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दिसम्बर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
विशेष
गरीबों के मसीहा थे लियो तोल्स्तॉय : रूपसिंह चन्देल
  लियो निकोलाएविच तोल्स्तॉय के अंतिम और अप्रतिम उपन्यास 'हाजी मुराद' का अनुवाद करते समय न केवल उस महान लेखक के विषय में अधिकाधिक जानने बल्कि उनके पढ़े हुए साहित्य को पुनः पढ़ने की इच्छा जागृत हुई। उनका बहुत कुछ ऐसा था जो तब तक पढ़ा नहीं था उसे भी खोजा। इसी प्रक्रिया में 'हेनरी ट्रायट'ᅠऔर 'विक्टर श्लोव्स्की' की जीवनियाँ और उनकी पत्नी सोपिफया अन्द्रेएव्ना की डायरी भी पढ़ी। दोनों जीवनीकारों ने उनके रिश्तेदारों, मित्राों, सहयोगियों, लेखकों, कलाकारों आदि के संस्मरणों को अपनी जीवनियों में अनेकशः उ(ृत किया है। इससे उन संस्मरणों को मूल में पढ़ने की इच्छा हुई और तब खोज प्रारंभ हुई उन संस्मरणों की। इन संस्मरणों से गुजरते हुए लियो के जीवन के अनेक अज्ञात पहलू मेरे समक्ष उद्द्घाटित हुए।ᅠमैंने अनुभव किया कि वह न केवल महान लेखक थे बल्कि एक ऐसे महामानव थे जो सदियों में जन्मते हैं। वह किसानों और गरीबों के मसीहा थे-अहर्निश उनके विषय में सोचने और उनके लिए कुछ न कुछ करते रहने वाले। वेरा वेलीच्किना, मैक्सिम गोर्की और इल्या रेपिन के संस्मरण इस विषय में पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। अपने संस्मरण 'काउण्ट लेव निकोलाएविच तोल्स्तॉय' में रेपिन लिखते हैंᅠ

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'एक दिन यास्नाया पोल्याना में हम एक नंगे पाँव मुज़िक से मिले जो सहायता प्राप्त करने के लिए लेव निकोलाएविच के पास जा रहा था। खेत बोने के लिए उसे बीज चाहिए थे।'ᅠ
'तुम्हे मिल जाएँगे' लेव निकोलाएविच ने सहजतापूर्वक कहा। 'मैं कह दूँगा। एक द्घण्टा बाद आ जाना... कारिन्दा वह तुम्हे दे देगा।'
ᅠतोल्स्तॉय ने इसी संदर्भ में रेपिन से कहा।' 'हाँ गरीबी जीवन के महत्तम शिक्षकों में से एक है।'ᅠ
'यु( और शांति', 'अन्ना कारेनिना', 'पुनरुत्थान' और 'हाजी मुराद' उपन्यास, तीन आत्मकथात्मक उपन्यास- 'बचपन', 'किशोरावस्था' और 'कज्८ााक', 'पफ़ादर सेर्गेई', 'इवान इल्यीच की मृत्यु', 'क्रुटज़र सोनाटा' ;लंबी कहानीद्ध, 'द्घोड़े की कहानी', 'बाल नृत्य के बाद' आदि कहानियाँ, 'अंधकार की सत्ता' तथा 'जीवित शव' नाटक सहित लगभग पचीस कृतियों के लेखक, चिन्तक, विचारक, दार्शनिक, शांतिवादी और शैक्षिक सुधारक लियो निकोलाएविच तोल्स्तॉय का जन्म कास्को से दो सौ किलोमीटर दूर तूला नगर के यास्नाया पोल्याना नामक जागीर में एक समृ( तथा उच्च कुलीन परिवार में २८ अगस्त ;नये

कलेंडर के अनुसार ९ सितम्बरद्ध १८२८ को हुआ था। उनके पिता का नाम निकोलई इल्यिच ताल्स्तॉय और माँ का नाम मारिया निकोनिकोलएव्ना था। उनकी माँ प्रतिष्ठित वोल्कोन्स्की परिवार से थीं और महाकवि पुश्किन की दूर की रिश्तेदार थीं। लियो तोल्स्तॉय जब दो वर्ष के थे, उनकी माँ की मृत्यु हो गयी थी। बच्चों की शिक्षा के उद्देश्य से निकोलई इल्यिच तोल्स्तॉय ने मास्को जाने का निर्णय किया। १० जनवरी, १८३७ को यास्नाया पोल्याना से उनकी यात्राा सात स्लेजों में प्रारंभ हुई, जिन्हें उनके अपने और किराये के द्घोड़े खींच रहे थे। लियो की वृ(ा दादी एक अलग स्लेज में थीं। मास्को में प्ल्यूश्चिखा में शेर्बाचेव का मकान किराए पर लिया गया, जहाँ वे अठारह महीनों तक रहे। निकोलई ने बच्चों की शिक्षा के लिए फ्रयोदोर एवानोविच नामक शिक्षक नियुक्त किया। लेकिन इन्हीं दिनों एक दुर्द्घटना द्घटी। एक सम्पत्ति विवाद के सिलसिले में निकोलई इल्यिच तोल्स्तॉय को अकस्मात तूला जाना पड़ा। १९ जून, १८३७ को उन्होंने मत्यूशा नामक शिकारी, जो उनका नौकर भी था, के साथ तूला के लिए प्रस्थान किया और २४ द्घंटों से भी कम समय में लंबी यात्राा तय कर २१ जून को वह वहाँ पहुँचे। वह किसी से मिलने जा रहे थे कि रास्ते में गिर गये थे और उनकी मृत्यु हो गयी थी। २५ मई १८३८ को लियो तोल्स्तॉय की दादी प्रिन्सेज गोर्चाकोवा की भी मृत्यु हो गयी। पिता की मृत्यु के समय लियो मात्रा ९ वर्ष के थे। उनके, उनके भाइयों और बहन के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उनकी एक आंट