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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
प्रभाष जोशी पर विशेष
भाषा और साहित्य

झुलसी हुई रोटी अरुण प्रकाश

अाजकल पत्राकारिता वाले साहित्य से स्वयं को दूर समझते हैं। साहित्य वाले भी स्वयं को पत्राकारिता से श्रेष्ठ समझते हैं। लेकिन निबंध में यह पफाँक महंगी पड़ेगी। इसलिए मौजूदा निबंधकारों में सर्वश्रेष्ठ चुनना हो तो मैं प्रख्यात पत्राकार प्रभाष जोशी को चुन लूंगा। जनसत्ता में हर सप्ताह कागद कारे स्तंभ में निबंध ही तो प्रकाशित होते हैं
प्रभाष जोशी अनौपचारिक निबंध भी लिखते हैं। ऐसे निबंध अधिकांशतः दैनिक जनसत्ता के साप्ताहिक स्तंभ 'कागज कारे' में प्रकाशित हुए हैं। स्तंभ लेखन में, लेखक चाहे तो, अनौपचारिक भी हुआ जा सकता है। अपना, पराया आख्यान मिलाया जा सकता है। इसीलिए प्रभाष जोशी ने अनगिनत


अनौपचारिक निबंध लिखे हैं--मूंगपफली ;मालवा में मूंगपफली को मूंमपफली कहते हैंद्ध से लेकर सीता की रसोई तक। सब जानते हैं कि अयोध्या में राम जन्मभूमि के साथ-साथ सीता की रसोई भी ध्वस्त कर दी गई। रामचंद्र गाँधी ;इनका निधन इसी जून २००७ मेंद्ध ने तो एक पूरी पुस्तक द्घी रसोई पर लिखी थी। प्रभाषजी सीता की रसोई नहीं, अपनी सीता की रसोई शीर्षक देते हैं। यहाँ बल 'अपनी' पर है। प्रसंग है कि श्रीमती जोशी कानपुर गई हुई थीं, इसी बीच उनकी रसोई अव्यवस्थित हो गई। वहाँ अड़ंग-बड़ंग बना। बर्तन भांड़े इधर-उधर हो गए। गंदगी ऊपर से बढ़ी। मिसेज जोशी लौटकर आने वाली हैं सो रसोई चमकाने में लगे हैं। 'मैं अपने द्घर की सिया को उसकी रसोई वैसी ही सौंपना चाहता था।' मित्रा गोविंद बहुगुणा सपफाई-उद्योग में लगे प्रभाष जोशी पर बीच में टपक पड़ते हैं--'क्या भाभी आने वाली हैं?' प्रभाष जोशी लिखते हैं : 'मैंने द्घर और रसोई का जो किया था और जिस भावना से किया था, वह सिपर्फ मेरे और पत्नी के बीच रहना चाहिए।' ...वह हमारी प्राइवेसी नहीं तोड़ रहा था। प्राइवेसी में अनुल्लंद्घनीयता तो होती है लेकिन वह पारिवारिक नहीं होती जो हमारी लोक-परंपरा में सीता की रसोई को मिली हुई है। 'यहाँ तक तो व्यक्तिगत प्रसंग है। सीता की रसोई से जुड़ी पवित्राता, पूजनीयता और लोक परंपरा राम मंदिर आंदोलन के परीक्षण का प्रस्थान बिंदु बन जाते हैं

