दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
चिट्ठी आई है
प्रायोजित नहीं है यह अंक
संजीव पर केंद्रित अंक अति महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह प्रायोजित नहीं है। इसकी प्रामाणिकता और प्रकाशन औचित्य इसलिए असंदिग्ध् है। इसमें संजीव का कृतित्व व व्यक्तित्व समग्र रूप से उभरा है, उनका द्घर, आजीविका और लेखन के हर मोर्चे पर अडिग संद्घर्ष भी। साथ ही उनकी अदम्य लेखकीय जिजीविषा भी। राजेन्द्र यादव के नाम पत्रा, स्वयं प्रकाश, शिवमूर्ति, सृंजय, प्रेमपाल शर्मा के संस्मरण तथा विश्वनाथ त्रिापाठी व गोपेश्वर सिंह के आलेख और लेखक का साक्षात्कार अंक के खास व जरूरी

हिस्से हैं। संजीव की दी गयी छः कहानियाँ लम्बी उम्र की कहानियाँ हैं। 'आरोहण' अति विशिष्ट है। कतिपय बड़े आलोचकों का यह कहना कि संजीव की रचनाओं में लेखन पूर्व किए गए उनके होमवर्क का झलक आना एक दोष है, वास्तव में उनकी अनदेखी करने के अपने अपराध् को ओट देना है। कृतियों की भाषा, स्थान विशेष की मुकम्मिल जानकारी कृतियों को परिवेशगत लोकल टच तो देती हैं ही, उनके किसी अवयव में झोल व कमजोरी भी नहीं रहने देती हैं।
हृदयेश, शाहजहांपुर, उ.प्र.

 
और हाशिए पर ध्केलने की कोशिश
 

'पाखी' का अक्टूबर ०९ अंक पढ़ा। आपने 'मेरी बात' के अंतगर्त एक बहुत ही पते की बात कही है कि अपनी कुंठाओं, अपनी भड़ास को उगलकर हमारे बु(जिीवियों ने एक प्रकार की सड़ांध् चारों तरपफ पफैला रखी है। जिसे देखो दूसरे के चाल-चलन पर टिप्पणी करने में जुटा है। मगर यहाँ सवाल यह उठता है कि ये टिप्पणी करने वाले कौन और किस वर्ग और समुदाय के हैं। ऐसी ही एक कुंठित टिप्पणी इसी अंक में चिट्ठी के रूप में प्रकाशित हुई है। जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ भगवानदास मोरवाल की। ऐसा अचानक हमारे हिन्दी समाज में यह कैसी प्रवृत्ति द्घर करती जा रही है कि चुपचाप एक से एक श्रेष्ठ कृतियाँ देने वाले लेखक इन टिप्पणियों और उपेक्षाओं का शिकार हो रहे हैं। जहाँ तक मेरी जानकारी है इनका शिकार हिन्दी के दो महत्वपूर्ण कथाकार-उपन्यासकार संजीव और भगवानदास मोरवाल जैसे समर्थ लेखक हो रहे हैं। यह सर्वविदित है कि ये दोनों कथाकार आज पाठकों के बीच सर्वाध्कि लोकप्रिय स्वीकृत लेखक हैं। यहाँ एक तथ्य को मैं रेखांकित करना चाहता हूँ कि ये दोनों लेखक संयोगवश आदि शिल्पकार अर्थात प्रजापति ;कुम्हारद्ध समुदाय से हैं। दोनों लेखक विवादों, वितंडों, वादों और परनिंदा जैसे दुर्गुणों से कोसों दूर हैं। अगर ये दोनों एक से एक बेहतर कृतियाँ देकर हिन्दी कथासाहित्य को समृ( कर रहे हैं, तो हमें इनका कृतज्ञ होना चाहिए। परंतु लगता है सवर्णवादी ब्राह्मणवादी वर्ग विशेष की कोशिश इन्हें पहले से पड़े हाशिए से और हाशिए पर ध्केलने की हो रही है। इस पत्रा से ऐसा लगता है मानो हिन्दी साहित्य शराब के बल पर चल रहा है। जहाँ तक भगवानदास मोरवाल को पिछले कुछ महीनों में दो महत्वपूर्ण सम्मान/पुरस्कारों का सवाल है, खासकर 'अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान' और शब्द साध्क जूरी सम्मान की, तो इनकी ;इसके साथ में कथाक्रम सम्मान को भी जोड़ना चाहूँगा।द्ध चयन प्रक्रियाओं से सभी परिचित हैं। शब्द साध्क जूरी सम्मान के जूरी के सदस्यों के रूप में तो हिन्दी साहित्य के तीन दिग्गज डॉ. नामवर सिंह, श्री राजेन्द्र यादव, और डॉ. विश्वनाथ त्रिापाठी थे। 'रेत' का चयन इन्होंने ही किया। यह भी एक संयोग है कि इन तीन महत्वपूर्ण सम्मान/पुरस्कार में से दो ;इंदु शर्मा कथा सम्मान व कथाक्रम सम्मानद्ध इन दोनों कथाकारों को प्राप्त हो चुके हैं। हमें व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के बजाय लेखक के रचनात्मक अवदान पर बात करनी चाहिए। आपके संपादकीय से जरूर हमारे बु(जिीवी अपने आपको शर्मसार महसूस करेंगे, ऐसी मैं उम्मीद ही कर सकता हूँ।
ओमपाल सिंह, महिपालपुर, नई दिल्ली.

