'
 
 
 
दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
उपन्यास अंश
आँधी के आम और गरीब के राम:अरुण आदित्य
 

उपन्यास के बारे में : 'उत्तर-वनवास' अयोध्या के राजा राम की नहीं गाँव के अंतिम मकान में रहने वाले राम चंद्र की कथा है। राम चंद्र के बहाने दरअसल यह उस तंत्रा की गाथा है, जिसमें सि(ांत और मूल्य अनअपफोर्डेबल लॉयबिलिटी बनकर रह गए हैं। पिछले पचास वर्षों के राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में आए उतार चढ़ावों की यह कथा ऐसे अंधेरे कोनों में भी रोशनी डालती है जहाँ लोकतंत्रा को बंधक की कोशिशें की जाती रही हैं। जहाँ एक ईमानदार-संवेदनशील आदमी इतना बेबस और अकेला कर दिया जाता है कि उसे द्घुटन महसूस होने लगती है।

आह...आ..ह...आ...ह।'' झोपड़ी से एक दबी हुई सी कराह रह-रहकर निकल रही थी। झोपड़ी की बगल में नीम का पेड़ था। कराह सुनकर नीम की टहनियाँ झोपड़ी पर झुक आई थीं। पत्तियां हौले-हौले झोपड़ी को सहला रही थीं। पर झोपड़ी की कराह थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। रुकती भी कैसे? नीम तो उसके बहिरंग को सहला रहा था। जबकि झोपड़ी का दुख तो उसके हृदय में था, जहाँ शिकारी कुत्तों द्वारा नोची-चोथी गई किसी हिरणी-सी द्घायल पफूलकली एक कोने में पड़ी सिसक रही थी। नीम झोपड़ी के सर को सहला रहा था तो अंदर उसके हृदय को एक अधेड़ महिला सहलाने की कोशिश कर रही थी।

''सबर करा पफुल्लो, सबर करा। इन कलमुहन के कीड़ा परिहैं। एक-एक अंग कोढ़ से गल के टपके। जिन रोआ बिटिया, चुपाइ जा रानी।'' पफूलकली को चुप कराते-कराते वह अधेड़ औरत खुद सुबकने लगी थी। यह पफूलकली की माई थी। पफूल की कली जैसी उसकी सुंदरता देखकर ही माई ने पफूलकली नाम रखा था। लेकिन बेटी की जिस सुंदरता को लेकर वह इतराती थी, वही आज अभिशाप बन गई थी।
रात तेज आँधी आई थी। कई पेड़ उखड़ गए थे। कई छप्पर उड़ गए थे। भरी तबाही मची थी। सरकार ने इसे राष्ट्रीय आपदा द्घोषित कर दिया था। सरकारी अमला क्षति का आकलन कर रहा था। दो महीने बाद चुनाव थे। सो राजनीतिक दल भी इस बात का आकलन कर रहे थे कि इस आँधी से किस दल को कितना नपफा या नुकसान हो सकता है। पफूलकली को हुई क्षति किसके लिए पफायदा थी और किसके लिए नुकसान, यह अभी तय होना था।

गरमियों में हर साल तेज आँधियां आतीं। आँधियां पफूलकली की माई के लिए नियामत लेकर आतीं। जिस साल न आतीं, पफूलकली की माई परेशान हो जाती। भगवान से मन्नतें मांगती कि ऐसी आँधी आए कि उसकी झोली भर जाए। इन आंधियों के चलते हर गरमी में वह दूसरों के बगीचे से एक-डेढ़ क्विंटल आम इकट्ठे कर लेती थी। इन आमों का खटाई-अचार बनाकर बेचने से अच्छी-खासी कमाई हो जाती थी।
आँधी आते ही पफूलकली की माई को लगा कि भगवान ने उसकी सुन ली। उसे क्या पता था कि कभी-कभी भगवान का सुनना कितना महंगा पड़ता है। आज माई उस द्घड़ी को कोस रही है जब आँधी के आम बीनने के लिए पंडितों के बगीचे में जाने का लालच उसके मन में आया था। खुद गई तो गई पर पफूलकली को ले जाने की क्या जरूरत थी? पर कोई पहली बार तो उसे लेकर नहीं गई थी। दोनों पहले भी साथ-साथ जाती रही हैं।

माँ-बेटी जल्दी-जल्दी आम बीन कर द्घर भाग जाना चाहती थीं। पंडितों के आ जाने से पहले। आँधी बगीचे के पेड़ों को बुरी तरह झकझोर रही थी। आम मुँह माँगी मुराद की तरह भद-भद गिर रहे थे। जमीन पर कच्चे-पक्के आमों की एक परत-सी बिछ गई थी। बहुत जल्दी ही दो झोले भर गए। ज्यादा लालच ठीक नहीं। माई ने सोचा और द्घर चलने के लिए बेटी को आवाज दी-''हू हू।''
हू हू उनका कोड वर्ड था। हालांकि उन्हें पता भी नहीं होगा कि उन्होंने जो संकेत बना रखा है, उसे ही अंग्रेजी में कोड वर्ड कहते हैं। मिशन की समाप्ति पर माई हू हू की आवाज निकालती थी। जवाब में बेटी दो बार हू हू-हू हू करती थी। और दोनों द्घर के लिए लौट पड़ती थीं। पर आज माई की हू हू के जवाब में बेटी ने हू हू नहीं कहा। हू हू के बदले वह चीख रही थी -माई हमका बचाइ ले रे। बचाइ ले मइया। मैया रे...

