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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
प्रभाष जोशी पर विशेष
प्रभाष जोशी पर विशेष/खेल

जिस पर देवता पफूल बरसाते हैं फजल इमाम मल्लिक

कोई १७ साल पहले छह जून, १९९२ को ेंच ओपन टेनिस चौंपियनशिप के पफाइनल में मोनिका सेलेस ने स्टेपफी ग्रापफ को तीन सेटों तक खिंचे मुकाबले में हराकर खिताब जीता था। मैच ऐतिहासिक हुआ था। खास कर महिला टेनिस ग्रैंड स्लैम में इस तरह के मैच देखने को विरले ही मिलते हैं। तब प्रभाष जोशी ने सात जून के जनसत्ता में इसी शीर्षक से दोनों खिलाड़ियों के खेल की ताकत और कमजोरी पर अपनी टिप्पणी की थी। मोनिका सेलेस की इस कामयाबी पर उन्होंने लिखा था 'यह करिश्मा चारित्रिाक शक्ति का है। स्टेपफी ग्रापफ तीन साल पहले ेंच ओपन लगातार तीसरी बार जीतकर


इतहिास नहीं बना पाईं। लेकिन मोनिका सेलेस कल रात तीसरी बार भी जीत गईं। स्टेपफी के साथ पेरिस के रोलां गारा के सभी सोलह हजार दर्शक थे और वे अपनी महानायिका के संद्घर्ष की हर सपफलता पर तालियां पीट रहे थे। मोनिका सेलेस के साथ दर्शक नहीं थे। लेकिन सेलेस के साथ मोनिका सेलेस थीं। ऐसी बड़ी-बड़ी ऐतिहासिक द्घड़ी में जीतता वही है जिसके साथ वह खुद होता है। इसलिए जो खुद के साथ होता है खुदा भी उसके साथ होता है'। उनकी इन पंक्तियों में ेंच ओपन के उस पफाइनल का पूरा रोमांच है जो सेलेस को सेलेस बनाकर पाठकों के सामने रखता है। अब जब इन पंक्तियों को दोबारा पढ़ रहा था तो लग रहा था
कि रोलां गारा के उस स्टेडियम में बैठकर दोनों के बीच खेले जा रहे मैच का हम लुत्पफ उठा रहे हैं। सेलेस के पफोरहैंड और बैकहैंड की महारत का जिक्र है तो स्टेपफी के बैकहैंड की कमजोरी पर भी उन्होंने कलम चलाई थी। दोनों के बीच खेले गए मैच के रोमांच के पल-पल को उन्होंने जैसे उस रात टीवी पर जिया था। सेलेस को संपूर्ण 'खिलाड़िन' करार देते हुए प्रभाष जोशी ने लिखा था कि कभी बोर्ग के खेल पर नस्तासे ने कहा था कि हम टेनिस खेलते हैं, वे क्या खेलते हैं मालूम नहीं। अब जीना गैरिसन का कहना है कि मोनिका के खिलापफ खेलना कुछ 'मा पफलेषु कदाचन' जैसा है। टेनिस जैसे खेल को गीता के श्लोक में ढाल कर किसी खिलाड़ी के खेल को परिभाषित प्रभाष जोशी ही कर सकते थे, कोई दूसरा नहीं। खेलों की शब्दावली में 'खिलाड़िन' और 'महानायिका' का अदभुत प्रयोग हम में से कितने खेल पत्राकारों ने किया है या करने की सोचा भी होगा?