 
पाठक को विचलित करने की क्षमता
 
'पाखी' सितम्बर ०९। इस समय के महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय कथाकार संजीव पर केंद्रित अपूर्व एवं प्रशंसनीय आयोजन के लिए बधई। उनकी 'अपराध्' कहानी ने मुझे उनके लेखन के प्रति ऐसा सम्मोहित किया कि उससे अब तक मुक्त नहीं हो पाया हूँ। 'अपराध्' सारिका कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत हुई थी और उसने कथाकार संजीव की टीआरपी ऐसी बढ़ाई कि बस चारों ओर उन्हीं का जिक्र होता। सन्‌ १९८० का सारिका का वह अंक मैंने सहेज कर रखा था। पिफर धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान जहाँ भी संजीव नजर आते, पढ़ना जरूरी हो गया। उन्हीं वर्षों में सृंजय बीकानेर आए। ;'कामरेड का कोट' कहानी तो उन्होंने बहुत बाद में लिखी एवं कथाकार के रूप में चर्चित हुएद्ध। वे कथाकार साथी मालचंद तिवाड़ी से मिलने श्रीड़ूंगरगढ़ गए थे, पिफर बीकानेर आए। रात को मेरे यहाँ ही ठहरे। देर रात तक संजीव के बारे में ही मैं जानकारी लेता रहा। उनकी दिनचर्या क्या है, कहानी लेखन से पूर्व वे इतनी शोध्-खोज कैसे कर लेते हैं, कुल्टी कैसी जगह है, कैसा व्यवहार है उनका? सृंजय पूर्णतः संजीव के रंग में रंगे हुए थे। विस्तार से बताते रहे- संजीव भाई ये करते हैं, वो करते हैं...और विस्मित भाव से मैं सुनता रहा। सृंजय का उनके संबंध् में लिखा संस्मरण 'स्क्रैप और स्क्रिप्ट के बीच खड़ा एक आदमी' इसका साक्ष्य है कि वे किस भांति संजीव के रंग में रंगे हुए हैं आज तक। सचमुच संजीव का सृजन ही ऐसा है कि वह पाठक को विचलित किए रहती है, वह लम्बे समय तक उससे मुक्त नहीं हो सकता। संभवतः वे अकेले ऐसे कथाकार हैं जो शोध् करके कथा सृजन करते हैं, तब ही सर्कस, भिखारी ठाकुर पर केंद्रित उपन्यास 'सूत्राधर', 'सावधन नीचे आग है', 'आरोहण', 'डेढ़ सौ सालों की तन्हाई', 'डायन', 'प्रेतमुक्ति' जैसी बेजोड़ अविस्मरणीय कृतियाँ हमें दे पाए हैं।
