| प्रभाष जsोशी पर विशेष/संस्मरण |
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ठेठ हिन्दी की ठाठ वाली भाषा
प्रभाषजी से मेरी पहली मुठभेड़ मंडी हाउस के पिफक्की सभागार में हुई थी- मौका था नवभारत टाइम्स के संपादक राजेन्द्र माथुर के निधन पर शोक सभा के आयोजन का। उस समय नवभारत टाइम्स के संपादक सुरेन्द्र प्रताप सिंह थे। लेकिन हमें जो आमंत्राण मिला था उसमें निखिल चक्रवर्ती और प्रभाष जोशी का भी नाम अंकित था। मुझे भी बोलना था। मैंने कहा कि राजेन्द्र माथुर के व्यक्तित्व का पता इससे भी चलता है कि एक ओर वामपंथी निखिल चक्रवर्ती बैठे हैं, दूसरी ओर प्रभाष जोशी जिन्होंने
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अपने अखबार में सती प्रथा का जोरदार समर्थन किया है। कार्यक्रम के बाद मैं निकलने लगा तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। 'कहाँ जा रहे हैं आप। मैं आपका ही इंतजार कर रहा था। निखिल दा के साथ मेरा होना आपको आश्चर्य क्यों लगा?' वह मेरी पहली मुठभेड़ थी। उसके बाद उनसे मेरी निकटता बढ़ती चली गई। बाद में दिसंबर १९९२ से एक नए प्रभाष का जन्म हुआ और उनसे हमारा परिचय हुआ।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद प्रभाष जोशी का बदला रूप सामने आया। जिस अंदाज में उन्होंने भाजपा और संद्घ पर हमला बोला वो सराहनीय था। हम विभिन्न आयोजनों, सभा-गोष्ठियों में मिलने लगे। निकटता कब एक संबंध में तब्दील हो गई, पता ही नहीं चला। कई आयोजनों में हम साथ-साथ गए हैं। मैं उनके 'कागद कारे' स्तंभ का मुरीद था। उसको काटकर मैंने संकलित कर रखा था। एक दिन मैंने उनसे कहा- 'मैं कतरन रखते-रखते थक गया हूँ। पुस्तक क्यों नहीं निकाल लेते। पलटकर बोले-'आप इसकी भूमिका लिखेंगे?' मैंने हामी भरी। हठ कर मैंने वह पुस्तक तैयार करवाई। पाँच खंडों में 'कागद कारे' का संकलन पिछले साल प्रकाशित हुआ। उसमें मेरी लिखी भूमिका भी है।
मैंने उनके राम बहादुर राय या उन जैसे किसी दूसरी विचारधारा वाले व्यक्ति से उनके संबंधों पर कभी एतराज नहीं किया। राय साहब से उनके बहुत पुराने और प्रगाढ़ संबंध रहे। मेरे गुरुदेव आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहा करते थे कि मनुष्य किसी विचारधारा का पुंज नहीं होता, वह उस पुंज से भी बड़ा होता है। मनुष्यता किसी भी विचार से बड़ी होती है। इसकी कसौटी प्रभाषजी थे। यह बात महान से लेकर सामान्य लोगों के बारे में भी कही जा सकती है। इस समझ के तहत मैंने देखा कि प्रभाष जोशी के हर विचारधर लोगों से संबंध थे। अन्तर वैयक्तिक संबंध भी होते हैं। महात्मा गाँधी के कई लोगों से संबंध थे? जो उनकी विचारधारा को नहीं मानते थे।
बालमुकुंद गुप्त कलकत्ता से एक पत्रिाका निकालते थे, तब अनस्थिरता शब्द को लेकर महावीर प्रसाद द्विवेदी से उनकी लम्बी बहस चली। महावीर प्रसाद बालमुकुंद गुप्त की भाषा में त्राुटियां निकाला करते थे- भाषा वैसी नहीं, ऐसी होनी चाहिए। लेकिन १९०६ में बालमुकुंद गुप्त के निधन के बाद आचार्य द्विवेदी ने उनकी भाषा की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए लिखा- हिन्दी लिखने वाला तो एक ही था। हिन्दी तो वही है जो बालमुकुंद लिखा करते थे। बालमुकुंद के बाद आज के जमाने में अगर कोई हिन्दी लिखने वाला हुआ तो प्रभाष जोशी। जिसे ठेठ हिन्दी का ठाठ कहा जाता है, वह उनकी भाषा में ही देखने को मिलता है। यह अपनी क्षेत्राीय बोलियों पर टिकी होती है। क्षेत्राीय बोली से ही हिन्दी को ताकत मिलती है, संस्कृत से नहीं। ऐसी जीवंत और लोक भाषा की छौंक लिए भाषा लिखने वाला हिन्दी में कोई दूसरा नहीं है। उनकी भाषा में मालवा का रस-गंध है। उनकी भाषा तब मुखर रूप में दिखाई देती है जब वो अपने परिवार मित्रा, माँ, बहन, भाई पर लिखते हैं। वैसे मालवी की छौंक उन लेखों पर भी है जो विशु( रूप से राजनीति या खेल पर लिखे गए हैं। उन्होंने मालवा के कई शब्द और मुहावरे लाकर उन्हें हिन्दी भाषा में स्थापित किया। बिना नाम देखे उनकी भाषा को पढ़कर कहा जा सकता है कि यह प्रभाष जोशी का लिखा है। उनके व्यक्तित्व की छाप उनकी भाषा में नजर आती है।
जो लोग यह मानते हैं कि प्रभाषजी में अंतर्विरोध था, उन्हें प्रभाष जोशी को पिफर से पढ़ने-समझने की जरूरत है। मुझे उनमें कोई अंतर्विरोध नहीं दिखाई देता। द्विखंडित व्यक्तित्व वाले व्यक्ति नहीं थे वो। उनका व्यक्तित्व ठोस और संपूर्ण था। मैं इसमें कोई विरोध नहीं देखता कि पारिवारिक होने के कारण वो परम्पराओं, कर्मकांड को निभाते थे। कांग्रेस के धुर विरोधी थे। हिन्दू थे पर हिन्दुत्ववादी नहीं। उनकी किताब 'हिन्दू होने का धर्म' को पढ़कर इसे समझा जा सकता है। वो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संद्घ वाले हिन्दू नहीं थे। अलबत्ता ऐसे हिन्दू थे जिनका मुसलमानों से कोई विरोध नहीं था। किसी भी धर्म वाले से उनको विरोध नहीं था। वे जातिवादी नहीं थे।
मैं चाहता हूँ कि जब प्रभाषजी की पहली बरसी अगले साल मनायी जाए उस अवसर पर उनके निधन के बाद जो भी लिखा गया है और लिखा जा रहा है उसे संकलित कर एक पुस्तक का रूप दिया जाए।
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| एक सपफल और सार्थक जीवन |
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पैकेज पत्राकारिता के खिलापफ जिहाद की शुरुआत करने वाले प्रभाष जोशी अपना मिशन अधूरा छोड़कर चले गए। जब से पैकेज पत्राकारिता की समस्या ने उनके मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करना शुरू किया था तब से ही उनकी सक्रियता अपने शरीर की क्षमताओं की परवाह करते हुए बढ़ गई थी। कुछ ही दिन पहले तो उन्होंने अपने एक लेख में अपनी और अपने कतिपय इष्टजनों के जीवन की अंतिम विपत्ति के साथ खेली गई आँख मिचौली का सरस वर्णन किया था। आदिवासी स्त्राी-पुरुष सहनृत्य की अद्भुत अदाओं और भाव-भंगिमाओं की तरह ही यह आँख-मिचौली कभी मनुष्य को अपनी प्रेयसी ;मृत्युद्ध के निकट लाकर स्पर्श सुख की अनुभूति दे जाती है और कभी छिटककर दूर हो जाती है और विरह के सुख की अनुभूति प्रदान करती है।
कुछ समय पहले ही एक ऐसी ही स्पर्शानुभूति पाने के बाद प्रभाषजी ने पेसमेकर लगाया था और इससे उनका उत्साह इतना बढ़ गया था कि वहे हफ्रते में अधिकांश समय धराकाशीय यात्रााओं में व्यतीत करने लगे थे। उनके उस उत्साह को देखकर भवानी प्रसाद मिश्र की याद आती थी। आपातकाल की काली रात बीतने के कुछ दिन बाद ही भवानी जी दिल्ली प्रशासन के सूचना प्रसार निदेशालय में आए थे जहाँ उन दिनों मैं दिल्ली पत्रिाका का संपादन करता था। उन्होंने पेसमेकर लगाया था और वे कुतूहल से भरे हुए थे। कुर्ता हटाकर और अपनी छाती खोलकर उन्होंने मुझे दिखाया कि पेसमेकर कहाँ लगा है बल्कि बच्चों का सा उत्साह दिखाते हुए उन्होंने मुझे उस पर हाथ रखने के लिए कहा था। कुछ-कुछ वैसा ही उत्साह और कुतूहल प्रभाषजी में भी जरूर भरा होगा। तभी तो उनके लिखने की गति भी तेज हो गई थी और भारत का भूगोल मापने की भी। स्थितियां भी उनके उत्साह के अनुकूल बनती गईं।
खमीर जितना बनता गया मादकता उतनी ही बढ़ती गई। लंबे अर्से तक पत्राकारिता में नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए संद्घर्ष करते हुए उन्होंने अपना जीवन बिताया था। आपातकाल के दिनों में उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ लोकतंत्रा की बहाली के लिए काम किया था। जनसत्ता को उन्होंने उन्हीं मूल्यों के प्रति समर्पित बनाया था जो गाँधी जी और जयप्रकाश नारायण जी के सान्निध्य से उन्होंने प्राप्त किए थे।
अतः जब पंद्रहवीं लोकसभा के चुनावों में उन्होंने पत्राकारों और समाचार पत्राों के मालिकों को, सरेआम बोली लगाकर अपने को बेचते हुए देखा तो कुमार गंधर्व और भीमसेन जोशी जैसे महान कलाकारों के संगीत से परितृप्त उनकी शांत आत्मा भी व्याकुल हो उठी और अपने स्तंभ 'कागद कारे' के अलावा कितनी ही पत्रिाकाओं के लेखों में तड़पने लगी। इसी व्याकुलावस्था में एक दिन सुबह-सुबह उन्होंने भारत की एक अन्य व्याकुल आत्मा, डॉ. राममनोहर लोहिया को याद किया। मुझे पफोन किया और मेरे द्वारा संपादित राममनोहर लोहिया रचनावली को देखने की इच्छा प्रकट की। मैंने अपने प्रकाशक अनामिका पब्लिशर्स को कापफी पहले प्रभाषजी सहित कुछ नामों की सूची दे रखी थी, जिन्हें रचनावली के नौ खंडों का सेट भिजवाना था। प्रकाशक ने यह काम अभी तक नहीं किया था। मैंने उनसे क्षमा मांगते हुए उसी दिन सेट भिजवाने की व्यवस्था कर दी। गिरिराज किशोर 'अकार' का लोहिया विशेषांक ;लोहिया की जन्मशती के उपलक्ष मेंद्ध निकालने जा रहे थे, उसके लिए कुछ लिखने का मेरा अनुरोध भी उन्होंने स्वीकार कर लिया।
इन तमाम गतिविधियों में जुनून जैसी संलग्नता के साथ-साथ उनके जीवन का एक अन्य जुनून भी व्यस्तता की चरम सीमा छू रहा था। क्रिकेट अब लगभग साल भर चलते रहने वाली गतिविधि बन गया है। ताबड़-तोड़ और पफर्राटेदार बीसमबीसी चैंपियन ट्रापफी के बाद भारत और आस्ट्रेलिया के बीच सात एक दिवसीय मैचों की श्रृंखला चल रही थी। इधर सचिन तेंदुलकर एक दिवसीय मैचों में १७००० का आँकड़ा पार करने वाले थे। उनके यह आँकड़ा पार करने पर और १७५ रन तक जा पहुँचने पर वे प्रसन्न थे। लेकिन तभी एक अजीब शॉट पर उनके आउट होने पर जो एक धक्का लगा उसने उन्हें चिर प्रेयसी के आलिंगन में पहुँचा दिया।
ऐसे मिलन की कामना किसने न की होगी? बड़े योगियों, तपस्वियों और साधकों की यही कामना तो रही कि एक ही छलांग में वे प्रेयसी की गोद में जा गिरें। जीवन इस मधुर-मिलन की तैयारी ही तो है। अतः मैं तो कहूँगा कि उनके काम भले ही अधूरे रह गए ;पूरे किसके हुए हैं?द्ध लेकिन उनका जीवन सपफल और सार्थक रहा। रामबहादुर राय ने जब 'जनसत्ता' से सेवानिवृत्त होने के बाद समाचार और विचार का पाक्षिक 'प्रथम प्रवक्ता' निकालने का इरादा किया और प्रभाषजी से मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की तो उन्होंने कहा, ''चिंता मत करो। मैं हूँ न।'' उनका यह आश्वासन उनके सभी सहयोगियों के लिए स्थायी आश्वासन बना रहेगा। |
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| तो पंडित जी आप चले गए |
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प्रभाषजी अब हमारे बीच नहीं रहे । ६ नवम्बर २००९ की मध्य रात्रिा में दिल्ली में सारे नाते-रिश्तों को तोड़कर वह अचानक चल बसे। दूसरे दिन अपनी जन्मभूमि, इन्दौर में नर्मदा वेफ किनारे वह अग्नि वेफ सुपुर्द कर दिये गये...।
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा।
पंच तत्व मिल बने शरीरा॥
अपने गहरे रिश्तों को याद कर हम जो भी मातम करें, उन्हें अकीदत वेफ पूफल पेश करें या न करें अब उन पर वुफछ असर नहीं पड़ने वाला। वह तो दुनिया की हर मं८िाल से दूर जा चुवेफ हैं और वह इतिहास वेफ अनमिट अध्याय हो गये हैं। अब तो उनकी यादें ही साथ रहेंगी। उनको भूलना आसान थोड़े ही होगा!
