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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
लेख
एमिल जोला : हिंसा की सशक्त... : विजय शर्मा
 

हम हिंसा की बात मनुष्य की पशु प्रकृति या उसकी पशुता के सन्दर्भ में करते हैं। वास्तव में क्रूरता मानव की प्रकृति है। हिंसा का क्रूरतम व्यवहार केवल मनुष्य में मिलता है। प्रकृति में कहीं और इसकी मिसाल नहीं मिलती। आज पृथ्वी पर उत्पन्न जीवों में हम क्रूरतम प्राणी हैं।'' -एंथनी स्टोर, ह्यूमन एग्रेशन

हिंसा मनुष्य का स्वभाव है, हिंसा करने में उसे बड़ा सकून मिलता है. मार-धाड़, लड़ाई-झगड़े में बड़ी उत्तेजना है। मनुष्य का इतिहास लड़ाइयों की लम्बी दास्तान है। लड़ाई ;यहाँ हिंसा का पर्याय हैद्ध बहुत प्रकार की होती है। दो राष्ट्रों के बीच ;सीमा विवादद्ध, दो शासकों के बीच ;अहम का टकरावद्ध, दो राज्यों के बीच ;पढ़ा था पानी पर लकीर नहीं खिंचती पर पानी का बँटवारा तो हो ही सकता हैद्ध, दो परिवारों के बीच पुश्तैनी लड़ाई, दो आदमियों के बीच। आप सोच रहे होंगे भला औरतों को क्यों छोड़ दिया। छोड़ा नहीं गया है। लड़ाई दो औरतों के बीच भी हो सकती है या यूँ कहें कि होती है और होती रहेगी।
यह जगजाहिर है कि लड़ाई जर, जमीन या जोरू के लिए होती है। यह तो हुई पुरुषों की बात। परंतु स्त्राी क्यों हिंसा पर उतारू हो जाती है ?

एक शोध के अनुसार मौखिक और शारीरिक हिंसा को उकसाने वाला स्त्राी व्यवहार दुनिया के सब स्थानों पर मिलता है। इसी शोध के अनुसार स्त्राी की आक्रामकता सर्वाधिक दूसरी स्त्राी के प्रति ही पाई जाती है. अक्सर यह आक्रामकता बहुत कम नुकसान करने वाली होती है। सौत तथा जो भी स्त्राी और उसके पति के बीच आता है उसका निशाना बनता है। इसी मनोवैज्ञानिक ग्रंथी के कारण वह अपनी सास, ननद, बेटी के प्रति भी वाचिक और शारीरिक रूप से हिंसक हो जाती है। पुरुषों में पति ही उसकी आक्रमकता ज्यादा झेलता है। स्त्राी आक्रामकता अक्सर पुरुष या पुरुष के स्थानापन्न उत्पाद्य के प्रति होती है, लेकिन कई बार यह स्व-रक्षा या अपनी संतान की रक्षा के लिए भी प्रकट होती है, जैसे तुरंत की ब्याई शेरनी या कुतिया का व्यवहार।

लड़ाई के लिए कम से कम दो का होना एक लाजमी शर्त है, परमावाश्यक है दो का होना। 'यु( गली अति चौड़ी जा में दो-दो समाय।' यह गली कोई प्रेम गली तो है नहीं, जो संकरी हो और जिसमें दो समा नहीं सकते हैं। यु( की गली बहुत चौड़ी होती है और सुरसा के मुँह की भाँति पफैलती ही जाती है। जिसमें शुरुआत तो दो से होती है पर यह अपने में सारे संसार को समा सकती है। यहीं पर 'वसुधैव कुटुम्बकम' यथार्थ में चरितार्थ होता है। पिछली सदी में हुए दो-दो विश्व महायु( इसके उदाहरण हैं।
भाँति-भाँति की हिंसा का इ८ााद आदमी करता है। इसीलिए तरह-तरह की लड़ाइयाँ होती हैं। महाभारत काल में आमने-सामने लड़ा जाने वाला धर्म ;!द्ध यु(। आजकल का स्कड मिसाइल वाला यु( जिसमें एक पार्टी वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर बटन दबाती है। मिसाइलें हवा में उड़ती हैं और विरोधी सैनिकों के साथ-साथ नागरिक भी धराशायी हो जाते हैं। एक एटम बम गिरता है और पीढ़ियाँ अपाहिज हो जाती हैं। गोरिल्ला और शीत यु( कभी न समाप्त होने वाली लड़ाइयाँ हैं जिससे आज सारी दुनिया त्रास्त है।

