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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
ख़बरनामा
कहानी और कविता का समकालीन परिदृश्य
महादेवी वर्मा सृजन पीठ, मल्ला रामगढ़, नैनीताल, द्वारा ३०-३१ अक्टूबर को 'हिन्दी कहानी और कविता का समकालीन परिदृश्य' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। दो दिवसीय इस संगोष्ठी के तीन सत्राों में सम्पूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। महादेवी सृजन पीठ के निदेशक बटरोही ने कहा कि विगत कुछ वर्षों से यह अनुभव किया जा रहा है कि लेखन समाज के मुख्य सरोकारों से गायब होता चला गया है। कभी साहित्य आदमी के व्यक्तित्व का निर्धारण करता था जबकि आज ऐसा सोचना ही अटपटा लगता है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महात्मा गाँध्ी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री वी.एन.राय थे।

प्रथम सत्रा में समकालीन हिन्दी कहानी विषय पर चर्चा की गयी। इस उद्द्घाटन सत्रा का संचालन नीरजा टंडन ने ंकिया। इस सत्रा में योगेन्द्र आहूजा, अखिलेश, गीत चतुर्वेदी, सत्यनारायण पटेल, नवीन नैथानी, राकेश मिश्र, दिनेश कर्नाटक, त्रोपन सिंह चौहान, टी श्रीनिवास तथा साध्ना अग्रवाल आदि ने भाग लिया। कहानी सत्रा का संचालन करते हुए महेश कटारे ने कहा कि कहानी का काम मनुष्य की धड़कनों को आकार देना है। कहानी पर बात चलती रहती है। कहानी समाप्त नहीं होती। सत्रा का आरंभिक वक्तव्य देते हुए सुप्रसि( कहानीकार योगेन्द्र आहूजा ने कहा कि आज कहानियों का परिदृश्य उत्तेजक है। कहानियाँ उपन्यासों के रूप में सामने आ रही हैं। वे सूचनाओं से अटी होती हैं। तद्भव के संपादक अखिलेश ने कहा कि कहानी समाज के बदलने से बदली। आज के कहानीकार को इस बदले समाज को अभिव्यक्त करने के लिए यथार्थवाद का अतिक्रमण करना होगा। कहानीकार गीत चतुर्वेदी ने सवाल उठाया कि हिन्दी कहानी के शिखर पुरुष हिन्दी के बाहर क्यों नहीं दिखाई देते। दिनेश कर्नाटक ने कहा समय की जटिलता के नाम पर आज कहानियों के साथ बेवजह के प्रयोग कर कहानी को जटिल बना दिया जा रहा है, जबकि महान कहानियों ने हमेशा सादगी से अपनी बात कही है। कहानीकार ममता कालिया ने कहा कि कहानी के क्षेत्रा में आलोचकों ने निराश और दिग्भ्रमित किया है। कृति के अंदर विकृति नहीं आनी चाहिए। कहानी तथा कविताएँ ध्ीरे-ध्ीरे अपना काम करती हैं। रचना आज आलोचना से आगे चली गयी है।

द्वितीय सत्रा में समकालीन हिन्दी कविता पर चर्चा की गयी। इस सत्रा का संचालन सि(ेश्वर ने किया। इस सत्रा के प्रतिभागी थे मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, पंकज चतुर्वेदी, विजय गौड़, राजेश सकलानी, गंभीर सिंह पालनी तथा शैलेय। आरम्भिक वक्तव्य देते हुए विजय गौड़ ने कहा कि विधाएँ अपना अतिक्रमण करती हैं। समकालीन कविताओं पर बात करने के लिए समकालीन कहानियों पर बात होनी चाहिए। पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि नए कवि में आत्मविश्वास तथा आत्मालोचना की कमी है। शैलेय ने कहा कि हिन्दी कविता में अंध्ेरे को चीरने वाली रचनाधर्मिता की आवश्यकता है। राजेश सकलानी ने आज के समय को 'नियंत्रिात अराजकता' का समय कहा। वीरेन डंगवाल ने कहा ऐसा लगता है कि आज की कविता अनुवाद की सुविधा के लिए लिखी जा रही है। कविता को अपने समाज की ध्वनियों तथा शब्दों को व्यक्त करना चाहिए। मंगलेश डबराल ने कहा कि हास्य कविता जैसी चीज केवल हिन्दी में है। उन्होंने कहा मैं पाठक के लिए नहीं लिखता। कवि का काम है कवि के नाते अपने समय को दर्ज करना तथा उसके पार जाना।

