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र।त भर मेह बरसा था। भोर में देखा सब तरपफ जल-थल हो रहा था। धान की बेरन तैयार हो चुकी थी और उन्हें लगाने का समय हो चला था। तभी लाला बढ़ई ने आकर बताया कि कनचोदा नहीं रहा।
मैंने छाता लिया और कनचोदे के द्घर की तरपफ चल पड़ा। झीसी अब भी पड़ रही थी। गलियाँ दलदली हो गई थीं। गाँव की औरतें पलरी में धान की बेरनें लेकर खेतों की तरपफ चली जा रही थीं। खेतों में टखनों तक पानी था जो बेरन लगाने के लिए बहुत बढ़िया था। बेरनें मेरी भी लगाई जानी थीं लेकिन कनचोदे की मृत्यु के समाचार ने उस तरपफ से ध्यान खींच लिया था। कभी दिल करता कि किसी कारिंदे को यह काम सौंपकर पिफर कनचोदे के यहाँ जाऊँ, पिफर दिल उलाहना देने लगता कि बेरन तो बाद में भी लग सकती है, कनचोदे के साथ जो वक्त गुजारा है, उससे जो सेवा-टहल करवाई है, उसी के खातिर चलो। आषाढ़ अपने अंतिम दौर में चल रहा था। अभी वक्त है। सावन लगते-लगते भी अगर बेरन लग गई तब भी ठीक है, मैंने खुद को दिलासा दिया।.. |
पाँव और चप्पल पूरी तरह कीचड़ में सन चुके थे। चप्पल की चटकाल से कीचड़ उछल-उछल कर पीछे पाजामे और कुरते को रंग चुका था। कीचड़ के कुछ कतरे सिर तक पहुँच गए थे। कुछ दूरी पर बरगद का पेड़ पानी में तर बतर बोझिल मन से झुका हुआ खड़ा था। हवा जब उसकी शाखों से गुजर कर निकलती तो लगता जैसे पेड़ पर चढ़े सारे प्रेत एक साथ हू..हू कर रहे हों। पेड़ के तने के पास किसी ने टोना-टोटका करके ढेर सारा सेनुर और पफूल पफेंक दिए थे। पफूल तो इधर-उधर हो गए थे लेकिन सेनुर तने और जड़ों के आसपास ठहरे पानी में उथला रहा था।
रास्ते में जब द्घूरे बाबा का आस्ताना आया तो लाला बढ़ई ने दोनों हाथ ऊपर उठाकर जोर से जयकारा किया, जय हो द्घूरे बाबा की। वह वहीं खड़ा हो गया, और न जाने बड़ी देर तक क्या बुदबुदाता रहा।
द्घूरे बाबा के आस्ताने के चारों तरपफ गंदगी का ढेर लगा था। अरे, कनचोदा बाबा का भगत था, लाला बोला, तुमको पता है भैने, एक दिन भगती में आके कनचोदे ने सोचा कि द्घूरे बाबा को गंदगी से हटाकर सापफ जगह रख दिया जाए। उसने उन्हें उठाकर उस पीपल के नीचे धर दिया कि अब सब वहीं उनकी पूजा करें। जानत हौ भैने उसके बाद क्या हुआ?
मैंने नहीं में सिर हिलाया। अरे, संझा तक साले पर सीतला माता का प्रकोप हो गया। बड़ी वाली माता निकल आईं और जाते-जाते उसकी एक आँख भी लेती गईं। ठीक होते ही पहला काम कनचोदवे ने यह किया कि द्घूरे बाबा को पीपल के नीचे से हटाकर वापस द्घूरे पर रख दिया। उसके बाद से कभी किसी की हिम्मत नहीं हुई बाबा को कहीं और ले जाने की।
अंधविश्वास और अपफवाह कैसे पफैलती है, लाला बढ़ई की बातों से सापफ पता चल गया, लेकिन वह अपनी रौ में बहता जा रहा था। इतनी भगती के बाद भी बेचारे को क्या मिला! पता नहीं कौन सी बात रही जेकर कनचोदा कलेजे से लगाए रहा, और वही ओकर जान ले लिहिस वरना अबहईं कहाँ मरे वाली उमर रही, लेकिन देह में जैसे द्घुन लाग गा रहा, लाला बढ़ई बड़बड़ा रहे थे।
हम जल्द ही कनचोदे के द्घर पहुँच गए। मढ़हे के नीचे उसका शव रखा था जिस पर मैली धोती ओढ़ाई हुई थी। औरत उसकी पहले ही मर चुकी थी। एक लड़का था, वह भी न जाने कहाँ भाग गया था। साथ में उसकी बेटी भर थी जो उस समय अपने दुधमुँहे बच्चे को कोरे में लिए एक कोने में चुपचाप बैठी थी। मढ़हा टपक रहा था, और पानी की बूंद शव की बाईं आँख वाली जगह पर गिर रही थी जहाँ आँख की जगह एक छेद था। छेद में पानी भर गया था और उसने शव पर ओढ़ाई गई मैली धोती के एक सिरे को अंदर खींच लिया था। कनचोदे के शरीर का वह हिस्सा इस समय सबसे ज्यादा नुमायाँ हो गया था और लग रहा था जैसे वह छेद पूरी कायनात को लील जाएगा।
थोड़ी देर बाद वहाँ और लोग भी जमा हो गए। मेरे ममेरे भाई और गाँव के मौजूदा प्रधान लम्बरदार उपर्फ डॉक्टर ओमप्रकाश उपाध्याय भी आ पहुँचे थे। प्रधान जी, कनचोदे को पफूँकने की तैयारी में लग जाएँ, इसने आपके खानदान की बहुत सेवा की है, लाला बढ़ई बेलौस बोले जा रहे थे, आपके पास तो सिपर्फ धन था, तन-मन इसने लगाया था।
