प्रभाष जोशी- मित्राो! अब कोई १० मिनट तक इस कार्यक्रम के सूत्राधर का अभिनय मैं आप के सामने करूँगा। ये इसलिए कह रहा हूँ कि इस कार्यक्रम की रूपरेखा मैंने महेश्वरी जी को सुझाई थी और उन्होंने कृपापूर्वक इसे स्वीकार भी किया। हमारे यहाँ मालवा में एक 'मामेरा' होता है। कोई भी मांगलिक कार्य में बेटी या बहू के लिए पीहर से मामा आता है और सारे लोगों को जो चीज उपयुक्त होती है वह देता है। और बहन जो उस द्घर की बहू या मालकिन है वह एक-एक व्यक्ति को याद करके अपने भाई से जो भी देना-दिलाना होता है, वह देती है। यह एक करुण दृश्य होता है। क्योंकि जो लोग नहीं रहे या नहीं आये उन्हें याद किया जाता है।
मुझे 'कागद कारे' कॉलम लिखने के लिए सबसे पहले जवाहरलाल कौल ने कहा। बोले कि मुझे इस तरह के एक कॉलम को लिखना चाहिए। 'कागद कारे' का शीर्षक हमारे साहित्य संपादक मंगलेश डबराल ने सुझाया था। आप जानते हैं कि मंगलेश डबराल साहित्य अकादमी से सम्मानित कवि हैं। उन्होंने १२ साल तक जनसत्ता का साप्ताहिक संस्करण निकाला। लोग कहते थे कि यही सबसे अच्छा साप्ताहिक संस्करण है। उनके एक मित्रा और मेरे एक आलोचक का कहना है कि प्रभाष जोशी ने जो किया हो सो किया हो, एक ही काम अच्छा किया है कि मंगलेश डबराल को १२ साल तक जैसा वे चाहते थे वैसा अखबार निकालने दिया। उन्हें रवीन्द्र त्रिापाठी ने पहली बार अखबार में प्रोड्यूज किया। वे दुर्र्भाग्य से दुर्द्घटना के शिकार होकर अस्पताल में भर्ती हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि उनके लिए एक कुर्सी खाली छोड़ दी जाए।
सोलह साल तक मैंने 'कागद कारे' कॉलम लिखा। अब चार साल और लिखना चाहता हूँ। इस दौरान मात्रा एक बार ही ऐसा हुआ जब मुझे उसे बोलकर लिखवाना पड़ा। मुम्बई में बाईपास सर्जरी के बाद मेरे दोनों हाथ सुन्न थे, तब एक बार आलोक तोमर से बोलकर अस्पताल में लिखवाना पड़ा। वह 'ध् से धड़कन, धैवत और ध् से ध्न्यवाद' वाला पीस है।
मित्राो! मैंने करीब पचास साल के पत्राकारीय जीवन में चार-पाँच बहुत बड़े संपादकों के साथ काम किया। पहले राहुल बारपुते जो नई दुनिया के संपादक थे और जो ऐसी विलक्षण प्रतिभा के आदमी थे कि कुमार गंधर्व के साथ संगत कर सकते थे। एम एपफ हुसैन के साथ बैठकर पेंटिग कर सकते थे। पूफलदेश पांडे के साथ बैठकर मराठी साहित्य पर भाषण दे सकते थे। किसी भी डिबेट को ज्वाइन कर सकते थे। साइकिल पर चलते थे। बैडमिंटन खेलते थे, स्वीमिंग करते थे, पर उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि मैं इस अखबार का प्रधान संपादक हूँ। पहली बार जब मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने कहा कि पहले आदमी बनकर आओ पिफर काम करना। उस समय मैं गाँव से आया था, मेरी दाढ़ी लम्बी थी। मैं सर्वोदय में काम करता था। तो मैंने जाकर सब ठीक किया और राजा बाबू बनकर दूसरे दिन गया। उन्होंने कुछ लिखकर देने को कहा। मैंने लिखकर दिखाया। उसमें मैंने 'नयी' लिखा था तो उन्होंने 'नई' कर दिया और कहा तुम कहानी, कविता तो लिखते हो पर पत्राकारिता नहीं जानते हो। इसलिए जब तक तुम पत्राकारिता सीख नहीं जाते तब तक हम तुम्हें इस अखबार में काम करने का पैसा नहीं