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सुबह से लालू के ढाबे पर बैठा हुआ टाइमपास कर रहा था। जबसे मेला शुरू हुआ था, मेरा डेरा यहीं जमा रहता था। कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने के बाद पफुर्सत ही पफुर्सत थी। अक्सर समय गुजारने के लिए नया ठिकाना तलाशा करता था। मोहल्ले के कुछ दोस्तों से जानकारी हुई थी कि लालू ने मेले में ढाबा खोला है। अंधे को क्या चाहिए दो आँखें, कुछ यही स्थिति मेरी भी थी। मेरी तलाश पूरी हो गई थी। एक ऐसी जगह मिल गई थी, जहाँ एक-डेढ़ महीने आराम से गुजर जाने थे। ग्वालियर का मेला वैसे भी कोई छोटा-मोटा मेला तो होता नहीं है। यहाँ देशभर के व्यापारी अपनी दुकानें लगाया करते हैं। दुकानें भी हर तरह की होती हैं। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी। टीवी, जि से लेकर मोटरसाइकिल, कार सब कुछ इस मेले में मिलता है। मनोरंजन के लिए कई तरह के झूले, मौत का कुआं, जादू के शो होते हैं और खाने-पीने के लिए एक से बढ़कर एक रेस्टॉरेंट और होटल। यहाँ अलग-अलग सेक्टर लगाए जाते हैं, जहाँ लगने वाले शोरूम की भव्यता देख कोई भी |
मंत्रामुग्ध हो सकता है। लकड़ी से इस कदर खूबसूरत शोरूम तैयार किए जाते हैं, जिन्हें देखकर लगता है, जैसे किसी आलीशान द्घर में आ गए हों। इसी तरह शासकीय विभागों द्वारा लगाई जाने वाली प्रदर्शनी भी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बनती है। हालांकि मेले के लिए अब लोगों में पहले-सा रुझान नहीं रहा है, पिफर भी ग्वालियरवासी सालभर मेले का इंतजार करते हैं। मेले की चहल-पहल कई लोगों के लिए वरदान साबित होती है, वह दिनभर यहाँ भटकते रहते हैं और शाम को द्घर लौट जाते हैं।
लालू का ढाबा मेले के आखिरी छोर पर था। इस छोर पर आकर मेला खत्म हो जाता था। मेले का अंतिम प्रवेशद्वार भी इसी ओर था। पिफर भी यहाँ बैठे-बैठे मेले के अंदर का नजारा लिया जा सकता था। ढाबे के पास कुछ पान, बीड़ी, सिगरेट की गुमठियाँ लगी हुई थीं। इसके अलावा कुछ गांवटी नाश्ते की दुकानें थीं, जिन पर कभी-कभार भीड़भाड़ दिखाई देती थी। बहरहाल यहाँ समय गुजारना मुश्किल नहीं था। यही वजह थी कि मेरे लिए मेला राहत पहुँचाने वाला था। मेरी कॉलेज की पढ़ाई खत्म हो चुकी थी, नौकरी अब तक मिली नहीं थी। कई बार पेपर में आवश्यकता का कॉलम देखकर इंटरव्यू देने गया था, पर कुछ खास हाथ नहीं लगा था। एक-दो जगहों पर छोटी-मोटी नौकरी लगी, पर उनसे मुझे संतुष्टि नहीं हुई। इसलिए नौकरी छोड़ने में भी देर नहीं लगी।
लेकिन द्घर पर अक्सर मेरी नौकरी को लेकर चर्चा छिड़ी रहती थी। इसलिए कोशिश करता था कि ज्यादा से ज्यादा समय बाहर बिताऊँ। इसलिए लालू का ढाबा मेरे लिए पसंदीदा स्थल बन गया था। लालू मेरे कॉलेज या स्कूल का मित्रा नहीं था। वह मेरा मोहल्ला मित्रा था। हम दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे, यहाँ उठते-बैठते मित्राता की नींव पड़ी थी। सामान्यतः मेरी मित्राता या तो अपने समकक्ष व्यक्ति से होती थी अथवा मुझसे निम्न स्तर के व्यक्ति से। लालू बहुत ही सहज और सापफ दिल का लड़का था। उसका यह व्यवहार किसी को भी मित्राता करने पर विवश कर सकता था। वैसे लालू की स्थाई दुकान बाजार में थी, जो अच्छी-खासी चलती थी। मेले में वह दूसरी बार आया था। पिछली बार कमाई ठीक-ठाक हो गई थी, यही सोचकर इस बार भी यहाँ आ गया था।
