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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
व्यंग्य
शीला बिटिया का दहेज : प्रदीप पंत
  मुहल्ला नेता और 'मुहल्ला कल्याण समिति' के अध्यक्ष राजा बाबू धवल-उज्ज्वल खादी की पैंट-बुश्शर्ट में प्रातः काल पंत जी के द्वार पर आ खड़े हुए। होठों पर मुस्कान और हाथों में निमंत्राण-पत्रा।
''शीला बिटिया का विवाह है और आपको विवाहोत्सव में सपरिवार आना है।'' कहते हुए राजा बाबू ने निमंत्राण-पत्रा पंत जी की ओर बढ़ाया और यह भी स्मरण कराया कि शीला बिटिया आप की सुपुत्राी की क्लास पफैलो है। इसलिए समझ लीजिए कि यह डबल निमंत्राण है-उसकी ओर से भी और हमारी ओर से भी।
पंत जी ने विनम्रतापूर्वक कहा कि ''आपके परिवार में विवाह है तो चाहे जो हो जाए, चाहे जितना भी आवश्यक कार्य हो, हम पहुँचेंगे जरूर। आपकी

बिटिया हमारी बेटी के समान है।''
राजा बाबू हँसते हुए बोले, ''वादा तो आपने पहले भी दो बार किया था जब हमारी बड़की और मंझली की शादी हुई थी, पर आप आए नहीं।''
दरअसल जब राजा बाबू की बड़की और मंझली की शादी हुई थी, तब पंत जी सरकारी नौकरी में थे। छोटी-मोटी अपफसरी के कारण उन्हें लगता था कि सरकार उन्हीं के कंधों पर टिकी हुई है। इसलिए वह सुबह-सवेरे निकल जाते और शाम देर से लौटते। इस वजह से तब उनकी मुहल्ला नेता राजा बाबू से अधिक निकटता नहीं हो पाई थी और इसी कारण निमंत्राण को औपचारिकता मानते हुए बड़की और मंझली के विवाह में नहीं गए थे। लेकिन अब इस कारण का उल्लेख करने के बजाय उन्होंने राजा बाबू से कहा, ''यह महज संयोग था कि जिस दिन आपकी बड़की का विवाह था, ठीक उसी दिन हमारे ऑपिफस का एक साथी चल बसा और जिस दिन आपकी मंझली की शादी थी, उस दिन हमारे निकट के एक रिश्तेदार स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान कर गए।''
राजा बाबू ने टोका, ''इस बार किसी को मारिएगा मत-किसी दुश्मन को भी नहीं। कोई अन्य बहाना भी नहीं चलेगा।''
पंत जी ने स्पष्टीकरण दिया, ''एकदम सच कह रहे हैं हम। कोई बहाने नहीं बनाए थे। लेकिन पिफर भी आप उन्हें बहाने मान रहे हैं तो समझ लीजिए कि इस बार सचमुच कोई बहाना नहीं होगा, बिलकुल भी नहीं। अपने द्घर में किसी की मृत्यु हो जाए तो भी हम आएँगे, चाहे अर्थी किराए के लोगों से ही क्यों न उठवानी पड़े।''
''यह हुआ न वादा!'' पंत जी की ओर आत्मीयतापूर्वक हथेली बढ़ाते हुए राजा बाबू बोले, ''तो ध्यान रहे कि आप किसी भी कीमत पर वादे से मुकरेंगे नहीं, चाहे द्घर में सचमुच ही किसी की...''