मनुष्य को हिंसा इतनी प्रिय है कि जब वह खुद नहीं लड़ रहा होता है तो समय बिताने के लिए दूसरों को लड़ा रहा होता है। दूसरों को लड़ाकर तमाशा देखने में जो मजा है वह शायद स्वयं लड़ने में नहीं है। द्घर में सास पति-पत्नी को लड़ा कर मजा लूटती है। सास-बहू की लड़ाई में पड़ोसियों को रस मिलता है। पड़ोसियों की लड़ाई में मोहल्ला चटखारा लेता है। दूसरों की लड़ाई की आग में द्घी डालने में बड़ा आनन्द है। दंगल देखने के लिए मेले लगते हैं। ऐसा न होता तो डब्ल्यू डब्ल्यू एपफ को बच्चा-बच्चा कैसे जानता? मल्ल यु( और द्वंद्व यु( लड़ाइयों के बड़े प्राचीनतम रूप हैं। अमीर-गरीब सबको लड़ाई बड़ी प्रिय होती है। यहाँ पूर्ण साम्यवाद है। गरीब की तो सारी जिन्दगी लड़ते बीतती है। हाँ! समृ(किाल में जब उसके पास खूब समय होता है तो अवकाश के क्षण का मनोरंजन है मुर्गा लड़ाई, कबूतरबाजी, भेंड़ा भिड़ाना और कुछ नहीं तो आ बैल मुझे मार। लाल कपड़ा दिखा कर सांड को लड़ने के लिए उकसाना। भले ही सांड कलर ब्लाइंड क्यों न हो। साँप और नेवले की लड़ाई, कुत्ते, बिल्ली की लड़ाई और दो बिल्लियों की लड़ाई में बन्दरबाँट और बन्दर के पौ बारह होने की बात आपने देखी भले न हो सुनी अवश्य होगी। साहित्य में जेम्स मिशिनर के 'सैन्टिनियल' में गरुड और साँप की लडाई का वर्णन अप्रतिम है।

भूमिका कापफी लम्बी होती जा रही है। हाँ तो जनाब साहेबान बात हो रही है यु( की, लड़ाई की। साहेबान, कद्रदान दिल थाम कर बैठिए और एक लड़ाई की बानगी देखिए जिसकी रनिंग कमेंटरी ांस के प्रसि( लेखक एमिल जोला ;१८४०-१९०२द्ध ने अपने उपन्यास 'लसामोर में दी है। ऐसा खाका खींचा है शब्दों के द्वियामी वर्णन का कि बहुआयामी जीती-जागती तस्वीर पाठक के सामने खड़ी हो जाती है। लड़ाई के चश्मदीद गवाह तो उसका चटखारा लेते ही हैं, साथ में पढ़ने वाले को भी यह लड़ाई कभी नहीं भूलेगी। उन्होंने न तो मुर्गा लड़ाई, न कबूतर लड़ाई और न ही भेंड़ा लड़ाई का चित्राण किया है। न ही यह वर्णन दो पुरुषों का जोर आजमाइश की है और न ही स्त्राी-पुरुष के बीच चलने वाला गुरिल्ला यु( है। जनाब यह दो स्त्रिायों की विशु( लड़ाई है जिसका आनन्द आप भी उठाएँ।