दूसरे दिनों की तरह मैं आज भी ढाबे की एकमात्रा कुर्सी पर बैठा-बैठा इधर-उधर नजरें दौड़ा रहा था। मेले में द्घूमने आए सैलानियों को देखे जा रहा था। मेले की खासियत होती है कि यहाँ आपको हर तरह के लोग दिखाई पड़ जाते हैं। जिन लोगों को सामान्यतः देखने के लिए आँखें तरसती हैं, वह यहाँ आमतौर पर पाए जाते हैं। उन्हें छककर देखा जा सकता है। इन लोगों को देखते हुए कुछ देर को मैं यह भूल गया था कि एक पफटेहाल ढाबे पर बैठा हुआ हूँ। यहाँ खास लोगों के आने की उम्मीद तो बेकार ही थी। पिफर भी जब कोई अच्छी शक्ल दिखाई पड़ती, दिल में कुछ उत्साह पफूट पड़ता था। सोचता था शायद किसी के कदम भटक जाएँ।
मैं अपनी कल्पनाओं के द्घोड़े दौड़ा ही रहा था, एकाएक कानों तक किसी की आवाज पहुँची। पलटकर देखा तो काउंटर पर एक काला-सा लड़का खड़ा था। उसने उंगलियों से इशारा करते हुए कहा-'वहाँ चार कप चाय भिजवा दो।'
उसकी बात सुनकर पहले तो गुस्सा आया कि यह लड़का मुझे चायवाला समझ रहा है, लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं। वैसे भी कोई गुस्से वाली बात नहीं थी। मैं जहाँ बैठा था, कोई भी व्यक्ति मुझे चायवाला ही समझता। लालू कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था। शायद कुछ सामान लेने गया था। ढाबे पर दो ही लड़के थे। उस पर दोपहर का समय था, भीड़भाड़ कुछ ज्यादा ही थी। दोनों लड़के पफुर्ती से अपने काम में लगे हुए थे। ढाबे पर आए ग्राहकों को खाना परोसने और उनका आर्डर लेने में व्यस्त थे। हालाँकि चाय तैयार थी। अभी कुछ देर पहले ही बनी थी, मगर सवाल यह था कि चाय देने कौन जाए। जब कुछ समझ नहीं आया तो हिम्मत जुटाकर खुद ही चाय पहुँचाने की सोची। यह छोटा-सा काम मेरे लिए बहुत बड़ा था और साहसिक भी। वास्तविकता यह थी कि इस समय मैं स्वयं को असहज महसूस कर रहा था। आसपास देख रहा था कि कहीं कोई परिचित व्यक्ति न हो। जब आश्वस्त हो गया कि कोई जान-पहचान का व्यक्ति नहीं है, तब उस लड़के के साथ हो लिया।
चाय की केतली उस काले लड़के को थमाई और खुद उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। मैं कुछ मिनटों में ही उसके ठिकाने तक पहुँच गया था। यहाँ सिलसिलेवार एक के बाद एक झोपड़ियाँ बनी हुई थीं। इन झोपड़ियों के बाहर कुछ महिला-पुरुष द्घासपफूस से द्घोड़े तैयार करते दिखाई दे रहे थे। उस लड़के ने चाय की केतली ले जाकर उनके सामने रख दी। चाय की केतली देखते ही एकाएक सबके हाथ खुदबखुद थम गए। उस लड़के ने बारी-बारी सबको चाय दे दी। वह बड़े पफुर्सतिया अंदाज में चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, जबकि मैं इस इंतजार में था कि वह जल्द से जल्द चाय खत्म करें, जिससे गिलास लेने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं आना पड़े।
इन लोगों को देखकर मन में कुछ सवाल पैदा हुए थे, इसलिए लौटते समय उस लड़के से पूछ ही बैठा-'तुम लोग कहाँ से आए हो?' लड़के ने बड़ी सहजता से जवाब दिया-'हम सब गुजरात से यहाँ आए हैं। पिछले कुछ सालों से लगातार आ रहे हैं। यहाँ द्घोड़े बनाकर मेले में बेचते हैं।'
'अच्छा नाम क्या है तुम्हारा?'
