| प्रभु त्रिावेदी |
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मूर्छित सभी विहंग
मरणासन पीपल पड़ा, नीम करे विषपान।
लगा मनुज की बु(ि पर, प्रश्नवाचक निशान॥
कटे सैकड़ों पेड़ जब, पंछी हुए तबाह।
चिड़िया ने चूजों सहित, तब किया आत्मदाह॥
हृदयविदारक दृश्य वह, मूर्छित सभी विहंग।
तिनका-तिनका द्घोंसले, हुए बसेरे भंग॥ |
वृक्ष काटने से बड़ी, काँकरीट की भीड़।
बया ढूँढ़ती रात-दिन, कहाँ बसाए नीड़॥
रहवासी खुश हो गए, पंछी हुए उदास।
सड़क नीम को खा गई, साक्षी है आकास॥
हत्या करते वृक्ष की, जो दें नेह अगाध।
समय लिखेगा मनुज का, ये जद्घन्य अपराध॥
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