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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
प्रभाष जोशी पर विशेष
शब्दों के शिला लेख
 

राम की अग्नि परीक्षा

राम की जय बोलने वाले धोखेबाज विध्वंसकों ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रद्घुकुल की रीत पर अयोध्या में कालिख पोत दी।
हिन्दू आस्था और जीवन परंपरा में विश्वास करने वाले लोगों का मन आज दुख से भरा और सिर शर्म से झुका हुआ है। अयोध्या में जो एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं और बाबरी मस्जिद के विवादित ढाँचे को ढहाना हिन्दू भावनाओं का विस्पफोट बता रहे हैं-वे भले ही अपने को साधु-साध्वी, संत-महात्मा और हिन्दू हितों का रक्षक कहते हों उनमें और इंदिरा गाँधी की हत्या की खबर पर ब्रिटेन में तलवार निकाल कर खुशी से नाचने


वाले लोगों की मानसिकता में कोई पफर्क नहीं है। एक निरस्त्रा महिला की अपने अंगरक्षकों द्वारा हत्या पर विजय नृत्य जितना राक्षसी है उससे कम निंदनीय, लज्जाजनक और विधर्मी एक धर्मस्थल को ध्वस्त करना नहीं है। वह धर्मस्थल बाबरी मस्जिद भी था और रामलला का मंदिर भी। ऐसे ढाँचे को विश्वासद्घात से गिरा कर जो लोग समझते हैं कि वे राम का मंदिर बनाएँगे वे राम को मानते, जानते और समझते नहीं हैं।
राम के रद्घुकुल की रीत है-प्राण जाए पर वचन न जाई। उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार, भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संद्घ ने सुप्रीम कोर्ट, संसद और राष्ट्र की जनता को वचन दिया था कि विवादित ढाँचे को हाथ नहीं लगाया जाएगा। लेकिन कल अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट, संसद और देश को धोखा दिया गया। कहना कि यह हिन्दू भावनाओं का विस्पफोट है-झूठ बोलना है। जिस तरह से ढाँचे को ढहाया गया वह किसी भावना के अचानक पफूट पड़ने का नहीं सोच-समझ कर रचे गए षड्यंत्रा का सबूत है। भाजपा के ही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संद्घ के नेता भी वहाँ मौजूद थे। वे साधु-महात्मा भी वहाँ थे जिन्हें मार्गदर्शक मंडल कहा जाता है। विहिप, भाजपा और संद्घ को अपने अनुशासित कारसेवकों और स्वयंसेवकों पर बड़ा गर्व है। लेकिन वे सब देखते रहे और ढाँचे को ढहा दिया गया। ढाँचा ढहाते समय रामलला की मूर्तियाँ ले जाना और पिफर लाकर रख देना भी प्रमाण है कि जो हुआ वह योजना के अनुसार हुआ है। भाजपा की सरकार के प्रशासन और पुलिस का भी कुछ न करना कल्याण सिंह सरकार का इस षड्यंत्रा में शामिल होना है।

कल्याण सिंह ने पहले इस्तीपफा दिया और पिफर भारत सरकार ने उन्हें डिसमिस कर के उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया है। भाजपा की एक सरकार ने बता दिया है कि वह अपना जनादेश किस तरह पूरा करती है। उसमें न सै(ांतिक निष्ठा थी, न संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी को वहन करने की शक्ति। वह जिस मौत मारी गई उसी के योग्य थी। क्योंकि वह उग्रवादियों के हाथों का खिलौना हो गई थी और षड्यंत्राकारियों ने इसका इस्तेमाल ढाँचा ढहाए जाने तक किया। वे डेढ़ साल से कल्याण सिंह की सरकार को मंदिर की बाधाएँ दूर करने का साधन बनाए हुए थे। अपने संवैधानिक, संसदीय और नैतिक कर्तव्य से समझते-बूझते हुए पलायन करने वाली सरकार के लिए कोई आँसू नहीं बहाएगा लेकिन जनता पिफर से ऐसी सरकार बनने देगी?

भारत सरकार ने राष्ट्रपति शासन जरूर लगाया है लेकिन इतने महीनों से वह उत्तर प्रदेश सरकार और भाजपा को जिम्मेदार बनाने के राजनैतिक खेल में लगी हुई थी। अब ऐसी हालत उसके सामने है कि अयोध्या में दो-तीन लाख लोग इकट्ठे हैं। पुलिस और अर्धसैनिक बलों को वहाँ पहुँचने में अनेक बाधाएँ हैं। जो टकराव वह टालना चाहती है अब उसमें वह गले-गले पहुँच गई है। ढाँचे की रक्षा, संविधान और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान उसकी भी उतनी ही जिम्मेदारी थी जितनी उत्तर प्रदेश सरकार की। क्या उसने एक प्रदेश की निर्वाचित सरकार पर विश्वास कर के गलती नहीं की? क्या उसे संविधान की रक्षा के लिए गैर संवैधानिक कदम उठाने चाहिए थे? इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे लेकिन इतिहास में वह कोई कारगर सरकार नहीं मानी जाएगी। कोई नहीं जानता कि भारत सरकार अब अयोध्या में कितना कुछ कर सकेगी लेकिन देश का जनमत उसे बख्शेगा नहीं।

सही है कि सभी राजनैतिकों और राजनैतिक पार्टियों ने अयोध्या के मामले को उलझाया है। सभी ने उसका राजनैतिक उपयोग किया है और कल जो हुआ है उसमें इस राजनीति का भी हाथ है। लेकिन राम मंदिर निर्माण का आंदोलन विश्व हिन्दू परिषद चला रही थी। यह संस्था संद्घ की बनाई हुई है। कल से शुरू होने वाली कार सेवा का भार संद्घ ने लिया था। बजरंग दल और शिवसेना के लोग क्या कर सकते हैं इसे संद्घ परिवार जानता था।
लेकिन उनने लोगों की भावनाओं को भड़काया और उन्हें बड़ी संख्या में अयोध्या में जमा किया। राजनैतिक पार्टियों के खेल तो सब जानते हैं लेकिन संद्घ, हिन्दू समाज को हिन्दू संस्कृति के अनुसार संगठित करने का दावा करने वाला संगठन है और विश्व हिन्दू परिषद मंदिर और वह भी राम का मंदिर बनाने निकली संस्था है। आप कांग्रेस और भाजपा को राजनैतिक पार्टियों की तरह कोस सकते हैं। लेकिन संद्घ परिवार को क्या कहेंगे जिसने धर्म और समाज के लिए लज्जा का यह काला दिन आने दिया? देश का वृहत्तर हिन्दू समाज संद्घ के स्वयंसेवकों या विहिप के कारसेवकों से लाखों गुना बड़ा है। यह वृहत्तर हिन्दू समाज अयोध्या में जो हुआ उस पर शर्मिंदा है और देश को कैसे बचाना यह उसी की उदार और सहिष्णु परंपरा में स्थापित है। वह पूछेगा कि राम का मंदिर वचन तोड़कर, धोखाधड़ी और बदले की नींव पर बनाओगे? और जो कहेगा कि हाँ, उससे वह पूछेगा, कि यह हिन्दू धर्म है?

कोई नहीं कह सकता कि कार सेवा के नाम पर ढाँचा इसलिए ध्वस्त हुआ कि अचानक भड़की भावनाओं को रोका नहीं जा सकता था। मुलायम सिंह की तरह अयोध्या जाने पर किसी ने पाबंदी नहीं लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कार सेवा की इजाजत दी थी। जिस इलाहाबाद हाईकोर्ट पर पफैसले को टांगे रखने का आरोप है वह पाँच दिन बाद अधिग्रहीत भूमि पर निर्णय देने वाला था। तब तक कार सेवा ठीक से चल सके इसकी कोशिशों में केंद्र सरकार ने सहयोगी रुख अपनाया था। उत्तर प्रदेश की सरकार ने पुलिस की तैनातगी इतनी कम कर दी थी कि उसे देखकर किसी के भड़कने की संभावना नहीं थी। कार सेवा में जिन रोड़ों की बातें भाजपा-विहिप आदि करते रहे हैं वे सभी हटे हुए थे। और ऐसा भी नहीं कि 'गुलामी' के तथाकथित प्रतीक उस ढाँचे को कारसेवकों और उनके नेताओं ने पहली बार देखा हो कि वे एकदम भड़क उठे। वह ढाँचा वहाँ साढ़े चार सौ साल से खड़ा था और उसमें कोई तिरयालीस साल से रामलला विराजमान थे और वहाँ पूजा-अर्चना की कोई मनाही नहीं थी। पिफर उसे गिराने और इस तरह गिराने की अनिवार्यता क्या थी?

