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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
प्रभाष जोशी पर विशेष
प्रभाष जोशी पर विशेष/वैचारिक
 

पत्राकारिता के कबीर गुरदयाल सिंह

लोकतांत्रिाक या कहें जनपक्षीय पत्राकारिता के स्तंभ प्रभाष जोशी के निधन ने मुझे व्यक्तिगत रुप से बहुत ज्यादा विचलित किया है। मेरी निगाह में उनसे बड़े कद का पत्राकार शायद उनके दौर से अब तक और कोई दूसरा नहीं है। बेशक जीवन और मृत्यु शाश्वत सत्य हैं, लेकिन चिंता इस बात की है कि अब आमजन, लोकतंत्रा, धर्मनिपेक्षता के हक में और भ्रष्टाचार व निरंकुश सत्ता के खिलापफ उतनी बेबाकी से कौन आवाज बुलंद करेगा?

जोशीजी के निधन से पत्राकारिता जगत में आए चुनौतीपूर्ण संकट के इस वक्त में श्री गुरु नानक देव जी की वाणी 'सच की बाणी नानक आखै, सच सुनाए सी सच की बेला' याद आती है। जिसका मतलब है कि सच मैं तब बोल रहा हूँ, जब सच कहने का समय है। बाबर के अत्याचार जब बहुत बढ़ गए थे और रहनुमा-पैगंबर तक खामोश थे। ऐसे में तब गुरु नानक देव जी ने बाबर के खिलापफ आवाज बुलंद की थी। प्रभाष जी ने भी सच को तब अपनी कलम के जरिए उजागर किया, जब उसकी जरूरत थी। वह भी बिना किसी खौपफ और पूर्वाग्रह के निरंतर अपने वैचारिक आंदोलन को गति दी। कोई भी सरकार या धन-बल की सत्ता उनको अपने रास्ते से डिगा या डरा नहीं सकी। ऐसा उनको लिखे एक-एक शब्द से बखूबी जाहिर है।

मैंने भारतीय पत्राकारिता में ऐसा कोई दूसरा संपादक-विचारक नहीं देखा, जो इतनी शिद्दत साथ आम लोगों से जुड़ा रहा हो। प्रभाषजी के चले जाने से सबसे बड़ी पिफक्र यही है कि अब आम लोगों की बात कौन करेगा। बेशक मैं कभी उनसे नहीं मिल पाया। मिलने की हसरत भी बहुत थी। दिल्ली जाता था तो कई बार सोचता था कि उनसे मिलूँगा। मगर संकोच होता था कि वह हर वक्त बस काम करने की अपनी आदत के मुताबिक व्यस्त होंगे और पिफर वह मुझे जानते भी तो नहीं हैं। अब तो उनसे न मिल पाने की कमी बस मलाल बनकर रह गई है। हालांकि उनके रहते भी उनसे न मिल पाने के बावजूद उनका नियमित कॉलम 'कागद कारे' पढ़कर ही संतोष हो जाता था कि जैसे अभी उनसे मिलकर हटा हूँ। वैसे भी वैचारिक-सांझ महत्वपूर्ण होती है, यह एक ना टूटने वाला रिश्ता होता है। मलाल तो है ही, काश एक बार उस शख्सीयत के दर्शन भी कर लेता तो और आत्मसंतुष्टि मिलती। काश, पंजाब और पंजाबी में भी कोई प्रभाष होता। लेखन में किसी भी भाषा-क्षेत्रा और धर्म या जाति का बंधन नहीं होता है। भले ही अपने पत्राकारिता और वैचारिक आंदोलन के दौर में प्रभाषजी ने पंजाब में बहुत लंबा वक्त नहीं बिताया। इसके बावजूद पंजाब के करीब एक पत्राकार के रूप में वह जितना रहे, उन्होंने इस सूबे को जितनी नजदीकी के साथ देखा-समझा, वह उनकी गहरी समझ का सबूत है। यही उनका आकर्षण था कि वह बाद में भले ही पंजाब से दूर बैठकर लिख रहे हों या वैचारिक अलख जगा रहे हों, यहाँ तक उनकी मौजूदगी का अहसास बखूबी होता था। मुद्दतों याद रखने के काबिल उनके लेखन का ही दम था कि भले ही देश की राजधानी के नजदीक उन्होंने आखिरी सांसें लीं, लेकिन उनके जाने का दर्द मुल्क की सरहदों तक शिद्दत से महसूस किया गया।

अपने विचारों और मुद्दों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने का सबसे बड़ा माध्यम पत्राकारिता ही है। लिहाजा समाचार-पत्राों और पत्रिाकाओं में अक्सर मैं भी लिखता रहता हूँ, लेकिन जोशीजी विरले ही थे जिनकी लिखी बातें २०-३० साल बाद भी मुझे अब तक याद हैं। जबकि अमूमन कुछ एक लेख-आलेख दो-चार दिनों, महीनों और बहुत हुआ तो थोड़े से साल भर में भुला दिए जाते हैं। मैं प्रभाषजी की भाषा-शैली का कायल रहा हूँ। उन्होंने करीब २० साल पहले लिखा था कि मैं एक दोस्त के साथ शौकिया तौर पर साइकिल से मालवा ;मध्यप्रदेशद्ध में द्घूम रहा था। इसी लेख में उन्होंने गाय के सूखे गोबर के लिए 'ऐरने' शब्द का इस्तेमाल किया था। संयोग से पंजाब के मालवा क्षेत्रा में भी जलाने के काम वाले उसी सूखे गोबर को 'ऐरने' ही कहते हैं। मुझे बड़ा अच्छा लगा कि इतने सरल तरीके से भी भाषा की सांझ होती है। इसी अवचेतन-सांझ ने दूरदराज बैठकर पढ़ने वालों को भी उनसे जोड़ा।

उनकी इसी सोच वाली शैली लगातार गहराती गई। इसी का नतीजा था कि मुझे भी जैतो जैसे छोटे से कस्बे में बैठकर उनका लिखा पढ़ने की ललक रहती थी। मेरे कस्बे में जनसत्ता अखबार नहीं आता था। कहीं और से मालूम पड़ने पर खासतौर से प्रभाषजी को पढ़ने के लिए अपने कस्बे में ही जनसत्ता मंगवाने लगा। विशेषकर हर रविवार को जनसत्ता का इंतजार रहता था। ताकि प्रभाषजी का कागद कारे पढ़ सकूँ। उनके लेखन का ही प्रभाव था कि मैंने अपने लेखों में बहुत बार कागद कारे को 'कोट' किया। उनकी अद्भुत भाषा-शैली को लेकर मेरी राय है कि उनकी विचार-शक्ति ही उनके लेखन का प्रधान गुण थी। कागद कारे शीर्षक हकीकत में एक व्यंग्य थ्ाा। असलियत में जोशीजी कागज काले नहीं बल्कि रोशन करते थे, जिनकी रोशनी सदा रहेगी।

अगर कागद कारे का विश्लेषण करूँ तो वह महज आलेख नहीं, बल्कि एक 'एस्से' की तरह होता था। उन्होंने और जनसत्ता ने ८४ के द्घटनाक्रम पर जो 'स्टैंड' लिया था, वह याद रखने के काबिल है। जबकि १९९२ के बाद पढ़ने पर सापफ अहसास हुआ कि जोशीजी अल्पसंख्यकों के सच्चे, धर्मनिरपेक्ष व तार्किक प्रवक्ता हैं। उनके मन में आम लोगों के लिए इस हद तक दर्द था कि वह सिपर्फ लिखकर ही संतोष नहीं कर लेते थे, बल्कि जनआंदोलनों का हिस्सा भी बन जाते थे। उनके पास सबसे बड़ी पूंजी के रूप में अडिग विचारों की शक्ति थी। जो युगों तक एक वैचारिक-आंदोलन के रूप में जिंदा रहेगी। जिसे कोई नहीं छीन पाएगा, हालांकि छीनने की कोशिशें बहुत लोगों ने की भी थीं। उन्होंने जब पंजाब के काले दौर और उसके बाद के हालात पर बेबाकी से लेखन-चिंतन किया, तब भी बहुत सी ताकतें मुखर हुई थीं। पिफर जब १९९२ के हालात पर उनकी लेखनी चली तो तब भी तमाम शक्तियाँ इस वैचारिक धारा का रुख मोड़ने के मकसद से सक्रिय हुई थीं। यह प्रभाषजी की विचारधारा और उसे शब्दों में पिरोने वाली लेखनी का ही दम था कि कोई भी ताकत उन्हें रोक न सकी और न ही कोई उन्हें अपने विचारों से डिगा सका।

नई परिभाषाएँ गढ़ने के मामले में प्रभाषजी का कोई सानी नहीं था। अपने शब्दबाणों से ही वह व्यवस्था की बखिया उधेड़ कर रख देते थे। यहाँ उनके एक सारगर्भित लेख का हवाला देना चाहूँगा, जिसमें उन्होंने लिखा था कि सरकारी नीतियाँ तालाब हैं और आसपास दूर तक पफैली बंजर जमीन पड़ी है। सरकारें मानती हैं कि पहले तालाब भरा जाए और जब वह भर जाएगा तो छलकता पानी बंजर जमीन पर खुद पफैल जाएगा। तालाब से जोशीजी का भाव पूंजीपतियों से था। जबकि आम लोगों को उन्होंने बंजर जमीन का नाम दिया था। एक अन्य आलेख में दिया गया प्रसंग भी मुझे अभी तक याद है, जिसमें उन्होंने जिक्र किया था कि एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका किस तरह खुद पिफएट कार चलाकर उनके द्घर आए थे। जबकि उनके द्घर में गोयनका जी को बिठाने के लिए एक अदद सही सलामत कुर्सी तक भी नहीं थी। यही जोशीजी जब मीडिया जगत की नामचीन शख्सीयत बनकर बहुत व्यस्त थे तो भी उनकी संवेदनशीलता नहीं मरी। बाईपास सर्जरी के बाद उनके एक छोटे से सहयोगी कर्मचारी का निधन हो गया। जोशीजी बीमारी की हालत में गमजदा परिवार को दिलासा देने पहुँचे तो उस कर्मचारी की विधवा भावुक होकर उनसे गले लगकर रोने लगी। डाक्टरों की हिदायत के बावजूद जोशीजी अभिभावकों की तरह उस महिला को सीने से लगाकर दिलासा देते रहे। हालांकि डाक्टरों की हिदायत के मुताबिक बाईपास सर्जरी की स्थिति में ऐसा करना उनके दिल की तकलीपफ को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी जान के लिए खतरा भी पैदा कर सकता था।