३१ अक्टूबर को तृतीय सत्रा का आयोजन किया गया। जिसका विषय था-हिन्दी रचनाशीलता और नए समाज की चुनौतियाँ। सत्रा का संचालन करते हुए कहानीकार देवेन्द्र ने साहित्य तथा समाज के द्वन्द्वात्मक संबंध् को रेखांकित किया। अध्यक्षता सुप्रसि( कहानीकार तथा नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया ने की। भारत भारद्वाज, वीरेन्द्र यादव, अवध्ेश मिश्र, दयानंद अनंत, प्रियदर्शन मालवीय आदि ने इस परिचर्चा में भाग लिया।

अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए सुप्रसि( कहानीकार तथा नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया ने कहा कि यह भ्रम पफैलाया जाता है कि हिन्दी में पाठक नहीं हैं, जबकि अकेले ज्ञानपीठ सालाना लेखकों को तीस लाख रुपये की रायल्टी देता है, जबकि वह शीर्ष प्रकाशन नहीं है। पुस्तकों के दाम पाठकों को अनपढ़ बनाए रखने की साजिश है। बंगाल तथा केरल में खूब किताबें बिकती हैं क्योंकि वहाँ उनके दाम वाजिब रखे जाते हैं। इस दौरान हैदराबाद से आई ज्योति नारायण ने कविताओं पर अपनी बात रखी तथा विजय गौड़ ने चर्चा में हस्तक्षेप किया। समापन वक्तव्य मगांअंहिंविवि के विशेष कार्याध्किारी राकेश श्रीवास्तव ने दिया।

 

'जिस लाहौर नई वेख्या ओ जम्याइ नइ' का मंचन

 
'साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश देते हुए यह नाटक आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना भारत-पाक विभाजन, जिसकी विषयवस्तु पर यह आधारित है, के समय रहा होता ...या मंचन के २० साल पूरे कर लेने के बाद है।' हिन्दी अकादमी के उपाध्यक्ष प्रो. अशोक चक्रधर ने उक्त विचार असगर वजाहत द्वारा लिखित और राजेन्द्र नाथ द्वारा निर्देशित नाटक 'जिस लाहौर नई वेख्या ओ जम्याइ नइ' के मंचन के अवसर पर प्रकट किए। हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रस्तुत यह नाटक २३ एवं २४ अक्टूबर, २००९ को श्रीराम सेन्टर में प्रदर्शित किया गया। अकादमी के सचिव डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव 'परिचय दास' ने इस नाटक को समकालीन होते हुए भी कालजयी नाटक की संज्ञा दी।
श्रीराम कला मंडल द्वारा प्रस्तुत इस नाटक में भारत पाक विभाजन के समय लखनऊ से लाहौर गये सिकंदर मिर्जा को वहाँ रतन लाल जौहरी की हवेली अलॉट हो जाने की कहानी है। लेकिन वहाँ जाने पर परिवार का सामना उसमें रह रही रतन की बूढ़ी माँ से होता है जो किसी भी तरह डराने-ध्मकाने के बावजूद वहाँ से भारत जाना नहीं चाहती। ध्ीरे-ध्ीरे मिर्जा परिवार और रतन की माँ में प्यार-मोहब्बत का रिश्ता कायम हो जाता है। सिकंदर मिर्जा कापिफर को द्घर में रखने पर मुहल्लों के गुंडों द्वारा धमकाने पर भी रतन की माँ की सुरक्षा करते हैं और उसकी मृत्यु पर बेटे का पफर्ज निभाते हुए हिन्दू रीति से उसका दाह संस्कार करते हैं। जिस मौलवी के कहने पर उन्होंने यह सब किया था अन्त में उसकी हत्या उन गुंडों द्वारा कर दी जाती है।
मानवीय एकता और भाईचारे का संदेश देते इस नाटक का पहला मंचन २७ सितम्बर, १९९० को इसी श्रीराम सेंटर में स्व. हबीब तनवीर के निर्देशन में किया गया था। तब से पिछले बीस वर्षों में इसके एक हजार से ज्यादा शो देश के विभिन्न हिस्सों में ही नहीं कराची, लाहौर, दुबई, वाशिंगटन, सिडनी, लंदन में भी हो चुके हैं। दोनों दिन खचाखच भरे हाल में राजेन्द्र यादव, संजीव, विष्णु नागर, अनिल चौध्री, पिफरोज अब्बास और अन्य लेखकों, पत्राकारों, नाट्यकर्मियों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
 