लाला, जबसे तुमने कंठी ली है, लगता है तब से तुम द्घंटा बहुत पकड़ रहे हो और तभी से पगला भी गए हो, प्रधान जी बोले, कनचोदा इस गाँव का रहने वाला था, और प्रधान होने के नाते मुझे क्या करना है, इसकी जानकारी तुम न दो।
बढ़ई मामा ठीक कह रहे हैं भाई साहब, मैंने कहा, पफूँकने-तापने के लिए आपने जो सूखा पेड़ गाँव को दिया है, उससे लकड़ी कटवाकर मंगवा लीजिए, तब तक हम लोग टिकठी का इंतजाम करते हैं।
लम्बरदार भाई साहब ने अपने खानदानी उसूलों के खिलापफ एक अच्छा काम यह कर दिया था कि अपनी बाग का एक सूखा पेड़ उन्होंने गाँव को दे िदया था कि जो भी मरेगा उसे उसी पेड़ की लकड़ी से पफूँका जाएगा।
बूंद टूट चुकी थी। चिता की लकड़ी वाला सूखी शाखों-डालों का वह पेड़ धरती के सीने पर अड़ा था, उसकी जड़ें जमीन में पैबस्त थीं कि कहीं से ८िांदगी का कोई सुराग मिल जाए। बदली के बीच अचानक ऐसा लगा कि उसकी शाखों पर हरी-हरी कोंपलें निकल आई हों। शाखों का एक भी सिरा ऐसा न था जहाँ हरियाली न नजर आ रही हो। निचली डाल पर जब कुल्हाड़ी की चोट पड़ी तो हरियाली पफुर्र हो गई और आसमान सुग्गों से भर गया।
कनचोदे के शव को चिता पर चढ़ाकर उसे लकड़ी के कुंदों से दबा दिया गया। उस समय सब गीला-गीला था। शव गीला, कपफन गीला, जमीन गीली और लकड़ियाँ गीली। डोम ने सुलगते कंडे और पुआल को ऊपर उठाया और बहती हवा के रुख पर रखकर पुआल बार दिया। उसने जलता पुआल लाला बढ़ई को पकड़ा दिया जिन्होंने शव के सिरहाने चिता में आग बैठाई। सारा कर्मकांड लाला बढ़ई खुद कर रहे थे। उन्होंने अपनी कमर में कपफन से एक टुकड़ा पफाड़कर लपेटा था और एक छोटा सा हिस्सा गर्दन में बाँधे था। अब वह डोम के साथ जुट गए बाँस लेकर शव को उलटने-पलटने में।
ये पाप के लच्छन हैं! सार बहुत पापी रहा, ददन सुकुल बोले।
ठीक कहत हो काका, सार जल्दी जरबै न करे, किसी ने ददन सुकुल की ताईद की।
अरे छोड़ा यार, पहिले ई बतावा कनचोदवा की एक लौंडिया है। बड़ी चाँपिया चीज है स्साली, जब चलत है तो ओकर दुइनो प्याऊ हौले-हौले उछलत हैं, किसी भलमनई का बीज लागत है, ददन सुकुल हथेली में तम्बाकू-चूना रगड़ते हुए बोले, ससुरी कभी अंधेरे-उजाले मिल जाती तो वहीं चाँप देता, उन्होंने हथेली में रखी खैनी को ठोंककर पफटकारा और हथेली शिवपूजन के सामने कर दी।
अरे तुम दुइनो को कौनो लाज है कि नाहीं, उहाँ बाप जरत है और इहाँ सारे बकचोदी कर रहे हैं, राजकिशोर नाटे ने कहा।
अबे चुप्प नटवा साले! बोल ऐसे रहा है जैसे बाबू आसाराम, ददन सुकुल ने चप्पल दिखाकर आगे कहा, अभी बेटा यही पफेंक कर मारूँगा, गोली ढना..ना..ना..ना..!
अबे छोड़ चूतिए को। ई बतावा गौने के पहिले कऊन ससुरी के चाँप दिहिस, ओकरे लौंडा भी हो गया, शिवपूजन ने चुटकी में तम्बाकू उठाते हुए पूछा।
यही तो हम जानना चाहते हैं। लेकिन एक बात है लौंडिया बहुत चाँपिया चीज है, और लम्बरदरवा सार बिना चाँपे रहे ना, ददन सुकुल पफुसपफुसाए। उन्होंने तम्बाकू निचले होंठ और जीभ के नीचे दबाई और डोम से चिल्लाकर पूछा, का बे! जरत है कि नाहीं?
मेहरारू का कूल्हा और मनसेधू की छाती सबसे देर मा जलत है, और कनचोदवा तो सार पहलवान रहा, ऊपर से ये मौसम और पाप की मार। हमका तो लागत है कि मसान के कुत्ते सारे एकर संस्कार करिहैं, शिवपूजन ने पिच्च से थूका। उनकी थूक लम्बरदार के पाँव के पास जाकर गिरी।
का पिचिर-पिचिर थूकत है? हमार द्घंटा पकड़ बैंचो, लम्बरदार अपनी जगह से उचकते हुए बोले, पहलवान बाबा के भगत बनो तुम दुइनो। एक मसल सुनो, गाँजा पिएँ राजा, तम्बाकू पिएँ चोर, खैनी खाएँ चूतिया, थूकें चारों ओर। अब कनचोदा की ल्हास चाहे आग खाए कूकुर... का किया जा सकता है।
आप द्घबराएँ नहीं सिरीमान, डोम ने लड़खड़ाती ८ाबान में कहा। वह बुरी तरह नशे में धुत था। उसने कच्ची चढ़ा रखी थी जिसे मल्लाहों ने खींचा था। यह तो हमार काम है, मजाल है कुत्ता मुँह मार जाए, उसने बाँस से एक कुंदे को उल्टा तो नीचे से आग भभक पड़ी।
ऊ सब तो ठीक है। ये बताओ कि कनचोदवा का तिल-पानी वगैरह कैसे दिया जाएगा? किसी ने पूछा।
अरे सार कोई भलमनई तो रहा नहीं, नीच रहा! न भी हो तो कोई बात नहीं, क्यों भाई लाला बढ़ई, लम्बरदार ने कहा।
उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी, मैं आर्यसमाज से किसी को बुलवाकर सब करवा दूँगा। कम से कम वहाँ वह आडम्बर तो नहीं है जिसका ढिंढोरा आप सब पीटते हैं, मैंने गुस्से से कहा।
अरे, हम तो भूल ही गए थे कि क्रांतिकारी जी यहाँ बिराजे हुए हैं, लम्बरदार ने कहा। चलो, कनचोदे का परलोक यह संभाल ही लेंगे, हमको तो उसके इहलोक से ही मतलब है।
नाहीं, भैया, आप सब पिफकर न करें, लाला बढ़ई बोले, मंदिर में हम सब किरिया करम कर देंगे। हम उसको दाग दे रहे हैं, तो हमीं उसका पिण्डा भी दे देंगे।
चलो, यह मामला तो सुलझ गया। क्रांतिकारी और बढ़ई काका सब देख ही लेंगे, लम्बरदार बोले, लेकिन एक बात बताइए भई क्रांतिकारी! कनचोदे को जो खेत हमारे बाप ने दिया था, वह तो अब हम वापस ले सकते हैं न कि इसमें आपको कोई एतराज है? वैसे अब उसके द्घर में उसकी बेटी और नाती के अलावा और तो कोई है नहीं, हम ही अब इन लोगों को संभालेंगे, हमारा भी तो कोई पफर्ज बनता है। क्रांतिकारी जी हम उतने बुरे नहीं हैं जितना आप समझते हैं। लम्बरदार जब जरा शान में आते थे तो खड़ी बोली बोलने लगते थे।
मुझे पता ही था कि आप मृतक की बेटी का खयाल रखेंगे, मैंने कहना चाहा, लेकिन लाला बढ़ई ने इशारे से मना कर दिया। चिता धधक उठी थी। लाला बढ़ई और डोम ने मिलकर द्घी की मदद से चिता बार दी थी और अब ऊँची-ऊँची लपटें निकलने लगी थीं। डोम बड़ी तत्परता से अपना काम अंजाम दे रहा था। उसने बाँस पिफर चिता में डाला और शव की टाँगे दबाकर उन्हें तोड़ दिया। हवन सामग्री मुट्ठी में भरकर छाती वाली जगह पर पफेंका तो आग से झक से एक लपक निकली और लपटें तेज हो गईं। मुझे लगा जैसे लपटें कोई शक्ल इख्तियार कर रही हैं। पिफर लगा जैसे वह कनचोदे की शक्ल हो। एक आँख तो सलामत थी, लेकिन दूसरी आँख की जगह जहाँ गड्ढा था मुझे लगा जैसे वहाँ से कोई आग का बगूला उठ रहा है और मेरे वजूद पर तारी हो रहा है। ऐसा लगा कि बगूले ने मुझे लपेटे में ले लिया है, और मेरे पाँव उखड़ गए हों। मैं न जाने अतीत के किन खंडहरों में हैरान-परेशान भटकने लगा था। मुझे हैरत हो रही थी कि तपिश का जरा भी एहसास मुझे नहीं था। मुझे याद आ रहा था...
जब मेरे मामा सड़-गल के मरे तो कनचोदा बेचारा बहुत रोया था। उनका हुकुम बजाना ही जैसे उसकी ८िांदगी का एकमात्रा मकसद हो। मामा जब बीमार थे और जब उन्होंने खटिया पकड़ ली थी तो उनको हगाने-मुताने का काम कनचोदा ही करता था। ये मेरे सगे मामा तो नहीं थे। मेरी माँ अपने माता-पिता की अकेली संतान थीं, और मामा मेरी माँ के चचेरे भाई थे। यही वजह है कि वे मेरे मामा कम, पट्टीदार ज्यादा थे। लेकिन वह कनचोदा ही था जो सही मायने में रिश्तेदारी निभाता था। गाँव के रिश्ते में वह मेरी माँ का काका लगता था, और मुझे अपना नाती मानता था। मैं भी उसे नाना कहने में संकोच नहीं करता था।
कनचोदा मेरे मामा का खासुलखास था। उनका लेफ्रटीनेन्ट, उनका दाहिना हाथ। उनके हर बुरे काम में शरीक। मामा मेरे ग्राम प्रधान थे, और बहुत ८ाालिम थे। उन दिनों जब पूरे इलाके में उनका जलवा था तो उनके पेशाब से चिराग जला करते थे। कनचोदा हर समय उनके साथ रहता था। यहाँ तक कि जब मामा किसी औरत के साथ खेत में हरकतबाजी करते रहते थे तो कनचोदा मेंड़ पर लाठी लिए पहरा देता रहता था। राहगीर उसे देखकर ही जान जाता था कि बराबर के खेत के अंदर कौन क्या कर रहा है! देखने वाले का मन मामा और कनचोदा दोनों के प्रति द्घृणा से भर जाता था।
गाँव में यह आम चलन है कि व्यक्ति को उसकी शारीरिक या मानसिक कमजोरी को ही उसका नाम बना दिया जाता है। जैसे अंधे को अन्हरू कहना, लंगड़े को लंगड़ कह देना, दिमागी रूप से कमजोर शख्स को पग्गल कहना। कनचोदे की एक आँख नहीं थी, इसलिए उसे आराम से काना या कन्ने कहा जा सकता था, लेकिन लोग उसे कनचोदा कहने में ज्यादा रस लेते थे। इसके पीछे शायद कनचोदे के प्रति उनकी द्घृणा और नपफरत रही हो। उससे नपफरत की जाती थी उसकी करतूतों के कारण जिसका दोषी वह नहीं, मेरे मामा थे। लेकिन किसकी मजाल थी कि उनके खिलापफ कोई कुछ कह पाए, कनचोदा उसके हाथ-पाँव न तोड़ देता! आखिर वह उसके बाबू साहेब जो थे!
