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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
गीत/ग़ज़ल
दिनेश सिंदल
  दिनेश सिंदल


जागती आँखों के थे सपने छुपाने में लगे
यानी हमको याद करके वो भुलाने में लगे

आपने पत्थर उछाले थे कभी मेरी तरपफ
सारे पत्थर दोस्तो वो द्घर बनाने में लगे

तितलियों के रंग कच्चे हो गये ये सोचकर
पफूल को मौसम क्यूँ इतने मुस्कराने में लगे


नपफरतें लेकर ८ामाने ने हमें देखा मगर
हम भी लेकर प्यार सच्चा आजमाने में लगे

उठ गया दुनिया का मेला हाट 'औ' बाजार भी
हमको इतने दिन यहाँ सजने सजाने में लगे

 

८िादगी में असूल बाँटेंगे
पिफर नई एक भूल बाँटेंगे

लोग पफूलों के चाहने वाले
आ के तुझको त्रिाशूल बाँटेंगे

पहले बाँटेंगे पफूल पत्तों को
पेड़ को पिफर समूल बाँटेंगे

स्वप्न द्घर का दिखाके आँखों को
राह को वो बबूल बाँटेंगे

ये बवंडर उठे जो सत्ता के
तेरी आँखों को धूल बाँटेंगे

कै़द मंदिर में देवता कर के
हम को पूजा के पफूल बाँटेंगे

वो पहले बाजुओं पर हौसलों के पर बनाते हैं
परिंदे पिफर कहीं हैं आसमां में द्घर बनाते हैं

कभी थी पफूल में तितली, कभी था पफूल तितली में
ये रिश्ते प्यार के मौसम के बाजीग़र बनाते हैं

उन्हें हम डूबने का मश्विरा देने को निकले हैं
किनारों पर खड़े जो डूबने का डर बनाते हैं

बिखरते खुश्बुएँ बनकर यहाँ बाहर हम ही लेकिन
हम हीं पफूलों की पंखुरी, तितलियों के पर बनाते हैं

दिलों की ये जमीं है हम जहाँ ठहरे रुके अब तक
नहीं दीवार-दर कोई जहाँ हम द्घर बनाते हैं

 

कहीं पर खून की होली कहीं पर जाम दंगों में
हुआ है बस यहाँ पर आदमी गुमनाम दंगों में

रहे बनकर जो अब तक शांति के उजले कबूतर थे
उन्हीं के सामने आए उछलकर नाम दंगों में

कहाँ पर तू कहाँ मैं नहीं मालूम है लेकिन
कहीं पर बुश मिलेगा तो कहीं सद्दाम दंगों में

हुई है जीत किसकी और किसकी हार क्या जाने
कहीं द्घायल हुआ अल्लाह कहीं पर राम दंगों में

ये सूरज रो रहा है आसमां पर खून के आँसू
टपकताखूनदेखाहैयहाँहरशामदंगोंमें

 
 
 
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