प्राप्त करती है। अगर उन जीवन मूल्यों में बहुत परिवर्तन दबाव के कारण आ रहा हो तो उसका संकट आप पत्राकारिता में देख सकते हैं। जैसे मान लीजिए द्घरों में बच्चों को यह सिखाया जाता है कि बाँट-चूट कर खाना और बैकुण्ठ में जाना। यानी यदि आप बाँट-चूट कर खाएँगे तो बैकुण्ठ में जाएँगे। कुछ समय पहले टीवी पर पेप्सी का एक विज्ञापन आता था। पेप्सी के इस विज्ञापन में अमिताभ बच्चन एक द्घर में जाता है। वहाँ एक ही पेप्सी बचती है।
अमिताभ बच्चन जब बच्चे से वह पेप्सी माँगता है तो बच्चा झट से जवाब देता है कि क्या आप मुझे बु(ू समझते हैं? यानी आज के इस दौर में बाँट-चूट कर खाना बु(ूपने की निशानी है। हमारे यहाँ अपना जो सामाजिक मूल्य है वह कहता है कि बाँट-चूट कर खाना सुख यानी स्वर्ग प्राप्त करने की स्थिति है। बाजार का मूल्य यह है कि आप अपनी सभी चीजों को अपने पास जकड़कर रखें और ज्यादा से ज्यादा चीजों को कन्ज्यूम करें। इसीलिए 'ये दिल माँगे मोर' होता है। लेकिन यह बताइए कि हमारे समाज में जहाँ ५-१० प्रतिशत लोगों को भी अच्छा खाना-पीना नसीब नहीं होता है, वहाँ 'ये दिल माँगे मोर' कैसे करें? हमारे समाज के ९० प्रतिशत लोग 'मोर' कहाँ से लाएँ? तो आज मूल्यों का संकट है। आज अंतरराष्ट्रीय बाजार अपने मार्केट में परिवर्तन करने के लिए जो मूल्य आपके यहाँ जबरदस्ती ला रहा है और आपके जो पारंपरिक जीवन मूल्य हैं उनके बीच में बहुत संद्घर्ष है। और यह संकट आपको अपनी पत्राकारिता में भी दिखाई देता है। क्योंकि अपनी पत्राकारिता उतनी मार्केट ओरिएन्टिड कभी नहीं थी जितनी कि अब होती जा रही है।
व्यावसायिकता के इस दौर में पत्राकारिता के स्वरूप में परिवर्तन होने से क्या आज पत्राकारिता के उद्देश्यों में भी बदलाव आया है?
जी हाँ उद्देश्यों में बिल्कुल बदलाव आया है। क्योंकि मैंने पहले किसी भी अखबार मालिक को यह कहते हुए नहीं सुना कि हम तो मुनापफे के लिए अखबार निकालते हैं और जिन-जिन चीजों से हमारा मुनापफा बढ़ सकता है हम उन्हें समर्थन देंगे। अपने देश में यह पहले कभी नहीं कहा गया। क्योंकि पहले हमारे देश में अखबार निकालना समाज परिवर्तन का माध्यम माना जाता था। इससे भी पहले अकबर साहब ने कहा कि 'अगर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।' अब हमको समाज परिवर्तन के लिए पत्राकारिता करनी है या सामाजिक न्याय के लिए पत्राकारिता करनी है या पिफर देश में आजादी के मूल तत्वों की स्थापना करने के लिए पत्राकारिता करनी है। ये सभी उद्देश्य बाहर हो गए हैं। ये उद्देश्य बाहर इसलिए भी हुए हैं क्योंकि हमारे राज्य के भी अब वो सि(ांत नहीं रहे। साथ ही साथ हमने बाजार की अर्थव्यवस्था को भी स्वीकार कर लिया है। इसलिए हमारी पत्राकारिता में बाजार के हित को साधना ज्यादा जरूरी हो गया है बजाय लोकहित साधने के।
पत्राकारिता में विचार में प्रतिब(ता की जो स्थिति पनप रही है उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