जब मैंने यह शब्द पहली बार सुना था तो मुझे अजीब सा लगा था। इसका अर्थ तो मैं नहीं जानता था लेकिन इसके पीछे कोई अश्लीलता है, यह मुझे जरूर लगता था। एक दिन इसके वीभत्स अर्थ का पता लग ही गया। मेरे मामा के दामाद आए हुए थे। वे तहसील के इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे। मैंने उन्हीं से कुछ लिया। उन्होंने निपट मास्टरी अंदाज में बताया कि कनचोदे का मतलब होता है कि किसी की आँख के साथ दुष्कर्म किया जाए जिसके पफलस्वरूप उसकी आँख पफूट जाए। मेरे ममेरे भाई लम्बरदार ने जब कनचोदे की यह परिभाषा सुनी तो उन्होंने बुरा सा मुँह बनाया। उन्होंने मुझसे कहा, एईसन बा, जब किसी के आँख में कोई अपना द्घंटा पेल दे, और आँख पफूट जाए तो एईसन मनई के कनचोदा कहा जात है।
वैसे कनचोदा देखने में भी बड़ा डरावना लगता था। लंबा-तडंग़ा जिस्म, काला-आबनूसी रंग, माता के दाग से भरा चेहरा, मूँछें। एक आँख को लपेट में लेकर सिर पर बँधा अंगौछा, पाँव में चमरौधा, धोती द्घुटनों तक और तन पर मोटा सूती कुर्ता। कद कोई छह पफुट और हाथ में सात पफुटा लाठी। दीवार चाहे जितनी ऊँची हो, मजाल है कनचोदा पहली बार में ही पार न कर ले। वह चोर भी था, लठैत भी, पहलवान भी। जब मैं अपनी अम्मा और पिताजी के साथ पहली बार अपनी समझदारी में ननिहाल गया था तो बस स्टेशन पर रब्बा लेकर कनचोदा ही आया था। मैं उसे देखकर डर गया था। लेकिन मुझे देखकर कनचोदे की आँख भर आई थी, और जब अम्मा ने कहा कि बेटा यह तुम्हारे नाना हैं, इन्हें नाना कहो। मैंने नाना कहा तो वह इतना खुश हुआ कि मुझे अपने कंधों पर बिठा लिया, और पिताजी से बोला बच्चा जी, अब लक्खी बिटिया को लेकर रब्बे से चलें, नाती को मैं लेकर आता हूँ।
एक बार की बात है, मैं हमेशा की तरह ननिहाल गया हुआ था। मेरे पहुँचने के बाद कनचोदे का एकमात्रा काम मेरी टहल करना हो जाता था। वह मामा को छोड़, मेरे आगे-पीछे मंडराने लगता था। गाँव में मेरे कई दोस्त बन गए थे। मामा का सबसे छोटा लड़का जिसे छोटे के नाम से जाना जाता था, वह मेरा हमउम्र था। कनचोदा, हम सबके साथ मिलकर खेलता, मजा करता। हम लोग एक दिन दोपहर को आम की बगिया में द्घूम रहे थे। कनचोदा साथ तो था ही। यकायक उसने हम लोगों को चुप रहने का इशारा किया और पफुसपफसाया कि अभी मजा दिखाता हूँ। हमने देखा कि मामा के मुंशी पंडित रामजतन तिवारी लोटा लेकर बगल के खेत में द्घुस रहे हैं। उन्होंने लोटा नीचे रखा और धोती की लाँग खोलकर बैठने की तैयारी करने लगे। जैसे ही वह नीचे बैठे, कनचोदा बोला, पंडित!
आवाज सुनकर तिवारी जी खड़े हो गए। जब कहीं से कोई नजर नहीं आया तो पिफर उन्होंने धोती सरकाई और नीचे बैठ गए। कनचोदा पिफर बोला, पंडित! तिवारी जी बेचारे! चौंक कर पिफर खड़े हो गए। यहाँ-वहाँ नजरें द्घुमाने लगे, और बुदबुदाए, कौन भों... वाला आवाज दे रहा है। जब मुतमईन हो गए कि कहीं कोई नहीं है, तो पिफर नीचे बैठने की तैयारी करने लगे। बैठने से पहले एक बार पिफर उन्होंने देखा भाला, पिफर धोती सरकाई और... कनचोदा बोल पड़ा, पंडित!
कऊन सार अपनी महतारी के लैके खेते मा द्घुसा है बे! मनई को हगते नाहीं देखा है का, या अपनी महतारी के लिए भतार खोजे आए हो! पंडित जी को तैश आ गया था। कोई सुन-गुन न होती देख वह पिफर बैठने की तैयारी करने लगे... और जैसे ही बैठे, कनचोदा पिफर बोला, पंडित!
तेरी महतारी की...! हम टट्टी करबै न करब! जात अही! जे होय आवा सारे मरावा!
पंडित जी ने धोती कसी, लात मारके लोटे का पानी नीचे गिरा दिया, और पाँव पटकते हुए चल दिए। हम लोग भी पीछे-पीछे निकले। जब द्घर पहुँचे तो पंडित रामजतन तिवारी मुँह पफुलाए खटिया पर पड़े थे और पेट सहला रहे थे। मैं पंडित जी के पायताने बैठ गया और कनचोदा कुएँ की जगत पर। जेब से चुनौटी निकालते हुए बोला, का हो पंडित जी, आपकी तबियत ठीक नहीं का?
अरे का बताएँ हो कनचोदे! पता नहीं कौन सार रहा खेते मा? जब दिसा-मैदान के लिए बैठी, तो सार बोले पंडित! हम चौंक के उठ जात रहे। पेट सार द्घूम गया, अब गैस बन रही है, उन्होंने मेरी दिशा में चूतड़ उठाए और जोर से आवाज निकाली।
अरे तोका रच्चो लाज नहीं पंडित। नाती बैठा है और तू ओही तरपफ पादत अहो।
नाती उड़ ना जाए, द्घबराओ मत, पंडित गुस्से से बोले। पिफर मेरी तरपफ इशारा किया, और पफुसपफुसाए, का बे कनचोदा, नाती को भी प्रधान जी की विद्या में पारंगत कर रहे हो का?
प्रधान जी की विद्या! अब मेरे लिए यह दूसरा रहस्य था। पहला रहस्य तो यह था कि कनचोदे का असल नाम क्या है। अब यह दूसरा रहस्य क्या है?
एक दिन मैंने कनचोदे से पूछा, नाना आपका कोई असली नाम भी तो होगा? तो वह बोला, अरे छोड़ो नाती, असल नाम का क्या करना। अब तो मुझे भी याद नहीं। लोग कनचोदा कहते हैं, वही असली नाम है।
मैंने पिफर कहा, लेकिन नाना, आपका नाम तो बहुत गंदा है!
काम भी तो गंदा है नाती!
और यह गंदा काम आप मामा के कहने पर करते होंगे?
अरे छोड़ो नाती!
और यह 'प्रधान जी की विद्या' क्या है?