'राजू।'
मैं जब तक ढाबे पर पहुँचा, लालू सामान लेकर वापस लौट आया था। उसने मुझे आश्चर्य से देखा, हँसते हुए बोला-'संजीव! तुम चाय लेकर गए थे, किसी लड़के को बोल देते, वह दे आता। या पिफर मेरे आने का इंतजार कर लेते। इतना पढ़ा-लिखा आदमी चाय लेकर जाए, यह अच्छा नहीं लगता।' मुझे मालूम था कि मेरा चाय लेकर जाना उसे हैरानगी में डालने वाला था। मैंने बड़ी सहजता से जवाब दिया-'उस समय दोनों लड़के कापफी व्यस्त थे, इसलिए मजबूरन मुझे ही चाय लेकर जाना पड़ा। जब तुम यह काम कर सकते हो तो पिफर मेरे चाय ले जाने पर इतने आश्चर्यचकित क्यों होते हो?' ढाबे पर बैठने से कम से कम यह पफायदा हो रहा था कि अलग-अलग श्रेणियों के व्यक्तियों के जीवन में झाँकने का अवसर मिल रहा था, जिनसे सामान्यतः कभी मेल-मुलाकात करने का अवसर प्राप्त नहीं होता। इस द्घोड़े वाले लड़के से मिलकर मैं भीतर ही भीतर प्रसन्न था। उनका रहन-सहन, जीवन, पहनावा-ओढ़ावा सब कुछ मेरी जिज्ञासा का केंद्र बन गया था। कुछ देर दिमाग दौड़ाने के बाद तरकीब सूझी कि राजू से दोस्ती बढ़ाकर द्घोड़े बनाने की कला सीखनी चाहिए। वैसे भी मुझे नई चीजें जानने, सीखने में विशेष रुचि थी। इस पफैसले से मेरा पहला मकसद भी पूरा हो जाना था।
मैं इंतजार कर रहा था कि अगले दिन राजू से इस सिलसिले में बातचीत करूँगा। लेकिन संयोग से दो-तीन दिन उससे मुलाकात नहीं हो पाई। इसके बाद जब राजू ढाबे पर आया तो उसके साथ एक और लड़का था। दोनों ढाबे पर बैठकर चाय पीने लगे। चाय खत्म करने के बाद जब राजू काउंटर पर पैसे देने आया तो मैंने बिना कोई भूमिका बाँधे अपनी इच्छा जाहिर कर दी-'क्या तुम मुझे द्घोड़े बनाना सिखा सकते हो?'
