| ओम प्रकाश अडिग |
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'इस शहर में
पफंस गया लगता भंवर में।
इस शहर में।
रह न पाए पाँव स्थिर,
कुछ लगे ऐसे थपेड़े।
डूब जाते हैं यहीं पर,
रूप के सुकुमार बेंडे़।
क्या हुआ, ऐसा प्रवासी-
लग रहा द्घर में?
इस शहर में।
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गिर पड़े स्तंभ सारे,
चाह के, इस मन के।
अब न जाने क्या लिखा है,
भाग्य जीवन के?
कंपकंपा कर आ गया है,
दर्द पिफर स्वर में।
इस शहर में।
पड़ रही ढीली दिनोंदिन,
पकड़ इस मुट्ठी की।
प्रीति ने लगता दुबारा,
आज छुट्टी की।
द्घोलकर मुस्कान, रख दी है-
जहर में।
इस शहर में॥
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| शब्द का आचरण |
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मौन कवि है,
गा रहा वातावरण है।
शब्द का यह आचरण है।
दूर तक पफैला हुआ है,
एक सुख सपना।
गिरि शिखर वर वृक्ष लगता,
है सहज अपना।
खोलकर बैठा
गगन क्या व्याकरण है?
शब्द का यह आचरण है।
चाँदनी सी, कौन, सागर में,
गया भर?
एक मधु संगीत छिड़ता,
आँतु अधर पर।
पुस्तकों में,
मिल न पाया उद्धरण है।
शब्द का यह आचरण है।
कौन-सी लय, द्घूमती
जिस पर दिशाएँ?
पफूल अपने रूप पर ही-
मुस्कुराएँ।
हो रहा कुछ ज्योति का,
शुभ अवतरण है।
शब्द का यह आचरण है। |
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