अंधेरे में कोई उसे द्घसीट कर ले जा रहा था। और वह माई को गुहार रही थी। पर माई उसे बचाने के बजाय हू हू-हू हू किए जा रही थी। दरअसल आँधी का शोर इतना तेज था कि न तो बेटी को माई की हू हू सुनाई दे रही थी और न ही माई को बेटी की गुहार।
हू हू करके थक हारकर माई द्घर आ गई।
दो द्घंटे बाद पफूलकली भी लौटकर द्घर आई थी। लेकिन अब वह पफूलकली नहीं, रौंदी हुई कली थी।
अअअ
पफूलकली की झोपड़ी सिसक रही थी। सिसकियां सारे गाँव का चक्कर काटती हुई दिनेश सिंह की हवेली तक पहुँच गई थीं। हवेली और सिसकियों का बड़ा विचित्रा संबंध है। इस गाँव में कोई भी सिसकी या तो हवेली से शुरू होकर सारे गाँव का चक्कर लगाती है या पिफर गाँव के किसी भी कोने से शुरू हो, सारे गाँव का चक्कर लगाती हुई हवेली में आकर खत्म होती है।
हवेली सक्रिय हो उठी।

गाँव की इज्जत का सवाल है। दिनेश सिंह ग्राम प्रधान हैं। गाँव के राजा। इतना बड़ा कांड हो जाए और वे चुप बैठे रहें? नहीं, हर्गिज नहीं। उनके रहते गाँव में ऐसा अत्याचार हर्गिज नहीं हो सकता। पंडितों का मन बहुत बढ़ गया है। इन्हें इनकी औकात दिखानी ही होगी।
''अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे। राम समुझ अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं। अब अगर हथकड़ी न लगवा दूँ बाप-बेटे को तो मेरा नाम भी कुंवर दिनेश सिंह नहीं।''
''पर ऊ पफुलकलिया बुजरी मुँह खोले तब ना। ऊ तो ऊपर-नीचे के दुइनउ मुँह दाबे बैठी है।'' ये त्रिालोकी लोहार थे। कुंवर दिनेश सिंह के दाहिने हाथ। आस-पास के इलाके में लोग उनकी लाठी का लोहा मानते हैं। लाठी और जबान दोनों चलाने के मामले में त्रिालोकी बिल्कुल बेधड़क हैं।
''मुँह तो वो जरूर खोलेगी और अइसन खोलेगी कि देखना...सब देखते रह जाएँगे।''
त्रिालोकी दिनेश सिंह के आत्मविश्वास के कायल हैं। उन्हें विश्वास हो गया कि अगर दिनेश सिंह कह रहे हैं तो पफूलकली मुँह जरूर खोलेगी।
''उसका मुँह खुलेगा, और खुलेगी पंडितों की पोल। दिन में जिसकी परछाईं भी पड़ जाए तो लग जाती है छूत, रात में चाटते हैं उसी का मूत।''
''तुम तो कवित्त जैसा तुक मिलाने लगे तिरलोकी।''
त्रिालोकी समझ नहीं पाए कि दिनेश सिंह ने यह बात व्यंग्य में कही है या तारीपफ में। वैसे भी वे दिनेश सिंह को कहाँ समझ पाते हैं। वे ही क्यों, गाँव में और भी कोई दिनेश सिंह को कहाँ समझ पाता है। अपने इस विलक्षण सोच पर त्रिालोकी मुस्करा उठे।
दिनेश सिंह भी क्या इस मुस्कराहट का रहस्य समझ पाए होंगे?
अअअ
''पफुलकलिया की माई!''
''का है सरकार''

''हमारे प्रधान होते हुए गाँव में इतना बड़ अनर्थ हो गया और तूने हमें बताया तक नहीं।'' दिनेश सिंह का स्वर ऐसा था कि पफूलकली की माँ यह समझ नहीं पाई कि वे उसे डाँट रहे हैं या दिलासा दे रहे हैं। डर के मारे उसकी जबान को लकवा मार गया। वह चुप थी सो आगे भी दिनेश सिंह को ही बोलना था-
''तुम पिफकर मत करो। राम समुझ और उसके कपूत को जेल में न सड़वा दूँ तो कहना। ''
''छोड़ो सरकार। राम समुझ महराज की पहुँच बहुत ऊपर तक है। उनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, हमार बिटिया जरूर बदनाम हो जाएगी।''
''पागल मत बन पफुलकलिया की माई! उसकी जितनी बदनामी होनी थी, हो गई। अगर इन लोगों को सजा नहीं मिली तो ये गाँव की किसी भी बहन-बेटी को नहीं छोड़ेंगे।''

आपने कौन सी गाँव की बहन बेटियों को छोड़ रखा है। पफूलकली की माँ यह कहना चाहती थी, लेकिन उसने कहा-''हमें अपने हाल पे परी रहइ दो सरकार। कोरट-कचेहरी थाना जाने की न तो हमारे पास हिम्मत अहै और न पैसा-कौड़ी।''
''अरे जड़बु(!ि जब मैं साथ हूँ तो तुझे हिम्मत और दौलत की कमी कहाँ से हो गई। ये लड़ाई मैं खुद लड़ूँगा। तुमलोगों ने मुझे गाँव का प्रधान चुना है। मेरा भी कुछ पफर्ज बनता है कि नहीं। मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए, बस पफूलकली की गवाही चाहिए।''
पफूलकली की माँ के पास इस प्रस्ताव को न मानने की कोई वजह नहीं थी।
''जैसी तोहार मर्जी सरकार। लेकिन एकइ डर है सरकार कि रउआ बड़कन के लड़ाई में हम और न पिस जाएँ।'' बेटी के साथ कुकर्म करने वाले को सजा मिले यह तो पफूलकली की माँ भी चाहती थी, लेकिन वह सुरक्षा का पूरा आश्वासन भी चाहती थी।