अलैक्जैड्रां इल्यिनिच्ना ने संभाली। लेकिन १८४१ में उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी दूसरी आंट तात्याना अलैक्जाड्रोंव्ना ने उनके पालन-पोषण का भार संभाला था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद लियो तोल्स्तॉय कज़ान विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए गए। उस समय उनकी आयु १३ वर्ष थी। उनके साथ उनका निजी नौकर वन्यूशा था जो बालक ही था और जो बाद में उनकी काकेशस यात्राा के समय उनके साथ रहा था। कज़ान में वह एक अवकाश प्राप्त कर्नल युश्कोव के द्घर में रहे थे। पढ़ाई की दृष्टि से तोल्स्तॉय अच्छे छात्रा नहीं थे। उनकी पत्नी ने अपने संस्मरण 'तोल्स्तॉय और उनका परिवार' में इस विषय में लिखा है,ᅠ''प्रत्येक शरद आँतु में परिवार कज़ान वापस लौट जाता, जहाँ चारों भाई विश्वविद्यालय में पढ़ते थे। एक दिन लेव निकोलाएविच ने प्राच्य भाषा विभाग में अध्ययन की इच्छा व्यक्त की और दूसरों की सलाह को अनसुना कर वहाँ प्रवेश भी ले लिया। लेकिन वह वहाँ एक वर्ष से अधिक नहीं टिके। उन्होंने विभाग बदलकर लॉ विभाग में प्रवेश ले लिया। पढ़ाई में वह सदैव कमजोर रहे और शिक्षा ग्रहण करने में उन्हें कठिनाई होती थी। उन्होंने जीवन में जो कुछ भी सीखा,ᅠस्वयं के अनुभव से और सहजता पूर्वक उसका पूर्ण उपयोग भी किया।'' वहाँ उनके प्रोपफेसर थे डी. आई. मेयर, जो बहुत अच्छे व्यक्ति थे। वह तोल्स्तॉय में विशेष रुचि ले रहे थे, उन्होंने पेकार्स्की नामक छात्रा के माध्यम से तोल्स्तॉय को बुलाया और उन्हें एक विषय पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने का कार्य सौंपा,ᅠलेकिन, तोल्स्तॉय वह कार्य नहीं कर पाए। बहुत वर्षों बाद पी. पेकार्स्की ने डी. आई. मेयर पर एक संस्मरण लिखा था। जो १८५९ में प्रकाशित एक पुस्तक में संकलित हुआ था, उसमें उन्होंने प्रो. का कथन उ(ृत किया था। प्रो. मेयर ने कहा था, ''मैंने आज उसकी परीक्षा ली और देखा कि पढ़ने की उसकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। खेद का विषय है, उसकी ऐसी अभिव्यंजक मुखाकृति और बु(मिानों जैसी आँखें हैं कि मैं यह मानता हूँ कि सद्भावना और स्वतंत्राता से एक असाधारण व्यक्ति के रूप में वह अपना विकास कर सकता है।''ᅠ
तोल्स्तॉय ने किसानों के जीवन का निकट से गहन अध्ययन किया। वह उनकी दयनीय जीवन-स्थितियों से दुखी और व्यवस्था के प्रति विक्षुब्ध थे। उन्होंने यास्नाया पोल्याना में खेती के कार्यों में अपने को व्यस्त कर लिया था। यह कज़ान से लौट आने के बाद की द्घटनाएँ थीं। उन्होंने एक थ्रेशिंग मशीन बनायी, जिसका वर्णन उन्होंने 'जमींदार की एक सुबह' में किया है। इस मशीन ने भारी शोर किया था, सनसनाई थी और दम तोड़ दिया था। उन दिनों तोल्स्तॉय १८ वर्ष के थे। थ्रेशिंग मशीन द्वारा किसानों के श्रम को कम करने का उनका सपना टूट गया था। पफरवरी, १८४९ में वह अपनी मास्टर्स डिग्री के लिए सेंट पीर्ट्सबर्ग गए। जुआ खेलने की लत उन्हें वहीं लगी।ᅠवह कर्ज में इतना डूब गये कि मार्च १८४९ में उन्होंने सेर्गेई को लिखा कि वह उनके द्घोड़े और कुछ जमीन बेचकर पैसे भेजे। उन्होंने अपने कारिन्दा को जंगल बेचने के लिए लिखा। उन्होंने सेर्गेई को पुनः लिखा और कहा कि वह 'खरीदारों से किसी भी शर्त' पर सौदा करके उन्हें पैसे भेजे। 'हाजी मुराद' और 'कज्जाक़' में उन्होंने अपने इस अनुभव का लाभ उठाया है। उसके बाद उन्होंने विदेश यात्रााएँ कीं। वह उन स्थानों पर गये, जहाँ कभी रूसो रहे थे और जहाँ उन्होंने नयी शिक्षा प(ति का स्वप्न देखा था।ᅠयात्राा के अंत में तोल्स्तॉय भी रूस में पब्लिक विद्यालय शिक्षा के विषय में सोचने लगे थे। यास्नाया पोल्याना लौटकर तोल्स्तॉय ने किसानों के लिए एक स्कूल की स्थापना की। यह उनके एक आलेख-'पब्लिक विद्यालयों के प्रबंधन के लिए योजना का प्रारूप' से स्पष्ट है। विद्यालय को सरकारी मान्यता प्राप्त न थी। यहाँ युवा तोल्स्तॉय अपने किसानों के बच्चों को पढ़ाते थे। उनके शिष्य वी.एस. मोरोजोव ने अपने संस्मरण में लिखा : ''१८५९ के प्रारंभ में यास्नाया पोल्याना गाँव में चारों ओर समाचार पफैला कि लेव निकोलाएविच गाँव में एक स्कूल खोलने जा रहे हैं और जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं वे पढ़ने जा सकते हैं, क्योंकि उसके लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाना है। उस द्घोषणा से उत्पन्न हुई उत्तेजना को मैं अभी भी याद कर सकता हूँ। चर्चा करने के लिए लोग समूहों में एकत्रा होने और इस विषय में अपने विचार व्यक्त करने लगे थे।ᅠ
