| डॉ. अंजना संधीर |
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महानगर में एकाकीपन
धमधमाती रहती हैं सड़कें
कारों, बसों की दौड़ से
चलती रहती है यह दौड़, सुबह से पूरी रात तक
अपनी-अपनी कारें, अपनी-अपनी दौड़
जलती रहती हैं चौबीसों द्घंटे यहाँ बत्तियाँ
कोई किसी के रास्ते में नहीं आता
सब चलते रहते हैं बेजान
कृत्रिाम भाषा बोलते हैं
लेकिन सबको डालर से तोलते हैं
इस वैभव नगरी की दिव्य जगमगाहट में
बूढ़े किसी पार्क की बेंचों पर |
अकेले बैठे, सामाजिक सुरक्षा पफंड से
मिल रही पेंशन से पेप्सी खरीद अकेले पीते डूबे रहते हैं
कल के सपनों में जब वे डिस्को के मरी८ा थे
ते८ा रफ्रतार के आदी थे
तब किसी एक की कम्पनी पसंद न थी
आज किसी एक की कम्पनी को तरसते हैं
'मदर्स डे' 'पफादर्स डे' की साल भर राह देखते हैं।
वे अकेले ही जन्मे, अकेले ही दौड़े
उन्हें अब किसी का इंतजार नहीं
जानते हैं वे कि अंतिम संस्कार सरकार कर देगी
पिफर फ्रलैट में अकेले, रोज मौत के
सपने देखने से अच्छा है पार्क में बैठना...
दौड़ती जिंदगी को देखना और भूल जाना कुछ पल के लिए अकेलेपन को
हालाँकि भीड़ अकेलेपन को दूर नहीं करती
लेकिन लोग तो हैं जो चलते हैं, हँसते है
सीटी बजाते हैं, हलचल तो हैं
इन बूढी आँखों के लिए इतना ही कापफी है
द्घर के अकेलेपन से
भीड़ का अकेलापन ज्यादा अच्छा है
मरने से पहले मरने नहीं देता।
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| परदेस से माँ को पाती |
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रुई के छल्लों सी सपफेद बपर्फ
पड़ रही है
और आँखें भीग रही हैं
तुझे याद कर के माँ...
सात समुन्दर पार
चली आती हैं तेरी आँखें
मुझे दिलासा दिलाने।
ले बारिश हो रही है...
गर्मागर्म बेसन के पकौड़े खा
इतनी दूर तेरी आवा८ा
तेरी रसोई की खुशबू ले आती है माँ।
मैं अपने द्घर में ठीक हूँ, महारानी हूँ...
पर तेरा आँगन, कमरे, सीढ़ियाँ, तुलसी, अलमारियाँ
और मेरे आने की राह देखती
तेरी आँखें मुझे भूलती नहीं हैं
अब सुबह से शाम का इंतजार नहीं
बरसों का इंतजार करना
एक-एक दिन गिनना
मैं आऊँगी...
परदेसन का इंतजार करना।
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| पोइनसेटिया के पफूल |
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झड़ जाते हैं सारे पत्ते
एक-एक कर पेड़ों से
ठूँठ खड़े हो जाते हैं विरानी के दृश्य खड़े करने
पर... ठूँठ बने पेड़ों को भी चाँदी से
ढक देती है पफैला बपर्फ का आँचल माँ कुदरत
चित्राकार जैसे कागज पर रंगता है ठूँठ पेड़ों के
ऐसे ही सूखी डालियों पर चित्राकारी करती है बपर्फ से माँ प्रकृति
सूखे पेड़ दो रंगे हो जाते हैं उनके मूल रंग में
चमकता है चाँदी का रंग
चारों तरपफ की सपफेदी को भी रंगने के लिए
माँ प्रकृति ने बनाए सदाबहार होली ट्री
ताकि सपफेदी में भी हरियाली दूर-दूर तक दिखे
मानसिक रूप से बीमार न हो आदमी
देख-देख सपफेदी क्योंकि इन्हीं दिनों में
इन देशों में आती है क्रिसमस
अधिकतर काले लम्बे मोटे-मोटे ओवरकोट
और टोपियाँ पहने चलते हैं लोग
आदमी के काले या गहरे रंगों की पोशाक
और प्रकृति की सपफेदी में तालमेल रहे
इसलिए बपर्फ को भी रंगीन बनाती है
लाल, गुलाबी और सपफेद
पोइनसेटिया के पफूलों से माँ प्रकृति
क्रिसमस ट्री को छोटे-छोटे सतरंगे बल्बों से
सजाते हैं लोग
पर प्रकृति ऐसे में भी देती है
पोइनसेटिया के सुंदर पफूल जिन की पत्तियाँ
क्रिसमस की सुंदरता को और बढ़ाती है
छोटा पफूल और पफूलों से भी सुंदर
इसकी लाल, गुलाबी, सपफेद लंबी पत्तियाँ
बनाती हैं सतरंगी क्रिसमस
गुलदस्तों में दूर-दूर तक सजते हैं
ये पोइनसेटिया के पौधे
और जाते हैं तौहपफों के रूप में भी
खाली पेड़ों को देती है चाँदी
बपर्फ को देती है सदाबहार पेड़ों की हरियाली
और हरियाली को देती है
लाल, गुलाबी और सपफेद पफूलों की सुंदरता
भरती है व्यक्ति के जीवन में रंग
मदर नेचर पोइनसेटिया के रूप में।
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