पफुलकलिया की झोपड़ी से लगा नीम का पेड़ ऊपर से नीचे तक हिल रहा है। जैसेे आवेश या गुस्से में काँप रहा हो। पेड़ के नीचे कापफी भीड़ है। हरिजन टोले के बड़े-बुजुर्ग जमा हैं। जेठ की इस तपती दोपहर को एक अजीब सा सन्नाटा रहस्यमय बना रहा है। हर चेहरा किसी अनजाने भय का विज्ञापन करता नजर आता है। कोई भी आवाज खुसुर-पफुसुर से ऊपर नहीं उठ पा रही है। अचानक टोले के मुखिया रामचरन ने अपनी आवाज को खुसुर-पुसुर से थोड़ा ऊपर उठाया- ''पफुलकलिया की माई, तुम्हें पता नहीं है कि तुम कितने खतरनाक जाल में पफंस गई हो। अगर तुमने इस जाल को नहीं काटा तो पूरे टोले पर आपफत आ जाएगी।''
मुखिया की बात खत्म होते ही नीम का पेड़ बहुत जोर से हिला। उसकी इच्छा हुई कि एक साथ अपनी सारी पत्तियां गिरा कर इन लोगों को तपती धूप में खुला छोड़ दे। पर पूरी ताकत से हिल जाने के बावजूद सिपर्फ कुछ पत्तियां ही टूटकर गिरीं। मुखिया और अन्य लोगों के सिर पर अब भी पर्याप्त छाँह थी। नीम के न चाहने के बावजूद। और नीम गुस्से में खुद को हिलाने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा था।
''हमें पता है कि कुंवर साहब आपन पुराना हिसाब चुकावइ खातिर राम समुझ और उनके बेटवा को सजा दिलवाना चाह रहे हैं। पर इसी बहाने अगर हमरी पफुल्लो की आबरू लेइ वालेन के सजा मिल जाए तो का हर्ज है? हमका पता है कि ई लड़ाई अगर जोर पकडे़ तो भयानक तबाही मचे और दुइनउ ओर से लोग मरिहैं। पर अब हमरे हाथ में कुछ नाहीं अहै। तीर छूट चुका है और अब ई तबाही तो होइके रहे। हमरी पफुल्लो की इज्जत गई है, बदले में चार-छह लाश और गिर जइहैं तो धरती का बोझा कुछ कम होइ जाए।''
''तुम बिरादरी के हुकुम की उदूली कर रही हो। तुम्हारा हुक्का-पानी बंद कर दिया जाएगा। ''
''हुक्का-पानी की परवाह ऊ करे जिसके पास पानी बचा हो। हमार तो पानी पहले ही उतर चुका है। अब हुक्का-पानी बंद करके और का बिगाड़ लोगे।'' नीम का पेड़ अब हहराना बंद कर हौले-हौले हिलने लगा था। हलके-हलके झोंके पफुलकलिया की माई की पीठ थपथपा रहे थे।
पर उसी समय गाँव के सीवान के बूढ़े बरगद पर द्घुग्द्घू बोलने लगे थे। गाँववालों का मानना था कि वहाँ जब-जब दोपहर में द्घुग्द्घू बोले हैं, गाँव में भारी विनाश हुआ है। तबाही की आशंका से भयभीत भीड़ 'इस सारे पफसाद की जड़' पफुलकलिया और उसकी माँ को कोसते हुए छंट गई।

अब क्या होगा? एक ही सवाल था जो आशंका बनकर पूरे गाँव पर मंडरा रहा था। पफुलकलिया की माँ ने राम समुझ के बेटे विभूति के खिलापफ पंचायत बुलाने का ऐलान कर दिया था। कोटवार सारे गांव में द्घूम-द्घूमकर खास-खास लोगों को पंचायत की सूचना दे रहा था।
बाभन टोला गुस्से में उबल उठा।
''माना कि राम समुझ के बेटे ने नादानी की है, लेकिन इन छोटे लोगों की इतनी हिम्मत कि वे हमारे खिलापफ पंचायत बुलाएँ''-रमई तिवारी का चेहरा ब्रह्म-रोष से लाल हो गया था, ''रमकलिया की माई अगर खुद राम समुझ के पास आ जाती तो क्या वे उसे मुआवजा नहीं दे देते? पर इसको तो हवेली की शह मिल गई है न। वर्ना यह कोई पहला मामला तो है नहीं। खुद इसी पफुलकलिया की माँ को २० रुपए और तीन किलो गेहूँ देकर तुमने इसका मुँह बंद कराया था कि नहीं शिवराम।''
शिवराम दुबे झेंपकर बगलें झाँकने लगे। कुछ और लोग भी मन ही मन द्घबरा उठे-रमई महराज अपनी रौ में हैं, पता नहीं किस-किस की पोल खोल दें। इससे पहले कि वे किसी और की पोल खोलते राम समुझ ने गाड़ी को पटरी पर लाने की कोशिश की-अब आगे की कोई राह बताइए, रमई काका। इस आपत-काल में आप ही कोई उपाय बता सकते हैं।
''एक ही उपाय है। लंका दहन। पूरे रैदासी टोला को पफूंक दो। वरना आज ये पंचायत बुला रहे हैं, कल ससुरे सिर पर चढ़कर हगेंगे।'' रमई महराज के बोलने से पहले ही उनका भतीजा रमाकांत बोल पड़ा। रमाकांत दादागिरी के क्षेत्रा में नया-नया कैरियर बना रहा था। अपनी इमेज चमकाने का यह अच्छा अवसर लगा। लेकिन रमई महराज ने उसे डाँट दिया-''कभी तो अकल की बात किया करो। हर जगह आग लगाने पर तुले रहते हो। आग तो लगी हुई है, उसे बुझाने की कोई जुगत सोचो।''