''हाँ, चाहे द्घर में सचमुच ही किसी की...'' पंत जी ने दुहराया।
राजा बाबू हँसे।
पंत जी को भी हँसना पड़ा।
''तो अब चलें हम। औरों को भी निमंत्राण-पत्रा बांटने हैं न!'' राजा बाबू ने कहा और जाते-जाते रुककर बोले, ''ये ससुरी पॉलिटिक्स और समाज सेवा ची८ा ही ऐसी है कि संबंधों का दायरा पफैलता चला जाता है और खुशी के अवसरों पर सबको बुलाना पड़ता है, ताकि आगे भी संबंध और संपर्क बने रहें। और चूंकि आप लेखक हैं, इसलिए आपकी संगत से लेखकों और हिन्दी सेवियों से भी संबंध और संपर्क स्थापित हो गए हैं। सो उन्हें भी निमंत्रिात करना है।''
''सो तो है।'' पंत जी ने उद्गार प्रकट किए, हालांकि उन्हें ज्ञात था कि सिवा उनके किसी अन्य लेखक अथवा हिन्दी सेवी से राजा बाबू के संबंध अथवा संपर्क नहीं थे और यह भी कि राजनीति की दुनिया में भी वह कतई नहीं थे, सिवा मुहल्ला राजनीति के। हाँ, यह दीगर बात कि भविष्य में भले ही राजनीति में प्रवेश की उनकी इच्छा-आकांक्षा हो। स्वयं पंत जी उन्हें एकाध बार सीधे राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश करने का सुझाव दे चुके थे, जिसे उन्होंने यह कहकर खारिज कर दिया था कि 'अब हमें इतना तो ऊँचा चढ़ाइए मत कि हम सीधे जमीन पर धड़ाम से आकर गिरें और चारों खाने चित्त हो जाएँ।' बहरहाल शादी-विवाह के शुभ-अवसरों से पूर्व जो बात कही जाती है, उसे स्वयं पंत जी ने भी उनके सम्मुख दुहरा दिया कि 'हमारे लायक कोई कार्य हो तो बताइए।'
''कार्य बस इतना ही कि आपको शादी में सपरिवार सम्मिलित होना है।'' जाते-जाते राजा बाबू बोले, ''अच्छा, अब चलते हैं हम। विवाह के दिन ही अब आपसे भेंट होगी। नोट कर लीजिए हमारी चेतावनी कि आपको सपरिवार आना है।''
लेकिन शीला बिटिया की शादी के दिन और सो भी शाम के समय पंत जी को सचमुच एक रिश्तेदार के निधन का दुखद समाचार मिला। पंत जी ने मरने वाले को पहले मन ही मन भारी-भरकम गाली दी, पिफर पुचकारते हुए से कहा, ''तुझे भी आज ही मरना था क्या! एक-दो दिन बाद या पिफर एक-दो दिन पहले स्वर्ग या नर्क कहीं जाता। अगले दो दिन वैसे भी मरने वालों के लिए शुभ हैं। चैनल वाले ज्योतिषी जी बता रहे थे।''
पत्नी ने समझाया, ''मरने वाला मर गया। अब वह उठकर तो कहेगा नहीं कि मेरी अर्थी उठाने क्यों नहीं आए? पर शीला बिटिया के विवाह में नहीं गए तो राजा बाबू हमेशा के लिए नारा८ा हो जाएँगे। क्या पता दुश्मनी ही पाल लें। तुमने वादा भी किया है उनसे कि द्घर पर किसी की मृत्यु हो गई तो भी विवाह में सपरिवार शामिल होंगे। शुक्र मनाओ कि मेरी या किसी और की मृत्यु नहीं हुई। तेरहवीं के दिन शामिल हो लेंगे, द्घर का एक वक्त का खाना भी बचेगा, आज शीला बिटिया की शादी में शरीक होंगे।''
पंत जी बोले, ''गमी में अभी हो आता हूँ और उसके बाद शादी के समारोह में...''
''कैसी बात करते हो!'' पत्नी बोलीं, ''जिस दिन शादी जैसे उल्लासपूर्ण उत्सव में शामिल होना हो, उस दिन गमी वाले द्घर में नहीं जाते। शुभ और अशुभ दोनों एक साथ नहीं चलते।''
अंततः पंत जी ने एक आदर्श और आज्ञाकारी पति के नाते पत्नी की बात मान ली। कुछ देर आराम पफरमाने के बाद अपना इकलौता सूट पहना। बेटे और बेटी ने अपनी-अपनी पोशाकें पहनीं। पत्नी उस साड़ी में सज गईं जिसे धारण करके वह वर्षों पूर्व नववधू के रूप में पंत जी के द्घर आई थीं। लेकिन उन वर्षों को बीते इतना समय हो गया है कि पंत जी को यह भी याद नहीं रहता कि उनका विवाह कब हुआ था। विवाह की वर्षगाँठ की याद पत्नी ही दिलाया करतीं। खैर, तो पत्नी ने साड़ी-ब्लाउज वगैरह धारण कर चेहरे पर क्रीम-पाउडर भी लगा लिया। अब यह बात और कि इस क्रिया के परिणामस्वरूप उनके चेहरे का रंग कुछ, गर्दन का कुछ और न८ार आ रहा था। लगे हाथों उन्होंने होठों पर लिपिस्टिक भी पोत ली और मचलते हुए पूछा, ''कैसी लग रही हूँ?''