दिल्ली को संजीव जंगल मानते है और इस अंक के आलेखों में उनके दिल्ली आवास का जो नक्शा खींचा गया है, वह उनके प्रिय पाठकों को भी हताश-उदास बना देता है। तल्खी से संजीव इस द्घर व दफ्रतर के बारे में कहते हैं,' ये है मेरा द्घर। इस द्घर और मेरे 'हंस' के दफ्रतर, जहाँ मेरी कोठरी है, वहाँ हवा-रोशनी नहीं आती।' कुल्टी से निकलने के बाद वे हवा-रोशनी विहीन इस द्घर में रहने को विवश हैं। किंतु राकेश श्रीवास्तव ने अपने आलेख में बताया है कि संजीव ने अपनी जन्मस्थली बांगर कला, कुम्हार टोली में नया द्घर बनवाया है, आलेख के साथ उस द्घर का चित्रा भी है। गाँववासी उम्मीद लगाए हैं कि उनके गाँव का नाम रोशन करने वाला कथाकार जल्दी ही सपरिवार आएगा और इसमें रहेगा।
संजीव जी से उनके जन्म से लेकर दिल्ली प्रवास, साहित्य-सृजन आदि सभी विषयों पर सार्थक बातचीत की और बातचीत में उन्होंने गाँव चले जाने का संकेत इन शब्दों में दिया भी कि 'पफैक्ट्री ;कुल्टी कीद्ध बंद होने के बाद मैं यहाँ ;दिल्लीद्ध आ गया पिफर बीमार पड़ गया। पिफर गाँव चला जाउफँगा...।' दिल्ली में उनके व परिजनों के रहने के दर्द को आप जानते हैं इसलिए उनसे पूछा जाना चाहिए था कि उन्होंने इसीलिए अपने गाँव बांगरकला में द्घर बनवाया है क्या, कि वहाँ कब शिफ्रट होने की योजना है, कि क्या उनकी पत्नी भी यही चाहती हैं, कि वहाँ शिफ्रट होकर द्घर खर्च के लिए कौन सा काम-धम करेंगे? क्योंकि यह कड़वी सच्चाई है कि सिपर्फ और सिपर्फ लेखन ;वह भी संजीव की भांति स्तरीयद्ध के बल पर द्घर-परिवार नहीं चला सकता कोई हिन्दी लेखक। यदि सम्मानजनक रॉयल्टी, मानदेय रचना पर मिलता तो क्यों संजीव ;उनके जैसा पूर्णतः समर्पित लेखकोंद्ध को विवशता में नौकरी करनी पड़ती और क्यों अस्वस्थ रहना पड़ता? उनके पुत्रा और पुत्रिायों का साक्षात्कार भी आना चाहिए था क्योंकि उन्हें स्वयं को इस बात का अपफसोस है कि वे अपनी संतानों को सही तरह से नहीं पढ़ा सके।
बुलाकी शर्मा, बीकानेर, राजस्थान
 