मेरा प्रश्न बड़ा सीधासाधा था, लेकिन उसे चकित करने वाला था। उसने मुझे आश्चर्य से देखा था। मैंने उसकी मनः स्थिति समझते हुए कहा-'मैं तुमसे किसी तरह का मजाक नहीं कर रहा हूँ। सचमुच मैं द्घोड़े बनाना सीखना चाहता हूँ।' शायद उसे मेरी बात का विश्वास हो गया था। इसलिए गंभीरतापूर्वक जवाब दिया-'जब आपकी इच्छा हो, मुझे बता देना। द्घोड़े तैयार करना ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। आप जल्द ही सीख जाओगे।' लालू वहीं पास में खड़ा-खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। जैसे ही द्घोड़े वाला लड़का गया, वह ठहाके लगाने लगा। उसका हँसते-हँसते बुरा हाल था। वह हँसते-हँसते कई बार कह चुका था-'इतनी पढ़ाई-लिखाई का क्या पफायदा हुआ। जब द्घोड़े बनाना सीखना था तो किताबों में सिर खपाने की क्या आवश्यकता थी।'
मैं बड़ी मुश्किल से उसे अपनी बात समझा पाया था। जब उसे पता चला कि मैं सिपर्फ एक नई चीज को जानने का प्रयास कर रहा हूँ, इसके अलावा कुछ नहीं, तब जाकर वह आश्वस्त हुआ। कुछ भी हो, मेरा काम बन गया था। सामान्यतः मैं ढाबे पर दोपहर को आया करता था, पर जबसे यह नई सनक सवार हुई थी, सुबह नौ बजे के आसपास ढाबे पर पहुँच जाया करता था। दरअसल द्घोड़े वाले बारह बजे के आसपास मेले में निकल जाया करते थे, इसलिए सुबह जल्दी आना मेरी मजबूरी थी। वर्ना, मेरी ख्वाहिश अधूरी रह जानी थी। शुरूआत के कुछ दिनों में तो मैं किसी दर्शक की तरह उन लोगों को द्घोड़े बनाते देखा करता था। मेरी इच्छा तो यह थी कि पहले दिन से ही काम शुरू कर दूँ, पर उन लोगों ने कुछ दिन दूर बैठकर दूसरे लोगों को काम करते देखने की हिदायत दी थी। सो, मन मारकर चुपचाप बैठा-बैठा दूसरे लोगों को निहारा करता था। कभी-कभी यूँ ही खाली बैठे रहने पर खीज भी उठती थी, लेकिन कुछ दिनों बाद इसका पफायदा भी समझ में आने लगा। धीरे-धीरे मैं द्घोड़े बनाने की प्रक्रिया से परिचित हो गया था। जब मुझे लगने लगा कि सारी चीजें समझ में आ गई हैं
तो पिफर मैदान में उतरना ही ठीक समझा। मेरे अंदर का उत्साह भांपकर इन द्घोड़े वालों ने भी प्रशिक्षण देने में खास रुचि दिखाई थी। सबसे पहले मुझे एक छोटे द्घोड़े का ढाँचा तैयार करने को कहा गया। मुझे लग रहा था कि इस काम में कोई खास मुश्किल नहीं आने वाली है। इतने दिनों में अंदा८ाा लग गया था कि द्घोड़े को किस तरह आकार दिया जाता है। अपने इसी आत्मविश्वास की बदौलत मैं पूरी तन्मयता से अपना काम किए जा रहा था। मेरे हिसाब से द्घोड़ा ठीक-ठाक बन रहा था, लेकिन मुझसे कुछ दूर बैठी इस गुजराती लड़की को शायद द्घोड़े की शक्लो-सूरत ठीक-ठाक नहीं लगी थी। वह मुझ पर शुरू से ही नजर रखे हुए थी, शायद प्रशिक्षक के रूप में उसे यहाँ बैठाया गया हो। उसने मेरे हाथों से द्घोड़ा लेते हुए उस पर अपने हाथों का हुनर दिखाना शुरू कर दिया। द्घोड़े की देह पर कुछ जगह द्घासपफूस लगाई, जिससे द्घोड़ा पहले की तुलना में तंदरुस्त नजर आने लगा। जबकि मुझे लग रहा था कि द्घोड़े का स्वास्थ्य ठीक-ठाक है।