आज जब उन पर लिखने बैठा तो अचानक मुझे उनका लिखा याद आया जिसे बहुत ही सहेज कर मैंने अपनी डायरी में रख छोड़ा था। सत्राह साल से उनके इस लिखे को सहेज कर रखने की एक बड़ी वजह यह रही कि टेनिस 'खेलों' पर आज भी उनके जैसा कोई लिखने वाला नहीं है। टेनिस पर उनके लिखे को पढ़ते हुए टेनिस की न सिपर्फ नई बारीकियों का पता चलता है बल्कि अपनी शास्त्राीयता से वे ऐसा संसार रचते थे जिसमें खिलाड़ियों को एक-दूसरे से खेलते देखने जैसा आनंद मिलता था। टेनिस से अपने इस लगाव को वे जग-जाहिर भी करते थे। टेनिस के मैच भी वे उसी चाव से देखते थे। अक्सर बातचीत में इसका जिक्र भी करते थे। ेंच ओपन हो या विंबलडन ग्रैंड स्लैम के मैच शायद ही उनसे छूटे हों। रात-रात भर टेनिस को देखना। टेनिस के रोमांच के उन क्षणों को वे उसी तरह जीते थे, जिस तरह क्रिकेट के मैचों का लुत्पफ उठाते थे। स्टेपफी ग्रापफ और मोनिका सेलेस के मैच हों या क्रिस इवर्ट और मार्तिना नवरातिलोवा के, पीट सांप्रास और आंद्रे अगासी व ब्योर्न बोर्ग से लेकर जान मैकेनरो और रोजर पफेडरर पर उनके लिखे को पढ़ने के बाद ही पता चलता है कि टेनिस को हिन्दी पट्टी में लोकप्रिय बनाने में उनका कितना और कैसा योगदान है। मुझे तो याद नहीं पड़ता है कि किसी भी भाषा के संपादक ने खेलों पर इतना लिखा है। प्रभाषजी इकलौते संपादक थे जो न सिपर्फ खेलों पर लिखते थे बल्कि उन पर पैनी नजर भी रखते थे। किसी एक भारतीय भाषा के किसी एक संपादक का नाम याद आ रहा है तो कोई बताए जिसने लगातार खेलों पर लिखा है।

यह बात दीगर है कि क्रिकेट ने उनके टेनिस पर लिखे को पीछे छोड़ दिया। सचिन तेंदुलकर और उनका क्रिकेट प्रेम ही चर्चा के केंद्र में रहे और टेनिस ऐसे में कहीं पीछे छूट गया। हालांकि हाल के कुछ सालों में उन्होंने टेनिस पर उतना नहीं लिखा। इसकी एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि टेनिस में जो नए खिलाड़ी आ रहे हैं उनमें पहले जैसी एकाग्रता नहीं रही है। मोनिका सेलेस और स्टेपफी ग्रापफ के बाद महिला टेनिस में कोई ऐसी खिलाड़ी नहीं है जिसका एकछत्रा राज रहा हो। पुरुषों के टेनिस में पफेडरर जरूर हैं और कुछ सालों तक बने भी रहेंगे लेकिन उनके बाद तो लंबे समय तक बादशाह बनने की कुव्वत किसी में दिखाई नहीं देती। मुझे याद पड़ता है एक बार प्रभाषजी ने इस पर भी टिप्पणी की थी। उन्होंने लिखा था कि टेनिस का हाल भी कुछ-कुछ हिन्दी सिनेमा जैसा हो गया है। हर हफ्रते नंबर एक पर नया खिलाड़ी आ बिराजता है। एक समय था कि अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी सालों नंबर एक रहे। पर अब हाल यह है कि हर शुक्रवार को नंबर एक का ताज बदलता रहता है। ऐसा ही हाल टेनिस में है।

नवरातिलोवा, क्रिस इवर्ट के बाद स्टेपफी ग्रापफ और मोनिका सेलेस ने टेनिस में अपना दबदबा बनाए रखा। पर इनके बाद तो हर दिन उलटपफेर होता रहता है। पुरुषों के वर्ग में भी इसी तरह का खेल चल रहा है। टेनिस पर उनका यह विश्लेषण हिन्दी के पाठकों को आसानी से समझ में आ गया होगा। टेनिस की लोकप्रियता को हिन्दी सिनेमा से जोड़कर पाठकों के एक बड़े वर्ग को उन्होंने यह बताया था कि टेनिस में भी नंबरों का खेल चलता है। ेंच ओपन के उसी पफाइनल मैच का जिक्र करते हुए प्रभाषजी ने आगे लिखा था-'तीन बार लगातार ेंच ओपन जीत कर सेलेस ने इतिहास बना लिया। लेकिन टेनिस का परम पद विंबलडन का मुकुट है। सेलेस की अग्नि परीक्षा विंबलडन की द्घास पर इस महीने के आखिरी सप्ताह से होगी। वहाँ अगर सेलेस ने स्टेपफी को इसी तरह मार दिया तो महानता की ओर उनकी यात्राा की शुरुआत होगी। अठारह साल की खेलती-कूदती और मौज-मजा करती सेलेस के लिए यह भारी काम है। लेकिन ८७-८८ में स्टेपफी ग्रापफ उन्हीं की उम्र में यह कर चुकी हैं। वह तो अपने पिता के कर्मों की शर्म उन्हें झकझोर नहीं देती तो स्टेपफी पर पिछले दो साल से ग्रहण नहीं लगा होता। चलिए दोनों को विंबलडन में पिफर देखेंगे। और संभव है वहाँ भी स्टेपफी और सेलेस ऐसा ही टेनिस खेलें जिस पर देवता पफूल बरसाते हैं।'