''पढ़ते हुए एक सप्ताह व्यतीत हुआ, पिफर दूसरा, पिफर पूरा महीना। शरद कब की समाप्त हो गई, हमें पता ही नहीं चलाऋ और अब जाड़ा आ गया था। स्कूल में हम द्घर जैसा अनुभव करते थे और हमें लेव निकोलाएविच के प्रति पूर्णरूप से लगाव हो गया था। एक दिन उन्होंने हमसे कहा, ''मुझे 'महामहिम' मत कहा करो। मेरा नाम लेव निकोलाएविच है और तुम्हें इसी नाम से मुझे पुकारना है।''ᅠ
उनका पुराना नौकर पफोका इस कार्य में उनकी सहायता करता था। उनके काकेशस चले जाने के बाद यह कार्य बाधित हुआ था, लेकिन वहाँ से लौटने के बाद उन्होंनें पुनः विद्यालय प्रारंभ कर दिया था। तब स्कूल चलाने के लिए उन्होंने मास्को के ग्यारह विद्यार्थियों का चयन किया था। इन्हीं दिनों उन्हें किसानों और जमींदारों के बीच मध्यस्थता करने के लिए पब्लिक आर्बिट्रेटर चुना गया था। परिणामतः किसानों के बच्चों के लिए उस क्षेत्रा में अनेक स्कूल खुले थे, लेकिन यास्नाया पोल्याना का स्कूल उनके लिए था।
लियो तोल्स्तॉय के परिवार में सैन्य सेवा की सुदीर्द्घ परम्परा रही थी। उनके पिता ने १८१२ में नेपोलियन के विरु( यु( किया था। तोल्स्तॉय के बड़े भाई निकोलई सेना में भर्ती हुए थे। १८५१ में तोल्स्तॉय भी उनके साथ गए और एक बाहरी व्यक्ति के रूप में सेना के लिए अपनी सेवाएँ अर्पित की थीं। उस समय उनकी आयु बाईस वर्ष थी। सेना में वह लगभग पाँच वर्ष रहे थे। कमीशन प्राप्त करने के लिए उन्हें बहुत प्रयास करना पड़ा था। परिवार के उच्च संपर्कों का सहारा लेना पड़ा था। उन्होंने काकेशिया, डेन्यूब और क्रीमिया की लड़ाइयों में भाग लिया था। सैन्य अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी, भले ही एक बाहरी व्यक्ति के रूप में, उन्हें काकेशिया तथा सेवस्तोपोल के यु(ों से संबंधित कहानियों और 'कज्८ााक', 'यु( और शांति' तथा 'हाजी मुराद' जैसे उपन्यासों के सृजन में सहायक सि( हुई थी। उनकी पत्नी सोपिफया अन्द्रेएव्ना ने अपने संस्मरण में लिखा है, ''वह प्रायः मुझसे यह कहते थे कि उनकी सबसे सुखद स्मृतियां काकेशिया से जुड़ी हुई हैं। उन दिनों उन्होंने बहुत पढ़ा, स्टेर्न की रचनाओं का अनुवाद किया। यहीं उन्होंने 'बचपन' और 'किशोरावस्था' की रचना की थी।''
वैसे तोल्स्तॉय ने पहली रचना, १८४१ में हुई अपनी बुआ की मृत्यु के बाद कविता के रूप में लिखी थी। काकेशिया प्रवास भावी लेखक तोल्स्तॉय के लिए वरदान सि( हुआ था। वास्तविकता यह थी कि वह सोची-समझी योजना के बाद ही सैन्य सेवा में गये थे, क्योंकि न केवल वह सैन्य अभियानों को निकट से देखना चाहते थे, बल्कि उस पूरे प्रांत का बहुआयामी अध्ययन भी करना चाहते थे। 'कज्८ााक' और 'हाजी मुराद' इसका प्रमाण हैं। काकेशस में लिखी गयी उनकी रचना 'बचपन' उस समय की प्रमुख साहित्यिक पत्रिाका 'सोव्रेमेन्निक' ;समकालीनद्ध में प्रकाशित हुई थी। तोल्स्तॉय ने इसमें लेखक के रूप में अपना नाम नहीं दिया था। लेकिन जब पाठकों और आलोचकों ने 'बचपन' की प्रशंसा की तब उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा था। सोपिफया ने अपने संस्मरण 'तोल्स्तॉय और उनका परिवार' में इस विषय में लिखा : ' उन्होंने मुझे बताया कि काकेशस में एक दिन उन्हें ओटेचेस्टवेन्निए जपिस्की पत्रिाका की प्रति प्राप्त हुई जिसमें साहित्यिक आलोचना के एक लेख में 'चाइल्डहुड' के अज्ञात लेखक की प्रशंसा में कुछ शब्द लिखे गए थे। उन्होंने कहा, ''झोपड़े एस एश अपने भाई के साथ तख्त पर लेटा हुआ था और ऑॅगोलिन हमारे निकट बैठा हुआ था। मैंने पढ़ा और प्रशंसा में छककर पिया, मेरा सीना गर्व से लगभग पफटने को हो रहा था और मैंने अपने से कहा : 'कोई भी नहीं, यहाँ तक कि वे भी नहीं, जानते कि प्रशंसा मेरे लिए है। इस विषय में उन्होंने अपनी डायरी में भी लिखा, ''मैं इसे पढ़ रहा था, प्रशंसा के कारण अभिभूत हुआ जा रहा था और मेरी छाती गर्व से पफटी जा रही थी।'' इस पत्रिाका के संपादक थे प्रसि( कवि और लेखक नेक्रासोव। नेक्रासोव ने इस पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, ''लेखक हमें हमारे लिए सर्वथा नयी दुनिया में ले जाता है... उनमें पात्राों को