इस अनौपचारिक निबंध की संरचना हूबहू वही है जो आदि निबंधकार मोंतेन अपनाते थे। व्यक्तिगत प्रसंग के बहाने सार्वजनिक प्रसंग। सीता की रसोई तोड़ने वालों के बारे में वे लिखते हैं : 'उनकी प्रेरणा प्रतिशोध है, लोक परंपरा की आस्था नहीं। इसलिए उन्होंने बाबरी मस्जिद ढाँचे और सीता की रसोई में कोई पफर्क नहीं किया।' मार्के की बात यह है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी टेक का इस्तेमाल करते हैं, प्रभाष जोशी नहीं करते। वे विषय में अंतर्निहित तत्व को मथकर बाहर निकालते हैं। इस अनौपचारिक निबंध का सबसे मार्मिक अंश देखिएः सीता की रसोई दरअसल हमारी लोक परंपरा में है। सीता की रसोई हमारे पारिवारिक जीवन का उत्स है। जो भी उस पर सिर टेकता है या चढ़ावा चढ़ाता है, वह अपने द्घर की रसोई को दैविक बनाता है। उसे सीता की मानकर उसे अन्नपूर्णा तत्व देता है--जिसमें नोन, तेल, लकड़ी और चूल्हे-चक्की जैसी रोजमर्रा की मामूली चीजें भी देवत्व पा जाती हैं। हम कहते हैं कि भगवान पत्थर में नहीं, हमारे अंदर हैं। मंदिर की मूर्ति भी तभी पूजनीय होती है जब उसकी प्राण प्रतिष्ठा कर दी जाए। यह प्राण-प्रतिष्ठा हमारी वह आस्था है जिसे हम पत्थर की मूरत में प्रतिष्ठित करते हैं। हम जिसे पूजते हैं वही ईश्वर है।'

औपचारिक निबंधों में अंतिम पंच लाईन का खास महत्व होता है। पाठक इसी के प्रभाव को रचना-यात्राा के बाद साथ ले जाता है। निबंध के अंत में लिखते हैं : 'सिया की उस रसोई को कोई कारसेवक नहीं तोड़ सकता। उसे मंदिर तोड़ने वाले हमलावर नहीं तोड़ पाए, न मस्जिद तोड़ने वाले रामभक्त तोड़ पाएँगे। वह हमारी लोक-आस्था में पारिवारिक जीवन की पवित्राता है--अक्षुण्ण, अलंघ्य और अजेय!'
चाहें तो भाषा-विज्ञान आधारित आलोचना वाले मित्रा पंच लाईन में प्रयुक्त विस्मयादि बोधक चिन्ह कि किसिक-किसिम के अर्थ निकाल सकते हैं। लेकिन पंच लाईन डालने का कोई नियम नहीं बनाया जा सकता। वस्तुतः अनौपचारिक निबंध में पंचलाईन निबंध की संरचना का तार्किक चरमोत्कर्ष होता है। आख्यान का प्रयोग करने वाले रूपबंधों पर यह लागू होता है।

हमारे दौर के सबसे महत्वपूर्ण निबंधकार प्रभाष जोशी ने अधिकांशतः अखबारों में लिखा जहाँ जन-संप्रेषण सर्वोपरि होता है। उन्होंने कितने निबंध लिखे, यह उन्हें भी याद नहीं है। हाँ, उनके निबंध आलेख और स्तंभ-लेखन दोनों स्वरूपों में मिलते हैं। उन्होंने कितनी सहजता से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संद्घ के वैचारिक आधार हिंदुत्व की अवधारणा पर ३२ पेजी भूमिका ;संदर्भित पुस्तकः हिंदू होने का धर्मद्ध वैचारिक निबंधों की लिखी है। वे संघ्ा को नापसंद करते हैं लेकिन पहले पैराग्रापफ में ही लिख देते हैं: 'संद्घनिष्ठ लोग तो कोई विचार स्वातंत्रय में पनपते नहीं। वे संद्घ संप्रदाय में बार-बार के बौ(कि से ठोस हुए लोग होते हैं और उनमें खिड़की-दरवाजे तो क्या दरारें भी खुली नहीं रहतीं जिनसे भिन्न विचार उनमें द्घुस सकें और उन्हें बदलने के लिए मना सकें। सही है कि विचार में विश्वास करने वाले आदमी को पिफर भी लगातार कोशिश करते रहना चाहिए कि ऐसे लोगों को भी खुले विचार के लिए प्रेम और सहानुभूति की कोमलता से खोलें।'