सेलेस इसके बाद रुकीं नहीं थीं और वे नंबर एक खिलाड़िन बन गई थीं। प्रभाष जोशी ने सेलेस के खेल में बहुत आगे जाने की क्षमता को उस रात देखा था। जाहिर है कि इसके बाद सेलेस हमेशा स्टेपफी को मात देती रहीं। एक साल बाद स्टेपफी के एक जुनूनी प्रशंसक ने हैंबर्ग में खेले जा रहे मैच में सेलेस की पीठ में छुरा मार दिया था ताकि स्टेपफी पिफर से नंबर एक खिलाड़ी बन जाएँ। तब प्रभाषजी ने कागद कारे में 'मोनिका के मन पर' शीर्षक से लिखा था-मोनिका की चीख भी सुनी है और अस्पताल में स्टेपफी ग्रापफ को उसके साथ रोते भी देखा है। उसके पागल चहेते दर्शक ने उसे पिफर नंबर एक बनाने के लिए मोनिके सेलेस को जो छुरा मारा है वह पीठ में तो मोनिका के लगा है लेकिन दिल में ग्रापफ के लगा होगा। कोई भी शिखर खिलाड़ी अपने प्रतिद्वं(ी के खून में अपना ही खून देखता है। दोस्ताना होड़ में आप अपने मुख्य प्रतिद्वं(ी से जितने पास आते हैं उतने दोस्ती और प्यार में भी नहीं आते। स्टेपफी के मोनिका के पास बैठकर रोने में एक अपनापन है जो दोस्ती के अपनेपन से भिन्न है, खेलों में इस तरह की भावनात्मक टिप्पणियाँ कितनों ने की हैं मुझे नहीं पता।

लेकिन कम से कम मेरी जानकारी में तो खेल पत्राकारिता में भाषा का यह ओज और दर्शन हिन्दी ही नहीं किसी भी भाषा की पत्राकारिता में शायद ही देखने-पढ़ने को मिले। दोस्ती और प्रतिद्वं(तिा की इस बारीक रेखा का बयान प्रभाषजी ही कर सकते थे क्योंकि खेल उनके लिए महज खेल नहीं था। इसी लेख में आगे उन्होंने लिखा था- 'शिखर पर पहुँचने तक आप इतनी बार जय और पराजय से गुजर चुके होते हैं कि द्घमंड और दंभ बहुत पीछे और नीचे छूट जाते हैं। यह गर्व और विश्वास स्टेपफी ग्रापफ को छुरा खा कर खेल से बाहर हुई मोनिका सेलेस की जगह नहीं लेने देगा। कोई अचरज नहीं कि शुक्रवार को मोनिका की पीठ में छुरा लगा और रविवार को ग्रापफ पफाइनल में अरांगजा से हार गई। पिछली छह बार से वह जीतती आ रही थी। उसने नहीं कहा कि मोनिका के साथ जो हुआ उसके बाद खेलने की उसकी इच्छा नहीं रही। लेकिन देखने वालों ने देखा कि स्टेपफी जैसे
खेलने के रस्म से गुजर रही थी। चुनौती में खेल नहीं रही थी। इसलिए उस जर्मन दर्शक की हिंसा और भी व्यर्थ और बेमानी लगती है।' इन पंक्तियों को पढ़ते हुए क्या यह नहीं लगता कि हम खेल में समाजशास्त्रा की नई परिभाषा को गढ़ रहे हैं। वैसा समाजशास्त्रा जो न तो अंग्रेजी के दिग्गज 'टेनिस राइटर' अपने पाठकों के सामने परोस सकते हैं न ही किसी और भाषा का खलीपफा खेल पत्राकार। उन्होंने भाषा में जिस तरह के नए मुहावरे गढ़े और जो प्रयोग किए उसने खेल पत्राकारिता को एक ऐसी जगह ला खड़ा किया जहाँ से आगे शायद ही अब कोई निकल पाएगा। जो भी खेल पत्राकारिता करेगा वह प्रभाष जोशी को बार-बार दोहराएगा। ठीक उसी तरह जिस तरह हिन्दी में ग़८ाल लिखने वाले अब दुष्यंत का ही अनुसरण कर रहे हैं।

