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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
रपट/कथाक्रम समारोह
समय में धंसकर रचने की चुनौती
  इस बार 'कथाक्रम सम्मान' दिया गया ग्रामीण यथार्थ को अभिव्यक्त करने वाले कथाकार महेश कटारे और इस दपफा विमर्श का विषय था-'हिन्दी साहित्य और भविष्य का समाज।' दोनों ही बातें अहम थीं। जब साहित्य राजधानी दिल्ली और यहाँ रहने वालों के बीच उलझ रहा है, ऐसे में मध्य प्रदेश के दूर गाँव में किसानी कर रहे कथाकार महेश कटारे को सम्मान देना सुखद था। दूसरे बदलाव की मौजूदा आँधी में खुद के भविष्य की चिंता तो खूब है, मगर समाज के भविष्य के बारे में सोचने की जहमत कोई नहीं उठाना चाहता। कथाक्रम के मंच से ७-८ नवम्बर, लखनऊ में शैलेन्द्र सागर और उनकी टीम ने इस मौजूं विषय पर विशद चर्चा करायी जो निश्चित तौर पर काबिले तारीपफ है।


कथाक्रम-आयोजन का प्रारंभ करते हुए

शैलेन्द्र सागर ने अपनी माँ को याद किया जिन्होंने पिछले दिनों दुनिया को अलविदा कह दिया था। शैलेन्द्र सागर ने अपनी माँ पर बेहद मार्मिक संपादकीय 'कथाक्रम' के सितंबर अंक में लिखा था। यह पहला अवसर था जब माँ की गैर मौजूदगी में 'कथाक्रम' का आयोजन हो रहा था। कथाकार देवेन्द्र ने महेश कटारे के व्यक्तित्व और लेखन पर यह कहते हुए प्रकाश डाला- 'महेश गाँव में रहकर कहानियाँ लिख रहे हैं। उनकी कहानियों में आजादी के बाद के गाँव की स्थिति की तस्वीर है। वे मार्क्सवादी दृष्टि से नहीं, बल्कि अपने अनुभवों से कहानियों में हो रहे बदलाव को पकड़ते हैं। इनके यहाँ न कृत्रिाम परिवेश है, न बनावटी किस्म के चरित्रा।' पुरस्कार समारोह सत्रा का संचालन कर रही मीनू अवस्थी ने इसे रेखांकित किया कि महेश ने इक्कीसवीं सदी की जटिलता को अपनी कहानियों के जरिए अभिव्यक्त किया है।
पुरस्कार ग्रहण करने के बाद महेश कटारे ने कहानी को रात के सन्नाटे में बात बुनने की कला बताया। उन्होंने कहा- 'मेरी इच्छा है कि मेरी कहानी मुनादी की आवाज में बदल जाए। मेरी कहानियों की स्त्राी कभी हार नहीं मानती। यह पुरस्कार मेरे लिए गाँव की गर्वीली गरीबी को जीने जैसा है। अगर तुम अतीत पर गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर गोली बरसाएगा। मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं हत्यारे और अन्यायी को कभी प्रतिष्ठित नहीं होने दूँगा। मौजूदा दौर में यह तय करना पड़ेगा कि लेखक द्घायल क्रौंच पक्षी की माँ के साथ खड़ा है या शिकारी के हिंसक स्वार्थ के साथ।'

'हंस' के संपादक राजेन्द्र यादव ने महेश कटारे को 'कथाक्रम सम्मान' दिए जाने को चंबल का लखनऊ पर हुए हमले का नाम बताया। उन्होंने कहा कि महेश कटारे को देखकर अदम गोंडवी याद आते हैं जो गाँव में किसानी करते हुए कविताई करते हैं। सर्वप्रथम 'मुर्दा स्थगित' जैसी कहानी से महेश ने हिन्दी जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। महेश से मुझे बहुत उम्मीदें हैं। पफूलन देवी जैसे चरित्रा पर इनको कोई उपन्यास लिखना चाहिए।
प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने महेश कटारे की तुलना प्रेमचंद से की। प्रेमचंद की कहानियाँ भी शहरी दृष्टि से लिखी गई मालूम होती हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के गाँव के नजरिए से ग्रामीण यथार्थ की कहानी तो महेश कटारे ने ही लिखी है, वो भी भाषा की ताजगी और चरित्रा की बोल्डनेस तथा विविधता के साथ। इनके पास भाषा के साथ-साथ चरित्राों की भी ताकत है। 'छछिया पर छाछ' थीम पर हिन्दी में कोई दूसरी कहानी नहीं लिखी गई। मुझे अपफसोस है कि मैंने महेश कटारे को बड़ी देर से पढ़ा।
कथाकार शेखर जोशी को हैरानी इस बात की थी कि अदबी नजाकत वाले शहर में ठेठ गंवई मिजाज के लेखक महेश कटारे का सम्मान हो रहा है।