जज्बातों का मर्म समझने वाली प्रभाष जैसी हस्ती के बारे में जितना भी कहा-लिखा जाए, कम ही है। मैंने एक उपन्यास की भूमिका में लिखा भी था कि आवाम के बीच जाने और आने में बहुत बड़ा बुनियादी पफर्क होता है। महत्वपूर्ण यह है कि आप आवाम के बीच जा रहे हैं या आ रहे हैं। जोशीजी आवाम के बीच जाते थे, वहाँ से आते नहीं थे। इसीलिए आज वह भले ही शारीरिक रूप से लोगों के बीच नहीं रहे, लेकिन इससे कोई पफर्क नहीं पड़ा है। असलियत में एक सोच, अहसास और आंदोलन के रूप में वह आज भी आम लोगों के बीच हैं और हमेशा रहेंगे। अंतिम दिनों में प्रभाषजी मरती विचारधारा और नैतिकता के खिलापफ एक आंदोलन चला रहे थे। पैसे लेकर लिखने वालों के खिलापफ उनका यह वैचारिक आंदोलन भी उनके चले जाने से अधर में रह गया, जिसे निरंतर गति देने के लिए पत्राकारिता जगत के बाकी जिम्मेदार लोगों की लामबंदी भी निहायती जरूरी है।

जोशीजी शारीरिक रुप से दुनिया से चले गए, लिहाजा संस्कारों के अनुरूप उनको श्र(ांजलि देने का क्रम अभी जारी है। अहम पहलू है कि पत्राकारिता जगत जो जोशीजी को किस रूप में श्र(ांजलि दे रहा है या देना चाहता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात कहना चाहूँगा कि पत्राकारिता, सरकार और आवाम के बीच एक पुल का काम करती है। जो पत्राकार पूरी ईमानदारी से यह नहीं कर पाता है, वास्तव में वह जोशीजी की राह पर नहीं चल रहा और उनको सच्ची श्र(ांजलि भी नहीं दे रहा। बेबाकी से कहा जाए तो पेशे के नाम पर भले ही ऐसे लोग इस पत्राकारिता जगत से जुड़े हों, लेकिन वास्तव में वह पत्राकार कहलाने के काबिल नहीं हैं। सोचता था कि काश मैं भी प्रभाष जी जैसा लिखूँ, लेकिन जनपक्षीय लेखन का उतना तुलनात्मक हौसला शायद मेरे जैसे लेखक में भी नहीं था। यही कोशिश होनी चाहिए कि पत्राकारिता को एक वैचारिक आंदोलन के रूप में जिंदा रखने का अभियान निरंतर जारी रहे और इस अभियान की कमान सिलसिलेवार युवा पीढ़ी संभालती रहे। पूरी उम्मीद है ऐसा ही होगा, क्योंकि एक विचारधारा के रूप में आज भी हमारे बीच मौजूद जोशीजी की भी यही आत्मिक इच्छा थी। वाकई अगर ऐसा होता है तो यकीनन पत्राकारिता जगत के उस लौह-पुरुष को यही सबसे बड़ी श्र(ांजलि भी होगी। नम आँखों के साथ मैं उन्हें 'पत्राकारिता का कबीर' कहना चाहूँगा, बस।

 
मैं उन्हें गाँधीवादी नहीं मानता राजेन्द्र यादव
 

समझता हूँ कि हिन्दी पत्राकारिता को बदलने का किसी एक अखबार में काम किया वो 'नई दुनिया' था। इसी ने राहुल बारपुते, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी और रामशरण जोशी जैसे दिग्गज पत्राकारों को जन्म दिया। हिन्दी पत्राकारिता को दिशा देने वालों में राजेन्द्र माथुर का भी बड़ा नाम है जिन्होंने नवभारत के प्रधान संपादक रहते हुए एक ऐसे पत्राकार की नियुक्ति की जो सिपर्फ अखबार की भाषा-वर्तनी को ठीक किया करता था। प्रभाष जोशी ने जनसत्ता से पहले चंडीगढ़ में तीन साल तक इंडियन एक्सप्रेस का संपादन किया। वे चंडीगढ़ से दिल्ली आए। हालांकि वो एक्सप्रेस समूह की साप्ताहिक 'प्रजानीति' का संपादन कर चुके थे जो इमरजेंसी के दौर बंद हुई। जनसत्ता ने पूरी दिल्ली में अपना आगाज आक्रामक प्रचार अभियान से किया। उस वक्त पूरी दिल्ली में होर्डिंग लगे जिस पर नारा लिखा था- 'सबकी खबर ले, सबको खबर दे।' उस समय हिन्दी के दो ही राष्ट्रीय अखबार दिल्ली से प्रकाशित होते थे-नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान। तीसरा जनसत्ता निकला जो तूपफान की तरह आया। प्रभाष जी का यहाँ तक कहना था कि उन्होंने जनसत्ता में पत्राकारों की भर्ती की जो परीक्षा रखी थी वो यूपीएससी सरीखी कठिन थी। निश्चित तौर पर प्रभाष जी ने एक सशक्त टीम बनाई। नतीजतन अपने प्रकाशन के तीन चार महीनों के भीतर ही जनसत्ता का सर्कलेशन साढ़े तीन लाख तक पहुँच गया। तब उन्होंने एक सूचना प्रकाशित की कि जनसत्ता को अब इससे ज्यादा नहीं छाप सकते। लिहाजा इसके पाठक उसे मिल बाँट कर पढ़ें। हिन्दी पत्राकारिता के लिए यह एक बड़ी बात थी। एक नई सनसनी। प्रभाष जी ने जनसत्ता को एक मौलिक तथा गंभीर अखबार बनाया। उसे एक गंभीर साहित्यिक वैचारिक रूप दिया।

उस दौर में हिन्दी अखबार के संपादकीय पृष्ठों पर ज्यादातर अंग्रेजी लेखों के अनुवाद छपते थे। जनसत्ता ने यह नहीं किया। प्रभाष जी ने हिन्दी में मौलिक लेख लिखवाए।
देखते ही देखते जनसत्ता गंभीर और वैचारिक उत्तेजना पैदा करने वाला अखबार बन गया। तब से लेकर आज तक जनसत्ता ने अपना वो चरित्रा बरकरार रखा है। हिन्दी में एक मात्रा जनसत्ता ही है जो साहित्य को आज भी सबसे ज्यादा जगह देता है और बेहद पठनीय भी है।
क्रिकेट के प्रति कोई पत्राकार पागल रहा तो वो प्रभाष जी थे। कहा जाता है कि अगर द्घर में आग लगी हो और क्रिकेट का रोमांचकारी मैच चल रहा हो तो प्रभाष जी पहले मैच देखेंगे, द्घर में लगी आग नहीं बुझाएँगे। उनके कई दूसरे पागलपन भी थे। पत्राकारिता के अलावा उनमें संगीत को लेकर भी गजब का पागलपन था। यह उनको राहुल बरपुते से शिष्यत्व के रूप में मिला था-संगीत, साहित्य और पत्राकारिता सब एक साथ।
राजनीति के अलावा उन्होंने दूसरे विषयों पर भी पूरी आत्मीयता और इन्वाल्वमेंट के साथ लिखा। उनकी भाषा में गजब की चमक और मौलिकता थी। वे बहुत से मुहावरे मालवा से लेकर आए थे। उनकी भाषा सबसे अलग थी। बिना नाम पढ़े उनका गद्य पढ़कर कोई भी यह बता सकता था कि यह प्रभाष जी का लिखा है।
मेरे पास उनके आठ-दस खत हैं। वे उन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में लिखे थे। चेखव पर मेरी किताब पढ़कर प्रशंसा में लिखे खत। जब वो यहाँ दिल्ली में एक्सप्रेस समूह में आए तो सबसे पहले मेरे दफ्रतर आए। कई योजनाएँ बनाई थीं। शाम को हम लोग अक्सर पिफरोजशाह कोटला के खंडहर में मिला करते थे। शाम को वह अपने दफ्रतर से निकलते थे, मैं अपने दफ्रतर से। हम बैठकर द्घण्टों बातें करते थे। निजी, देश-विदेश की राजनीति और पत्राकारिता की बातें। कुछ बैठकों में राजेन्द्र माथुर भी शरीक होते थे। तीनों का सम्मेलन हो जाया करता था उस खंडहर में।
प्रभाष जी को मालवा और वहाँ की संस्कृति से बेहद लगाव था। उनको खुद मालवा का खाना खिलाने का बड़ा शौक था। खासकर दाल बापफले। वे खुद बाटी को अपने अंगोछे से पोंछकर बड़े प्रेमपूर्वक हमें खिलाया करते थे।
मेरी और उनकी बकायदा लड़ाई और मतभेद सती प्रकरण के बाद हुए। रुपकुंवर सती कांड के बाद देश के तमाम अखबारों और मीडिया में इसको लेकर नाराजगी थी और धिक्कार का वातावरण था। लेकिन हम तमाम लोगों के लिए यह स्तब्ध कर देने वाला था कि प्रभाषजी के अखबार जनसत्ता में इसके पक्ष में प्रशस्तियों गायी गई भारतीय संस्कृति की रक्षा की बात कही गई। इसके विरोध में मैंने भयंकर लेख लिखा-सती और प्रभाषजी पर। इससे प्रभाषजी नाराज हो गए। उन्होंने जवाब में जो लिखा वो कापफी निजी था। मसलन मैं मन्नू के साथ कैसा व्यवहार करता हूँ। मुझे हैरत हुई कि प्रभाषजी इस स्तर तक उतर सकते हैं। इसके बाद हमारी बोलचाल बंद हो गई। बाद में उन्होंने गोबर और नरबलि की महिमा पर जनसत्ता में लेख लिखे। उन्होंने तर्क दिए कि जो बलि करता है उसके मन में जिसकी बलि होती है उसके प्रति कोई व्यक्तिगत विद्वेष दुर्भावना नहीं ही होते। वह शु( सात्विक भाव से बलि करता है। उन्होंने हाल ही में एक ब्लॉग में राजाराम मोहन राय को गालियाँ दी हैं कि उन्होंने भारतीय संस्कृति को नहीं समझा इसलिए सती का विरोध किया। जबकि मेरा मानना है कि वहाँ शु( रूप से मामला मानवीयता का था। ब्लॉग वाले साक्षात्कार में प्रभाषजी ने यह भी कहा कि ब्राह्मणों ने ज्ञान-विज्ञान और दूसरी चीजों को जिस तरह सींचा और आगे बढ़ाया, उन्हीं दर्प और द्घमंड में उन्होंने भारतीय संस्कृति के नाम पर गोष्ठियाँ भी कीं।