''बहुत सुंदर। स्वीट सिक्सटीन।'' पंत जी ने पूरी संजीदगी के साथ कहा।
''मजाक करते हो!'' वह बोलीं, ''ठीक नहीं लग रही हूँ तो जल्दी से पास के पार्लर में हो लूँ।''
पंत जी ने समझाया, ''जानती हो, दो महीने से किसी पत्रा-पत्रिाका से एक चैक नहीं आया। प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देते। यह उनकी सनातन परंपरा है। जितनी पेंशन मिलती है, वह तुम जानती ही हो। इसलिए पार्लर वगैरह का चक्कर छोड़ो। तुम सचमुच बहुत अच्छी लग रही हो!''
पत्नी खुश हो गईं।

पंत जी सपरिवार विवाह-स्थल पर पहुँचे। बिजलियों की झालरें झिलमिला रही थीं। लोग आकर कुर्सियों पर विराजमान होते जा रहे थे। बैरे ठंडा और गर्म सर्व कर रहे थे। बिसमिल्ला खां की शहनाई का टेप धाराप्रवाह बज रहा था। शीला बिटिया को जयमाला डालने के लिए उचित स्थान पर बैठाने का प्रबंध किया गया था। राजा बाबू ने पंत जी को देखा तो उनके पास पहुँच कर विनीत स्वर में अनुरोध किया, ''आप मुहल्ले के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आपकी इ८८ात से हमारी भी इ८८ात है। आपको सारे अनुष्ठान पूरे होने तक रुकना पड़ेगा। हम 'ना' नहीं सुनेंगे। यों भी शीला बिटिया आपकी बेटी की क्लासपफैलो है न!''
इस बीच पंत जी की बेटी शीला बिटिया के पास बतियाने के लिए जा चुकी थी।
पंत जी ने इस शुभ अवसर पर रिश्तेदारी में हुई मृत्यु के सच्चे किंतु अशुभ समाचार का उल्लेख किए बिना हँसते हुए कहा, ''जैसा आपका आदेश।''
राजा बाबू खुश हुए। पंत जी भी खुश हुए कि राजा बाबू ने उन्हें मुहल्ले का प्रतिष्ठित व्यक्ति कहा, हालांकि उनके दिल में चोट-सी भी लगी कि हिन्दी के एक 'महान लेखक' को वह मात्रा मुहल्ले का प्रतिष्ठित व्यक्ति बता रहे हैं। लेकिन पिफर आत्मनिरीक्षण करने पर उन्हें महसूस हुआ कि और तो कोई मानता नहीं, खुद हम ही अपने को 'महान लेखक' माने रहते हैं। पर इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। वह तो परंपरा को निबाह रहे थे। परंपरानुसार हिन्दी में हर लेखक अपने को 'महान' मानता है। बहरहाल राजा बाबू के उद्गारों से पंत जी की पत्नी प्रसन्न हुईं। वह बोलीं, ''लो, आज राजा बाबू ने तुम्हें प्रतिष्ठित द्घोषित कर दिया, जब कि हिन्दी का कोई आलोचक या पाठक तो तुम्हें लेखक तक नहीं मानता। कभी किसी चालू किस्म की आलोचना तक में तुम्हारी चर्चा नहीं होती, कोई पाठक तुम्हें पत्रा नहीं लिखता, साहित्यिक गोष्ठियों में तुम चूहे की तरह दुबके बैठे रहते हो। खुशी मनाओ कि राजा बाबू
ने...''