कहा न नाती, जाने दो। बस यही जान लो कि तुम्हारे मामा कंस मामा हैं। वह तुमसे जो भी कहें, बस ठीक उसका उल्टा ही समझना और जान लेना कि जो भी वह बोल-कह रहे हैं, वह सोलह आने झूठ है। अगर उनके कहे पर तुमने विश्वास कर लिया तो बाद में दुख ही होगा। मेरी यह बात गाँठ बाँध लो, और इसे अपने तक ही रखना।
कनचोदे के साथ मैं न जाने क्यों निकटता महसूस करता जा रहा था। पिताजी के मुँह से मैंने एक बार उसका असली नाम सुना था, दयाल। बस उसके बाद से मैं उसे दयाल नाना कहने लगा था। मेरे मुँह से अपना असली नाम सुनकर उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन गाँव और खासतौर से मेरे मामा के द्घरवालों के लिए वह कनचोदा ही था। यहाँ तक कि द्घर की औरतें भी उसे बेहिचक और बेझिझक कनचोदा ही बुलाती थीं।
जब भी मेरे मामा दयाल नाना को गाली देते या हिकारत से बुलाते तो मुझे बहुत दुख होता था, और गुस्सा भी आता था। मन यही करता था कि गुम्मा पफेंककर उनकी आँख पफोड़ दूँ। एक दिन तो हद ही हो गई।
मामा और द्घर के अन्य मर्द जहाँ सोते या रहते थे, उसे बंगला कहा जाता था। वह द्घर के बाहर था। बंगले के सामने बहुत बड़ा दालान था और उसके बाद द्घर के भीतर जाने का रास्ता। बंगले के पास ही एक कुआँ बना हुआ था, जहाँ द्घर के मर्द नहाते थे। वहीं बगल में लंबी-चौड़ी सरिया थी। मवेशी यहीं बाँधे जाते थे। द्घर का मुख्य दरवाजा तो इतना बड़ा था कि उसमें से हाथी निकल जाए। बंगले से सटी एक खिड़की थी जिससे सटी एक कोठरी थी जिसका निकास बाहर गली में भी था। मामा अक्सर इस खिड़की के रास्ते कोठरी में आते-जाते थे, और शायद वहीं से जब दिल करता बाहर निकल जाते। मैं वहीं बंगले में लेटा औंद्घा रहा था। मामा का छोटा लड़का छोटे और कुछ अन्य लड़के मुझे जगा रहे थे कि दिशा-मैदान चलने का समय हो गया है। तभी मैंने देखा कि मामा आँख मलते खिड़की वाली कोठरी से निकले, और चिल्लाए, पकड़ के लाओ हरामजादे कनचोदा को!
सामने मामा का नौकर गुंगवा था, और कोई नहीं। मामा ने पहले अपनी एक आँख पर हाथ रखा, पिफर दाहिने हाथ की तर्जनी दिखाई और बाएँ हाथ की तर्जनी व अंगूठे से द्घेरा बनाकर दाएँ हाथ की तर्जनी को उसमें डालकर आगे-पीछे किया। पिफर बुलाने का इशारा किया। गुंगवा पफौरन समझ गया कि कनचोदे को बुलाया जा रहा है। वह गों..गों करता हुआ बगटुट भागा।
कनचोदा जब आया तो बंगले के सामने अच्छी-खासी भीड़ जमा थी। कुछ औरतें भी थीं। दो-तीन आदमी लाठियाँ लिए कुएँ की जगत पर बैठे थे। कनचोदे को देखकर मामा गरजे, का बे कनचोदवा! मंगल की रात कहाँ थे?
बाबू साहेब, रिश्तेदारी में गए थे, कनचोदे ने धीरे से कहा।
झूठ बोलता है बे! पाठक जी के यहाँ चोरी कैसे हो गई?
हमका का मलूम बाबू साहेब, काहे चोरी हो गई।
रामखिलावन, मामा ने एक लठैत से कहा, पिटाई करो साले की। अभी पता चल जाता है कि जेवर चुराके कहाँ रखे हैं।
रामखिलावन ने एक करारी लाठी कनचोदे की कमर में दे मारी। वह चिल्लाया, बाबू साहेब हम कुछ नहीं जानते, हमका मत मारें।
मादर...! मामा चिल्लाए, साले पाठक जी की लड़की का गौना जाना है, और साले तुमने उन्हीं के यहाँ के जेवर चुरा लिए, रामखिलावन! देख क्या रहा बे, मार साले को!
उसके बाद रामखिलावन और दूसरे लोग कनचोदे पर पिल पड़े और उसे मारते-मारते बेदम कर दिया। इतनी मार खाने के बाद उसने स्वीकार कर लिया कि पाठक जी के यहाँ उसी ने चोरी की है। मामा ने उसे पुलिस में न देने का वायदा किया और जेवर बरामद करवा लिए।
सबके चले जाने के बाद, मामा ने कनचोदे को प्यार से अपने पास बुलाया और उसे दूध पीने को दिया। पिफर न जाने वह उससे क्या-क्या बतियाते रहे। उसकी मनुहार करते रहे।
मेरी समझ में यह माजरा बिलकुल नहीं आ रहा था। मैं कनचोदे से सारी कैपिफयत जानना चाहता था कि आखिर उसने चोरी क्यों की? मौका मिलते ही मैंने कनचोदे से पूछ लिया, क्यों नाना, आपको इतनी लाठियाँ पड़ीं, क्या आपने वाकई चोरी की थी?
कनचोदा बोला, इतनी लाठी तो नाती हमारे शरीर पर गर्दा है। हमने एक बार तुमसे कहा था कि तुम्हारे मामा जो बोलें उस पर कभी भरोसा मत करना। जो कहें उसका ठीक उल्टा जानना। हमने कोई चोरी नहीं की।
पिफर यह सब क्या था?
दरअसल, पाठक जी की बिटिया तुम्हारे मामा की आँखों में चढ़ी थी, बस उस पर चढ़ नहीं पा रहे थे। उन्हें मौका मिल गया। उन्होंने हमसे गहने चोरी करवा लिए, और पाठक जी की बिटिया को संदेसा कहवा दिया कि हमारे साथ सोओगी, तो हम गहनों का पता लगवा देंगे।
बेचारी, द्घर की इज्जत बचाने के लिए अपनी इज्जत उद्घड़वाने खिड़की वाली कोठरी में पहुँच गई। रात भर बाबू साहेब उसे चाँपते रहे, और सुबह होते ही भगा दिया। पिफर मुझे बुलवाया, उसके बाद की कहानी तो नाती तुमको पता ही है।
मैं तड़प के रह गया। दिल यही कर रहा था कि... अब क्या बताएँ!
