| परिवार की यादों में प्रभाष |
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मालवा की माटी जैसा मन
जसो छुटपन में थो असो को असोज है अब भी। जरा सो भी पफरक नी आयो। बस! जिना काम की धुन लगी, उखे पूरो करकेज छोड़तो, भोत जिद्दी थो। म्हारे लगे हे कि इना जिद्दीपन काई कारण आज इत्ते बड़ो आदमी बन्यो हे। म्हारे तो अब भी उसो को उसोज परभास लगे हे पण लोग के हे कि अखबार की लाइन में उको भोत नाम हे। बड़ा-बड़ा लोग होन का साथे उठनो-बेठनो हे।
कोई की सुनतो नी थो। में तो भोत बिमार रेहती थी तो यो कंई करे हे एकी खबर जयादा नी रेहती थी पण सब जना होन, द्घर का बड़ा आस-पड़ोस का केता था कि लीला थारो छोरे अलग ही चले हे, कने कां-कां की बात करे हे, देख जे इखे 'सिंगासन योग' हे, एकी पिफकर मत करजे। जो करेगो, असो करेगो कि बस...। |
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हाँ, अभी भले ही पूजा-पाठ नी करतो होय, पण कईं को भी बार-तिबार हो तो। तो जने बेंडो हो जातो, रावण बनातो, गणपति बनातो, झाँकी सजातो ओर तो ओर छोरी होन का साथ संजा बनातो और गीत भी गातो। मना करता तो दोई बड़ी बेन होन ;लता ने सुसीलाद्ध के लबूर दे तो, पन मजाल के कई को भी तिबार छूट जाये।
मेट्रिक तक तो पढ़ने में अच्छो थो। द्घर की हालत कईं भोत अच्छी नी थी पन कईं भी करके पढ़तो जरूर। पढ़ने की लगत तो शुरू से ही थी। एक बार पफेल हो गयो तो मास्टर से लड़ लियो, बाद में मास्टर ने पास कर्यो जद जाके द्घर आयो।
कईं की भी चीज होती सबके बाँट के खातो। ओर खाने कीज नी, कईं की भी चीज होय, जसे दो कुरता रेता तो एक कोई के दो देतो और दे के खुब खुब भी होतो।
'दा' साब ;पिताजीद्ध से डरतो भोत थो। पन सेवा भी भोत करतो। उनका पाँव दबाने बैठतो, तो आदी रात हो जाती, जद तक उसे साँती नी होती, दबातोज रेतो। केनो को मतलब ये हे कि जद तक कईं को भी काम करनो उखे पूरी तरह करनो, यो उसको स्वभाव ही थो ने अभी भी हे।
म्हारे गीता-भागवत पढ़ने को सुरु सेई नियम थो। यो कई भी करतो होय उको ध्यान सुनना में ही रेहतो ओर जो बात एक बार सुन ली उखे कभी नी भूलतो। ओर अभी देख लो तम, उका लेख में बचपन की सब बात लिखे हे, केनो को मतलब ये हे कि स्मरण शक्ति भोत तेज थी, जो बात एक बार दिमाग में बैठ गई तो बैठ गई। बाद में जब यो थोड़ो भोत काम करने लग्यो, ;कईं-कईं काम कर्या म्हारे तो याद भी लीद्ध ओर इका पासे पैसा आया, तो कागद-किताब खरीद लातो ओर द्घंटों न जाने कई-कई लिखतो और पफाड़ के पफेक देतो। एक बार तो एका दोस्त ;महेस दुबेद्ध और यो एक किताब लाया, कजे कई बात हुई तो एक-एक पन्नो पफाड़ के जला दियो। पान-सो रुपया की किताब को कई माजनो ही नी थो।