लट्ठ बजाने में मशगूल साहित्यकार
 

'पाखी' अक्टूबर में भाई रत्नकुमार सांभरिया का प्रेमचंद को लेकर आलेख 'मंत्रा, दलित और सांप्रदायिकता' को पढ़कर दुख हुआ। रत्नकुमार अपनी उदार छवि के लिए जाने जाते कथाकार हैं। मगर लगता है कि मोर्चे खोलने की विध में वे भी पीछे नहीं रहना चाहते हैं। अपनी लकीर उफँची करने की जगह अतीत की लकीर पर प्रहार कर इसे छोटा या हीन दिखाना चाहते हैं। साहित्य में प्रेमचंद को लेकर लगातार लट्ठ बजाने में मशगूल साहित्यकार इससे क्या अमर हो जाएँगे? माना कि प्रेमचंद दलित या गैर हिन्दू के पक्षध्र नहीं थे। इससे क्या सि( होगा? भ्रम, भ्रम को नहीं तोड़ पाते हैं। कहानी 'मंत्रा' के जरिए रत्न भाई प्रेमचंद को हिन्दू सभाई सि( करने में लगे हैं तो 'शतरंज के खिलाड़ी' लिखने पर उन्हें साम्प्रदायिक सि( करना चाहते हैं। कहानी 'मंत्रा' एक कमजोर कहानी जरूर कही जा सकती है। मगर आत्मपरिवर्तन व नपफरत को पाटने वाली भी कही जा सकती है। गुड़ खाएँ पर गुलगुलों से परहेज, कहावत पर वार करती है। आडंबर पर आक्रमण करती है। 'शरतरंज के खिलाड़ी' में दो नवाबों की आकंठ बुरी आदतों का चित्राण है। वक्त को दर्शाने वाली कहानी कहा जा सकता है उसे न कि सांप्रदायिकता पफैलाने वाली रचना। प्रेमचंद अगर सांप्रदायिक भावना के शिकार होते तो उनकी ३२० कहानियों में से ३०० तो उस भाव की पुष्टि करती। ऐसे में क्या वे 'पंचपरमेश्वर' या 'ईदगाह' जैसी कहानियाँ लिख पाते? एक कहानी 'स्त्राी-पुरुष' में वे कहते हैं-'सूरत नहीं आत्मा को देखो, इस आत्मा की पकड़ या पहचान शायद स्वार्थ की आँख नहीं कर सकती है।' हिन्दू धर्म में साध्ुओं को लेकर तब प्रेमचंद हास्यपूर्ण कहानी गुरु मंत्रा की रचना नहीं करते। मिष्ठानों की चाह चिंतामणि को साध्ू वेष धारण करने पर मजबूर कर देती है। चिंतामणि को एक साधु की जयकार सुनाई दी, चल, चल, जल्दी लेकर चल, नहीं तो अभी करता हूँ बेकल! दूसरे साध्ू ने कड़ाका लगाया, आ-रा-रा-धम, आय पहुँचे हम, अब क्या है गम। तीसरे साधु ने गरजकर कहा, देश बंगाल, जिसको देखा न भाला, चट पट भर दे प्याला! तब चिंतामणि ने कड़ककर कहा, न देगा तो चढ़ बैठूँगा। सुनकर साध्ुजनों ने चिंतामणि की अभ्यर्थना की मगर गांजे की एक दम न लगा सके चिंतामणि!
क्या गुरु मंत्रा जैसी कहानी लिखकर प्रेमचंद हिन्दू विरोधी हो गए? प्रेमचंद की कलम अस्पृश्यता विरोध्ी थी, सांप्रदायिकता विरोध्ी थी, नारी शोषण विरोध्ी थी और स्वराज्य की चेतना से भरपूर थी। यह बात दूसरी है कि उनकी विचारधरा की बहक कापफी ज्यादा कहानियों को कमजोर कर गई। जरूरत है कि डॉ. आम्बेडकर से बढ़कर कोई डॉ. अम्बेडकर आए और गाँधी जैसा गाँध्ी व अब्दुल कलाम आजाद जैसा व्यक्तित्व। निरर्थक अतीत पर झाड़ू मारी जा चुकी है। वर्तमान को संभालना हमारा कर्तव्य है जिससे बेहतर भविष्य बने। इस बाजारवादी संसार में अगर कोई अपने को बचा सके वही बहुत हैं अन्यथा लाश पर जूता पफटकार कर निकलने वाले बहुत आएंगे और बहुत है। अपनी ही जाति को जगाने के लिए बहुत ने अपनी जाति की बुराइयों को उजागर किया है। क्या उन्हें दलित विरोध्ी कहेंगे? भाई रत्नकुमार से अनुरोध् है कि वे आत्मा में ढालकर कहानियाँ लिखें, ओछी राजनीति में न पड़े।
विजय, नोएडा, गौतमबु(नगर