लेकिन मामा अकेले से कोई क्या निपटता। उनके बड़े बेटे लम्बरदार मामा की जगह लेने के लिए तैयार हो ही गए थे। अब कनचोदे की दोहरी जिम्मेदारी हो गई थी। मामा के साथ रहना और लम्बरदार को भी सहारा देना। बाप-बेटे में कुछ भी अलग नहीं था। दोनों का स्वभाव, अवगुण सब समान थे। अपने बाप के उलट वह औरतों के साथ-साथ साइकिल की सवारी का भी शौक रखते थे। दिशा-मैदान भी साइकिल पर ही जाते थे। इसीलिए उनका नाम साइकिलिहा भी पड़ गया था। साइकिल की सवारी गाँठते-गाँठते उनका एक अण्डकोश पफुटबाल के बराबर हो गया था जो धोती की लाँग के सहारे झूलता रहता था। वह जब खटिया पर बैठते थे तो अपनी उस गठरी को बड़ी संभाल के साथ खटिया की पाटी से टिका देते थे। वह पहलवान बाबा के भगत थे। गाँव में रिवायत थी कि आपफर से पफसल उठाने के पहले नीम के नीचे पत्थर रूपी पहलवान बाबा को गाँजा, चरस, भाँग या देसी शराब का अ(ा चढ़ाया जाता था। पहलवान बाबा का भगत होने के नाते लम्बरदार जी गाँजे, चरस, भाँग और देसी शराब को बाबा का प्रसाद समझकर दिन के किसी भी प्रहर में निःसंकोच ग्रहण कर लेते थे।
दूसरी बात यह कि वह दर्जा नौ तक पढ़े थे। कोई अगर उनसे पूछता कि भइया आप कहाँ तक पढ़े हैं तो वह बड़े पफ से कहते, हम हाईस्कूल पफेल हैं। गोया यह कहना कि दर्जा नौ तक की पढ़ाई की है कोई बेइज्जती की बात हो। मास्टर वह हो नहीं सकते थे और खेती में अब उतनी बरक्कत रह नहीं गई थी। कुछ न कुछ तो करना ही था क्योंकि सारे खेत मुझमें और मामा के खानदान में आधो-आध बंट गए थे। मेरे नाना ने अपना सारा हिस्सा मेरे नाम कर दिया था जिस पर कभी मामा की नजर थी।
पिफर लम्बरदार के मास्टर जीजाजी उनके लिए दूर की कौड़ी ले आए। वे उन्हें अपने साथ लखनऊ ले गए और न जाने कौन सा सार्टिपिफकेट उनके पास आ गया कि वे रातों-रात डॉक्टर ओमप्रकाश उपाध्याय बन गए। उन्होंने मामा की पुरानी ऐशगाह खिड़की वाली कोठरी में डॉक्टरी की दुकान खोल ली और लोगों का इलाज करने लगे। इसके लिए लम्बरदार उपर्फ डॉ. ओमप्रकाश उपाध्याय को एक गिनी पिग की जरूरत थी, और वह पहले से ही मौजूद था-कनचोदा!
डॉक्टर साहेब ने इंजेक्शन लगाना कनचोदे पर सीखा। वह कोई ताकत वाला इंजेक्शन बनाते और कनचोदे से कहते, आजा बे भों...के। इससे साले तुमको ताकत मिलेगी, हाथ सामने करो। और कनचोदा खुशी-खुशी ताकत के नाम पर अपना हाथ आगे कर देता। डॉक्टर साहब कभी उसकी नसों में तो कभी माँसपेशियों में इंजेक्शन ठोंक देते। यह तो शायद कनचोदे का शरीर अच्छा था या उसकी किस्मत कि वह सब प्रयोग झेल जाता। ग्लूकोज चढ़ाना भी लम्बरदार ने कनचोदे पर ही सीखा था, और अब गाँव में जब भी हैजा पफैलता तो पानी चढ़वाने के लिए लोगों की कतार लग जाती।
अंग्रेजी उन्हें आती नहीं थी इसलिए जब भी वह दवाई लाने तहसील जाते तो वहाँ दुकानदार से पूछ-पूछ कर किस रोग में कौन-सी दवा देनी चाहिए यह सारी बातें एक नोट बुक में लिख लेते। धीरे-धीरे उनकी गाँव में 'रोरिंग प्रैक्टिस' हो गई। एक पफायदा और हुआ। अब डॉक्टर ओमप्रकाश सरकारी अस्पताल से मुफ्रत में बंटने वाले पुरुष गर्भनिरोधक निरोध के पैकेट उठा लाते। इससे बड़ों के मनोरंजन में कितना लाभ हुआ यह तो नहीं पता लेकिन बच्चों के मनोरंजन में बहुत लाभ हुआ। बच्चे सरकारी कंडोम में हवा भरकर उसे पफुला लेते और गुब्बारे की तरह खेलते। गली-गली, द्घर-द्घर में निरोध के गुब्बारे उड़ने लगे। अब जब कभी कोई बच्चा रोता तो उसे निरोध लाकर दे दिया जाता और वह उसे पाकर खुश हो जाता।
लेकिन पानी बरसे और मेढ़क न टर्राए यह हो नहीं सकता।
सो भइया, लम्बरदार उपर्फ डॉक्टर ओमप्रकाश से गलती हो ही गई, और वह भी भयानक! एक तड़पते मरीज को न जाने उन्होंने कौन सा इंजेक्शन ठोंक दिया, और वह भी उसकी जीभ में। इंजेक्शन लगते ही उसका मुँह सूज गया और जीभ अकड़ गई। द्घरवाले उसे बैलगाड़ी में लाद के गाँव से सात कोस दूर तहसील के अस्पताल ले जाने की तैयारी में थे कि उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
लम्बरदार के विरोधी बैसन के पुरवा के ठाकुर रणछोर सिंह और गाजी की तकिया के जव्वाद खान को जब मामले का पता चला तो दोनों सक्रिय हो गए। ये दोनों तहसील थाने के दलाल भी थे। आनन-पफानन में इलाके के सिपाही को सूचना दे दी गई और बड़े दारोगा को संदेसा भेज दिया कि वे पफौरन लाव-लश्कर लेकर आएँ और मामले की जाँच करें।
इस द्घेराबंदी की खबर मामा को मिल ही जानी थी। उन्होंने मृतक के बाप रद्घुनाथ को बुलाया और कहा, का हो भइया, यह चेयरमैन काका का गाँव है। यहाँ कभी पुलिस नहीं आई, और हम सुने हैं कि तुम उस ठकुरे और कटुए के सिखाने पर पुलिस बुलाए हो?
का किया जाए? लम्बरदार हमरे बेटवा के मार दिए। अब तो जाँच हो ही जाने दो प्रधान जी, ल्हास रखी है, चीर-पफाड़ तो करवाएँगे ही। हमको भी हमारा बेटा प्यारा था और भरोसे पर लम्बरदार के पास आए थे, लेकिन क्या हुआ? मार दिए उसको, रद्घुनाथ बोला।
एईसन है भइया! लम्बरदार के पास तो सटरीपिफटेक है, दिखा देंगे। लड़का मरा तो उसमें उनका क्या दोष? मामा बोले।
जब रोग नहीं पकड़ पाए तो काहे सूई ठोंक दिए? प्रधान जी हम बहुत दुखी हैं, हमें पता है हमारे कटे पर आप मूतेंगे भी नहीं, रद्घुनाथ उठते हुए बोला।
अबे चोप्प! अबकी लम्बरदार गरजे, पिफर अपने आप से बोले, बाबू! हम तो इसके लौंडे को देख ही नहीं रहे थे। यह साला रणछोड़वा की गोल का है। हम सुरू में भगा दिए थे। साला मिनमिनाने लगा, तब हम देखे इसके लौंडे को। वह पहले से ही बेहोस था। बड़ी मुश्किल से तो ससुरे की जीभ में सूई लगा पाए। जब सूई से नहीं उठा तो क्या द्घंटा लगाते उसको?