विचार में प्रतिब(ता यानी विचारधारा या वैचारिकता का पफर्क समझना चाहिए। विचारधारा यानी कोई मार्क्स की विचारधारा मानेगा या कोई पूंजीवादी विचारधारा मानेगा या कोई हिन्दुत्व की विचारधारा मानेगा। तो इस प्रकार विचारधारा के अनुसार पत्राकारिता करना तो पार्टी या दल की पत्राकारिता करना है। वैचारिकता का मतलब है कि जो भी विचार सामने है आप उसे विचार की दृष्टि से अपने निजी जीवन और राष्ट्रीय जीवन की कसौटी पर लगाकर देखें। यदि आप ऐसा करेंगे तो विचार की कद्र करेंगे। विचार की इज्जत किए बिना कोई भी वैचारिकता पनप नहीं सकती। लेकिन विचारधाराएँ यह कहती हैं कि हम ही सत्य हैं बाकी और सब बेकार हैं। ये जब कोई मान ले तो वो वैचारिकता छोड़ देता है। वैचारिकता मानने का मतलब यह है कि आप सब विचारों के लिए दरवाजे खुले रखें और मानें कि सब विचारधाराओं से कोई बिल्कुल सही मार्ग निकल सकता है। लेकिन सत्य किसी एक के पास है यह गलत है। और यह मैं नहीं कह रहा हूँ हमारे सभी पुराने ग्रन्थों में लिखा है कि अन्तिम सत्य कोई नहीं है। जो भी सत्य है वो उस समय के अपने प्राप्त सत्य हैं और उनको हम जितनी सरलता से समझ सकते हैं समझें। उन तक भी पहुँचने का रास्ता एक अकेला मेरा या आपका रास्ता नहीं है। उन तक पहुँचने के कई रास्ते हैं। ऐसा भारत के पूरे दर्शन और पूरे धर्म में कहा गया है जो दुनिया में कहीं नहीं कहा गया है। तो यह वैचारिकता यानी यह खुलापन आप विचार के साथ रखें यह एक अलग बात है और एक ही विचारधारा के अनुसार अपने अखबार को चलाना यह एक अलग बात है।
आज अनेक पत्राकार राजनीति में आ रहे हैं जबकि वर्तमान राजनीति और पत्राकारिता के रास्ते अलग-अलग हैं। इसे आप कहाँ तक उचित मानते हैं?
अपने यहाँ पत्राकारिता और राजनीति का बहुत पुराना संबंध है। आप जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी की स्थापना करने वाले जो ९०-९१ लोग थे उनमें से २० से ज्यादा तो पत्राकार थे। इसका मतलब कि जो पार्टी देश में स्वशासन के लिए और पिफर देश की आजादी के लिए लड़ी उसका देश की पत्राकारिता में बहुत बड़ा स्थान है। देश को आजाद कराने की जो राजनैतिक आकांक्षा थी वही राजनैतिक लक्ष्य पत्राकारिता का भी था और इसीलिए भारतीय पत्राकारिता आजादी के आंदोलन का एक चमकता हुआ हथियार बनी। अब जो भूमिका हमने अदा की थी यानी २००-२५० साल की परंपरा, उसको हम छोड़ तो सकते नहीं हैं। अब जैसी राजनीति हो रही है वैसी ही पत्राकारिता भी हो रही है क्योंकि दोनों एक-दूसरे से संबंधित होकर चलते हैं। उस पत्राकारिता और उस राजनीति के कारण हमारी पत्राकारिता ही ज्यादा बिगड़ रही है क्योंकि आजाद लोकतांत्रिाक देश में सत्ता के लिए होड़ करना तो राजनीति का स्वयंसि( स्वभाव हो सकता है लेकिन पत्राकारिता का स्वयंसि( सि(ांत यह नहीं हो सकता कि आप उस राजनैतिक सत्ता में अपने हिस्से की मांग करें। आज जो कुछ राजनीति में पत्राकारिता कर रही है वो अपने हिस्से की मांग कर रही है जो कि गड़बड़ करती है।
अखबारों से साहित्य गायब होता जा रहा है?