तआलुक्कात वेफ लम्बे अर्से में शायद यह पहला मौका था जब १ नवम्बर २००९ को प्रभाषजी पटना आये और अपने आने की न हमें सूचना दी और न हमारे साथ ठहरे ही। मुझे आश्चर्य हुआ। पहले भी एक-दो बार दूसरी जगहों पर वह ठहर गये हैं पर हमें अपने पटना आने की पूर्व सूचना उन्होंने अवश्य दी है। जिस आयोजन वेफ सिलसिले में वह पटना आये थे उसमें मैं भी आमंत्रिात था। निर्धरित समय पर दो बजे से ही मैं मंच पर दिल्ली से आने वाले अतिथियों का इन्तज़ार कर रहा था। चूंकि मिस्टर जिन्ना और देश विभाजन पर आधरित श्री जसवंत सिंह की पुस्तक वेफ उर्दू संस्करण का विमोचन होना था, मैं वहाँ उत्सुकतावश गया था, अन्यथा राजनीतिक आयोजनों में मैं शरीक नहीं होता। वह संद्घ परिवार जिसने बंटवारे वेफ इल्८ााम में यहाँ वेफ मुसलमानों को आ८ाादी वेफ बाद से ही कटद्घरे में खड़ा कर रखा है उसका एक बड़ा नेता अवेफले मिस्टर जिन्ना को देश विभाजन का ८िाम्मेदार नहीं माने, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और कांग्रेस को भी शरीक जुर्म साबित करे, उसवेफ लिए म८ाबूत ऐतिहासिक सबूत पेश करे, अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण बात है। इस विषय को वेफन्द्र में रखते हुये मैंने खुद उफर्दू में 'गाँध्ी और मुसलमान' नाम की एक पुस्तक लिखी है जिसका लोकार्पण पूर्व प्रधनमंत्राी श्री आई.वेफ.गुजराल ने दिल्ली में १९८५ में किया था। अजीब विडम्बना रही है कि न सिर्पफ मिस्टर जिन्ना और मुसलमानों को बल्कि महात्मा गाँधी को भी एक वर्ग द्वारा भारत विभाजन का ८िाम्मेदार माना जाता रहा है। आ८ाादी वेफ बाद जो हिन्दुस्तान का इतिहास लिखा गया, लिखवाया गया, विशेष कारणों से सच्चाइयों पर पर्दा डाला गया और उसकी आड़ में सत्ता वेफ खेल की बलि-बेदी पर लाखों लोग चढ़ाये गये। देश विभाजन वेफ नतीजे में लाखों लोगों का मारा जाना और करोड़ों का उजड़कर इध्र से उध्र और उधर से इध्र आना, मानव इतिहास की अद्वितीय त्राासदी तो है ही, इसको मुद्दा बनाकर पन्द्रह ह८ाार से ज्यादा साम्प्रदायिक दंगे इस हिन्द-महाद्वीप में हुए और लाखों लोगों पर कहर टूटा है।
समारोह वेफ आयोजक डॉ. एजा८ा अली ने मुझे मंच पर २ बजे ही बिठा दिया था। प्रभाष जोशी और अन्य विशिष्ठ अतिथियों वेफ आने वेफ इन्ते८ाार में हम पल-पल गिन रहे थे। विमान वेफ देर से पहुँचने वेफ कारण खचाखच भरे हॉल और बाहर एकत्रा लोग अध्ीर होने लगे थे। स्थानीय लोगों का सम्बोधन चलता रहा। तीन बजे वेफ बाद अतिथिगण आये, इन्ते८ाार की तकलीपफदेह द्घड़ी ख़त्म हुई। दिल्ली से आए मेहमानों वेफ साथ बहुत से लोग मंच पर आ गये। यह स्वभाविक ही था, क्योंकि एक साथ प्रभाष जोशी, जसवंत सिंह, दिग्विजय सिंह, एम.जे.अकबर, आरिपफ मुहम्मद खाँ, तीस्ता सितलवाद जैसे नामी-गिरामी लोग उस पुस्तक 'जिन्ना -भारत विभाजन वेफ आयने में' वेफ उफर्दू संस्करण वेफ लोकार्पण वेफ सिलसिले में आए थे जिसने आर.एस.एस. और भाजपाई ख़ेमे में भूचाल ला दिया था। वुफछ तथ्यों की सच्चाइयों को सामने लाने वेफ जुर्म में जसवंत सिंह जैसे अपने वरिष्ठ नेता को भाजपा ने बेआबरू कर अपनी पार्टी से निकाल बाहर किया था, यह भी लोगों की दिलचस्पी की वजह थी। अतः भारत विभाजन वेफ उलझे प्रश्न पर भाजपा वेफ एक बड़े नेता से सच्चाई सुनने वेफ लिए ८ाबर्दस्त भीड़ उमड़ पड़ी थी।
मैं तो पहले से ही मंच पर था, प्रभाष जी से हाथ मिलाते ही मैं ने शिकायतन कहा कि पंडितजी आपने अपने आने की सूचना हमें क्यों नहीं दी?... उन्होंने कहा मौलाना र८ाी भाई चूंकि इस बार मेरा मिशन वुफछ और है, इसलिए मैंने आपको सूचित नहीं किया, क्षमा करना। पिफर हँसी-म८ााक चली। डॉ. एजा८ा अली साहेब ने मंच पर बैठने की वुफछ इस तरह व्यवस्था की थी : डॉक्टर साहेब वेफ लिए अध्यक्षीय वुफर्सी थी, जिस पर वह कम ही बैठे, मंच संचालन में लगे रहे, मैं था, प्रभाषजी, जसवंत सिंह जी, दिग्विजय जी, एम.जे.अकबर, आरिपफ मुहम्मद खँा, तीस्ता सितलवाद, आदि। जसवंत सिंह जी से परिचय कराते हुए प्रभाषजी ने कहा कि यह हमारे बहुत करीबी मित्रा मौलाना र८ाी भाई हैं.. चूंकि मेरे बगल में ही वह थे, दोनों ने एक-दूसरे वेफ द्घर-परिवार की खैरियत जानी। उन्होंने कहा, आयोजन ख़त्म होते ही यहाँ वेफ बाद मैं आपवेफ पास ही आउफँगा। मैं आस्वस्त हो गया कि वह गाँध्ी संग्रहालय में ही रात को ठहरेंगे और हमारे साथ ही खाना भी खाएँगे। अरे, उनका खाना होता ही क्या था। दो पुफलवेफ, उबली हुई सब्८ाी, बिना मिर्च-मसाले की तरकारी, दाल, दही, बैगन का भुरता, बस!
पहले पुस्तक का सामूहिक तौर पर विमोचन हुआ। विमोचन तो प्रभाषजी को ही करना था, लेकिन उन्होंने सब को साथ कर लिया। एक किताब पर जसवंत सिंह, एम.जे. अकबर, दिग्विजय सिंह, आरिपफ मुहम्मद खाँ, तीसता सितलवाद और अपना हस्ताक्षर कर उसवेफ उफपर लिखा 'र८ाी अहमद की किताब' और मंच पर ही जसवंत सिंह और खुद वह, उस किताब को 'आपको समर्पित' कह कर मुझे दिया। अब वह किताब मेरे लिए बहुमूल्य यादगारी तोहपफा बन गई है।
मुझे ही डॉ. एजा८ा साहेब ने पहले बोलने वेफ लिए यह कहते हुए आमंत्रिात किया कि मैंने भी इस विषय पर एक किताब लिखी है। मेरे बाद और लोगों ने अपने विचार रखे। जसवंत जी ने तपफसील से देश विभाजन और उसवेफ बैकग्राउंड पर रोशनी डाली और दस्तावे८ाों वेफ आधर पर सि( किया कि हमाम में सब नंगे हैं, किसी एक व्यक्ति या समुदाय को मुजरिम नहीं माना जा सकता। कार्यक्रम बहुत सपफल रहा। कार्यक्रम खत्म होने वेफ बाद हम संग्रहालय चले आये और प्रभाषजी का इन्त८ाार करते रहे, पर वह नहीं आये। आयोजकों ने दिल्ली से आये उनवेफ मित्राों वेफ साथ उन्हें भी होटल में ही ठहरा दिया था। मंच पर ही उनसे वुफछ बातें हुईं और १८ नवम्बर को पिफर पटना आने का उन्होंने वादा किया। हमें 'हिन्द स्वराज' वेफ सौ वर्ष पूरा होने पर भाषणों का एक सिलसिला शुरू करना था और वह खुद बिहार वेफ माननीय मुख्यमंत्राी श्री नीतिश वुफमार से बिहार में एक पत्राकारिता-विश्वविद्यालय की स्थापना संबंध्ी चल रही प्रक्रिया को अन्तिम रूप देना चाहते थे।
२ नवम्बर को सवेरे-सवेरे होटल से उनका पफोन आया कि वह १०.३० बजे की गाड़ी से वाराणसी वेफ लिए निकल रहे हैं, संग्रहालय नहीं आने पर उन्होंने खेद व्यक्त किया । यह भी कहा कि वह तो १८ नवम्बर को आ ही रहे हैं, दो-तीन दिन साथ रहेंगे। होटल में ही आयोजित श्री जसवंत सिंह वेफ प्रेस कान्प्रेंफस में वह भी सम्मिलित हुए। बाद में मालूम हुआ कि वह १०.३० की गाड़ी से नहीं गये बल्कि १२.०० बजे की गाड़ी से वाराणसी वेफ लिए निकले। मुझे सूचना मिली कि सुबह से वुफछ इस तरह की उनकी व्यस्तता रही कि उन्होंने नाश्ता भी नहीं किया था और सेंडविच का पैवेफट साथ लेकर रवाना हुए। यह सुनकर मैं द्घबरा गया, क्योंकि उनवेफ स्वास्थ्य की पेचीदगियों को मैं वुफछ जानता था। हमें और हमारे द्घरवालों को उनवेफ खान-पान और खाने की रूटीन की चिन्ता बनी रहती थी। ६.०० बजे सवेरे बिना दूध् और चीनी की सादी चाय। पिफर दो कप दूध् वाली बिना चीनी की चाय वेफ साथ में वुफछ थिनअरारोट बिस्वुफट। ९.०० बजे नाश्ता, वही उबली सब्८ाी, दही, दो पुफलवेफ...।
श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल वेफ आयोजन में प्रभाष जी दो मिनट भी नहीं बोले थे। वह थवेफ-थवेफ से दिख रहे थे। मैंने समझा हवाई जहा८ा वेफ सपफर की थकान है। २ नवम्बर को वाराणसी में उनकी तबीयत वाकई खराब हो गई थी। वहाँ भी वह बहुत कम बोले और भाषण वेफ दौरान वह दो बार बैठ गये थे। एन.डी. टी.वी. वेफ प्रतिनिधि, श्री अजय जी ने मुझे बताया कि वह तो बोलना ही नहीं चाहते थे लेकिन आयोजकों वेफ आग्रह को वह टाल नही सवेफ, वाह रे प्रभाषजी की मोरव्वत और दोस्त-नवा८ाी...।
बिहार वेफ बु(जिीवियों से प्रभाषजी का पहली बार परिचय उस समय हुआ जब १९६० वेफ अन्तिम दिनों में पटना वेफ हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन भवन वेफ सभागार में जयप्रकाश जी ने उनकी पुस्तक 'चम्बल की बंदूवेंफ, गाँधी वेफ चरणों में' का लोकार्पण किया था। वह पुस्तक वृतांत है विनोबा जी और जयप्रकाश जी के उन सपफल प्रयासों की जिनकी वजह से चम्बल वेफ आतंकी कहे जाने वाले खूनख़ार डवैफतों ने जिनवेफ ८िान्दा या मुर्दा पकड़ने पर लाखो-लाख रुपये वेफ ईनाम द्घोषित थे, जयप्रकाश जी मौजूदगी में पुलिस वेफ सामने आत्म-समर्पण किया था। जे.पी. ने उन्हें चम्बल वेफ बागी की संज्ञा दी थी। गाँधीवादियों द्वारा चम्बल द्घाटी में शांति स्थापना वेफ प्रयास करने वाली टोली में प्रभाषजी भी शामिल थे और वही अभियान उनकी सक्रिय पत्राकारिता की शुरुआत भी कही जा सकती है।
उनवेफ अन्दर जो यकसुई समर्पण और प्रतिब(ता की भावना थी उसका बीज तो उसी समय पड़ चुका था जब गाँधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली की मासिक पत्रिाका 'गाँधी मार्ग' वेफ सुप्रसि( साहित्यकार-संपादक श्री भवानी प्रसाद मिश्र वेफ मार्गदर्शन में उनवेफ सहयोगी वेफ नाते उन्होंने अपना साहित्य-सह-पत्राकारिता का सपफर शुरू किया था। और उन्हीं दिनों से हम एक-दूसरे वेफ सम्पर्वफ में रहे। उन दिनों मैं अपने शोध्-कार्य से दिल्ली में रह रहा था। राजद्घाट वेफ गेस्ट हाउफस वेफ उफपरी कमरे में मेरा निवास था और नीचे 'गाँधी मार्ग' का दफ्रतर। सै(ांतिक पत्राकारिता और गाँधीवाद से प्रेरित नौजवान प्रभाषजी ने निडर पत्राकारिता वेफ जिस सपफर को उस वक्त शुरू किया, उन्होंने पिफर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