यह भी नहीं कहा जा सकता कि वहाँ केंद्र ने टकराव मोल लिया हो। लोगों को भड़काया हो। भाजपा और संद्घ के ही नहीं विहिप और बजरंग दल जैसे उग्रवादी संगठनों ने भी कहा था कि केंद्र करेगा तो ही टकराव होगा। लेकिन केंद्र कल दिल्ली में सात द्घंटे तक हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा और तथाकथित कारसेवकों ने अपने नेताओं की उपस्थिति में उग्र-से-उग्र काम कर डाला। कोई नहीं कह सकता कि उन्हें उत्तेजित किया गया। कोई नहीं कह सकता कि यह भावनाओं का अचानक विस्पफोट था। यह जबरदस्ती और सोच-समझकर किया गया अपकर्म है। इसमें जो धोखाधड़ी है वह हमारे लोकतंत्रा और पंथनिरपेक्ष संविधान को ही दी गई चुनौती नहीं है। यह पूरे हिन्दू समाज की विश्वसनीयता, वचनब(ता और उत्तरदायित्व को नुकसान पहुँचाया गया है। संद्घ परिवार और पफैशनेबल धर्मनिरपेक्षता की चिंता न भी हो तो कम-से-कम उस समाज की परंपरा, वचनब(ता और विश्वसनीयता की पिफक्र तो करनी चाहिए जिसे वह विश्व का सबसे उन्नत और संस्कृत समाज मानता है।

इसके बाद हम सिख आतंकवादियों के धर्म की आड़ में चलते खालिस्तान और कश्मीर के मुसलमान आतंकवादियों की आजादी के जिहाद का क्या जवाब देंगे? ताकत भी दिखाने के धर्मनिष्ठ, पारंपरिक, संवैधानिक और संसदीय रास्ते हिन्दू समाज के लिए खुले हुए थे पिफर क्यों उसे इस मध्ययुगीन बर्बरता में डाला गया? जो मानते हैं कि ढाँचा ध्वस्त कर के वे हिन्दुत्व की नींव रख रहे हैं वे जल्द ही देखेंगे कि हिन्दू समाज उन्हें कहाँ पहुँचाता है। बदले की भावना से काँपने वाले प्रतिक्रियावादी कायरों के अलावा किसी हिन्दू हृदय ने इस विध्वंस का समर्थन किया है?
देश, केंद्र सरकार और हिन्दू समाज के सामने आजाद भारत का सबसे बड़ा संकट मुँह बाए खड़ा है। अगले कुछ दिनों में उन्हें अग्नि परीक्षा में से गुजरना है। संविधान और संसदीय परंपरा उनके साथ है और उन्हें एकता और अखंडता की ही रक्षा नहीं उन परंपराओं का भी निर्वाह करना है जो हजारों सालों से इस देश को धारण किए हुए हैं और जिनके नष्ट हो जाने से न भारत, भारत रहेगा, न हिन्दू समाज हिन्दू। इस संकट में वे भगवान राम से प्रेरणा ले सकते हैं जिन्होंने ऐसे संकट में विवेक के साथ मर्यादा की स्थापना और रक्षा की है।

 
मुक्ति के कनेर के पीले फूल
 

बहरहाल, पूछना मैं यह चाहता हूँ कि पता नहीं शादी को लोग गुलामी की शुरुआत क्यों कहते हैं। और मैं जो लड़कपन में गाँधी का काम करने के लिए सधुक्कड़ी करता हुआ एक गाँव में चला गया था वह वापस शहर में लौटकर पत्राकार क्यों हो गया और शादी न करने पर टिके रहने के बावजूद एक दिन अचानक हाँ भर दी और आज तक कभी नहीं लगा कि गलती की और अपन गुलाम हो गए जबकि भाई साब इस साल अपनी शादी को तीस साल हो जाएँगे। ऐसा मैं अपने से इस स्वतंत्राता दिवस की सुबह साढ़े चार बजे पूछ रहा था और मेरे चारों ओर हरियाली से पफलती-पफूलती अरावली की पहाड़ियाँ ओस से नहा रही थीं-जैसे झंडा वन्दन के लिए तैयार हो रही हों।
पूछ इसलिए रहा हूँ कि पन्द्रह अगस्त हमारी भैनजी का जन्म दिवस है। ऐसा नहीं कि वे पहले जन्मी हों और पिफर पन्द्रह अगस्त स्वतंत्राता दिवस हो गया हो। उनका कहना है कि उनकी माता बताती हैं कि वे चौदह अगस्त की रात कानपुर में हुई रोशनी देखकर लौटी थीं, और जब संसद भवन में जवाहरलाल भारत के नियति से साक्षात्कार का अपना मशहूर भाषा दे चुके तो एक अस्पताल में कमला देवी उपाध्याय को एक कन्या रत्न की प्राप्ति हुई। सलमान रुशदी का मुहावरा लें तो हमारी भेनजी मिडनाइट चाइल्ड हैं

क्योंकि वे ीडम एट मिडनाइट वाले भारत में जनमी हैं। लेकिन अपने को क्यों नहीं लगा कि जब भारत स्वतंत्रा हो रहा था तब अपने को परतंत्रा बनाने वाली जन्म ले रही थी। या मुहावरे में इस तथ्य का इस्तेमाल करते हुए मैंने कभी क्यों नहीं कहा कि जिस दिन देश आजाद हो रहा था उसी दिन से मेरी गुलामी की शुरुआत हुई? लेकिन मुझे इसमें भी कोई गड़बड़ नहीं लगती कि सबेरे उठते ही भेनजी को हैप्पी बर्थ डे टू यू-कहने के बजाय पहाड़ियों में बन्दर की तरह आवारागर्दी करने अकेला निकल गया हूँ। हेव पफन लेडीज! थैंक्यू वाले कागद कारे का नवभारत टाइम्स में जवाब लिखने वाली किसी कमल कुमार को मेरे विवेक पर आश्चर्य और तरस आया था। क्योंकि 'पति-पत्नी होने पर भी दो द्घंटे में जिनसे वे एक वाक्य तक नहीं बोले। जिन्हें उन्होंने 'बिस्तर लगा दूँ' यानी आँख-कान बन्द कर दूँ-कहकर सुला दिया और स्वयं चौकन्ने पुस्तक पढ़ने के नाम पर स्त्राी-पुराण के एक-एक पल का ब्यौरा बटोरते रहे।'

अब इन बहन जी को क्या मालूम कि कार हो या बस, ट्रेन या विमान, यात्राा पर चलते ही हमारी भेनजी को नींद आने लगती है और उन्हें जगाए रखना उनके साथ ज्यादती है। अंग्रेजी के हमारे विद्वान प्राध्यापक मित्रा दीनदयाल पांडे का उज्जैन में विवाह हो रहा था। हम भैनजी को इस बहाने आउटिंग पर ले गए। अपनी भी शादी तब हुई-हुई थी और साथ यात्राा का वह पहला मौका था और वह भी ऐसे नगर में जहाँ उनके द्घरवालों ने आकर हमारा विवाह किया था। अपन रूमानी ढंग से उत्तेजित और बात करने को मरे जा रहे लेकिन बस चली और भैनजी सो गईं। उठाया और पिफर सो गईं। अपन बहुत दुखी और नाराज। मान लिया कि उनकी अपने में कोई रुचि नहीं है और हमारी शादी हुई तो अच्छा नहीं हुआ। अपने को खुद पर भी संदेह हो और मन विवाह में विपफल होने की हताशा से भर जाए। चिक-चिक हुई और मैंने उन्हें बताया कि उनका सो जाना उनकी संवेदनहीनता की हद है बिगाड़ हो जाता लेकिन उन्हें पहली बार जब मैं लेने गया तो सासुजी ने कहा कि इनके सोने का ध्यान रखूँ। वे रोटी उतारते हुए भी सो सकती हैं और नींद में खाली तवे से रोटी उतारने में उंगलियाँ जला सकती हैं।