रमाकांत के पास आग बुझाने की कोई जुगत नहीं थी सो वे भुनभुनाते हुए वाक-आउट कर गए। कई अन्य लोगों की भी राय थी कि रैदासी टोले वालों को सबक सिखाना जरूरी है। पर रमई महराज मंझे हुए खिलाड़ी हैं। खेल को अपने नियंत्राण में रखना जानते हैं, ''सबक सिखाने से कौन मना कर रहा है। पर सबक सिखाने से पहले राम समुझ और पूरे ब्राह्मण समाज की इज्जत बचाना जरूरी है।''
रमई महराज ने बड़ी चालाकी से राम समुझ की इज्जत को पूरे ब्राह्मण समाज की इज्जत बना दिया था। कमान अपने हाथ में लेने के बाद रमई महराज ने अगली चाल का खुलासा किया-''सबसे पहले तो यह बात गाँठ बाँध लो कि हमें रैदासी टोले से नहीं, ठाकुरों से लड़ना है। दरअसल यह कोई नई लड़ाई नहीं है। परधानी के चुनाव के रूप में जो लड़ाई शुरू हुई थी, यह उसी का विस्तार है। उस समय तो दिनेश सिंह जैसे-तैसे जीत गए थे, लेकिन गाँव में ब्राह्मण-शक्ति के उदय को देखकर वे द्घबरा गए हैं। इसीलिए पफुलकलिया के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साध रहे हैं। तुम लोग रैदासी टोला में आग लगाने को उतावले हो, उससे क्या होगा? अरे हिम्मत है तो दिनेश सिंह की हवेली पफूंक कर दिखाओ।''

हवेली में आग लगाने की हिम्मत किसी में नहीं थी, सो सभा में सन्नाटा छा गया।
रमई महराज ने देखा कि अब पूरी सभा की उम्मीद भरी निगाहें उन्हीं पर केंद्रित हो गई हैं। पिछले कुछ समय से ब्राह्मण समाज पर उनकी पकड़ कमजोर पड़ने लगी थी। राम समुझ समाज के नए नेता बन कर उभर रहे थे। ग्राम-प्रधान के चुनाव में राम समुझ ने वर्षों से प्रधानी कर रहे दिनेश सिंह की सत्ता को हिला कर रख दिया था। खून-पसीना एक कर देने के बावजूद दिनेश सिंह कुल १२ वोटों से जीत पाए थे। बाभन टोला तो इसे जीत मानता ही नहीं था। राम समुझ ने रिजल्ट सुनते ही कहा था-''यह बेइमानी की जीत है। जनमत तो अभी भी मेरे साथ है।'' राम समुझ की बात कुछ-कुछ सही भी थी। चुनाव के दूसरे दिन दिनेश सिंह के दाहिने हाथ त्रिालोकी लोहार शराब के ठेके पर गरज रहे थे-''पच्चीस वोट तो मैंने अकेले डाले हैं।''

राम समुझ की हार पर पूरा बाभन टोला दुखी था। इसलिए नहीं कि वे बहुत लोकप्रिय थे, बल्कि इसलिए कि समूचे ब्राह्मण समाज ने उनकी जीत-हार के साथ अपने को बांध दिया था। चुनाव परिणाम वाले दिन बाभन टोले में कई द्घरों में चूल्हा तक नहीं जला, लेकिन एक आदमी बहुत खुश था। कयास लगाइए कौन होगा यह आदमी? रमई महराज! जी हाँ, यही रमई महराज जो आज बढ़-चढ़ कर ब्राह्मणों की मान-मर्यादा की बात कर रहे हैं। रमई महराज को डर था कि अगर राम समुझ प्रधान बन गए तो ब्राह्मण समाज की राजनीति पूरी तरह उनके कब्जे में चली जाएगी। राम समुझ के बेटे विभूति ने पफुलकलिया से बलात्कार करके रमई महराज को राम समुझ पर बढ़त लेने का मौका उपलब्ध करा दिया था। अब रमई इस मौके को यूँ ही कैसे जाने देंगे। उन्होंने अपने तरकश से सबसे बेधक तीर निकाला और चला दिया- ''हवेली में आग लगाने की तरकीब मेरे पास है। ऐसी आग लगाऊँगा कि बुझाए नहीं बुझेगी। पर एक शर्त है कि आप सब को एकजुट होकर मेरे कहे अनुसार चलना होगा। बाद में यह नहीं होना चाहिए कि कोई तीरद्घाट जाए तो कोई मीरद्घाट।''
ब्राह्मण समाज के पास रमई महराज के इस प्रस्ताव पर सहमत होने के अलावा कोई चारा कहाँ था?

गाँव में तनाव है। ठाकुर-ब्राह्मण संग्राम की तैयारियाँ जोरों पर हैं। चार दिन बाद पफुलकलिया की पंचायत है। दोनों पार्टियों ने पंचायत के मैदान को कुरुक्षेत्रा बना लेने का दृढ़ संकल्प कर लिया है। लाठी-डंडे, बल्लम, बरछी, तलवार, तमंचे चमकाए जा रहे हैं। हर द्घर में बस यही चर्चा है। लगभग पूरा गाँव दो खेमों में बंट गया है। दोनों खेमों के वीर पुरुषों की भुजायें पफड़क उठी हैं, लेकिन दोनों पक्षों के अंतःपुर में खासी बेचैनी है। ऐसी लडा़इयों के दुष्परिणाम अंततः अंतःपुर को ही भुगतने पड़ते हैं। पुरुष या तो मार खाते हैं-जान गंवाते हैं, या मार कर जेल चले जाते हैं। दोनों ही हालात में झेलना औरतों को ही पड़ता है। सबसे ज्यादा बेचैन है रैदासी टोला। उसे अपनी हालत साँडों की लड़ाई में पफंसी बागड़ जैसी नजर आ रही है। पर इस टोले में एक ऐसी महिला भी है जो भय से पूरी तरह मुक्त है। ठीक समझे, पफुलकलिया की माई। उसका भय अपने चरम पर पहुँच कर जैसे खत्म हो गया हो। बाभन टोले के लड़के तीन बार उसे हड़का चुके हैं। शिवाकांत ने तो एक बार सरे बाजार कनपटी पर कट्टा भी अड़ा दिया था- ''भलाई इसी में है कि पंचायत वापस ले लो। औकात में रहो, वरना जान से भी हाथ धो बैठोगी।''