१९७४ में जब जे.पी. ने छात्रा आन्दोलन का नेतृत्व संभाला तो उस आन्दोलन का चरित्रा बदला और उसका कॉनवास बहुत बड़ा हो गया था। छात्राों का वह आन्दोलन जन-आन्दोलन में तबदील हो गया और बात पटना विश्वविद्यालय और अन्य विश्वविद्यालयों से निकलकर सड़कों और मुहल्लों से गुज़रते हुए विधनसभा भंग करने की मांग तक पहुँचा। दैनिक अख़बार, नई दुनिया, इंदौर, वेफ कवरेज वेफ लिए प्रभाषजी बिहार आए थे और जे.पी. वेफ साथ ही दौराओं का उनका सिलसिला भी चला। पटना में उनका ठहरना हमारे साथ ही हुआ। अजीब ईत्तेपफाक कि उसी अवध्ि में अजीत भटटाचार्य, बी.जी. वरगीस, नैनतारा सहगल, आदि भी आन्दोलन वेफ कवरेज वेफ लिए पटना आए हुए थे और हमारे ही मेहमान थे। आ८ााद हिन्दुस्तान में पहली बार एक ऐसा अभियान चल रहा था जहाँ पार्टियों की द्घेराबन्दी समाप्त कर वेफवल सत्ता में नहीं, व्यवस्था में आमूल परिवर्तन, मुख्य मुद्दा बना हुआ था और देश-विदेश की न८ारें इध्र लगी हुई थीं। कांग्रेस और सी.पी.आई. को छोड़ कर पूरा विपक्ष जे.पी. की अगुआई में एकत्रा हो गया था। कश्मीर से कन्यावुफमारी तक आन्दोलन की क्रांतिकारी पिफ८ाा बनी हुई थी। इस बीच प्रभाषजी इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप से जुड़ चुवेफ थे। जिन दिनों प्रभाषजी 'इंडियन एक्सप्रेस', चंडीगढ़ वेफ रेसिडेंट एडिटर थे, आन्दोलन वेफ लिये एक मुखपत्रा वेफ रूप में अख़बार की ८ारूरत महसूस की गई और 'एवरी मैन' और बाद में 'जनसत्ता' वेफ प्रकाशन का तय हुआ। वुफछ दिनों वेफ लिए अज्ञेय जी 'एवरी मैन' वेफ संपादक रहे। उनवेफ बाद अजीत भटटाचार्य ने उसकी ८िाम्मेदारी संभाली। प्रभाषजी को चंडीगढ़ से बुलाकर 'जनसत्ता' की ८िाम्मेदारी सौपी गई और वह लोकप्रियता की बुलन्दियों वेफ जिस मकाम पर पहुँचा वह जग-८ााहिर है। इस कामयाबी का पूरा श्रेय प्रभाषजी की शैली, व्यवहार और उनकी टीम-लीडरशिप की क्षमता और वुफशलता को जाता है।
जब मंडल कमीशन ह्मण का दौर था अपने लेखों वेफ लिए प्रभाषजी पर मनुवादी-ब्राहम्णवादी, पोंगापंथी और क्या-क्या न होने का आरोप लगा था। कमंडली ऊपफान वेफ बीच संद्घ परिवार और आर.एस.एस. वेफ हिन्दुत्ववादियों द्वारा उनपर द्घोर हिन्दू विरोध्ी होने का इल्८ााम थोपा गया। प्रभाष जी ने अपनी दृष्टि से द्घटनाओं का मुल्यांकन किया, उनकी निष्पक्षता हमेशा उनवेफ साथ रही। संकीर्ण मानसिकता से ग्रसित खेमों ने उनवेफ विचारों को पसन्द नहीं किया और उनपर अपने विरू( होने का इल्८ााम लगाया। हकीकत यह है कि पत्राकार प्रभाषजी ने जो देखा, जो महसूस किया, वही उनकी लेखनी से भी निकलीः
कबीरा बैठ बा८ाार मांगे सब की ख़ैर।
न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर॥
हिन्दुस्तान में वैंफसर बनी साम्प्रादायिकता वेफ विरोध् में जितना प्रभाषजी ने लिखा शायद ही आज वेफ किसी पत्राकार ने लिखा होगा। उन्होंने हर तरह और हर वर्ग की साम्प्रादायिकता वेफ खिलापफ़ अपनी लेखनी की धर को हमेशा ते८ा तो रखा ही पूरे देश में द्घूम-द्घूम कर इसवेफ खिलापफ अभियान भी चलाया। अपने आचार, विचार, लेखनी और उठाए कदमों से उन्होंने गाँधी, नेहरू, जयप्रकाश और गणेश शंकर विद्यार्थी की शानदार परंपरा को जीवित रखा और र्ध्मनिरपेक्ष लोगों वेफ समूह में अपना मुकाम बनाया।
राष्ट्रीय एकता, साम्प्रादायिकता और देश की स्थिति पर आयोजित गोष्ठियों में उन्होंने अनेकों बार अपने विचार स्पष्टता से रखे हैं। उनवेफ विचारों की व्यापकता और गंगा-जमुनी संस्कृति की पुर८ाोर वकालत साम्प्रदायिक तत्वों वेफ लिए हमेशा चैलेंज सि( हुआ किए। उनवेफ साथ दिल्ली से आये समाजशास्त्राी प्रो. इम्तेया८ा अहमद हों या साहित्यकार नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय या गिरिराज किशोर, सब लोग उनकी ताईद ही करते न८ार आए। वह हिन्दुतत्ववादियों, आर.एस.एस., भाजपा नेता अटल बिहार वाजपेयी और लौह पुरुष कहे जाने वाले लाल कृष्ण अडवाणी पर जिस तरह प्रहार किया करते थे हम लोग उलझन में पड़ जाते थे। जब थोड़ा नरम रुख़ अपनाने का हम सुझाव देते, वह और कड़े हो जाते और कहते, भाई साहेब, मैं हिन्दू हूँ, इत्तेपफाक से ब्राह्मण भी हूँ, ये हिन्दुत्ववादी लोग आपलोगों पर थोड़े ही हमला कर रहे हैं, वह तो हम हिन्दुओं को बेआबरू कर उन्हें नुकसान पहुँचा रहे हैं। उनकी हरकतों से तो हिन्दू धर्म शर्मसार हो रहा है। यह पाखंडी संद्घवीर क्या रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविन्द, विवेकानन्द, टैगोर, गाँध्ी और जयप्रकाश से बड़े व्यकतित्व वाले हिन्दू हैं? यह सत्तालोभी काग८ाी शेर वुफर्सियों वेफ लिए सनातन हिन्दू र्ध्म का व्यापार कर रहे हैं, हिन्दू र्ध्म को सटट बा८ाार में ध्वेफल रहे हैं।
वह इंदौर वेफ रहने वाले थे। प्रभाषजी चौतरपफा प्रतिभा वाले व्यक्ति थे। इंदौर और मालवा की ध्रती की सुगंध्, उसका तेवर, उनकी बोल-चाल और हाव-भाव उनमें रचा बसा था। मालवा के लोकगीतों, लोक कथाओं की जब वह चर्चा करते तो हमारे सामने अल्हा-उदल वेफ कथाकारों जैसा समां बन जाता था। लेकिन वह वही रुवेफ नहीं रहे। हिन्दुस्तान वेफ दूसरे इलाकों की संस्कृति पर भी उनकी गहरी पकड़ थी। जब मुंडरी, संथाल और उफरांव साहित्य की चर्चा होती तो हम रांची और संथाल परगना वेफ आदिवासियों वेफ बीच उनवेफ जंगल वेफ माहौल में गुम हो जाते। छत्तीसगढ़ की जन-जातियों वेफ रीति-रिवाज, खान-पान और शादी-ब्याह वेफ गीत और रसम-रसूम वेफ वर्णन पर वह आते तो तीजन बाई की छवि उनवेफ हाव-भाव में न८ार आने लगती थी। और मिथिलांचल, विद्यपति और मैथिली संस्कृति, जानकी विवाह, मंडन मिश्र, भारती और शंकराचार्य सम्वाद पर आते तो मैथिली संस्कृति वेफ असर में विभोर हो जाने का एहसास होने लगता। उड़ीसा की परंपराओं और जयदेव वेफ गीत-गोविन्दम का वर्णन हमें मथुरा और वृन्दावन की रासलीला वेफ तिलस्मी माहौल में पहुँचा देता था। प्रभाषजी कभी भी लगातार तीन दिनों से ज्यादा हमारे साथ पटना में नही रहे। उनका कार्यक्रम बहुत व्यस्त हुआ करता था क्योंकि इसी अवध्ि में अपने शिष्य पत्राकारों को पत्राकारिता के गुर भी वह सिखाते थे। सुबह-शाम चन्द द्घंटे जो हम एक साथ गु८ाारते वे बड़े महत्व वेफ हुआ करते थे। पंडितजी! तुम तो चले गये, हमारी महपिफलें अब सूनी रहेंगी।
श्री अटलबिहारी वाजपेयी उनवेफ जवारी थे। उनसे प्रभाष जी का द्घनिष्ठ रिश्ता था। उनवेफ प्रधनमंत्राी बनने वेफ बाद लोग अटकलें लगा रहे थे कि प्रभाषजी अब प्रधानमंत्राी कार्यालय वेफ न८ादीक जाएँगे। उन्हें प्रलोभन भी दिया गया था। अपफवाह भी पैफली की प्रभाषजी राज्यसभा जा रहे हैं। दिल्ली में ऐसी ही वुफछ अपफवाह श्री चन्द्रशेखर जी वेफ प्रधनमंत्राी काल में भी उड़ी थी। और यहाँ तो हकीकत वुफछ और ही थी। पंडित जी ने पत्राकार बने रहने को ही पसन्द किया, उसे ही प्राथमिकता दी। इस पत्राकार ने वाजपेयी जी, अडवाणी जी, और अन्य संद्घ परिवार वेफ नेताओं वेफ बारे में जो लिखा शायद ही किसी पत्राकार ने लिखा हो या लिखने की हिम्मत भी की हो। प्रभाष जी ने अपने को रामनाथ गोयनका से जोड़ा था, जो खुद ही बड़े जुझारू व्यक्ति थे। विनोबा और जे.पी. से निष्ठा, प्रतिब(ता की सीख और दीक्षा ली थी। इंदिरा जी की नीतियों वेफ खिलापफ उन्होंने ८ाोरदार कलम उठाई थी, ८ाोरदार पहल की थी। इंदिरा जी को काली, दुर्गा और चन्डी कहने वाले वाजपेयी और उनका गिरोह किस खेत की मूली थे। सत्य बोलना और सत्य को सामने लाना उनकी पत्राकारिता का मुख्य उद्देश्य रहा और उसे अन्तिम साँस तक बखूबी उन्होंने निभाया। संकीर्ण मानसिकता, संकीर्ण राष्ट्रवाद और र्ध्म-८ाात की आड़ में ओछी राजनीति वेफ खिलापफ उन्होंने जो जेहाद छेड़ा, देखें हिन्दी, उर्दू और अंग्रे८ाी का कौन पत्राकार उसे आगे बढ़ाता है।
जोशी जी ने अनेकों नौजवानों को पत्राकारों की श्रेणी में लाकर खड़ा किया है। ऐसे प्रतिभावान जिनवेफ अन्दर उनको वुफछ क्षमता न८ार आई उन्होंने उसी तरह टे्रन्ड किया जिस तरह पत्थर को तराश कर एक संगतराश मूर्तियां गढ़ता है। हमारे सामने एक लम्बी पिफहरिस्त ऐसों की है जिनकी छुपी प्रतिभा को बड़े कनवास पर साबित करने का शुअवसर प्रभाष जी ने मुहैया किया।
पफणीश्वरनाथ रेणू, नलिन विलोचन शर्मा, नागार्जुन आदि ने आंचलिक बोलचाल वेफ शब्दों को अपनी कृत्तियों में जिस तरह स्थान दिया प्रभाषजी ने पत्राकारिता में अपनी कलम से उस धर को जानदार बनाए रखा। गंवई बोलचाल और मोहावरों को उन्होंने साहित्यक लड़ी में मोती की तरह पिरोया है। काश यह सिलसिला आगे चलता रहे ताकि हिन्दुस्तान की आंचलिकता व८ानदार बनकर भारतीयता वेफ दमखम को जीवित बनाए रखे।
अरे भाई मौलाना साहेब मैं तो पाकिस्तान-रिर्टन हो गया... आप कभी पाकिस्तान गये हो या नहीं... पाकिस्तान से लौटने वेफ बाद उन्होंने मुझसे कहा थाᅠ। महाशय पंडित जी, आपवेफ संद्घी मित्राों ने बहुत द्घुड़कियाँ दीं, बहुत षडयंत्रा रचे, इसवेफ बावजूद हम जैसे लोग न पाकिस्तान गये और न कब्रिस्तान...भाई, मैंने तो बहुत चाहा था कि वुफछ दिनों वेफ लिए एक बार पाकिस्तान हो ही आउफँ, पर नहीं जा सका। वहाँ मेरे बड़े भाई, उनवेफ परिवार सहित बहुत से रिश्तेदार पाकिस्तान में रहते हैं। वी८ाा वेफ लिए आवेदन दिया, पाकिस्तानी दूतावास से कोई उत्तर नहीं मिला। श्री वुफलदीप नैक्षयर से सिपफारिश भी कराई, पर बात नहीं बनी। अपफसोस है जिस बड़े भाई से आखिरी बार मिलना चाहता था वही अब नहीं रहे, अल्लाह को प्यारे हो गये। आप अपना तर्जुबा बताएँ, वैफसी रही यात्राा...।
मौलाना साहेब मेरा तो तजुर्बा अद्भुत रहा...।
जैसा आप जानते हैं हम कई पत्राकार, सांसद और दिल्ली वेफ समाज सेवी एक साथ पाकिस्तान गये थे, पर वहाँ तो मैदान मार लिया था आपवेफ चेले सांसद लालू जी ने। लालू, आलू और बिहारी सत्तू ने तो लालू जी को पाकिस्तान में जनता का हीरो बना दिया। सरकारी आयोजन वेफ एलावे तो हमलोगों को किसी ने द्घास ही नहीं डाली...