प्रभाषजी भावुक बेहद थे। वे सभा गोष्ठियों में अक्सर मिलते रहते थे। उनका व्यवहार कापफी शालीन और आत्मीय रहता था। इस बार मेरे ८०वें जन्मदिन पर उन्होंने सबके सामने मेरे पैर छू लिए। मैं सोच भी नहीं सकता था कि ब्राह्मणत्व के यथार्थ में डूबे प्रभाषजी मेरे पैर स्पर्श करेंगे। उनके जिस ब्राह्मण दर्प के बारे में मैंने पढ़ा सुना था, उस हिसाब से उनको मेरे पैर छूने का कोई हक ही नहीं था। लेकिन उन्होंने ऐसा किया।
वस्तुतः प्रभाषजी अन्तर्विरोधों के केन्द्र थे। वे पहले बाकायदा जनसंद्घी हुआ करते थे। बाद में संद्घ से उनका झगड़ा हुआ। इस झगड़े की वजह के बारे में कहा जाता है कि प्रभाषजी का आग्रह था कि उनको राज्यसभा का सदस्य बनवा दिया जाए इसको लेकर झगड़ा हुआ। उसी के बाद से वो भाजपा और संद्घ के सबसे बड़े दुश्मन हो गए। इसी बीच में अयोध्या का विवादित ढांचा गिरा। और उन्होंने अपने भीतर का सारा क्रोध संद्घ, भाजपा पर हमला कर निकाल दिया। उन्होंने अटल, आडवाणी, गोविन्दाचार्य किसी को नहीं छोड़ा। तब से वो कहीं भी भाजपा वालों को बख्शते नहीं थे। वे व्यक्तिगत रूप से आज शेखावत और चन्द्रशेखर के मित्रा थे। लेकिन वो तटस्थ होकर इनकी अच्छाइयाँ बुराइयाँ बताते थे।
अगर निर्भीक किसी पत्राकार को कहा जाए तो वे प्रभाष जोशी ही थे। अपने तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद वे मानवीय थे। ज्ञान, अध्ययन और बोलने की कला अद्भुत थी। और वक्ता भी बहुत अच्छे थे। वे किसी भी विषय पर देशज अंदाज में पूरी प्रमाणिकता के साथ बोला-लिखा करते थे। इतना बड़ा पत्राकार हिन्दी में कोई नहीं, दूसरी भाषा में हुआ हो तो मुझे जानकारी नहीं। उनकी तेजस्विता एक महत्वपूर्ण कारण और भी है। बाकी तमाम संपादकों के माथे पर मालिक बैठे होते हैं जो अपने प्रलोभनों के चलते संपादक को खुली छूट नहीं देते। रामनाथ गोयनका को प्रभाषजी के संबंध जिस तरह के थे और गोयनका और जिस तरह से पत्राकारों को लिखने की आजादी दे रखी थी, उससे प्रभाषजी को अपने व्यक्तित्व के विकास का पूरा अवसर मिला।

साहित्य में उनका दखल रहा, लेकिन संदर्भ उन्होंने बहुत दिए। मगर वे शु( साहित्यिक मिजाज का इसलिए नहीं कहूँगा क्योंकि साहित्य की कोई पुस्तक नहीं लिखी। किसी साहित्यिक पुस्तक या लेखक पर उस तरह से नहीं लिखा जो एक साहित्यिक व्यक्ति लिखता है। अलबत्ता राजनेताओं, धर्म, परंपरा, संस्कृति बहुत सामान्य लोगों पर लिखी।
कहने को तो वे गाँधीवादी थे, लेकिन मैं उन्हें गाँधीवादी नहीं मानता। इसकी माकूल वजहें भी हैं। मसलन, जिस तरह से वे आक्रामक होकर सत्ता, अत्याचार और भ्रष्टाचार के खिलापफ गुस्से में आकर आग उगलने वाले अंदाज में लिखते थे वो अहिंसा को परम धर्म मानने वाला गाँधीवादी कतई नहीं कर सकता। उनमें व्यवस्था के प्रति बहुत गुस्सा था। वो गुस्सा गाँधी जी के निष्क्रिय सत्याग्रह वाला नहीं था। बात थोड़ी विवादास्वद हो जाएगी लेकिन एक वाकया है कोई चार-पाँच साल पहले का। मैं प्रभाषजी के साथ भोपाल के एक होटल में ठहरा हुआ था-वहाँ प्रभाषजी ने जमकर सिपर्फ चिकन खाया और शराब भी पी। मेरे आश्चर्य व्यक्त करने पर उन्होंने कहा-मेरी सेहत के लिए यह जरूरी है।
प्रभाषजी नामवर सिंह को बहुत प्यार करते थे। नामवर के ७५वें जन्मदिन पर उन्होंने 'नामवर के निमित्त' नाम से देश भर में बहुत सारे आयोजन करवाए। पिछले कुछ दिनों से वो मुझे और अशोक वाजपेयी को हिन्दी साहित्य की विभूति कहने लगे थे।
इस तरह कहना चाहिए कि हमारे संबंध बहुत द्वन्द्वात्मक किस्म के थे। उनकी कुछ व्यक्तिगत बातों को मैं नापसंद करता था। मगर उनका सम्मान करता था। आज भी मानता हूँ कि उनकी वजह से जनसत्ता अपने ढंग का अकेला अखबार है। जो सनसनी में अंग्रेजीयत में नहीं पड़ा। जनसत्ता जैसा अखबार केवल वही निकाल सकते थे। उन्होंने हिन्दी भाषा की गरिमा को इस अखबार में बचाकर रखा। जहाँ तक मेरी जानकारी है जनसत्ता जैसा अखबार हिन्दुस्तान में और प्रभाष जोशी जैसा संपादक हिन्दी में कोई दूसरा नहीं।

 
पत्राकारिता की नई परिभाषा राम बहादुर राय
 

मुंबई के हवाई अड्डे से बाहर प्रभाष जोशी इंतजार कर रहे हैं। उनके सामने एक टैक्सी आकर रुकती है। ड्राइवर बाहर आता है और वह सीधे उनकी तरपफ बढ़ रहा है। इसे देखकर प्रभाषजी ने समझा कि उसे सवारी की तलाश है इसलिए पूछने आ रहा है। ऐसा था नहीं। जब तक वे उसे मना करते और कहते कि जरूरत नहीं है तब तक वह उनके बहुत करीब पहुँच चुका था। यह जानने के लिए कि क्या वह उसी व्यक्ति को प्रणाम करना चाहता है जिसे वह अक्सर टी.वी. पर बोलते हुए देखता था। उसने पूछा-आप प्रभाष जोशी हैं? हाँ में जबाव पाते ही वह व्यक्ति झुका। उनके पैर छूए और आदरपूर्वक उनसे बोला कि आपको मैं अक्सर टी.वी. पर देखता-सुनता हूँ। आपको खडे़ यहाँ देखा तो मैं खुद को रोक नहीं पाया। मुझे यही कहना है कि आप बहुत सापफ-सापफ बोलते हैं। इसकी ही आज जरूरत है। इतना कहकर वह चला गया। यह ज्यादा दिन पहले की बात नहीं है, पिछले महीने की ही है। यह इस तरह का पहला प्रसंग भी नहीं है। ऐसा अक्सर यात्रााओं में उनके साथ होता ही था। चाहे वह रेलयात्राा हो या जहाज की। नई पीढ़ी के लोग प्रभाषजी से ज्यादा अपनापा महसूस करते थे। यह विभिन्न अवसरों पर दिखता था। उस दिन वे देहरादून से लौटते हुए थोड़ी देर के लिए हरिद्वार में हरकीपौड़ी की सीढ़ियों के उपरी हिस्से पर बैठे हुए थे। आते-जाते अनेक युवा उनके पास आए। उन्हें पहचाना और पिफर एक-दूसरे को बताते हुए बढ़ते गए कि प्रभाष जोशी ही है।

ऐसे प्रभाष जोशी का निधन एक बड़े अभाव को पैदा कर गया है। उनके लिए जितनी शोक सभाएँ हो रही हैं और उनका सिलसिला अभी रुका नहीं है तो इससे यह समझा जा सकता है कि उनकी कीर्ति का संसार अपार था। वह रहेगा। उन्हें याद करने वालों में सिपर्फ पत्राकार ही नहीं हैं। यह सही है कि पत्राकार भी हैं। लेकिन उससे ज्यादा वे लोग हैं जो किसी संस्थान में नहीं हैं। विभिन्न आंदोलन समूहों पर तो जैसे बज्रपात ही हो गया है। अरूणा राय, मेधा पाटकर, देवेन्द्र शर्मा ऐसे कुछ नाम बताने के लिए गिनाए जा सकते हैं। ये उन सवालों को उठाते हैं जिनका संबंध आम आदमी से है। ये लोग मुद्दे पर लोगों को गोलबंद करते हैं। उनमें अधिकारों की चेतना जगाते हैं। वंचितों और कमजोर वर्गों की आवाज को मजबूत करने के लिए सक्रिय रहते हैं। इन लोगों को प्रभाषजी का बहुत बड़ा सहारा था। वे विचार और कर्म से इनके अभियान को बल प्रदान करते थे। पर ऐसे नाम और काम की लंबी सूची है। उसमें जसवंत सिंह का नाम नया जुड़ा है। उनकी पुस्तक के उर्दू संस्करण का लोकार्पण करने प्रभाषजी पटना गए थे। इसके लिए जसवंत सिंह ने उनसे मुलाकात कर आग्रह किया था। जैसा उनका स्वास्थ्य था उसमें यात्रााएँ लोग नहीं करते हैं। वे डाक्टरों और अपने शुभचिंतकों की सलाह को दरकिनार कर लगातार यात्रााएँ कर रहे थे। इससे यह धारणा बन गई कि यात्रााओं से उन्हें नई ऊर्जा मिलती है। यह कुछ हद तक सही था। लेकिन उसकी भी एक सीमा थी।