''जान के परवाह किसे है लल्ला? मैं तो पहले ही मरी हुई हूँ, अब और का मारोगे? कल मारना चाहते हो तो आज ही मार डालो, पर मैं पंचायत वापस नहीं लूँगी। ...जब तुम पैदा हुए थे तो मैंने तोहार नाड़ा काटा था, अब तुम हमार गर्दन काट लो।''
खड़ी बोली में इतना बोल जाने के बाद अब इसकी गर्दन सलामत नहीं रहेगी। प्रत्यक्षदर्शियों को बुढ़िया का अंजाम बिल्कुल सापफ-सापफ दिखाई दिया। इलाके में शिवाजी के नाम से मशहूर शिवाकांत को गुस्ताखी जरा भी बर्दाश्त नहीं होती। इसी बाजार में वे दो खून कर चुके हैं। पहला खून अपने दोस्त राजन का किया था। दोनों एक पान की दुकान पर खड़े थे। सामने से एक लड़की निकली तो शिवाकांत ने कोई कमेंट किया। लड़की ने पलट कर देखा, बुरा सा मुँह बनाया और अपने रास्ते चल पड़ी। दोस्त ने चुटकी ली- ''इस तरह कमेंट करने से लड़कियाँ नहीं पटती हैं। परसनालटी पर पिफदा होती हैं। पर तुमको तो चेहरे पर द्घास-पफूस रखने का शौक है। सोचते हो कि दाढ़ी-मूँछ रखकर असली शिवाजी जैसे बहादुर हो जाओगे। शिवाजी मराठा थे और तुम तो साले बाभन हो- सदा की डरपोक कौम। मुझे देखो, क्लीन सेव रहता हूँ। आधा दर्जन लड़कियाँ मरती हैं मुझ पर। और दाढ़ी मूँछ मुड़ा देने के कारण क्या तुमसे कम बहादुर हूँ?''

राजन को यह मजाक बहुत महंगा पड़ा। शायद इसलिए कि इस मजाक ने शिवा के जातिगत अभिमान पर चोट की थी। या पिफर लड़की की उपेक्षा ने उसे बौखला दिया था। उसने जेब से तमंचा निकाल कर राजन की छाती पर अड़ा दिया-''अब बोल, क्या कहता है, डरपोक हूँ मैं?'' राजन को लगा शिवा मजाक कर रहा है। ऐसे मजाक उनके बीच चलते रहते थे। इसलिए उसने मजकिया लहजे में ही कहा-''भोंसड़ी के, हाथ में कट्टा आ जाने से कोई बहादुर हो जाता है क्या? बहादुर तो वो होता है जो गोली चलाता है।''
इसके बाद राजन कुछ और नहीं बोल सका। सिपर्फ एक चीख निकली। शिवाकांत ने अपने बहादुर होने का सबूत दे दिया था।
दूसरा, धीरपुर का एक मुसलमान नौजवान था। बंबई से कमाकर लौटा था। नई मोटरसाइकल खरीदी थी। नया खून, नया जुनून! कर बैठा गुस्ताखी। शिवाजी की गाड़ी को ओवरटेक कर गया। उसे शिवाजी के बारे में पता भी नहीं था। पता होता तो वह उन्हें ओवरटेक करने के बाद इस बाजार में चाय पीने के लिए क्यों रुकता?

चाय का पहला द्घूंट ही मौत का द्घूंट बन गया। दूसरा द्घूंट हलक के नीचे उतरने से पहले ही गोली सीने में उतर गई थी। उस समय तो किसी को पता भी नहीं चला कि उसे किस गुनाह की सजा मिली है। बाद में तीसरे-चौथे दिन शिवाकांत के एक पटठे ने खुलासा किया- साला मुसल्ला, चार पैसे क्या कमा लिया, अपनी औकात भूल गया। शिवाजी की गाड़ी को ओवरटेक करने चला था। साले को पता नहीं था कि जो शिवाजी से आगे निकलने की कोशिश करता है, हम उसे जिंदगी से भी आगे निकाल देते हैं।
ऐसे वीर शिवा के सामने एक बुढ़िया इस तरह गुस्ताखी करे तो उसकी सजा मौत के अलावा और क्या हो सकती है। पफुलकलिया की माई के हश्र के बारे में वहाँ मौजूद किसी भी व्यक्ति को शंका नहीं थी।

पर इस बार गोली नहीं चली! पफुलकलिया की माई की बात में पता नहीं ऐसी क्या बात थी कि शिवा ने उसकी कनपटी से तमंचा हटा लिया।
देखने वालों को ही नहीं, खुद पफुलकलिया की माई को भी अपने सिर से मौत के हट जाने पर ताज्जुब हुआ। उसने मुझे छोड़ क्यों दिया? शायद उसे लगा हो कि एक मरी हुई बुढ़िया को मारने से उसकी तौहीन होगी। या पिफर कहीं उसे बचपन का वह एहसान तो नहीं याद आ गया।
शिवाकांत को उस एहसान के बारे में शायद ही पता होगा? और पता भी हो तो उनके जैसे लोग किसी के एहसान को क्या याद रखेंगे, पर इस वक्त पफुलकलिया की माई को वह जरूर याद आ गया। वह कार्य, जिसे वह एहसान मानती भी नहीं थी, और जिसके बारे में उसने आज तक किसी को बताया तक न था, आज अचानक याद आ गया? शायद शिवा की एहसान पफरामोशी के कारण!
फ्रलैश बैक । २२ साल पीछे। शिवाकांत तब कुल छह दिन के थे। पफुलकलिया की माई मालिश करने गई थी। पफुलकलिया उस समय पैदा भी नहीं हुई थी, इसलिए तब उसे पफुलकलिया की माई नहीं, सोमई बहू कहा जाता था। सोमई बहू ने मालिश करने के लिए गोद में उठाया तो पता चला कि शिवा को बहुत तेज बुखार है।

