| ओबामा को साहित्य का नोबल पुरस्कार : रवीन्द्र त्रिापाठी |
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मैं नोबल पुरस्कार समिति के ज्यूरी सदस्यों से एक निवेदन करना चाहता हूँ। मेरी उनसे करब( प्रार्थना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को अगले साल साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार दें। मैं जानता हूँ कि अगले साल का नोबल पुरस्कार द्घोषित होने में अभी कापफी वक्त है। पिफर भी मैं चाहता हूँ कि इसके लिए अभियान जल्द से जल्द शुरू कर दिया जाना चाहिए। शुभ काम करने में देरी नहीं होनी चाहिए। और एक अमेरिकी राष्ट्रपति को दो-दो नोबल पुरस्कार मिले इससे अच्छा शुभ काम क्या हो सकता है? इसलिए बेहतर तो यही होगा कि अभी से ये द्घोषणा हो जाए कि अगले साल ओबामा को ही साहित्य का नोबल पुरस्कार मिलेगा। इससे नोबल पुरस्कार में एक नई परंपरा की शुरुआत भी हो सकती है। |
मैं जानता हूँ कि मेरे इस निवेदन से कई लोगों को मिर्ची लगेगी। लोग जल-भुन जाएँगे और शायद मेरा मजाक उड़ाएँगे। वे कहेंगे कि ओबामा ने साहित्य लेखन की दिशा में कदम भी नहीं रखा है पिफर उनको साहित्य का कोई पुरस्कार देने के बारे मे सोचना भी हास्यास्पद है, नोबल पुरस्कार देने की तो बात ही अलग है।
लेकिन जिसको मिर्ची लगनी है लगे। मैं क्या करूँ। कुछ लोग तो पैदा ही होते हैं मिर्ची लगने के लिए। कोई भी अच्छा काम करो, ऐसे लोगों को मिर्ची लगती है। जैसे जब ओबामा को शांति के लिए नोबल पुरस्कार देने की द्घोषणा हुई तो कइयों को मिर्ची लगी। इसलिए कोई कुछ कहे मैं अपनी राय पर कायम हूँ और आगे भी कायम रहूँगा। ओबामा को साहित्य का नोबल पुरस्कार दिलाने के लिए जो भी कर सकता हूँ, करूँगा। मैं भगवान से प्रार्थना करूँगा, हस्ताक्षर अभियान चलाऊँगा और जरूरत पड़ने पर तंत्रा-मंत्रा का भी सहारा लूँगा। मैं भारत के प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह से भी अनुरोध करूँगा कि इस दिशा में जरूरी कदम उठाएँ। जरूरी कदम उठाने से मेरा मतलब है कि वे भी नोबल पुरस्कार समिति को एक पत्रा लिखकर ये कहें कि ओबामा को ये पुरस्कार दें। हो सके तो विदेश मंत्राी कृष्णा को इसी काम में लगा लें। मैं मनमोहन सिंह को इसके बारे में पत्रा लिखकर ऐसा करने के पफायदे के बारे में भी बताऊँगा। जैसे इसका पहला पफायदा तो ये होगा कि इसी बहाने कृष्णा को एक काम मिल जाएगा। अब तक देश में किसी को ये समझ में नहीं आया है कि हमारे विदेश मंत्राी कृष्णा काम क्या करते हैं। लेकिन कृष्णा अगर इस काम में लग जाएँगे तो विरोधी दलों के इस आरोप का जवाब दे सकेंगे कि वे करते क्या हैं। जब संसद में विरोधी दल वाले हल्ला मचाएँ कि कृष्णा बतौर विदेश मंत्राी सक्रिय नहीं है तो वे जवाब में कह सकते हैं कि मैं ओबामा को नोबल पुरस्कार दिलाने में लगा हूँ। इस पर थोड़ा हंगामा होगा जरूर। खासकर सीपीएम वाले आरोप लगाएँगे कि हमारी विदेश नीति अमेरिका की पिछलग्गू हो गई है। लेकिन इसका खास असर नहीं होगा। अगर ज्यादा मामला बढ़ा तो सोमनाथ चटर्जी की सहायता ली जा सकती है।