देंगे। इसलिए छह महीने तुम्हें यहाँ सीखना पड़ेगा। इस दौरान जब मैंने विनोबा भावे पर महीने भर रिपोर्टिंग करके दी तो उसका बड़ा नाम हुआ। तो उन्होंने कहा कि अब तुम्हें ५० रुपया महीना मिलेगा। मेरे मित्रा राजेन्द्र माथुर को तब ५० रुपये महीना ही मिलता था। अब मैं देखता हूँ कि जब मेरे छोटे भाई की बेटी सिपर्फ बीए पास करके एनडीटीवी में गयी तो उसे ४१ हजार रुपये की तनख्वाह मिली। मैंने कभी अपने असिस्टेंट एडीटर को भी उतना पैसा नहीं लेने दिया क्योंकि मैं खुद भी उतना पैसा नहीं लेता था।
दूसरे संपादक जिनके साथ मैंने काम किया वह श्रीश मुलगांवकर हैं। वह टाइम्स ऑपफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस के भी संपादक हुए। मैं उनसे क्रिकेट के साथ कई चीजों पर बात करता था। बहुत विलक्षण व्यक्ति थे वे। मैट्रिक पास करने के बाद वे अंग्रेज संपादक से काम मांगने पहुँच गये। संपादक ने उन्हें द्घुड़दौड़ की रिपोर्टिंग करने को कहा। उन्होंने रिपोर्टिंग की और उस दिन के अखबार में वह छपी भी। उसी दिन से मुलगांवकर पत्राकारिता में प्रवेश कर गये।
तीसरे संपादक अजीत भट्टाचार्य थे, जो यहाँ आये हुए हैं। वो टाइम्स ऑपफ इंडिया छोड़कर जे पी का अखबार 'प्रफी मैन' निकालने के लिए यहाँ आये। और तब से वे इसी प्रकार के काम करते रहे। पहली पुस्तक में उन पर एक 'कागद कारे' है- हम जेपी के लोग। मुलगांवकर पर भी दो एवं राहुल बारपुते पर भी एक 'कागद कारे' है।
एक दिग्गज संपादक जिनके साथ मैंने काम किया जार्ज वर्गीज हैं। वे भी सपत्नीक यहाँ आए हुए हैं। जार्ज वर्गीज के बारे में जेपी ने कहा कि देश में कोई सच्चा ईसाई है तो वह हैं, इसलिए तुम जाकर बात कर लो। उस समय मैंने उन्हें डाकुओं के समर्पण की क्या तैयारी हो रही है इसका एक पीस अंग्रेजी में लिखकर दिया। उस वक्त तक मैंने अंग्रेजी नहीं लिखी थी और मुझे बहुत डर भी लग रहा था। जार्ज ने उस लेख को ठीक किया और जब वह छपने वाला था तब उन्होंने मुझे गाँध्ी पीस पफाउंडेशन में पफोन कर के बताया कि तुम्हें कितनी कापी चाहिए? मैं आज तक एक ऐसे संपादक की खोज में हूँ जो अपने सहयोगी के आर्टिकल को छापकर पूछे कि तुम्हें कितनी कापी की जरूरत है। २० साल तक वह हम सबको अपनी बराबरी का समझकर व्यवहार करते रहे।
एक ऐसे संपादक जिनको ३० साल पहले मैं इंडियन एक्सप्रेस चलाने के लिए चंडीगढ़ ले जाना चाहता था वह हैं एच के दुआ। जब हम गाँध्ी पीस पफाउंडेशन में काम करते थे तब उनकी बीट जे पी आंदोलन थी। इसलिए वे वहाँ आकर हम सब से बात करते थे। तब से हमारी उनकी दोस्ती के ३६ साल हो गये। दुआ जी टाइम्स ऑपफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स एवं इंडियन एक्सप्रेस तीनों के संपादक रहे। अब वे चंडीगढ़ में ट्रिब्यून के प्रधन संपादक हैं।
मित्राो! आज की सभा में ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके साथ मैंने काम किया और जिन्होंने मेरे साथ काम किया। आज मैं बिना किसी भावुकता के साथ यह कंपफेस करना चाहता हूँ कि अगर ये दिग्गज लोग नहीं होते तो प्रभाष जोशी न हुआ होता। ऐसे लोगों की कृपा से ही नये पत्राकार बनकर खड़े होते हैं और अपना काम आगे करते है। जब तक ऐसे लोग बनते रहेंगे तब तक बाजार पत्राकारिता को लूटकर नहीं ले जा पाएगा। इसलिए आज मैं इन पाँचों संपादकों को बड़ी कृतज्ञता से ध्न्यवाद करना चाहता हूँ।