एक दिल को छू जाने वाला अनुभव सुनाता हूँ... लाहौर वेफ जिस होटल में हमें ठहराया गया था एक दिन सवेरे उससे बाहर निकलकर मैं पफुटपाथ पर खड़ा था। धेती, वुफर्ता और कंद्घे पर सिल्कन चादर, एक टीपीकल हिन्दुस्तानी ब्राह्मण अचानक एक ईमपोर्टेड लक८ारी गाड़ी सामने आकर रुकी। पंजाबी वुफर्ता और सलवार पहने एक खूबसूरत नौजवान गाड़ी से उतरा ;वह खुद ही गाड़ी चला रहा थाद्ध। मेरे पास आया और बड़े अदब से सलाम किया और उसी शालीन लहजे में कहा... शायद आप हिन्दुस्तान से आये हैं... क्या पहली बार लाहौर आना हुआ है?... मैंन हाँ कहा और थोड़ा सशंकित भी हुआ। पाकिस्तानियों वेफ बारे में अपने हिन्दुस्तान में जो निगेटिव सोच बनी हुई है, हम पर भी तो उसका वुफछ असर है ही। उस नौजवान ने गाड़ी का दरवा८ाा खोला और कहा सर, आएँ मैं आपको शहर दिखलाता हूँ.. जान न पहचान, ख़ाला अम्मा सलाम... उस जवान वेफ शरीपफाना अन्दा८ा, प्रेमपूर्ण हाव-भाव और सम्बोध्न वेफ अन्दा८ा ने मानों मुझे 'मेसमेरायज' कर दिया हो,
मैं उसकी लक८ारी गाड़ी में उसवेफ साथ बैठ गया और गाड़ी चल पड़ी। बैठने का तो मैं बैठ गया पर अब हमारी हिन्दुस्तानी सोच दिल ध्ड़काने लगा। चलो पंडित जोशी, पाकिस्तान में हुआ तुम्हारा अपहरण...। वुफछ पूछा न पाछा, न अता-पता लिया, इस अनजान देश ;जिसे शत्राु देश माना जाता हैद्ध और अपरिचित शहर में एक अजनबी की गाड़ी में आ बैठा... दिल में यह खुद-बुद चल ही रही थी कि उस नौजवान ने ;जो खुद गाड़ी ड्राईव कर रहा थाद्ध कहा, सर देखें दाहिनी तरपफ की जो बड़ी हाई-राइ८ा इमारत है वह यहाँ वेफ एक लीडर की है, बाएँ तरपफ जो पाँच सितारा होटल न८ार आ रहा है वह एक 'वडेरा' ;बड़े जमीन्दार को सिंध्ी भाषा में वडेरा कहते हैंद्ध जो हुवुफमत वेफ वजीर रहे हैं, उनका है। गाड़ी पौश इलाकों की सड़कों से गुजरती रही, वह नौजवान बताता रहा, सर, यह पफलां मिलिट्री जेनरल की बिल्डिंग है तो पफलां बड़े सरकारी अपफसर और तीजारती द्घरानों की ...मैं गुमसुम अपनी सोच वेफ भंवर में गोते लगा रहा था । अपने अपहरण को भूल चुका था और सोचने लगा कि मैं लाहौर में हूँ या दिल्ली, बम्बई या अहमदाबाद में ...गाड़ी मध्यम रफ्रतार से बिना रुवेफ चलती रही, शहर वेफ महत्वपूर्ण इलाकों और भीड़-भाड़ वाली गलियों को मैं निहारता रहा, मैं तय नहीं कर पा रहा था कि मैं हिन्दुस्तान में हूँ या पाकिस्तान में। एक ही तरह वेफ लोग, एक ही तरह का दृश्य, वही अमीरी और ग़रीबी, दोनों वेफ बीच में वही बड़ी खाई, रिक्शा ;जो सजे हुए थेद्ध, ठेलों ;वह भी सजाया हुआ थाद्ध, यक्का, टमटम, खच्चर गाड़ी, भीख मांगते अध्नंगे बच्चे, पुफटपाथ पर दुकानें और मक्खियाँ भिनभिनाती वूफड़ों का ढ़ेर। दो द्घंटे गु८ार गये और मुझे पता ही नहीं चला।
सही सलामत उस नौजवान ने अपने होटल तक मुझे पहुँचा दिया... सर, आपका होटल आ गया... अच्छा, मैं अपनी सोच के भंवर से बाहर आया।... दिल वेफ चोर ने कहा- खैर, मेरा अगवा नहीं हुआ था... बहुत शुक्रिया भाई, मैंने उसे वुफछ पैसे देना चाहा, अपना पर्स निकाला... उसने पिफर बड़े अदब से कहा, चचाजान आप मुझे शर्मिन्दा न करें... आप तो हमारे मोहतरम मेहमान हैं... मैंने जब आपको होटल वेफ सामने देखा, शहर में आये एक अजनबी हिन्दुस्तानी समझकर आप ही आप आपवेफ पास आ गया, एक अन्जान कशिश ने मुझे आपवेफ न८ादीक ला दिया, शायद वह कशिश उस ८ामीन की खुशबू की रही हो जो आप अपने साथ लाये हैं।... मेरे दादा अब्बा मरहूम भी यू.पी., हिन्दुस्तान वेफ शाहजहाँपुर वेफ किसी गाँव से उजड़कर यहाँ आये थे। नये माहौल में उन्होंने अपने लिए एक जगह बनाई। एक तिजारत शुरू की थी, अब्बा ने उनका हाथ बटाया और आज माशाअल्लाह हमारा खाता-पीता द्घर है। हम दो भाई बहन हैं। हमने उफंची तालीम हासिल की। मैं अब्बा वेफ इक्सपोर्ट-इम्पोर्ट वेफ कारोबार में हाथ बटाता हूँ और बहन की शादी हो गई है, उनवेफ ससुराल वालों का ताअल्लुक भी मुरादाबाद से रहा है। दादा अब्बा अब नहीं रहे। अपने आबाई वतन शाहजहाँपुर की मिट्टी में दपफन होने की तमन्ना और दिली कसक लिए वह अल्लाह को प्यारे हो गये। हमने अपना आबाई वतन शाहजहाँपुर नहीं देखा है। बहुत ख्वाहिश हाेती है वह जगह देखूँ जो हमारे आबाओ-अजदाद का वतन रहा और जिसकी यादें दादा अब्बा को रुलाती रहीं। मेरी दादी जान और हमारे बुर्जुग तो उसी ख़ाक में दपफन हैं। अब्बा और अम्मी जब अपने गाँव का ८िाक्र करते तो ज८ाबाती होकर गुमसुम हो जाते हैं... सियासत ने क्या कयामत ढा रखी है... हमारे बीच आग का दरया बना दिया है।
चचाजान वुफछ किया जाना चाहिए... हमारी नस्ल तो खामखाह अनकिये गुनाह की स८ाा भुगत रही है... एक साँस में इतना वुफछ कहकर उस जवान ने खुदा हापिफ८ा कहा, गाड़ी वेफ एक्सलेटर को दबाया और भीड़-भाड़ वाली सड़क पर न८ारों से ओझल हो गया। न तो मैंने उसका पता पूछा और न ही उसने अपना पता दिया, और न ही मेरे बारे में वुफछ जानना चाहा। भाई मौलाना साहेब मैं तो सकते में आ गया था। पाकिस्तान की नई पीढ़ी जिसकी जडं़े हिन्दुस्तान वेफ शाहजहाँपुर में हैऋ मेरे दिल में कसक पैदा कर गयी। मैं सोचने लगा यही कसक तो अपने वतन को छोड़ कर हिन्दुस्तान आए सिखों और हिन्दुओं की तीसरी नस्ल वेफ नौजवानों वेफ दिलों में भी मौजूद होगी। काश, हमारे नेताओं ने गाँध्ी की बात मानी होती... इस त्राासदी से बचा जा सकता था। पता नहीं कितनी पीढ़ियों को अपनी जड़ों की तलाश दिल में कसक पैदा करती रहेगी और दोनों तरपफ वेफ नेता लोग अपनी सियासत का पासा पेंफकते रहेंगे।
जुनूं का दौर है किस किस को जाएँ समझाने।
इध्र भी अक्ल वेफ दुश्मन उध्र भी दिवाने॥
भाजपा वेफ बड़े नेता रहे जसवंत सिंह की पुस्तक 'जिन्ना-भारत विभाजन वेफ आयने में' वेफ ऊर्दू संस्करण वेफ लोकार्पण वेफ सिलसिले में डॉ. एजाज अली द्वारा बुलाए जाने पर १ नवम्बर २००९ को प्रभाष जी पटना आए थे। वही मेरी उनसे आखरी मुलाकात रही। देश वेफ बंटवारे का दंश झेलती तीसरी पीढ़ी जिससे वह पाकिस्तान में रू-ब-रू हुए थे और यहाँ का तर्जुबा जो उन्हें आये दिन होता रहा, और दोनों देशों की आम जनता की बदहाली संवेदनशील-निष्पक्ष-पत्राकार प्रभाष जोशी को कचोटता रहा होगा। जसवंत सिंह की पुस्तक ने इतिहास की सच्चाई पर डाली गई ध्ूल को हटाकर बंटवारे को मुद्दा बनाकर की जा रही अपफसारात्मक सत्ता की राजनीति का खुलासा किया है। सच्चाइयों वेफ सामने आ जाने से साम्प्रदायिकता की राजनीति रुवेफगी यह उम्मीद की जाती है। पुस्तक वेफ संदेश को लोगों तक पहुँचाने वेफ 'मिशन' में ही प्रभाषजी निकले थे और जब मैंने अपने साथ नहीं ठहरने की शिकायत उनसे की थी तो उन्होंने जिस 'मिशन' का जिक्र किया था शायद वह यही 'मिशन' रहा होगा । दोनों देशों वेफ बीच अविश्वास शत्राुता की हद तक पहुँची हुई है। ये दोनों देश तीन बार लड़ाई लड़ भी चुवेफ हैं । वॉर-इकानॉमी के बोझ वेफ नीचे दोनों तरपफ की जनता वुफचली जा रही है और लाहौर, कराची वेफ साथ दिल्ली, बम्बई, अहमदाबाद वेफ पौश इलाकों में नेताओं, अपफसरों और ठीवेफदारों की कोठियाँ सज रही हैं। हमें तो उनसे उनवेफ 'मिशन' पर बात करने का मौका ही नहीं मिला। १८ नवम्बर को वह पिफर पटना आने वाले थे। आने का तय हुआ था, उस मौवेफ पर उनसे उनवेफ 'मिशन' पर बात होती, पर होनी को वुफछ और ही मंजूर था।
प्रकृति वेफ कानून वेफ अनुसार प्रभाषजी को तो जाना ही था। हर आने वाले को जाना ही है। पन्द्रह साल पहले उनकी बाईपास सर्जरी हुई थी। इस बीच एक-दो बार हलवेफ झटवेफ भी लगे थे। लेकिन न उन्होंने अपनी दिनचर्या बदली और न भागम-भाग का रवैया। अपने बारे में शायद उनको एहसास होता ही होगा कि दिल की बीमारी है कब क्या हो जाए, जो वुफछ करना है जल्द कर लो। हालांकि वह एहतियात बरतते थे। सवेरे खुद शूगर टेस्ट करते और उसी वेफ हिसाब से इन्सुलिन लेते। हमलोगों को भी टेस्ट करने का तरीका सिखाते और इन्सुलिन वेफ इतिहास, भूगोल पर हमारी जानकारी बढ़ाते। भागमभाग की जिन्दगी में रुटीन लाइपफ बरकरार रखना आसान नहीं होता।
उनकी र्ध्मपत्नी ;जो शु( हिन्दुस्तानी गृहणी हैंद्ध उनवेफ बारे में हमेशा चिन्तित रहा करतीं। वह मुझसे बराबर कहती थी कि जब प्रभाषजी पटना जाते हैं तो मुझे बहुत इतमिनान रहता है कि आप जैसे गारजियन वहाँ हैं, उनकी देख-रेख, खान-पान में कोताही नहीं होगी। हमलोगों ने इस दायित्व को निभाने की हमेशा कोशिश भी की। उनवेफ पटना वेफ आखरी सपफर में ऐसा नहीं हो सका क्योंकि वह होटल में ठहरे । ख़ैर, विध्ि वेफ आगे तो किसी की चलती नहीं। उनका जाना तो हमलोगों वेफ लिए अपूरणीय क्षति है और वह 'मिशन' जिस पर वह निकले थे, उस पर भी तो झटका लगा ही है। उन्होंने एक यो(ा की तरह कामयाब ८िान्दगी गु८ाारी। ऊसूलों पर किसी से कभी समझौता नहीं किया, जाना था चले गये, पिफर भी यही लगता है काश वह वुफछ दिन और हमारे बीच रहते...।
ऐसा कहाँ से लाउफँ कि तुझसा कहें जिसे॥ |
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| प्रभाषजी! आप मेरी उम्र में होते तो क्या करते? |
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प्रभाषजी कुछ कह दीजिए.. आडियो टेस्ट हो जाएगा। क्या कहें टेस्ट तो जनता का था। लेकिन पास कांग्रेस हो गयी और भाजपा पफेल हो गयी। जी प्रभाष जी ठीक है। लेकिन आपने यह क्यों कहा कि इम्तिहान जनता का था। अपन तो यही समझते हैं कि आम चुनाव का मतलब आम जनता का ही इम्तिहान होता है। लेकिन जनता के बीच जाने के लिए अब आपका भोंपू है ना। जिसे न्यूज चैनल कहते हैं। अखबार बंदिश लगाता था, तो इस बार वह भी बिका हुआ नजर आया। अपने गोविंद जी हैं जो लगातार द्घूम रहे हैं। युवाओं से मिल रहे हैं। आर्थिक विकल्प का सपना संजोये हैं। मुझे लगा आज प्रभाषजी मूड में हैं इसलिए मनमोहन सरकार के शपथग्रहण समारोह के दौरान उनसे बातचीत करने में मजा आएगा। मैने टोका...कहा प्रभाषजी आज इसी पर बात करेंगे कि मनमोहन सरकार के मंत्रिायो में कौन सा चेहरा नया होगा और कौन से चेहरे पर सबकी नजर होगी। यार नजरें तो सभी की मनमोहन सिंह पर ही होंगी। क्योंकि इस दौर में बाजारवाद ही सबसे बड़ा वाद है। चलिए प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं। बाकी हम लोग ब्रेक में बात करेंगे।
कार्यक्रम शुरू होते ही कांग्रेस की जीत पर प्रभाषजी ने सीधे कहा...सपने ना हों तो प्रचार-प्रसार से चुनाव जीते नहीं जा सकते। जाहिर है आपकी यह टिप्पणी भाजपा पर होगी..आडवाणी पर होगी। लेकिन कांग्रेस ने भी तो कोई सपना नहीं जिलाया है। सही कहा आपने। यही वह स्थिति है जहाँ चुनाव में अरुचि पैदा हो रही है और चुनाव आयोग वोट ना डालने वालों को पप्पू कहने लगा है। आप ही सब के चैनल तो सिनेमायी कलाकारों और सेलिब्रिटी की उंगुली का निशान दिखाते नजर आए जो वोट डालने में ही लोकतंत्रा की जीत देख रहे थे। न-न लेकिन हमने ग्रामीणों और आदिवासियों को भी वोट डालते दिखाया। लेकिन किसी ने कैमरे के सामने अपनी उंगुली तो नहीं उठाकर दिखायी होगी। वह तो हर दिन वोट डालें अगर उनका पेट भरने की गांरटी कोई दे दे। तो लोकतंत्रा की परिभाषा ही जब गाँव और शहर की अलग है तो आप क्या कहेंगे। करीब आठ मिनट की चर्चा के बाद जैसे ही ब्रेक हुआ मैंने प्रभाषजी से पूछा, अगर आप आज मेरी उम्र में होते तो क्या करते। आंदोलन करता। आंदोलन..पत्राकारिता छोड़कर। नहीं पत्राकारिता करते हुए। दोनों एक साथ कैसे संभव है। पत्राकारिता अपने आप में आंदोलन है..शर्त यही है कि आप पत्राकारिता करें, कुछ और नहीं। कुछ और नहीं का मतलब। कई मतलब हैं। पहली बात तो बिकने से बचने की है, दूसरी विकल्प का सवाल खड़ा करने की और तीसरी सरोकार की पत्राकारिता करते हुए अपने नहीं, पायदान के सबसे निचले तबके के सवालों को उठाने की। यह सब ठीक है लेकिन संभव कैसे है?