दूसरे सत्रा में 'हिन्दी साहित्य और भविष्य का समाज' विषय संगोष्ठी का संचालन मुरादाबाद से आए 'परिवेश' के संपादक मूलचंद गौतम ने किया। पहली वक्ता के तौर पर महुआ माजी ने बांग्ला साहित्य के परिप्रेक्ष्य में भविष्य के समाज का खाका खींचा। उन्होंने कहा कि जीवन के सपने से जुड़े साहित्य का भविष्य कभी समाप्त नहीं होता। साहित्य का जीवन से दूर होना चिंताजनक है।
शशिकला राय ने पर्यावरण, प्रकृति से खिलवाड़, सूखती संवेदना और वैज्ञानिक ढंग से भविष्य के समाज की भयावह तस्वीर की ओर संकेत दिया। उन्होंने जोर किया कि साहित्य को अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी। इन्हीं सवालों के बीच से भविष्य का रास्ता निकलेगा। इधर के लेखन में भाषा अहम बन गयी है। सब कुछ सीमित वर्तुलाकार में द्घूमता है। आशय का भाषा के जंगल में खो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
कवि आलोचक और चितंक अशोक वाजपेयी की राय में विषय और कथ्य अलग-अलग चीज है। उन्होंने कहा कि साहित्य के पाठक बढ़ रहे हैं। लोग पढ़ते हैं। बावजूद इसके मौजूदा दौर में हिन्दी में लिखना अपने आप में एक रेडिकल चीज है। क्रांति है। ज्यादातर लोग अंग्रेजी में लिख रहे हैं, दौलत-शोहरत बटोर रहे हैं भले ही वह कूड़ा क्यों न हो? हिन्दी को बड़े स्तर पर परोसने वाला मीडिया भी साहित्य का दुश्मन है। उसके पास साहित्य के लिए जगह नहीं है। भविष्य के समाज पर बात करते हुए एक बड़ा सवाल यह भी है कि भविष्य यानी कल से हमारी मुराद क्या है? कल से होड़ तो वह लोग करते हैं जो समय में धंसकर जीते हैं और ऐसे लोग आगे भी बढ़ते हैं। चुनौती समय में धंसकर रचना करने की है।

आलोचक निर्मला जैन का मानना था कि पाठकों के कम होने का मर्सिया है। यह एक मिथ है कि हिन्दी पत्रा-पत्रिाकाओं की संख्या बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही हैं। लेखकों की तादाद में भी इजापफा हो रहा है। युवा रचनाकारों के साथ-साथ पुरानी और बीच की पीढ़ी भी रचनारत है। यह बात जरूर है कि जितना लिखा जा रहा है उस अनुपात में पढ़ा नहीं जा रहा।
दैनिक जागरण अखबार के साहित्य प्रभारी और कथाकार राजेन्द्र राव के वक्तव्य में वह आक्रोश दिखा जो हिन्दी के उस बड़े तबके में है जो साहित्य का विकेन्द्रीकरण चाहता है। उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य शीर्षस्थ लेखकों के बीच में दबा हुआ है। तमाम हिन्दी सम्मेलनों और संगोष्ठियों का चरित्रा एक जैसा होता है। वही दो-तीन चेहरे हर जगह की शोभा बनते हैं जो नाम नहीं, ब्रांड बन गए हैं। हिन्दी के पुरोधाओं ने ही हिन्दी साहित्य का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। यह मान लिया गया है कि ज्यादा पढ़ा जाने वाला साहित्य अच्छा साहित्य नहीं होता। शीर्ष लोगों को अपने पड़ोस के पटपड़गंज और लक्ष्मीनगर में रहने वाला हिन्दी कवि नजर नहीं आता वे नित नए विदेशी कवियों को आमंत्रिात करते हैं। संजीव की उपेक्षा आपके सामने है। महेश कटारे जैसे गंवई लेखक को सम्मानित होते पहली बार देख रहा हूँ। मैंने ये भी देखा कि दिग्गज लोग आज यहाँ महेश कटारे पर पाँच मिनट भी नहीं बोल पाए।