द्घूमने-पिफरने को भोत शोक थो, कने कां-कां चल्यो जातो। अब तो खेर हवई-जहाज में द्घूमे हे पन पेलां तो यूंज ही भटकतो रेतो। एक बार तो आठ-आना पैसा जेब में था ने साइकिल से ठेठ साँची तक चल्यो गयो। इन्दौर का आस-पास ऐसी कोई जगह नी होगी जहाँ नी गयो हो। सब का सब जंगल तक देख्या। मतलब यो कि नई-नई चीज देखने की, करने की समझने की धुन थी। हर चीज में उखे जसे होस नी रे। कभी तो कई काम करने बैठे तो ओ मेंई डूब जाय ओर छोडे तो जने कभी कर्योई नी हो ऐसो लगे। कोई से हेत करे तो सब ओ पे निछावर कर दे और बिसराये तो पिफर देखेज नी। अब भी योई हाल है। 'मालवा कि माटी जसो मन हे जरा सो स्नेह मिले तो चिपकी जावे ओर जरा सी बात पे मतलब अपेक्षा मिले तो बिखरी जावे।' बस यो किरकिेट ओर लिखनी दोई चीज असा हे कि अभी तक ऊब्यो नी हे। पतो नी कब छोड़ दे, कईं के नी सकां। किरकिेट को दीवानो बचपन सेई हे। म्हारो आज भी मन भर आये हे कि पेंट चइये थो किरकेट खेलने के पन द्घर की स्थिति असी नी थी कि एक पेंट दिला देता। आज भी वा बात भोत मन दुखाए हे।
अब कईं कूं यो तो द्घर में जादा रेतो नी थो तो इने कईं-कईं कर्यो म्हारे याद नी हे। रंदो द्घिस्यो, तो चपरासी की नोकरी कर ली, बच्चा होन के छोड़ने जा तो, मास्टरी करी गाँव में। कंई मालम कजन कईं-कईं तो करो। छोटा-बड़ा काम में भेद नी कर्यो कभी। जो कर्यो मनसे कर्यो ओर डूब के कर्यो।
म्हारे याद हे आएटा में जब यो पेदा हुयो ;असाढ़ सुदी सप्तमीद्ध तो इत्ते पानी पड्यो थो कि आखो गाँव डूब गयो थो। सब जना होन द्घर-बार छोड़-छोड़ के ऊंची जगह पर चला गया था। एकाज कारण पूरा जीवन भर एकी यही कहानी री हे कि जब तक यो संद्घर्ष करतोर्यो कोई ने साथ नी दियो ओर उल्टा कित्तीज तरे की बात होन बनाई। कईं कसर नी छोड़ी। वासूदेवशास्त्राीजी ने पत्रिाका बनई थी एकी तो हमने कभी सोच्यो भी नी थो कि या 'सिंगासन योग' की बात सच्ची भी हुई सके पन के हे नी कि 'कुदरत की गत न्यारी।'
अअअ
;प्रभाषजी की माँ के संस्मरण, पुस्तक 'प्रभाष जोशी : ६०' से साभारद्ध
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| करनी धरनी, रहनी गहनी संदीप जोशी |
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मेवाड़ संस्थान में प्रियदर्शनजी ने अच्छा कहा। समावलोकन करते हुए प्रभाष जोशी के पंच तत्व के बारे में बताया। कहा कि प्रभाष जोशी ने क्रिकेट सी के नायडू से, पफक्कड़पन कबीर से, सुर ताल कुमार गंधर्व से, जीवन प्रयोजन गाँधी से और सामाजिक सरोकार जयप्रकाश नारायण से जाना। लेकिन प्रभाष जोशी के मायने इसके अलावा और भी थे।
उनके खेल कूद के दिनों में इंदौर में होलकर की क्रिकेट टीम खेला करती थी। लम्बे चौड़े सी के नायडू उस समय के युग पुरुष खिलाड़ी थे। पिताजी और उस समय इंदौर के युवा लोग सी के नायडू और मुश्ताक अली के खंेल के कायल थे। वे इंदौर के यशवंत क्लब में इन दोनों खिलाड़ियों को खेलते देखने जाते। अगर मौका मिलता तो खिलाड़ियों को गेंद भी करते। बडे़ लेकिन साधारण परिवार से होने के कारण खेलने के सपफेद जूते व कपड़े जुटा नहीं पाते। पिफर भी पालिश करके गुजारा करते। वहीं से पिताजी का क्रिकेट प्रेम बढ़ा और नायडू से लेकर सचिन तक खेल के महान भारतीय खिलाड़ियों के गुणगान लिखते रहे। खूब देखा, समझा, आनन्द लिया।