आप देखिए। हम यहाँ सरकार चलाने वाले मंत्रिायो के बारे में चर्चा कर रहे हैं और आप खुद ही बता रहे हैं कि किस सांसद के मंत्राी बनने के पीछे कौन सा गणित है। यह तो चलता रहेगा यार। लेकिन सेंध तो इसी में लगानी है और पत्राकारिता तलवार की नोंक पर चलने सरीखा ऐसे ही नहीं है। चौथा खम्बे का मतलब है बाकी के हर खम्बे पर नजर रखी जाए। अपन के दफ्रतर में तो बत्ती गुल कर दी गयी थी। एक्सप्रेस बिल्डिंग में मोमबत्ती जलाकर कर भी अपन ने संपादकीय भी लिखा है और रिपोर्ट भी जांची है। लेकिन इसके लिए तो रामनाथ गोयनका जैसा कलेजा भी चाहिए। हाँ, यार वो दौर लगता है अलग था। जबकि वह दौर तो अभी का ही हिस्सा है.. लेकिन कितना कुछ बदल गया है। इतनी तेजी से संस्थान ढहेंगे किसने सोचा होगा। यार तब खबर छापते तो अगले दिन प्यून भी छाती ठोंक कर कमरे में आता और मजे में पानी पिलाता। उस प्यून को भी लगता कि जहाँ वह काम कर रहा है वहाँ से सरकार के कान में तेल डाला जा सकता है।
जनसत्ता की ठसक क्या थी इसका अंदाज इससे भी लगता कि एक्सप्रेस बिल्डिंग की सीढ़ियों पर कभी कोई जनसत्ता की कापी बिछाकर उसपर नहीं बैठता। अब लोग जनसत्ता की बात करते हैं तो कभी-कभी लगता है कि हम किसी दूसरी जमीन पर यह सब कर रहे थे। इतनी जल्दी जनसत्ता भी मिथ बना दिया जाएगा.. यह मैंने तो कभी नहीं सोचा। ना तो तब ले-आउट ऐसा था कि अखबार सुंदर दिखे। ना मशीनें ऐसी थीं कि शब्द मोती सरीखे छप जाएँ। सबकुछ तो रुखड़ा था, सिपर्फ खबर होती थी। जिसे अब कांटेंट कहते हैं। लेकिन अब यही कांटेंट कहीं है नहीं बाकी सबकुछ है। तभी मेरे कान में पीसीआर से आवाज आयी कि ब्रेक खत्म हो रहा है। मैंने प्रभाष जी से कहा, लगता है जनसत्ता को जानबूझकर मिथ बनाया गया जिससे प्रभाषजी भी मिथक बन जाएँ.. प्रभाष जी हम बात करेंगे लेकिन अभी ब्रेक खत्म हो रहा है, सो अगले ब्रेक में। पिफलहाल शपथग्रहण समारोह शुरू हो चुका है। शपथग्रहण में कैबिनेट और राज्य स्तर के हर मंत्राी पर प्रभाष जोशी की दो लाइन की टिप्पणी ही उस राजनीति को सापफगोई के साथ सामने ला देती जिसे छुपाने में सरकार और राजनीति जुटी रहती है।
आंनद शर्मा कांग्रेस की युवा ब्रिग्रेड से निकले हैं। मंत्राी पिफर बन रहे हैं तो यह संदेश कांग्रेस से जुड़ने वाले उन युवाओं के लिए है जो समझते हैं कि कांग्रेस से जुड़ने पर सत्ता की मलाई तो मिलेगी। अंधीमुत्तु राजा यानी ए राजा। मनमोहन सिंह की पाक सापफ सरकार बनाने के दावे की पोल पट्टी यही शख्स खोल देता है। भ्रष्टाचार के आरोप ए राजा पर लगे लेकिन गठबंधन में सरकार बनानी है तो हर दाग चांद में दाग सरीखा है। एंटोनी, पृथ्वीराज चौहान, एसएम कृष्णा, विलास राव देशमुख यह सभी तो १० जनपथ का पौचां पकड़े हुए हैं। लेकिन प्रभाषजी मंत्रिामंडल तो प्रधानमंत्राी का होता है। लेकिन आप कह रहे हैं ७ रेस कोर्स की नहीं, १० जनपथ की ज्यादा चली है। बिलकुल और युवा ब्रिग्रेड में राहुल की चली है। और मनमोहन सिंह से राजनीतिक तौर पर प्रणव मुखर्जी तो कई पफर्लांग आगे हैं। तो मनमोहन भी समझते हैं कि वह भी सोनिया के मंत्रिामंडल के एक मंत्राी भर हैं।
बहरहाल करीब पचास मिनट तक चले शपथग्रहण के बाद ब्रेक हुआ तो मैंने तुरंत ही प्रभाषजी को टोका। सत्ता चलाने में किचन कैबिनेट या कोटरी की राजनीति शुरू कहाँ से हुई। इंदिरा गाँधी से। उससे पहले सारे निर्णय कैबिनेट लेती थी। लेकिन इंदिरा ने कैबिनेट को पीएमओ के सामने बौना कर दिया। और किचन कैबिनेट इतनी शक्तिशाली हो गयी कि कैबिनेट के किसी भी मंत्राी की हैसियत पीएमओ के एक अदने मुलाजिम के सामने भी बौनी हो गयी। लेकिन प्रभाषजी इंदिरा गाँधी लौह महिला के तौर पर उभरीं। अब कोई नेता कहाँ नजर आता है। सही कह रहे हो, मगर यार यह तो देखो कि जिसके खिलापफ अपन ने लड़ाई लड़ी और जिसने आपातकाल जैसा काला अध्याय इस देश के इतिहास में जोड़ दिया वही आज सबसे बेहतर प्रधानमंत्राी लगती है। इसका मतलब है कि सत्ता अब दिखायी देने वाली सरकारों में नहीं है, इसका ओर-छोर कहीं और है और अपने से बड़ी सत्ता की रखवाली में सरकार लगी हुई है।
आपका संकेत बाजारवाद या पूंजी की तरपफ है। अभी तो यही दिखायी देता है और वह जो तिगड़ी की बात बार-बार मीडिया में होती है जो बाजारवाद को थामे हुए है उससे पावरपफुल और कौन है। तिगडी मतलब। प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह, चिदंबरम और योजना आयोग वाले मोंटेक सिंह अहलूवालिया। अब इनके निर्णय पर किसी कैबिनेट के मंत्राी पर आपने कभी आक्षेप करते सुना है। कोई कर ही नहीं सकता। तो मंत्रिापरिषद में १० जनपथ का क्या महत्व। अरे यार मंत्राी बनने से कद बढ़ता है। सरकार कुछ काम तो करेगी ही। बीस-तीस करोड़ के लिए ही चाहे पॉलिसी बने। उसमें भी मंत्राी की भागीदारी का मतलब अब मलाई से है। सत्ता के केन्द्र इसी मलाई से ही खुद को मजबूत बनाते जाते हैं। लेकिन प्रभाषजी राहुल गाँधी जिस तरह देश में द्घूम रहे हैं और कांग्रेस के भीतर संगठन और उस के भीतर लोकतंत्रा की बहाली की बात खुले तौर पर कहते हैं, तो इसका एक मतलब यह भी है, गाँधी परिवार संकेत देता है कि राहुल ने सत्ता संभाली तो वह एक आदर्श चेहरा होगा। अरे यार हमारा देश इतना बड़ा है और विविध है कि उसमें चुनाव जीतने के लिए कई तिकड़म करनी पड़ती है। अच्छा है कि इस तिकड़म के लिए ही राहुल देश की विविधता देख लें। पिफर कांग्रेस जिस तरह अपने ही द्घेरे में सिमटी है उसको तोड़े बगैर कांग्रेस अपने बूते सत्ता में आ भी तो नहीं सकती।
पीसीआर से कानों में पिफर आवाज आयी ब्रेक खत्म, लेकिन सिपर्फ दो मिनट बचे हैं। मतलब सापफ था प्रभाष जी से एक कमेंट लेकर शपथग्रहण का कार्यक्रम खत्म किया जाए। ब्रेक से लौटते ही मैंने कहा सरकार का चेहरा सामने है अब सवाल है किसे कौन सा पोर्टपफोलियो मिलेगा। जो आज रात तक सापफ हो जाना चाहिए। प्रभाषजी किस मंत्राी या किस पोर्टपफोलियो पर आपकी नजर होगी.. जिसे मनमोहन सिंह बदल देंगे। अर्जुन सिंह और हंसराज भारद्वाज मंत्रिामंडल में है नहीं तो मानव संसाधन और कानून मंत्राालय जाहिर है किसी नये को सौंपा जाएगा। लेकिन इस टीम में किसी को भी कोई विभाग दे दीजिए पफर्क क्या पड़ेगा क्योंकि मनमोहन की इसी टीम को तो जनता जनार्दन ने चुना है। इस बार तो यही महत्वपूर्ण है कि राहुल गाँधी की टीम में से चुने गये युवा चेहरों को कौन-सा विभाग दिया जाता है। और वह कौन-सा कमाल दिखाते हैं। लेकिन आप इंतजार कीजिए राहुल गाँधी खुद कब आते हैं। मैंने भी कार्यक्रम यह कहकर खत्म किया कि जनमत मनमोहन को मिला है और समारोह का दौर खत्म हुआ। अब देश को इंतजार उस सरकार का है जो उन्हें राहत दे सके क्योंकि हाथ मजबूत किया गया है।
प्रभाषजी अगली मुलाकात में बात इसी पर करेंगे कि मनमोहन सरकार ने राहत दी या नहीं या कौन खरा उतरा। प्रोग्राम खत्म हुआ इसके बाद कार्यालय के बाहर गाड़ी तक प्रभाषजी को छोड़ने गया तो मेरे दिमाग में वही सवाल कौंधा जिससे पहले ब्रेक में बात शुरू की थी। तो चलते चलते पिफर पूछ ही डाला... प्रभाषजी आप अभी मेरी उम्र में होते तो करते क्या...पता नहीं यार। लेकिन इस टीवी को भी अपन अपनी तर्ज पर मोड़ते जरूर.. चलो कभी द्घर आओ यार तब पफुर्सत से बात होगी...। |
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| सागर का 'वह' अंश खोजते हम |
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शुक्रवार ६ सितंबर को हमारी मुलाकात होनी थी। हमारी-यानी मेरी और प्रभाष जोशी की। प्रभाष जी ने ही यह कार्यक्रम बनाया था। पाँच सितंबर की सुबह उनका पफोन मेरे पास आया। उन्होंने मेरी किताब के लोकार्पण के बारे में मुझसे पूछा। सामयिक प्रकाशन से आई इस किताब के लोकार्पण की एकाधिक योजनाएँ उनके साथ बनीं जो कभी उनकी व्यस्तता और कभी मेरी अस्त-व्यस्तता की वजह से टलती रहीं। इस बार मैंने टालना चाहा-कुछ संकोच के साथ याद दिलाते हुए कि किताब पुरानी हो गई है। लेकिन प्रभाषजी पफैसला कर लिया करते थे तो टालते नहीं थे। उन्होंने अगली सुबह बुला लिया, कहा-नामवर सिंह के यहाँ साथ चलेंगे।
यह मुलाकात पिफर टल गई। इस बार हमारे उनके बीच आधी रात से पहले मौत आ गई। मुझे आधी रात के बाद सूचना मिली। करीब पौने दो बजे रात को द्घर की द्घंटी बजी। मैंने हैरानी के साथ दरवाजा खोला-रवींद्र त्रिापाठी मिले और इस त्राासदी की सूचना मिली।
रात को पिफर मैं अस्पताल गया। आधी रात के उस भुतहा अंधेर में अस्पताल का चिकना पफर्श पार करते हुए हम वहाँ पहुँचे जहाँ प्रभाषजी लेटे हुए थे। उनका चेहरा देखते हुए मुझे याद आया, हमारी तो सुबह मुलाकात तय थी। मैंने अपना पफोन निकाला, उस पर रिसीव्ड कॉल का समय पड़ा हुआ था-१०.४८। मैं स्तब्ध और कातर था, उस वक्त तक दुबारा लौटना चाहता था।
लेकिन लौटना कब मुमकिन होता है? सिपर्फ यादों के गलियारों में लौट सकते हैं हम। उन परछाइयों को पिफर से छूने, महसूस करने की कोशिश करते हुए जिनसे जिंदगी गुजरती रही। सिपर्फ इतना खयाल आया मुझे, प्रभाषजी मेरे लिए भी छोड़ गए हैं यादों की एक पोटली।
उनसे मेरी पहली मुलाकात बड़े अजीब ढंग से हुई थी। जनसत्ता के संपादकीय दायित्व से उनके मुक्त होने के बाद वहाँ मेरी नियुक्ति हुई थी। तब राहुलदेव संपादक थे। शायद मैं पहला आदमी था जिसे प्रभाषजी की सूचना के बिना लिया गया था। यह एक अनहोनी से कम नहीं था। इस अनहोनी के बीच एक और हादसा हुआ। एक शाम पेज बन जाने के बाद प्रभाषजी का एक लेख आया। मैंने उसे पफौरन कंपोजिंग में डाला और अगले दिन के लिए तय कर दिया। बिना यह जाने कि प्रभाष जोशी के लेख जिस दिन आते हैं, उसी दिन छपते हैं। कुछ ही मिनट में प्रभाष जोशी तक यह खबर पहुँच गई कि उनका लेख एक दिन के लिए रोक लिया गया है। बस उन्होंने मुझे कमरे में बुलाया। वे बुरी तरह गुस्से में थे। पहला सवाल दागा-जनसत्ता में किसी ने मेरा लेख एक दिन रोकने की कोशिश नहीं की, आपने ये हिम्मत कैसे की?
