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शायद ही कोई दिन ऐसा होता हो जब दुनियाँ के किसी न किसी शहर में भारतीय सिनेमा का कोई न कोई कलाकार स्टेज पर गानों के बोल पर नृत्य करने की कोशिश नहीं कर रहा हो। पहले नए साल के अवसर पर मौसम आते थे जब कलाकारों के लाइव शो के टेलीविजन पर प्रसारण की प्रतीक्षा रहती थी। अब किसी न किसी बहाने साल भर उनके लाइव शो हाजिर हैं। कभी किसी अवार्ड शो के बहाने तो कभी पुलिस कल्याण तो कभी किसी रियलिटी शो के ग्रैंड पिफनाले। सब का स्वरूप एक ही होता है, यहाँ तक कि 'राजीव गाँध्ी युवा सम्मान' जैसे सम्मानजनक अवसर और किसी 'सुर-संग्राम' के ग्रैंड पिफनाले में पफर्क करना मुश्किल हो जाता है। कोई चूकना नहीं चाहता शाहरुख खान जैसे |
बादशाह से लेकर अमिताभ जैसे शहंशाह तक, और बाकी के सलमान, प्रियंका, ऐश्वर्या, अभिषेक वगैरह वगैरह की तो बात ही अलग। रिकार्ड पर बज रहे गानों पर पसीने से लथपथ बेताल में कूदते नाच में उनके कलाकार को कौन-सी आत्मिक संतुष्टि मिलती है या पिफर हमारा मनोरंजन किस हद तक हो पाता है ये तो राम ही जाने, लेकिन इतना निश्चित है ये बेसिर-पैर के कार्यक्रम कलाकारों की तिजोरियों में इजापफा अवश्य करते हैं, वह भी भारी-भरकम। आश्चर्य नहीं कि स्टेज शो के साथ अक्सर किसी न किसी मापिफया सरगना का नाम सुर्खियों में आता रहता है। वास्तव में बदलते समय के साथ पैसों की अकूत भूख ने एक पिफल्म में अभिनय कला के प्रदर्शन के नाम पर करोड़ों समेटते कलाकारों को अपने लिए एक नई भूमिका चुनने के लिए लालायित कर दिया है, इन्टरटेनर की।
हिन्दी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय माने जाने वाले अभिनेता शाहरुख खान गर्व के साथ स्वीकार करते हैं, मैं इन्टरटेनर पहले हूँ कलाकार बाद में। वे कहते हैं हमारा उद्देश्य दर्शकों और अपने चाहने वालों का मनोरंजन करना है, चाहे वह सिनेमा के पर्दे पर हो या दर्शकों के सामने स्टेज पर। हालांकि अजय देवगन और आमिर खान जैसे कलाकार स्पष्ट मानते हैं हम इन्टरटेनर नहीं कलाकार हैं। दर्शकों के बीच हमारी पहचान हमारी अभिनय कला से है। और हमारी कोशिश होनी चाहिए कि इस कला के प्रति दर्शकों के मन में सम्मान कायम रहे। शायद इसलिए आमिर खान अवार्ड मिलते रहने के बावजूद न तो कभी किसी निजी अवार्ड समारोह में हिस्सा लेते हैं, न ही कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। अभिनय निःसंदेह हमारी समृ( 'कला' का हिस्सा रहा है जिसका उद्देश्य किसी न किसी तरह हमारी सामाजिक एवं सांस्कृतिक समझ को समृ( करने का रहा है। मनोरंजक तरीके से मनोरंजन भारतीय संस्कृति में कभी किसी कला का अंतिम साध्य नहीं रहा, हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दौर में कापफी हद तक इस जवाबदेही का निर्वाह दिखता भी था। के एल सहगल, मोती लाल से लेकर गुरुदत्त, राज कपूर, अशोक कुमार, दिलीप कुमार, संजीव कुमार तक अभिनय कला के प्रति एक समर्पण, सम्मान का भाव दिखता था, जो आज भी नसीरूद्दीन शाह या इरपफान खान में देखी जा सकती है। अभिनय के लिए पैसे वे भी लेते थे, लेकिन वहाँ पैसे की अकूत भूख नहीं दिखती थी। अशोक कुमार से संबंधित एक संस्मरण सुनाते हुए बी आर चोपड़ा ने कभी कहा था, 'कानून' की कहानी सुनने के बाद दादामुनि ने कहा बिना गाने के पिफल्म बनाकर तुम रिस्क उठा रहे हो तो मैं भी तुमहारे साथ हूँ, मैं इस पिफल्म में काम करने के एक भी पैसे नहीं मांगूगा जो मन में आए दे देना। यह कोई संयोग नहीं कि हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दौर के अध्किांश लोकप्रिय रहे कलाकारों ने अपने अंतिम दिन मुपफलिसी में गुजारे।