पंत जी ने उल्लास के इस अवसर पर पत्नी से बहस न करना ही उचित समझा। लेकिन मन ही मन उन्होंने संकल्प किया कि आइंदा किसी साहित्यिक गोष्ठी में पत्नी को कतई साथ नहीं ले जाएँगे। डाकद्घर से ढेर सारे पोस्टकार्ड खरीदकर उन पर अपने नाम पाठकों के पत्रा लिखेंगे और छद्म नाम से आलोचनाएँ लिखकर उनमें अपनी चर्चा ही नहीं, प्रशंसा भी करेंगे। हिन्दी में यह भी एक परंपरा है, जिसे एक स्वस्थ परंपरा कहना चाहिए।
तभी बारात धूम-धड़ाके के साथ स्वागत-द्वार पर आ पहुँची। आमंत्रिात अतिथि बेचैन-से मानो बारात के आने की ही प्रतीक्षा कर रहे थे। बाराती स्वागत-द्वार को पार कर शामियाने में पहुँचे और आमंत्रिात अतिथि बारातियों से भी पहले उस 'चील-झपट्टा भोजन' पर टूट पड़े जिसे नए जमाने में 'बुपफ़े' कहा जाता है। समां बंध गया। लगा, मानो क्रांति हो गई। बिसमिल्ला खां की शहनाई की स्वर-लहरी इस क्रांति के तुमुल-नाद में कहीं खो ही गई। यदि बिसमिल्ला खां इस धरा-धाम पर होते और चांदनी बिछे, गाव तकिए लगे दीवान पर बैठे शहनाई बजा रहे होते तो सिर पर से श्वेत बुर्राक टोपी उतार कर रहे-सहे बालों को नोंच डालते और लगातार सिर धुनते चले जाते।
लोग एक-दूसरे को धकियाते हुए प्रीतिभोज पर पिले पड़े। ऐसे में यह पता नहीं चल पा रहा था कि कौन बराती है और कौन राजा बाबू का आमंत्रिात अतिथि। पता तब चल रहा था जब प्रीतिभोज करने के बाद लोग श्र(ानुसार राजा बाबू को लिपफापफे भेंट कर अपने-अपने द्घरों की ओर प्रयाण कर रहे थे। राजा बाबू 'हें-हें' करते हुए या 'इसकी जरूरत क्या थी' कहते हुए लिपफापफे लेते जा रहे थे। सहसा महान लेखक-पत्राकार पंत जी को सधवा से विधवा और विधवा से कृशकाय होते-होते दिवंगत हो चुकी एक साप्ताहिक पत्रिाका के जीवित और भूतपूर्व किंतु अभूतपूर्व संपादक की बिटिया के विवाह का दृश्य स्मरण हो आया। जब कोई उनकी ओर 'शुभकामनाओं सहित' लिपफापफा बढ़ाता तो वह अपने मातहत के मापर्फ़त रिश्वत लेने वाले काइयाँ अपफसर की भांति विवाह-स्थल के एक कोने की ओर इशारा करते जहाँ बिजली की तेज रोशनी में मे८ा पर रजिस्टर खोलकर कुर्सी पर बैठा एक नया उभरता और क्रांति को समर्पित युवा कवि लिपफापफे देने वालों से लिपफापफे लेते हुए उन्हीं के सामने खोलता और रजिस्टर में नाम और रकम दर्ज करके लोगों से दस्तख़त भी करा लेता। यह नया कवि अभूतपूर्व संपादक की पत्रिाका में तब तक जमकर छपता रहा जब तक पत्रिाका ही काल-कवलित नहीं हो गई। पत्रिाका की मृत्यु पर नौकरी से हटाए गए संपादकीय विभाग के सदस्यों का कहना था कि संपादक जी द्वारा ऐसे कवि-लेखकों को प्रकाशित करने के कारण ही पत्रिाका का सर्कुलेशन इतना गिरा कि मालिकों को पत्रिाका बंद करने का निर्णय लेना पड़ा।
पंत जी ने इस रचनात्मक प्रकरण का स्मरण करते हुए राजा बाबू को भी इसी ढंग से 'शुभकामनाएँ' उपर्फ़ लिपफापफे लेने का सुझाव दे डाला। लेकिन राजा बाबू हँसते हुए बोले, ''पंत जी, आप नहीं जानते, हमारी इस राजनीति और समाज सेवा की दुनिया में चोर-उचक्के और उठाईगीर भरे पड़े हैं। जिसे भी जिम्मेदारी सौंपेंगे, वह आधे नाम लिखेगा और शेष आधों की 'शुभकामनाएँ' और 'आशीर्वाद' नए नोटों सहित अपनी जेब में डालकर तिड़ी हो जाएगा। उन आधों को हम बिना वजह गरियाएँगे कि ससुरे आकर खा-पी गए और शकुन के नाम पर एक धेला भी नहीं पकड़ाया।''