निबंध में तर्क की जिस जनतांत्रिाकता--यानी प्रामाणिक तथ्य, तार्किक संग्रहण और सटीक निष्कर्ष की जरूरत होती है वह निबंधकार में यांत्रिाक रूप में नहीं, ऑर्गेनिक यानी सहज रूप से होनी चाहिए। प्रभाष जोशी में यह है और खूब है। परिद्घटना की कई व्याख्याएँ हुआ करती हैं। उनमें अधिकांश रुटीन होती हैं लेकिन कोई-कोई व्याख्या विलक्षण भी होती है पर सहमतकारी हो यह जरूरी नहीं होता। प्रभाष जोशी में सिपर्फ तर्क की जनतांत्रिाक ही नहीं, एक अभियानकर्ता की सहमतकारी प्रणाली भी है। उदाहरणस्वरूप यह पंक्ति देखिए--'बाबरी मस्जिद मेरे लिए भारतीय मुसलमानों की ऐतिहासिक और अतिक्रमित धर्मस्थली ही नहीं थी, वह हिन्दुओं के धर्म, संस्कृति और सामाजिक परंपराओं की कसौटी थी।' यानी मस्जिद ध्वंस से तकलीपफ मुसलमानों को नहीं, हिन्दुओं को भी होनी चाहिए जो संसार के सामने अपनी ही बनाई कसौटी पर खरे नहीं उतर सके। अन्य विश्लेषक सारा पफोकस मुसलमानों पर रखते थे, प्रभाष जोशी सहजता से इंगित करते हैं--'शर्म हम हिन्दुओं को भी आनी चाहिए।'
वे धीरे-धीरे हिन्दुत्व की अवधारणा के स्रोत की ओर बढ़ते हैं। 'जिस हिन्दुत्व को भाजपा और संद्घ परिवार अपना मूल सि(ांत मानता है वह विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और रामकृष्ण परमहंस का हिन्दुत्व है। आपको याद होगा कि उनका हिन्दुत्व स्वामी विवेकानंद का बताया हुआ है। सरसंद्घचालक सुदर्शन भी हिन्दुत्व की बात करते हैं तो स्वामी विवेकानंद का ही नाम लेते हैं। वीर सावरकर का तो कोई नाम नहीं लेता।' इसके बाद पुस्तक हिन्दुत्वः हिन्दू कौन है? और इसके लेखक विनायक दामोदर सावरकर के जीवन प्रसंग, पुस्तक से जुड़े प्रसंग और हिन्दुत्व की अवधारणा के विश्लेषण से एक वैचारिक निबंध बना है। आश्चर्य यह है कि इस पूरे निबंध में व्यंग या कटाक्ष कतई नहीं है। इसमें निबंधकार का उद्देश्य हिन्दुत्व की अवधारणा की भर्त्सना करना नहीं, उसके उद्गम तक पहुँचना है जिसके लिए उद्वेगविहीन विवेक वैचारिक निबंधों की जान होती है। इसमें निजता को काबू में रखना होता है।

एक अन्य वैचारिक निबंध 'क्योंकि वे खुले बा८ाार के गुलाम हैं' में चित्राकार मकबूल पिफदा हुसैन हैं। उन्होंने दुर्गा, सरस्वती आदि के चित्रा बनाए थे। भोपाल के एक सज्जन ने इस पर वितंडा खड़ा कर दिया। हुसैन ने मापफी माँग ली। इसी पर यह निबंध है। यह वैचारिक निबंध है, पिफर भी इसमें कुछ व्यक्तिगत प्रसंग आए हैं क्योंकि वितंडा खड़ा करने वाले सज्जन ने स्वयं को प्रभाष जोशी का गुरु बताया था। लेकिन इन प्रसंगों के चलते इसे व्यक्ति केंद्री निबंध नहीं माना जा सकता। बहरहाल, यह वैचारिक विश्लेषण का अद्भुत उदाहरण है। ये पंक्तियाँ देखिए : 'पिफर अवतार हैं तो लीलाएँ भी हैं और भगवान के हर अवतार की लीलाएँ हैं जो निपट मानवीय हैं तो दैविक भी हैं। अवतारों और लीलाओं के जरिए भगवान को भक्त, आराधक और पूजक के इतना नजदीक ला दिया गया है कि वह सखा से लेकर सब कुछ हैं। इसमें भगवान का सहज मानवीयकरण है और मनुष्य को दैविकता दी गई है।