यह सही है कि अखबारों से साहित्य गायब होता जा रहा है लेकिन इसका मात्रा कारण यह नहीं है कि अखबारवालों में कुछ गड़बड़ हो गयी है। पहले जो पढ़ने-लिखने जाते थे वही लोग अखबारों के भी पाठक होते थे। मान लीजिए आज से ४० साल पहले जो पाठक रहा होगा। यानी मेरे जैसा जो लड़का रहा होगा उसने शेक्सपियर भी पढ़ा था। उसने प्रेमचंद भी पढ़ा था। उसने शरतचन्द, रवीन्द्रनाथ, मार्क्स, टालस्टाय, रशियन मास्टर, ैंचमास्टर सब पढ़ रखा था। तो वो सब बैकग्राउण्ड अपने पाठकों का होता था। लेकिन जब से हमने बड़े पैमाने पर साक्षरता का प्रोग्राम शुरू किया तब से साक्षरता आ गयी यानी पढ़ना-लिखना तो आ गया लेकिन पढ़ने-लिखने के पीछे जो लिखने-पढ़ने की पृष्ठभूमि है वो गायब हो गयी। आप ये पाएँगे कि ज्यादातर पत्राकारों का ये अंदाज नहीं है। अगर आप उनसे पूछ लें कि बताओ ओथेलो किसने लिखा है? तो उन्हें यह मालूम नहीं होगा कि किसने लिखा है। क्योंकि जिस प्रकार से उनका पाठक नवसाक्षर व्यक्ति है उसी तरह से वो नवसाक्षर पत्राकार हैं। उनकी कोई बैकग्राउण्ड नहीं है। ऐसे लोगों को लगता है कि साहित्य का क्या महत्व है।
अब साहित्य का क्या महत्व है तो साहित्य में रुचि लेने वाले लोग पहले भी अपनी रुचि अखबारों से पूरी नहीं करते थे। अखबारों से शुरुआत होती थी। पिफर वो साहित्य में यानी लिखने-पढ़ने की तरपफ जाते थे। अब जो अखबार से शुरू होता है वो ज्यादा से ज्यादा टीवी में खत्म हो जाता है। टीवी को मैं ट्रिबेलाइजेशन यानी चीजों को न कुछ कर देने का सबसे बड़ा माध्यम मानता हूँ। एक बार टीवी में ही कहा गया था कि यदि टीवी का बस चले तो वो कालिदास को खुशवन्त सिंह और मीराबाई को शोभा डे बनाकर छोड़ देगा। यह माध्यम ही ऐसा है जो चीजों को ट्रिबेलाइज करता है यानी चीजों को नाकुछ बनाता है। तो जो अखबार के छिछलेपन से शुरू हुई वो टीवी के छिछलेपन में समाप्त हो जाए तो वो साहित्य वाला मामला नहीं होता है। इसलिए साहित्य को अपने काम के लिए जैसे प्रिटिंग प्रेस ने एक माध्यम दिया। जैसे टीवी भी एक माध्यम देता है। तो इसके अलावा भी कुछ चीजें निकालनी चाहिए। इसका कारण यह है कि टीवी एक्शन का माध्यम है जबकि साहित्य कल्पना का माध्यम है। तो कल्पना के माध्यम के लिए क्या करना चाहिए, यह साहित्य को सोचना चाहिए।
साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर आप लगातार लिखते रहे हैं। गुजरात दंगों के बाद कुछ लोगों ने मीडिया की भूमिका पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाया था।
मीडिया के खिलापफ वो लोग बोले हैं जो कि या तो सत्ता में हैं या पिफर जो दंगों में सक्रिय रूप से शामिल थे। दरअसल अगर देखा जाए तो ये दंगे नहीं हैं। गोधरा में जो कुछ हुआ वह सबका सब मुसलमानों ने किया। उसके बाद जो गुजरात में हुआ वह सबका सब हिन्दुओं ने किया। तो एक प्रकार का वह हिन्दू विरोधी और यह मुस्लिम विरोधी दंगा हैं। जैसे १९८४ में जो दिल्ली में हुआ वो सिक्ख विरोधी था। बेचारे सिक्ख लड़ने के लिए नहीं आए थे। उसी तरह से बेचारे मुसलमान वहाँ लड़ने के लिए नहीं आए। और उसी तरह से वे बेचारे हिन्दू जो साबरमती एक्सप्रेस में बैठे हुए थे वे भी लड़ने के लिए नहीं आए थे। तो ये दंगा नहीं है। ये सुनियोजित ढंग से एक समुदाय को समाप्त करने की कोशिश है। अब इन बातों को जितनी सापफ-सापफ और जितनी तथ्यात्मकता के साथ दोनों अपने प्रिंट मीडिया ने और अपने इलैक्ट्रानिक मीडिया ने जनता के सामने रखा है उससे इन लोगों को बुरा लगा है। लेकिन मैं यह मानता हूँ कि संद्घ संप्रदाय के जो दोनों ही लंका कांड थे वो पत्राकारिता के सुंदर कांड हैं।
इस दौर में हमारे देश पर बाजारवाद का असर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। एक वरिष्ठ पत्राकार होने के नाते इस देश और दुनिया को आप किस रूप में देखते हैं?