समझने और उनके स्वरूप के विषय में गहरी सच्चाई अभिव्यक्त हुई है...।'' काकेशिया में रहते हुए ही तोल्स्तॉय ने एक लेखक के रूप में प्रसि(ि पा ली थी, जब वह वहाँ से नवम्बर १८५५ में पीर्ट्सबर्ग लौटकर आये, तब उस समय के महान रूसी रचनाकारों, आस्त्राोव्स्की, चेर्नीशेव्स्की, तुर्गनेव और गोंचारोव ने उनका एक बड़े लेखक के रूप में स्वागत किया। तुर्गनेव ने तोल्स्तॉय की बहन मारिया को लिखा था, ''हम सब की राय में लेव निकोलाएविच हमारे सर्वश्रेष्ठ लेखकों की पांत में आ गये हैं और अब तो उन्हें कोई ऐसी चीज लिखनी चाहिए कि वह प्रथम स्थान प्राप्त कर लें जिसके योग्य वह हैं और जो उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।'' यहाँ यह उल्लेख करना अनुचित न होगा कि लेखक तुर्गनेव और तोल्स्तॉय की बहन मारिया के मध्य प्रेम संबंध थे। मारिया ने अपने पति से तलाक ले लिया था। वह तुर्गनेव से विवाह करना चाहती थी, जिसे तुर्गनेव लंबे समय से टालते आ रहे थे। तोल्स्तॉय के लिए यह एक अप्रिय स्थिति थी। तुर्गनेव के प्रशंसक होने के बावजूद कुछ विषयों में तोल्स्तॉय का उनसे मतवैभिन्य था। उस पर मारिया के संबंधों का मामला। दरअसल, तुर्गनेव मॉलिन वर्डोट को प्यार करते थे, जिसके मकान में वह रहते थे। लेकिन सुश्री वर्डोट से तुर्गनेव को अपने प्रेम का उत्तर नहीं मिला था। तुर्गनेव के एक पुत्राी थी, जिसके पालन-पोषण के लिए वह विशेष चिन्तित रहते थे और सुश्री वर्डोट उस बच्ची की देखभाल करती थीं, लेकिन तोल्स्तॉय मारिया के विषय में चिन्तित थे। १८६१ के वसंत में कवि अपफानसी पफेत की जागीर स्तपनोव्का में एक सुबह नाश्ते के दौरान तुर्गनेव और तोल्स्तॉय की मुलाकात हो गयी थी। किसी विषय पर दोनों में झड़प हुई और बहन को लेकर तोल्स्तॉय के मन में जमी क्षुब्धता पफूट पड़ी थी। इस सबके बावजूद तोल्स्तॉय के हृदय में तुर्गनेव के विरु( दुर्भाव न था। तुर्गनेव ने अपने किसानों को स्वतंत्रा कर दिया था और दुर्भिक्ष के दौरान गरीब किसानों के सहायतार्थ विभिन्न जागीरों की यात्राा करते समय तोल्स्तॉय ने पाया था कि तुर्गनेव के किसानों की स्थिति अन्य जमींदारों के किसानों से बहुत अच्छी थी।
पफरवरी, १८६२ में पब्लिक आर्बीट्रेटर के पद से त्यागपत्रा देकर तोल्स्तॉय १२ मई १८६२ को मास्को चले गए थे। उनके साथ उनके शिष्य वसीली मोरोजोव और इगोर चेर्नोव थे और था पुराना नौकर अलेक्सेई ओरेखोव जो सेवास्तोपोल में उनके साथ रहा था। मास्को में उन्होंने बेहर्स परिवार के साथ रात व्यतीत की थी। उनकी भावी पत्नी सोनिया बेहर्स ;सोपिफया अन्द्रेएव्नाद्ध ने पहली बार उस ग्रामीण युवक को देखा था। मास्को से तोल्स्तॉय त्वेर चले गये थे। जिन दिनों वह यास्नाया पोल्याना से बाहर थे, अधिकारियों ने उनके स्कूल में छापा मारा था। उससे स्कूल को इतनी क्षति हुई थी कि स्कूल उससे उबर नहीं पाया था। लियो निकोलाएविच तोल्स्तॉय लगभग चौतीस वर्ष के हो चुके थे, लेकिन अविवाहित थे। काकेशस से लौटने के बाद वह एक किसान युवती अक्सीनिया बजीकिना के प्रेम में पड़ गए थे। वह उन दिनों 'कज्८ााक' लिख रहे थे, लेकिन उन्हीं दिनों त्युचेवा नामक युवती से भी उनके प्रेम संबंध थे। उन दिनों वह नियमित डायरी लिखते थे। १४ जनवरी, १८५८ को उन्होंने लिखा, ''त्युचेवा हर समय मेरे दिमाग में रहती है। सच, इससे मुझे खीज होती है, क्योंकि

वास्तव में यह प्रेम नहीं है।'' २६ जनवरी, १८५८ को उन्होंने लिखा, ''वह ठंडी, तुच्छ और अभिजात वर्गीय है जबकि चिचेरिना सुन्दर है।'' लेकिन अक्सीनिया के विषय में वह लिखते हैं, ''अक्सीनिया को एक दृष्टि देखा। वह बहुत सुन्दर है। मैंने इतने दिन व्यर्थ ही गंवा दिए। आज पुराने बड़े जंगल में, वहाँ उसकी भाभी भी थी, और मैं मूर्ख हूँ... मैं उसके प्यार में पड़ गया हूँ।