भगवान और उसे मानने वालों के बीच ऐसा सीधा और निजी संबंध किसी धर्म में नहीं है। इस्लाम और ईसाइयत में बिलकुल नहीं। इसमें भगवान भक्त से बिलकुल अलग हैं।' आगे वे लिखते हैं : 'हिन्दुत्व इस्लाम और ईसाइयत जैसे सभी धर्मों की प्रतिक्रिया में निकला है। वह सनातन धर्म की अंतर्निहित और अनिवार्य बहुलता, बहुआयामिता, उदारता और व्यक्तिगत स्वतंत्राता को उसी शंका से देखता है जिससे इस्लाम और ईसाइयत देखते रहे हैं।' तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि हुसैन ने सनातन भारतीय परंपरा का आह्‌वान करने के बजाए मापफी माँग ली। इस पर प्रभाष जोशी बेलाग राय देते हैं, 'लेकिन हुसैन मुंबई और पश्चिम के व्यावसायिक कला संसार के शोशेबा८ा खिलाड़ी हैं। इसलिए उनमें दम नहीं था कि प्रतिक्रिया और सांप्रदायिकता के सामने निष्ठा से डटे रहते। बाजार का आदमी आख़िर कम८ाोर होता है। खुले बा८ाार में वही गुलाम है।' यही वस्तुपरक निष्कर्ष इसे एक श्रेष्ठ निबंध बनाता है।

 
द एंड नहीं है यह उमाशंकर सिंह
 

एकाध साल पहले जब दिल्ली की हिन्दी अकादमी ने प्रभाष जोशी को अपने सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान 'शलाका' से नवाजा तो दबे-खुले स्वरों से यह पफब्ती कसी गई कि प्रभाष जोशी साहित्यकार कब से हो गए! वे तो महज पत्राकार हैं। अच्छे पत्राकार होंगे पर साहित्यकार तो बिल्कुल भी नहीं। पिछले छह साल से लगभग नियमित रूप से 'कागद कारे' पढ़ने वाले इस निगूरे कलमगो का भी पहले कुछ ऐसा ही मानना था। मगर 'कागद कारे' के सम्यक अध्ययन से प्रभाषजी को महज पत्राकार मानने वाले भ्रम जार जार हो जाते हैं। जिन किसी को भी प्रभाषजी के साहित्यकार होने का शक हो उन्हें 'कागद कारे' के इन संकलनों को पढ़ लेना चाहिए। खासकर के कागद कारे का 'धन्न नरबदा मइया हो' शीर्षक संकलन।

साहित्य में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो विभिन्न विधाओं के आपस में द्घुलने मिलने के इस युग में भी 'विशु( साहित्य' का राग आलापते रहते हैं। ऊपर के विचार ऐसे ही जीवन के बृहत संभागों से कटे साहित्यग्रस्त लोगों ने पिफतूर के रूप में उछाले थे। यह विरोधाभास ही है कि एक तरपफ आजकल साहित्य के पाट को पफैलाने की बात होती है तो दूसरी तरपफ उसकी शु(ता का राग 'रक्त की शु(ता' वाले भाव के साथ जपा जाता है। प्रभाषजी का कागद कारे साहित्य है मगर साहित्य की किसी खास विधा में पूरी तरह अंटता नहीं है। वह लेख है। संस्मरण है। ललित निबंध है या पिफर इस सबके मिलने से बनी कोई नई ही चीज जिसका नामकरण अभी होना है। प्रभाष जी 'ओटन लगे कपास' शीर्षक से अपनी आत्मकथा लिखना चाहते थे। जीवन ने उन्हें इसका अवकाश नहीं दिया। लेकिन कागद कारे में उनकी आत्मकथा के कापफी अंश आ गए हैं। रूप उसका भले ही कुछ हो। इस रूप में भी यह उनकी आत्मकथा के अभाव की पूर्ति भी है और उनकी दाय भी। भले ही यह एक व्यवस्थित और सिलसिलेवार आत्मकथा न हो। जीवन भी कहाँ पूरी तरह नियमतः व्यवस्थित और सिलसिलेवार होता है। पिफर उसकी माँग आत्मकथा से क्यों?