कोई अगर उनसे पूछता था कि आजकल आप क्या कर रहे हैं तो उनका साधारण सा जवाब होता था-पढ़ना-लिखना और यात्राा करना। इन तीन शब्दों में उनका जीवन समाहित था। पढ़ना-लिखना जितना अपनी अभिव्यक्ति के लिए होता था उससे कहीं अधिक उसमें उनका सरोकार भी झलकता था। यात्रााएँ उसका ही विस्तार थीं। उसके जरिए वे लोगों को एक रास्ता दिखाने, विचार की पटरी पर चलने को प्रेरित करते थे। वे इसका पफर्क नहीं करते थे कि कौन बुला रहा है। जो सरोकार उनके थे उस पर कोई भी अगर उन्हें बुलाता था तो वे जाने के लिए तत्पर रहते थे। इसकी भी परवाह नहीं करते थे कि वहाँ उनकी देखभाल करने वाला कोई होगा या नहीं। जसंवत सिंह की पुस्तक का लोकार्पण कर वे पटना से बनारस पहुँचे। ट्रेन में अकेले थे। बनारस अगर कोई नहीं आता तो वे सर्व सेवा संद्घ के परिसर में खुद पहुँचते हालांकि ऐसी नौबत आती नहीं थी। उस दिन भी नहीं आई। बनारस के कैंट स्टेशन पर उनके स्वागत में लोग आए थे। वहाँ वे हिंद स्वराज की गोष्ठी को जब शुरू करने जा रहे थे उस समय उन्हें चक्कर आया। उद्द्घाटन के बाद उनका लंबा भाषण हुआ। जिन्हें उनकी तबियत का यह हाल मालूम था उनलोगों ने सोचा और पफैसला किया कि अगले किसी कार्यक्रम में उन्हें जाने से रोका जाएगा। वे लोग अपनी बात उनसे मनवा नहीं सके। वे उस जगह भी गए जहाँ उन्हें बोलना था। उनका तर्क था कि जब हाँ किया हुआ है तो जाना ही चाहिए।

इसी तरह वे लखनऊ गए। बनारस से लखनऊ की यात्राा कार से की। जिसमें उनके साथ गोविंदाचार्य गए थे। क्योंकि दोनों को उस मंच से हिंद स्वराज पर बोलना था। यात्राा की थकान को उन्होंने रास्ते में गोविंदाचार्य से बातचीत करते हुए मिटाई। वे यही कहते रहे। हम पाते हैं कि प्रभाष जोशी अथक यात्राी थे। उनके किसी मित्रा ने उन्हें यायावर कहा है। इसी रूप में याद किया है। कुछ लोगों को लगता है कि यात्रााएँ उनके जीने का एक बहाना होती थीं। इससे भिन्न नजरिया भी है। वे पर्यटन के लिए यात्राा नहीं करते थे। उनकी यात्राा का एक उद्देश्य होता था। निरर्थक यात्राा और जीवन में उनका यकीन नहीं था। सार्थक यात्राा उनके रग-रग में बचपन से शामिल थी। लोग पत्राकार और बडे़ संपादक प्रभाष जोशी को उनके लेखन और भाषण से जानते हैं। उससे ही उन्हें समझने का प्रयास होता है। लेकिन इस तरह के प्रयास में एक दृष्टिदोष भी रहता है। लोग तुलना करने लगते हैं। जहाँ भी तुलना भी होती है वहाँ विरोध और विसंगति को खोजने की कोशिश होती है। जो है, उसे समझने का प्रयास कम होता है और ज्यादा जोर इस बात पर होता है कि होना क्या चाहिए। ऐसे तुलनात्मक आकलन से वे बिल्कुल अलग थे। कुछ लोग उनकी तुलना आजकल के उन पत्राकारों से भी करने लगते थे जिनके लिए पत्राकारिता सत्ता का पायदान बन गई है।

ऐसी तुलनाओं से उनके साथ अन्याय होता रहा है। जिसका उन्होंने कभी जवाब देना मुनासिब नहीं समझा। इस तरह की नासमझी और तुलना वे ही कर सकते हैं जो नहीं जानते कि प्रभाष जोशी कौन थे। जिन्होंने प्रभाष जोशी के जीवन को 'जनसत्ता' के दायरे में ही देखा-समझा है वे बेचारे ऐसे हैं जिन पर दया की जानी चाहिए। उन्हें बताया जाना जरूरी है कि 'जनसत्ता' से पहले और उसके बाद के प्रभाष जोशी को बिना पूर्वाग्रह के जानने के लिए मुक्त मन चाहिए। ऐसा मन जो समझने का इरादा रखता हो। जो सरल तरीके से तथ्यों को देख पाता हो। इस तरह का मन ही उस प्रभाष जोशी को भी जान पाएगा जिसने पंद्रह साल की उम्र में अपना पफैसला खुद लिया। वे तब इंदौर के गुजराती कॉलेज में पढ़ते थे। विज्ञान के छात्रा थे। उनके पिता चाहते थे कि वे विज्ञान और गणित की पढ़ाई कर इंजीनियर हो जाएँ। उनकी रुचि क्रिकेट खेलने में थी। वे चाहते थे कि बीस की उम्र में क्रिकेट की इंडिया टीम में खेलें। पिता की इच्छा और अपनी रुचि को एक ओर रखकर उन्होंने आसपास के गाँवों को समझना शुरू किया। इसके लिए रास्ता खोजा। पता किया तो मालूम हुआ कि इंदौर के ही क्रिश्चियन कॉलेज के एक प्रोपफेसर अपने छात्राों को गाँव ले जाते हैं। उनसे नाता जोड़ा और उनकी टीम में शामिल हो गए। वे भी गाँव जाने लगे। उनकी यायावरी का वह प्रारंभ था।

इसी तरह साइकिल से पूरे मध्य भारत की उन्होंने अपने एक साथी को लेकर यात्राा की थी। उनकी यात्राा इस उद्देश्य से प्रेरित थी कि आजाद देश में नवनिर्माण को देखना और महसूस करना है। सोचिए कि पंद्रह साल के एक तरुण में यह भाव पैदा हुआ कि देश को नए सिरे से बनाने में उसकी भी भूमिका होनी चाहिए। यह १९५४ की बात है। वह प्रेरणा प्रबल थी। विचार का स्पफुरण मात्रा नहीं था। उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी। इंटर की परीक्षा में बैठने के बजाय गाँव में जाकर रहने लगे। गाँव था-सुनवानी महाकाल। उनका जीवन बदल गया। छात्रा से स्वाध्यायी और समाजसेवी हो गए। उसी तरह का जीवन जीने लगे। सुबह जल्दी उठकर अपने लिए जरूरत भर का आटा खुद पीसते थे। गाँव भर के बच्चों को जुटाकर गलियों की सपफाई करते और कराते थे। पिफर छिप्रा नदी में स्नान कर उस ठिकाने पर लौटते थे जो गाँववालों ने दे रखा था। वहाँ आकर तकली पर सूत कातना और खेतों में काम करना उनकी दिनचर्या के अनिवार्य हिस्से थे। शाम को कथा-वार्ता और लोकगीत। वे वहाँ पाँच साल रहे। वहीं रहते उनकी भेंट कुमार गंधर्व से हुई, जिन्हें सुनने वे देवास जाते थे। उसी अवधि में उन्होंने अंग्रेजी साहित्य और उसके लेखकों को पढ़ा। दर्शनशास्त्रा पढ़ा। गाँधी को पढ़ा और समझा। इस तरह के सार्वजनिक जीवन की आत्मदीक्षा लेकर प्रभाष जोशी ने नई पगडंडी बनाई। जिस पर वे ही चल सकते हैं जो संकल्प के धनी हैं। जिनमें आत्मसंयम है और जो चरित्रावान हैं।

उन्होंने अपने उदाहरण से यह साबित किया कि कॉलेज और द्घरबार छोड़ने पर भले ही लोग अपनी समझ से कुछ भी कहें पर सार्वजनिक जीवन जीते हुए भी पढ़ना-लिखना किया जा सकता है। जब उन्हें यह दिखने लगा कि उनके काम को गाँव वाले सराह रहे हैं और राजनीतिक लोग उनको अपना प्रतिद्वंद्वी मानने लगे हैं तो उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। वे चाहते तो वहीं रह सकते थे। चुनाव भी लड़ सकते थे। कांग्रेसी यही समझते थे कि वे अपने लिए चुनाव क्षेत्रा तैयार कर रहे हैं। जो समझ तब कांग्रेसियों की थी वही बाद के दिनों में औरों की भी बनी। वह जितनी तब निराधार थी उतनी ही बाद में भी हवाई साबित हुई। उन्होंने चुनाव लड़ने के लिए गाँव को नहीं चुना था। इसलिए चुना था कि नए सिरे से देश बन रहा है और उसमें उनको भी कुछ करना चाहिए। गाँववालों ने जब उनमें विराट का दर्शन करना शुरू किया तो प्रभाष जोशी ने लद्घु रूप अपनाया। सेवा से पत्राकारिता की तरपफ मुडे़।

