| पाठकों की राय में |
|
| |
'कागद कारे' के पाठक
दिनेश कुमार : पहले पुरानी पीढ़ी जाती थी तो दूसरी पीढ़ी उस कमी को भर देती थी। आज के समय का संकट यह है कि एक पीढ़ी के जाने के बाद दूसरी पीढ़ी रिक्त स्थान की भरपाई नहीं कर पा रही है। यह केवल पत्राकारिता में ही नहीं है। साहित्य, राजनीति से लेकर हर क्षेत्रा में ऐसा महसूस किया जा रहा है। अभी दूसरा कोई उस कद का नहीं तैयार हो पा रहा है। कारण चाहे जो कुछ भी हो। प्रभाषजी के जाने के बाद केवल उनका कालम ही नहीं उनकी विरासत को आगे बढ़ाने वाला दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता है।
जहाँ तक जनसत्ता की बात है तो प्रभाषजी के कालम और लेखन की कमी तो महसूस होती रहेगी। लेकिन इससे जनसत्ता की सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जनसत्ता से उनका जुड़ाव महज लिखने भर था। संपादकीय सलाहकार पद |
|
से भी वे मुक्त हो चुके थे। कोई हस्तक्षेप नहीं था। कागद कारे और क्रिकेट पर उनका लिखा अब जनसत्ता में नहीं होगा। उनकी कमी महसूस होती रहेगी। जनसत्ता की सेहत पर अब इसका इसलिए नहीं पड़ेगा क्योंकि जनसत्ता अपने प्रसार के न्यूनतम स्तर पर है।
संत समीर : जनसत्ता और प्रभाषजी एक दूसरे के पर्याय थे। प्रभाषजी ने अखबार के साथ ही भाषा का तेवर और समाचार का रूप भी बदला। संपादक के पद से हटने के बाद जनसत्ता का क्रेज कम हुआ। बाद के दिनों में पाठक रविवार को जनसत्ता इसलिए खरीदता था क्योंकि प्रभाषजी का कागद कारे कालम होता था। अब सिपर्फ एक कालम ही नहीं बंद हुआ बल्कि उतनी बेबाकी, निर्भीकता और सापफगोई से लिखने वाला भी कोई नहीं है। अपने लेखन में वे संबंधों को आड़े नहीं आने देते थे। उस तेवर का लिखने वाला कोई दूसरा इस समय नहीं है।
पाठक अभी कुछ दिन इस उत्सुकता में जनसत्ता से जुड़ा रहेगा कि इस कमी को कैसे पूरा किया जाता है। जनसत्ता की स्थिति प्रभाषजी के बाद बहुत अच्छी नहीं थी। लेकिन उनके जुड़े रहने भर से एक क्षीण सी उम्मीद बनी रहती थी कि जनसत्ता पिफर एक बार अपने वैभव में आएगा। कागद कारे स्तंभ जनसत्ता से अंतिम जुड़ाव था। यदि इस कमी को पूरा नहीं किया गया तो अंतिम जुड़ाव भी टूट जाएगा। प्रभाषजी की इच्छा थी कि जनसत्ता पिफर अपने तेवर के साथ आएगा। अब देखना यह है कि संपादक और प्रबंधन उस सपने को कैसे संजोते हैं। जनसत्ता एकमात्रा ऐसा अखबार था जो बाजार में रहकर भी बाजार के बाहर की बात करता था।
ब्रजेश कुमार : प्रभाषजी का न रहना सिपर्फ जनसत्ता और पत्राकारिता की ही क्षति नहीं है, हिन्दी समाज के बौ(कि जगत की यह अपूरणीय क्षति है। प्रभाषजी ने पत्राकारिता को जनसरोकारों से जोड़कर हिन्दी पत्राकारों में आत्मसम्मान का भाव जगाया। बेबाक, निर्भीक और विश्लेषणात्मक लेखन ही उनकी विशेषता थी। बात एक स्तंभ तक ही सीमित नहीं है। उनकी उपस्थिति पत्राकारिता को अनुशासित करती थी। लोकसभा चुनाव में पैसे लेकर खबरों को छापने पर उन्होंने अखबारों के खिलापफ अभियान ही शुरू कर दिया था। उनके एक-एक शब्द विश्वसनीय थे। हिन्दी जगत उनकी कमी को पूरा कर सकेगा ऐसा देखने में नहीं आता है।
सुशील राद्घव : प्रभाष जोशी को पत्राकारिता और जनसत्ता के दायरे तक बांधना उचित नहीं होगा। उनका व्यक्तित्व बहुत विशाल था। वह जो सोचते थे वही बोलते और लिखते भी थे। यहाँ तक कि उसके लिए संद्घर्ष भी करते थे। बिहार से लेकर राजस्थान तक अभी हाल में ही यात्रााएँ की थीं। यह किसी न किसी आंदोलन में भागीदारी करने की यात्रााएँ थीं। अरुणा राय और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जब सूचना का अधिकार कानून के लिए संद्घर्ष शुरू किया, तब उन्होंने नारा दिया था ''जीने का अधिकार जानने का अधिकार'' प्रभाषजी कहते थे कि जीने का अधिकार तभी संपूर्ण होगा जब जानने का अधिकार मिलेगा।
आजीवन वह ''सबके लिए खबर और सबकी खबर'' लेते रहे। उनके न रहने से सिपर्फ कागद कारे स्तंभ ही नहीं बंद हुआ है बल्कि सामाजिक और सार्वजनिक जीवन का एक स्तंभ चला गया जो पत्राकारिता को लोकतंत्रा का 'चौथा खंभा' होने की सार्थकता स्पष्ट करता था। पत्राकारिता, राजनीति, आंदोलन और सार्वजनिक जीवन को बेदाग और बेबाक रूप से जीने वाले प्रभाषजी का जाना प्रकाश के एक अक्षय स्रोत का जाना है जो अंधकार की सीमा बताता था।
श्रुति मिश्रा : कागद कारे ने सत्ता और समाज के प्रभावशाली लोगों के काले कारनामों की जिस अंदाज में खबर लियी, प्रभाषजी के जाने के बाद लगता है कि उस बेबाकी से लिखने वाला अब कोई नहीं बचा है।
कागद कारे में एक तरपफ प्रभावशाली लोगों की खबर है तो दूसरी तरपफ निजी दोस्तों और परिवार जनों से आत्मीय संबंधों का जिक्र। निजी संबंधों का जिक्र भी कहीं से निजी नहीं लगता है। वह भी समाज में द्घट रहे रोज-ब-रोज के संबंधों का उतार-चढ़ाव। 'कागद कारे' के स्थान पर जनसत्ता में जो पुस्तक समीक्षाएँ आ रही हैं उससे एक खालीपन का बोध होता है।
प्रस्तुति : प्रदीप कुमार |
| |
|
| |
|