निजी जीवन, उसके अधूरेपन और अपने समाज, संस्कृति और पर्यावरण को समेटने वाले ममर्स्पशी आलेखों का संकलन है-'धन्न नरबदा मइया हो।' निजी प्रसंगों और बाह्य यथार्थ के दबावों के द्घर्षण से उपजी चमक इन आलेखों में सापफ दिखती है। प्रभाषजी के निजी जीवन के 'माताराम', 'भेनजी', 'मुनमुन' और 'लाल्टू' जैसे आदि पात्राों को लोग इसी खंड में संकलित कागद कारे के संस्मरणात्मक आलेखों से जानते हैं। गृहस्थ जीवन या स्पष्ट शब्दों में कहें तो अपनी पत्नी के जन्मदिन पर लिखा 'मुक्ति के कनेर के पीले पफूल' में जो उन्होंने गार्हस्थ जीवन के प्रति रागात्मकता दिखाई है वह केदारनाथ अग्रवाल और सर्वेश्वर के अपनी पत्नी पर लिखी मार्मिक कविताओं सरीखी है। अपने द्घर-समाज से दूर एक उद्देश्य लेकर वे दिल्ली आए। दिल्ली के स्वभाव, चरित्रा और समाज से उखड़ने की पीड़ा का ऐसा संश्लिष्ट उदाहरण दूसरा मुश्किल है। बिल्कुल 'साधो रहना नहीं यह देस बिराना है...'

के अंदाज में। आप खुद देखिए-'रज्जू बाबू ;राजेंद्र माथुरद्ध तो दिल्ली को गच्चा देकर चले गए। मैं रह गया अकेला इस रेगिस्तान में। दिन रात आँधी में बनते-बिगड़ते ढूहों के बीच। इस उम्मीद में कि अपनी जड़ों से टपकते खून को किसी दिन अपने निश्चय की गठरी में बाँधकर पिफर मालवा के किसी द्घर की काली मिट्टी में उन्हें उतार दूँगा। जहाँ से उन्हें पच्चीस साल पहले बड़ी बेरहमी और रुखाई से उखाड़ लाया था।' दिल्ली में उन्होंने अपने जीवन के सर्वाधिक साल तो बिताए पर यह जानते हुए कि यह उनकी नहीं होगी। बकलम खुद प्रभाषजी 'दिल्ली को चाहे जितनी बार जीता और रौंदा गया हो, यह जितनी बार बसी और उजड़ी हो यह न तो अपने विजेता की हुई न अपने रखवाले की। यह नगरी न सुहागन है, न रखैल, न विधवा। यह शाश्वत नगर वधू है। यह किसी की नहीं है जो इसका होना चाहे हो। लेकिन खातिर जमा रखे कि यह उसकी नहीं होगी। अपन दिल्ली को अपनी करने नहीं आए थे। अपन उसके होने के लिए भी नहीं आए थे।

अपन अपना काम करने आए थे। लेकिन आए हरि भजन को ओटन लगे कपास।... मैं कपास ओट रहा हूँ। कपास ओटना कोई हेय काम नहीं है। और कपास की पूनी, पूनी से सूत, और सूत से एक चादर मैंने बुनी है। मैं चाहता हूँ कि हरिभजन करते हुए चादर मेरा कपफन हो जाए। लेकिन दिल्ली की इस सराय में नहीं। मालवा के अपने द्घर में। सख्यिांवा द्घर सबसे न्यारा... जहं बिन ज्योति उजियारा।' यह मर्मस्पर्शी संस्मरण आज का नहीं है। आज से १६ साल पहले का है। उस वक्त प्रभाषजी जनसत्ता के संपादक थे और शिखर पर थे। पिफर उनका स्वर इतनी उदासी और निराशा लिए हुए क्यों है। शायद इसलिए क्योंकि '९ अप्रैल ९१ को राजेंद्र माथुर गए। सितंबर में शरद जोशी, देवास से कुमार गंधर्व चले गए।' अपने बीच के आत्मीय लोग एक-एक कर साथ छोड़ कर जाने लगें तो ऐसी उदासी और श्मशान वैराग्य लाजिमी है। खैर पराई और सौदाई होने की तोहमत झेलते हुए अगर वसुंधरा गाजियाबाद को दिल्ली का विस्तार मानें ताे इसी शहर में अंत तक प्रभाषजी कपास ओटते रहे। और खुद प्रभाषजी के ही भिन्न प्रसंग में कहे गए शब्दों में कहें तो 'कपास ओटना कोई हेय काम नहीं है।' प्रभाषजी पाँच नवंबर की रात को मृत्यु के आगोश में भले ही सो गए हों, पर मृत्यु का हौव्वा उन्होंने कभी नहीं माना। हालांकि उन्हें कई बार मृत्यु से साक्षात्कार सा हुआ। कई बार उनमें मृत्यु के प्रति सहज भय भी व्यापता रहा, पर कुछ देर भर के लिए। उसके बाद वे अपनी पुरानी रंगत में आ जाते रहे-मौत की ऐसी की तैसी। अभी तो बहुत जीना है और मर भी गया तो 'मरन नहीं है मेरा अंत' के भाव से वे लगातार मृत्यु को ललकारते रहे। उन्होंने लिखा है-