पंत जी चुप हो गए और विवाह के अनुष्ठान देखने की प्रतीक्षा करने लगे।
राजा बाबू बोले, ''अभी कार्यक्रम शुरू होने में देरी है। तब तक आप भी सपरिवार डिनर ले लीजिए।''
पंत जी ने पत्नी की ओर देखा। पुत्रा को निहारा। पुत्राी शीला बिटिया के पास से लौट आई थी, सो उसकी ओर भी दृष्टिपात किया। सबने सहमति प्रकट की और देखते-देखते सभी यु(-भूमि में कूद पड़े। कुछ देर में सपफलता प्राप्त हुई तो सभी ने अपनी-अपनी प्लेट में भांति-भांति के व्यंजन डाले, जो कुछ ही क्षणों में परस्पर गड्ड-मड्ड होकर एक नई 'डिश' में परिवर्तित हो गए। इत्मीनान से सभी ने नई 'डिश' को निबटाया। बेटे-बेटी ने तो मिष्ठान लिया ही, पंत जी और उनकी पत्नी ने भी अपने-अपने डायबिटी८ा की परवाह न करते हुए मिष्ठान का आनन्द लिया। उनके मुख-मंडल पर तृप्ति का भाव न८ार आ रहा था।
कुछ ही देर में विवाह-अनुष्ठान आरंभ हो गया। अति संक्षेप में यह कि पंडित जी ने मंत्राोच्चार किया और पिफर ऊँचे मंच पर शीला बिटिया ने दूल्हे के गले में जयमाला डाल दी।
राजा बाबू ने धीरे से पंत जी के कान में कहा, ''हमने ज्यादा टीप-टाप नहीं किया है। आदर्श विवाह कर रहे हैं हम। राजनीति और समाजसेवा से जुड़े लोगों को दूसरों के सामने मिसाल कायम करनी चाहिए।''
''जी हाँ, जी हाँ! सो तो है ही।'' पंत जी बोले।
राजा बाबू के हाथ में दो पफाइलें थीं। उन्हें दिखाते हुए राजा बाबू ने पंत जी को सूचना दी, ''हम लड़के को कोई दहेज नहीं दे रहे, सिवा इन दो पफाइलों के।''
पंत जी चौंके, ''पफाइलें?''
''हम जानते थे, आप चौंकेंगे।'' राजा बाबू ने कहा।
''इन पफाइलों में शीला बिटिया या दामाद के नाम पिफक्स्ड डिपॉजिट के सार्टिपिफकेट हैं क्या?''
''अरे भाई, हम इतने संपन्न कहाँ कि पिफक्स डिपाजिट रख सकें।'' राजा बाबू हँसे। पिफर कुछ देर बाद शु( दार्शनिक भाव से उन्होंने कहा, ''यों भी हम पिफक्स-विक्स में यकीन नहीं करते। जब ससुरी इस दुनिया में ही कुछ पिफक्स नहीं, सब कुछ एकदम अस्थायी है तो स्थायी का भला क्या काम?''
''हाँ, सो तो है। सो तो है।'' पंत जी ने हाँ में हाँ मिलाई।
राजा बाबू ने इस बीच रहस्य-सा खोलते हुए दोनों पफाइलें खोल डालीं। पहली पफाइल में सबसे ऊपर लगे खूबसूरत आर्ट पेपर पर बड़े अक्षरों में छपा था-''माताश्री रुक्मिणी देवी विकलांग कल्याण संस्थान।'' दूसरी में इसी तरह आर्ट पेपर पर लिखा था-''माताश्री रुक्मिणी देवी बाल कल्याण संद्घ।''
पंत जी उजबक से राजा बाबू की ओर देखने लगे जो होठों पर पफैली भोली-सी मुस्कान को समेटते हुए बोले, ''रुक्मिणी देवी हमारी श्र(ेय माता जी थीं। उनका मन विकलांगों और बालक-बालिकाओं के कल्याण की भावना से ओतप्रोत था। उन्हीं की स्मृति में हमने बनाई हैं ये दो कल्याणकारी संस्थाएँ। सरकार दोनों के लिए पाँच-पाँच लाख रुपए सालाना अनुदान देती है। हमने सोचा, क्यों न शीला बिटिया के पति, अपने दामाद को ये संस्थाएँ भेंट कर दी जाएँ। दस लाख रुपये साल की आमदनी होती रहेगी।''
''आमदनी ही होगी या विकलांगों और बच्चों का कल्याण भी होगा?'' पंत जी ने चिंतित भाव से पूछा।
''देखिए पंत जी, आपके इस कठिन प्रश्न का उत्तर तो वे सरकारी अधिकारी ही दे सकते हैं जो हमें अनुदान प्रदान करते हैं।'' राजा बाबू हँसते हुए बोले, ''खैर, छोड़िए यह सब इस समय। यों भी आप इतने विस्तार में जाकर क्या कीजिएगा भला!''