नई दुनिया को ऐसे एक रिपोर्टर की खोज थी जो विनोबा भावे की इंदौर यात्राा को कवर कर सके। राहुल बारपुते और राजेंद्र माथुर की निगाह उनपर टिक गई। उन लोगों के आग्रह पर प्रभाष जोशी ने महीने भर जिस तरह रिपोर्टिंग की उससे नई दुनिया की शान बढ़ी। उनका लिखा हुआ खूब लोकप्रिय हुआ। वे रात ढ़ाई बजे बिनोवा के निकलने से पहले पहुँच जाते थे। दिन भर साथ रहते थे। इस तरह उनकी पत्राकारिता शुरू हुई। पत्राकारिता उनके लिए नौकरी नहीं थी, बदलाव का जरिया थी। नई दुनिया के दिनों के कई उनके काम गिनाए जा सकते हैं। वे पत्राकारिता के लिए मिशाल हैं। उसकी चर्चा यहाँ गैर जरूरी है। इतना ही कापफी है कि वे छह साल नई दुनिया में रहे। जब भोपाल से मध्य देश अखबार निकालने की चुनौती आई तो उन्होंने उसे मंजूर किया। वह अखबार दो तीन साल ही चल पाया। उसके बंद हो जाने पर वे नई दुनिया लौटकर जा सकते थे। वे नहीं गए। और गाँधी जन्म शताब्दी के काम में उन्होंने सार्थकता पाई। १९७४ तक सर्वोदय निकाला। जब वे दिल्ली १९६८ में आए, उस समय वे चाहते तो रतनलाल जोशी के यहाँ पहुँच सकते थे। उनकी जेब में एक सिपफारिशी पत्रा था। वे सिपफारिश से कहीं कुछ पाना नापसंद करते थे। इसलिए वह पत्रा वैसे ही उनके पास पड़ा रहा।

गाँधी जन्म शताब्दी के बाद जेपी ;लोकनायक जयप्रकाश नारायणद्ध ने महसूस किया कि शासन में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। राजनीति में अनीति पफैल रही है। लोगों को आजादी का अधिकार नहीं मिल रहा है। इससे चिंतित होकर जेपी ने कुछ चुने हुए सोचने-समझने वालों को कर्नाटक के टिप्प गुंडनहल्ली में विमर्श के लिए बुलाया। वहीं इवरीमैन्स निकालने का पफैसला हुआ। जिससे प्रभाषजी जुड़े। आंदोलन हिन्दी क्षेत्रा में था। इसलिए प्रजानीति साप्ताहिक निकालने का विचार रामनाथ गोयनका ने बनाया। वे जैसी बोलचाल की हिन्दी चाहते थे वैसी ही उन्होंने सर्वोदय में पाई थी। उन्होंने प्रभाषजी का लिखा हुआ पढ़ा था और प्रारंभिक हिचक दूर कर वे उन्हें प्रजानीति निकालने के लिए ले गए। कुछ ही महीने निकल पाया कि इमरजंसी लग गई। इमरजंसी में इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय गाँधी की तानाशाही थी। वे जिन दो पत्राकारों से खासकर नाराज थे उनमें एक प्रभाष जोशी थे। प्रजानीति को बंद करना पड़ा। जिस समय पूरे इंडियन एक्सप्रेस पर इमरजंसी की काली छाया मंडरा रही थी और सवाल था कि क्या किया जाए उस समय एक दिन प्रभाष जोशी ने रामनाथ गोयनका को कहा कि जब नाव डूबने लगती है तो पफालतू सामान पफेंक दिया जाता है। नाव को बचाने के लिए ऐसा करना पड़ता है। आप प्रजानीति और आसपास को बंद कर दीजिए। यह सलाह प्रभाष जोशी ही दे सकते थे, जिन्हें इसकी परवाह नहीं थी कि वे अखबार से निकल जाएँगे तो क्या होगा। वे इमरजंसी के दिनों में भूमिगत थे। लोकतंत्रा की वापसी के संद्घर्ष में सक्रिय थे।

लोकतंत्रा जब लौटा और दूसरी आजादी आई तो वे पत्राकारिता के जरिए उसे मजबूत करने में लगे। वह दौर उनकी पत्राकारिता का ऐसा था जिसे राजनीतिक परिवर्तनों के उतार चढ़ाव में हम देख सकते हैं। वे हिन्दी के ऐसे संपादक हुए हैं जिन्हें अंग्रेजी के इंडियन एक्सप्रेस को तीन केंद्रो से निकालने और संभालने में सपफलता मिली थी। अंग्रेजी समूह के हिन्दी अखबार के संपादकों में उनका ऊंचा स्थान यूँ ही नहीं बना था। उसे उन्होंने अपने पत्राकारीय पराक्रम से अर्जित किया था। जनसत्ता को जिन कई बातों से बल मिला उसमें एक यह भी था। एक यह भी कारण था कि उन्होंने हिन्दी पत्राकारिता को पहले दर्जे पर लाकर बैठा दिया। यह दिखाया कि हिन्दी पत्राकारिता से जनमत बनाया जा सकता है। सत्ता परिवर्तन संभव है। सत्ता पर अंकुश संभव है। जनसत्ता की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन के चल रहे प्रयासों को अपना जीवनकार्य समझ लिया था। इसी अर्थ में वे ऐसे सार्वजनिक बु(जिीवी थे जो आंदोलनों के प्रेरक थे और उन आंदोलनों को वैचारिक रास्ता दिखाते थे। उनमें कुछ पाने या हासिल करने का मानवीय दोष नहीं आया। इससे वे आजीवन परे रहे। यही वह मूल उनकी पूंजी थी जिससे वे नैतिक ऊर्जा पाते रहते थे। उनके सरल और सुलभ होने का भी रहस्य यही है।

 
धर्म निरपेक्ष चरित्रा गोविंदाचाय
 

प्रभाष जोशी का अचानक हम लोगों के बीच से जाना न सिपर्फ पत्राकारिता की क्षति है बल्कि समाज के विभिन्न मुद्दों पर लड़ने वाला यो(ा खोया है। हर मुद्दे पर बिना लाग-लपेट के बोलने वाले प्रभाषजी अपने आप में अद्भुत व्यक्तित्व थे। आज जब मीडिया, विज्ञापन और बाजारवाद के साथ खुली गलबहियाँ डाले द्घूम रही है ऐसे में प्रभाष जोशी देश भर में मीडिया की इस कुप्रवृति पर लगाम लगाने के लिए जन जागरण कर रहे थे।
बाजारवाद के खिलापफ चल रही लड़ाई का हमने कद्दावर नेता खो दिया है। जिस उत्साह और लगन से वे आम लोगों की समस्याओं को आगे लाते थे ऐसा कोई निर्भीक आदमी ही कर सकता है। लेकिन इस लड़ाई में प्रभाषजी ने ऐसे सिपहसालार भी पैदा किए जो लड़ाई को मंजिल तक पहुँचाएँगे। प्रभाषजी ने अपने साथ कई लोगों को तैयार किया है जिनकी जनप्रतिब(ता आम लोगों के साथ है। वे जीवन भर राजनीति के भ्रष्टाचार, निरंकुशता और बाजारवाद के खिलापफ लड़ते रहे।

उनके निधन के बाद उनको और उनके द्वारा स्थापित मान्यताओं को मानने वाले दिल्ली से लेकर इंदौर तक दिखे। यह बात अलग है कि सेकुलर राजनीति का नारा बुलंद करने वाले लोग कम दिखाई दिए। यह अनायास नहीं है। प्रभाषजी कांग्रेस पार्टी के सत्तारूढ अधिनायकवाद के चरित्रा के खिलापफ थे। कांग्रेस द्वारा देश पर थोपी गयी इमरजेंसी का उन्होंने विरोध किया। जनता पार्टी के साथ आए। संद्घ परिवार और भाजपा के लोगों पर प्रभाषजी आजीवन हमला करते रहे। इसमें व्यक्तिगत संबंध कहीं से आड़े नहीं आया। उनका संद्घ में हिन्दुत्व की अवधारणा से विरोध था इसके विपरीत प्रभाषजी और गाँधीजी दोनों अपने को आजीवन सनातनी हिन्दू कहते रहे। संद्घ परिवार के हिन्दुत्व में भूमि और जन दोनों शामिल हैं जबकि प्रभाषजी भूमि से दूर जन में विश्वास करते थे। दोनों की हिन्दुत्व की समझ अलग थी। लेकिन वे आजीवन आस्था, विश्वास, धर्म और संस्कृति की बात करते रहे।

६ दिसंबर १९९२ के पहले वे प्रधानमंत्राी पीवी नरसिंह राव से मिलने गए थे। संद्घ परिवार के प्रतिनिधि मंडल में वे शामिल थे। जो इस बात की गारंटी सरकार को देने गया था कि ६ दिसंबर को अयोध्या में प्रतीकात्मक कार सेवा होगी। विवादित ढाँचे को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा। लेकिन ६ दिसंबर को बात संद्घ परिवार के हाथ से निकल गयी। कार सेवक अनियंत्रिात हो गए। बाबरी मस्जिद विध्वंस हो गया।
इस द्घटना के बाद प्रभाषजी को बहुत दुःख हुआ। उनको लगा कि संद्घ परिवार ने उन्हें धोखा दिया। जीवन भर की उनकी संचित छवि टूट गयी। उनके धर्म निरपेक्ष चरित्रा एवं व्यक्तित्व का नुकसान हुआ। वे धर्मनिरपेक्ष चरित्रा, राजनीति के संवाहक थे। इससे उनकी संद्घ परिवार से दूरी बढ़ती गयी। मेरा उनसे बहुत ही नजदीकी संबंध था। हमने जो अनुभव किया, उस आधार पर कहा जा सकता है कि उनका व्यवहार और चरित्रा लोकतांत्रिाक था।

प्रभाषजी के व्यक्तित्व के कई पहलू थे जो उनके नजदीक जाने पर पता चला। वे कोई योजना दीर्द्घकालिक समय के लिए बनाते थे। जैसे कि सौ साल जीना है। काम की इस योजना ने हमें बहुत प्रभावित किया। मीडिया की वर्तमान राजनीति से कापफी विचलित थे। उम्र के इस पड़ाव में भी वे बहुत कुछ करना चाह रहे थे।
हिन्द स्वराज को वे आज की परिस्थिति के अनुसार पिफर से लिखना चाहते थे। पर ऐसा नहीं कर सके। उनके द्वारा छोड़े गए कार्यों को आगे बढ़ाने का दायित्व हम सबका है।
हिन्द स्वराज के सौ वर्ष होने पर वे देश भर में गोष्ठियाँ और सभाएँ कर रहे थे। कई जगहों पर मैं उनके साथ था। रास्ते में उन्होंने सबको आलू का पराठा खिलाया। जिस प्रेम से उन्होंने हमको खिलाया, उसी प्रेम के साथ कार ड्राइवर को भी। और ड्राइवर से वादा लिया कि वह नशा नहीं करेगा। गुटखा और शराब का सेवन नहीं करेगा। वे ड्राइवर और सवारी में भेद नहीं करते थे। व्यक्ति की हैसियत से संबंध और व्यवहार नहीं तय करते थे। वे सबके साथ समान व्यवहार रखते थे। आजीवन वे जन, जनतंत्रा और जनभाषा के लिए लड़ते रहे। भाषा के देशज और खांटी प्रयोग को उन्होंने आगे किया। यह लोकतांत्रिाक प्रवृत्ति का सबसे बड़ा लक्षण है।
वे बहुत सुलझे और सहज इंसान थे। लोकतांत्रिाक गुणों के संवाहक थे। आम इंसान के साथ थे।