जवाब देने में मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी। मैंने बताया कि पेज छूटने के बाद लेख मिला था और मुझे नहीं मालूम था कि पेज रुकवा कर वह लेख लेना है। किसी संपादक ने मुझे यह निर्देश नहीं दिया।
प्रभाष जी ने कहा, ठीक है जाइए। लेकिन यह ठीक नहीं है, इसका एहसास मुझे था। मैंने वरिष्ठ संपादक अच्युतानंद मिश्र को यह पूरा वाकया बताया। उस दिन मिश्र जी का ही लेख पेज पर लगा हुआ था। अच्युतानंद जी ने पफौरन अपना लेख रुकवा कर प्रभाष जी का लेख लगवाने का आदेश दिया।
इस वाकये के महीनों बाद तक प्रभाषजी से मैं बचता रहा। पिफर एक दिन प्रभाषजी का बुलावा मिला। मैं द्घबरा गया-आज क्या गलती हुई है? जाने से पहले मैंने पूरा संपादकीय पेज खंगाल लिया। जब प्रभाषजी के पास पहुँचा तो उन्होंने लगभग गले लगा लिया-यार, तुमने जो नीरद सी चौधरी पर लिखा है, वह कमाल का है। यह जनसत्ता की परंपरा है।
मैं अभिभूत था। नीरद सी चौधरी के १०० साल पूरे करने पर एक लेख मुझसे श्रीश मिश्र ने लिखवाया था। प्रभाषजी उसी की तारीपफ कर रहे थे। सिपर्फ तारीपफ नहीं, उन्होंने जनसत्ता की परंपरा से मुझे जोड़ लिया। या अपने रिश्ते से।
यह अब १२ साल पुरानी बात है। इन १२ वर्षों में वह रिश्ता मजबूत होता चला गया, यह सोचकर कुछ खुशी होती है और कुछ अभिमान होता है। हालांकि प्रभाषजी के साथ बहुत सारे लोगों का और भी पुराना, और भी द्घनिष्ठ रिश्ता रहा। उस लिहाज से हमारे रिश्ते में शायद कभी वह भौतिक करीबी नहीं रही। जब वे जनसत्ता सोसाइटी में नहीं रहते थे तो एकाध अवसरों को छोड़कर मैं कभी उनके द्घर नहीं गया। जनसत्ता सोसाइटी में आ गए तो मिलने का सिलसिला बढ़ा। हालांकि वह भी कई दूसरे मुलाकातियों के मुकाबले कापफी कम था।
अब सोचता हूँ, इतने संक्षिप्त और दूरस्थ परिचय के बावजूद मैं खुद को उनके करीब क्यों पाता रहा? या वे ऐसे बहाने क्यों देते रहे, जिससे मुझे लगे मैं उनके करीब हूँ? इस सवाल के जवाब में उनके व्यक्तित्व का एक और पहलू सामने आता है। करीब उनके जो भी रहे हों लेकिन आत्मीयता का एक धागा वे उन लोगों से जोड़ते रहे जो उनकी निगाह में शायद पढ़ाई-लिखाई से सरोकार रखते थे और पत्राकारिता की समझ भी। हालांकि इस वाक्य में एक तरह की जो आत्मश्लाद्घा है, वह मुझे कुछ संकोच में डालती है। पिफर भी मुझे लगता रहा कि मेरा लिखा हुआ वे पढ़ रहे हैं और पसंद कर रहे हैं। उनके साथ होने वाली बैठकें अक्सर वैचारिक चर्चाओं और नई सूचनाओं की ऊष्मा से लैस रहतीं। लेकिन यह सिपर्फ एक संपादक की चौकन्नी निगाहों से एक उपयोगी पत्राकार का आकलन नहीं था। वह एक दूर के शहर से आए एक बौ(कि युवा के साथ एक संवेदनशील नाता था जो प्रभाषजी की प्रौढ़ आँखें मुझसे जोड़ती रहीं। पिफर कुछ अभिमान के साथ कह सकता हूँ कि जिन लोगों को उनका अभिभावकत्व मिला, उनमें शायद मैं भी रहा। इस अभिभावकत्व के एकाधिक किस्से मुझे याद हैं।
नौ साल पहले जब मैं वसुंधरा के अपने नए बने द्घर में रहने जा रहा था तो अचानक रात को उनका पफोन आया। जब उन्हें पता चला कि न मैं शुभ दिन की परवाह कर रहा हूँ और ना ही गृह प्रवेश जैसा कोई आयोजन तो वे नाराज हो गए।
उन्होंने ताकीद की कि मैं परिवार सहित वसुंधरा जाऊँ और जाकर द्घर में कलश स्थापना करूँ। उन्होंने पफोन पर स्मिता-यानी मेरी पत्नी से भी बात की।
उनका कहा मानकर हम दोनों शाम को निकले। हमने कुछ खरीददारी की और पिफर वसुंधरा के अपने द्घर में उनके कहे मुताबिक पूजा जैसी कोई चीज की। अब याद करता हूँ तो लगता है, वह छोटा-सा कर्मकांड जरूरी था-किसी ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करने या किसी दुरात्मा के अंदेशे को भगाने के लिए नहीं, अपने भीतर यह अहसास पैदा करने के लिए कि यह नई शुरुआत है-जीवन इस द्घर के बाद एक नई जड़ पकड़ेगा। प्रभाष जोशी भी सिपर्फ कर्मकांड से अपने प्रेम की वजह से यह सब नहीं कह रहे थे। उन्हें शायद अपने अनुभव और अपनी संवेदना की वजह से अंदाजा था कि एक युवा दंपती को इस अवसर की गहराई की समझ नहीं है और यह छोटा सा उपक्रम शायद उनके जीवन में कुछ जोड़ेगा। शायद इस अहसास से भी कि इस अभिभावकविहीन शहर में कोई तो हो जो इन दोनों को बसेरे के पहले की जरूरतें बताए।
ऐसे अवसर बाद में और भी आए। लेखन में भी और जीवन में भी अपने कंधों पर उनका हाथ मैं महसूस करता रहा। उनमें अपनी तरह का बड़प्पन था जो दूसरों की उपलब्धियाँ देख किलक उठता था। जब मंगलेश डबराल को साहित्य अकादमी का सम्मान मिलने की सूचना आई तो वे दफ्रतर में थे। उन्होंने मुझे बुलाया और बड़े उत्साह से कहा-मंगलेश जी पर अच्छा सा संपादकीय जाना चाहिए। वे यहीं नहीं रुके। उसी उत्साह में छलकते उन्होंने अगली शाम मंगलेश जी के द्घर की छत पर उनसे पूछे बिना एक छोटा सा आयोजन रख दिया।
इसका बाकायदा एक कार्ड छप गया जिस पर उन्होंने बुलावा देने वालों में अपने अलावा मेरा नाम भी लिखा था। वह कार्ड अब भी मेरे पास कहीं होगा। हालांकि बाद में वह आयोजन किसी वजह से टल गया, लेकिन प्रभाष जोशी के उत्साह में कभी कमी नहीं आई।
इसी उत्साह से उन्होंने मेरी किताब के लोकार्पण का इंतजाम किया। मेरे सामने अशोक माहेश्वरी, उदय प्रकाश, राजेंद्र यादव और तमाम दूसरे लोगों को पफोन करते रहे। उस आयोजन का एक-एक ब्योरा उन्होंने तय किया। एक साथ दो किताबों-मेरे कहानी संग्रह के अलावा उन्होंने हमारे सहयोगी और आत्मीय मनोज मिश्र की किताब का भी लोकार्पण रख लिया था-पर हो रहे इस आयोजन को लेकर मैं संशय में था। लेकिन जितनी आत्मीयता और भव्यता के साथ वह आयोजन संपन्न हुआ, उसकी स्मृति अब भी पुलक जगाती है। निश्चित रूप से यह नामवर सिंह, राजेंद्र यादव और उदय प्रकाश जैसे लोगों के साथ प्रभाष जोशी की उपस्थिति थी जो इस भव्यता में एक गरिमा और पारिवारिकता जोड़ती रही।
चाहूँ तो ऐसे संस्मरण और भी गिना सकता हूँ।
छोटी-छोटी आत्मीय झिड़कियों के भी और बड़ी-बड़ी तारीपफों के भी। लेकिन कहने को बात सिपर्फ एक है। प्रभाष जोशी हम सबके ऊपर छाए एक आसमान का नाम था। वह आसमान जो जरूरत के हिसाब से धूप, बारिश और हवा की सौगातें देता रहता, जो पूरे पर्यावरण को अपने शून्य से बाँधे रहता और इसके बावजूद अपनी उपस्थिति का भान तक नहीं होने देता। वे किसी आकाश की ही तरह हर जगह दिखते थे। हर मंच पर, हर खाली जगह पर। छोटी-छोटी सामाजिक लड़ाइयों से लेकर बड़े-बड़े बौ(कि मोर्चों तक। देश भर में द्घूम कर नामवर के निमित जैसा वर्ष भर चलने वाला आयोजन किया। नर्मदा की लड़ाई हो या सिंगुर की, झारखंड का असंतोष हो या इंदौर की छटपटाहट-हर जगह वे जाते। बावजूद इसके कि शरीर साथ नहीं दे रहा था, डॉक्टर मना किया करते थे, अपने-पराये समझाया करते कि ये उम्र इतना तनाव लेने की नहीं है। सुना है, प्रभाष जोशी अपने मृदुल हास्य के साथ कहा करते थे कि वे द्घर पर इसलिए नहीं रहते कि मौत लेने आए तो वे उसको न मिलें। बाहर द्घूमते रहेंगे तो किसकी पकड़ में आएँगे? वे पकड़ में आने के लिए नहीं थे। पफोन करके बुलाया और खुद चले गए। बरसों पहले पढ़ा एक उपन्यास याद आया-कुरु स्वाहा। मनोहर श्याम जोशी ने यह उपन्यास हजारी प्रसाद द्विवेदी और आँत्विक द्घटक को समर्पित किया है। समर्पण में लिखा है-सागर थे आप, लेकिन द्घड़े में द्घड़े जितना ही समाया। प्रभाष जोशी के जाने के बाद यही समर्पण याद आया। लगा कि वह आकाश चला गया है जो गाहे-बगाहे हमारी छत बन जाया करता था। अब हम सब अपने-अपने द्घड़ों में सागर का वह अंश खोज रहे हैं। मेरा द्घड़ा छोटा है, शायद दूसरे उस सागर का कहीं ज्यादा बड़ा रूप दिखा सकें। |
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| मानवीय सरोकारों के 'प्रभाष' |
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पाखी' जुलाई अंक के लिए जब संपादकीय लिख रहा था तब कहाँ यह सोचा था कि जिन दो शिखर पुरुषों के संग बिताए तीन दिनों के अनुभव कागद पर उतार उसे कारे कर रहा हूँ उनमें से एक रानीखेत दोबारा चलने और कुछ दिन वहाँ प्रकृति की गोद में आराम से बिताने के वायदे की खिलापफी कर हमेशा-हमेशा के लिए चला जाएगा और एक ऐसा खालीपन पीछे छोड़ जाएगा जो आने वाले लंबे समय तक भरा न जा सकेगा। पाँच नवंबर की शाम मैं द्घर कुछ जल्दी आ गया था। मोबाइल स्विच ऑपफ करते समय क्या पता था कि अगले दिन सुबह यह स्विच ऑन होने के साथ ही प्रभाषजी के न रहने का समाचार देगा। लगभग साढ़े सात बजे छह नवंबर को एक तरपफ मैंने मोबाइल को ऑन किया और आदतानुसार रेडियो में एपफ एम १०६.४० लगाया। एपफ एम में समाचार और मोबाइल पर एस एम एस एक साथ। वरिष्ठ पत्राकार प्रभाष जोशी का निधन। पिफर रवीन्द्र त्रिापाठी का पफोन 'रात पफोन ट्राई किया था पर बंद था। खबर तो मिल ही गयी होगी?' जनसत्ता अपार्टमेंट जब तक पहुँचा प्रभाषजी का पार्थिव शरीर एम्स से वापस लाया जा चुका था। अखबारी दुनिया और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के जाने पहचाने चेहरे बड़ी तादात में वहाँ मौजूद थे। पार्थिव देह को प्रणाम करते समय मुझे जवाहर लाल नेहरू की प्रसि( स्पीच याद हो आई। गाँधीजी की हत्या के बाद हतप्रभ राष्ट्र को संबोधित करते हुए नेहरू ने जब यह कहा कि 'हमारे जीवन से रोशनी चली गयी है और चारों तरपफ अंधकार ही अंधकार है' तो उनके मनोभाव कैसे रहे होंगे, यह मुझे उस क्षण महसूस हुआ।
मेरा प्रभाषजी से पहला परिचय १९९४-९५ के आसपास हुआ। कागद कारे को पढ़ने का चस्का तब ताजा-ताजा लगा था जो २००९ तक पहुँचते एक आदत में शुमार कैसे हो गया इसका आभास आठ नवंबर के जनसत्ता से ही हुआ। १९९४-९५ का परिचय अगले १३ सालों में जनसत्ता के जरिए हर सप्ताह संबंधों को प्रगाढ़ता देता गया। आमना-सामना हुआ २००९ में। पहली मुलाकात ऐसी कि मानो जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो। 'दि संडे पोस्ट' के उत्तराखण्ड संस्करण का लोकार्पण कार्यक्रम हल्द्वानी में रखा गया था। तय किया कि प्रभाषजी मुख्य अतिथि होंगे। कार्यक्रम २० जून को पिफर २१ को नैनीताल में 'पाखी' के लिए नामवरजी के साथ लंबी बातचीत। पहले डॉ. नामवर सिंह की सहमति ली पिफर प्रभाषजी के द्घर पहुँचा। भेनजी को पुकार हुई 'नैनीताल चलोगी'। 'मैं नहीं जाऊँगी आप हो आइए। अब जब कोई वहाँ रहा नहीं तो मैं जाकर क्या करूँगी।' बेसन की सेम वाली नमकीन मेरे सामने रखती भेनजी ने जवाब दिया। 'सरला बहन ने कितना आग्रह किया, कितने बरसों किया पर आप ने कभी किसी की सुनी क्या।' मैं द्घबराया, प्रभाषजी तो तैयार ही लगते हैं पर भेनजी मामला बिगाड़ देंगी। मेरे मनोभाव समझ प्रभाषजी बोले 'चिंता मत करो वह चलेंगी। प्रोग्राम तय रहा।'
पिफर नैनीताल और रानीखेत। दिन तो केवल तीन लेकिन यादें अनगिनत। नैनीताल क्लब में जहाँ हम सब बातचीत में मशगूल तो प्रभाषजी अलग कमरे में बंद, 'कागद कारे' लिखने में व्यस्त। उन्हें वहीं छोड़ हम यानी नामवर जी, भेन जी, मैं, शैलेय और प्रेम भारद्वाज ताल के किनारे ठण्डी सड़क पर टहलने निकले। भेनजी के श्रीमुख से प्रभाषजी के मनमौजी स्वभाव के अनगिनत किस्से सुनने को मिले। कैसे एक मित्रा को उनकी किताब के लिए पूरे एक साल तक भूमिका लिखकर न दी, मित्रा भी गजब, किताब प्रकाशित करा डाली। भूमिका का पृष्ठ कोरा, नीचे टिप्पणी 'प्रभाष जोशी ने लिखनी थी जो लिखी नहीं।' जनसत्ता अपार्टमेंट में ठीक ऊपर के माले का फ्रलैट ओम थानवीजी का। उन्होंने बहुत चाव से उसे बनाया-संवारा। जब तैयार हुआ तो जोशीजी को आमंत्रिात किया। प्रभ्ााषजी की पूरे छह महीने तक आनाकानी। थानवीजी कह-कह कर हारे नहीं, प्रभाष जोशी जाने को राजी नहीं। उनके गले यह बात उतरी ही नहीं कि कोई कैसे द्घर बनाने के लिए इतना समय और ऐसी मेहनत कर सकता है।
नैनीताल से रानीखेत आते समय पहाड़ी नदियों को देख प्रभाषजी की उदासी और चिंता। क्या होगा? जंगलों में लगी या लगाई गई आग को देखकर भी प्रश्न। क्यों? कैसे? पूरे रास्ते मैं उनके प्रश्नों से जूझता रहा। पिफर जब माल रोड होटल में पहुँचे तो प्रभाषजी प्रपफुल्लित 'यार तुम्हारा शहर तो सचमुच स्वर्ग है।' शान्ति पथ पर भ्रमण करते हुए यह शब्द उन्होंने दसियों बार कहे होंगे। यही वायदा किया और लिया कि अक्टूबर-नवंबर में कुछ दिनों के लिए यहाँ आया जाएगा। नामवरजी की सहर्ष सहमति। नारायण सिंह राणा को यात्राा प्रभारी की जिम्मेदारी। पर नियति को यह मंजूर था नहीं सो हुई नहीं। पफोटोग्रापफी मेरा शौक है। कैमरा देख प्रभाषजी ने नामवर जी के साथ अच्छी पफोटो निकालने का आदेश दिया। बोले 'साथ कई जगह गए, खूब पफोटो भी खिंची लेकिन महापण्डित किसी ने भी भिजवाई नहीं, अब यह काम तुम्हारे जिम्मे।' मैंने तीनों की कई तस्वीरें अलग-अलग कोणों से खींचीं। भेनजी को कैमरे के स्क्रीन पर दिखाते हुए कहा कि 'इन तस्वीरों का मूल्य कौन चुकाएगा?' उस दिन 'पफादर्स डे' था। यह कौन सा नया त्यौहार है मुझ जैसों को पता तक नहीं। भेनजी ने मास्टर स्ट्रोक मारा 'प्रभाषजी को यह उनके पुत्रा की ओर से पफादर्स डे का गिफ्रट।' मैं निरुत्तर। आज जब वह नहीं रहे, सब बातें एक-एक कर याद आ रही हैं।