पंत जी ने अगला प्रश्न कर दिया, ''संस्थाओं के कार्यालय कहाँ हैं?''
''यह जानकारी आपको डाकद्घर वाले देंगे, क्योंकि दान-अनुदान के चैक और चिट्ठी आदि डाकिया ही लाता है।'' राजा बाबू ने कहा और पिफर दुहरा दिया, ''छोड़िए भी यह सब। आप अपने आदमी हैं, इसलिए बता दिया आपको। हमने स्वयंसेवी संस्थाएँ बनाकर स्थायी रूप से अपनी पॉकेट में रखने के बजाय दामाद को दे डालने का निश्चय किया, यही क्या कम कल्याणकारी कार्य है!''
और इतना कहने के कुछ देर बाद उन्होंने मानो 'ओम्‌ भूर्वाय नमः' कहते हुए दोनों पफाइलें दामाद की ओर बढ़ा दीं, यह बताते हुए कि इनमें सरकारी अनुदान की पहली किस्त के ड्राफ्रट भी हैं जिन्हें बैंक में जमा करा डालना। पिफर आसपास चहचहाती अपनी बड़की और मंझली की ओर इशारा करते हुए पंत जी से बोले, ''जब इन दो का विवाह किया था तो हम इनके पतियों को एक-एक ही संस्था उपहार-स्वरूप दे पाए थे। तब हमारे पास संस्थाओं की शॉर्टेज थी। बड़की को अपने दादाश्री और मझली को दादीश्री की स्मृति में बनाई हुई संस्थाएँ दी थीं। आजकल हमारे पास संस्थाओं की कमी नहीं है। अब भी चार-छह हैं। आजकल की पफैशनपरस्त 'सोशल एक्टिविस्ट' पीढ़ी इन्हें 'एन.जी.ओ.' कहती है। हम पुराने वक्त के लोग इन्हें 'स्वयंसेवी संस्थाएँ' कहते हैं। सभी सरकार से अनुदानित। कोई विधवा-कल्याण के प्रति अर्पित है, कोई कुष्ठ रोगियों, बेसहारा बूढ़ों, बेरोजगार युवाओं आदि के प्रति समर्पित है। इन संस्थाओं में से कुछ बेटे को सौंप देंगे, कुछ आने वाली बहू को। दुनियादारी बहुत कर ली, अब तो बस भगवान भजन करेंगे। कहिए, कैसा है आइडिया?''
''अति उत्तम!'' कहते हुए पंत जी ने जानना चाहा कि इन स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारी कौन हैं?
राजा बाबू ने पहले ठहाका लगाया, पिफर बोले, ''इन संस्थाओं को हमने 'मुहल्ला कल्याण समिति' की भांति पब्लिक लिमिटेड नहीं प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसा बना के रखा है। ऐसे काम प्राइवेटली ही किए जाते हैं।''

पंत जी शीला बिटिया के विवाह से लौटकर पलंग पर लेटे तो पत्नी ने कहा, ''बेटी जवान हो गई है। दहेज के लिए तुम्हारे पास पैसा नहीं है। तुम भी राजा बाबू की भांति दो-चार स्वयंसेवी संस्थाएँ क्यों नहीं बना लेते!''
''तो तुम्हें भी अब यह आइडिया सूझ गया!'' पंतजी ने तनिक तल्ख़ अंदा८ा में कहा और सोने की कोशिश करने लगे।
''क्यों, गलत क्या है इसमें?'' पत्नी बोलीं।
पंतजी झुंझलाए, ''तुम्हें मालूम है न, हमने किसलिए सरकारी सेवा से स्वेच्छा से अवकाश ग्रहण किया था? इसलिए कि अपनी लेखकीय प्रतिभा के सहारे कलम की नोक से व्यवस्था से टक्कर लेंगे।''
''मालूम है। लेकिन अब तक तो तुम्हें व्यवस्था से छोटी-मोटी मुठभेड़ करते भी नहीं देखा।'' पत्नी ने कहा और कुछ ही देर में वह खर्राटे लेने लगीं।

 
 
 
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