''महराजिन, छोटका पंडित के बहुत तेज बोखार है। केहू डॉक्टर के देखाइ देव।'' सोमई बहू ने कहा तो सौरी में बैठी माँ की आँखों से आँसू बहने लगे। सोमई बहू ने ढाढस बंधाने की कोशिश की तो आँसुओं की धार और तेज हो गई।
''का बताऊं सोमई बहू..' एक छोटी जाति की औरत के आगे अपनी व्यथा व्यक्त करने में शिवा की माँ को भारी तकलीपफ हो रही थी। एक-एक शब्द जैसे एक-एक मन वजनी पत्थर को ठेलकर बाहर आ रहा हो-''कल से ही द्घर में खाने को कुछ नहीं है। इसके बाप टाँग पफैलाए सो रहे हैं। उन्हें तो किसी बात की चिंता ही नहीं। कहते हैं कि ब्राह्मण होके मजूूरी तो कर नहीं सकता। मजूरी करने में शरम है, लेकिन जने-जने से भीख मांगने में कोई शरम नहीं है। हम माँ-बेटे को एक साथ मौत भी नहीं आ जाती कि इस नरक से छुट्टी मिले। जिउ ऐसे अकरात गया है कि मन करता है कोई जहर-माहुर खा लूँ और इसको भी खिला दूँ।''

''जिउ छोटा मत करो महराजिन। भगवान ने कुश से मुँह चीरा है तो खाने का इंतजाम भी वही करेंगे।'' कहते हुए सोमई बहू उठ खड़ी हुई।
हमने नाहक ही इससे आपन दुखड़ा रोया। इसके सामने रोने से क्या मिला? अब ये दस द्घरों में बताएगी कि झिंगुरी पंडित के द्घर दो दिन से चूल्हा नहीं जला। शिवा की माँ ने उसके जाने के बाद खुद से कहा और आँसुओं की धार एक बार पिफर बह निकली। वर्णाभिमान ने अभाव की पीड़ा को और बढ़ा दिया था।

थोड़ी देर बाद सोमई बहू वापस आई। उसके हाथ में एक-एक रुपए के तीन नोट थे। उसने नोट पंडिताइन के हाथ पर रख दिए। कृतज्ञता से पंडिताइन का गला भर आया। उस समय ये तीन मुड़े-तुड़े गंदे नोट उन्हें तीन लोक की संपदा के बराबर लगे। उन्होंने भरे गले से कहा- ''तोहार ई एहसान जिनगी भर नहीं भूलूँगी। अगर जी गया तो हमार लल्ला जरूर तोहार कर्ज उतार देगा।''
''अरे ई कोई कर्ज नहीं है महराजिन। सतनराएन भगवान की कथा और दुइ ठो बाभन खिलाने के लिए एक-एक पैसा जोड़ि के एतना एकट्ठा केहे रहे। ई छोटका पंडित तो बाल भगवान भी हैं और बाभन भी। इनकी सेवा से बढ़ के पुन्न और कहाँ मिले।''
सोमई बहू की विनम्रता ने पंडिताइन को उसके सामने और छोटा बना दिया। ''तुम धन्न हो सोमई बहू,'' कहते हुए पंडिताइन ने उसके सामने हाथ जोड़ दिए। शायद वे भूल गईं कि सोमई बहू की जाति क्या है, या पिफर उसकी महानता के आगे वर्णभेद गौण हो गया था।
पर जिस बाल भगवान की सेवा ने उसे वर्णव्यवस्था से ऊपर उठा दिया था, उसी ने बीस-बाइस साल बाद पिफर जता दिया था कि उसकी जात क्या है और उसे अपनी औकात में रहना चाहिए।
हाँ मैं नीच जात की हूँ, और अपनी औकात में ही रहती हूँ, लेकिन मैं पंचायत वापस नहीं लूँगी। पफुलकलिया की माई ने पूरा जोर लगाकर कहा, लेकिन उसका यह ऐलान सुनने के लिए शिवाकांत वहाँ नहीं थे। मरी हुई बुढ़िया को मारकर कौन पाप ले, कहते हुए वे चले गए थे।
शिवाकांत के हार मान लेने के बाद यह तय हो गया कि अब पंचायत होकर रहेगी।

पंचायत।
यानी महाभारत।
दिनेश सिंह के दम और पफुलकलिया की माई के दृढ़ निश्चय के बाद पंचायत का टलना नामुमकिन है। शुरू-शुरू में कापफी खुरचाल रहा बाभन टोला अब थोड़ा सकते में है क्योंकि दिनेश सिंह के नेतृत्व में ठाकुरों के साथ-साथ पूरा रैदासी टोला भी एकजुट हो गया है। इनकी संयुक्त ताकत ब्राह्मणों की कुल ताकत से कापफी अधिक है।
तटस्थ पर्यवेक्षकों का मानना है कि बाभन टोला के लिए यह एक हारी हुई लड़ाई है। पर बाभन टोले के नए मुखिया रमई तिवारी जानते हैं कि हार को जीत में कैसे तब्दील किया जाता है। हारी हुई लड़ाई को जीत में बदलने के लिए रमई महराज ने हवेली का रुख किया।