मैंने उससे पूछा भी कि उसने क्या किया, पर कुछ जवाब नहीं मिला। उसका व्यवहार कुछ अजीब ही था। काम के दौरान कभी-कभी मेरी ओर बड़ी गौर से देखा करती थी, पर बोलती कुछ नहीं थी। कई बार आवश्यकता होने पर मैंने उससे बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन मेरा प्रयास निरर्थक ही था। अपने कठोर प्रयासों के बावजूद उसका नाम तक नहीं जान पाया था। बस यह पता चला था कि वह रिश्ते में राजू की बुआ लगती है। इस लड़की का रहन-सहन भी दूसरे लोगों की तरह ही था। हमेशा मैले-कुचैले चोली-द्घाद्घरा पहने रहती थी। हालांकि उसे देखकर यह कहना मुश्किल था कि किस श्रेणी की लड़की है। रंग बेशक सापफ नहीं था, पर चेहरे की बनावट खूबसूरत ही कही जा सकती थी। नैन-नक्श भी तीखे थे। इसमें कतई शक नहीं था कि यदि वह सापफ-सुथरे कपड़े पहनती, सज-संवरकर रहती तो सुंदर ही दिखती। यह लड़की सामान्यतः द्घोड़े बनाने में दूसरे सदस्यों की मदद किया करती थी। कभी-कभी आवाज आने पर झोपड़ी के अंदर भी चली जाया करती थी। झोपड़ी के अंदर महिलाएँ खाना पकाने का काम करती थीं। वह भी कभी-कभार इस काम में हाथ बटा दिया करती थी। वैसे मेरे ख्याल से झोपड़ी के अंदर दो-तीन महिलाएँ होंगी, जो बहुत कम मौकों पर बाहर निकला करती थीं। इन लोगों के साथ एक-दो महिलाएँ और थीं, जो शायद बहुत कम बाहर दिखती थीं। यह भी हो सकता था कि यह महिलाएँ मेरी वजह से ही बाहर नहीं निकलती हों।
एक दिन मैंने मजाकिया अंदाज में राजू से पूछा-'तुम लोग हमेशा इधर से उधर भटकते रहते हो, पिफर शादी-ब्याह कैसे होता है?'
राजू ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-'आप शायद हम लोगों को बंजारे समझ रहे हो, हम बंजारे नहीं हैं। हम तो सिपर्फ धंधे की वजह से बाहर आ जाते हैं। गुजरात में हमारा अच्छा-खासा द्घर है। वहाँ हमारी बिरादरी के कई लोग रहते हैं। इसी बिरादरी में हमारा शादी-ब्याह हो जाता है।'
'यहाँ मेले में कोई लड़की पसंद आई क्या?'
आप भी अच्छा मजाक करते हैं, मुझ काले-कलूटे लड़के को कौन पसंद करेगा? आप जैसा गोरा-चिट्टा होता तो अभी तक न जाने कितनी...।' मैंने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा-'क्या खूबसूरत होने से ही कोई लड़की पसंद कर लेती है।' सामने से जवाब आया-'हाँ, और क्या...।'
उसका जवाब सुनकर न जाने क्यूँ मेरी नजरें उस लड़की की ओर द्घूम गईं। वह बड़े गौर से हमारी बातें सुन रही थी। मुझे लग रहा था कि वह हमारी बातचीत में हस्तक्षेप करेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम दोनों की नजरें जरूर मिलीं, पर बातचीत का क्रम नहीं बन पाया। अब यहाँ आने का भी कोई कारण नहीं बचा था। मैं जितना काम सीख सकता था, लगभग सीख ही चुका था। वास्तविकता यह भी थी कि अब इस काम से मेरा मन भर चुका था, वैसे भी मुझे इस काम में कोई दक्षता हासिल नहीं करनी थी।