सपफलता असपफलता से परे कबीर का पफक्कड़पन और द्घुमक्कड़पन अपनाया। कबीर को कुमार जी की मधुर वाणी से सुना और अध्ययन किया। हमें भी पढ़ाया। कबीर का 'वा द्घर' उनको सबसे न्यारा लगता था। लेकिन आज के विभिन्न परिप्रेक्ष से कभी विमुख नहीं होते थे। 'करनी धरनी, रहनी गहनी' में उनकी आस्था गहरी थी पर जानते थे कि यह सब भी एक दिन 'बिराना' होगा। वे पुरानी चीजों को नए और अपने ढंग से करते थे। कबीर की उलट बांसी का, लिखने में सीधा इस्तेमाल करते। अकेले होते तो कबीर को ही सुनते।
कुमार गंधर्व भी इंदौर के पास देवास में रहते थे। पिताजी ने उनको और उनके गायन को नई दुनिया के पूर्व संपादक राहुल बारपूते और चित्राकार विष्णु चिंचालकर यानी गुरुजी के सानिध्य में जाना, समझा और दीवाने हुए। कुमार जी का छोटी द्घुमावदार तान भरना और शास्त्राीय संगीत से हटकर लोक व भक्ति संगीत में रमना, पिताजी के लिए प्रेरणादायक था। वे अक्सर कुमार जी के बीमार होने के बावजूद ऐसा अच्छा गाने के बारे में बात करते व बताते थे। कुमार जी के कबीर गायन में ही वे अपना सारा जीवन बिता सकते थे। वे जब इंदौर जाते कुमार जी के द्घर देवास जरूर जाते। ट्रेन से इंदौर जाते समय हमें देवास के टिले पर कुमार जी का द्घर दिखाते। कुमार जी के गाए एक-एक भजन के बारे में बताते और समझाते। मित्राों को सुनने को कहते और टेप या सीडी भेंट करते। पत्राकारिता से अलग कुमार जी का गायन उनका नशा था।
महात्मा गाँधी की शताब्दी के समय ही पिताजी महानगरी दिल्ली आए और बसे। मैं १९६९ में तीन साल का था। द्घर में हर बात या बहस गाँधीमय ही होती। रहे भी तो गाँधी निधी या गाँधी शांति प्रतिष्ठान में। गाँधी जी के जीवन प्रयोजन को अपनाया लेकिन आनन्द के लिए खेल और उत्सव नहीं छोड़े। पत्राकारिता करते हुए भी कोशिश करते कि मुद्दों को गाँधी जी द्वारा सुझाए रास्ते पर रखें। मैं बहुत छोटा था तभी गाँधी जी की आत्मकथा उनसे भेंट मिली। और २००९ शुरू होते ही 'हिन्द स्वराज' पढ़ने के लिए पीछे पड़े। एंथनी परेल की गाँधी जी पर लिखी दो किताब भेंट कर गए हैं। एक पढ़ ली है और दूसरी पढ़ रहा हूँ। वे मानते थे कि गाँधी जी को नई पीढ़ी पढ़े और भारतीय समस्याओं के भारतीय हल खोजे। वे मानते थे कि समस्याओं के हल जितने स्थानीय होंगे उतने स्वाभाविक व तटस्थ होंगे। पिताजी मानते थे कि 'हिन्द स्वराज' में ही लोगों का सच्चा स्वराज है। पिफर से नए सिरे से 'हिन्द स्वराज' पढ़ना है।