लेकिन आज की तारीख में कोई भी नया कलाकार पर्दे पर कदम रखते ही सबसे पहले ढेर सारी पिफल्में साइन कर अपना भविष्य 'सुरक्षित' कर लेना चाहता है। उसके बाद जरा सी भी लोकप्रियता मैनेज हो गई तो भरसक कोशिश होती है जितनी जल्दी हो सके इसकी पाई-पाई वसूल कर ली जाए। साल भर पुराने रणबीर कपूर और इमरान खान की जोड़ी जब एक अवार्ड शो में भद्दे मजाक और अश्लील आक्षेप करते हुए दिखती है तो वाकई तय करना मुश्किल हो जाता है इन्हें अभिनेता माना जाय या इन्टरटेनर।
एक मार्केट वैल्यू तय होते ही अच्छी पिफल्में और अच्छे अभिनय के लिए चिन्तित होने के बजाय ये विज्ञापन, स्टेज शो, रियलिटी शो से लेकर शादी-विवाह, बारात, जन्मदिन पार्टी तक में नाचने के लिए रेट तय करने में लग जाते हैं। दुकानों के उद्द्घाटन के लिए बुलाना चाहें या रैम्प शो में शामिल करना चाहें, ब्यूटी पार्लर में बिठाना चाहें या अपने बुटीक में उन्हें बुलाना चाहें, वे हर कहीं किसी भी रूप में उपस्थित होने को तैयार हैं, बस उनकी कीमत उन्हें मिल जानी चाहिए। एक कार्यक्रम के लिए शाहरुख खान यदि करोड़ में उपलब्ध् हैं तो उर्मिला या रवीना टंडन कुछेक लाख में उपलब्ध् हो सकती हैं। कार्यक्रम डांडिया नाईट में डांडिया चटकाने का हो या बारातियों से गले मिलने का, इन्हें कोई आपत्ति नहीं। 'दर्शक' तो वहाँ भी हैं, हमारे कलाकार मानते हैं कि उन्हें मनोरंजन करना है कहीं भी, कभी भी, बशर्ते यथोचित कीमत मिलती रहे।
अपनी लोकप्रियता का यह दोहन क्या अपने प्रशंसकों के प्रति अन्याय नहीं? दर्शकों के बीच आपकी पहचान आपके अभिनय से है, ऐसे अभिनय से जिसमें आपके अलावा लेखक, निर्देशक, नृत्य निर्देशक, पफाइट मास्टर, स्टन्ट मैन, मेकअप मैन, ड्रेस डिजाइनर से लेकर लाइटमैन तक की अपनी सशक्त भूमिका है। इसमें से एक ने भी लापरवाही दिखायी तो सारी लोकप्रियता हवा हो सकती है। सबके साथ मिलकर जब दर्शकों के सामने उसके अमूर्त पात्रा को आप मूर्त करने की कोशिश करते हैं तो उस समय दर्शक कलाकार नहीं, पात्रा को स्मरण करता है। दर्शक जब 'लगान' में भुवन को देखता है, महसूस करता है तो उसके पूरे कालखण्ड से जुड़ना चाहता है, उस समय के पूरे ग्रामीण परिवेश को जानना चाहता है, उसे आमिर खान नहीं दिखता। लेकिन जब आमिर खान भुवन को आमिर खान के रूप में स्टैबलिश कर ब्रिटानिया का शो मैच दिखाने लग गये थे, उसी समय दर्शकों के मन से भुवन का प्रभाव ध्ुलने लगा था। यह सीध्े-सीध्े अपने ही किये को नकारने की कोशिश है। 'गजनी' में आमिर खान एक नये लुक में सामने आते हैं लेकिन उस नये लुक का प्रभाव उसी समय तरल होने लगता है जब उसे वह पात्रा से अलग कर भी इस्तेमाल करने लगते हैं। पता नहीं क्यों आज के तमाम बड़े कलाकारों में भी यह महत्वाकांक्षा क्यों नहीं बनती कि पचास वर्षों बाद भी लोग मदर इंडिया के बिरजू के रूप में उन्हें याद करें, 'जिस देश में गंगा बहती है' के राजू के रूप में याद करें या 'मुगलेआ८ाम' के सलीम के रूप में। पुरानी पिफल्मों के सैकड़ों पात्रा नाम से ही नहीं अपने पूरे वजूद में हमें आज भी याद हैं। लेकिन नई बेहतर समझी जाने वाली पिफल्म के पात्रा बस अगली पिफल्म तक याद रह जाएँ तो गनीमत है। और वास्तव में यह कलाकारों की कोशिश का ही नतीजा है। उनकी कोशिश अब पात्राों को नहीं अपने आप को स्टैबलिश करने की होती है। आश्चर्य नहीं कि गरीब किसान बने या मिलियेनियर अब नायकों का मैनरिज्म एक समान दिखता है।