ᅠऐसा जीवन में पहले कभी नहीं हुआ था। मेरे मस्तिष्क में दूसरा कोई विचार नहीं है। मैं संतप्त हूँ।'' कुछ लोगों का कहना है कि अक्सीनिया से उन्हें एक पुत्रा भी था,ᅠलेकिन अक्सीनिया से पूर्व अन्य युवतियों से भी उनके प्रेम संबंध थे। कोकेशस जाने से पूर्व वह एक जिप्सी युवती के प्रति आकर्षित थे। उनका भाई सेर्गेई लंबे समय तक एक जिप्सी युवती के साथ रहने के पश्चात्‌ उससे विवाह कर चुका था। उसने तोल्स्तॉय को भी उस जिप्सी युवती से, जिसके प्रति तोल्स्तॉय आकर्षित थे, विवाह के लिए प्रेरित किया था। बाद में, तोल्स्तॉय बलेरिया असेर्नीवा के प्रेम में पड़े, जिसके साथ संबंध विच्छेद करते हुए उन्होंने १४ जनवरी, १८५७ को उसे एक पत्रा लिखा था, ''प्रिय अलेरिया व्लादीमीरोव्ना, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं अपने प्रति कसूरवार हूँ और भयानक रूप से आपके प्रति भी कसूरवार हूँ... मैं शीद्घ्र ही पेरिस के लिए रवाना हूँगा और कब रूस वापस लौटूँगा, ईश्वर ही जानता है।'' वलेरिया व्लादीमीरोव्ना असेर्नीवा अपने माँ-पिता को खो चुकी थी। वह सुदाकोवो, जो यास्नाया पोल्साना के निकट था, में रहती थी और अच्छे रहन-सहन के बावजूद धनवान न थी। लेकिन काले बालों वाली, संगीत पसंद वह एक सुदर्शना युवती थी। असेर्नीवा के साथ तोल्स्तॉय के संबंध बहुत गहराई तक स्थापित हो चुके थे। उन्होंने अपनी बुआ, भाई और मित्राों से उसका परिचय करवाया था। उसे सोलह पत्रा भी लिखे थे, लेकिन किन्हीं अज्ञात कारणों से उन्होंने उससे विवाह नहीं किया था।
तोल्स्तॉय जब तीस के थे, वह त्युचोवा के विषय में सोचते थे, ''मैं उससे बिना प्यार के निश्चय ही शांतिपूर्वक विवाह के लिए अपने को तैयार कर रहा था, लेकिन उसने जान-बूझकर ठंडेपन के साथ मेरा स्वागत किया।'' अंततः उन्होंने उससे भी विवाह का विचार त्याग दिया था। १जनवरी, १८५९ को उन्होंने डायरी में लिखा, ''मैं या तो इस वर्ष विवाह कर लूँगा अथवा कभी नहीं करूँगा।'' उन दिनों की उनकी डायरी से ज्ञात होता है कि विवाह को लेकर वह कितनी उलझन में थे। लगातार वह अक्सीनिया का उल्लेख करते हैं। अंततः बेहर्स परिवार से उनकी निकटता ने उन्हें सोनिया के निकट ला दिया था। वास्तव में, डॉक्टर अन्द्रेई इव्स्तापफीविच बेहर्स अपनी बड़ी बेटी लिजा का विवाह तोल्स्तॉय के साथ करना चाहते थे। लेकिन ६ मई, १८६२ को तोल्स्तॉय ने अपनी डायरी में लिखा, ''मैंने बेहर्स परिवार में सुखद दिन व्यतीत किया, लेकिन लिजा के साथ विवाह का साहस मुझमें नहीं है। 'वह बेहर्स की छोटी बेटी सोनिया, जो उनसे सोलह वर्ष छोटी थी, को पसंद करते थे और २४ सितम्बर, १८६२ को सोनिया के साथ उनका विवाह हुआ। डॉक्टर बेहर्स लिजा के साथ तोल्स्तॉय के विवाह न करने से इतना नाराज थे कि उन्होंने सोनिया को दहेज के रूप में कुछ भी नहीं दिया था। सोपिफया अन्द्रेएव्ना ने अपने संस्मरण 'लियो का विवाह' में विस्तार से तोल्स्तॉय से अपनी मुलाकात से लेकर विवाह तक का विवरण प्रस्तुत किया है।
सोपिफया अन्द्रेएव्ना के साथ शादी के पश्चात्‌ तोल्स्तॉय के जीवन का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। सोपिफया निश्चित ही उनकी एक कुशल संगिनी सि( हुई थी। वह उनकी पत्नी, सहायिका, निजी सचिव आदि विभिन्न रूपों में उनके रचनात्मक कार्यों में सहायता करती थी। वह उनकी प्रत्येक रचना की पहली पाठक ही नहीं होती थी, बल्कि वह उन्हें अपनी सलाह भी देती थी। वह उनकी रचनाओं को पफेयर करती थी। शादी के पश्चात्‌ लंबी अवधि तक तोल्स्तॉय कुछ नहीं लिख पाये। 'कज्८ााक' ;१८५२-१८६२द्ध लिखकर वह पर्याप्त यश पा चुके थे, लेकिन, लगभग दो वर्षों तक कुछ न लिख पाने के दौरान वह एक बड़े विषय पर कार्य करने के लिए अपने को तैयार कर रहे थे। उन्होंने १८६५ में 'यु( और शांति' पर कार्य प्रारंभ किया, जिसे १८६९ में पूरा किया। यह उपन्यास राजनीतिक, सामाजिक, कूटनीतिक, धार्मिक, दार्शनिक, सामरिक,