मेरी रिपोर्ट यह है कि शशि शेखर अभी तक संपादकीय कार्य ही करते हैं इसलिए मुझे ठीक लगा कि मैं उनसे यहाँ आने को कहूँ।
मित्राो, तीसरे विमोचनकर्ता हमारे मित्रा श्रवण कुमार गर्ग हैं। वह दैनिक भास्कर के ग्रुप एडीटर हैं। देश के बहुत बड़े ग्रुप में मैंने तीस साल काम किया। पर ग्रुप एडीटर क्या होता है यह मैं नहीं समझ सका। उनको यहाँ आया हुआ देखकर अच्छा लगता है कि सन् १९७० में श्रवण कुमार गर्ग एवं अनुपम मिश्र के साथ हमने सर्वोदय, बिहार आंदोलन और उसके बाद कठिन दिनों में छुपकर जो भी कर सकते थे हमने किया। कुमार गर्ग से हमारा लड़ाई-झगड़े का संबंध् भी है। जब मैंने विमोचन के लिए उनका नाम तय किया तो लोग कहने लगे कि वह तुमको गाली देते हैं। मैंने कहा कि दें वे मुझे। मुझे नहीं लगती। जो मैं नहीं लेता वो मुझे नहीं लग सकती। ये श्रवण कुमार वही हैं जो १९७० में काम करने के लिए दिल्ली में आए। इस नाते मैं उनसे आग्रह करूँगा कि वे मेरी एक पुस्तक का विमोचन करें।
इसके बाद एन के सिंह हैं। वे 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के भोपाल के संपादक हैं। एन के सिंह 'नई दुनिया' में काम करते थे। वे बिहार के हैं, उनके मन में बिहार की आंदोलनकारी आत्मा लहराती रहती है। इसलिए नई दुनिया में काम करते हुए उनकी इच्छा हुई कि वे इंडियन एक्सप्रेस में काम करें। मैंने बात की। तो अभी मैंने जिन सभी संपादकों का जिक्र किया उन सबके साथ एन के सिंह ने काम किया। हिन्दी में वे उसी तरह से आते रहते हैं जिस तरह कुमार गंर्ध्व जी आरोह से अवरोह में जाते हैं, और वे लोैटकर हिन्दी में जाते हैं। वे इंडियन एक्सप्रेस अहमदाबाद के भी संपादक थे।
आखिर में अनुपम मिश्र हैं। अनुपम मिश्र ने श्रवण गर्ग से कुछ समय पहले मेरे साथ काम करना शुरू किया। मैंने अनुपम मिश्र से कहा कि मेरी पुस्तक का विमोचन करना है तो वह हाथ झटक कर खड़े हो गये कि मैंने जीवन में किसी की पुस्तक का विमोचन नहीं किया है। तो मैं आज आपकी किताब का विमोचन कैसे कर सकता हूँ। मैंने कहा कि भाई कोई न कोई काम एक बार पहली बार करना ही पड़ेगा। यह समझ लो कि अपने भाई की पुस्तक का विमोचन है। तो वे किसी तरह तैयार हुए। उन्होंने मुझे बताया कि नागौर में पानी अभियान के काम से जाना है इसलिए मुझे टाइम नहीं मिलेगा। तो मैंने कहा कि कुछ तो सोचो। एक समय राजीव गाँध्ी ने लालकृष्ण आडवाणी की बेटी के रिसेप्शन के लिए एक दिन सेशन अधिक चलाया और दोपहर में खत्म कर दिया ताकि लोग वहाँ जा सकें। तो राजीव गाँध्ी लालकृष्ण आडवाणी के लिए यह कर सकता है तो तुम क्यों नहीं कर सकते हो। तो इस तरह वे तैयार हुए। आज वे अपना काम खत्म करने के बाद ४ बजे यहाँ पहुँचे हैं। इन्होंने एक पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब' लिखी है। आज एक भी ऐसी भाषा नहीं है जिसमें इस पुस्तक का अनुवाद न हुआ हो। दुनिया में जहाँ कहीं भी पानी को बचाने का विचार होता है अनुपम की पुस्तक को संदर्भ-ग्रंथ के रूप में लिया जाता है। अनुपम जी गजब की हिन्दी लिखते हैं। तालाब और पर्यावरण जैसी चीजों को बड़ी आसानी से समझाते हैं। उनका लिखना उनके पिता भवानी प्रसाद मिश्र की याद दिलाता है। इसलिए मुझे लगा कि वे मेरी पुस्तक का विमोचन करें।
