के कारण वह स्वयं लिखती हैं-'तुलसी एक ऐसे कवि हैं जिनके साहित्य को पढ़कर उस पर कोई टिप्पणी कर देना जितना आसान है उतना ही कठिन भी।


पुस्तक को पाँच अध्यायों में बाँटकर लेखिका ने तुलसी साहित्य की उन तमाम विशेषताओं को रेखांकित करने का प्रयास किया है जिन्हें जनसाधारण अपने-अपने ढंग से समझता और पोषित करता आया है। इन पाँच अध्यायों में तुलसी की रामकथा के अंतः सूत्रा, मानवीय जीवन की पक्षधरता, युग जीवन की सापेक्षता, लोक जीवन का सामरस्य तथा प्रकृति से सामंजस्य है, जिसके अंतर्गत उन्होंने तुलसी के समग्र साहित्य को विश्लेषित किया हैं।

तुलसी को रामकथा लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? तुलसी से पहले राम तथा रामकथा का क्या रूप व स्वरूप प्रचलित था? राम कैसे 'पुरुषोत्तम राम' के रूप में प्रतिष्ठित हुए? रामकथा का क्या अध्यात्मिक व व्यवहारिक रूप हो सकता था? ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर शैल जी प्रथम अध्याय में ढूँढ़ती नजर आती हैं। वे तुलसी के 'राम' की व्याख्या 'सत्य, चेतन एवं आनंदमय' के रूप में करती हैं। 'तुलसी ने अपनी आसाधारण प्रतिभा के बूते रामकथा के जिस विशाल काव्यपफलक को उठाया उसमें संस्कृत, पाली, प्राकृत एवं अपभ्रंश की रामकथाओं से भिन्न 'राम' के ऐसे रूप को सामने रखा जिसमें समाहित देवत्व एवं मनुष्यत्व के द्वारा जीवन के अध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक सभी स्तरों का व्याख्यायित करने का प्रयास है।' तुलसी के काव्य को वह मात्रा वर्ण, अर्थ, रस, छंद का संयोजन नहीं मानती हैं।

इसी मंगल की भावना से प्रेरित तुलसी 'रामराज्य' की प्रतिस्थापना करते हैं जो वर्तमान के लोक कल्याणकारी राज्यों की अवधारणा की जननी है। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम होने के साथ-साथ एक न्यायप्रिय शासक के तौर पर स्थापित करने का जो प्रयास तुलसीदास ने किया उसे शैल कुमारी कुछ यँू समेटती हैं-'जीवन के विविध पक्षों में समन्वय की प्रवृति का ही प्रभाव है कि तुलसी अपनी प्रक्रिया में कबीर की तरह खंडन-मंडन करते या सूर की तरह केवल भक्ति की गहराइयों में डूबते नहीं दिखाई पड़ते वरन रामकथा में अपने समय के जीवन को खुली आँखों से देखते, समझते व्यक्ति, परिवार, समाज धर्म और दर्शन से जुड़े हुए अनेक अंतर्विरोधों के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए जीवन के मध्यम मार्ग का संधान करते दिखाई पड़ते हैं।' दूसरे अध्याय में शैल जी उनके विस्तार काव्य को पोषित करने वाले मानवीय गुणों को विस्तार से वर्णित करती हैं। तुलनात्मक रूप से मानस, कवितावली, गीतावली से उ(रण देकर विश्लेषित करती हैं कि 'ब्रह्म सत्य है' पर विश्वास करते हुए तुलसी ने राम के संवेदनशील मानवीय पक्ष को आगे रखा है। तुलसी ने जब मानस की रचना की तब मुगलों का शासन था जो हिन्दुओं को पददलित कर रहे थे। उनकी सांस्कृतिक व अध्यात्मिक आलोचना भी कर रहे थे। तो यह कह सकते हैं कि मानस की रचना में अपनी धर्म संस्कृति को स्थापित करने का भी भाव समाहित रहा हो। रामराज्य का दृष्टिकोण देना प्रतिक्रिया स्वरूप है। तीसरे अध्याय 'युगजीवन की सापेक्षता' में इस बात को डॉ शैल कुमारी उदाहरणों के साथ विस्तार से बताती हैं।

लोकजीवन में समरसता और गतिशीलता बनाये रखने में तुलसी ने 'लोकजीवन' का सुंदरतम उपयोग किया है जिसे लेखिका ने चौथे अध्याय 'लोकजीवन का सामंजस्य' में विस्तार से व्याख्यायित किया है। इस अध्याय में वे तुलसी साहित्य में व्यक्त लोक संस्कृति के रंग, लोक विश्वास, सूक्तियों का उपयोग, लोकभाषा का सन्निवेश समेत कई बातें बताती हैं। उद्दीपन के तौर पर प्रकृति का सहारा हर रचनाकार लेता है। तुलसी ने अपनी रचनाओं में पात्राों की संवेदना व भावों को व्यक्त करने के लिए प्रकृति को आलम्बन बनाया है। अंतिम अध्याय प्रकृति से सामंजस्य में लेखिका ने इसी को बड़े विस्तार से लिखा है। इस प्रकार शैल जी ने इस पुस्तक में तुलसी साहित्य से संबंधित किसी भी पक्ष को अनछुआ नहीं छोड़ा है। कुल मिलाकर यह पुस्तक तुलसी साहित्य का एक लद्घु संस्करण है।

 
 
 
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