जैसे कि अमूमन हर लड़ाई की शुरुआत बहस-बकवास से होती है। इस लड़ाई की शुरुआत भी होती है वाकयु( से जो शीद्घ्र ही हाथापाई में परिवर्तित हो, गुत्थमगुत्था हो, लहूलुहान होने लगती है। कदाचित आपने ऐसी लड़ाई में हिस्सा लिया हो। इसे भोगा हो। यदि आपको इसमें प्रत्यक्ष भाग लेने का अवसर न मिला हो तो कम-से-कम इसके साक्षी तो अवश्य बने होंगे। क्या कहा यह सौभाग्य भी आपको नहीं प्राप्त हुआ है, तब तो आपको 'लसामोर' के कम-से-कम आठ पन्ने अवश्य पढ़ने चाहिए। साहित्य में दो औरतों की लड़ाई का ऐसा वर्णन दुर्लभ है।

एमिल जोला ने सैंतीस वर्ष की उम्र में १८७७ में 'लसामोर' लिखा। इस उपन्यास में जोला ने पेरिस के निचले तबके के जीवन का बड़ा वीभत्स और निर्मम खाका खींचा है। यह एक धोबन ग्रेबा के सम्मानपूर्वक जीने की छोटी-सी लालसा की कथा है। वह अपनी अस्मिता कायम रखना चाहती है। इसका हठ करती है। यह उसके संद्घर्ष की भयावह कथा है। इस लंगड़ी धोबन ग्रेबा को विश्वास है कि एक दिन उसकी अपनी लांड्री की दुकान होगी। पर दुकान दुःस्वप्न की भाँति हर बार उसके हाथ में आते-आते पिफसल जाती है। उसका दुर्भाग्य है कि उसे अपना और अपने दो नाजायज बच्चों का पेट भी पालना है। खुदा की मार। गरीबी में आटा गीला। एक पियक्कड़ पति और जोंक की तरह चिपटे, खून चूसते अपने पूर्व प्रेमी की देखभाल का बोझ भी उसे ही उठाना पड़ता है।

गरीबी पर ऐसा तिलमिला देने वाला साहित्य विश्व साहित्य में दुर्लभ है। पतन की इन्तहाँ तब हो जाती है जब जोला लिखता है कि यदि छत और दीवालों के जाले बिकते होते तो वे उसे भी बेचकर पी जाते। हेनरी जेम्स के अनुसार 'लसामोर' मनुष्य की प्रकृति है। पर वह प्रकृति नहीं जो उसे सुसंस्कृत, उच्च और सम्पन्न बनाती है। यह उसकी सहज प्रकृति की इमेज है। निम्नतर और निम्नतर। उच्चतर संद्घर्ष करता है जैसा कि वह कर सकता है प्रकाश और मुक्तवायु के लिए और निम्नतर उसे खींच कर गुलाम बनाता है। अंधकार, अज्ञान और गरीबी का। कथा का अंत आदर्शवादी उपन्यासों की भाँति सुखद नहीं है। यथार्थवादी साहित्य के शीर्ष पर स्थापित 'लसामोर' 'रोगन मेकार्ट सीरीज, की एक कड़ी है। शून्यवाद का प्रतिवादन करने वाले इस उपन्यास का अंत बड़े मार्मिक, बड़े कारुणिक तरीके से होता है। उपन्यास का अंत इसकी नायिका का यथार्थ से टकराव और पफलस्वरूप उसके पियक्कड़ बन कर अनैतिकता के गर्त में गिरने से होता है।