कोई बात नहीं प्रधान जी, हमारे लड़के को मारा और अब उसके बारे में क्या-क्या बोल रहे हैं लम्बरदार और आप चुप बैठे हैं, सुन रहे हैं। हम जा रहे हैं, रद्घुनाथ ने बिसूरते हुए कहा।
जा रहे तो जाओ, हम रोकेंगे नहीं, लेकिन एक बात हमारी भी सुनते जाओ। ठाकुर साहेब और खान साहेब से तो हम बाद में निपटेंगे। ले जाए पुलिस लम्बरदार को। रहोगे तो तुम इसी गाँव में। तुम्हारा मुकदमा चल रहा है न भगेलू मोराई से! उसमें अभी हम दखल नहीं दे रहे थे, लेकिन लगता है कि कुछ करना होगा। तुमने उसके द्घर के पीछे उसके निकास-पैठार की जगह गोबर गैस का गड्ढा बना लिया है ना? मामा बोले। थोड़ा ठहरकर उन्होंने कनचोदे से कहा, का बे, भगेलू के मुकदमे की कौन तारीख पड़ी है?
उस मुकदमे का इससे क्या संबंध, प्रधान जी? रद्घुनाथ ने जरा ऐंठकर कहा।
भई, तुम तो बड़े आदमी हो। तुम्हारा भाई भिलाई की लोहा मिल में काम करता है। पैसा भेजता है और तुम खेत खरीदते हो। द्घर भी पक्का बनवा लिया है, और उसी द्घर में गुण्डे-लपफाड़ियों को पनाह देते हो। उन्हीं के बल पर भगेलू बेचारे से मुकदमा लड़ रहे हो। अब हम चुप नहीं रहेंगे। गुण्डे-लपफाड़ियों के साथ-साथ पुलिस तुम्हारी गाँ...में भी डंडा करेगी। जब कल्लाएगी तब पता चलेगा। वह दोनों साले बड़े दारोगा के दलाल हैं ना मादर... अभी कप्तान साहेब को कहलवाता हूँ।
हमारे यहाँ ऐसा कौन-सा गुण्डा आपने देख लिया प्रधान जी, रद्घुनाथ के कस-बल अब खुलने से लगने थे। वह धम्म से बैठ गया।
नाहीं भैया, पूरा गाँव जानता है, पड़ोस गाँव के गुण्डे-लपफाड़ी तुम्हारे यहाँ आते-जाते हैं। सब गवाही देंगे। रणछोर सिंह और जव्वाद खान दोनों के नाम दपफा ३०७ का मुकदमा चल रहा है, हत्या के प्रयास का। मामा का यह पैंतरा देखकर रद्घुनाथ दंग था। अबे ओ कनचोदवा, ददन सुकुल से कहो कि लम्बरदार के साथ शहर जाकर कप्तान साहेब से मिल लें, चेयरमैन काका के दफ्रतरी बाबू शिवबरन लाल को भी वहीं साथ ले लेंगे। कप्तान के लिए शिवबरन लाल ही कापफी हैं। नामजद रपट लिखवाएँ, रणछोर सिंह और जव्वाद खान के खिलापफ! पफौरन जाएँ।
और यह जो गँड़खुल्ला जी बैठे हैं, इनका क्या? कनचोदे ने पूछा।
अरे नहीं भाई। रद्घुनाथ का नाम न लेंगे, वह अपना आदमी है, मामा बोले।
कनचोदा बाहर जाने को हुआ तो रद्घुनाथ ने उसे कातर आँखों से देखा। अबे भों...के! हमका का देखत हो मादर...! कनचोदा बोला, भों... के ल्हास साले गंधाने लगेगी। जा पफूँक उसे। चल हमरे साथे। गुण्डे-लपफाड़ी तुम्हारे काम नहीं आवेंगे, बाबू साहेब को ही अपना सगा समझो! और रही पुलिस तो उसकी गाँ...भी चेयरमैन भइया के नाम से पफटती है, तुमको तो पता ही है पूरे जिले के वही मालिक हैं, चल उठ! कनचोदा रद्घुनाथ का हाथ पकड़ता हुआ बोला, लेकिन रद्घुनाथ सिर झुकाए बैठा रहा।
अबे, बैंचो, क्या हमारा द्घंटा पकड़ के उठेगा! कनचोदा रद्घुनाथ को लगभग खींचता हुआ उसके द्घर की तरपफ चल दिया। पिफर बोला, अबे भों.. के समझा करो, तुम ल्हास पफूँकने में देर न करो, भगेलू से सुलह हम करवा देंगे बाबू साहेब से कहके।
आज यही कनचोदा इतने बरसों बाद अपनी लड़की के साथ-हाथ जोड़े शहर में मेरे पिताजी के सामने दीन-हीन बना बैठा था। जाड़े के दिन थे और पिताजी की आदत थी आराम कुर्सी बाहर निकलवाकर धूप में बैठने की, लेकिन आज धूप बिलकुल नहीं थी। वह बाहर वाले बरामदे में ही बैठे थे। सर्द कोहरे की परतों में ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था। कोहरे को देखकर न जाने क्यों उसमें द्घुसकर खो जाने का जी कर रहा था। हर तरपफ कोहरे का अंतहीन सिलसिला। मैं एक तसले में कोयले सुलगा कर ले आया और पिताजी के सामने रख दिया। उन्होंने अपने पाँव सेंकते हुए इशारा किया और कनचोदे की लड़की को द्घर के अन्दर भेज दिया। पिफर बोले, हाँ दयाल बताओ क्या कहा डॉक्टर ने?
अब क्या बताएँ बच्चा जी, लौंडिया ससुरी पेट से है, और अभी गौना हुआ नहीं है।
पिताजी को शायद झटका सा लगा। वह कुछ देर खामोश रहे, पिफर बोले, व्यावहारिकता तो यही कहती है दयाल कि गर्भ गिरवा दो, कहो तो मैं डॉक्टर से कहूँ?
बच्चा जी, डक्टराइन उसके लिए मना कर रही थी, कह रही थी अब कुछ नहीं हो सकता।
अरे, तो किस कमीने की हरकत है यह? तुम्हारी बिरादरी का है क्या?