सुध्ीश पचौरी- जो प्रभाषजी ने यहाँ तक की भूमिका बाँध्ी है उसमें छोटा सा टुकड़ा ही यहाँ सम्भव है। प्रभाषजी ने एक मानक रखा है यहाँ। उन्होंने बताया कि अपने अग्रज को कैसे स्मरण करना चाहिए। जिसने किसी भी स्तर तक पत्राकारिता को साक्षर किया। तो यह विशिष्टता जो उन्होंने स्थापित की इस दृष्टि से उनका वक्तव्य और आप सब की उपस्थित एक ऐतिहासिक शाम में बदल गई है। उनके कॉलम को नियमित पढ़ने वाले लोग हैं इसलिए अगले चार साल क्यों जब तक वे हैं तब तक वे लिखें। वे हमेशा मस्त और व्यस्त रहने वालों में से हैं। जब इस तरह के एक कॉलम लिखने का विचार आया तब देखा गया कि प्रभाषजी बहुत संकुचित हो रहे थे कि अरे यार देखेंगे। तब तक उनकी किताब 'हिन्दू होने का र्ध्म' आ चुकी थी। इससे पहले 'मसि कागज' भी आ चुकी थी। इतना लिखने वाला इतना एलर्ट माइंड व्यक्ति संकोच कर रहा था। प्रोज की कितनी वेरायटी है उनके पास। मैं तो जनसत्ता से बाहर से जुड़ा हुआ व्यक्ति एक कॉलमकार बनाया गया था।
एक खतरनाक बात प्रभाषजी में है कि वे स्नेहवश किसी के कंध्े पर अपना हाथ रख देते हैं तो उसे थोड़ा समझदार हो जाना पड़ता है। कुछ लोग पैकेज देते हैं और वे एक पूरा एजेंडा दे देते हैं कि उसे लेकर द्घूमते रहिये। जब मेरे कंध्े पर उनका हाथ आ गया तो मुझे मालूम पड़ा कि मुझे मंच का संचालन करना है। उनके प्रोज के जितने दीवाने यहाँ हैं उतने से ज्यादा बाहर भी हैं। ऐसा उत्साह केंद्रित प्रोज हिन्दी में नहीं है। जहाँ एक पक्का शत्राु है और उस शत्राु की खबर लेता एक आदमी है जो चारों तरपफ से उसे द्घेर रहा है। उनमें एक जिद है, जो यहाँ बैठे हैं वे भी थोड़-थोड़े जिद्दी हैं। लेकिन उनके चेले अनुपम जी शाायद उनसे भी सवायी हैं। लेकिन वे बहुत ही कोमल हैं। प्रभाषजी का हाथ बहुत ही कोमल है। हमें नहीं लगता जो हाथ क्रिकेट खेलता और खिलाता रहा हो उसका हाथ इतना कोमल कैसे हो सकता है। मुझे नागार्जुन याद आते हैं। उनमें एक विशेषता थी कि वे लोगों को एक सूत्रा में बाँध्ने का काम करते रहते थे। हम सबको जान गये सब हमें जान गये। तो इस तरह का नागार्जुनपना प्रभाषजी में भी है।
एक बार प्रभाषजी के सुपुत्रा सोपान से मेरी बातचीत हुयी तो उन्होंने एक खूबसूरत जुमला कहा कि ये जो मेरे पिता जी हैं वे पूरे राज कपूर हैं। जो हो रहा है उसमें थोड़ा क्रिटिकल हो कर निकलते हैं लेकिन रहते वैसे ही हैं थोड़ा भावुक। जिस आवारगी और दीवानगी के साथ वे काम करते हैं उसके बिना वह संभव नहीं है। एक जिद तो चाहिए ही। इस जिद से वह चमक आती है। वैसा प्रोज जिसमें एक भी झोल नहीं, एडीटिंग की गुंजाइश नहीं। जनसत्ता में यह बात प्रचलित है कि प्रभाषजी के लेख के लिये आखिर तक इंतजार रहता है। लेख हाथ का लिखा होता है। वाक्यों में कहीं भी काटा-पीटी नहीं होती। इतना आर्गनाइज्ड माइंड निश्चित रूप से हमारे समाज की एक बहुत बड़ी शक्ति है। उनकी आज पाँच किताबों का विमोचन कर रहे हैं। इसलिए यह बहुत ऐतिहासिक वक्त है। ऐसा मीडिया यज्ञ मेरी स्मृति में नहीं है, जहाँ इतने लोग आए हों, इस तरह के आए हों, प्रभाषजी अपनी पत्राकार जीवन प्रक्रिया एवं प्रशिक्षण प्रक्रिया के बार में बोले हों।