मनोवैज्ञानिक, आर्थिक अर्थात्‌ जीवन के लगभग सभी पक्षों पर प्रकाश डालता है। इस उपन्यास ने तोल्स्तॉय को विश्व के महान लेखकों के मध्य आसीन कर दिया। सामरसेट माम ने उनके विषय में लिखा, ''संसार का सबसे बड़ा उपन्यासकार बाल्जाक था, किन्तु 'यु( और शांति' संसार का महान उपन्यास है।'' तोल्स्तॉय ने इस उपन्यास को लिखने में अथक श्रम किया था। इस दौरान उन्होंने दो छोटी रचनाएँ 'काकेशस में एक यु(बंदी' ;१८७२द्ध और 'पफादर सेर्गेई' ;१८७३द्ध लिखा। लेकिन वह कुछ और महत्वपूर्ण लिखने की योजना बना रहे थे। यह उपन्यास था 'अन्ना कारेनिना' जिसे उन्होंने १८७५-७७ में लिखा था। यह उपन्यास सुन्दर अन्ना, कूपमंडूक और सीमित जीवन दृष्टि रखने वाला उसका कुलीन पति कारेनिन, जो उम्र में अन्ना से कापफी बड़ा था और अन्ना को प्रेम करने वाले जवान काउंट व्रोन्स्की की कहानी है। उपन्यास का अंत अन्ना की आत्महत्या में होता है। इसमें मुख्य कथा के साथ लेविन और कीटी की प्रेमकथा भी है। लेविन के विचार तत्कालीन रूस की विविध समस्याओं पर तोल्स्तॉय के विचारों को व्याख्यायित करते हैं। इस उपन्यास के विषय में रोमा रोलां का कथन है, ''अन्ना कारेनिना पूरा एक संसार है जिसकी निधि अकूत है।'' अन्ना कारेनिना के विषय में सोपिफया ने एक स्थान में लिखा कि उनके पड़ोस में एन.एन.बिबिकोव नाम के व्यक्ति रहते थे। उसकी पत्नी की एक दूर की रिश्तेदार जो पैंतीस वर्ष की थी साथ रहती जिसका नाम अन्ना स्तेपानोव्ना था, पत्नी की मृत्यु के बाद वह बिबिकोव की रखैल के रूप में उस द्घर में रहने लगीऋ लेकिन जब अपने बेटे और भतीजी को पढ़ाने के लिए एक जर्मन गवर्नेस नियुक्त किया अन्ना ने द्घर छोड़ दिया और निकटस्थ स्टेशन यसेन्की जाकर मालगाड़ी के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली थी। सोपिफया लिखती हैं कि अन्ना के क्षत-विक्षत नग्न शरीर को देखकर लेव हिल उठे थे और वही उनके उपन्यास 'अन्ना कारेनिना'ᅠका आधार बनी थी।
'अन्ना कारेनिना' के बाद तोल्स्तॉय का लेखन निरंतर चलता रहा। १८८२ में उन्होंने- 'एक स्वीकारोक्ति', 'मेरा धर्म' ;१८८४द्ध, 'द्घोड़े की कहानी' ;१८६४ में- पुनः १८८६ मेंद्ध, 'इवान इल्यीच की मृत्यु' ;१८८६द्ध, 'एक व्यक्ति को कितनी जमीन की आवश्यकता है?' ;१८८६द्ध, 'अंधकार की सत्ता' ;ड्रामा-१८८६द्ध, 'क्रुट्जर सोनाटा' ;१८८९-लंबी कहानीद्ध, 'पुररुत्थान' ;१८८९-९९द्ध, 'हाजी मुराद' ;१८९६-१९०४द्ध जैसी कालजयी रचनाएँ लिखीं। 'पुरनरुत्थान' में तोल्स्तॉय ने भूदास प्रथा के बाद की रूसी सामाजिक जीवन की विसंगतियों को गंभीरता से अभिव्यक्त किया है। यद्यपि इस उपन्यास का नायक नेखल्युदोव है, तथापि वास्तविक नायक आम-साधारण लोग हैं जो नेखल्युदोव के माध्यम से अपने वास्तविक रूप में पाठकों के समक्ष प्रकट होते हैं। 'हाजी मुराद' तोल्स्तॉय का ऐतिहासिक उपन्यास है, जिसमें हाजी मुराद ही नहीं अधिकांश अन्य पात्रा वास्तविक हैं। उन्होंने इस उपन्यास को लगभग पचास वर्ष पश्चात्‌ लिखा था, जबकि वह यास्नाया पोल्याना के स्कूल के अपने छात्राों को प्रायः हाजी मुराद की वीर गाथाएँ सुनाया करते थे। 'क्रुट्जर सोनाटा' के विषय में कुछ विद्वानों का कहना है कि उन्होंने अपनी पत्नी सोपिफया अन्द्रेएव्ना से ईर्ष्या के कारण उसे लिखा था। ऐसा माना जाता है कि सोपिफया अन्द्रेएव्ना और उस समय के प्रसि( संगीतकार सेर्गेई इवानएविच तानेएव, जो तोल्स्तॉय का अच्छा मित्रा था, के मध्य यास्नाया पोल्याना अथवा मास्को में प्रेम संबंध स्थापित हुआ था लेकिन शायद वह सोपिफया का एकपक्षीय प्यार था। वह यह नहीं जानती थी कि तानेएव उसे प्यार नहीं करता। वह यह सोचती थी कि वह उसके पति से भयभीत था। लेकिन वह प्रत्येक संगीत समारोहों में जाती थीं और तानेएव के बगल में बैठती थीं। एक बार तानेएव कीव गया और वहाँ मस्कोव परिवार के साथ ठहरा। सोपिफया

अन्द्रेएव्ना भी उसकी पीछे कीव गयी। वह पहले अपनी बहन तातियाना से मिली, पिफर मस्लोव परिवार की मेहमान बनी।ᅠइस परिवार से उनके पुराने संबंध थे। अगले दिन वह सभी के साथ जंगल द्घूमने गयी, जहाँ सोपिफया के चित्रा खींचे गए। जब वह मास्को लौटी तब उन्होंने तोल्स्तॉय का तनावग्रस्त तना हुआ चेहरा देखा। तोल्स्तॉय ने अपनी भाभी को एक पत्रा लिखा था, जिसमें दुखी मन से उन्होंने लिखा, ''आिखर अब मैं सत्तर वर्ष का बूढ़ा जो हूँ।'' उन्होंनें पाँच पृष्ठों का एक लंबा पत्रा सोपिफया को लिखा, जिसे उन्होंने 'एक संवाद' कहा। उसमें उन्होंने सोपिफया से कीव यात्राा और तानेएव के प्रति उनके सम्मोहन के विषय में स्पष्टीकरण मांगा था। पत्रा पढ़कर सोपिफया आग बबूला हो उठी थी और चीखती हुई बोली थी, ''आप कमीने हैं, आप एक जानवर हैं! और मैं एक अच्छे, सहृदय व्यक्ति को प्यार करती हूँ, न कि आपको। आप एक पशु हैं!'