कथा का वर्तमान समकाल ढूंढने की चेष्टा
 
''बहुत पुराने सच को नए रूप में और नुकीले ढंग से प्रस्तुत कर विचलित करती है यह कहानी। नायक और खलनायक की दूरी को मिटा देती है। जो पराजित है वही विजेता है 'लूजर विन्स' मुहावरे को सत्य करती हुई।'' उक्त विचार प्रख्यात कथाकार और आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह ने हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा आयोजित 'कथा समुच्चय' कार्यक्रम में संजीव द्वारा पढ़ी गई कहानी 'ऑपरेशन जोनाकी' पर व्यक्त किए। ४ नवम्बर को हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा आयोजित 'कथा समुच्चय' में चन्द्रकान्ता, संजीव और बलराम की कहानियों का पाठ किया गया।

सबसे पहले व्यास सम्मान प्राप्त चंद्रकान्ता ने कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधरित कहानी 'पफाँस' का पाठ किया। विस्थापन के बाद दिल्ली में रह रहे एक हिन्दू परिवार के पास कश्मीर से आए पड़ोसी सनाउल्लाह जाते हुए जमीन बेचने का प्रस्ताव रखते हैं। इस कथावस्तु पर यह कहानी आधरित है। असल में वह वही 'पफाँस' है जो बदलते हालातों और संदर्भों में दो समुदायों या कहें दोस्तों के बीच पफंसी हुई है। इसके बाद संजीव ने अपनी कहानी 'ऑपरेशन जोनाकी' पढ़ी। एक पुलिस अध्किारी अनिमेष की कहानी जो चिन्मय नाम के 'देशद्रोही' में अपने अपहृत हुए पुत्रा सौरभ या बाद में सत्येन की द्घेराबंदी के दौरान उसमें अपने खोए पुत्रा की छवि देख रहे हैं। कौन देशभक्त है? और कौन देशद्रोही? के द्वन्द्व को बड़ी बारीकी से पकड़ती यह कहानी हमारी कानून-व्यवस्था और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है।

संजीव ने इस कहानी का नाट्य रूप भी तैयार किया है। बलराम ने 'शुभ दिन' नामक कहानी का पाठ किया। ग्राम्य जीवन को प्रमुखता से अभिव्यक्त करने वाले बलराम ने इस कहानी में दिल्ली में रह रहे पति-पत्नी और उनके एक बेटे के दस साल के जीवन का एक प्रामाणिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। शहरी भागदौड़, यहाँ की जरूरतों से उपजे तनाव में दैहिक सम्बन्धें की खत्म होती बुनियाद।
अकादमी के सचिव डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव 'परिचय दास' ने इस अवसर पर कहा कि इस श्रृंखला के माध्यम से हम कथा का वर्तमान समकाल ढूंढ़ने की चेष्टा कर रहे हैं। इस अवसर पर बलराम के कहानी संग्रह 'गोआ में तुम' का विमोचन भी डॉ. विजयमोहन सिंह ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. विजयमोहन सिंह ने की।