खैर यहाँ मेरा उद्देश्य उपन्यास की कथा सुनना-सुनाना नहीं है। चलिए, इस लेख के विषय सूत्रा को पुनः पकडें। जोला की नायिका ग्रेबा अपना सब कुछ गिरवी रख कर पति को खुश रखने की चेष्टा कर रही है। वह कपडे़ धोने द्घाट पर आई है। वहाँ औरतें खुसुर-पुसुर कर रही थीं कि तभी उसके बच्चे वहाँ आकर उसे बताते हैं कि उनका पिता अपना सामान लेकर चला गया है और द्घर की चाभी बच्चों को ग्रेबा तक पहुँचाने का आदेश भी दे गया है। पहले तो वह जड़ हो जाती है। उसे बात ही समझ में नहीं आती है पर धीरे-धीरे सच्चाई का एहसास उसे होता है और वह रोना शुरू कर देती है। पर जल्द ही उसे खुसुर-पुसुर करती औरतों में वह भी दीखती है जिसके संग उसका पति भाग कर रह रहा है. आगे आठ पन्नों में चलने वाली ग्रेबा और वर्जिनिया की लड़ाई जोला के शब्दों में ही पढें़।

'चेहरे से हाथ हटा कर ग्रेबा ने अपने आस-पास देखा। सामने वर्जिनिया को तीन-चार औरतों के साथ अपनी ओर कनखियों से देखते देखकर मानो उस पर पागलपन का दौरा पड़ गया। वह आँखें धरती पर गड़ाए हुए कुछ खोजती हुई दोनों बाँहें पफैला कर लड़खड़ाई हुई आगे बढ़ी। उसका शरीर वश में नहीं था अंग-अंग काँप रहा था। उसे पानी भरी बाल्टी मिल गई। उसने वही दोनों हाथों से कसकर पकड़कर उठा ली और पूरा जोर लगाकर पानी वर्जिनिया पर पफेंक दिया, पिफर चीखी, 'जाओ, चली जाओ, कुतिया! मेरी आँखों से दूर हो जाओ!' 'ओह! तू कुतिया!' लम्बी लड़की ने बार-बार दोहराया, 'क्या हो गया है इसे ? क्या पागल हो गई है ?

ग्रेबा खड़ी रही। उसका चेहरा विकृत हो गया था पर कुछ बोली नहीं। अभी वह पेरिस की भाषा में रची-बसी नहीं थी पर दूसरी बोलती गई। 'चली जा यहाँ से कहाँ से आ गई यह गाँव की छोकरी। पुआल में लोट-लोट कर ऊब गई थी। बारह बरस की उम्र से ही सिपाहियों के बिस्तर गरम कर रही है। बिचारी ने एक पैर भी देश सेवा में दे दिया। बेचारी का पैर। भीड़ में हँसी की लहर दौड़ गई। इसी बीच वर्जिनिया भीड को अपने संग पा दो कदम आगे बढ़ आई। अपने लम्बे कद को और बढ़ाते हुए चिल्लाई, 'हुँह! ठिकाने लगा दूँगी हमें यहाँ तंग न करो। कौन है यह डेढ़ पसली वाली? मैं तो इसे जानती तक नहीं। अगर इसने मुझे छुआ होता तो स्कर्ट उद्घाड़ कर ऐसी धुलाई करती कि याद रखती और तुम लोगों को भी मुफ्रत का तमाशा देखने को मिल जाता। बोलती क्यूँ नहीं! कहती क्यूँ नहीं बददिमाग! क्या बिगाड़ा है मैंने तेरा। बहुत बड़-बड़ कर रही है।' ग्रेबा हकलाने लगी। 'तुम सब जानती हो। रात मेरे आदमी को देखा है।' 'बन्द कर अपना मुँह नहीं तो गला दबा दूँगी। इसका आदमी हाय यह तो मजेदार बात है। लेडी का खसम। लँगडियों के भी खसम होते हैं। अगर वो तुझे छोड़ गया तो मेरी क्या गलती।