 
कबीर की आत्मा संजीव में
 

सितम्बर की 'पाखी' ने मुझे दो बार चौंकाया, बुकस्टाल पर इसके मूल्य ने और द्घर पर इसकी संपूर्णता ने। कहना न होगा कि दूसरा कारण पहले पर भारी रहा। संजीव को मैंने पहले भी पढ़ा है। प्रभावित भी थी। परिचय 'पाखी' ने कराया। ध्न्यवाद। इच्छा हुयी जन्म-जन्मान्तर की थ्योरी को मान ही लूँ। क्या पता कबीर की पफक्कड़ आत्मा अकुलाकर संजीव में आ गयी हो। वही अक्खड़पन द्घर जारने का साहस और सच बोलने का दुःसाहस कहाँ मिलता है अब ऐसा कम्बीनेशन। पर इस द्घोर आर्थिक युग में सीध्ी सपाट सहुलियत की राह छोड़कर तलवार की धर पर चलने के दुराग्रह के विरू( प्रभावती जी की शिकायत भी जायज लगी। तथ्यात्मकता को तरजीह देने का इल्जाम भी सर माथे पर। इतने प्रयासों के बावजूद जब ईश्वर आजतक एक सम्पूर्ण निर्दोष व्यक्ति की रचना में कामयाब नहीं हो पाया तो अदना से इंसान से कैसे उम्मीद की जाय शु( लेखन और व्यवहारिकता जैसी विरोध्ी कसौटियों पर एक समान खरा उतरने की? सीध्ी उँगली और द्घी की कामना मात्रा कपोल कल्पना है। हमारे इध्र एक कहावत प्रसि( है-'गाँव के लेल ओझा बताह ओझा के लेल गाँव बताह', सो मेरी राय है कि इस शख्स को बख्श दिया जाए।
आपकी 'पाखी' ने साहित्य के सन्नाटे को तोड़ा है। इसकी गुणवत्ता बनी रहे इसलिए शिकायतों पर गौर पफरमाना जरूरी है। अगस्त अंक में 'गोबरछत्ता' के तुरंत बाद 'पैरामीशियम' जैसी सतही रचना आपने कैसे छापी? उफँचाई से एकाएक गिरने पर चोट लगती है। पिछले किसी अंक में भी पुनरावृति दोष से बोझिल सोनी सिंह की कहानी? पढ़कर मन भन्ना गया। सृष्टि की श्रेष्ठतम रचना का ऐसा अपमान। ईश्वर उन्हें क्षमा करें। व्यक्तिवाचक आत्मकथात्मक संस्मरण होता तो और बात थी। शायद साहित्य में भी विलेन का होना अनिवार्य होगा हीरो की प्रतिष्ठा के लिए। इसलिए खैर।
माया प्रसाद, मुजफ्रपफरपुर

 
मानकों पर खरी
 

सर्वप्रथम सृजन की उड़ान यानि 'पाखी' की नियमित विकास यात्राा पर बधई। एक दिन एक दुकानदार के यहाँ 'पाखी' का अंक हाथ लगा। आद्यान्त पूरा पढ़ गया। एक अंक पढ़ने के बाद अगले अंक को पढ़ने की लालसा बढ़ती गयी। इस समय मेरे हाथों में जुलाई ०९ अंक है, अब तक पाँच अंक पढ़े और सुरक्षित रखे हैं बल्कि वे कई मित्राों तक द्घूम चुके हैं। यह पत्रिाका पत्राकारिता के क्षेत्रा में विशेषकर साहित्यिक पत्राकारिता के क्षेत्रा में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है और पत्राकारिता के मानकों पर खरी उतर रही है। इसका बाहरी आकार, रूप एवं सज्जा संतुलित एवं आकर्षक है। कहानियाँ, कविताएँ और ग़८ाल बहुत सराहनीय हैं। 'नवगीत के जनबोध की हकीकत' पर नचिकेता ने बड़ी बारीकी से विश्लेषण किया है। समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर पवन करण पर भरत प्रसाद का लेख बहुत उत्साहवर्(क बना है। हिमांशु शेखर ने मीडिया की पोल खोलकर उसकी संकीर्ण एवं दिखावटी मानसिकता की बखिया उध्ेड़ उसे आईना दिखाया है। प्रेम भारद्वाज ;माँ ने कहा थाद्ध की कलम से निकला एक-एक शब्द अन्तर्मन को बेध् गया। कितनी सरलता से २१वीं सदी के लाईपफ स्टाइल को संजीदगी से पेश किया है। वास्तव में यही मानसिकता विकराल रूप लेती जा रही है, हम आगे बढ़ रहे हैं और अपनी माँ पीछे छूट रही हैं। सूर्यबाला की मध्ुर स्मृतियाँ विष्णु प्रभाकर के उद्यमी एवं मानवीय व्यक्तित्व को स्पष्ट करती हैं। लद्घुकथाएँ विशेषकर 'कांवड़िया' और 'दूध्' बहुत अच्छी लगीं।
अशोक कुमार शोधर्थी, हरिद्वार, उत्तराखण्ड