कथाकार कामतानाथ ने आशावादी तरीके से कहा-हिन्दी साहित्य में वो ताकत है जो समाज को बदल सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज जीवन में साहित्य की जरूरत नहीं रह गई है। साहित्य की ताकत दिनों-दिन द्घटती जा रही है यह बेचैनी करने वाली बात है।
डॉ. नामवर सिंह ने कहा-हम वर्तमान से इतना आक्रांत हैं कि हमने भविष्य के बारे में सोचना ही छोड़ दिया। एक जमाना था जब प्रगतिशील आंदोलन का उपफान था। सब कुछ सुर्ख था। उस दौर में बहुत खराब साहित्य लिखा गया। दुखांत रचनाएँ दुनिया में अच्छी लिखी गई हैं। सुखांत कमजोर साबित हुईं। अच्छा साहित्य वो है जो बेहतर कल के बारे में सोचकर लिखा जाए। हिन्दी की किताबें बिक रही हैं। भविष्य उज्जवल दिखाई देता है। हाँ, उपन्यास जरूर कम लिखे जा रहे हैं। भाषा के साथ जो इन दिनों खिलवाड़ जारी है वह सुखद नहीं है।
दूसरे दिन यानी ८ नवंबर को सत्रा की अध्यक्षता कोई पुरुष लेखक करने जा रहे थे कि बीच में दर्शक दीर्द्घा से खड़े होकर नामवर सिंह ने किसी महिला को अध्यक्ष बनाने की गुजारिश की और इस तरह से आरक्षित कोटा से निर्मला जैन को उस सत्रा का अध्यक्ष बनाया गया। संचालन किया चंद्रकला त्रिापाठी ने।
कथाकार संजीव की नजरों में हिन्दी साहित्य और भविष्य का समाज दोनों अलग-अलग चीजें हैं। विडम्बना है कि प्रेमचंद किसी रिचुअल की तरह याद किए जा रहे हैं, मगर उनके पात्रा पीछे छूटते जा रहे हैं। विकास का यज्ञ किसानों की बलि लेकर ही पूरा हो रहा है। 'गोदान' का यथार्थ अपने काल और पात्रा का अतिक्रमण कर रहा है। नए लेखकों की नए जत्थे सामने आ रहे हैं। वे ज्यादा आत्ममुग्ध हैं। भविष्य बहुत सुंदर-स्वस्थ नहीं दिखता।

युवा कथाकार सत्यनारायण पटेल के तेवर भी कापफी तल्ख थे। उन्होंने हैरानी जाहिर की कि हमारे साथी युवा लेखक न जाने किस दुनिया में जीते हैं, और न जाने किस दुनिया की कहानी लिख रहे हैं। हिन्दी साहित्य के पास आज की तारीख में कितने पाश, गोरख पाण्डेय और वरवर राव हैं जो सरोकार से जुड़कर रचनाएँ करते हैं। छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी जो संद्घर्ष कर रहे हैं वो कहानियों में नहीं आ रहे। आज की कहानियाँ संद्घर्ष की चेतना भी पैदा नहीं करतीं।
बिहार के आरा से आए राकेश कुमार सिंह ने पाठकों की महत्ता को स्थापित करते हुए अपनी बातें तल्खी से रखीं। उन्होंने कहा कि हर जीवन एक लम्बी कहानी है। जटिलताएँ पहले भी थीं मगर आज की तरह उसका जाप कभी नहीं हुआ। इंडिया न्यूज के सहायक संपादक अशोक मिश्र ने मीडिया की सराहना की कि वहाँ साहित्य अभी भी बना हुआ है।
हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने इस बात पर जोर दिया कि हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य को एक समझना गलत है। दोनों दो पृथक चीजें हैं। लिपि साहित्य कैसे बन गया, यह सवाल है। यह गलत है कि साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल है। वह मशाल बनकर कब चला मुझे याद नहीं। हम एक ऐसी अंधी गली में आ गए हैं जहाँ कोई विचार, दर्शन हमारी मदद नहीं करते। इस अंधी गली से निकलने के लिए हमें खुद निर्णय लेना होगा और रास्ता तलाशना पड़ेगा।

अपने अध्यक्षीय भाषण में निर्मला जैन ने मीडिया को कटद्घरे में खड़ा किया कि वो साहित्य को जगह नहीं दे रहा। इस समय मिडिल क्लास नहीं, मिडल क्लासेस हो गए हैं। जो युवा इन दिनों ज्यादा संख्या में कहानियाँ लिख रहे हैं वो कूड़ा लिख रहे हैं। भाषिक कलाबाजी ज्यादा समय तक टिकने वाली नहीं है। टिकेगा वही जो सरोकारों से जुड़ा होगा। द्घर-द्घर पहुँचने वाले चैनलों ने हमसे साहित्य छीन लिया है।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए युवा लेखिका रजनी गुप्त ने कहा कि साहित्य के केन्द्र में संवेदना है। जब तक संवेदना बची रहेगी साहित्य को कोई खतरा नहीं होगा।

 
 
 
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