हम छोटे थे तब सुनने में आता कि पिताजी जयप्रकाश नारायण के साथ जगह-जगह जाते हैं। पिफर उनकी एक अजीब किताब आई 'चम्बल की बन्दुकें गाँधी के चरणों में' और डाकू मोहर सिंह व तहसिलदार सिंह द्घर आने लगे। ईमरजन्सी में गाँधी शांति प्रतिष्ठान रहने गए तो पिताजी बताते कि यहीं जेपी रहते हैं। जेपी के बर्तन बिस्तर उत्साह और गर्व से दिखाते। पिताजी ने गाँधी जी को पढ़ा, विनोबा को जाना लेकिन काम जेपी के साथ ही करने को मिला। जेपी के आंदोलनकारी स्वभाव के ही कारण पिताजी आंदोलनों से जुड़ने लगे। पत्राकारीय धर्म निभाते हुए वे आंदोलन के हिस्सा बन जाते और आंदोलनकर्ता हमारे परिवारी। राजनीति जेपी और इंदिरा गाँधी के संबंधों के समय ही समझी।
इन पंच तत्वों के अलावा प्रभाष जोशी में और कई तत्व थे। लेखनी में 'जैसे बोलना वैसे ही लिखना' मंत्रा उनको भवानीप्रसाद मिश्र से मिला। लेकिन उनकी रुचि और नजर राजनीति, खेल, संगीत, लोकहित व सामाजिक सरोकार सभी में रही। इसलिए उनके लेखन में कब राजनीति में खेल, खेल में संगीत और लोक सरोकार में कबीर आ जाता, पता नहीं चलता था। लेकिन मुझे उनके लेखन में श्र(ांजलियां सबसे गजब लगती थीं। उनके लिखने में जाने वाले को जानना जरूरी नहीं होता था और पढ़ने पर लगता था जानता हूँ।
संगीत में उनकी रुचि केवल कुमार गंधर्व तक ही सीमित नहीं थी। किसी का भी गाया अच्छा व मेहनती संगीत उन्हें लुभाता था। माईकल जैकसन से लेकर मलकीत सिंह तक सभी को पिताजी ने खूब सुना। मुझे याद है, मैं चार महीने इंग्लैंड में क्रिकेट खेल कर लौटा और मलकित सिंह का पहला टेप लाया था जिसका 'मावां ठण्डियां छावां' सुन कर उन्होंने करीबन १०० टेप खरीद कर मित्राों को बांटे। बरसों तक मम्मी के बोर होने पर भी सुबह द्घर में सुब्बालक्ष्मी का विष्णुसहस्त्रानाम बजता रहता था।
मित्राता भी भरपूर निभाते। इंदौर के शुरुआती दौर से रहे मित्रा राजेन्द्र माथुर, नरेन्द्र तिवारी और शरद जोशी को जीवन भर याद करते रहे और सम्मान देते रहे। माताराम यानी मेरी दादी की दो साल बाद 'सेन्चुरी' धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रहे थे। अब कौन मनाएगा, शायद हम।
पिताजी ने राजनीति भी खूब करी। सभी पार्टियों के राजनेताओं से उनके मधुर संबंध रहे। इसका कारण जो मुझे लगा, उन्होंने कभी नेताओं पर व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाए लेकिन लगातार नीतियों पर खिलापफत लिखते रहे। रामनाथ गोयनका से पिताजी ने व्यस्थापन कैसा हो जाना और लगातार नोकझोंक के बावजूद सम्मान भरोसा दोनों तरपफ रहा व दिखा। राजनीति में सिवाय खुद चुनाव लड़ने के चुनाव अवलोकन प्रचार प्रसार से लेकर नीति विश्लेषण सब किया। वीपी सिंह सरकार बनते समय कई बार ऐसा हुआ जब द्घर आता तो नेताओं के रक्षक मुझे मेरे द्घर में ही नहीं आने देते थे क्योंकि कोई नेता अन्दर होता। समय बदला राजनीति बदली और पिताजी विमुख होते गए।