दुनियाभर के साहित्य में चाहे वह महाभारत हो, चाहे ओथेलो हो या पिफर कोई अन्य पुस्तक हो, मनुष्य के मनुष्य से संबंध के बारे में बात हुई है। लेकिन अब दुनिया के ऊपर दो तत्व राज करने की कोशिश कर रहे हैं। एक तो होड़ यानी कम्पीटीशन और दूसरा प्रतिहिंसा। पिछले पन्द्रह-बीस साल से जो तत्व सबसे ज्यादा जोर लगा रहा है वह करूणा का, प्रेम का या सत्य का नहीं है वह प्रतिहिंसा का तत्व है। आप पाएँगे कि ये दोनों ही तत्व यानी होड़ और प्रतिहिंसा दुनिया के किसी भी साहित्य की मूल प्रेरणाएँ नहीं हैं। क्योंकि जहाँ साहित्य है वहाँ होड़ नहीं है। क्योंकि जहाँ आकाश है, जहाँ शून्य है वहाँ आप किससे होड़ करेंगे। वहाँ तो वह ध्रुव तारा ही है जिसको आप अपने सत्य की तरह टिका कर रखते हैं। जैसे कबीर ने कहा वहाँ न सूरज है, न चांद है, बिना ज्योति उजियारा है। उस संसार में आजकल सबसे बड़ी शक्ति होड़ मानी जाती है। हमारे यहाँ अक्सर कहा जाता है कि गरीबी नहीं मिटती है। उत्तर मिलता है कि गरीबी मिटाना सरकार का काम नहीं है। गरीबी नहीं मिट रही है तो मार्केट में जाइए। इसकी चिंता मार्केट करेगा। आप कहीं भी जाएँ चाहे वह इंडिया इन्टरनेशनल सेन्टर हो, चाहे दिल्ली विश्वविद्यालय हो, आप कहीं भी जाकर मांग करें तो वो आपको कहेंगे मार्केट में जाइए।
मार्केट हमारे देखते-देखते हमारी नियति तय करने वाली ताकत हो गया। उधर एक और द्घटना हुई। सोवियत संद्घ के विखण्डन के बाद अमेरिका ने द्घोषणा की कि अब यह संसार एक ध्रुवीय संसार है। यानी अब दो ध्रुव नहीं रह गए है। अब मात्रा एक ध्रुव अमेरिका है और अब अमेरिका वही सब कुछ करेगा जो कि अब तक राष्ट्र संद्घ करने के लिए आगे आता था। लेकिन अमेरिका की ताकत कोई नैतिक ताकत, कोई लोकतांत्रिाक ताकत तो है नहीं। अमेरिका की ताकत पूंजी की ताकत है। अमेरिका की ताकत सैनिक ताकत है। रीगन जो उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति थे और थ्रेचर आण्टी जो उस वक्त इग्लैण्ड की प्रधानमंत्राी थीं, दोनों ने मिलकर सोचा कि हम बदलती दुनिया में यदि अपने सारे मुनापफे की इच्छा अपने उत्पादों से करते गए तो ये मुनापफा तो थोड़े दिनों बाद समाप्त हो जाएगा। क्योंकि जहाँ प्रगति होती जाएगी वहाँ के देश अपना सामान उत्पादित करेंगे और पिफर अपने लिए कोई मार्केट नहीं बचेगा। तो रीगन और थ्रेचर आण्टी ने मिलकर तय किया कि मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की जो चीजें हैं उनको आप अपने मुनापफे के साथ जोड़ दीजिए। क्योंकि ये ऐसी चीजें हैं जिनका उपयोग कभी समाप्त होने वाला नहीं है। इसलिए पानी, अन्न, स्वास्थ्य, शिक्षा सभी का व्यावसायीकरण कर दीजिए।
कुल मिलाकर मनुष्य के कल्याण का निजीकरण कर दीजिए। अगर यह तय हो गया तो पिफर पफायदा कभी समाप्त होने वाला नहीं है। यदि साहित्य की भाषा में कहें तो रीगन और थ्रेचर ने तय किया कि जहाँ-जहाँ ब्रह्म बैठा हुआ है यानी दुनिया में जहाँ भी सृजनात्मक शक्ति है वहाँ आप पूंजी को स्थापित कर दीजिए। पूंजी दुनिया में सब जगह बेरोकटोक आ-जा सके। उसके ऊपर कोई टैक्स न लगे ऐसी व्यवस्था कर दीजिए इसलिए उन्होंने कहा कि ग्लोबलाइजेशन करना चाहिए। ग्लोबलाइजेशन का मतलब है कि पूंजी जहाँ-जहाँ आना-जाना चाहे, जिसका द्घर बसाना चाहे, जिसका द्घर उजाड़ना चाहे उसे यह छूट होनी चाहिए। यानी यदि सांस्कृतिक शब्दावली में कहें