हरिवंश- जब मैं विद्यार्थी था तब से मैं 'प्रजानीति' पढ़ता आया हूँ। अगर दिल्ली की भाषा में कहूँ तो मैं जंगल-झाड़ वाले पूर्वोत्तर क्षेत्रा का हूँ। जहाँ आम धारणा है कि हमारी बात दिल्ली में नहीं सुनी जाती। पर दिल्ली के बाहर एक बड़ी दुनिया है गाँवों की, जंगलों की। और एक समानांतर वैकल्पिक विकास की बात करने वालों की। इस तबके के लोगों की बात बहरे कानों को सुनाना और दिल्ली में हो रहे छल-छलावों की बात को सुदूर बैठे लोगों तक पहुँचाने का काम जो कर रहे हैं वह प्रभाषजी हैं। 'कागद कारे' का एक स्लोगन 'सबकी खबर ले, सबको खबर दे' बहुत अपील करता रहा। इन स्तंभों ने विचारों की पारदर्शिता ;बसमंतपजल वि जीवनहीजेद्ध की एक असाधारण बात है। आप क्या कहना चाहते हैं? आप किध्र खड़े हैं? बहुत जगह यह स्पष्ट नहीं होता। बाजार, मीडिया, उदारवादी अर्थव्यवस्था, राजनीति के बारे में विचार प्रभाषजी के लम्बे संद्घर्षों और अनुभवों के बाद निकले हैं। इनमें उनका अपना प्रत्यय, अपना पक्ष है और इन पक्षों में अपनी मिट्टी की गंध् भी है। सिपर्फ मालवा ही नहीं गाँध्ी, विनोबा, जेपी की परंपरा की श्रेष्ठ चीजें शामिल हैं। जो बात वे कहते हैं वे दिल्ली जैसे अभिजात वर्गों के महानगरों में कहना कितना कठिन है। यानी भीड़ में अकेले होकर कहना। आज जब ऐसे पुरोध नहीं हैं तब मैं उनके स्तंभों को इस संदर्भ में समझने की कोशिश करता हूँ। जो हम लोगों को प्रेरित करता है। उनके स्तंभ में पढ़ी हुई एक चीज याद आती है जिस पर उन्होंने एक बहस भी चलाई थी- न दैन्यम न पलायनम्। बहुत ही बेबाक ढंग से कही गयी बात हैं। अपनी परंपरा की श्रेष्ठ चीजें उनके लेखन में बार-बार उभर कर आती हैं। कबीर, कुमार गंर्ध्व, टी एस इलिएट इन सभी की पंक्तियों का असर उनके लेखन में है। एक पत्राकार से क्रियटिव राइटर बने, चिंतक बने। जो भाषा और मुहावरे उन्होंने गढ़े वह सब पत्राकारिता के लिए जनसत्ता का अवदान हैं। जब वे कुमार गंर्ध्व जैसे लोगों को याद करके कॉलम लिखते हैं- निर्भय निर्गुन गुण रे गाऊँगा। तो ये स्वर प्रॉपिफट मोटिव को प्राइम मानने वाली पत्राकारिता के दौर में सुनने को नहीं मिलेगा। उनका संद्घर्ष ही उनका व्यक्तित्व बना। उनका एक लेख 'सुरंग में गाढे़ अंध्ेरे दिन' पढ़ा। उसमें उनका संद्घर्ष एवं किस तरह की मानस स्थिति से वे निकले, क्या-क्या नहीं सहा, वह मिट्टी किस तवे में पकी है अगर हम जान जाएँ तो हम रोमांचित ही होंगे।
एन के सिंह- लम्बे संपर्क के बावजूद प्रभाषजी के बारे में कुछ कहना मेरे लिए मुश्किल है। वे मेरे गुरुजनों में से एक हैं। कोई अपने गुरु के बारे में भला क्या कहा सकता है। उनके साथ सीध्े काम करने का मौका नहीं मिला जैसा मौका श्री राजेन्द्र माथुर के साथ मिला था। एक अवसर मुझे उनके साथ काम करने का मिला था जिसे मैंने गवां दिया था जिसके लिए आज तक मैं पछता रहा हूँ। वे पत्राकारिता में ही नहीं बल्कि संगीत में भी मेरे गुरु हैं। जनसत्ता ने दिनमान के बाद एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। जनसत्ता में बौ(किता की धर के साथ-साथ तीखी पत्राकारिता के तेवर थे। उनकी नजर संपादकीय पृष्ठ के साथ अखबार की साज-सज्जा पर भी रहती थी। जनसत्ता उस समय सचमुच जन की सत्ता बनकर उभरा। उनको गुरु मैंने कापफी बाद में १९९२ में माना। बाबरी विध्वंस की द्घटना मुझमें कापफी परिवर्तन लाई। उस समय तक देश मेरे लिए एक अमूर्त किस्म का अस्तित्व था।