नाहीं बच्चा जी, कनचोदा चुप हो गया।
बताओ दयाल, हो सकता है कि मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकूँ। न हो तो लड़की के ससुराल वालों पर ही दबाव डलवाऊँगा। पहले बताओ तो वह कौन कमीना है?
कनचोदा पिफर चुप।
कटखनी हवा पागल कुत्ते की तरह दाँत चियारे यहाँ-वहाँ छौंछियाती पिफर रही थी। वह जिधर का भी रुख करती, उसके साथ लिसलिसा पीला कोहरा भी बह निकलता। कोहरे में पानी इस तरह भरा था जैसे किसी बजबजाते नासूर में मवाद भरा हो, पीला-पीला, बदबूदार, और वह धीरे-धीरे रिस रहा हो। हवा का झोंका बरामदे में दाखिल हुआ और उसके साथ कोहरा भी उड़कर आया और कनचोदे को धर दबोचा।
कुहासे के बीच कनचोदा बड़ा अजीब सा नजर आ रहा था, जैसे कोई खामोश साया। उसने कथरी ओढ़ रखी थी, और अंगौछा कसकर कान पर बाँधे था। दाढ़ी बढ़ी हुई थी और नाक से बहता पानी मूँछ और नाक से बाहर लटके बालों में उलझकर जम सा गया था। रुखे, कठोर हाथ झुलसे हुए से लग रहे थे, उंगलियों की पोरें पफटी थीं और खून रिस कर पोरों में जमा हो गया था। अचानक वह उठा और तपते के करीब आ बैठा। ऐसा लगा जैसे किसी साए को शरीर मिल गया हो। उसने अंगौछा खोला और नाक-मुँह पोंछकर अंगौछे को कंधे पर टाँग लिया।
दयाल, बोलो भाई! कौन है वह मरदूद?
अब क्या बताएँ बच्चा जी! जो हो गया, उसे अब कौन बदल सके है!
लेकिन मालूम होना चाहिए, मैं शायद कोई रास्ता निकाल सकूँ।
लम्बरदार हैं, कनचोदे ने हौले से कहा और हुचुक-हुचुक रोने लगा।
पिताजी सन्न रह गए। उन्हें मेरे स्वर्गीय नाना का खयाल आने लगा कि कैसे देवता स्वरूप व्यक्ति के खानदान में राक्षस पैदा हो जाते हैं, पहले मामा क्या कम थे जो अब लम्बरदार नमूदार हो गए हैं! कनचोदे ने थोड़ी ही देर में खुद को संभाल लिया था। वह बेवजह अपनी लाठी के एक सिरे से जमीन पर ठक-ठक कर रहा था। उसने अंगौछे से पिफर मुँह पोंछा। उसकी आँख के गड्ढे में इतना खालीपन हो सकता है, मैंने पहले यह कभी नहीं देखा था। पिफर उसने कानी आँख को लपेट में लेते हुए अंगौछा सिर पर कस लिया।
अब क्या करोगे दयाल? पिताजी ने धीरे से पूछा, यह तो बड़ी बेइज्जती की बात हो गई।
हमार कौन बेइज्जती बचा जी! हम तो छाछ हैं। आप हो दूध। दूध पफटता है, छाछ नहीं। बात बस इतनी भर होती तो हम झेल जाते, लेकिन बात बहुत बड़ी है, और वह पिफर हुचुक-हुचुक कर रोने लगा। कथरी उतारकर उसने परे पफेंक दी और चमरौधे से अपना मुँह पीटने लगा।
अरे, अरे, दयाल क्या कर रहे हो? तुम्हें यह अचानक क्या हो गया?
लेकिन वह जैसे सुन ही नहीं रहा था। उसने पिताजी के पैर पकड़ लिए और कातर स्वर में बोला, बच्चा जी! आपको इहाँ सब जानत हैं, जोन डक्टराइन के इहाँ भेजे रहें, ओही से जहर मँगवा दें। बचवा पैदा होते ही ओकर चटाए देब।
क्या बकवास कर रहे हो दयाल, मैं जरूर इस समस्या का हल निकालूँगा, मुझ पर भरोसा रखो, पिताजी ने उसे उठाते हुए कहा।
आप सब समस्या का हल निकाल सकत अहैं, ई हमका पता है, लेकिन जब आपसे हम ई कही कि लम्बरदार अपनी बहिन को भी नहीं छोड़े तब आप का कर लेंगे। यह लौंडिया बाबू साहेब की ही बिटिया तो है!
पिताजी और मुझे काटो तो खून नहीं। उन्होंने सिर आराम कुर्सी की पुश्त से लगाकर आँखें बंद कर लीं। मैं समझ गया कि पिताजी इस असलियत का बोझ उठा नहीं पा रहे हैं। मैं उन्हें सहारा देकर अन्दर ले गया। उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया। अम्मा को उनके पास बिठाकर पड़ोसी डॉक्टर दास को बुलाने दौड़ पड़ा।
क्रांतिकारी जी, कहाँ खो गए? लम्बरदार बोले, चलो उठो, किरिया हो गई।
मैं हड़बड़ा के उठ गया। सामने देखा कनचोदे की चिता के बाँस का सहारा लिए डोम खड़ा है और लाला बढ़ई से कपाल क्रिया करवा रहा है। कपाल क्रिया हो जाने के बाद लाला बढ़ई ने कपाल की तरपफ खड़े होकर बाँस को चिता के दूसरी तरपफ पफेंक दिया। सबने जोर से कहा, राम नाम सत् है!
सबने कनचोदे की चिता को प्रणाम किया, और जुलूस की शक्ल में गाँव की तरपफ लौट पड़े। कपफन का टुकड़ा कमर में और एक हिस्सा गर्दन में बाँधे लाला बढ़ई नंगे पाँव सबसे आगे चल रहे थे। उन्हें दस दिन अब इसी स्थिति में रहना था। हम खरामा-खरामा मेंड़ पर बढ़े जा रहे थे। बारिश कब का बंद हो चुकी थी लेकिन आसमान पर बादलों का डेरा था और कभी-कभार कोई मोटी बूँद टप्प से चू पड़ती थी। हवा नमी से बोझिल थी और उसमें चिराँध का बसेरा था। दूर खेत में औरतें धान की बेरन लगाते गा रही थीं-
बरखा के आई बहार हो,
मैया मोरी झूलैं झुलनवा
बरखा के आई बहार हो
मैया मोरी झूलैं झुलनवा
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