राजू अब भी नियमित रूप से ढाबे पर आया करता था, लेकिन मेरी नजरें उसके साथ किसी और को भी खोजा करती थीं। वह लड़की अब भी मेरे दिल-ओ-दिमाग में हलचल मचा रही थी। मैं उसके बारे में ही सोचा करता था। उसकी चुप्पी मेरे लिए रहस्य का विषय थी। उसकी आँखों में कुछ अजीब-सा आकर्षण था, कुछ खिंचाव था। कुल मिलाकर इन दिनों मैं उस लड़की की कल्पनाओं में खोया रहता था। यह भी झूठ नहीं था कि मैं कोई ऐसा बहाना तलाश कर रहा था, जिससे उसे देखने का मौका मिल जाए। एक बार जब द्घोड़े वालों को चाय पहुँचाने की बात आई तो मैंने लालू से कहा-'लाओ चाय मैं पहुँचा आता हूँ, बहुत दिनों से उनसे मिला भी नहीं हूँ...।' लेकिन कमबख्त लालू ने किसी और को भेज दिया।
मैं यह बात स्पष्ट रूप से जानता था कि मुझे उस गुजराती लड़की से प्रेम नहीं हुआ था। लेकिन कुछ न कुछ तो था ही, जिसकी वजह से मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्राण नहीं रख पा रहा था। मुझे लगता था कि मुझे लेकर उस लड़की के भीतर भी कुछ चल रहा होगा। लेकिन यह नहीं जान पाया था कि वह क्या सोचती है? शायद यही जान लेने की इच्छा मेरे अंदर एक अलग तरह का रोमांच पैदा कर रहा था। वैसे भी वह लड़की सामान्य नहीं थी। एक अलग वर्ग से संबंध रखती थी, जिसके पफेर में शायद ही मुझ जैसा कोई दूसरा व्यक्ति पड़ता। यह सब कुछ मेरे भीतर ही भीतर बवंडर मचा रहा था, लेकिन कोई ऐसा नहीं था, जिससे अपने दिल की बात कह सकता। अगर लालू को अपनी कहानी सुनाता तो वह निश्चित ही मुझे मूर्ख समझता। यह संयोग ही कहा जा सकता था कि मेरी बेचैनी समझते हुए वह लड़की एक दिन खुद ही ढाबे पर चाय लेने आ पहुँची थी। उसके साथ एक छोटा लड़का भी था। वह दूसरे दिनों की अपेक्षा आज कुछ ठीक-ठाक नजर आ रही थी। कपड़े कुछ सापफ-सुथरे पहने हुए थी, बालों में चोटियाँ गूंथ रखी थीं और चेहरे पर शायद तेल लगा रखा था। जब वह चाय लेकर वापस लौटने लगी तो उसने मुझे पलटकर भी देखा। मुझे लगा कि वह सामान्य रूप से मुझे देख रही है, पर असल बात कुछ और ही थी।
मेले में बैठे-बैठे तकरीबन एक महीना गुजर चुका था, लेकिन अभी तक मैं मेला नहीं द्घूम पाया था। कोई खास इच्छा भी नहीं थी। लेकिन एक शाम राजू मेरे पास आया और मुझसे मेला द्घुमाने की जिद करने लगा। इसलिए मजबूरन मुझे उसके साथ जाना पड़ा। मुझे झूला झूलना कोई विशेष पसंद नहीं था, लेकिन राजू का दिल रखने के लिए उसके साथ नाव वाले झूले में बैठ गया। झूला जैसे अपनी पूरी ऊँचाई पर पहुँचता, मेरा दिल द्घबराने लगता। जबकि राजू का उत्साह और बढ़ जाता। मैं यह देखकर हैरान था कि वह झूले के बिलकुल किनारे बैठा था और कभी-कभी तो खड़ा भी हो जाता था। जब हम लोग झूले से उतरकर मेले में द्घूमने लगे तो मैंने बातचीत का सिलसिला शुरू किया। बात को द्घुमाते-पिफराते पूछा-'वो लड़की तुम्हारी सगी बुआ है या पिफर दूर का रिश्ता है...?'