इस द्घटना के बाद मुझे एकाएक लगा कि कुछ लोग हैं जो इस मुल्क के टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं। तब पहली बार मुझे लगा कि इस मुल्क से मुझे प्यार है और यह प्यार जगाने में मेरी मदद प्रभाषजी के लेखों ने की। छद्म हिन्दुत्व पर उनके विचारोत्तेजक लेखों और तीखे प्रहारों ने कापफी भ्रांतियों को दूर किया। मेरे कॅरियर का अध्किांश समय अंग्रेजी अखबारों में गुजरा है। उनके कई स्वनामध्न्य संपादक हैं जिनका मैं नाम नहीं लेना चाहूँगा। वे समझते थे कि धेती-कुर्ता पहने प्रभाषजी पुरातनपंथी हैं। १९९२ से पहले प्रभाषजी जिस तरह का जनसत्ता निकालते थे, उसे लेकर वामपंथी, सीनियर प्रशासनिक अध्किारी तथा राजनीतिक वर्ग को उनकी र्ध्मनिरपेक्षता पर शक होता था तो वह मुझसे पूछते थे। पर र्ध्म और सांप्रदायिकता का यह पफर्क उन्हें बाबरी प्रकरण ने ही समझाया। १९९२ की द्घटना राजनीति के साथ-साथ मीडिया के लिए भी अहम थी। सांप्रदायिकता के अपने स्टैण्ड को लेकर हिन्दी पत्राकारिता एक लांछन का शिकार रही है। पर प्रभाषजी ने हमें सिखाया कि हिन्दू होने का र्ध्म क्या है। उन्होंने एक स्टीरियो टाइप की इमेज से हिन्दी पत्राकारिता को मुक्ति दिलाई। जब पूरी पत्राकारिता अपनी पहचान के संकट से जूझ रही है तब प्रभाषजी आशा की मशाल जलाए हुए हैं।
श्रवण कुमार गर्ग- प्रभाषजी ने पांच संपादकों के परिचय दिए और उसमें मेरा भी परिचय दिया और बताया कि उन्होंने बड़ी हिम्मत करके मुझे बुलाया क्योंकि मैं उन्हें बहुत गालियां देता था। मैं प्रभाषजी के सम्मान समारोह में आया था और उन्होंने मेरा सम्मान कर दिया। इसका उन्हें हक है। पिछले ४० वर्षों से मैं उन्हें जानता हूँ। अपनी अध्कि निकटता का दावा मैं इस नाते कर सकता हूँ कि इंदौर से मैं भी आता हूँ और प्रभाषजी भी आते हैं। जो मैंने ४० साल पत्राकारिता में गुजारे हैं उसके बहुत से गुण दोष उनसे प्राप्त किये हैं। तो अगर मैं उनका आलोचक हूँ तो हो सकता है यह मैंने उनसे ही प्राप्त किया हो। कुछ लोग अपने पद के साथ, अपनी उपलब्ध्यिों के साथ बदलते रहे हैं पर प्रभाषजी ऐसे शख्स हैं जो पिछले ४० सालों से बदले नहीं हैं। जो तेवर ४० साल पहले थे वे आज भी हैं। पर हम लोग शायद बदल गये हैं। इसे आप उनकी एक बड़ी खूबी मान सकते हैं। अगर ४० साल पहले लिखी प्रभाषजी की किसी कहानी को पढं़े या आज के लेख को पढ़ें तो पफर्क करना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि उन मुहावरों, उस मिट्टी, उस नदी के साथ वो आज भी जुडे़ हुए हैं। ये पफर्क करना मुश्किल है कि लिखते समय वे दिल्ली में बैठे हैं या नर्मदा किनारे।