हवेली में उस समय गाँव के सारे ठाकुर इकट्ठे थे, जब एक नौकर ने आकर सूचना दी कि रमई तिवारी आए हैं। उत्तेजना और उत्साह के उन क्षणों में रमई के आने की सूचना किसी को अच्छी नहीं लगी। उस समय ब्राह्मणों को मजा चखाने की योजना लगभग अंतिम दौर में थी। ऐसे समय में रमई का आ टपकना किसी अपशकुन जैसा लगा।
'ये कौए की औलाद कहाँ से आ टपका?' दिग्विजय सिंह ने बाहें चढ़ाते हुए कहा।
'जरूर जासूसी करने आया होगा।' रद्घुराज सिंह ने चेताया।
'भगाओ साले को।' किसी तीसरे ने सलाह दी लेकिन कुंवर दिनेश सिंह ने भीष्म पितामह कहे जाने वाले ८० वर्षीय भगवंत सिंह की बात को तरजीह दी- ''इस तरह अपने द्घर आए बाभन को भगाना उचित नहीं होगा। ''
''सरकार उन्हें बुला लाऊँ?'' नौकर ने डरते हुए पूछा।
''नहीं।'' कुंवर दिनेश सिंह के इस वाक्य से सन्नाटा छा गया। एक क्षण की चुप्पी के बाद वे मुस्कराते हुए बोले- ''बाभन देवता को लेने बाहर तक हम खुद जाएँगे।''

''पाय लागूँ महराज! धन्यभाग हमारे कि आप हमारी कुटिया पे पधारे।''
''धन्य भाग तो हमारे हैं कुंवर साहब कि आपके दर्शन हो गए। मैं तो डर रहा था कि हवेली के गेट से ही भगा दिया जाऊँगा।''
''क्या बात कर रहे हो महराज! आपको पता है कि इस कुटिया से कभी किसी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं लौटाया गया।''
''हवेली की परंपरा मुझे मालूम है। और इसी के भरोसे तो मैं यहाँ तक आने की हिम्मत जुटा सका वरना राम समुझ ने आपके खिलापफ चुनाव लड़ के और उसके कपूत ने कुकर्म कर के हमें आपके सामने मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा।'' रमई महराज को खुद के वाकचातुर्य पर आश्चर्य हुआ कि किस तरह उन्होंने एक तीर से दो शिकार कर डाले हैं। कुंवर साहब अब उन्हें आदर सहित अंदर ले जा रहे हैं।
अंदर ले जाकर कुंवर साहब ने उन्हें ऊँचे आसन पर बैठाया। कुंवर के इस कूटनीतिक बड़प्पन ने रमई को एक छोटेपन का अहसास करा दिया। अपने छोटेपन के अहसास से उबरने के चक्कर में वे हड़बड़ा गए कि बात कैसे शुरू की जाए।

पर उन्हें बात शुरू करने की जरूरत नहीं पड़ी। खुद कुंवर साहब ने पहल की-''ब्राह्मण का सम्मान करना आज भी हम अपना धर्म समझते हैं। वैसे भी इस कलजुग में सिपर्फ हम ठाकुर ही ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं। शूद्रों ने तो पैलगी तक करना छोड़ दिया है। सरकार ने भी कम बेकदरी नहीं की है। इस सरकार के राज में तो गाँधी जी के ये हरिजन अपने को सरकारी पंडित मानने लगे हैं।''
''आप सही कह रहे हैं कुंवर साहब'' रमई महराज को लगा कि वे बात को जिस दिशा में ले जाना चाहते थे, उसके लिए बिलकुल सही जमीन खुद कुंवर साहब ने तैयार कर दी है। तैयार जमीन में उन्होंने अपनी कूटनीति का पहला बीज रोपने की कोशिश की-''सिपर्फ आप लोगों के ही कारण ब्राह्मणों की थोड़ी बहुत मान-मर्यादा बची हुई है। लेकिन अब ब्राह्मणों में ऐसे कुलबोरन पैदा हो गए हैं कि पूरे समाज की आन बान मिट्टी में मिलाने पर तुले हुए हैं।''

''हम तो ब्राह्मणों की बहुत इज्जत करते हैं लेकिन ब्राह्मणों को जब खुद अपनी इज्जत की परवाह नहीं है तो हम भी क्या कर सकते हैं। गाँव के प्रधान होने के नाते मुझे राम समुझ के खिलापफ यह रवैया अपनाना पड़ा है।''
''आपकी बात बिलकुल सच है, लेकिन मेरी एक बात पर गौर कीजिएगा कि ठाकुरों का सम्मान भी ब्राह्मणों के सम्मान के साथ ही जुड़ा हुआ है। आज सिपर्फ ब्राह्मण ही हैं जो ठाकुरजी को भगवान के रूप में पूजते हैं। इन लोगों ने तो ठाकुर जी के बदले बाबा साहेब को पूजना शुरू कर दिया है। अब तो ये लोग अभिवादन भी जयराम जी के बजाय जय भीम कहकर करते हैं।''
''आप ठीक कह रहे हैं लेकिन...''

''मुझे राम समुझ और उसके कपूत से कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन एक बात मैं बहुत सापफ तौर पर देख रहा हूँ कि आपकी मदद से रैदासी टोले के लोग अगर ब्राह्मणों पर हावी हो गए तो एक दिन ठाकुरों को भी नहीं बख्शेंगे। सरकार ने पहले ही इनका मन बढ़ाया हुआ है आपका समर्थन पाकर ये एकदम आग मूतने लगेंगे।''
रमई महराज की इस बात ने वहाँ उपस्थित क्षत्रिाय समाज को एक पल के लिए संशय में डाल दिया। रमई महराज ने इस संशय को और गहरा करते हुए कहा, ''जरा यह भी सोचिए कि शूद्रों की आबादी भी हमसे कितनी अधिक है। अगर अब भी ठाकुर और ब्राह्मण एकजुट नहीं हुए तो अगला प्रधान कोई शूद्र ही होगा।''
''लेकिन लोक नीति और मर्यादा...?''