 
आजादी के बाद की हिन्दी पत्राकारिता और प्रभाष जोशी गोविंद सिंह
 

प्रभाष जोशी निस्संदेह आजादी के बाद के सबसे बड़े पत्राकारों में से एक थे। उनके जीवन और कर्म पर एक नजर डालें तो सापफ लगता है कि वे आजादी के पहले और बाद की हिन्दी पत्राकारिता की दो अलग-अलग धाराओं के बीच एक सेतु का काम करते हैं। इस मायने में कि जहाँ आजादी से पहले की पत्राकारिता मिशनरी पत्राकारिता थी, उसके सामने राष्ट्रीय आजादी का एक विराट लक्ष्य था, वहीं आजादी के बाद की पत्राकारिता लगातार प्रोपफेशनल यानी पेशेवर बनने की कोशिश है। प्रभाष जोशी की पत्राकारिता में दोनों ही तत्व मिलते हैं।
आजादी के बाद के बड़े हिन्दी पत्राकारों की सूची बनाएँ तो अज्ञेय, धर्मवीर भारती, राजेंद्र माथुर, राहुल बारपुते, मनोहरश्याम जोशी, कमलेश्वर, रद्घुब्वीर सहाय, सुरेंद्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी के नाम सामने आते हैं। हालांकि साहित्यकार पत्राकारों की एक लंबी पफेहरिस्त बन जाएगी और मासिक पत्रिाकाओं या लद्घु पत्रिाकाओं के संपादकों की सूची भी अलग से बनाई जा सकती है लेकिन हम यहाँ मुख्यतः दैनिक और साप्ताहिक पत्रा-पत्रिाकाओं को ही रखना चाहते हैं, जिन्होंने धारा को बदलने का काम किया और जिसे हम मुख्यधारा की पेशेवर पत्राकारिता के रूप में जानते हैं।

अज्ञेय जी हालांकि प्रिंट मीडिया में आने से पहले रेडियो में रह आए थे लेकिन दिनमान की परिकल्पना कर के उन्होंने हिन्दी पत्राकारिता को एक नया आयाम दिया। तब तक हिन्दी ही नहीं, अंग्रेजी में भी कोई समाचार पत्रिाका भारत में नहीं थी। धर्मयुग और इलस्ट्रेटेड वीकली ऑपफ इंडिया बहुचर्चित और बहुप्रसारित पत्रिाकाएँ थीं लेकिन वे पफीचर पत्रिाकाएँ ही थीं। टाइम्स समूह ने जब १९६५ में दिनमान निकालने की योजना बनाई तो अज्ञेय जी को इसके संपादक के लिए चुना गया। वे निस्संदेह उस समय साहित्य की दुनिया के सबसे चमकते हुए सितारे थे। तब तक तार सप्तक की परंपरा में तीन सप्तक आ चुके थे। उन्हें ही दिनमान की परिकल्पना करनी थी। मोटे तौर पर टाइम जैसी पत्रिाका उनके सामने दृष्टांत के रूप में थी। खैर उन्होंने वह पत्रिाका निकाली और अत्यंत खूबसूरती के साथ निकाली, जिसने बाद के वर्षों में रद्घुबीर सहाय के संपादन में नए मानक गढ़े। अज्ञेय जी को १९७७ में जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद नवभारत टाइम्स का भी प्रधान संपादक बनाया गया। वे दो वर्ष इस पद पर रहे। निस्संदेह उनके संपादन में नवभारत टाइम्स ने नई ऊँचाइयों का स्पर्श किया। उन दिनों नवभारत टाइम्स के संपादकी पेज में छपने वाले लेखकों के नाम आज भी मुझे रटे हुए हैं। लेकिन उनकी पत्राकारिता नवभारत टाइम्स की नहीं, दिनमान की ही थी। नवभारत टाइम्स को तो उन्होंने थोड़ा-सा संस्कारित ही किया था। और पिफर अज्ञेय जी मूलतः साहित्यकार थे, पत्राकार बाद में। उनका पत्राकारीय योगदान उनके साहित्यिक अवदान से ढ़क जाता है। पिफर भी अज्ञेय जी की पत्राकारिता को मिशनरी की बजाए पेशेवर पत्राकारिता कहना ज्यादा संगत होगा।

साहित्यकार-पत्राकारों की परंपरा में धर्मवीर भारती, रद्घुवीर सहाय और मनोहरश्याम जोशी भी हैं। लेकिन पत्राकारीय योगदान के लिए जिस व्यक्ति ने पूरी हिन्दी पत्राकारिता में अपनी एक खास जगह बनाई, वह निस्संदेह धर्मवीर भारती थे। धर्मयुग अपने समय की श्रेष्ठतम पत्रिाका थी। वह साहित्यिक भी थी और पेशेवर भी थी। वह हर द्घर की शान थी। उसमें पत्रा भी छप जाए तो लेखक अपने को गौरवान्वित समझते थे। एक कहानी छप जाए तो लोग साहित्यकार कहलाते थे। धर्मयुग में एक भी गलती का मिलना असंभव था। उसकी भाषा, उसकी शैली, उसकी साज-सज्जा और छपाई सब मोहक थीं, इसीलिए उसे तब हिन्दी का पर्याय माना जाता था। ऐसी ख्याति उसने यों ही नहीं अर्जित कर ली थी। उसे इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए धर्मवीर भारती ने अपने साहित्यकार की कुरबानी दी थी। वह सुबह से शाम तक आँख गड़ा कर धर्मयुग में छपने वाली एक-एक चीज पढ़ते थे। अपने काम के अलावा उन्होंने और कोई महत्वाकांक्षा नहीं पाली। महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद वह एकमात्रा अनुशासित संपादक थे, जिसके लिए संपादन अपने जीवन का पहला और आखिरी कर्म बन गया था। यदि वह धर्मयुग में नहीं गए होते तो शायद अंधायुग और गुनाहों के देवता से आगे की चीज हिन्दी जगत को देते।

धर्मयुग की तुलना में साप्ताहिक हिन्दुस्तान ;मनोहरश्याम जोशीद्ध और दिनमान ;रद्घुवीर सहायद्ध का प्रसार कापफी कम था। लेकिन स्तर के लिहाज से उन्होंने भी कई नए मानक गढ़े थे। साहित्यिक रुझान, गांभीयर् और सृजनात्मकता के लिहाज से जोशी और सहाय हिन्दी पत्राकारिता के दो बेमिसाल स्तंभ थे। सहाय जी को तो पिफर भी हिन्दी के पत्राकारीय व राजनीतिक हल्कों में महत्व मिला परंतु आश्चर्य है कि जोशी जी के पत्राकार को खास महत्व नहीं मिला। नई पीढ़ी उन्हें हमलोग और बुनियाद के पटकथा लेखक या कसप के उपन्यासकार के रूप में ही ज्यादा जानती है। इसी क्रम में कमलेश्वर भी आते हैं, जिन्होंने सारिका के रूप में हिन्दी की साहित्यिक और पेशेवर पत्राकारिता का अद्भुत समन्वय पेश किया। सारिका एक स्तरीय कहानी पत्रिाका होते हुए भी बेहद लोकप्रिय थी और द्घर-द्घर में पढ़ी जाती थी। कहानी पत्रिाका को इस स्तर पर प्रसारित करवाने की कला कमलेश्वर ही जानते थे। वैसे वे कुछ दैनिकों के संपादक भी रहे लेकिन उन्हें लोग सारिका के संपादक के रूप में ही याद रखेंगे। यों टेलीविजन में भी उनकी आवाज और झलकियों के चाहने वाले कम नहीं थे।

दिनमान की तर्ज पर निकले समाचार साप्ताहिक रविवार के संपादक के रूप में ख्याति अर्जित करने वाले सुरेंद्र प्रताप सिंह का योगदान भी भुलाए नहीं भूलता। वह महज २७ साल की उम्र में रविवार के संपादक बन गए थे। उन्होंने रविवार को नए तेवर और धार दी। उसने दिनमान की बौ(कि जड़ता को तोड़ा और खोजी पत्राकारिता के नए प्रतिमान गढे़। वह साप्ताहिक समाचार पत्रिाकाओं को दिनमान से आगे ले गए। उनकी छवि रविवार के जुझारू संपादक के रूप में ही बनी। अच्छी बात यह है कि उनकी पत्राकारिता का लगातार विकास हुआ। वह नवभारत टाइम्स के कार्यकारी संपादक बने। राजेंद्र माथुर के साथ उन्होंने इस अखबार को एक नया तेवर दिया। नवभारत टाइम्स से मुक्त होने के बाद आजतक के संपादक के रूप में उनका एक नया पत्राकार व्यक्तित्व सामने आया और इलेक्ट्रॉनिक पत्राकारिता को नई जमीन। वह कभी भी एक अच्छे लेखक नहीं रहे लेकिन पत्रा या पत्रिाका को समग्रता में प्रस्तुत करने का उनका एक नया अंदाज था, जिसने हिन्दी पत्राकारिता को गहराई से प्रभावित किया।