अब अपनी तो आदत रात को देर तक पढ़ने की और सबेरे जल्दी उठने की और भैनजी की आदत जल्दी सोने और देर से उठने की। ऐसी उलटी आदतों वाले दो जनों की तीस साल खूब पट गई तो इसीलिए कि अपन ने उन्हें देर से सोने और जल्दी उठने पर मजबूर नहीं किया और उन्होंने हमारे देर तक पढ़ने और जल्दी उठने पर अटाटी-खटाटी नहीं ली। उन्हें उठाकर चार बजे जंगल में द्घुमाने ले जाता और कहता कि देखो वह हँसिए-सा चाँद और दूधिया आकाश गंगा और चारों ओर पहाड़ियों के पीछे से आती भोर-तो वे भाव-विभोर होने की बजाय उबासी लेने लगतीं और किसी पुलिया पर सो जातीं। जंगल के एक महल में उन्हें नौ-दस बजे तक आराम से सोने देना ही उन्हें हैप्पी बर्थ डे टू यू कहना है। इस पर भी कमल कुमार को लगे कि स्त्रिायों को अपमानित करने वाला यह विकृत व्यक्ति अपनी साध्वी और समर्पित पत्नी की हँसी उड़ा रहा है तो अपना निष्कर्ष उन्हें मुबारक। अपनी तो हर स्वतंत्राता दिवस पर भैनजी से कुछ और गहरा जाती है। दूसरों से अपना क्या मतलब?

जैसे कई लोगों को अजीब बल्कि खराब लगता है कि मैं पत्नी को भेनजी कहता हूँ और मुझे इसकी कोई लाज हिचक नहीं है। हर पति-पत्नी या यार-दोस्त एक दूसरे का कोई निजी नाम रख लेते हैं। प्रेम का नाम। अपन ने शुरुआत उन्हें बीनो कहने से की थी। बीना अपने बचपन की दोस्त थी। हमने द्घर बदला। उसके बाद उसका क्या हुआ नहीं मालूम। लेकिन वह नाम एक सद्घन आत्मीयता से जुड़ा है जो अपन ने उषा उपाध्याय से उषा जोशी हुई एक कन्या पर जड़ लिया। पिफर दिल्ली आए तो रहने को गाँधी निधि में द्घर मिला। वहाँ गुजरात और गाँधी के आश्रम की तर्ज पर सब भाई और बेन-पति पत्नी भी। हमारे अमदाबाद के दोस्त प्रकाश शाह माँ को बेन कहते हैं और पिता को भाई कहते थे। उनके पिता भी पत्नी का नाम लेकर आगे बेन लगा देते थे। गाँधी जी कस्तूरबा को बा कहते थे और गुजराती में बा माँ को कहते हैं। बहरहाल वहाँ जो द्घर काम करने वाले आते/आती-वे बीनो बाई को भ्ोनजी कहते/कहतीं। पंजाबी के असर में बेन जी, भेनजी हो गईं। उनसे दिल्ली में कोई पूछता कि आप क्या करती हैं तो वे कहतीं-हमारा क्या है जी! अपन द्घरेलू करमचारी। अगर वे अपने हाउस वाइपफ होने का ऐसा वर्णन करतीं तो अपन उस द्घरेलू कर्मचारी के भी करमचारी-इसलिए उन्हें भेनजी कहना शुरू किया। पच्चीस साल से उन्हें अपना यही एक सम्बोधन है। उन्हें अच्छा लगता है दूसरों को ठीक नहीं लगे तो अपन क्या करें। अपन-वाइपफ, मिसेज या आमची सौभाग्यवती-मजाक में ही कह सकते हैं-प्रेम में नहीं। सिपर्फ नाम लेना अपने संस्कार में नहीं है-किसी का भी। सब लोग मुलगांवकर को श्री कहते। अपन कभी नहीं कह पाए।

बहरहाल, सरिस्का वन क्षेत्रा में द्घूमते हुए मैं अपने से पूछता रहा कि पन्द्रह अगस्त मुझे अपनी निजी गुलामी की वर्षगाँठ या बरसी क्यों नहीं लगती। मजाक में भी मैंने ऐसा कभी क्यों नहीं कहा? भेनजी तो कभी कह भी देती हैं कि ये हमारे माँ-बाप की गलती है। अपन ने नहीं कहा। अपनी शादी का पफैसला माँ-बाप ने किया भी नहीं। अपने माँ-बाप ने तो भेनजी के बापू को कह दिया था कि हमारी तो वो सुनता नहीं। आप पूछ देखो। मान जाएँ तो अपन तो आज कर दें उसका ब्यादला! उन्होंने अपने से पूछा और अपन ने आगा देखा न पीछा, आव देखा न ताव-हाँ कह दिया। उन्होंने बहुत मनाया कि लड़की देख आओ। अपन नहीं माने। सुन्दर लड़की अच्छी पत्नी होगी इसकी क्या गारन्टी? और आप किसी से इसलिए तो प्रेम नहीं करते कि वह विश्व सुन्दरी है। पिफर लोग प्रेम करके राजी-मर्जी से शादी करते हैं। बीस साल साथ रहते हैं। गिरस्ती बसाते हैं। बाल-बच्चे पैदा करते हैं। पिफर इक्कीसवें साल पता चलता है कि नहीं हम एक दूसरे के प्रेम में कभी थे ही नहीं। और ऐसे आदमी/औरत के साथ कोई भला कैसे रह सकता/सकती है। तलाक हो जाता है। क्या खाक समझा एक दूसरे को! जब प्रेम में पागल होकर एक दूसरे से शादी की, बीस साल साथ रहे और एक दूसरे के साथ आपसी समझदारी में बड़े और बूढ़े नहीं हुए तो आधे द्घंटे में किसी लड़की को आप क्या देख लोगे? अगर खानदान और लोग देखकर माँ-बाप का लड़के-लड़की की शादी कर देना खतरनाक रस्म है तो लड़के-लड़की का एक दूसरे को देख लेना, बात कर लेना और हाँ कर देना भी कोई समझदारी की गारंटी नहीं है।

इसमें यही है कि अपनी गलती के लिए वे एक दूसरे को जिम्मेदार मान लेंगे, एक दूसरे को कोस लेंगे। करवाई गई शादी में माँ-बाप या रिश्तेदारों को दोष देने की सुविधा है। मनोवैज्ञानिक बताएँगे कि यह एक राहत है। अपन ने बिना देखे भाले दस दिन में शादी कर ली। भेनजी को शिकायत है कि उन्हें देखकर मैंने हाँ नहीं की न उन्हें मुझे देखकर ना कहने का कोई मौका मिला। अपने को कोई शिकायत नहीं है। स्त्राी-पुरुष के संबंधों का कोई सीधा और स्थापित राजमार्ग नहीं है। शादी एक अन्धा कुआँ है जिसमें आँख मूँदकर छलांग लगानी चाहिए। कुएँ के कीचड़, पत्थर, साँप, बिच्छू को नीर और पफूलों में बदलना आपका काम है। आपमें गड़बड़ होगी तो सापफ मीठे पानी और तल में पड़े गहनों को भी कीचड़ और साँप-बिच्छू बना लेंगे। और जो लोग बहुत जन्मपत्राी आदि दिखवाते हैं उन्हें बाबा तुलसीदास का सीता-राम के विवाह के बारे में लिखा यह पद याद रखना चाहिए-गुरु वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी, शोध के लगन धरी। सीता हरण मरण दशरथ को वन में विपति परी। करम गति टारै नहीं टरी।
पहले एक गाना बजा करता था-पन्द्रह अगस्त इस वास्ते है हमें प्यारा, आजाद हुआ आज के दिन देश हमारा। इसका एक निजी संस्करण अपन ने बना रखा है। पन्द्रह अगस्त हमें इसलिए प्यारा है कि आज के दिन वह महिला जन्मी जिसने कोई सोलह साल बाद मुझे मुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की। निम्न मध्य वर्ग के थोड़े-बहुत पढ़े-लिखे लड़कों की तरह अपने मन में भी कई कुंठाएँ थीं।

