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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
लद्घु-कथाएँ
रावण : खेमकरण 'सोमन'
  उसका यह रूप देखकर मेरा दिल अंदर से ही काँप गया। मैं उसके और अपने बचपन के दिनों में पहुँच गया।
''जल रावण जल!'' वह अकसर द्घास या अखबार से बनाए गये पुतले को रावण समझकर जलाया करता था। कुछ हद तक वह अपने आपको राम भी समझता था।
''सीता को चुराएगा!'' वह पुतले में आग लगा देता। पिफर ताली मारकर और उछलकर कहता-''बुराई के प्रतीक और बुरे इंसान! जल, तू खूब जल।''

याद नहीं कि उसने कितने रावण के पुतले पफूंकें थे। जलाए थे। ''बुरा इंसान, दूसरों को परेशान करेगा, मरेगा''-वह कहता। उस पर रामलीला का पूरा असर था और राम का भी। ''ए भाई!'' वह मुझे वर्तमान में ले आया-''जहाँ जी करे, द्घूमना। अपना ही इलाका है। साले को चीर दूँगा, किसी ने भी कुछ कहा तुम्हें तो! सब जानते हैं पांड्या ने कितने खून किए हैं। कहाँ तक मेरी पहुँच हैं।'' मैं समझने की असपफल कोशिश कर रहा था कि एक राम कब रावण बन गया।
प्रथम कुंज, ग्राम व डाक-भूरारानी, रूद्रपुर, उधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड
मो. ९०१२६६६८९६

 
उलझन : प्रमोद कुमार चमोली
 
अच्छा आनन्द जी अब हम चलते हैं। आप जैसे दानी सज्जनों की मदद से ही हमलोग निरीह पशुओं की सेवा करते हैं।' करुणा समिति ने चंदा लेने के पश्चात्‌ आनन्द जी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा। उदारमना आनन्द जी ने उन्हें इस नेक काम के लिए धन्यवाद दिया। कभी भी आवश्यकता पड़ने पर और मदद देने का आश्वासन भी दिया।
तभी आनन्द जी का पुत्रा रोहन कमरे में आया और बोला 'पिताजी आपने चंदा दे दिया।' 'हाँ हाँ दे दिया? वो तो हम हमेशा ही देते हैं। आज तुम इस तरह पूछ रहे हो जैसे कि हमने कोई नया काम किया हो।' रोहन ने संयत होते हुए कहा 'वो कुछ नहीं पिताजी, मैं सोच रहा था कि वो अपने पड़ोस वाले सोहन लाल जी हमसे कम दान देते हैं।' आनन्द जी कुछ समझ नहीं पाए और बोले 'बेटा यह उनका निजी मामला है। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हें मेरा चंदा देना पसन्द नहीं आ रहा है । लेकिन बरखुरदार एक बात कान खोलकर सुन लो मैंने जिन्दगी भर कमाया है। मैं जो कुछ दे रहा हूँ, अपनी कमाई से दे रहा हूँ। मुझे इस मामले में हस्तक्षेप अच्छा नही लगेगा।' पिताजी मेरा मतलब यह नहीं था। मैं तो यह कहना चाह रहा था कि 'जंगल में मोर नाचा किसने देखा' रोहन ने कुछ हिचकते हुए पर अपनी बात कह ही दी।
अच्छा तो यह बात है, पर बेटा ये दान इत्यादि तो गुप्त ही अच्छा होता है। अरे भई, असली दान वो होता है जो एक हाथ दे तो दूसरे हाथ को पता भी नहीं चले। रोहन-हाँ पिताजी आप सही कह रहे हैं, दान गुप्त ही होना चाहिए। पर ये सब पुरानी बातें हैं। आजकल सब काम मैनेज करने से होता है। आप सौ रुपये दान देते हैं तो आप को हजार रुपये का प्रचार मिलना चाहिए। आपने देखा है ना सोहन लाल जी को पूरा शहर जानता है। उनकी नेताओं में, अपफसरों में कितनी पहचान है। आजकल यही नियम है कि चंदा- दान दो और प्रचार लो। इससे नाम होता है। पिफर पिताजी जिसका नाम हो जाए उसकी सब गलती छिप जाती है। जब सब जगह जान-पहचान हो जाती है तो व्यापार में भी सहयोग मिलता है।
यह सब सुनकर आनन्द जी सोचने लगे कि सही क्या है? रोहन जो कह रहा है वो सही है? क्या गुप्तदान वास्तव में पुरानी बात हो गई है?
राधास्वामी सत्संग भवन के सामने, गली नं. २, शिवबाड़ी चौराहे के पास, पुरानी शिवबाड़ी रोड, बीकानेर।
मोबाइलः ०९८२८६०००५०
 
आँखें : योगेन्द्र शर्मा
 
कभी उसके जवान बड़े भाई की मौत पर सारे कस्बे में हाहाकर मच गया था। जब उसकी अर्थी उठी थी, तो कस्बे में कोई भी ऐसा नहीं था, जिसकी आँख नम न हुई हो। माँ समेत कई औरतों की आँखे तो रोते-रोते सूज गयी थीं।
और चार दिन पहले आए, इस भयंकर भूकंप ने सारे मकान मलबे में बदल दिए थे। दिन-रात मशीनें लगी हुई थीं। दो औरतें, एक बच्चा, एक आदमी, अधमरी हालत में मलबे से निकाले गये थे, जिन्हें तुरंत अस्पताल भिजवा दिया था।
उसे आश्चर्य हो रहा था कि एक मौत पर कितनी आँखे रोई थीं, और अब सारा कस्बा काल का ग्रास बन गया था, तो बचे हुए ग्यारह लोगों की आँखे सूखी हुयी थीं। सब हैरान परेशान थे कि चार दिन की गली-सड़ी लाशें मलबे से जल्दी निकलें और इस जानलेवा बदबू से छुटकारा मिले।
एम.-२६, गली नं.-३, सिंह कॉलोनी, रूद्रपुर, उत्तराखण्ड
 
 
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