वास्तव में तानेएव और सोपिफया का प्रेम वास्तविक नहीं था। निश्चित्‌ ही पारिवारिक असंतोष और प्रेम की आंकाक्षा के कारण वह उसकी ओर आकर्षित हुई थी, लेकिन वह एकपक्षीय था। ऐसी स्थिति में तोल्स्तॉय की मानसिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। सोपिफया अन्द्रेएव्ना ने यास्नाया पोल्याना में द्घर बनवाया, उसे सजाया, और वहाँ रही भी थी। लेकिन वास्तविकता यह थी कि ग्राम्य जीवन को वह स्वीकार नहीं कर पायी थी। परिवार के लिए समर्पित और बच्चों के भविष्य की चिन्ता में डूबी रहने वाली उस अथक परिश्रमी महिला को पति का किसानों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण, सामाजिक कार्यों में उनकी संलिप्तता और व्यवस्था का मुखर विरोध पसंद नहीं था। वह तोल्स्तॉय को एक काउंट की भांति...

एक अभिजातीय वर्ग के व्यक्ति की भांति देखना चाहती थी। जबकि तोल्स्तॉय किसानों जैसा सामान्य जीवन जीना पसंद करते थे। २८ जून, १८८१ को तोल्स्तॉय ने अपनी डायरी में लिखा, ''मैं एक गरीब आत्मा को देखने गया। वह एक सप्ताह से बीमार है। उसे दर्द और कपफ है। पीलिया बढ़ रहा है। कुर्नोसेन्कोव को पीलिया था। कोन्द्राती उसी से मरा। गरीब लोग पीलिया से मर रहे हैं। वे पफलाला से मर रहे हैं।'' वह आगे लिखते हैं, ''उसकी पत्नी की गोद में एक बच्चा है, तीन लड़कियाँ हैं और भोजन नहीं है। चार बजे तक उन्हें भोजन नहीं मिला था। लड़कियाँ सरसपफल तोड़ने गयी थीं और वही उनका भोजन था।'' तोल्स्तॉय ने आगे लिखा कि उस द्घर में स्टोव इसलिए जलाया गया कि बच्चे को लगे कि कुछ पकाया जा रहा था और वह चीखे नहीं। गरीबी का यह भयावह दृश्य तत्कालीन रूस की स्थिति का वास्तविक बयान है। उन्होंने पुनः लिखा, ''हम शैम्पेन के साथ अच्छा रात्रिा भोज करते हैं।... प्रत्येक बच्चे को खर्च के लिए पाँच रूबल दिए जाते हैं। गाड़ियाँ तैयार हैं, जिनमें वे पिकनिक के लिए जाएँगे। उनकी गाड़ियाँ कठिन श्रम से थके-मांदे किसानों की गाड़ियों के पास से गुजरेंगी...'' तोल्स्तॉय की रचनाएँ ही नहीं समय-समय पर उनकी डायरी में दर्ज की गई बातें रूस की उस समय की सामाजिक और आर्थिक विद्रूपता को उद्द्घाटित करती हैं। वेरा वेलीच्किना और इल्या रेपिन ने इस विषय में अपने संस्मरणों में पर्याप्त प्रकाश डाला है। ᅠ
तुर्गनेव की भांति उन्होंने भी अपने किसानों को स्वतंत्राता दे दी थी। लेनिन ने उनके विषय में अपने आलेख-''लेव तोल्स्तॉय रूसी क्रांति के दर्पण में'' में लिखा था, ''तोल्स्तॉय के विचारों में विरोधाभास वस्तुतः उन विरोधाभासपूर्ण परिस्थितियों का दर्पण है जिनमें किसान समुदाय को हमारी क्रांति में अपनी ऐतिहासिक भूमिका अदा करनी पड़ी थी।''
किसानों के जीवन परिवर्तन के विषय में तोल्स्तॉय जैसा सोचते थे क्रांतिकारी भी वैसा ही सोच रहे थे। शायद इसीलिए उन्होंने कहा था, 'क्रांति अपरिहार्य है।' वह दूसरी क्रांति की प्रतीक्षा कर रहे थे, जो किसानों की जीवन स्थितियाँ बदल देने वाली थी। लेकिन दूसरी ओर वह

क्रांति से भयभीत भी थे। ऐसी ही अनेक बातों में हमें उनका विरोधाभास प्रकट होता दिखता है। उन्होंने १३ मई, १९०८ से १५ जून, १९०८ तक एक आलेख पर कार्य किया, जिसका शीर्षक था, 'मैं चुप नहीं रह सकता।' इस आलेख ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। सेंसर किए जाने के भय से तोल्स्तॉय ने इसे लेटिश ;स्मजजपेीद्ध में प्रकाशित करवाया। उसके बाद यह तूला के एक गुप्त छापाखाने से पूरा प्रकाशित हुआ। दुनिया के लगभग सभी देशों में इसे प्रकाशित किया गया और आश्चर्यजनक रूप से जर्मन के दो सौ अखबारों में यह एक साथ प्रकाशित हुआ था। इस लेख का प्रारंभ इस प्रकार होता है, ''सात मौत की सजाएँ। दो सेण्ट पीटर्सबर्ग में, एक मास्को में, दो पेन्जा में, दो रिगा में। चार पफांसियां-दो खर्सन में, एक विल्नो में और एक आडेसा में।'' इस लेख में आगे कहा गया कि १८८० के दशक में देश में एक जल्लाद था, लेकिन १९०८ में अनेकों दिवालिया दुकानदार जल्लादी काम के लिए अपनी सेवाएँ दे रहे हैं और बदले में सैकड़ों रूबल पाकर अपने