कहीं तू यह तो नहीं सोच रही कि मैंने ही उसे चुराया है। लेगी मेरी नंगा झोरी? वह तो मेरी मुरी में ही द्घुसा है। कह तो निकाल दूँ। पर तूने ही उस बेचारे का जीना हराम कर रखा है। बेचारा भला आदमी कहाँ से ले आई थी पट्टे पर। अरे यहाँ किसी को इस बेचारी का आदमी मिले तो ला देना। ईनाम मिलेगा।'
वर्जिनिया ने ग्रेबा की दुखती रग छू दी थी। भीड़ में पिफर हँसी की लहर दौड़ गई। ग्रेबा को विश्वास हो गया कि इसी की बहन के साथ भागा है लेंटियर। बुदबुदाई 'चबा जाऊँगी तेरी बहन को।' 'हाँ, हाँ मेरी बहन है, उसमें क्लास है, वो तेरी जैसी द्घटिया औरत नहीं है। पर मुझसे क्यों लड़ती है? यहाँ तो कोई चैन से कपड़े भी नहीं धो सकता है।' पर वर्जिनिया ही बार-बार व्यंग्य करती रही लौट-लौट कर कटाक्ष करती रही 'हाँ मेरी बहन ने चुराया है तेरा सनम। अब तो चैन पड़ गया। तू देखती वे कैसे बिस्तर में द्घुसे हुए थे एक दूसरे में समाए हुए। इसीलिए तो वह तुझे इन हरामियों के साथ छोड़ गया है। कैसे प्यारे-प्यारे हरामी के पिल्ले हैं। ये तुझे तेरे उसी यार से मिले हैं न? तीनों को तू वहीं मरने छोड़ आई। ठीक भी है, कितनों को लादकर शहर लाती? अरे यह सब तेरे उसी खसम लेंटियर ने बताया है। चूस चुका है तुझे वह। अब क्या बचा है चाटने को। कुतिया।'

ग्रेबा पर पिफर दौरा पड़ गया। इस बार उसके हाथ एक नील भरी बाल्टी लगी और उसने वही वर्जिनिया के मुँह पर खींच मारी। नील में नहाई हुई वर्जिनिया चीखी 'ठहर तो रंडी। और जो गालियों की बौछार शुरू हुई वह बाल्टी भर-भर कर एक-दूसरे पर पानी पफेंकने से और भी रपटन भरी हो गई। वे पानी पफेंकती जातीं और चीखती जातीं 'ये ले मलेच्छ इससे तेरी सारी जवानी ठंडी हो जाएगी!
'ले धो ले सारी गन्दगी, जिन्दगी भर पिफर कभी मुँह न धोना पड़ेगा!
'ले यह तेरी जवानी धोने को!
'ले यह तेरी काया धोने को!
'ले यह यार के पास तेरे जाने के पहले दाँत चमकाने को!

इसी बीच वर्जिनिया ने गरम पानी से भरी एक बाल्टी उठा कर ग्रेबा पर पफेंक दी। तमाशबीन सिहर कर पीछे हट गए, कुछ बीच-बचाव करने लगे। पर कौन मानता। इस बीच लपककर दोनों ने एक दूसरे का गला पकड़ लिया। बाल पकड़ लिए। झोंटा ऐसे खींचा मानो खोपड़ी के सारे बाल उखड़ आएँगे। दोनों चीखना बन्द कर अपनी सारी शक्ति से एक दूसरे को नोचने-खसोटने लगीं। ब्लाउज पफट गया। स्कर्ट शमीज की सीवन उधड़ गई। दोनों भूखी बिल्ली की तरह गुंथी हुई थीं। पर वह हिंसा ही क्या जिसमें खून न निकले। दोनों एक दूसरे के खून की प्यासी थीं और आखिरकार ग्रेबा को गाल से गले तक खरौंच डाला वर्जिनिया ने। खून देखते ही ग्रेबा पर खून सवार हो गया। उसने वर्जिनिया की कान की बाली के साथ उसके कान की लौ भी नोंच डाली।