तब उन्होंने नए विचार और नए मुद्दे तलाशे। बाबरी मस्जिद, सूचना का अधिकार, मानवाधिकार, हिन्द स्वराज और हाल की पत्राकारिता में बाजारवाद पर उनका ध्यान गया।
प्रभाष जोशी लगातार आगे देखते व बढ़ते रहे। जीवन जीते व आनन्द लेते रहे। अपनी गाड़ी धीरे-धीरे हाँकते रहे। और सचिन तेंदुलकर की महानतम पारी देखते हुए 'वा द्घर' चले गए। वे शायद ऐसे ही जाना चाहते थे जब पूछा जाए 'अभी क्यों'।
प्रणाम
;लेखक प्रभाष जोशी के जेष्ठ पुत्रा हैं जिन्होंने रंणजी स्तर तक क्रिकेट खेला है पिफलहाल एयर इंडिया में खेल अधिकारी हैंद्ध |
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वह सुबह कभी तो आएगी गोपाल जोशी
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कई यादें जुड़ी हैं दादा ;प्रभाष जोशीद्ध के साथ की। पिता नाजिर थे। द्घर के हालात बहुत अच्छे नहीं थे। थोड़े बड़े होते ही दादा ने कहीं नौकरी पकड़ ली। वेतन मिलने पर हुक्मचंद के पिता से लट्ठे वाला कपड़ा ले आए। उसके दो कुर्ते बनवाए। एक खुद पहना दूसरा मुझे दिया। हमारे पास वही दो कुर्ते थे, अच्छा कपड़ा के नाम पर। हम उसे धोते थे। लोटे में जलते उपले डालकर प्रेस करते थे और पहना करते थे। उसके बाद दादा ने बहुत से कीमती कुर्ते पहने। लेकिन उस लट्ठे वाले कुर्ते को पहनने में जो खुशी हुई थी वो कभी नहीं हुई।
हम दोनों भाइयों में कई तरह का पागलपन था। उनमें से एक क्रिकेट भी रहा। हम में क्रिकेट प्रेम का बीज रोपने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के प्रथम कप्तान सीके नायडू थे जो हमारे ही इलाके के थे। दादा खेल को देखते-देखते उसमें पूरी तरह डूब जाया करते थे। मुझे याद है पिफरोजशाह कोटला में टेस्ट मैच चल रहा था। दादा के पास मैच का पास आया था। उस दिन गावस्कर ३४ वां शतक लगाकर टेस्ट में विश्व कीर्तिमान बनाने वाला था। दादा मैच देखने नहीं गए। मुझसे भी कहा आ अपन आज टीवी पर मैच देखते हैं। हमारा गावस्कर दुनिया में झंडा गाड़ेगा आज। हमने द्घर में टीवी पर पैच देखा। शतक बनाने पर दादा खूब रोए। वो खुशी के आँसू थे। पिफर पानी से चेहरा धोया-पोछा। आकर बोले-'चल अब अपन पिफरोजशाह कोटला मैच देखने चलते हैं।' हम स्टेडियम पहुँचे। वहाँ सुनील गावस्कर दादा का इंतजार कर रहे थे। 'जोशी जी मैं आपको ही देख रहा था... आशीर्वाद के लिए।'
इसी तरह एक दपफा वो टीवी पर मार्टिना हिंगिस का मैच देख रहे थे। मैं भी उनके साथ था। बोले-'गोपाल, दर्शक दीर्द्घा में बैठी उस महिला की आँखों को देख, उसमें एक सपना तैर रहा है... वह मार्टिना हिंगिस की माँ है... छह-सात की उम्र में उसने नवरातिलोवा के खेल से प्रभावित होकर अपनी बेटी के हाथों में रैकेट पकड़ा दिया था कि वो भी दुनिया की बड़े टेनिस खिलाड़ी बनेगी। इसीलिए उसने उसका नाम मार्टिन रखा। मार्टिना नवरातिलोवा से लेकर वह सपना आज पूरा होने वाला है। एक माँ का सपना और हिंगिस जीत गई। दादा खुशी से रो पड़े। हिंगिस का पहला ग्रैंड स्लैम था। एक माँ का सपना पूरा हुआ था। उस खुशी को अहसास कर दादा की आँख भर आई थी। तो ऐसे थे दादा।