मनमोहन सिंह के इस कदम का दूसरा पफायदा ये होगा कि इससे भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते बहुत प्रगाढ़ होंगे। मैं मनमोहन सिंह जी को याद दिलाऊँगा कि बुश के राष्ट्रपति रहने के दौरान भारत-अमेरिका की दोस्ती मस्त-मस्त थी। लेकिन ओबामा की जीत के बाद ये दोस्ती पस्त-पस्त हो गई है। अगर ओबामा युग में भारत और अमेरिका के रिश्ते को बेहतर करना है तो नोबल पुरस्कार की राजनीति हमारे लिए कूटनीतिक जीत में बदल सकती है। आखिर हर पुरस्कार में राजनीति होती है। पिफर नोबल पुरस्कार में राजनीति का एक लंबा इतिहास रहा है। यदि हम भी इसे लेकर थोड़ी बहुत राजनीति कर लें तो क्या गलत होगा।
तीसरा पफायदा ये होगा कि पाकिस्तानी हुक्मरानों को भी, पफौरीतौर पर ही सही, गहरा कूटनीतिक ध्क्का लगेगा। अभी तक पाकिस्तान अमेरिका से कुछ मांगता रहा है। कभी पैसा, तो कभी हथियार, तो कभी राजनीतिक मदद। लेकिन जब भारत के प्रधानमंत्राी की तरपफ से नोबल पुरस्कार समिति के सामने ये अनुरोध जाएगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति को साहित्य का नोबल पुरस्कार दिया जाए तो अमेरिकियों को पहली बार लगेगा कि भारत भी उनको कुछ दिलाने की कोशिश कर रहा है। ये पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक विपफलता होगी। ये अलग से कहने की जरूरत नहीं कि पाकिस्तान की कूटनीतिक विपफलता अपने आप में भारत की कूटनीतिक जीत है। ऐसा करने से मनमोहन सिंह जी भी कम से कम 'भारत रत्न' के हकदार हो जाएँगे।
मनमोहन सिंह को निजी तौर पर इसके और भी पफायदे होंगे। दुनिया में उनकी छवि बन जाएगी कि वे साहित्य और संस्कृति में रुचि रखने वाले राजनेता है। अभी तक उनकी छवि अर्थशास्त्राी की है। इसलिए ओबामा को पुस्कार दिलाने का अभियान छेड़ना मनमोहन सिंह के अपने छवि निर्माण की दिशा में एक छलांग होगी। यानी एक तीर चार निशाने।
ओबामा को नोबल पुरस्कार दिलाने की राह में कितनी भी बाधाएँ खड़ी की जाएँ, मैं हार नहीं मानूँगा। इस अभियान को गति देने के लिए कोपनहेगन भी जाना पड़े तो वहाँ चला जाऊँगा। जानता हूँ, जानता हूँ कि कोपनहेगन का सम्मेलन जलवायु परिवर्तन के मसले पर है। उस सम्मेलन का साहित्य से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन ये सबको मालूम है कि कोपनहेगन में इस बार बड़ी संख्या में कलाकार भी जा रहे हैं। जाहिर है कि कोपनहेगन में साहित्य की बात भी हो सकती है। मैं कोपनहेगन जाकर यह कहूँगा कि अगर बराक हुसैन ओबामा को साहित्य का नोबल पुरस्कार दिया जाता है तो विश्व स्तर पर जलवायु में सकारात्मक परिवर्तन आएगा। लोग पूछ सकते हैं कि ऐसा कैसे होगा, तो इसका भी जवाब है मेरे पास। मेरा तर्क ये है कि जैसे ही ये पुरस्कार दिया जाएगा ओबामा में प्रकृति के प्रति प्रेम जाग उठेगा। भाई जो साहित्यकार बनेगा वो प्रकृति का पुजारी तो होगा न। कम से कम मैंने यही सुना है कि साहित्यकार प्रकृति का पुजारी होता है। मेरा मतलब ये है कि नोबल पुरस्कार मिलने की द्घोषणा के बाद ओबामा प्रकृति के पुजारी बन जाएँगे और उनकी देखा-देखी अमेरिका के कॉरपोरेट सेक्टर में प्रकृति प्रेम जागेगा। जैसे ही अमेरिकी कंपनियों में प्रकृति प्रेम जागेगा जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या के प्रति अमेरिका गंभीर हो जाएगा। जैसे ही अमेरिका इस समस्या को लेकर गंभीर होगा यूरोप भी गंभीर हो जाएगा और उसके बाद पूरी दुनिया गंभीर हो जाएगी। इतिहास हमें यही बताता है।