'मार डालेंगी ये एक दूसरे को। अरे! कोई इन्हें अलग करो।' भीड़ में से कोई चिल्लाया। खून देखकर तमाशबीनों के दो दल हो गए। एक दल लड़ाई रोकना चाहता था, दूसरे दल को इस दरिन्दगी में बड़ा मजा आ रहा था। उनकी हिंसक वृति को बड़ा सकून मिल रहा था।
चलिए जरा हम देखें कि इन दो औरतों की लड़ाई में पुरुष दर्शक क्या कर रहे थे? चार्ल्स कतार में हाथ बाँधे खड़ा था। उसकी आँखों में जवान माँस को देख कर वहशी चमक जाग उठी थी। वह हँस रहा था। मजे ले रहा था। उसे यह जान कर बड़ा मजा आया कि एक की बाँह के नीचे जनम का लक्षण है। उसे इंतजार था कि कब शमीज और पफटे और वह अपनी आँखें सेंक सके। उसे विश्वास था कि लहू बहेगा तो दोनों खुद ही थोडी देर में ठंडी पड जाएँगी। पर वह बीच-बचाव करके अपना मजा किरकिरा नहीं करना चाहता था।

द्घाट की मालकिन बदनामी के डर से पुलिस नहीं बुलाना चाह रही थी। धोबिनें अभी भी लड़ रही थीं। वर्जिनिया ने कपड़े धोने की थापी उठा ली थी, पर ग्रेबा पर भी भूत सवार था। इस बार उसका पलड़ा भारी था। उसने भी पीटना उठा लिया। वह वर्जिनिया को गिराकर उस पर सवार हो गई। उसने पीछे से उसका कपड़ा उठा दिया और जैसे पीट-पीट कर कपड़ा धोती थी वह बडे़ सधे हाथों से बड़े लयब( तरीके से वर्जिनिया की नंगी जाँद्घों और पीछे के नंगे हिस्से की धुलाई करने लगी। कठोर लकड़ी की थापी माँस में अपने निशाने बनाने लगी और चार्ल्स की आँखें भय से विस्पफारित हो गईं। चारों ओर से 'बस करो। बस करो' की गुहार मच गई। पर ग्रेबा छोड़ना नहीं चाहती थी। वह वर्जिनिया के शरीर का एक-एक इंच कूट डालना चाहती थी। उस पर हिंसा सवार थी। वह होश में न थी। जल्दी ही वह पीटने के साथ वो गीत गाने लगी जो वह अपने गाँव में कपड़े धोते समय दूसरी लड़कियों के साथ मिलकर गाया करती थी। गीत-संगीत आदमी के मन में समाया होता है। वह दुःख-सुख सब में लय का प्रयोग करता है। यह भी एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि व्यक्ति जब दुःख, अपमान, पीड़ा की पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है तो उसका मस्तिष्क संज्ञान खो बैठता है, लेकिन लय नहीं खोता है। भले ही समाज उसकी लय को न जाने, न समझे। ग्रेबा इसी अवस्था में पहुँच चुकी है। उसे किसी बात का होश नहीं है। एक तरह से वह रिग्रेशन की अवस्था में है।

हिंसा का ऐसा सजीव वर्णन, लड़ाई का ऐसा अक्षरशः दृश्य वर्णन साहित्य में शायद ही दूसरा मिले। ग्रेबा और वर्जिनिया की लड़ाई का अंत कहाँ और कैसे हुआ? इसके बाद ग्रेबा का क्या हुआ? ये बताना इस लेख का विषय नहीं है। ेंच और पिफर इंग्लिश से हिन्दी तक आते-आते लड़ाई कुछ ठंडी भी पड़ जाती है. अतः लड़ाई का भरपूर आनन्द उठाने के लिए एमिल जोला का 'लसामोर' पढ़ना ही ज्यादा मजेदार होगा। साहित्य में स्त्राी पर हिंसा और स्त्राी द्वारा हिंसा के चित्राण के लिए आज टोनी मॉरीसन तथा एल्ेड जेलिनिक का नाम अग्रणी है। मगर आज से कापफी पहले साहित्य में स्त्राी आक्रामकता का बड़ा सशक्त चित्राण जोला ने किया है।
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१५१ न्यू बाराद्वारी, जमशेदपुर-८३१ ००१
मो. ०९४३०३८१७१८

 
 
 
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