'कबीरदास को मरे कितने साल हो गए, पर उन्होंने कहा था हम न मरिहें संसारा। उनका मरना झूठ और कहना सच है। जब तक हिन्दी और उसे बोलने वाले हम लोग हैं तब तक भला कबीर मर सकते हैं?' प्रभाष जी के मौत के बाद कबीर के बारे में उनकी ही यह बात कुछ हद तक उनके संदर्भ में भी कही जा सकती है। जीवन ने उन्हें जो दिया वे सबका आनंद उठाते रहे। बिना शिकवा-शिकायत के। अपने मधुमेह और ब्लडप्रेशर जैसी बीमारियों की सालगिरह उन्होंने अपने जन्मदिन या शादी की सालगिरह की तरह मनाई। ३० मई १९९३ को वे लिखते हैं-'मधुमेह के साथ जीया जा सकता है। जीने की निर्द्वंद्व और भरपूर इच्छा होनी चाहिए। मैं परसों अपने मधुमेह की दसवीं वर्षगाँठ मना रहा हूँ। शक्कर नॉर्मल है। गोली भी खा लेता हूँ। और ज्यादा नहीं बीस साल जीना चाहता हूँ।' बीस न सही पर जीवन ने इसके बाद उन्हें १५ जिंदगानी से भरपूर साल दिए। प्रभाष जी वैसे अंतिम पत्राकारों में हैं जिनका साहित्य में भी लगभग पत्राकारिता के बराबर ही दखल है। यह दुखद है कि हिन्दी में अब वैसे पत्राकार कापफी कम हैं जिनकी इन दोनों विधाओं के बीच सहज आवाजाही हो। प्रभाषजी की पत्राकारिता को साहित्य बनाने वाली एक और चीज थी-वह था उनका लोकवादी स्वरूप। उन्होंने पत्राकारिता में लोक को शास्त्रा के ऊपर स्थापित कर दिया। शास्त्रा को इग्नोर नहीं किया। पर 'पोथी पढ़कर जग मुआ' टाइप से भी पोथी को नहीं पढ़ा।

शास्त्रा ने अपने को समृ( किया पर लोकपुरुष बन कर ही। आज पत्राकारिता में न शास्त्रा का सम्मान है और न लोक गुण। मगर लोक के प्रति आग्रह है और इसे प्रभाष जी की देन के रूप स्वीकार किया जाना चाहिए। जहाँ लोक के प्रति आग्रह भी नहीं है वहाँ पत्राकारिता सूचनाओं और सौदाओं का नीरस व्यापार बनकर रह गया है।
प्रभाषजी अपने बारे में अपने ही एक दिवंगत मित्रा शायर के शब्द लेके कहते हैं-'ये तो पिफतरत है जहाँ होते नुमायाँ होते, हम समंदर में भी होते तो तूपफाँ होते।' प्रभाषजी के अंग्रेजी के प्रिय कवि टीएस इलियट ने कभी मृत्यु के बारे में कहा था-'माई एंड इज माई बिगनिंग।' प्रभाष जी की मृत्यु उनकी बिगनिंग न हो, पर एंड तो नहीं ही है।

 
 
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