 
कहानियाँ दिल को छू गईं
 
'पाखी' का जुलाई अंक मिला। आपकी पत्रिाका ने दिल को छू लिया, विशेष तौर से कहानियों ने। जहाँ 'चाबी' में लेखक ने अपने सम्पूर्ण जीवन का अनुभव निचोड़ दिया, उन्होंने कुछ भी ना कहकर सब कुछ कह दिया, वहीं 'मध्यवर्ती प्रदेश' में कविता ने कुछ अलग सा लिखकर सचमुच हैरान कर दिया। इतने भरे-पूरे परिवार में भी कोई व्यक्ति इतना अकेला सा हो, इसकी कल्पना कर पाना मुश्किल है। 'एक था आदमी' में जिस तरह ये दर्शाया गया है कि आपको भी भेड़-चाल में शामिल होना ही पड़ता है, आपके विचारों के मायने, किसी और के समक्ष शून्य होते हैं, वाकई काबिले तारीपफ है। 'सुरसुरूंग गढ़ा' में लाचारी और सच्चाई को मौलिकता से प्रस्तुत किया है। 'शरीपफ लोग' का अंत मन को भा गया। 'जमाना बदल गया' में नई दुनिया के जीवन की मौलिकता बहुत अच्छी लगी। लद्घुकथाएँ भी आकर्षक थीं।
शिखा कोठियाल, देहरादून, उत्तराखण्ड
 
कहानियों को पर्याप्त स्थान
 

'पाखी' के प्रवेशांक से लेकर अभी तक लगभग सभी अंक देखे हैं। प्रवेशांक में ताजी रचनाओं के साथ भालचंद्र जोशी की बासी कहानी 'लौटा तो भय' को देखकर अटपटा लगा था। प्रतिक्रिया भेजना चाहता था परंतु समय के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाया और समय निकल गया।
अगस्त २००९ अंक हाथ में है। कहानियों को पर्याप्त स्थान दिया जा रहा है, जो 'पाखी' की पठनीयता को बढ़ाता है। इस अंक में दो महिला कथाकरों की कहानियाँ हैं जिनमें दोनों महिला पात्रा पर-पुरुषों की अंतरंग सामीप्य बेहिचक चाहती हैं और प्राप्त भी कर लेती हैं। चाहे 'और अंत में एक बारीक सा पर्दा' की समर्थ वैशाली हो या 'पैरामीशियम' की असमर्थ कमली। दोनों पर-पुरुष के अंतरंग सान्निध्य से अपने तन और मन की शक्ति को बढ़ाना चाहती हैं। सुभाषचंद गांगुली की 'पत्नी की तस्वीर' द्घर में बढ़ आए बाढ़ के पानी से जूझते बूढे़ गोपीबाबू की कहानी है जो अपनी स्वर्गीय पत्नी की एक मात्रा तस्वीर को ढूँढ़ने में रात बिता देते हैं, जो उनके लिए वास्तव में दुलर्भ थी। यह तस्वीर एक सपफल चित्राकार की पेंटिंग थी जो किशोर अवस्था में उनकी पत्नी को चाहता था। शादी सिपर्फ इसलिए नहीं हो पाती कि उसके पास सरकारी नौकरी नहीं थी। उसे कहीं से पता चलता है कि गोपीबाबू अपनी पत्नी की एक तस्वीर के लिए बेसब्री से तलाश में है। चित्राकार ने एक पत्रा लिखकर उन्हें दिल्ली में आमंत्रिात किया था कि वे स्वयं आकर तस्वीर ले जाएँ। गोपीबाबू की अनेक शंकाओं को शांत करते हुए भेंट की थी और यह कहा था कि मैंने आपकी पत्नी को आखरी बार १५-१६ की उम्र में देखा था। कल्पना के आधार पर पेंटिंग प्रौढ अवस्था की बनाई है यदि आपकी पत्नी से मिलती जुलती है तो ले जाइए। यही एक पेंच कहानी को रोचक बनाता है। सुशांत सुप्रिय की 'मैं कैसे हँसूं' में इतने दर्दनाक सवालात हैं कि सचमुच हँसना बहुत कठिन है। संजय कुमार सिंह की 'गोबरछत्ता' ऐसे प्रेम की लंबी कहानी है, जो पराकाष्ठा पर पहुँचता है और नियति के कारण नीचे गिरता है। ज्यादा उफँचाई से गिरी चीज ध्ड़ाम से जमीन पर गिरती है तो चकनाचूर होती है। कहानी की बुनावट में कसावट है।
बृजमोहन, झांसी, उ.प्र.
 