अपने वीर्यवान पुरुष होने से लेकर दुनिया में कुछ भी कर सकने के लायक होने की क्षमता में शक था। अनिश्चितताओं, दुर्बलताओं और आत्म संशयों से मन भरा रहता था। लड़की के नजदीक आने पर दिल जोर से धड़कने लगता था, कान लाल हो जाते और कानों में सीटियाँ बजने लगतीं। मैच की पहली गेंद खेलते वक्त पेट में जैसी तितलियाँ पफड़पफड़ाने लगतीं वैसा ही कुछ किसी भी परीक्षा में उतरते या कसौटी पर चढ़ते वक्त होता। अपना किसी पर अधिकार है या कोई अपनी मर्जी से अपना है-ऐसा आत्मविश्वास अपने को नहीं था। हर कदम पर अपने को साबित करना है। हर रन भागकर बनाना है। अपने से चौक-छक्के नहीं लगेंगे। इस अनिश्चितता से बचने के लिए कई बार मैं पहली गेंद पर ही चव्वा मार देता या मारने की कोशिश में डंडा उड़ जाता। उन लोगों को देखकर मैं भौंचक रह जाता जो अपनी कोई गलती देखते ही न थे, जिनको सब खराबियाँ दूसरों में दिखतीं और जो छीना-झपटी करके कुछ भी हथिया सकने में भरोसा करते। अपने को लगता कि अपन सौ टंच कोई काम करेंगे तभी वह होगा। कहीं भी कोई कसर रह गई तो उसका खमियाजा अपने को ही भुगतना है। अपने काँपते, टटोलते और छूट पड़ते हाथ को भेनजी ने थामा और स्पर्श से इतनी शक्ति दी कि मांसपेशियाँ मछलियों की तरह पफड़कने लगीं। एक स्त्राी आदमी को विश्व विजेता होने का जो पराक्रमी आत्मविश्वास देती है वह शायद विश्वविजय के पराक्रम से भी नहीं मिलता। भेनजी ने अपने को काम और पराक्रम की भव बाधाओं से मुक्त किया। स्त्राी से बराबरी के मैत्राी संबंध रख सकने लायक अपने को भेनजी ने ही बनाया।

स्वतंत्राता दिवस की ओस नहाई पावन भोर में द्घूमते-द्घूमते आठ बज गए। लौटने लगा तो लगा कि भेनजी के लिए कुछ ले जाना चाहिए। वहाँ वन सम्पदा के अलावा कुछ नहीं था। चाय-तम्बाकू की एकाध दुकान कहीं थी तो थी, नहीं तो खरीदी के लिए भी कुछ नहीं था। पिफर बटुआ भी पास नहीं था। इसी गुंताड़े में कि क्या ले जाया जाएँ सिलीसेढ़ के लेक पैलेस की चढ़ाई आ गई। चढ़ते-चढ़ते लगा कि थक गया हूँ। तालाब की पाल पर बैठकर सुस्ताया। पिफर चढ़ने लगा तो पीले कनेर का एक पफला-पफूला झाड़ दिखा बियाबान से शिव मन्दिर के पास। कनेर ही हमारा अपना पफूल है। लिली, ट्यूलिप, ग्लेडिओलस, गुलाब आदि तो कनाट प्लेस में मिलने वाले पफूल हैं। अपना उगना तो कनेर, चम्पा, पारिजात, मोगरा, मोतिया आदि के साथ हुआ है। दादी के भगवान के लिए यही कनेर के पफूल तोड़ लाते थे-पीले और लाल। माँ के बाल गोपाल को पारिजात की माला चढ़ती। आँगन या सड़क पर रात को गिरे पानी की तरह बिछे-पफैले होते सपफेद पखंड़ी और पीले डंठल के पारिजात। उन्हीं को बीनकर लाते और माला बनाते। भेनजी के द्घर आँगन में भी कनेर है। बचपन की स्मृतियों में भी कनेर है। पीला कनेरी रंग भी उनका प्रिय रंग है। इससे अच्छा और क्या होगा कि जितने साल की वे हुईं उतने कनेर के पीले पफूल उन्हें दूँ।

लेकिन किसी से पूछे बिना कैसे तोड़ ले जाऊँ? मन्दिर है, छप्पर है, खटिया है तो कोई रहता जरूर होगा। बैठ गया। थोड़ी देर बाद इरिगेशन का चौकीदार लौटा हाथ में लोटा लिए। उससे पूछा तो उसने उत्साह से कहा कि जरूर तोड़ो। तोड़ने के लिए ही तो खिले हैं। वह बन्दर भगाने में लग गया और मैं कनेर से बन्दर की तरह झूम गया। सोलहवें पफूल के बाद मेरी आँखें भर आने लगीं। द्घूम-द्घूमकर डालों से मैंने पफूल चुने और बाईं हथेली में गुलदस्ता बनाया। कपड़ों और हाथ पर कनेर का दूध लग गया। लेकिन उन चमकते पीले पफूलों में से भीनी तैलाक्त गंध आ रही थी। भेनजी जैसी। किसी भी परफ्रयूम से भिन्न और बस जाने वाली। चढ़ते-चढ़ते तालाब में झुके एक लाल बेगनबोलिया की तीन डालें तोड़ीं। उन्हें उँगलियों के बीच से अन्दर किया। पीले पफूलों पर लाल पफूल और अगल-बगल हरे पत्ते। लेक पेलेस के कमरे में जाकर चुपचाप दरवाजा खोला। भेनजी अभी भी कम्बल ओढ़े लम्बी ताने हुई थीं। पफूल उनके तकिए के पास रख दिए। वे जगी हुई थीं। आँखें कम्बल ओढ़े लम्बी ताने हुई थीं। पफूल उनके तकिए के पास रख दिए। वे जगी हुई थीं। आँखें खोले बिना मुस्कराईं। मैंने हैपी बर्ड डे नहीं कहा न उन्होंने थैंक्यू। ये बातें बोलकर नहीं कही जातीं।

 
मुम्पफली छाप आदमी की पहचान
 

दिल्ली का ऐसा कोई चौराहा नहीं है जहाँ आजकल सुबह-शाम जाम न होता हो। पूर्वी और पुरानी दिल्ली के हाल तो साल दो साल में ऐसे गए-गुजरे हो जाएँगे कि कलकत्ते की तरह कार या बस के बजाय पैदल जल्दी पहुँच सकेंगे। लेकिन इतने धूल-धुएँ में पैदल चलकर जो समय और स्वास्थ्य आप बचा पाएँगे उसे प्रदूषण बर्बाद कर देगा। दिल्ली में अभी लगभग बाईस लाख वाहन हैं जो कि बम्बई, कलकत्ता और मद्रास तीनों की वाहन संख्या में ज्यादा हैं। दस-बीस साल में लॉस एंजिलिस की तरह ऐसा भी हो सकता है कि दिल्ली में वाहन ज्यादा हों और लोग कम और उनमें से लगभग सभी के पफेपफड़े खराब हों।