व्यवसाय को पुनः स्थापित कर रहे हैं। इन जल्लादों में होड़ मची हुई है। परिणामस्वरूप वे कुछ कम पैसों में, अनेक केवल पचास रूबल में ही हत्या के लिए तैयार हैं।ᅠतोल्स्तॉय के इस आलेख से सरकार हिल उठी थी। लेकिन वह उस महान लेखक के विरु( कुछ कर नहीं सकती थी, जिसे जनता का अपार स्नेह प्राप्त था। इस आलेख को पढ़कर अमेरिका में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी तारकनाथ दास ने तोल्स्तॉय को २४ मई १९०८ को भारत की स्थिति के विषय में एक पत्रा लिखा। तोल्स्तॉय ने उन्हें उत्तर दिया था। इसके पश्चात्‌ महात्मा गाँधी ने उन्हें पत्रा लिखे, जिनके उत्तर 'एक भारतीय के नाम पत्रा' के रूप में यास्नाया पोल्याना के पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। महात्मा गाँधी को लिखे तोल्स्तॉय के पत्रा अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जो भारत की पराधीनता के विषय में उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हैं।ᅠ
तोल्स्तॉय तिहत्तर वर्ष के थे। उनका स्वास्थ्य खराब था। वह याल्टा जाना चाहते थे। ५ सितम्बर, १९०१ को सेवेस्ताप जानेवाली ट्रेन में उनके लिए एक विशेष कोच की व्यवस्था की गई थी। जब ट्रेन खार्कोव स्टेशन पहुँची, जनता का हुजूम अपने उस महान लेखक की एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़ा था। विश्व के शायद वे एक मात्रा ऐसे लेखक थे जिनकी एक झलक पाने के लिए स्टेशनों पर हजारों की भीड़, एक बार लगभग पचीस हजार की भीड़, एकत्रा होती थी।
याल्टा में उनसे मिलने वालों में चेखव थे। चेखव ने गोर्की को सितम्बर १९०१ के अंत के पत्रा में तोल्स्तॉय के चिन्ताजनक स्वास्थ्य के विषय में लिखा था।ᅠउसके पश्चात्‌ उन्होंने 'हाजी मुराद' पूरा किया। अन्य रचनाएँ लिखीं। इस दौरान वसीयत को लेकर पारिवारिक विवाद प्रारंभ हो गया था। तोल्स्तॉय अपने बेटों से असंतुष्ट थे। वह बेटी मारिया को अधिक चाहते थे। सम्पत्ति का बंटवारा सब में करना चाहते थे। जबकि सोपिफया अन्द्रेएव्ना की चिन्ता पूरे परिवार से जुड़ी हुई थी। वह तोल्स्तॉय के साहित्य का प्रकाशन दॉस्तोएव्स्की की पत्नी अन्ना की भांति स्वयं करना चाहती थी, ;और उन्होंने यह कार्य सपफलतापूर्वक किया भी थाद्ध और सम्पूर्ण साहित्य पर अधिकार चाहती थी, जबकि तोल्स्तॉय १८८५ के पश्चात्‌ के अपने साहित्य को स्वतंत्रा कर देना चाहते थे, जिसे कोई भी प्रकाशित कर सकता था। विवाद गहरा था। परिणामतः २८ अक्टूबर १९१० को सुबह पाँच बजे तोल्स्तॉय ने द्घर छोड़ दिया था। उस क्षण उनकी जेब में ३९ रूबल थे और उनके साथ यात्राा करने वाले मकोवित्स्की के पास तीन सौ रूबल थे। वह अस्तापोवो पहुँचे, जहाँ ७ नवम्बर, १९१० ;नये कलेण्डर के अनुसार २० नवम्बरद्ध को इस महान लेखक ने सुबह छः बजकर पाँच मिनट पर इस संसार को अलविदा कह दिया था। डी. पी. मकोवित्स्की ने अपने संस्मरण 'यास्नाया पोल्याना से लेव निकोलाएविच का प्रस्थान' में उनके अंतिम समय का विस्तृत वर्णन किया है।ᅠ
रूसी सरकार ने अपने इस लेखक के दर्शनार्थ जाने वालों के लिए विशेष ट्रेनें चलायी थीं। रूस की जनता ने जितना प्यार अपने इस महान लेखक को दिया वह अद्भुत था। गोर्की ने उनके विषय में लिखा, ''तोल्स्तॉय एक पूरा जगत हैं... उन्होंने सचमुच एक विराट कार्य किया है... पूरी शताब्दी का निचोड़ पेश किया है।''ᅠ
स्वास्थ्य लाभ करने के लिए जिन दिनों तोल्स्तॉय गास्परा में थे, गोर्की ओलीज ;व्समप्रद्ध में थे। स्वस्थ होने के बाद प्रायः दोंनों की मुलाकात होती थी। उनसे संबन्धित गोर्की ने अनेक टिप्पणियाँ और एक पत्रा लिखा। उनमें गोर्की ने लिखा, ''जब तक यह व्यक्ति इस धरती पर विद्यमान है, मैं यतीम नहीं हूँ।''
गोर्की की उपरोक्त बात अब तोल्स्तोय के साहित्य के संदर्भ में कही जा सकती है। ᅠ
अपने पत्रा के अंत में गोर्की नेलिखा ''और मैंनेऋ जो ईश्वर में विश्वास नहीं करताऋ उन पर चुपचाप एक सरसरी दृष्टि डाली और स्वयं से कहा : 'यह व्यक्ति ईश्वर की भांति है।
 
 
 
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