टेनिस पर उन्होंने ऐसे ढेरों आलेख लिखे। सहज और सरल भाषा में लिख कर टेनिस को हिन्दी पत्राकारिता का जरूरी हिस्सा बना डाला। भारतीय खिलाड़ियों में सानिया मिर्जा पर भी लिखा और लिएंडर पेस पर भी। लेकिन विश्व टेनिस में बहुत अच्छा नहीं कर पाने की वजह से भारतीय टेनिस पर उन्होंने बहुत ज्यादा नहीं लिखा। यह भी सच है कि प्रभाष जोशी के क्रिकेट प्रेम ने प्रभाष जोशी के टेनिस प्रेम को कहीं किसी आवरण में इतना ढंक दिया है कि लोगों को उनका यह रूप नजर ही नहीं आता। यह सच है कि क्रिकेट पर उन्होंने बहुत लिखा। सचिन तेंदुलकर की 'लप्पेबाजी' के वे मुरीद थे। सीके नायडू, मुश्ताक अली और सुभाष गुप्ते का गुणगान करते हुए वे नहीं थकते थे। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि स्टेपफी ग्रापफ और मोनिका सेलेस, आंद्रे अगासे और ब्योन बोर्ग के भी वे उतने ही कायल थे। उनके दनदनाते जमीनी स्ट्रोक को देखने के लिए भी वे रात भर टीवी से चिपके रहते थे। हाँ यह मानने में किसी तरह की झिझक नहीं होती कि टेनिस नहीं क्रिकेट उनका पहला प्रेम था। शायद प्रेम से बढ़ कर भी बहुत कुछ।

जनसत्ता के कलकत्ता संस्करण से मेरा जुड़ाव बतौर खेल पत्राकार हुआ तो उसकी वजह प्रभाषजी ही थे। उनके लिखे को पढ़ता रहा था। अजहर के लगातार तीन शतक लगाने पर उन्होंने अपने लिखे का शीर्षक दिया था 'अजहर तेरा नाम रहेगा'। कपिल की गोलंदाजी का जिक्र करते हुए वे अक्सर यह जिक्र भी करते किस तरह चंडीगढ़ में कपिल अपनी पफोटो छपवाने के लिए आए थे। इसलिए उनके लिखे को पढ़ कर क्रिकेट का थोड़ा बहुत ज्ञान तो हो ही गया था और खेलों के शौक की वजह से थोड़ा बहुत पफुटबाल-कबड्डी भी जानता था। इसलिए ताज बंगाल होटल में इंटरव्यू देने के लिए पहुँचा तब तक नहीं सोचा था कि खेल पत्राकारिता करनी है। लेकिन पिफर वहीं बैठे-बैठे पफैसला किया। इंटरव्यू के दौरान प्रभाषजी ने मुझसे सिपर्फ दो सवाल पूछे। एक क्रिकेट से दूसरा पफुटबाल से। मुझे जो लगा मैंने जवाब दिया और पिफर उनके इम्तहान में मैं पास हो गया था।