हाल पिफलहाल अपन यही सन्तोष कर सकते हैं कि उस दिल्ली में रहने की अपनी कोई मजबूरी नहीं होगी। लेकिन ये कागद दिल्ली के ट्रैपिफक और प्रदूषण पर कारे नहीं कर रहा हूँ। हर चौराहे पर खासकर सबेरे दफ्रतर जाते हुए और शाम-रात लौटते हुए कार में बैठे रहना पड़ता है और आजकल सर्दी है इसलिए हर चौराहे पर मूँगपफली बेचने वाले बाहर से काँच पर उँगली या पैसे बजाते हैं। उमग कर मन करता है कि एक पुड़िया ले लो। लेकिन हाथ पर चाबुक-सी मारनी पड़ती है। नहीं, डॉक्टर ने सभी नट्स बन्द कर रखी हैं। और मूँगपफली यानी ग्राउंड नट और किसी नट से कम नुकसान करने वाली नहीं है। आखिर मूँगपफली को गरीबों के बादाम कहा ही जाता है। और उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में तो वह चिना बादाम के नाम से बिकती भी है-काले नमक की छोटी-सी पुड़िया और एक हरी मिर्च के साथ।

रेलों और बसों में चतुर पफेरीवाले मूँगपफली को 'टाइम पास' के नाम से भी बेचते हैं। वे जानते हैं कि मूँगपफली में से दाने निकालकर खाने और कभी रेत और कभी सड़ी मूँगपफली से बचने के लिए देख-देखकर खाने से टाइम आसानी से पास हो जाता है। लेकिन अपना मूँगपफली से जो बचपन का और जो सहज नाता है उसमें वह पफालतू टाइम में मन लगाए रखने का शगल नहीं है। पिफलासपफरों और शायरों की तरह जीवन को एक सपफर मान लें तो भी इसे काटने के लिए बीच-बीच में मूँगपफली खाने का काम अपन इससे नहीं ले सकते। संद्घवालों की प्रभावित करने की भाषा और अवधारणाओं का उपयोग करें तो मूँगपफली अपने लिए अस्मिता और जनवादी मुहावरे का इस्तेमाल करें तो पहचान की वस्तु है। लेकिन अस्मिता और पहचान भी आखिर आत्म-चेतना बताने के मुहावरे हैं। अपन मूँगपफली के साथ जन्मे और बड़े हुए हैं इसलिए वह अपने सहज जीते रहने का एक साधन है।

बचपन के सिनेमाद्घरों में जो चवन्नी क्लास कहलाती थी और जिसमें खटमलों से अटी बैंचें परदे के पास हुआ करती थीं-उसे मूँगपफली क्लास भी कहा जाता था। वहाँ बैठने और बिजली गुल होने पर सीटियाँ बजाने और कोई अच्छा डाँस या द्घायल कर देने वाली अदा दिखने पर पैसे पफेंकने वाले लोगों को मुम्पफली छाप लोग कहा जाता था। और हालांकि कोरट में राव साब रहे दा साब के कारण परिवार में जब-तब बालकनी और बॉक्स के पफोकट टिकट भी मिल जाया करते थे। लेकिन परिवार तो अच्छी पारिवारिक और धार्मिक पिफल्में देखने ही जाता था। मवालियों की उचक्की पिफल्मों में तो द्घर के सब लोग जा नहीं सकते थे। ऐसी पिफल्में तो स्कूल कॉलेज से तड़ी मारकर मुम्पफली क्लास में ही देखनी पड़ती थीं। परिवार के साथ राजा बेटा बनकर जाने वाला मैं जैसे असली 'मैं' नहीं था। अपना असलीपन तो वही था जो चवन्नी में बैठकर मूँगपफली खाते हुए पिफल्म देखता था। और कपड़ों में खटमल लेकर आता था।

लेकिन सिनेमा तो और बाद में आया। उसके पहले तो मूँगपफली खाते हुए रामलीला देखने का चलन था। तब रामलीलाएँ नवरात्रिा के पहले दिन शुरू होकर दशहरे के दिन समाप्त नहीं होती थीं। जूनी इन्दौर में चौराहे-चौराहे पर उत्तर प्रदेश से आई मंडलियाँ कई महीने भर रामलीला करतीं। उनका कोई टिकट नहीं लगता। भादों का महीना खत्म होते ही रामलीलाएँ शुरू होतीं और दीवाली तक ही नहीं कोई-कोई तो कार्तिक पूनो तक चलती। रोज के खेल के बाद राम-लछमन-सीता की आरती होती और भक्त लोग आरती लेते हुए थाली में जो चढ़ाते वही जैसे रामलीला देखने का टिकट होता। बीच-बीच में कोई अच्छा सीन हो जाता और देखने वालों की आँखें छलछला आतीं तो कोई दरियादिल उठकर एक रुपया, दस रुपया न्यौछावर कर आता। उन रामलीलाओं को देखने वाले जैसे दर्शक नहीं होते। वे उनमें शामिल होते और अक्सर अपने को किसी पौराणिक काल में अजुध्या का रहने वाला मानते।

रामलीलाओं की उन स्मृतियों के साथ अगर कोई एक ची८ा सौंधी-सौंधी और हूक मारने वाली गंध के साथ जुड़ी हुई है तो मूँगपफली। तब मालवा की काली मिट्टी में होने वाली मूँगपफली पकने लग जाती थी और खेतों में उखड़कर, छोटी-मोटी नदियों और नालों में धुलकर मंडियों में आ जाती। धड़ी के हिसाब से बिकती। रामलीलाओं के चारों तरपफ चार पहियों की गाड़ियों पर पतरों पर जलते चूल्हों पर तगारियों में मूँगपफली सेंकी जाती। सिंकी हुई गीली मूँगपफली के सलवटवाले दोनों का स्वाद ही अद्भुत होता। लोग या तो अपने साथ द्घर से ही सिंकी हुई मूँगपफली लाते या रामलीला में बैठने के पहले खरीद लेते। जब वह चबा ली जाती तो लोग बीच-बीच में जाकर खरीद लाते। रात को जब आरती के साथ उस दिन की लीला पूरी होती और लोग द्घरों में लौटते तो उनके हाथ और होंठ काले होते और जहाँ वे बैठे होते वहाँ छिलकों के ढेर। दूसरे दिन गरीब मंगते उनमें दाने ढूँढ़ते हुए दिखते। स्कूल जाते हुए उन्हें देखता तो जाने क्यों लगता कि उन बच्चों में कहीं मैं भी हूँ। मुम्पफली छाप लोगों से अपनापा और उनके साथ पहचान ऐसी पुरानी और गहरी है।

चौराहों की रामलीलाओं से भी पहले मूँगपफली से अपने लगाव की यादें गणेश विसर्जन की रात मिलों के गणपतियों के विसर्जन के जुलूस से जुड़ी हुई हैं। तब इन्दौर की कपड़ा मिलों में न तो कोई संकट था न उसकी तीन पालियों में काम करने वाले मजदूरों-खासकर उत्तर प्रदेश से आए मजदूरों की कोई कमी थी। मिलों के गणेशोत्सव तो कोई बड़े सांस्कृतिक नहीं होते लेकिन उनके विसर्जन के जुलूस की झाँकियाँ ऐसी होतीं कि दूर-दूर से लोग देखने आते। सारा इन्दौर सड़कों पर जमा होता। द्घरों की रक्षा के लिए बड़े-बूढ़े रह जाते। तब मूँगपफली, कच्ची होती। ज्यादातर में तो दाने भी ठीक से पड़े और पके नहीं होते। लेकिन जुलूस तो रात भर चलते इसलिए इस कच्ची बल्कि दूधिया मूँगपफली की खपत भी कापफी हो जाती। तब मालवी से ज्यादा निमाड़ी मूँगपफली बिकती। निमाड़ में मूँगपफली मालवा से भी ज्यादा होती। निमाड़ की मिट्टी पथरीली होती है और काली मालवी मिट्टी जैसी चिकनी और चीठी नहीं होती। निमाड़ी मूँगपफली मालवी के पहले आ जाती। निमाड़ में मालवा से कम बरसात होती है।