हिन्दी पत्राकारिता जितनी तेजी से बढ़ रही है संपादक उतनी तेजी से कम होते जा रहे हैं। यह चिंता का विषय इसलिए है कि इस कमी को स्वयं संपादक भी महसूस नहीं कर रहे हैं। जिन हिन्दी संपादकों की पफसल हम देख रहे हैं वह पूरी की पूरी राजेन्द्र माथुर या प्रभाषजी के इर्दगिर्द उभरी है। भाषाई पत्राकारिता में कुछ गिने चुने इंस्टीट्यूट रहे हैं। ऐसी स्थिति में संपादकों का टोटा पड़ा हुआ है। ऐसे में बार-बार आँखें किसी राजेन्द्र माथुर को टटोलती हैं या प्रभाष जोशी के पास जाती हैं। यह बहुत सुखद आयोजन है और इस आयोजन के माध्यम से न केवल प्रभाष जोशी का सम्मान हो रहा है बल्कि भाषाई पत्राकारिता, हिन्दी का सम्मान हो रहा है और यह सब अंग्रेजी के गढ़ दिल्ली में हो रहा है, यह ज्यादा सुखद है।
शशि शेखर- आश्चर्य भरी सूचना से अपनी बात शुरू करना चाहता हूँ। यहाँ पर बैठे लोग प्रभाषजी को वर्षों से जानते हैं। मेरा रू-ब-रू परिचय नहीं रहा है। मैं उन्हें केवल पढ़-पढ़कर जानता रहा हूँ। उनको जानने की पहली अनिवार्य शर्त 'उनको पढ़कर जानना' को मैं पूरी तरह से पूरा करता हूँ। कैसे? यह बताने की मैं पूरी कोशिश करूँगा। 'आज' अखबार से मेरी पत्राकारिता शुरू हुयी। यह एक संस्कृतनिष्ठ अखबार था। सबसे अच्छे और बड़े अखबारों में यह शुमार होता था। तीन चार साल काम करने के बाद मुझे लगा कि यहाँ बदलाव की जरूरत है। और इस बदलाव के बारे में बात करने के लिए जब मैं संपादकों के पास गया तो वे बड़े लोग बोले कि पहले आप २०-२५ साल काम करें तब मैं आपकी बात सुनूँगा। इसी छटपटाहट में मेरा इलाहाबाद ट्रांसपफर हो गया। इसी साल जनसत्ता निकला। इलाहाबाद में दिल्ली के अखबार शाम को बिकते हैं और हर शाम मैं तड़पा करता कि जनसत्ता दिख जाए। पहली बार एक हिन्दी अखबार ऐसा दिखा जो मॉडर्न डिजाइन से समृ( था। जिसका पफांट साइज बड़ा था। अपने पहले संपादकीय में प्रभाषजी ने द्घोषणा की हमने १२.५ साइज में इसे स्पेशली डिजाइन किया है कि लोग इसे पढ़ सकें। उसे पढ़ते-पढ़ते मुझे कई बार लगा कि मैं दिल्ली जा कर प्रभाष जी से मिलकर आऊँ। लेकिन मुझे लगा कि अगर मैं अखबार को बार-बार पढ़ता रहूँ तो मुझे सीखने का मौका अध्कि मिलेगा।
मिलने पर पता नहीं वह मुझे कितना समय दे पाएँगे? ३० साल बाद मैं यह बात ईमानदारी से स्वीकारता हूँ कि आज मैं जो कुछ भी हूँ, उसमें जनसत्ता, प्रभाषजी के विचारों और उनके लेखों का बहुत बड़ा योगदान है। उस समय तक संपादक संपादकीय पेज की गुणवत्ता को तो बनाये रखते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि यही पेज हमारी गुणवत्ता का प्रतीक है। लेकिन पहली बार एक तेवर की रिपोर्टिंग डेली अखबार में देखी गयी। आलोक तोमर जो यहाँ बैठे हुए हैं उनकी तमाम रिपोर्टें मुझे आज तक याद हैं। प्रभाषजी के दो चेहरे लगातार दिखते थे। एक हेडिंग आज तक याद है-'अजहर तेरा नाम रहेगा।' उस जमाने में बड़ा लोकप्रिय नारा था कि इंदिरा तेरा नाम रहेगा। इस नारे की लोकप्रियता को संपादकीय पृष्ठ पर पूरी गरिमा से भुना लेने की हिम्मत शायद प्रभाष जोशी में ही थी। यही नहीं अज्ञेय जी की मृत्यु पर अपने संपादकीय में लिखा 'मैं सन्नाटे का छंद हूँ, खुले जंगल की तरह बंद हूँ।' आज तक मुझे लगता है कि ये दो बड़े पाट और इन दो पाटों के बीच अगर कोई सतत प्रवाह संभव है तो प्रभाषजी के साथ है। उस