 
आज के समय में नौटंकी
 
ध्ीरे-ध्ीरे गायब हो रही विभिन्न प्रदर्शनकारी कलाओं को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किए कार्यक्रमों की श्रृंखला में हिन्दी एवं मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली ने हाथरस शैली की नौटंकी का आयोजन त्रिावेणी सभागार में किया। शिकोहाबाद उत्तर-प्रदेश से आए कृष्णा माथुर और उनके साथियों ने 'इंदल हरण' नौटंकी की प्रस्तुति दी। पंडित नत्था राम गौड़ अखाड़े की इस नौटंकी का विषय था-आल्हा-उदल की वीरता। उनके मामा माहिल द्वारा छलपूर्वक बदला लेने की कुटिल चालें। आल्हा के बेटे का अपहरण करा कर उदल और उसकी भाभी मछला के साथ गंदे संबंधें का हवाला देकर उदल को मरवाने की चेष्टा। नौटंकी की शुरुआत परम्परा के अनुसार 'भेंट' गायन से हुई। बीच में गाए गए विभिन्न गीतों को भोजपुरी भाषा में गाया गया। डॉ. मुकेश गर्ग ने नौटंकी की प्राचीन परम्परा और उसकी वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ध्ीरे-ध्ीरे खत्म होने के कगार पर पहुँच रही इस विध को बचाना बेहद जरूरी है। हिन्दी और मैथिली-भोजपुरी अकादमी के सचिव डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव 'परिचय दास'नेआश्वासनदियाकिअकादमीआगेभीऐसेकार्यक्रमकरतीरहेगी।
 
अखबारी खबर की तरह छंद के बिना कविता
 
'कविता में केवल संद्घर्ष ही नहीं बल्कि सौंदर्य भी हो। इसके साथ छंद का होना भी जरूरी है। छंद के बिना कविता अखबारी खबर की तरह लगती है।' उक्त वक्तव्य वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने २६ अक्टूबर को मानव प्रकाशन की ओर से आयोजित एक अंतरंग संवाद गोष्ठी में दिया। उन्होंने आगे कहा कि गद्य की भाषा ने भी हिन्दी कविता का नुकसान किया है। हालांकि हिन्दी कविता में गद्य र्ध्म एक पुरानी परंपरा रही है। गद्य के रहने से हमें अच्छी व खराब कविता का पफर्क समझ में आ जाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय भाषा परिषद के निदेशक विजय बहादुर सिंह ने की तथा संचालन मृत्युंजय श्रीवास्तव ने किया। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने कहा कि अशोक वाजपेयी की कविता में मुझे कल्पनाशीलता कम दिखती है, जबकि इनकी कविता सोचती बहुत है। सोच के साथ शब्दों का युग्म इनकी कविता की ताकत है। वैसे तमाम चीजों के बावजूद अशोक जी की कविताएँ हमें काम की तो लगती हैं, लेकिन यह हमें रमाती नहीं। इस मौके पर अशोक वाजपेयी ने कार्यक्रम में उपस्थित कई लोगों के साहित्य से जुड़े सवालों के जवाब भी दिये। इस कार्यक्रम में अरुण माहेश्वरी, एकांत श्रीवास्तव, आशुतोष, आँषिकेश राय आदि ने शिरकत की।
 
कृष्ण बिहारी को मूर्तिदेवी पुरस्कार
 
वर्ष २००६ का मूर्तिदेवी पुरस्कार कृष्ण बिहारी मिश्र को और २००७ का पुरस्कार केंद्रीय मंत्राी वीरप्पा मोइली को दिये जाने की द्घोषणा की गई। मूर्तिदेवी पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ की ओर से दिया जाता है। कृष्ण बिहारी मिश्र को मूर्तिदेवी पुरस्कार उनकी रचना 'कल्पतरु की उत्सवलीला' के लिए दिया गया। २००७ का मूर्तिदेवी पुरस्कार वीरप्पा मोइली को उनकी रचना 'रामायण अन्वेषणम' के लिए दिया गया। पुरस्कार राशि के तहत दो लाख रुपये एवं प्रशस्ति पत्रा और वाग्देवी की प्रतिमा भेंट की जाएगी। इन पुरस्कारों का चयन टीएन चतुर्वेदी की अध्यक्षता में सत्यव्रत शास्त्राी, के सच्चिदानंदन, प्रतिभा राय, आँषभ चंद्र जैन, अखिलेश जैन और रवीन्द्र कालिया ने संयुक्त रूप से किया।
 