मूँगपफली से आर्थिक हैसियत और वर्ग का भी बँटवारा होता है यह सिनेमाद्घर से ही नहीं क्रिकेट मैचों से भी समझ आया। हम जो बच्चे बिना टिकट पुलिस को चकमा देकर द्घुस जाते और सबसे सस्ती टिकट बाड़ों में बाउंड्री के पास बैठते वे मैच के दौरान वहाँ बैठे दूसरे लोगों की तरह मूँगपफली खाते। लंच और टी के दौरान जब हम खिलाड़ियों के तम्बुओं की ओर धावा मारने जाते तो देखते कि बड़े और रईस लोगों के तम्बुओं के बच्चे जवान-बूढ़े सेंडविच के साथ सेबपफल और सूखे मेवे खा रहे हैं। तभी से अपने बालमन में बैठ गया कि सेंडविच, सेब और सूखे मेवे रईसों के खाने में आते हैं और अपने खाने में आती है मूँगपफली जो वहीं खोमचों पर सिंकती है और जिसके छिलके जगह-जगह पफैले होते हैं और जो लोग ये छिलके पफेंकते हैं वे पफूहड़ हैं वे पफूहड़ और संस्कारहीन लोग हैं। दादी को कभी अच्छा नहीं लगता कि बच्चे स्कूल आते-जाते या रास्ते में कहीं भी मूँगपफली खाते जाएँ। ये कोई अच्छे द्घर के बच्चों के लच्छन नहीं हैं।

रावजी बाजार में हमारे द्घर के सामने मनोहर गोधने भी रहा करते थे। वे जेल में कैदियों को लकड़ी का काम सिखाया करते थे। उन्हें सुतार कहना गलत होगा क्योंकि वे लकड़ी के कलाकार थे। उनके कोई बाल-बच्चे नहीं थे। वे मोहल्ले के हम बच्चों को मजाक में हिलगाए रखते और रंदा चलाने जैसे काम भी सिखाते। मनोहर काका हरसाल सर्दी में चिलगौंजे खाते दिखते। कभी-कभी एकाध मुट्ठी हमें भी दे देते। मैं तो तब जानता भी नहीं था कि पफली की लम्बी चीजों की तरह दिखने वाली उस ची८ा को चिलगौजा कहते हैं और वह सूखे मेवों में बड़ी कीमती ची८ा मानी जाती है। मनोहर काका से तो कोई दूरी नहीं थी और वे कोई ऐसे रईस भी नहीं थे। लेकिन उन्हें चिलगौजे छीलकर खाते देखता तो मुझे लगता कि वे ज्यादा ताकत पाने के लिए रईसों जैसे चोंचले करते हैं। शायद इसलिए कि उन्हें बच्चे चाहिए। अगर वे हम बच्चों से इतना प्रेम और हँसी-ठठका न करते होते तो उन्हें ठंड में मूँगपफली के बजाय चिलगौजे खाते देखकर मैं मन-ही-मन मान लेता कि वे गड़बड़ आदमी हैं।

मूँगपफली मुझे हमेशा बिलकुल अपनी लगती है। वह साबूदाने की खिचड़ी में पड़ती है इसलिए यह खिचड़ी जो सिपर्फ उपवास के दिन खाई जाती है मुझे पकवान लगती है। मूँगपफली के दाने खट्टी-मिट्ठी दाल-अमटी और महाराष्ट्र की पातलभाजी में डलते हैं इसलिए मुझे अमटी और पातलभाजी भी बहुत अच्छी लगती है। स्कूल में हमेशा मैं गुड़पट्टी लिया करता जो कि गुड़ की चाशनी में बनाई गई मूँगपफली की चक्की होती है। पहले स्कूलों के बाहर छोटे-छोटे खोमचे लगाने वाले आदमी-औरत और भी कई चीजें बेचा करते लेकिन मैं मूँगपफली की गुड़पट्टी ही लेता। अब भी सरकारी और नगर निगमों के स्कूलों के बाहर ऐसे आदमी-औरत बैठते होंगे और उनमें पढ़ने वाले बच्चे यही सब चीजें खरीदते होंगे। अपना साबका अब चूंकि पब्लिक स्कूलों और कॉन्वेंटों से पड़ता है इसलिए बच्चे कैंडी, आइसक्रीम, पेस्ट्री आदि ही खरीदते दिखते हैं। इन बच्चों में अपने को मैं नहीं पाता न लगता है कि ये अपने बच्चे हैं। अपने बच्चों को स्कूलों में पढ़ते और खरीदते-खाते मैंने देखा ही कहाँ?
लेकिन मालवा छोड़ आने के बाद भी अपना सबसे प्रिय चबैना मूँगपफली ही बना रहा। हर साल इन्दौर भोपाल से धड़ी दो धड़ी सिंकी हुई या कच्ची मूँगपफली मँगवाता रहा। कई बार खुद जाता तो साथ में लेकर आता। बड़े भगौने में नमक के पानी में मूँगपफली डालकर रात भर भिगोता और दूसरे दिन खूब उबालता।

पिफर पानी निकालकर मूँगपफली को लोहे की कढ़ाई में सेंकता। नमक में उबली और मन्दी आँच पर सिंकी उस मूँगपफली का स्वाद ही निराला होता है। द्घर भर को खिलाता और उम्मीद करता कि बच्चों को मेरे जैसा मालवी मूँगपफली का स्वाद लग जाएगा। वे अब भी इन्दौर जाते हैं तो खाते हैं लेकिन कच्ची मूँगपफली का न तो उन्हें वह स्वाद है न उससे वह लगाव है जो मुझे है। दिल्ली आने के बाद गुजरात से संबंध जुड़ा तो वहाँ से सींगदाणा लाने लगा। उससे अपना मोह देखकर प्रकाश भाई की पत्नी नयना बेन भी आते-जाते आदमी के हाथ सींगदाणा भिजवाने लगीं-नमकीन, कुरकुरे और शायद मशीन में एक जैसे सिंके हुए मूँगपफली के दाने। कई बार द्घर में इतने इकट्ठे हो जाते कि थोड़े दिनों के बाद खाने लायक नहीं रहते।

दिल्ली आने के आठ-दस महीने में ही राजद्घाट कॉलोनी में द्घर मिल गया और कुछ समय बाद भवानी प्रसाद मिश्र का परिवार भी वहीं आकर रहने लगा। तब अखबार में काम करने की भागदौड़ और देर रात तक दफ्रतर में चिमटा गाड़े बैठने की जरूरत तो होती नहीं थी। शाम को भवानी बाबू के छोटे बेटे-अनुपम मिश्र और मैं दरियागंज सब्जी और गिरस्ती का सामान लेने निकलते। दिल्ली गेट के कोने पर बैठे खोमचेवालों से चवन्नी का पैकेट खरीद लेते। शायद वह पचास या सौ ग्राम होती। हम लौटते होते तब भी उसमें कुछ मूँगपफली बची होती। हालांकि वह लाल मिट्टी या रेत में सिंकी होती और एक-चौथाई से ज्यादा अन्दर से पफोकली होती। नर्मदा की रेत में सिंकी मालवी मूँगपफली के सामने इस मूँगपफली का कोई स्वाद नहीं होता। पिफर भी बीस-पच्चीस साल पहले की उन निष्पिफकर शामों की सबसे अच्छी यादों के साथ मूँगपफली जुड़ी हुई है। एक्सप्रेस में आने के बाद भी मूँगपफली से अपना प्रेम बना रहा। इसी को समझकर गए साल तक रीता राय दफ्रतर में भी अपने लिए सौ ग्राम का एक पैकेट जब तब लाती रहीं और नयना बेन अहमदाबाद से सींगदाणा भिजवाती रहीं। जब तक इस तरह दफ्रतर में और राह चलते या कार में मूँगपफली चबाता रहा-लगता रहा कि अपन वही मुम्पफली छाप आदमी हैं।

