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प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्राकारिता को नई चाल में ढाला। शास्त्राीयता की झंकार पैदा करने वाले तार को हटाकर लोक की थाप वाली गूंज पैदा की। जनसत्ता के जरिए ठेठ हिन्दी के ठाठ वाली देसी पत्राकारिता का नया दौर प्रारंभ हुआ। बौ(कि प्रखरता और भाव-प्रवणता के संतुलन के साथ प्रभाषजी की भाषा में मालवी छौंक मौजूद है। अब प्रभाषजी नहीं, उनकी पत्राकारिता की प्रभा शब्दों के रूप में शेष रह गयी है। उनको विनम्र सादर श्र(ांजलि स्वरूप प्रस्तुत है उन पर विशेष सामग्री
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