कलकत्ता में करीब एक दशक से भी ज्यादा खेल पत्राकारिता की। शुरुआती दौर में एक बार उन्होंने गावसकर लिखना बताया। हिन्दी में आज भी गावसकर को गावस्कर लिखते हैं। उन्होंने कहा था सही शब्द गावसकर है, गावस्कर नहीं। दो मौके ऐसे भी आए जब कोलकाता में उनके साथ मैच कवर किया। पहली बार मार्च १९९६ में विश्व कप का सेमी पफाइनल और दूसरी बार पफरवरी १९९९ में एशियाई टैस्ट चौंपियनशिप का मैच। पर यह भी अजब इत्तपफाक रहा कि दोनों मैच दर्शकों की हुड़दंग की भेंट चढ़ गए। विश्व कप के सेमी पफाइनल में भारत और श्रीलंका के बीच ईडेन गार्डेन में खेला गया मैच तब दर्शकों की भेंट चढ़ा जब भारत हार के नजदीक था। उस रात प्रभाष जी को जितना आहत, मायूस और कमजोर होते देखा, शायद वैसा कभी नहीं देखा। स्टेडियम के बाहर थके-थके सीढ़ियों पर बैठ कर भारत की पराजय को वे अपने भीतर पसरा देख रहे थे। दूसरी बार भारत और पाकिस्तान के बीच टैस्ट मैच था। लेकिन चौथे दिन दर्शकों ने भारत के प्रदर्शन पर जम कर हंगामा किया और दूसरे दिन खाली स्टेडियम में भारत की हार की लिखी गई इबारत प्रभाष जी के साथ देखा। उस दिन भी वे उतने ही हताश और मायूस थे। उनके जुनून का पता तब ही चला था। १९९२ के विश्व कप मुकाबले में भारत आस्ट्रेलिया से एक रन से हारकर जब बाहर हो गया था तब प्रभाष जी ने शीर्षक लगाया था 'मर्म में चुभा एक रन का तीर'। इस शीर्षक से ही मैच की पूरी बात समझ में आ जाती है।

अब जब वे नहीं हैं तो लग रहा है कि अब खेल पत्राकारिता में नए शब्द हमें कौन देगा। हमें बीसम बीस जैसे शब्द कौन देगा। इसे वक्त की सितमजरीपफी नहीं तो और क्या कहेंगे कि जिस दिन उनके चहेते खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर ने वन डे क्रिकेट में बेहतरीन पारी खेल कर अपने सत्राह हजार रन पूरे किए, प्रभाष जी ने उसी दिन आँखें मूंद लीं। ३० मई,१९९३ को उन्होंने कागद कारे में अपने मधुमेह का जिक्र करते हुए लिखा था-'पिफर गए साल मेलबर्न के ओलंपिक म्यूजियम में एक पफोटू देखा। आस्ट्रेलिया का सॉकर या रग्बी का कप्तान मैदान में उतरने से पहले अपना इंसुलिन का इंजेक्शन ले रहा है। रग्बी या सॉकर में दम निकल जाता है अच्छे-अच्छे मुस्तंडों का। लेकिन यह शक्कर का ऐसा रोगी कि इसे इंसुलिन का इंजेक्शन लेना पड़ता है लेकिन दमगुर्दा देखिए कि वह खम ठोंकने वालों के देश की टीम का कप्तान है और विश्व कप में खेल रहा है।

उसके चेहरे के निश्चय और उल्लास और उत्साह को देख कर मुझे लगा कि मैं नाहक एक बार पाकिस्तान के एक हथ-कटे तेज गोलंदाज को टैस्ट में गोलंदाजी के लिए भागते देख कर आत्मदया से भर गया था कि मैं जो पूरा साबूत आदमी हूँ अब इस तरह क्रिकेट नहीं खेल सकता। वह पफोटू देख कर मैं मेलबर्न में उसी तरह द्घूमता रहा जैसा सत्ताइस साल पहले लंदन में द्घूमता रहा था। शुगर के साथ, मधुमेह के साथ जिया जा सकता है। जीने की निर्द्वंद्व और भरपूर इच्छा होनी चाहिए। मोह न हो तो मधुमेह आपका कुछ नहीं कर सकता। मैं परसों अपने मधुमेह की दसवीं वर्षगाँठ मना रहा हँू। शक्कर नॉरमल है, गोली भी लेता हूँ और ज्यादा नहीं तो बीस साल जीना चाहता हूँ। आपका आशीर्वाद है?' पर आप तो अपनी लप्पेबाजी कर पहले ही पैवेलियन लौट गए प्रभाषजी। अब हिन्दी की खेल पत्राकारिता में न तो आपके जैसा कोई गोलंदाज है और न ही आपके जैसी कोई लप्पेबाजी कर सकता है। आपके लिखे पर तो देवता भी पफूल बरसाते थे। अब आपकी तरह कौन है जो खेल पत्राकारिता को इतनी ऊँचाई पर ले जाएगा, जिसके लिखे पर देवता पफूल बरसाएँगे।

 
 
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