लेकिन अब चौराहे पर बीस मिनट भी लग जाएँ तो मूँगपफली का पैकेट नहीं खरीद सकता। ड्राइवर रामसिंह ने बताया कि अब दो रुपए में पचास ग्राम मिलती है वह भी सड़ी हुई। अपन न सिपर्फ मूँगपफली नहीं खा सकते डॉक्टर ने उसका तेल भी बन्द कर दिया है। नहीं तो पहले अपने को मूँगपफली के अलावा सिपर्फ दिल्ली का तेल मालूम था। पंजाब हरियाणा से लेकर बंगाल असम तक सरसों का तेल खाया जाता है इसकी समझ दिल्ली आने के बाद हुई। और अब सारा खाना करडी के तेल में पका खाते हुए उबकाई आने लगती है। इस मुम्पफली छाप आदमी की मूँगपफली छिन गई, उसका मीठा तेल छिन गया, उसमें तले नमकीन छुट गए। सुबह-शाम मुट्ठी भर गोलियाँ खानी होती हैं जिनकी कीमत कम-से-कम बीस रुपए होती है। अपने हिसाब में अब भी बीस रुपए में मन भर मूँगपफली आती है जिसे द्घर भर चाहे तो सारी सर्दी भर खा सकता है। जानता हूँ कि बीस रुपए में आधा किलो मूँगपफली आएगी जिसमें से अच्छे दाने तो दो मुट्ठी ही निकलेंगे। लेकिन मुम्पफली छाप आदमी का हिसाब भी तो अपनी छाप का ही बना रहता है।

मूँगपफली छुड़ाकर डॉक्टर ने मुझसे मेरी पहचान छीन ली है। मालवा की काली मिट्टी में से मूँगपफली का पौधा खींचकर निकालो तो जड़ों में मूँगपफली लगी दिखती है। मैं सीमेंट-कंक्रीट की सड़क पर पड़ा हुआ वह पौधा हूँ। और मालवा की काली मिट्टी में आजकल सोयाबीन की पफसल उगाई जाती है। कहीं आपने सुना कि कोई सोयाबीन छाप आदमी है जिसका उससे वही लगाव है जो मेरा मूँगपफली से है? सुनें तो बताना। अच्छा!

 
समय ने अपना काम किया
 

आखिर अपन बहत्तर के हो गए। अब ये होने का ऐसा है कि आप चाहो कि होते रहना रुक जाए और आप वहीं खड़े रहो जहाँ कि कल खड़े थे तो ऐसा नहीं हो सकता। और ऐसा भी नहीं हो सकता कि आप जल्दी-जल्दी होने लगें और जितनी लिखा कर लाए थे वह आज ही पूरी हो जाए। होते रहना आपके साथ और आपके बावजूद भी होता रहता है। आप कैसे ही तीस मार खां हों, आपका होना आप से निरपेक्ष है। इस पर आपका कोई बस नहीं चल सकता।
जैसे मैं मन ही मन मना रहा था कि बहत्तर पूरे न करूँ। इस साल को लेकर मेरे अंदर कई शंकाएँ और भय भरे हुए हैं। उन्नीस सौ आठ में जन्मे मेरे दा साब मजे से चल रहे थे कि एक दिन अचानक पता चला कि उन्हें गले में कैंसर है। इंदौर के द्घर में सब लोग सुन्न रह गए। मैं चंडीगढ़ था तो उन्हें लेकर आया। वहाँ के पीजीआई में उनके कागज दिखाए। रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर गुप्ता ने कहा कि जल्दी पकड़ में आ गया है। बिलकुल पिफकर मत करो। ठीक हो जाएँगे। उनने रेडियो थेरेपी की और दा-साब सचमुच ठीक हो गए। उनने दाढ़ी रख ली। इंदौर हो आए। छह महीने बाद पीजीआई में पिफर जांच हुई तो कैंसर का गले में नामोनिशान नहीं था। सेहत बनाने के लिए चंडीगढ़ से बेहतर कोई जगह हो नहीं सकती थी। अच्छा खाना-पीना और सुबह-शाम टहलना।

बिलकुल ठीक चल रह रहे थे कि सन अस्सी के दिसंबर महीने के आखिरी दिनों में एक शाम टहलने निकले। सड़क पर बस से टकरा गए। न कोई चोट न खून। उसी पीजीआई में उन्हें निर्जीव देखा, जहाँ से वे कैंसर से मुक्त हो कर आए थे। डॉक्टर गुप्ता सदमे में। कैंसर से तो नहीं हो सकती डेथ। जी सही है। वे एक्सीडेंट में गए। दा साब बहत्तर साल और कुछ महीनों के थे।
वैसे ही मन्ना! यानी भवानी प्रसाद मिश्र। हमारे लिए दिल्ली में दा साब के पर्याय। उसने दिल के इतने दौरे झेल लिए थे कि कई बार लगता था हमारी गिनती अवैज्ञानिक है। दो दौरे तो हमारे सामने पड़े थे। एक गाँधी निधि में और दूसरा कानपुर में। कानपुर का बड़ा जबरदस्त था। वहीं उन्हें अस्पताल में देखा। देखते ही बोले-हिरना, समझ बूझ बन चरना। उन दिनों कुमार जी का गाया यह कबीर पद हम लोगों के मुँह पर था। कानपुर में उन्हें पेस मेकर लगा। उसकी उमर पूरी हुई तो दस साल बाद इरविन में नया लगा।

कवि सम्मेलन करने या यों ही भाषण देने जाते तो सबसे मिलकर जाते। विदा करने वालों को डर लगता रहता कि क्या पता पिफर इन्हें देखने का मौका मिले न मिले। वे तब भी उस उमर और उस स्वास्थ्य में सेकंड स्लीपर पर यात्राा करते। ऊपर की बर्थ मिल जाती तो भी सीना और उमर दिखाकर बदलवाते नहीं। ऊपर चढ़ कर झोले में पैसे लिए रात काट देते। लौटकर पिफर सबसे मिलते तो कहने लगते-देखो लौट आया सई सलामत।
ऐसी ही एक यात्राा पर वे अपने गाँव-नगर नरसिंहपुर गए। खंडवा में दो भाषण दिए। पिफर नरसिंहपुर गए। एक दिन दिल का ऐसा जानलेवा दौरा पड़ा कि न पेस मेकर काम आया न कोई दवा। नरसिंहपुर में उनके खेत पर ही राख हुआ उनका शरीर देखा। मन्ना भी बहत्तर बरस के थे।
नहीं, यह मत समझ लीजिए कि दा साब और मन्ना के बहत्तर पूरे करके जाने से अपन डरे हुए हैं कि अब अपना नंबर। ऐसे तथ्य मैं छानबीन करके अपने पास तैयार रखता हूँ ताकि सभी संभावनाओं से अपने को सचेत रखूँ। अभी उस दिन मन्ना के बड़े बेटे अब्बी यानी अमिताभ मिश्र के साथ हम अपोलो अस्पताल जा रहे थे। उन्हें भी यह हिसाब मैंने सुनाया। उनने कहा-कोई बात नहीं भाई साब! अपन अपनी उमर में अपने बाप से बेहतर हैं और दा साब तो इस उमर में बहुत बूढ़े लगते थे। आप तो बड़े चंगे हैं। डॉक्टर ने कहा ही है। लेकिन यह तो हिसाब है अब्बी भैया। दुनिया हिसाब से चलती कहाँ है। माँ के बाद पिता ही अपनी देह बनाने वाला है। उसे याद रखना चाहिए।