दौर की एक खूबी यह थी कि इंदौर से आए एक संपादक राजेन्द्र माथुर ने बड़े तेवर वाली भाषा का इस्तेमाल किया था। प्रभाषजी के लेख और उसी समय राजेंद्र माथुर के लेखों को पढ़ते हुए और जीते हुए हम जैसे दूर बैठे लोगों को बहुत सीखने का मौका मिला। अपफसोस हिन्दी में रज्जू बाबू के जाने के बाद असामयिक तौर पर यह परम्परा समाप्त हो गई थी। उम्मीद है प्रभाषजी जब तक लिखेंगे गुणवत्ता के साथ लिखेंगे और हमारे जैसे तमाम एकलव्य सीखते रहेंगे।
अनुपम मिश्र- मुझे जिन चार व्यक्तियों ने बनाया उनमें से प्रभाषजी भी एक हैं। पहले मेरे पिता जी। दूसरे, गाँध्ी शांति प्रतिष्ठान के सचिव राधकृष्ण जी। उनके एक मित्रा बनवारी लाल चौध्री एक छोटी सी संस्था चलाते थे। उन्होंने हमें सिखाया कि कम पैसे में बड़ा काम कैसे कर सकते हैं और काम बड़ा होता जाए तो पैसा कम होता जाना चाहिए। यह आज की धरा से क्या, आज से ५० साल पहले की धरा से भी उल्टा काम था। चौथे भाई साब ;प्रभाषजीद्ध जिन्होंने मुझे लिखना सिखाया, वे मेरे जीवन में सन् १९६९ में आये। १०-१२ साल तो हमने कंध्े से कंध्े मिलाकर काम किया। कभी-कभी एक दिन में हम लोगों ने २० द्घंटे साथ काम किया था। उस समय उनको तनख्वाह ५०० मिलती थी और मुझे ३०० रुपये। उस समय प्रभाषजी पफोर स्क्वायर सिगरेट पीते थे और कभी-कभी हमें भी एकाध् पफुक्की मारने को दे देते थे। ५०० रुपये की तनख्वाह में भी वे राजा आदमी थे। ३०० रुपये की तनख्वाह में उनके साथ काम करते हुए जो हमने अमूल्य चीजें पाईं वो आज के सार्वजनिक गिरावट के दौर में हमें टिकाये हुए हैं। जो किताब मेरे हिस्से में आयी ;जब तोप मुकाबिल होद्ध उसकी लड़ाई उन्होंने प्लास्टिक के मामूली पेन से लड़ी। उस साधरण कलम से उन्होंने असाधरण लेख लिखे। जिन्हें हम लगातार पढ़ रहे हैं और कोट कर रहे है। प्रभाषजी शब्दों के मामले में सावधान लोगों में से हैं।
आज का दौर जब हिन्दी, चाहे वह अखबार की हो या टी वी की, बहुत बिगड़ी है, उसको ठीक करने के प्रति हम सबको ध्यान देना चाहिए, नहीं तो ऐसी बैठकों का क्या मतलब है। प्रभाषजी का 'कागद कारे' हम इतने सालों से पढ़ रहे हैं पर उन्होंने कागद कोरे भी बहुत सारे छोड़े हैं। वह कोरे कागद उनके जगह-जगह दिये हुए भाषण हैं, जो हर जगह नहीं छपे हैं। वे भाषण भी पढ़ने लायक हैं। उनके किसी एक भाषण की बात मैं आपको बताता हूँ। प्रभाषजी ने अपने उस भाषण में अकबर-बीरबल के 'पानी वाले हौद' का किस्सा बताया। हौद में एक-एक लोटा दूध् डालना था। बहुत भरोसे का जमाना था। सभी को भरोसा था कि मुझे छोड़कर सभी दूध् डालेंगे। आज उस भरोसे का दौर चला गया है। आज सबको पता है कि सब पानी डालेंगे अपन भी पानी डाल दें। प्रभाषजी ने कहा कि 'मुझे पता है सब पानी डालेंगे पर मैं दूध् डालना चाहता हूँ ताकि और कुछ न सही थोड़ा पानी दूध्यिा तो दिखेगा।' आप सब लोग जो यहाँ बैठे हुए हैं सभी में एक-एक लोटा दूध् डालने की क्षमता है, जो अर्पण कहलायेगा। उस दूध् के लोटे का अर्पण कीजिए अपने समाज को थोड़ा प्यार कीजिए। अपनी भाषा को थोड़ा चमकाइए। तब हम प्रभाष जोशी जैसे लोगों की चेन को टूटने नहीं देंगे।
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