मैं ये भी जानता हूँ कि ओबामा को साहित्य का नोबल पुरस्कार दिए जाने को लेकर कई लोगों के मन में संदेह और सवाल होंगे। मेरे पास इन सबके जवाब हैं। मैं सिलसिलेवार ढंग से आपके सामने ये सवाल-जवाब पेश करता हूँ
१द्ध कुछ लोग ये कहेंगे कि ओबामा ने अभी तक किसी तरह की साहित्यिक प्रतिभा नहीं दिखाई है। इसका जवाब ये है कि ओबामा को शांति का पुरस्कार इस बिना पर दिया गया कि वे दुनिया में शांति की संभावना पैदा कर सकते हैं। इसी तर्क से ये भी कहा जा सकता है कि ओबामा को साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार दे दिया जाए तो उनके अंदर एक उत्कृष्ट साहित्यकार बनने की संभावना पैदा हो सकती है। जिस आदमी में अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की योग्यता है, विश्व स्तर पर शांति स्थापित करने की क्षमता युक्त संभावना है, क्या उसमें साहित्यकार बनने की योग्यता नहीं होगी? और ओबामा ने तो किताबें भी लिखी हैं। भले ही उन्होंने साहित्यिक किताबें नहीं लिखी हैं लेकिन लिखी तो किताब ही है। इससे ये तो साबित होता है कि ओबामा लेखक हैं। यानी साहित्यकार बनने की पूरी संभावना उनमें है। बस मौका मिलना चाहिए और नोबल पुरस्कार से अच्छा मौका क्या हो सकता है किसी के लिए।
२द्ध कुछ का ये कहना होगा कि इस तरह का अभियान चलाने से तो नोबल पुरस्कार की परंपरा में राजनीति का प्रवेश होगा। लेकिन कोई मुझे बताए कि इस तरह का परंपरावाद साहित्य को कहीं ले जाएगा? साहित्य तो हमेशा परंपरा का विरोधी होता है। पिफर साहित्य के लिए मिलने वाले पुरस्कार को लेकर परंपरा के पालन का क्या औचित्य है? और परंपराएँ हमेशा निभाने से ज्यादा तोड़ने के लिए होती हैं। वैसे कोई मुझे बताएगा कि नोबल पुरस्कार की परंपरा क्या है और क्या ऐसा पहली बार होगा कि ओबामा को साहित्य का नोबल पुरस्कार देने से परंपरा टूट जाएगी?
३द्ध कुछ ये भी कहेंगे कि ओबामा को अगर साहित्य का नोबल पुरस्कार दिया जाता है तो उनको दो-दो नोबल पुरस्कार मिल जाएँगे। सवाल उठेगा कि किसी को एक भी नोबल पुरस्कार नहीं तो किसी को दो-दो। लेकिन दिल पर हाथ रखकर बताइए कि क्या सच में कोई बहुत बड़ी बेइंसापफी है? इस तरह की छोटी छोटी बातों का बतंगड़ बनाने का कोई औचित्य है? और दूसरी बात ये है कि अगर कोई प्रतिभाशाली है तो क्या इसीलिए उसकी प्रतिभा दबाई जानी चाहिए कि उसे दो नोबल पुरस्कार मिल रहे हैं। क्या ये प्रतिभा के साथ अन्याय नहीं होगा। दरअसल ओबामा में कई नोबल पुरस्कार लेने की योग्यता है। ऐसे योग्य आदमी की राह में रोड़े अटकाना क्या नैतिक रूप से उचित है? कदापि नहीं। प्रतिभा को दबाए जाने का विरोध होना चाहिए।
बराक हुसैन ओबामा को साहित्य का नोबल पुरस्कार दिए जाने के बारे में ये मेरे कुछ तर्क हैं। मुझे लगता है कि आप सब लोग इन तर्कों से सहमत होंगे। अगर हाँ तो मेरा सहयोग कीजिए। पुरस्कार लेने या दिलाने के लिए तरह-तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। कई तरह के जोड़-तोड़ करने पड़ते हैं। ये सब हमको करना है ताकि ओबामा की प्रतिभा के साथ न्याय हो, एक अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ न्याय हो।
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