तो लक्ष्मी के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। अप्सरा के लिए जगह होनी चाहिए। क्योंकि लक्ष्मी जहाँ जाएगी द्घर बसाएगी, स्थिरता लाएगी। और अप्सरा जहाँ जाएगी वहाँ प्रेम का, माया का संसार बनाएगी और जिस दिन उसकी इच्छा होगी वो उसको छोड़कर चली जाएगी। उसकी कोई जिम्मेदारी आपका द्घर चलाने की नहीं होगी। तो तय किया गया कि एक तो पूंजी को ब्रह्म की जगह स्थापित किया जाए दूसरे उसके चरित्रा को अप्सरा का चरित्रा दिया जाए। अपने यहाँ कहा गया है कि लक्ष्मी चंचल है लेकिन वो सिपर्फ चंचल है।
जबकि पूंजी को, अप्सरा पूंजी को छूट दी जा रही है कि वह कहीं भी आ जा सकती है। पूंजी के संसार में आत्मा की बात मत करो लेकिन जब गरीब लोगों के लिए जल, जमीन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की बात की जाती है तो कहा जाता है कि तुम्हारी कोई आत्मा है क्या। क्योंकि पूंजी की कोई आत्मा नहीं होती है। पूंजी तो ब्रह्म है। यदि सांस्कृतिक परिभाषा में कहा जाए तो कहेंगे कि पूंजी की कोई आत्मा नहीं होती है। पूंजी तो ब्रह्म है। यदि सांस्कृतिक परिभाषा में कहा जाए तो कहेंगे कि पूंजी तो ब्रह्म होगी और मुनापफा मोक्ष होगा। जिस किसी ने मुनापफा कमा लिया उसे मोक्ष की प्राप्ति हो गई। जब तक किसी चीज से कोई मुनापफा नहीं होगा तब तक उस चीज को करने का कोई मतलब नहीं है। सरकार की भी यही नीति है कि जिस चीज से लाभ नहीं हो रहा है उसे प्राइवेट हाथों में सौंपो। मार्केट उसी को अपने साथ लेगा जिसकी जेब में पैसा है। और जिसकी जेब में पैसा है वही होड़ में शामिल हो सकता है। तो इस देश के ९० करोड़ लोग तो बेचारे बाजार की अर्थव्यवस्था में आते ही नहीं हैं। वो किसी चीज को खरीदने और बेचने में होड़ नहीं कर सकते हैं।
क्या इस बाजारवाद का असर हमारे साहित्य पर भी पड़ रहा है?
अब अगर होड़ इस समाज का सबसे बड़ा मूल्य है तो आपके साहित्य का क्या होगा यह आप स्वयं सोच सकते हैं। दुनिया का कोई भी बड़ा उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक मनुष्य में होड़ पैदा करने के लिए नहीं लिखा गया है। तो आज के संसार का सि(ांत होड़ है और उसका दबाव आपकी किताबों पर है, आपके अखबारों पर है। साहित्य का जो संसार है उसको अगर कोई समाप्त करने पर तुला हुआ है तो वह मार्केट ही तुला हुआ है। क्योंकि साहित्य के संसार में जीवन का मूल्य ज्यादा बड़ा है। साहित्य के संसार में बाजार का भाव बड़ा नहीं हो सकता। बाजार के भाव और जीवन के मूल्यों में यह जो एक अन्तर्निहित संद्घर्ष है, यह सारी दुनिया के साहित्य में संकट पैदा कर रहा है। और इसलिए जितने विकसित देश हैं उनकी अपनी भाषा में लिखने वाले लेखकों का पतन हो रहा है और अंग्रेजी में लिखने वाली अरुंधती राय, विक्रम सेठ, अमिताभ द्घोष बाजी मारते जा रहे हैं। हालांकि वे भी अपने जीवन का साहित्य नहीं लिख रहे हैं, अपनी स्मृति का साहित्य लिख रहे हैं। यह दोयम दर्जे का साहित्य है पिफर भी पुरस्कृत हो रहा है। इसका कारण यही है कि इस प्रकार के साहित्य में जीवन का मूल्य अभी भी सुरक्षित होता हुआ दिखाई दे रहा है।
आपने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के विरु( अपनी आवाज बुलन्द की। इसके चलते आपको कट्टरपंथी तत्वों का विरोध भी सहना पड़ा। क्या इस देश में साम्प्रदायिकता को बार-बार भड़काना जरूरी हो गया है?