आश्चर्य यह है कि इस हमाम में सभी कलाकार नंगे नजर आते हैं। अमिताभ बच्चन से रणबीर कपूर तक और हेमा मालिनी से करीना कपूर तक, सभी इन्टरटेनर बनने की मारा मारी में लगे हैं। कोई एड्स पीड़ितों के नाम पर दर्शकों की गाढ़ी कमाई ऐंठने में लगा है तो कोई लॉस एंजेल्स से एन आर आई की कमाई समेट कर लाने में लगा है। कोई पटना में तखते के स्टेज पर नाच रहा है तो कोई बंगलौर के ऑडिटोरियम में। लक्ष्य सबका एक ही है, पैसा। वह भी निःसंकोच। साल भर पहले के किसी अवार्ड शो में शाहरुख खान ने एंकरिग करते हुए स्पष्ट स्वीकार किया कि कुछेक करोड़ की जरूरत पड़ेगी तो कुछेक शादियां अटेंड कर लूँगा। वास्तव में हमारे मन मिजाज पर काबिज होते बाजार का प्रभाव ही है के अपने आप को किसी को बाजार में खड़ा करते देख भी हमें आश्चर्य नहीं होता। दर्शकों के साथ सबसे बड़ी नाइंसापफी विज्ञापन पिफल्मों को देखकर महसूस की जा सकती है। दर्शकों ने आपको पसंद किया, आपके अभिनय को पसंद किया, आपके द्वारा निभाये पात्रा को पसंद किया। उसका खामियाजा आप दर्शकों को यह दे रहे हैं कि कोका कोला नहीं, पेप्सी पियो, या पिफर पेप्सी नहीं थम्सअप पियो। पार्कर से नहीं लिंक से लिखो। लक्स से ही नहाओ, अलां कार पर चढ़ो और पफलां की चड्डी बनियान पहनो। बैगपाइपर पियो काहे कि हम भी पीते हैं। क्या हमारे कलाकारों को पता है कि जो कुछ वे प्रस्तावित कर रहे हैं वह श्रेष्ठ है उनके दर्शकों के लिए या पिफर पैसे लेकर वे झूठ की जरूरतें ठूँसने की कोशिश कर रहे हैं अपने दर्शकों को, जिसने आपको ईमानदारी से पसंद ही नहीं किया आपको करोड़ों रुपये भी दिये पिफर भी थोड़े से और के लालच में आप दर्शकों से झूठ बोलने, उसे ठगने से बाज नहीं आते।
गौरतलब है यदि किसी प्रोडक्ट का विज्ञापन प्रोपफेशनल मॉडल करते हैं तो उसमें प्रोडक्ट महत्वपूर्ण रहता है। दर्शक के जेहन पर मॉडल के आग्रह या रिकोमेन्डेसन का वह प्रभाव नहीं पड़ता जो अमिताभ बच्चन या शाहरुख खान के आग्रह का पड़ता है। अमिताभ बच्चन जिस तरह परदे पर गरिमामय और अभिभावकीय भूमिका में दिखते हैं तुरंत बाद पेप्सी या कैडबरी के लिए उनका ललचाता चेहरा देख यह विश्वास करना कठिन होता है कि पेप्सी में वाकई कुछ नहीं। एक सामाजिक भूमिका को लेकर अमिताभ या सचिन पोलियो ड्रॉप का विज्ञापन करते हैं तो उसकी अनिवार्यता समझ में आती है, लेकिन यही अनिवार्यता वहाँ तक संचरित हो जाती है जब वे पेप्सी के बारे में बात करते हैं। यह भला कौन स्वीकार करना चाहेगा कि इतना महान व्यक्तित्व 'थोड़े से पैसों' के लिए पेप्सी के प्रति अपनी चाहत दिखाने को मजबूर हो रहा है।
खैर, जब पूरे कुंए में ही भंग पड़ी हो तो कलाकारों से ही क्यों अपेक्षा रखें कि वे हमारे नैतिक मानदण्डों का पालन करें। लेकिन सवाल यह भी तो है कि क्या कलाकारों से भी अब हम नैतिक ऊँचाइयों की अपेक्षा छोड़ दें, स्वीकार लें उनका अभिनेता से इंटरटेनर में रूपांतरण?
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