हमारे विष्णु चिंचालकर यानी गुरुजी तो चौरासी के होकर गए। उनके मन में सहस्र चंद्र दर्शन की इच्छा थी। लेकिन ये विलक्षण चित्राकार जब पचहत्तर के हुए तो हमने उनका अमृत महोत्सव मनाने का विचार किया। गुरुजी मालवी के 'गेल्या' होने तक सीधे और सच्चे आदमी थे। मेरी बरात में उज्जैन गए। बस में बैठे-बैठे सुंदर सरौते से बारीक सुपारी काट रहे थे। खुद ही बोले और हँसे 'गोल्यो बेटी बरात जाए, पान सुपारी द्घर की खाय।' ऐसे गुरुजी ने हमसे कहा-'मैं पचहत्तर का हुआ, इसमें मेरा क्या पराक्रम है! समय ने अपना काम किया है। उसके अजेय पराक्रम का उत्सव हम निराक्रमी कैसे मना सकते हैं।' लेकिन उनने अपने जाने के लिए शीलनाथ महाराज का वही भजन कुमार जी से गवाकर रखा था जो शीलनाथ बाबा ने आँषिकेश में समाधि लेते हुए अपने शिष्यों से सुना था। उस भजन से गुरुजी को ऐसा मोह था कि एनसीईआरटी ने उन पर जो पिफल्म बनाई उसके अखीर में भी उनने बजवाया।
रविशंकर महाराज ने जब सौंवे साल में प्रवेश किया तो अपन अमदाबाद में थे। प्रकाश भाई के साथ उनके दर्शन करने गए। बिलकुल गाँधी वाली सादगी में, जो कमरे को पावित्रय दे रहे थे, वे लेटे थे। बातचीत के अंत में प्रकाश भाई ने उनसे पूछा-अब सौवीं वर्षगाँठ कैसे मनाओगे। उनने सादी निर्मल मुस्कान के साथ कहा-बस इसी तरह लेटे-लेटे।

उमर का ऐसा अहसास ही न हो, मुझे लगता है कि यही असली जिजीविषा है। जीने और जीते रहने का सही तरीका। हम नाहक अपेन मन और शरीर पर जिए हुए वर्षों की मरी हुई लकड़ियों का बोझ डाले रखते हैं। बचपन में माताराम कहती थी-बीसे विद्या तीसे धन, नी आय तो रे गया मूसलचंद। बीस में विद्या और तीस में धन आ जाना चाहिए। लेकिन अपने को तो न विद्या आई न धन मिला। दिल्ली आया तो तीस का था। रेल का टिकट उधार पैसे से खरीदा। भैनजी गिरस्ती लेकर आईं तो एक टैक्सी में सब आ गया था। रामनाथ गोयनका और राधाकृष्ण पहली बार द्घर आए तो बैठाने को दो कुर्सियाँ नहीं थीं। भागवत साबू मंत्राी बने तो दिल्ली आए। भैनजी ने कागज जलाकर चाय बनाई और उन्हें पिलाई। एक बार मुकुंद कुलकर्णी बस भर के अपने कार्यकर्ता ले आए। रात हो गई थी। उन्हें ठहरा तो लिया, लेकिन रोटी बनाकर खिलाने पूरता द्घर में आटा नहीं था।

इस सबसे न तो अपने को धन कमाने की प्रेरणा हुई न कभी दीनता और दैन्य का अहसास। कबीर ने सिखाया था कि पफकीरी में मन लगाओगे तो चारों खूंट जगीरी में होंगे। अब भी हैं, हालांकि पफकीरी उतनी नहीं रही। अपनी पफकीरी पर कभी तरस नहीं आया दूसरों के वैभव से जान नहीं जली। गिरस्ती बस गई तो पिफर कबीर ने साथ दिया। साँई इतना दीजिए जा में कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ न साधु भूखा जाय। जो दूसरे का है वो मेरा हो नहीं सकता। इसलिए सारी छीना-झपटी बेकार है। आप किसी के साथ दौड़ में नहीं हैं। जो हैं वे पिछड़ जाने के लिए अभिशप्त हैं। शायद रवींद्रनाथ ने कहा है-मैं किसी से नहीं लड़ा, क्योंकि कोई भी मेरे वार के लायक नहीं था।
मैं जानता हूँ कि अपने यहाँ मनमोहन सिंह खुले बाजार की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ले आए हैं। सब ज्यादा से ज्यादा कमाने की होड़ में दौड़ रहे हैं। होड़ को नव-उदार पूंजीवाद तरक्की की पहली प्रेरणा और शक्ति मानता है। अपने चमकीले नौजवानों को टाई बाँधे और लैपटाप लटकाए बदहवास दौड़ते हुए मैं देखता हूँ और मेरी इच्छा होती है कि उनके कंधे पर हाथ रख कर पूंछूँ-बेटा कहाँ जा रहे हो? पद, पैसा और अमेरिका स्वर्ग नहीं है। और यह होड़ तुम्हें स्वर्ग में भी रुकने नहीं देगी। यह चाहती है कि तुम दौड़ते हुए गिरो और खल्लास हो जाओ। तुम्हारी जगह से कोई और ज्यादा सक्षम जवान दौड़ने लगे। यह सबको दुड़वाती रहना चाहती है। बताती नहीं कि जो दौड़ता है वह कहाँ पहुँचता है? कितने देश अमेरिका और उससे भी ज्यादा समृ( हो गए? अमेरिकी कितने सुखी और सार्थक हैं? दूसरों की उधार पूंजी पर कैसे जी सकते हैं? पैसे से क्या-क्या खरीदा नहीं जा सकता। तोबड़ा बाँध कर जो तुम्हें दुड़वा रहा है उससे पूछो कि वह तुम्हें पहुँचाएगा कहाँ? होड़ का तोबड़ा इसीलिए कि कोई रुककर पूछे नहीं कि क्यों?

इससे आपको कहीं यह न लगे कि अपन बहत्तर से डरे हुए हैं और संन्यास में झूठी सार्थकता देख रहे हैं। पंद्रह साल पहले अपन ने संपादकीय छोड़ी इसलिए कि अपनी और भैनजी की बाई पास हुई थी। डॉक्टरों का कहना था कि अब थोड़े आराम से जियो। लेकिन उसके बाद डायबिटीज को पच्चीस साल हो गए। पेस मेकर भी लग गया। लेकिन द्घूमना तो रुका ही नहीं है। पहले से ज्यादा यात्रााएँ होती हैं। ज्यादा गोष्ठियों, सभा-सम्मेलनों और मेलों में जाना होता है। पहले से ज्यादा लिख रहा हूँ। लिखने-पढ़ने में पहले से ज्यादा मन लगता है। संगीत सुनता हूँ। क्रिकेट और टेनिस देखता हूँ। लोगों से बातें करते हुए अक्सर भावुक हो जाता हूँ। अमूर्त स्थितियाँ और अनुभूतियाँ रुला तक देती हैं।
लोग उमर और शारीरिक अवस्था की याद दिलाते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता। सभा-गोष्ठियों में हिन्दी वालों की आदत के मुताबिक-पितृ पुरुष, शिखर पुरुष, पितामह आदि कहा जाता है तो मुझे अपमानजनक लगता है। यह कोई पफोकट की जवानी छाँटना नहीं है। अपनी उमर का दिखना सच्चा दिखना है। जो बाल काले करते हैं वे मुझे अपनी हकीकत छुपाने वाले झूठे लोग लगते हैं। सुबह-शाम में चौदह गोलियाँ लेने और दिन में तीन बार छत्तीस यूनिट इंसुलिन लगाने वाले आदमी को क्या अपनी सेहत का अंदाज नहीं होगा?

पिफर भी मुझे अंदर कभी बुढ़ापा नहीं लगता न कभी सब कुछ छोड़ देने की इच्छा होती है। अभी उस दिन दिग्विजय सिंह के साथ आसनसोल उतरा। कार से देवद्घर गया। वहाँ से बांका होते हुए सुल्तानगंज पहुँचा। वहाँ से रात साढ़े दस बजे धौरी के लिए निकले और वहाँ से रात दो बजे देवद्घर। ढाई बजे सोए। साढ़े चार बजे पिफर उठे। नहा-धोकर निकले और दो द्घंटों में सुल्तानगंज पहुँचे। भागलपुर से बांका होते हुए रात को देवद्घर। छत्तीस द्घंटों में बस दो द्घंटे नींद।
आप कहेंगे पागलपन है। लेकिन अपन ने एक पल भी नहीं सोचा कि क्यों? ऐसा करने के खतरे जानता हूँ। लेकिन बैठ गया तो सड़ जाऊँगा। किसी से दौड़ में नहीं हूँ। अपने से भी नहीं। बचपन से रोज कुआं खोदने और पीने की आदत है। पीछे की कमाई न जोड़ के रखी है न उस पर जीता हूँ। जीवन का काम तो अभी करना है। अपना सर्वश्रेष्ठ तो अभी आना है।

 
 
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