एक बार सोपान को नई दौर ले गया वहाँ मैंने बहुत से सिनेमा द्घरों में पास की व्यवस्था कर उसे सिनेमा दिखाया। दिल्ली वापसी पर सोपान ने प्रभाषजी से शिकायत की-'आप तो यहाँ हमें पिफल्म नहीं दिखाते हैं। गोपाल चर्चा की इंदौर में क्या धाक है। एक पफोन करने पर मुक्त में सिनेमा देखने को मिल जाता था।' उस समय में नई दुनिया के इंदौर संस्करण में पत्राकारिता करता था। सोपान की शिकायत के आधा द्घंटा बाद ही दादा का पफोन आया। डांटने के लहजे में बोले-'क्या ऐसे होगी पत्राकारिता?' उनका इशारा पत्राकारिता की धौंस जमाकर मुक्त पास लेने से था। मैंने स्पष्टीकरण दिया कि मैंने इसके लिए पत्राकारिता का सहारा नहीं लिया बल्कि सिनेमा द्घरों के मालिक मेरे दोस्त हैं। दरअसल दादा विशु( रूप से पत्राकार थे उन्होंने कभी इसके जरिए व्यक्तिगत लाभ लेने या परिवार को पफायदा पहुँचाने का काम नहीं किया।
दादा को पिफल्म देखने का बहुत शौक था। खासकर राजकपूर की पिफल्में। पिफल्म 'जागते रहो' हम दोनों ने सोलह बार देखी। 'तीसरी कसम' आठ बार। 'प्रेम रोग' भी हमने साथ-साथ देखी। ऐसे ही लगभग दर्जन भर पिफल्में हमने साथ-साथ देखी। दादा को राजकपूर की पिफल्म 'पिफर सुबह होगी' में शाहिर का लिखा गीत 'वह सुबह कभी तो आएगी' कापफी प्रिय था। कुछ समय पहले एक रात उन्होंने इस गीत के अंतरे, 'माना कि तेरे अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं, इंसानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी वो सुबह कभी तो आएगी को इस तरन्नुम गाते रहे और रोते रहे। मैंने भी उनके गाने में साथ दिया। मैं समझ नहीं पाया वो रो क्यों रहे हैं। क्या दर्द है उनके भीतर। उन्हें किस सुबह का इंतजार है? क्या सचमुच वो आएगी? जब दुख के बादल पिद्घलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा। जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नज्में गाएगी। दादा नहीं रहे, अब हमें भी उस सुबह का इंतजार है।
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;लेखक प्रभाष जोशी के छोटे भाई हैं और बचपन के दिनों में साथ-साथ क्रिकेट खेलते थे। गोपाल जोशी में नई दुनिया से लेकर नवभारत टाइम्स में खेल पत्राकारिता की हैद्ध |
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| कमजोरों का साथ देने वाली संवेदनशीलता सोपान जोशी |