सवाल में कोई खास दमदारी नहीं थी, लेकिन और कुछ नहीं सूझा था। मुझे तो किसी तरह उस लड़की का नाम जानना था। राजू ने बड़ी लापरवाही से जवाब दिया था-'नहीं! वह मेरी सगी बुआ हैं। जल्द ही उनकी शादी होने वाली है।'
'अच्छा शादी होने वाली है, कोई गुजराती लड़का होगा।'
'हाँ, हमारे साथ ही रहता है। आपने देखा होगा, कभी-कभी मेरे साथ एक दुबला-पतला लड़का चाय लेने आता है, वही उसका होने वाला पति है।'
मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। यह खबर सुनकर थोड़ा दुख तो हुआ था। सोच रहा था कि बेवजह राजू के साथ मेला द्घूमने आया। न यहाँ आता और न ही यह बुरी खबर सुनने को मिलती। उस दिन के बाद से मैं कुछ हतोत्साहित हो गया था। मेरे अंदर से ढाबे पर बैठने की रुचि खत्म-सी हो गई थी, लेकिन मेला भी खत्म होने को था। सिपर्फ चार-पाँच दिन बाकी रह गए थे। इसके बाद खुदबखुद यहाँ आना बंद हो जाना था। यही सोचकर रुका रहा। इस बीच मुझे एक बार और मेले में जाना पड़ा। इस बार मेरे साथ राजू नहीं लालू था। मेला खत्म होने को था, इसलिए भीड़भाड़ ज्यादा ही थी। शाम के छह-सात बज रहे होंगे। कोई भी सेक्टर ऐसा नहीं था, जहाँ अच्छी तरह कदम रखने की जगह हो। मेले में लगे माइकों पर कभी कोई पुराना पिफल्मी गीत सुनाई देने लगता था, कभी किसी कंपनी का विज्ञापन। चलते-चलते हम लोग मेले के कोने में पहुँच गए थे, जहाँ छोटी-छोटी दुकानें लगी हुई थीं। मेरी नजर एक छोटी-सी दुकान पर ठहर गई। दुकान पर वही लड़की कान के झुमके देख रही थी। वह पीछे खड़े आदमी को बार-बार झुमके दिखा रही थी, शायद उसकी राय जानने के संबंध में रायशुमारी कर रही थी। एकाएक उसकी नजर मुझ पर पड़ी।
मैं उसे देखते-देखते वहीं ठहर गया था कि लालू ने मेरे सिर पर हौले से एक चपत लगाई-'यहीं खड़े रहने का इरादा है क्या?' मैं समझ गया था कि लालू मुझसे इस बारे में कुछ न कुछ पूछेगा जरूर और यही हुआ। उसने मुझसे मुस्कुराते पूछा-'तुम उस लड़की को इतना गौर से क्यूं देख रहे थे? तुम्हें पसंद है क्या?'
'मुझे ऐसी लड़की पसंद आएगी क्या, क्या मैं इतना गया-गुजरा हूँ...। वह मुझे देख रही थी तो मैंने भी देख लिया।' मैंने मुस्कुराते हुए कहा। इसके बाद भी हमलोग कापफी देर तक इधर-उधर चहलकदमी करते रहे। एक ठेले वाले से मूंगपफली खरीदी। मूंगपफली चबाते हुए एक टीवी के शोरूम पर पहुँच गए। पूरा शोरूम रंगीन रोशनी में नहाया हुआ था। प्रत्येक टीवी के पास लड़के-लड़कियाँ खड़े थे, जो हाथों में रिमोट लिए हुए लाइव डेमो दे रहे थे। एक के बाद एक टीवी की खूबियाँ गिना रहे थे। वह अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे थे कि ग्राहक उनके हाथ से बचकर न निकलने पाए। शोरूम में बिखरी रोशनी में सबकुछ जगमगाता नजर आ रहा था। यहाँ से हमलोग सीधे पिफर मेला रंगमंच की ओर रवाना हुए, जहाँ कुछ देर मुशायरे का लुत्पफ उठाया। अंत में मेले का मशहूर पापड़ खाकर वापस लौट लिए।
मैं द्घर पर पहुँचकर बिस्तर पर लेटे हुए बहुत कुछ सोचे जा रहा था। मुझे लग रहा था कि अब उससे बातचीत कर लेनी चाहिए। हालांकि यह नहीं जानता था कि बातचीत का विषय क्या होगा?