अब आते हैं हिन्दी पत्राकारिता के इंदौर स्कूल पर, जिसके स्रष्टा निस्संदेह राहुल बारपुते थे। उन्हें पढ़ने या देखने का सौभाग्य मुझे कभी नहीं मिला लेकिन हमेशा यह ख्वाहिश बनी रही कि जिसने राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे शिष्य गढ़े, वह स्वयं कैसा पत्राकार होता होगा? राजेंद्र माथुर ने दिल्ली आने के बाद हंस में राहुल जी पर हिन्दी पत्राकारिताः संदर्भ राहुल बारपुते शीर्षक से लेख लिखा था। वह अक्सर कहा करते थे कि बारपुते एक ऐसे बरगद थे, जिनकी छाया में पल कर पत्राकार और भी बड़े होते थे। उन्होंने सचमुच आजाद हिन्दुस्तान की हिन्दी पत्राकारिता की रूपरेखा तय की और उसे भरने के लिए नई पौध तैयार की। इंदौर जैसी जगह पर नई दुनिया को वह ऊँचाई दी, जो किसी और के लिए असंभव था। आजादी के बाद के तीस साल यों भी हिन्दी की मुख्यधारा पत्राकारिता के लिए निराशा से भरे थे। एक भी अखबार ऐसा नहीं दिखाई देता जिसने कोई नया प्रतिमान कायम किया हो। आजादी से पहले शुरू हुए अखबारों का पतन शुरू हो चुका था, आजादी के समय या बाद में शुरू हुए अखबार शैशवावस्था में थे, बड़े प्रतिष्ठानों से निकलने वाले अखबार अंग्रेजी अखबारों की जूठन भर होकर रह गए थे और छोटे अखबार इसलिए नहीं बढ़ पा रहे थे क्योंकि सत्ता की तरपफ से हिन्दी को आगे न बढ़ने देने के सारे इंतजाम थे। ऐसे में इंदौर से नई दुनिया का निकलना और अपने स्तर को कायम रखना राहुल बारपुते के कारण ही संभव हो पाया। उनका अखबार हर लिहाज से पत्राकारीय मानकों पर खरा उतरता था। प्रभाषजी उनके साथ कम समय रहे जबकि राजेंद्र माथुर ने लंबी पारी खेली और उस बरगद की छाया में पलते-पलते वह कद हासिल किया, जिसे तब तक कोई हासिल नहीं कर पाया था।

राजेंद्र माथुर निश्चय ही आजाद भारत के सबसे बड़े पेशेवर पत्राकार थे। कमियां-अच्छाइयां हरेक में होती हैं, लेकिन एक ऐसा संपादक जो पूरी तरह से अखबार को समर्पित था, जो अखबार को पूरी तरह से जीता था, कोई दूसरा नहीं हुआ। वह एक श्रेष्ठ लेखक थे, महान चिंतक थे और समर्पित संपादक थे। वे चाहते तो शायद एक श्रेष्ठ साहित्यकार हो सकते थे। उनकी भाषा अत्यंत सृजनात्मक थी और वे एक विजनरी की तरह से किसी भी विषय को उठाते थे। साठ के दशक में जब वे इंदौर के एक कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे, उनकी लिखी टिप्पणियां अद्भुत हैं। क्या भाषा, क्या अंतर्वस्तु, हर लिहाज से अप्रतिम। वे पत्राकारिता की आँषि परंपरा के संवाहक थे। यानी एक ऐसे आँषि जो अखबार के बारे में सबकुछ जानता है। वे सदैव अखबारों, पत्रिाकाओं और कागजों से दबे रहते थे। उन्हें कभी खाली नहीं देखा। हाथ में कैंची लिए अखबारों की कतरने समेटते, उन्हें साथियों को देते और नए-नए मसलों पर उलझते हुए देखा। किसी अखबार में यदि कभी कोई नई चीज दिख जाए या पसंद आ जाए तो वे बच्चों की तरह से खुश होते और तुरंत अपनी टिप्पणी के साथ नोटिस बोर्ड पर टांग देते। चूंकि वे निरंतर भाषा और विचारों में ही डूबे रहते थे, इसलिए उनकी बातचीत की भाषा भी वैसी ही हो गई थी।

उन्होंने हिन्दी लेखन को नई शैली दी। वे किसी भी समस्या का कोई पौराणिक रूपक चुन लेते और उसी के इर्द-गिर्द कहानी बुनते। पाठक को अपने लेख के साथ बांधे रखने की उनकी यह अद्भुत शैली थी। उन्होंने कभी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं पाली। न ही अपनी पेशेवर तरक्की के लिए कभी संपर्कों का इस्तेमाल ही किया। बल्कि टाइम्स ऑपफ इंडिया में हिन्दी पत्राकारिता पर लिखे उनके तीन लेख ही उनके नवभारत टाइम्स में चयन का कारण बने। उनमें गजब की इतिहासदृष्टि थी। विश्व इतिहास के निकष पर कस कर ही वे द्घटनाओं का विश्लेषण करते। वैचारिक तौर पर वे सचमुच राहुल बारपुते के उत्तराधिकारी थे। उनकी छत्राछाया में एक ही समय में अलग-अलग विचारधाराओं के सहयोगी एक साथ सक्रिय थे। अस्सी के दशक में, जब वह दिल्ली में रहे, मुख्यतः खालिस्तान आंदोलन चल रहा था। उन दिनों लिखे उनके लेख आज इतिहास का अहम हिस्सा हैं। लेकिन तब पंजाब के अनेक शहरों में नवभारत टाइम्स सिपर्फ इसीलिए पढ़ा जाता था कि उसमें माथुर साहब का लेख छपता था। १९९१ में उनका असमय निधन हो गया, यदि वे कुछ समय और रहते तो शायद हिन्दी पत्राकारिता की तस्वीर कुछ और ही होती।

प्रभाष जोशी का कार्यकाल माथुर साहब की तुलना में लंबा रहा। उनका जीवन माथुर साहब के सपाट जीवन की तुलना में कुछ टेढ़ा-मेढ़ा और भटकावों भरा रहा। वे बीच-बीच में सर्वोदयी-गाँधीवादी भी हुए। पत्राकारिता छोड़कर गाँवों-आदिवासी इलाकों में काम करने चल दिए। वे जयप्रकाश नारायण के साथ भी रहे। यदि रामनाथ गोयनका न मिले होते तो शायद वह पत्राकारिता में वापस नहीं भी आते। एक तरह से हमें रामनाथ गोयनका का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने हमें प्रभाष जोशी दिए। एक्सप्रेस या जनसत्ता में उनका जो मिशनरी और जुझारू रूप हमें दिखाई देता है, उसे बनाने में भी रामनाथ गोयनका का ही हाथ था। यदि वह टाइम्स समूह में होते तो पत्राकारिता कर ही नहीं पाते। राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के बीच गजब की मैत्राी थी लेकिन जब तक माथुर साहब जीवित रहे, प्रभाष जोशी का व्यक्तित्व उभर नहीं पाया। क्योंकि तब नवभारत टाइम्स ही हर लिहाज से नंबर वन अखबार था। जनसत्ता की खबरों में निश्चय ही ज्यादा जोश दिखाई पड़ता था, लेकिन कभी कभी भावुक उद्रेक और हल्कापन भी होता था। चूंकि उन्होंने अपनी टीम में हर विचारधारा के एक्टिविस्ट भर लिए थे,

इसलिए वे गाहे-ब-गाहे अपनी सीमारेखा तोड़ देते थे। इसलिए एक्सप्रेस की ही तरह जनसत्ता को भी कभी संतुलित अखबार नहीं माना गया। यही वजह है कि अपनी चरम जवानी के समय भी उसका प्रसार नवभारत टाइम्स का आधा ही था। लेकिन प्रभाषजी की खूबी यह थी कि कम सर्कुलेशन के बावजूद उन्होंने रद्घुवीर सहाय की ही तरह अपने चाहने वाले पाठकों का एक मजबूत वर्ग तैयार कर लिया। उनके वैचारिक जीवन में भी दो-एक मोड़ ऐसे हैं, जिन्हें भटकाव कहा जा सकता है। पहला, सती प्रथा को डिपफेंड करने वाले संपादकीय, जो वास्तव में उनके सहयोगी ने लिखा था, पर अडे़ रहना और दूसरा, बाबरी मस्जिद ध्वंस की द्घटना के बाद पूरी तरह से संद्घ-भाजपा विरोधी हो जाना। सती प्रथा वाले मसले पर उनका अड़े रहना गैरजरूरी लगता था। वे दूसरे दिन अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकते थे। दूसरे, बाबरी ध्वंस की द्घटना के पहले उनका रूप संद्घ-भाजपा विरोधी नहीं दिखाई पड़ता। अचानक से यू टर्न ले लेने पर ऐसा लगा कि चूंकि उनकी बात नहीं मानी गई, इसलिए वे संद्घ-भाजपा विरोधी हो गए। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रामनाथ गोयनका की मृत्यु ;१९९१द्ध से पहले उनकी विचारधारा पर गोयनका के विचारों की छाप थी, और बाद में वे मुक्त हो गए। जो भी हो, यह उनके विचारों का भटकाव तो है ही। वास्तव में जनसत्ता के संपादक पद से हटने के बावजूद प्रभाष जी का महत्व न सिपर्फ बरकरार रहा, बल्कि और भी प्रखर हुआ। उनका स्तंभ कागद कारे, देशकाल की सीमाओं को लांद्घ गया। उनकी क्रिकेट समीक्षाएँ खेल पत्राकारिता का मानदंड बन गई। पत्राकारिता पर उनके भाषण नई पीढ़ी को सदैव ऊर्जस्वित करते रहेंगे। यानी ऐसा नहीं लगा कि अखबार से बाहर होते ही वे भी परिदृश्य से गायब हो गए, जैसा कि अधिकतर पत्राकारों के साथ होता है। बल्कि १९९१ के बाद वे निर्विवाद रूप से हिन्दी के शीर्षतम स्तंभ बन गए।

 
कुछ अधूरे काम हिमांशु शेखर
 

प्रभाष जोशी चले गए। उनके जाने के बाद हर तरपफ से यही आवाज आई कि उनका जाना एक युग का अंत हो जाना है। उनके जाने से जो शून्य उभरा है, उसे भरना असंभव सरीखा है। नामी पत्राकारों से लेकर नवोदित पत्राकारों और पत्राकारिता के छात्राों ने भी उन्हें अपनी-अपनी तरह से याद किया। अखबारों में चर्चा हुई। कुछ पत्रिाकाओं ने प्रभाष जी पर विशेषांक निकालने की भी द्घोषणा कर दी है। ब्लॉग जगत में प्रभाष जी के जाने पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई। ६ नवंबर की सुबह प्रभाष जी के वसुंधरा वाले निवास पर और पिफर उसी दिन गाँधी शांति प्रतिष्ठान में बड़ी संख्या में पत्राकार मौजूद थे। आने वाले लोगों में से ज्यादातर के मन में प्रभाष जी से जुड़ी कोई न कोई याद जरूर थी। लोगों ने प्रभाष जी की पत्राकारिता को लेकर जमकर बातें की।