बाबरी मस्जिद तोड़े जाने से पहले इस देश के लोगों ने अपने देश में ही किसी धर्म स्थल को तोड़ा हो, ऐसा आप नहीं पाएँगे। अरब के देशों से जो शासक लोग यहाँ आए उनके लिए यह जरूरी था कि जिन कारणों से उनका धर्म अरब देशों में पफैला वह इस देश में भी किया जाए। इसलिए मंदिर और मूर्तियाँ तोड़ी गईं। लेकिन ऐसा करने से किसी का धर्म समाप्त नहीं हुआ। इस देश में जो भी मुसलमान बने हैं वो ज्यादातर लोग अपने देश की सूपफी परंपरा के कारण बने हैं। तलवार के बल पर तो कुछ ऐसे राजपूत और ब्राह्मण ही बने हैं जो राज्य में अपनी शक्ति ऊँची रखना चाहते थे। इसके अलावा सभी नीची जातियों का जो परिवर्तन हुआ है वह अपने देश की सूपफी परंपरा के कारण हुआ है। कबीर सूपफी परंपरा के आदमी थे। हमारे देश में भक्ति साहित्य ने जो चमत्कार करके दिखलाया है वह राणा प्रताप के भाले और शिवाजी की तलवार ने नहीं किया है। इन निचली जातियों के भक्त कवियों ने अपने देश को विखण्डित होने से रोका है। उस वक्त भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक वाले इस देश की अखाड़ा परंपरा में जीवित थे। ये जितनी अखाड़े आप कुंभ के मेले में देखते हैं उस मध्यकाल में पैदा हुए जब हमारा राज्य पराजित होकर दूसरे लोगों के हाथ में गया।
इस तरह अपने मठों की या अपने मठों की जमीनों की रक्षा करने के लिए इन साधुओं ने तलवार उठाई। और इस तरह ये लोग हमारी अखाड़ा परंपरा में शामिल हुए। गुरु गोविन्द सिंह के उदाहरण से समझ लीजिए कि उन्होंने १६९९ में आनन्दपुर साहिब में जिन लोगों को एकत्रिात करके अमृत चखाया और जिन लोगों को बाल रखने, कंद्घा रखने तथा कृपाण रखने आदि का संस्कार दिया वह एक पूरे के पूरे सम्प्रदाय को आर्मी में बदलने की कोशिश थी। उनमें से ही अपने यहाँ निर्मला अखाड़े, उदासीन अखाड़े निकले। उनमें से ही कई प्रकार के अखाड़े निकलकर आए और इन अखाड़ों ने हमारे समाज और धर्म की रक्षा नहीं की। वो अपने-अपने मठों की, अपने-अपने सम्प्रदाय की रक्षा करते रहे। इस समाज की रक्षा संत परंपरा के कवियों ने भक्ति के जरिए अपने यहाँ के लोगों को ऊपर उठाकर सुरक्षित रखी। उस भक्ति की परंपरा को आजादी के आदोलन में लाने वाले महात्मा गाँधी थे जिन्होंने भक्ति को राजनैतिक हथियार में परिवर्तित किया। इस प्रकार मध्य युग में भक्ति इस देश की अखाड़ा परंपरा से जीती।
आजादी का जो हिन्दुत्ववादी आंदोलन १९०९ में वीर सावरकर की महासभा से और १९२५ में हेडगेवार के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संद्घ से पोषित हुआ, वह भी देश को आजादी दिलाने वाला आंदोलन नहीं था। देश को आजादी दिलाने वाला भक्ति आंदोलन का नया राजनैतिक संस्करण हमारा स्वतंत्राता आंदोलन था। अब इस सब को देखते हुए अगर आप बाबरी मस्जिद पर आएं तो आप पाएँगे कि धर्म के नाम पर उसका औचित्य स्थापित करने के लिए पूरे संद्घ के पास कुछ नहीं है। वो कहते हैं कि एक ऐतिहासिक बदला लेने के लिए मस्जिद तोड़ी गई है। यानी प्रतिहिंसा आपके समाज का सबसे बड़ा मूल्य मान लिया गया है। उसके बाद जो गुजरात में हुआ है वो उसी प्रतिहिंसा को पूरे समाज में पफैलाकर सि( करने का एक प्रयत्न है।
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