लेखक होने का मूल्य
 
'पाखी' सितम्बर ०९ संपादकीय 'हाँ, इतना अवश्य कह सकता हूँ कि गुटों मठों ...खरे उतरे हैं।' और पहला ही पन्ना ;चिट्ठी आई हैद्ध 'इसमें गाजियाबाद और आसपास के लेखकों का जमावाड़ा है।' संभव है प्रथम पत्रा में वर्णित साहित्यकारों ने 'पाखी' को मात्रा एक वर्षीय बालिका समझ रचनाएँ न भेजी हों। इस संग्रहणीय अंक में कटु आलोचना के पत्रा को पुरस्कृत करना प्रकाशकीय महानता का द्योतक है। 'लेखक कायर होता है' नौकरी बचाने के लिए वह मापफी माँगता है, सेंसरशिप का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करता है, अर्थ अभाव से पीड़ित, दयनीय और प्रकाशकों से शाोषित भी होता है। सुदृढ़ वित्तीय स्थिति वाला ही पूर्णकालिक लेखक हो सकता है। उपन्यास, कहानी संग्रह, कविता संग्रह लिखे, अपने पैसों से छपवाये, अपने डाक व्यय से देश के पाठकों को भेंट स्वरूप भेजे, एक आयोजन स्वयं के व्यय पर कर विमोचन करवा ले, समीक्षक से समूल्य समीक्षा करवा ले और किसी पत्रिाका या पत्रिाकाओं को अनुदान देकर समीक्षा प्रकाशित करवा ले। वरना तो जैसा कि इस पत्रिाका में शिवमूर्ति ने लिखा है-रेणु का परिवार केवल लेखक होने का मूल्य चुका रहा है, संजीव के परिवार ने भी लेखक होने का मूल्य कमोबेश चुकाया। संजीव पर केंद्रित यह अंक पाठकों को उपहार है।
बृजमोहन श्रीवास्तव, गुना, म.प्र.
 
सत्ता एवं मठों से असंब(
 
सितंबर की 'पाखी' पढ़ी। कथाकार संजीव पर केंद्रित अंक की आद्यांत पढ़ा। हंस, वागर्थ के बाद एक वर्ष में ही आपकी पत्रिाका समकालीन रचनाशीलता से संवाद स्थापित कराने में सक्षम है। प्रो. नामवर सिंह, प्रो. गोपेश्वर सिंह, डॉ. विश्वनाथ त्रिापाठी, राजेंद्र यादव के आलेख कापफी गंभीर एवं रोचक लगे। गुंजन कुमार की संजीव की पत्नी से बातचीत पढ़कर कापफी अभिभूत एवं भावुक हो गया। इस अंक को देखकर अन्य साहित्यिक पत्रिाकाओं को भी सबक लेना चाहिए। सत्ता एवं मठों से असंब( रहने वाले संजीव पर विशेषांक प्रकाशित करने के लिए बधई।
जयपाल सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
 

सच लिखना बौ(कि विवशता

 
आपके कुशल निर्देशन में प्रकाशित हिन्दी मासिक पत्रिाका 'पाखी' सितंबर ०९ अंक पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रसि( रचनाकार संजीव पर केन्द्रित इस अंक को इस युग का प्रामाणिक दस्तावेज माना जाएगा। संजीव के जीवन की कई द्घटनाओं व उनके उच्चकोटि के लेखन विषयक आपने जो प्रामाणिक जानकारियाँ छापी उसके लिए प्रत्येक हिन्दी भाषा-भाषी, विद्यार्थी-शोधार्थी व पाठक आपका हृदय व आत्मा से आभारी है। यह अंक आने वाली हिन्दी पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज होगा। काव्य विभाग में भी हृदय को छू लेने वाली कविताएँ पढ़कर लगा कि आज हिन्दी भाषा अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ विश्व की सिरमौर भाषा बन रही है। मैं ७३ वर्षीय सेवा मुक्त संस्कृत विभागाध्यक्ष हूँ। कापफी कुछ पढ़ा, लिखा व शोध् किया लेकिन 'पाखी' में जो पाया वह बहुत कम ही मिला। मैं भाट, चारण या चापलूस नहीं हूँ। लेकिन सच लिखना मेरी बौ(कि विवशता है।
पं. ओम प्रकाश शर्मा भारद्वाज, इंदौर, म.प्र.
 
 
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