तीन दिन का साथ और इतनी यादें। मुझे 'महापण्डित' की उपाधि इन्हीं तीन दिनों में मिली। नामवर जी ने खुलासा किया 'काशी के पण्डितों ने राहुल सांस्कृत्यायन का मखौल उड़ाने के लिए उन्हें महापण्डित कह पुकारा।' मैं चौंका 'तो सर आप मुझे इस संबोधन से न पुकारें।' प्रभाषजी कहाँ मानने वाले। शायद १८ अक्टूबर को उनसे अंतिम बार बात हुई। संबोधन वही 'महापण्डित'। लीलाधर जगूड़ी ने उन्हें उत्तरकाशी बुलाया था। अशोक पाण्डे को सम्मानित किए जाने का कार्यक्रम था। 'यह अशोक पाण्डे कौन हैं? पूरी जानकारी एकत्रिात करके दो।' पता नहीं वह इस यात्राा में गए या नहीं। पर मेरा उनसे आखरी संवाद यही था।
नेहरू ने अपने ही कहे को संशोधित करते हुए कहा था 'मेरा यह कहना कि रोशनी चली गई है, गलत है। क्योंकि जो रोशनी इस देश में दिखी वह सामान्य रोशनी नहीं थी। जिस रोशनी ने पूरे देश को वर्षों से रोशन किया वह आने वाले कई वर्षों, शायद एक हजार साल तक इस देश का मार्ग प्रशस्त करती रहेगी। और पूरा विश्व उसे देखेगा।' प्रभाषजी पर भी यही लागू होता है। जिन मुद्दों को उन्होंने उठाया उन्हें पूरी शिद्दत के साथ मुकाम तक लाने का प्रयास किया। वह एक पफाइटर थे। इंडियन एक्सप्रेस समूह के रामनाथ गोयनकाजी की तरह। जैसा उन्होंने गोयनकाजी के बारे में लिखा है। उसके दृष्टिगत स्वयं प्रभाषजी किसी विचारधारा विशेष के गुलाम नहीं रहे।
वे मानवीय संवेदना को सर्वोपरि मानते थे। उनके मित्राों की सूची देख लें। वामपंथी, समाजवादी, संद्घी से लेकर जनसत्ता का आम पाठक। सभी के साथ प्रगाढ़ता परंतु सि(ांतों के साथ कोई समझौता नहीं। ६ दिसंबर १९९२ के बाद तो एक दम नए तेवर। साम्प्रदायिकता के खिलापफ, साम्प्रदायिक ताकतों के खिलापफ पूरी ताकत झोंकना। यह प्रभाष जोशी ही कर सकते थे। और जब हिन्दी भाषी बड़े अखबारों ने पैसा लेकर खबर छापने की शुरुआत की तो भी इस अधर्म के खिलापफ अलख जगाने की अगुवाई वही कर रहे थे। और यह कोई उनका झूठा महिमा मंडन मात्रा नहीं है। प्रभाष जोशी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी संवेदनशीलता थी। कुमार गन्धर्व के पुत्रा के भीख मांगने की खबर जब चैनलों में चल ही रही थी तो कैसे वह विचलित हो कइयों पफोन कर कुमार मुकुल के लिए कुछ करने का प्रयास कर रहे थे, इसका मैं चश्मदीद गवाह हूँ। डॉ. मुरली मनोहर जोशी को पफोन किया। अपने कई साथियों, शिष्यों को इन्दौर पफोन लगाया। आखिर क्यों? कुमार मुकुल की आवारगी किसी से नहीं छिपी। पर प्रभाषजी का तर्क था 'एक दिव्य आत्मा का पुत्रा है कुछ तो अंश होगा पिता का।'
अपनी भड़ास निकालने का सबसे सशक्त माध्यम बनती जा रही ब्लागरों की दुनिया में कुछ अर्से से लगातार प्रभाष जोशी पर हमले चल रहे थे जो उनकी मृत्यु के बाद भी जारी हैं। उनको ब्राह्मणवादी मानसिकता का शिकार, सती प्रथा का समर्थक, एक अत्यंत पतित, मनुवादी पत्राकार आदि करार दिया जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आमतौर पर किसी के निधन के बाद उसकी अच्छाइयों का स्मरण करना एक रिवाज है। प्रभाष जोशी पर ब्लॉग में हमले उनके जिंदा रहते होने लगे थे। उन्होंने पलटवार नहीं किया। ४ जून १९९३ के अपने कॉलम में लिखा था, 'मैंने उस पर हमला नहीं किया क्योंकि वह मेरे वार के काबिल नहीं था।' शायद ब्लॉगरों की दुनिया को भी वह यही संदेश देना चाहते होंगे। किंतु उनके जाने के बाद भी जब हमले जारी हैं तो उनका उत्तर दिया जाना आवश्यक है। मनुष्य मात्रा का जीवन विरोधाभासों का पुंज होता है। आप किसी के जीवन में झांक लें। चाहे लेनिन हो या मार्क्स, कैनेडी हों या मार्टिन लूथर किंग, गाँधी हों या मंडेला, नेरूदा हों या दिनकर। सभी के साथ यह लागू है। आवश्यकता है और जरूरत भी, समग्र मूल्यांकन की। प्रभाष जोशी ने सती प्रथा के समर्थन में लिखा था या
किसी से लिखवाया। इस पर जितना लिखा जाना था बहस होनी थी और उनकी भर्त्सना होनी थी वह उनके रहते हों गई। और भी विचलन उनकी जीवन यात्राा के दौरान रहे होंगे। लेकिन क्या ऐसे तमाम विचलन उनके योगदान को, उनके व्यक्तित्व को खारिज कर सकते हैं? लिखा जा रहा है कि 'हो सकता है प्रभाषजी अपने आप में बड़े पत्राकार रहे हो। और उनके जाने से पत्राकारिता की बड़ी हानि हुई हो... लगता नहीं कि किसी प्रकार की हानि हुई है।' यह उदाहरण मात्रा हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं। ब्लॉगरों के प्रभाषजी पर हमलों से सुरेन्द्र किशोर तो इतने आहत हैं कि न अपने ब्लॉग में, न ही कहीं और कुछ लिखने को तैयार हैं। आखिर इतना द्वेष, इतना राग क्यों। प्रभाष जोशी यदि ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए तो इसमें उनका दोष तो नहीं। वह कर्मकांडों में यदि यकीन करते थे तो इससे उनके सरोकारों का क्या वास्ता? सारा मामला दरअसल 'परसेप्शन' का है और 'परसेप्शन' का 'रियलिटी' से कुछ लेना-देना नहीं होता। यह सही है कि किसी का भी झूठा महिमा मंडन करना गलत है। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनको महिमा मंडन की आवश्यकता नहीं होती और उन पर झूठे आरोपों का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्रभाष जोशी ऐसे ही 'प्रभाष' थे। न केवल पत्राकारिता के बल्कि मानवता के भी।
इसे त्राासदी कहूँ या पिफर प्रारब्ध। ४-८-२००२ को अपने कॉलम में उन्होंने तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत की मृत्यु पर लिखते हुए उनकी बूढ़ी माँ की मनःस्थिति का मार्मिक चित्राण किया था। और जब वह स्वयं गए तो पीछे सत्तानवें वर्ष की बूढ़ी माँ को छोड़ गए, उसी अवस्था में जिसका जिक्र उन्होंने स्व. कृष्णकांत की माँ को देख किया था। उन्होंने लिखा 'उन्हें अंतिम प्रणाम करने जाने का साहस भी नहीं कर पाया। जब जा सकता था तब टीवी पर उनकी माता सत्यवती को उन्हें गोद में सिर लिए देखा। मैं टूट गया। सत्तानवें बरस की माँ को पचहत्तर बरस के बेटे का सिर गोद में लिए देख। अभी दो महीने पहले अपनी भी माता आई थीं। वे भी नब्बे पार कर चुकी हैं। जिस दिन माताराम जा रही थीं अपनी तबीयत खराब हो गयी। पिफर भी उन्हें कार में बैठाने दरवाजे तक गया और पाँव पड़े। उन्होंने रूंधे गले से कहा-अब ये नहीं होना चाहिए कि मेरे रहते तुम चले जाओ। हमसे सहन नहीं होगा, और वे रोने लगीं।
यह सोच कर पल भर तो धरती में समा गया कि अपनी थोड़ी-सी तबीयत बिगड़ने पर माताराम को क्या लगने लगता है। माताराम सत्यवती को कृष्णकांत जी को गोदी में ले बैठे देख मेरा क्या हाल हुआ होगा आप समझ सकती हैं।' जनसत्ता अपार्टमेंट के नीचे खड़े किसी को कहते सुना कि माताजी इंदौर में बेसुध पड़ी हैं। नियति का खेल भी अजीब है। इसे कोई समझ नहीं सकती। रानीखेत में बातों ही बातों में प्रभाषजी ने ७२ की उम्र में अपने कई परिजनों के चले जाने की बात कही तो डॉ. नामवर सिंह ने उसे खारिज करते हुए कहा कि अभी कुछ बरस और जीना है। प्रभाषजी की अस्सीवीं वर्षगाँठ मनानी है। मुझे संबोधित कर उन्होंने कहा कि यह आयोजन आप के जिम्मे। हालांकि प्रभाषजी ने मृत्यु के पूर्वानुमान की बात को स्वयं ही हवा में उड़ा दिया था पर अंततः वही सच साबित हुआ। |
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| उड़ गया हंस अकेला |
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आपमें से किसी ने भोर में साँझ को देखा है। मैंने देखा और महसूसा भी। भोर में साँझ। छह नवम्बर। ब्लैक ाइडे। सुबह का सूरज। प्रभा 'प्रभाष' के अंत का पैगाम लेकर आया था। पैगाम अपन तक भी पहुँचा। अपन पहुँचे वसुंधरा के जनसत्ता अपार्टमेंट। माहौल में गमगीनी। वहाँ पत्राकारों, प्रभाषजी को जानने-पहचानने वालों का हुजूम। गहरी उदासी में डूबे पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा-जाइये, अंतिम दर्शन कर लीजिए। पहली मंजिल-ए-१०२। वहाँ मौत का सन्नाटा। चिर निद्रा में सोए प्रभाषजी। सिरहाने जलता दीपक। अगरबत्तियाँ। दीवार में टंगी कुमार गंधर्व की खास तान भरी मुद्रा वाली तस्वीर। बांयी तरपफ कुछ लिखते गाँधी। बीच में प्रभाषजी, नहीं उनकी देह। प्राण विहीन देह। कुमार गंधर्व के निर्गुण की बेहद धीमी आवाज-'उड़ जाएगा हंस अकेला...।' यह आवाज सन्नाटे को तोड़ नहीं उसे और गहरा कर रही थी। हंस उड़ गया था। अकेला। पीछे छोड़ गया था दुनिया का मेला। देह का मानसरोवर। रोते-सुबकते परिजन। दिल में टीस लिए प्रिय। अधूरे सपने। अधूरी योजनाएँ।
प्रभाषजी के पास जाने की एक बारगी हिम्मत नहीं हुई। हमने हिम्मत बटोरी। रुके कदम रुककर बार-बार चले। पाँच कदमों को तय करने में सदियों को लांद्घने का भाव। पुष्प अर्पित करने के बाद नजरें उनके शांत-स्थिर चेहरे पर डालता हूँ। आँखों पर रहने वाला मोटा चश्मा नहीं है। निर्गुण बज रहा है- झीनी-झीनी बीनी चदरिया। इसके पहले अनेकों बार प्रभाषजी ने इसी जगह बैठकर कुमार गंधर्व के इस निर्गुण को सुना होगा। अब चिर निद्रा में लेटे प्रभाषजी को कबीर का यह पद जैसे खुद सुन रहा है। एक संदेश। सबके लिए। हंस को अंततः देह के मानसरोवर को एक दिन छोड़कर जाना ही है। यही प्रारब्ध है। प्रमाणित हो रहा है कबीर का पद-उड़ जाएगा हंस अकेला-जग दर्शन का मेला।
उनके पुत्रा सोपान जोशी कहा करते हैं-मेरे पिताजी में राजकपूर वाली संवेदनशीलता है। यह शायद ठीक भी है। राजकपूर माने ग्रेट शो मैन। सपनों से मोहभंग भी और सपनों का सौदागर भी। जो गाता है-किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार, जो मिल सके गम तो ले उधार, जीना इसी का नाम है। वह हिरामन जो कसमें खाता है। रात भर जागकर दुनिया वालों के भ्रष्ट कारनामों को अपनी आँखों से देखता है। जिसका दिल हिन्दुस्तानी है। जो बड़े गर्व से कहता है-हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा ;प्रभाषजी के लिए नरबदाद्ध बहती है। जो अहिंसा में विश्वास रखता है, गाँधीजी में जिसकी आस्था है। थोड़ा रूमानी, सच्चा, ईमानदार, थोड़ा प्रोपफेशनल। प्रभाष जी के मामले में प्यार केवल संगीत और लोक-परंपरा तक ही सीमित। राजकपूर जो लोगों को द्घूम-द्घूमकर सीख देता है-सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है। दोनों का क्षेत्रा अलग-एक का सिनेमा, दूसरे का पत्राकारिता। राजकपूर जिसका सपना है सुबह का जो हर हाल में आएगी। सुबह के इंतजार प्रभाष जी को भी है गाना बजता है- 'इक दिन मिट जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल।' अब शब्द बच गए हैं- बोले और लिखे हुए। शो का इंटरवल है यह। खेल-तमाशा अभी जारी रहेगा। शो इज मष्ट गो ऑन।
प्रभाषजी के स्थिर चेहरे को देखकर उनसे जुड़ी कई बातें याद आती हैं। लिखा था 'अगर कोई भगवान है और उसकी प्रार्थना की जा सकती है तो मैं प्रार्थना करूँ कि जिस दिन तलाश करने की, कुछ ढूँढ़ते रहने की मेरी इच्छा मर जाए उस दिन मुझे शक्ति देना कि टहलने के अपने जूते पहन और पैदल चलता हुआ श्मशान पहुँचू। वहाँ इशोपनिषद का श्लोक बोलूँ-वायुरनिलम अमृतम...। मेरे अंत में ही मेरा प्रारंभ हो।' प्रारंभ लिए यह कैसा अंत सामने मौजूद है। समझ के परे है अपुन के। उनकी कोई एक वृ( परिचित वैशाखी का सहारा लिए आगे बढ़ती है। माथे को प्यार से सहलाती हुई करुण स्वर में सवाल करती है-हमें छोड़कर कहाँ चले गए तुम? एक अनुत्तरित सवाल। जाना सबको है। लोग जाते भी हैं। लेकिन क्या इस तरह? 'पफटापफट' बीसमबीस' जैसे शब्द गढ़ने वाले प्रभाषजी अपने अचानक इस तरह चले जाने पर कौन सा नया देशज शब्द गढ़ते, वही जानें।
तीन महीने पहले 'पाखी' के वार्षिकोत्सव का आमंत्राण कार्ड देने इसी जगह आया था। शाम का वक्त। तब प्रभाषजी ने चाय पीते हुए सामने टंगी गाँधी की तस्वीर दिखाते हुए कहा था- 'इस तस्वीर की खास बात है, गाँधीजी बाएँ हाथ से लिख रहे हैं। यह रेयर तस्वीर है। गाँधी संग्रहालय से निकलवाकर इसे बनवाया है। गाँधीजी जब दाएँ हाथ से लिखते-लिखते थक जाते थे तो वे खुद को आराम देने की बजाय बाएँ हाथ से लिखते थे और बाएँ हाथ से उसी सहजता और प्रवाह से लिखते थे जितना कि दाएँ हाथ से। तो पंडितजी ये होती है आदमी में काम करने की लगन।' प्रभाषजी ने भी कर्मठ का गाँधीजी से सीखी थी।
बगल के कमरे में प्रभाषजी की पत्नी ऊषाजी यानी भेनजी की सिसकियां। सांत्वना देती महिलाओं के बीच जार-जार आंसू बहाती भेनजी। आंसुओं से भीगे चेहरे पर पति की मौत का प्रतिरोध करती सुर्ख रंग की बड़ी बिंदी। लाल मतलब विरोध भी। वह बड़ी बिंदी भी जैसे प्रभाषजी के सहसा निधन को स्वीकार नहीं कर पाई। वह सुर्ख निशान मुझे प्रतिरोध का सूरज मालूम हुई। सबसे ज्यादा नुकसान तो भेनजी का ही हुआ। इतने सालों का साथ छूटा। कौन देगा जन्मदिन पर जंगल से लाकर कनेर के पफूलों का उपहार। 'भेनजी' का दशकों पुराना आत्मीय संबंध आखिर गुम हो गया। इनके बगैर कितना कठिन होगा जीना। कुछ ही महीने पहले रानीखेत में भेनजी ने मेरी मौजूदगी में नामवरजी से शिकायत के लहजे में कहा था-'इतने बड़े व्यक्ति हैं कि इनकी शिकायत करूँ भी तो किससे? आपको बता रही हूँ इधर दिनों-दिन जिद्दी हो गए हैं। बात-बात पर झल्ला जाते हैं। अपने मन की करते हैं, सुनते ही नहीं...।' कहीं उस शिकायत का तो बुरा नहीं माना उन्होंने। रूठकर हमेशा के लिए दूर चले गए। ठहरे तो जिद्दी ही। मन का ही उन्होंने किया। बिना बताए चल दिए। इस बार तो वह सो भी नहीं रही थीं कि जगाना उचित नहीं समझे। जीवन साथी क्या बीच मझधार में ऐसे साथ छोड़ते हैं?