जितने लोग और जिस तरह के लोग इन दोनों जगहों पर मौजूद थे, उसे देखते हुए तो यह माना जाना चाहिए कि प्रभाष जी जिन कामों को पूरा नहीं कर पाए, वह पूरा हो जाएगा। इन दोनों जगहों पर नहीं मौजूद रहने वाले बहुत सारे लोगों ने ब्लॉग या और किसी और माध्यम के जरिए प्रभाष जी को याद किया। सही मायने में कहें तो यही परीक्षा की द्घड़ी है। प्रभाष जी के शिष्य होने की बात तो बहुत सारे लोग कर रहे हैं। हर कोई उनकी बड़ाई कर रहा है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो कह रहे हैं कि प्रभाष जोशी ही उन्हें पत्राकारिता में लाए और आज वे जो कुछ भी हैं उनमें बड़ा योगदान प्रभाष जी का है। पर सवाल यह उठता है कि क्या ये सभी लोग प्रभाष जी के उन कामों को आगे बढ़ा पाएँगे, जिसे पूरा करने से पहले प्रभाष जी ने स्थूल शरीर को त्याग दिया। यह बात तो जगजाहिर है कि वे खबरों और विज्ञापन के द्घालमेल के खिलापफ अभियान चला रहे थे। इसके अलावा भी वे कुछ काम और करना चाह रहे थे। इस बारे में ४ नवंबर को उन्होंने के एन गोविंदाचार्य से चर्चा की थी। गोविंदाचार्य और प्रभाष जोशी बनारस से लखनऊ एक ही कार से आए थे और 'हिन्द स्वराज' पर आयोजित कार्यक्रम में दोनों ने भाषण दिया था। गोविंदाचार्य ने बताया कि उस सात द्घंटे की यात्राा में बहुत सी बातें हुईं और प्रभाष जी ने बताया कि और क्या-क्या करना उनकी योजना में है। पैसे लेकर खबर छापने के खिलापफ अपनी मुहिम को अंजाम तक पहुँचाने की योजना के अलावा उन्होंने गोविंद जी को बताया कि वे 'हिन्द स्वराज' पर एक किताब लिखना चाहते हैं। इसके अलावा उन्होंने बताया कि देशज शब्दों को भी हिन्दी की शब्दावली में जगह मिलना चाहिए और देशज शब्दों की भी एक शब्दावली तैयार होनी चाहिए। साथ ही वे लोक जीवन और लोक संस्कृति पर भी कुछ काम करना चाहते थे।

उनके दिमाग में अपनी किताबों को लेकर क्या विचार थे, वे तो उनके साथ ही चले गए लेकिन उनके दूसरे कामों को तो आगे बढ़ाया ही जा सकता है। उनके शिष्य होने का दावा करने वाले लोग या उनके प्रति श्र(ा रखने वाले लोगों को देशज शब्दों की शब्दावली तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। प्रभाष जी के लिए इससे बढ़कर श्र(ांजलि और क्या होगी कि उनके कामों को आगे बढ़ाया जाए। उनके जाने के बाद कुछ दिनों तक आँसू बहाया जाए और बड़े ही मार्मिक संस्मरण लिखे जाएँ लेकिन कुछ ही दिनों में उनके अधूरे कामों को भुला िदया जाए तो यह तो उनके साथ एक प्रकार का छल ही होगा।

प्रभाषजी के प्रति अपने मन में श्र(ा रखने वाले लोगों को उनके द्वारा स्थापित मूल्यों की रक्षा की दिशा में सोचना और कुछ करना चाहिए। ऐसा न करना प्रभाष जी के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने पत्राकारिता जगत को जो दिया है, उसे खो देना सही नहीं है। प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर प्रभाष जी से दीक्षा पाने वाले पत्राकारों की एक बड़ी संख्या है और इस बड़ी जमात पर प्रभाष जी द्वारा शुरू की गई लड़ाई को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। पैसे लेकर खबर छापने के खिलापफ जो मुहिम उन्होंने शुरू की थी, उसे एक अंजाम तक पहुँचाने की जिम्मेदारी इसी जमात पर है। बजाहिर, सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जो उनके सबसे करीब थे और उनकी इस लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे।

सितंबर के मध्य में जब प्रभाष जी से मेरी आखिरी मुलाकात उन्हीं के वसुंधरा वाले द्घर पर हुई थी तो उन्होंने विस्तार से अपनी इस लड़ाई के बारे में बताया था। उन्होंने बताया था कि पैसे लेकर खबर छापने की खबरिया संस्थानों की कुप्रथा के खिलापफ वे पाँच स्तर पर अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। पहला है प्रेस आयोग के सामने सारी बातों को रखना और प्रेस आयोग को जाँच के लिए कहना। उन्होंने बताया था कि इस मामले में प्रेस आयोग ने एक दो सदस्यीय समिति गठित कर दी है। इस दो सदस्यीय समिति को यह काम दिया गया है कि वह विज्ञापनों को खबर बनाकर छापने संबंधी शिकायत पर सारे साक्ष्य एकत्रा करें। उन्होंने बताया था कि जब यह समिति जरूरी साक्ष्य एकत्रा कर लेगी तो प्रेस आयोग एक बड़ी समिति गठित करेगी। यह बड़ी समिति इस पूरे मामले की जाँच करेगी।
प्रभाष जोशी इस बात को लेकर चुनाव आयोग के पास भी गए थे। वहाँ उन्हें बताया गया कि आयोग प्रेस के खिलापफ तो कोई कार्रवाई नहीं कर सकता लेकिन वह प्रत्याशियों के चुनावी खर्च की पड़ताल कर सकता है। प्रभाष जोशी ने कहा था कि अगर खबर छपवाने के बदले में दिए गए पैसे को प्रत्याशियों के चुनावी खर्च में जोड़ दिया जाए तो इनका खर्च तय सीमा को पार कर जाएगा। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग इन प्रत्याशियों के खिलापफ कार्रवाई कर सकेगा।

प्रभाष जोशी इस बात को मानते थे कि पैसे लेकर खबर छापने जैसे प्रेस के आचरण पर नियंत्राण के लिए देश में जरूरी कानून भी नहीं है। इसका पफायदा भी कई मीडिया संस्थान उठा रहे हैं। उन्हें लगता है कि कानूनी लचरता की वजह से वे कुछ भी करें लेकिन उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इसलिए प्रभाष जोशी कानून में पफेरबदल के लिए भी प्रयासरत थे। उन्होंने बताया था कि मीडिया द्वारा पैसे लेकर खबर छापना एक राजनीतिक मामला है और इसमें राजनीतिक लोगों की भागीदारी तो सुनिश्चित करनी होगी। इसके लिए वे कई सांसदों के संपर्क में थे और वे इस बात के लिए प्रयासरत थे कि कुछ नेता किसी सार्वजनिक मंच पर आकर यह कहें कि चुनाव में उनसे खबर छापने के बदले पैसे की माँग की गई। उन्होंने कहा था कि इतना हो जाने के बाद वे सांसदों से इस मसले को संसद में उठाने का अनुरोध करेंगे और कानून में पफेरबदल करवाने की कोशिश करेंगे। वे मानते थे कि बगैर कानूनी बदलाव किए प्रेस के इस अराजक रवैये पर काबू नहीं पाया जा सकता है। इतना होने के बाद वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर जाने की तैयारी कर रहे थे।

इसके अलावा पैसे लेकर खबर छापने के खिलापफ वे जन आंदोलन की जमीन तैयार करने में भी जुटे हुए थे। इसके लिए वे खूब भागदौड़ कर रहे थे। इसी भागदौड़ को उनकी सेहत अचानक बिगड़ने की एक बड़ी वजह बताया जा रहा है। वे अलग-अलग जगहों पर जा रहे थे और लोगों से मिल रहे थे। वे दिल्ली समेत राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड में कई भाषण इस मसले पर जनजागरण के लिए दे चुके थे। वे कई पत्राकारिता शिक्षण संस्थानों में भी गए थे और इस पूरे गोरखधंधे को उन्होंने पत्राकारिता में आने वाले नए विद्यार्थियों को बताया था। अपने अभियान के प्रति लोगों से मिल रही प्रतिक्रिया से वे बेहद उत्साहित थे। उन्हें यह बात और भी अच्छी लग रही थी कि उन्हें नई पीढ़ी की तरपफ से सबसे ज्यादा समर्थन मिल रहा है। उन्होंने कहा था कि माहौल तो ऐसा बनता जा रहा है कि पाठक खुद अखबारों के खिलापफ होते जा रहे हैं। प्रभाष जोशी यहीं से एक आंदोलन की शुरुआत की संभावना को देख रहे थे। एक ऐसा आंदोलन जिसमें खुद पाठक ही अपने अखबार के खिलापफ होगा।

पर दुर्भाग्य से प्रभाष जी इस आंदोलन के शुरू होने से पहले ही चले गए। अब इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन लोगों पर है जो खुद को उनकी परंपरा से जोड़ कर देखते हैं। इस लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाने की जिम्मेदारी उन लोगों की भी है जो प्रभाष जोशी के जीवन काल में उनकी इस लड़ाई में उनके साथ थे। जिन लोगों से मिल रही प्रतिक्रिया से प्रभाष जोशी बेहद उत्साहित थे उन लोगों को आगे आकर प्रभाषजी की मुहिम को चलाना होगा और पैसे लेकर खबर छापने की कुप्रथा को खत्म करना होगा। अच्छी बात यह है कि इस लड़ाई की जमीन और रास्ता प्रभाष जी खुद तैयार करके गए हैं। इसे अंजाम तक पहुँचाने के लिए बस साहस करने की जरूरत है। ऐसा करके ही प्रभाष जी को सच्ची श्र(ांजलि दी जा सकती है।

 
 
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