अगले दिन जब शाम के समय वही लड़की चाय लेने आई। इस बार मैंने अवसर का लाभ उठाना ही उचित समझा। चाय वाले लड़के के साथ मैं भी उसकी झोपड़ी की तरपफ चल पड़ा। लालू मेरी तरपफ ही देख रहा था, लेकिन चुपचाप था। उसके होठों पर मुस्कराहट बिखरी हुई थी। लड़की बड़े-बड़े कदमों से आगे-आगे चल रही थी, इसलिए मुझे अपने चलने की गति भी तेज करनी पड़ी। जब मैं उसके बराबर पहुँच गया तो बिना किसी औपचारिकता के अपनी बात कह दी-'आप शायद मुझसे कुछ कहना चाहती हैं...।' उसने मेरी आँखों में झाँका, शायद मंद-मंद मुस्कुराई भी थी। लेकिन कुछ स्पष्ट पता नहीं चला था। वह मेरे इतने करीब थी कि मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं। डर लग रहा था कि कहीं उसकी आँखों से सम्मोहित न हो जाऊँ। इसलिए अपनी नजरें दूसरी ओर द्घुमा लीं। अपनी चलने की रफ्रतार कम कर दी, खुदबखुद ही पीछे हो गया। मैं जब वहाँ पहुँचा तो देखा कि राजू झोपड़ी के बाहर ही बैठा हुआ था। मैंने उससे पूछा कि आज द्घोड़े बेचने नहीं गया तो उसने बताया कि आज रात ही गुजरात निकलने की तैयारी है। यह नई खबर मेरे लिए चौंकाने वाली थी। मैं जिज्ञासावश बोला-'अभी तो मेला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है पिफर...?'
'हमारा मेला लगभग खत्म हो चुका है। इसलिए यहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं है।'
मैंने उससे पूछा कि अगली बार यहाँ आओगे तो उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-'हाँ, हम तो हर साल आते हैं। अगले साल भी इसी जगह मिलेंगे। मगर पता नहीं आपसे मुलाकात हो पाएगी या नहीं...?' मैं चुपचाप ही रहा। यह सच भी था कि अगले साल के बारे में अभी से भविष्यवाणी नहीं की जा सकती थी। यह भी संभव था कि उस समय तक मेरी भावनाएँ बदल जाएँ। मुलाकात होने पर भी अभी जैसा मित्राताभाव शेष न रह जाए। रात के लगभग नौ बज गए थे, लेकिन मेरी द्घर जाने की इच्छा नहीं थी। मैंने लालू से कह दिया था कि आज रात उसके ढाबे पर ही रुकूँगा। वह भी कोई बच्चा नहीं था, मेरे यहाँ रुकने का अर्थ भली-भांति समझता था। पिफर भी उसने अपनी ओर से कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की। साढ़े नौ बजे के आसपास द्घोड़े वाले अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर ढाबे के सामने आकर जम गए। सबके चेहरे पर उत्साह नजर आ रहा था। मैं चुपचाप यह दृश्य देख रहा था।
इनका जाना मुझे थोड़ा खल भी रहा था। इतने दिनों में स्वयं भी इन लोगों के साथ द्घुलमिल गया था। इसके अलावा एक दूसरी वजह भी थी। यह लोग चाय के बकाया पैसे चुकाने आए थे। उन्होंने आखिरी बार ढाबे की चाय पी। कुछ देर बाद जब वह जाने लगे तो मैं खुद ही राजू के पास पहुँच गया। मैं उससे यह जानने की कोशिश करता रहा कि गुजरात जाकर क्या दिनचर्या रहेगी? मैं इस बातचीत के बीच कनखियों से उस लड़की को भी देख रहा था। वह भी चाय पीते-पीते मुझे निहार रही थी। आज मुझे उसकी आँखें बोलती हुई लग रही थीं, भीतर ही भीतर बहुत कुछ हिलोरें मार रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि इस अजीब-सी स्थिति में क्या करना चाहिए? मेरी बातचीत खत्म हुई, राजू सहित बाकी के लोग अपना-अपना सामान उठाने लगे। वह लड़की अपनी जगह से हिली नहीं थी। जब सब लोग थोड़ा आगे बढ़ गए तो पिफर वह मेरे पास आई। उसने कपड़े की गठरी से झोले से एक छोटा-सा द्घोड़ा निकाला और मेरे सामने रख दिया। मुझे बड़े स्नेहिल नेत्राों से देखा, पिफर धीमे से बोली-'बाय...।'
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