बदल रहा है भारत का सामाजिक यथाथ
 
'भारत का सामाजिक यथार्थ अत्यंत जटिल, विविध्, बहुस्तरीय और रूढ़िब( है। वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेजी से नहीं कि यहाँ की सामाजिक चेतना को बदल दे। इससे पहले और तेजी से बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति जैसी शक्तियाँ सामाजिक चेतना को बदल रही है।' युक्त वक्तव्य ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि एवं आलोचक कुँवर नारयण ने पटना में दिया। ५ नवंबर को साहित्यिक पत्रिाका 'नई धरा' द्वारा उसके संस्थापक संपादक उदयराज सिंह की स्मृति को समर्पित पाँचवाँ स्मारक व्याख्यान कार्यक्रम पटना में आयोजित हुआ। इस व्याख्यान का विषय था 'साहित्य और आज का समाज।' इस अवसर पर उदयराज सिंह की र्ध्मपत्नी शीला सिन्हा ने कवि कुँवर नारायण को 'उदयराज सिंह स्मृति सम्मान' से विभूषित किया। साथ ही उन्होंने राध्ेश्याम तिवारी के काव्य संग्रह 'इतिहास में चिड़िया' का लोकार्पण भी किया। समारोह की अध्यक्षता आलोचक डॉ. खेगेन्द्र ठाकुर ने की एवं संचालन 'नई धरा' के संपादक डॉ. शिवनारायण ने किया।
 
प्रथम राजकमल कृति सम्मान
 

प्रथम राजकमल कृति सम्मान २१ अक्टूबर को 'कबीर-हजारी प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार' के रूप में डॉ. पुरूषोत्तम अग्रवाल को उनकी कृति 'अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय' के लिए दिया गया। कृति पांडुलिपि पुरस्कार नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय के प्रेक्षागृह में एक समारोह में दिया गया। इस समारोह में सद्यः प्रकाशित डॉ. पुरूषोत्तम अग्रवाल की पुरस्कृत कृति का लोकार्पण पिफल्मकार श्याम बेनेगल ने किया। पुस्तक के बारे में श्याम बेनेगल ने कहा कि लेखक ने कबीर के आध्यात्मिक पक्ष को बहुत ही तटस्थ दृष्टि से देखा है। इसमें उस विवाद को विराम मिल गया है कि रामानंद कबीर के गुरु थे या नहीं।
इसी वर्ष राजकमल प्रकाशन ने अपने सपफल प्रकाशन के साठ वर्ष पूरे किए हैं। इस उपलक्ष में राजकमल प्रकाशन ने साठ साहित्यिक पांडुलिपियों के लिए साठ लाख के पुरस्कारों की द्घोषणा की थी। समारोह की अध्यक्षता डॉ. नामवर सिंह ने की।

 
हृषिकेष सुलभ सम्मानित
 

राँची में १२ सितम्बर को स्पेनिन संस्था द्वारा प्रथम 'सि(नाथ कुमार स्मृति सम्मान' ०९ हृषिकेश सुलभ को प्रदान किया गया। इस अवसर पर साहित्य गौरव सम्मान भी डॉ. राजेन्द्र नागदेव, इन्दु श्रीवास्तव तथा रंजना जायसवाल को दिया गया। पूर्व में साहित्य गौरव सम्मान अनिता रश्मि और विनोद साव को मिल चुका है। स्पेनिन के निदेशक के संजय सहित डॉ. शिवशंकर मिश्र, डॉ. रविभूषण, डॉ. श्रवण कुमार गोस्वामी एवं महुआ माजी उपस्थित थीं।
प्रस्तुति : प्रतिभा कुशवाहा

 
 
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