''लोकनीति और मर्यादा तय करने वाले तो हम ही हैं। शबरी के बेर भी हमीं खाते हैं और एकलब्य का अंगूठा भी हमीं कटवाते हैं।''
और रमई महराज ने एक बार पिफर साबित कर दिया कि लोग उन्हें यूँ ही चाणक्य नहीं कहते हैं। जब वे कुंवर साहब की हवेली में द्घुसे तो अकेले थे, लेकिन जब बाहर निकले तो उनके साथ यह आश्वासन भी था कि पंचायत नहीं होगी। आश्वासन सबसे पहले बाभन टोले में पहुँचा। टोला खुश हो गया।

पंचायत नहीं होगी।
इस खबर के पहुँचने के साथ ही रैदासी टोला दो हिस्सों में बंट गया।
टोले के मुखिया सहित कई बड़े बुजुर्ग खुश हो रहे थे कि चलो बला टली। वरना ठाकुरों-बाभनों की लड़ाई में बुरी तरह पिस जाते। दूसरे गुट में कुछ युवा थे जो इसे ठाकुरों-बाभनों की साजिश मानकर इसका विरोध कर रहे थे। विरोध करने वाले इस गुट में सबसे आगे थी पफुलकलिया की माई। पर ठाकुर-बाभन गठजोड़ और रैदासी टोले के बुजुर्गों के आगे इस गुट की औकात न के बराबर थी। यह गुट चाहकर भी पंचायत नहीं बुला सकता था। और अगर पंचायत बुला भी ली जाती तो पंच क्या पफैसला देते, इसमें किसी को संदेह नहीं था।
''पिफर क्या करना चाहिए?'' झिंगुरी ने शिवबरन से पूछा।
शिवबरन ने गेंदालाल से पूछा।
गेंदालाल ने पफुलकलिया की माई से पूछा।
पफुलकलिया की माई किससे पूछती। असहायता में उसे राम की याद आई। दशरथ पुत्रा राम नहीं बल्कि मायाराम के बेटवा रामचंद्र। गाँव के सारे ठाकुर-ब्राह्मणों में रामचंद्र एकमात्रा ऐसे व्यक्ति थे जिनकी नजर में पफुलकलिया की माई अपने लिए सम्मान का भाव देखती थी। रामचंद्र उसे चाची कहते थे।

और संयोग देखिए कि इधर पफुलकलिया की माई के मन में रामचंद्र का नाम आया, उधर रामचंद्र प्रकट हो गए। कहीं ये वास्तव में भगवान राम ही तो नहीं हैं जो दुखियारे भक्त की पुकार सुनकर दौड़े चले आते हैं। पर कलजुग में किसी भक्त की पुकार पर इस तरह भगवान कहाँ प्रकट होते हैं? ये तो हमारे लल्ला ही हैं, जो मेरी पुकार सुनकर चले आए हैं।
''पंचायत नहीं होगी, लल्ला!'' पफुलकलिया की माँ की आँखों से आँसू और मुँह से उसकी असहायता बोल रही थी।
''ये तो बहुत अच्छा हुआ चाची। पंचायत होती तो भी तुम्हें न्याय नहीं मिलने वाला था। पंचायत में ब्राह्मणों की हार होती, पर जीत तुम्हारी नहीं ठाकुरों की होती। क्योंकि इस लड़ाई में तुम कोई पक्ष थी ही नहीं। लड़ने वाले तो कोई और थे, तुम्हें तो सिपर्फ लड़ाई का हथियार बनाया गया था।''
''पिफर अब का करें?''
''वही, जो बहुत पहले करना चाहिए था।''
''का?''
''पुलिस में रिपोर्ट।''
''पुलिस-दरोगा ठाकुर-बाभन के सुनिहैं या हमार सुनिहैं? वो तो उलटे हमहीं के उठाइ के बंद करि देइहें।''
''ऐसे कैसे बंद कर देंगे? कोई अंधेरगर्दी है क्या?''
''अंधेरगर्दी नाहीं तो और का है? तीन साल पहले की बात भूल गए का, जब जिवराखन गए रहेन रमई महराज के खिलापफ रपट लिखवाने। रमई के तो कुछ नाहीं बिगड़ा, उलटे जिवराखन के इतना पीटेन कि अब भी बारिश-बदरी के मौसम में उनके हाथ-पैर टूटत हैं।''
''तब की बात कुछ और थी, आज सरकार भी तुम लोगों की रक्षा के लिए बहुत गंभीर है। मैं खुद तुम लोगों के साथ चलूँगा रिपोर्ट लिखवाने। न्याय के लिए लड़ना तो पड़ेगा ही।'' रामचंद्र ने पफुलकलिया की माई को आश्वस्त करने के लिए कहा, जैसे तुलसी के राम ने आँषियों को आश्वस्त करने के लिए कहा था - करौं निशाचरहीन महि, भुज उठाय प्रण कीन्ह। राम के प्रण से पता नहीं आँषिगण आश्वस्त हुए थे या नहीं, पर थाना-कचेहरी के नाम से पफुलकलिया की माई के चेहरे पर आश्वस्ति का कोई भाव नजर नहीं आ रहा है।
;आधार प्रकाशन पंचकूला से शीद्घ्र प्रकाश्य उपन्यास 'उत्तर-वनवास' का एक अंशद्ध

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)