कहा करते थे-मुझे मालूम है, मेरे पास कितने ओवर हैं और मुझे कितने रन बनाने हैं। लगता है, ओवर गिनने में कहीं चूक हो गई। इसका अंदाजा भी था उन्हें। जैसे कई दिग्गज टीमें सब कुछ रणनीति के अनुसार करते हुए भी हार जाती हैं, सचमुच ही रणनीति काम नहीं आई। वे समय से पहले ही मैच हार गए।
पत्राकारिता की नई परिभाषा गढ़ने वाले इस शख्स के इंदौर वापसी पर पत्राकारों का वह हुजूम नहीं था जो दिल्ली में छह नवम्बर को देखने को मिला। वही इंदौर जहाँ लौटने की बात वे करते थकते नहीं थे-'द्घर अगर कहीं है तो यही कहूँगा कि इंदौर है और यहीं लौटना है।' इलियट की पंक्ति है-द्घर वह है जहाँ से हम रवाना होते हैं। प्रभाषजी ने परिभाषा बदल दी। द्घर वह है जहाँ हम लौटते हैं। एक में रवाना होना ज्यादा महत्वपूर्ण है, दूसरे में लौटना। लेकिन वही तो लौटकर आएगा जो रवाना हुआ है। और जो रवाना हुआ है उसे लौटकर तो आना ही है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम उड़ें और उड़ते चले जाएँ और शून्य नीलाकाश में बिखर कर विलीन हो जाएँ। पक्षी होना हर किसी की किस्मत में कहाँ बदा होता है जो शाम ढले अपने द्घोंसले में लौटता जरूर है? प्रभाषजी को आभास था-'चूंकि इंदौर अब वह इंदौर नहीं जहाँ से मैं निकला था, इसलिए जिस इंदौर में लौटकर आऊँगा वह मेरा द्घर नहीं होगा। पराए इंदौर में क्या लौटना क्योंकि उसमें जड़ों के लिए वह जमीन तो नहीं होगी जहाँ से उन्हें उखाड़ कर निकला था।' मगर वे उसी पराए इंदौर में लौटे। आंधी-तूपफान की तरह बदल रहे इंदौर में। जहाँ द्घर था। द्घर में भाई, परिजन, पुरानी यादें। और ९८ साल की वृ
( माँ थी।
वर्ष ९५ का वाकया। तीन बेटियों के बाद जन्मे अपने सबसे बड़े बेटे की संपादकीय छोड़ने की खबर सुनकर बहुत खुश थी माँ। बेहद उत्साहित। पुलिकत। जैसे किसी मासूम बच्चे को उसका मनचाहा खिलौना मिलना तय हो गया है। पहली बार पफोन किया-'तम ने भौत अच्छो कियो कि बंधन मुक्त हुई ग्या। हमारे भौत खुसी हुई। अब थोड़ा दिन इदर आ के रो।' तब जनसत्ता के संपादकीय से मुक्त होकर भी वे नहीं लौटे द्घर। द्घर के उस बड़े कमरे में जो संपादकीय छोड़ने से पहले ही परिवार वालों ने बना दिया कि इंदौर वापसी पर इस कमरे में रहकर लिखेंगे-रहेंगे। चौदह साल बाद वापसी हुई। वो हृदय-विदारक वापसी। ईश्वर न करे किसी मां के बेटे की वापसी इस अंदाज में हो।
हम प्रभाषजी के पार्थिव शरीर के साथ इंदौर नहीं गए। उनकी जी यानी माताराम से भी कभी नहीं मिले। लेकिन बेटे की वापसी पर उनके भीतर उठे दर्द की कल्पना कर सकते हैं। बाट जोहती माँ की पथराई आँखें। बेटे की द्घर वापसी। जोगी को अपने महाप्रस्थान से पहले माँ का आशीर्वाद चाहिए होता है। ९८ साल की माँ की गोद में ७२ साल के बडे़ बेटे का शव। बचपन में बड़ी जतन करने पर सोता था शिशु प्रभाष। इस बार तमाम लोगों को दुःखों के हवाले कर सो गया। कभी न जागने के लिए। माताराम बहुत पहले वैरागी बन गई थीं। माया मोह को त्याग दिया था उन्होंने। लेकिन हिल उठी होंगी बेटे के शव को देखकर। क्षणभर में भस्म हो गया होगा वैरागीपन। पफूट पड़ी होंगी। बेटे के शांत-स्थिर चेहरे को देखते उसे सहलाते। वृ( काया और जर्जर मन कैसे सह पाया होगा सब कुछ। क्या क्षणभर में प्रभाष का पूरा जीवन वृत्त उस वृ( माँ की आँसू भरी आँखों में द्घूम नहीं गया होगा। माँ धरती होती है। वह भी धरती हैं। कैसे एक बीज उसी के गर्भ से पफूटा। उन्होंने उसे खून-दूध से सींचा, बड़ा किया। बेटा परदेशी हुआ और पूरी दुनिया में छा गया। आज ७२ वर्ष बाद पक कर नष्ट हो उसी की गोद में गिरा है। क्या यही है जीवन चक्र? एक माँ पर सबसे बड़ा सितम।
इंदौर की दैनिक पत्राकारिता छोड़कर दिल्ली इस इरादे से आए थे कि ययाति पर जो नाटक लिखा था, उसे खेलाऊँगा। छपवाऊँगा। गाँधी साहित्य के प्रकाशन का काम करते हुए नाटक, कहानी, उपन्यास और कविता लिखूँगा। उस नाटक का एक अंक रद्दी के साथ बिक गया। पिफर दैनिक पत्राकारिता की जद्दो-जहद में पफंसे तो उससे निकल नहीं पाए। यानी वो कपास ओटने लगे। कपास से सूनी, सूनी से सूत। सूत से एक चादर बुना। इस क्रम में एक चाहत भी पनपी-हरि भजन करते यह चादर मेरा कपफन हो जाए। मगर दिल्ली नहीं, अपने मालवा के द्घर में। चाहत पूरी हुई। कपफन में लिपटी देह माँ के सामने थी-शब्दों के सूत और सरोकारों की चादर रूपी कपफन में लिपटी। वह चादर जो प्रभाषजी ने शब्दों से बुनी थी। झीनी-झीनी बीनी चदरिया...। माँ की सीख ताउम्र गाँठ बाँधे रखी-कभी द्घी द्घना, कभी मुट्ठी चना, कभी वो भी माना। मतलब हालात बदलते हैं। आदमी को हर हालात का मुकाबला करना चाहिए।
प्रभाष माने क्या? क्या होता है प्रभाष जोशी होने का मतलब। प्रभाष जोशी नाम एक जुनून, एक कर्मठता, एक पागलपन और एक नई लीक बनाने का। खेल, संस्कृति, साहित्य, पत्राकारिता, संगीत, द्घुमक्कड़पन, भावुकता और जनसरोकार को द्घोंटने से जो चीज बनेगी उसकी शक्ल प्रभाष जोशी जैसी ही होगी। पत्राकारिता को आंदोलन का रूप दिया। जनसत्ता एक दौर में देश के सबसे बड़े राजनीतिक विपक्ष के रूप में उभरा। जनसत्ता दस्तावेज बना, उसके इतिहासकार वे खुद। अपने प्रिय कुमार गंधर्व की भांति पत्राकारिता में कायम शास्त्राीयता को तोड़कर देशज का खूंटा गाड़ा। जो भी लिखा उसमें डूबकर लिखा। परंपरावादी होने के चलते आलोचना के तीर झेले। संद्घ के पक्षपाती होने का आरोप लगा। ६ दिसंबर १९९२ को बावरी मस्जिद विध्वंस की ऐतिहासिक द्घटना के बाद जिस आक्रामक ढंग से संद्घ-भाजपा की धज्जियां उड़ाई उससे एक नए 'प्रभाष' का उदय हुआ। तमाम गिले-शिकवे धुल गए। आलोचकों की जुबां पर ताले जड़ गए। अटल बिहारी वाजपेयी और गोविंदाचार्य इनके प्रिय रहे। लेकिन उनकी चाल-ढाल गड़बड़ाने पर उन्हें भी नहीं बख्शा। ७४ के आंदोलन में सक्रिय रहे। इमरजेंसी में इंदिरा का कोप भी झेला। यह जिगरा उनके पास ही था। पुत्रा संदीप जोशी राष्ट्रीय टीम में खेलकर पिता का सपना पूरा करने वाले थे। बीच में सुरेन्द्र किशोर की भगवत झा आजाद वाली रिपोर्ट आ गई। भागवत झा आजाद के पुत्रा कीर्ति अजाद ने प्रतिरोध की भावना में संदीप के छक्के छुड़ा दिए। संदीप क्रिकेटर नहीं बन सके। पिता का सपना पूरा नहीं हुआ। लेकिन इसके लिए न उन्होंने पत्राकारिता के मूल्यों से समझौता किया, न सुरेन्द्र किशोर के प्रति स्नेह में कोई कमी आने दी।
अब बात प्रभाषजी के विरोधियों की। बेशक प्रभाष जोशी की कुछ सीमाएँ थीं-कुछ कमजोरियां भी रही होंगी। एक-आध चूक। जो किसी से भी हो सकती है। इसे इस रूप में भी देखना चाहिए कि वो देवता नहीं थे। याद नहीं आता, उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर किसी को आहत किया हो। अंतिम दिनों में भी उन्होंने 'न्यूज पैकेजिंग' के जरिए पूंजीपतियों के खिलापफ मोर्चा खोला था। मीडिया में भ्रष्टाचार की द्घुसपैठ के खिलापफ मुहिम छेड़ी। बाजार की बंदगी को कोसा। लेकिन हमारे 'भाई' लोगों को वह नहीं दिखा। मीडिया ने पैकेजिंग वाली प्रभाषजी की लड़ाई को मुद्दा नहीं बनाया। बनाता भी तो कैसे? हमाम में सब नंगे जो हैं। बहुत से अखबारों ने उनके निधन की खबर को प्रमुखता से इसलिए नहीं छापा क्योंकि उन्होंने उनका पैसा लेकर चुनाव की खबरें छापने के लिए नाम लिया था। वर्चुअल स्पेस, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिाक बहस के नाम पर ब्लॉग में खूब हमले हुए प्रभाष जोशी पर। उनके निधन के बाद भी चिता की लपटों के साथ हमलों का सिलसिला जारी रहा। प्रगतिशीलता का यह नया तरीका था। गड़े मुर्दे उखाड़े गए। यहाँ तक कि प्रभाषजी पर लिखने वाले सुरेन्द्र किशोर को गालियाँ तक दी गईं। व्यथित सुरेन्द्र किशोर ने पत्राकारिता छोड़ने तक की बात की। ब्लॉग पर दिए गए साक्षात्कार में ब्राह्मणवाद को पकड़ लिया गया। मीडिया में भ्रष्टाचार की सेंधमारी के पक्ष में कहीं कोई सुनगुन नहीं दिखई दी। पूंजीपतियों के लिखापफ छेड़ी गई उनकी लड़ाई को ब्राह्मण वाद का हौवा दिखाकर मिनिमाइज कर दिया गया। क्या ऐसा नहीं है कि असल में सारा खेल अपनी-अपनी दुकानदारी चमकाने का है। नामचीन लोगों के नाम को ध्वस्त कर खुद का 'नाम' स्थापित करने का क्रांतिकारी जुगाड़।
ऐसा माना जाता है कि अखबार में काम करते-करते और रोज एक ही तरह की उत्तेजनाओं से गुजरने की वजह से पत्राकार-संपादक संवेदनहीन हो जाते हैं। प्रभाषजी के साथ ऐसा नहीं था। बहुत संवेदनशील थे वो। बात-बात पर उनकी आँखें छलछला जाया करती थीं। कहा करते थे- रोएँगे नहीं तो जिएँगे कैसे? जब वो किसी का हाथ पकड़कर बहुत देर तक हथेलियों को अपने हाथों में लेकर दबाते थे तो नाराजगी का बड़ा से बड़ा हिमालय पिद्घल जाया करता था। ऐसा प्रभाष जोशी ही कर सकते थे कि खुद से नाराज चल रहे राजेन्द्र यादव के ८०वें जन्मदिन समारोह में सरेआम उनके पैर छू लें। उनमें ब्राह्मण का दर्प देखने वालों को उनकी यह विनम्रता भी देखनी चाहिए।
महानगरीय दिनचर्या आदमी को सिपर्फ और सिपर्फ वर्तमान में जीने का आदी बना देती है। नए जमाने ने जीने का नया पफार्मूला दिया है 'इंज्वाय'। सोचो नहीं, दुनिया को भोगो। वर्तमान में इस कदर जीने के खिलापफ थे प्रभाषजी। उनकी अपनी दलीलें थीं। वर्तमान में सिपर्फ पशु जीते हैं, क्योंकि उनके पास कोई स्मृति, कोई सपना नहीं होता। प्रभाषजी की पत्राकारिता एक स्मृति है और उनकी अधूरी लड़ाई को आगे बढ़ाना एक सपना भी। आप उन लोगों को हमेशा ढूँढ़ते रहते हैं जिनके साथ आपने अपने भविष्य को बुना था। उनके चले जाने से आपको लगता है कि भविष्य की ओर देखें तो कैसे। ऐसे में आप भविष्य में अतीत को प्रोजेक्ट करते हैं-भविष्य बनाने के लिए अतीत का होना जरूरी है।
पिफलहाल प्रभाष जी की गैरमौजूदगी का पता नहीं चल रहा है। वे इस समय लगातार हमारी चर्चाओं में हैं। अपने एक मित्रा के शब्दों को उधार लेकर कहूँ तो हम में से बहुत से लोगों के भीतर थोड़ा-थोड़ा हैं प्रभाष जोशी। हमारे सामने अब चुनौती उस थोड़े को विस्तार देने की है। 'प्रभाष परंपरा' को बढ़ाना होगा आगे। रिले रेस की तरह। केवल श्र(ासुमन से काम नहीं चलेगा। पफूल मुरझाते हैं। यथार्थ के जिस बियवान में वे हमें छोड़ गए हैं-वहाँ हमें मौजूदा समय से मुठभेड़ करते हुए सत्य और आम आदमी के सरोकार की लड़ाई को परिणति तक पहुँचाना है। |
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