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जब मेरे पिताजी किशोर थे तो पिफल्म खूब देखते थे। वह पचास का दशक था। उस वक्त हिन्दी पिफल्मों में राजकपूर, देवानंद और दिलीप कुमार की धूम थी। मेरे पिताजी ने इनमें राजकपूर को पसंद किया। इसकी एक बहुत बड़ी वजह राजकपूर की सेंसिबिलिटी थी। जो संवेदनशीलता राजकपूर की पिफल्मों में दिखाई देती थी उसे पिताजी भी खुद के भीतर पाते थे। दरअसल, ये वो संवेदनशीलता है जो किसी भी गरीब या किसी दबे मनुष्य की परिस्थिति को उन लोगों को बता सकने का काम करती है जिनके पास किसी भी तरह की सत्ता है। स्टार त्रायी में राजकपूर ही थे जिसमें सेंसिबिलिटी थी। वे आम आदमी और कमजोर के पक्ष में बाकी दो की तुलना में ज्यादा मजबूती के साथ खड़े थे। जिसे अंग्रेजी में 'अंडर डॉग' कहा जाता था उसके साथ रहे राजकपूर और मेरे पिता। राजकपूर ने ये चीजें हॉलीवुड स्टार चार्ली चैपलिन से ली थीं। चार्ली की तमाम पिफल्मों में नायक बहुत कमजोर और पराजित हुआ करता था। राजकपूर की पिफल्में चाहे वो 'जागते रहो', 'श्री ४२०', 'आवारा', 'छलिया', 'अनाड़ी' या 'तीसरी कसम' हो सभी में नायक आम आदमी या हाशिए के आदमी का प्रतिनिधित्व करता था। ये चीजें पिताजी के लेखन, उनकी पत्राकारिता में भी आई। उनका पूरा जीवन हाशिए और शोषित आदमी के साथ खड़ा रहा, उसकी लड़ाई लड़ता हुआ। इसका मतलब ये नहीं कि पिताजी ने राजकपूर की पिफल्में देखकर यह सब सीखा। अलबत्ता आदमी जिस प्रवृत्ति का होता है वो वैसी ही चीजें पसंद करता है और उन्हीं लोगों को पसंद भी। मेरे बड़े पापा ;प्रभाषजी के भाई सुभाष जोशीद्ध पारिवारिक बातचीत में मजाक भी किया करते थे- 'सब ठीक है, मगर राजकपूर में लिजलिजापन है।'
रज्जू भैया यानी राजेन्द्र माथुर के साथ पिताजी के रिश्ते समझना कापफी कठिन है। यह बेहद जटिल रिश्ता था। इसे आम आदमी समझ नहीं सकता। जिन्होंने नहीं समझा उन्होंने तरह-तरह से इसकी अपने ढंग से व्याख्या की और अटकलें लगाईं। मेरे पिताजी का स्वभाव था कि वो बहुत कम लोगों से बहस किया करते थे। असहमति के बावजूद वो चुप लगा जाया करते थे, मंद-मंद मुस्कुराते हुए। लेकिन रज्जू भैया के साथ वो सीधे बहस पर उतारू हो जाते। वो बहस कापफी तीखी हो जाया करती थी। एक मायने में वो रज्जू भैया के साथ 'बचपना' को जीते थे। अगर किसी बात पर रज्जू भैया ने मना कर दिया तो वे विचलित हो उठते। सोच में पड़ जाते- रज्जू ने मना कर दिया, एतराज जताया। इसका मतलब कोई बड़ी बात है। एक सच्ची और पवित्रा दोस्ती थी दोनों में।
रामनाथ गोयनका के साथ पिताजी के संबंध जटिल नहीं थे- लेकिन दोनों को पता था कि इस रिश्ते की सीमा क्या है। गोयनका कड़क मिजाज थे। ऐसा भी नहीं कि वो सत्ता को मिलाकर चलने वाले नहीं थे- एंटी स्टेब्लिसमेंट की उनकी छवि को मैं सही नहीं मानता। इंदिरा गाँधी को बहुत स्नेह करते थे वो। नेहरू से उनके संबंध प्रगाढ़ थे। हाँ यह बात यकीनी तौर पर सच है कि उन्होंने महज मुनापफे के लिए अखबार नहीं निकाला। मालिक दो तरह से संपादकों को साधता है- कुछ को पैसा देकर ;ऊंचा वेतनद्ध, जिसकी श्रेणी में पिताजी नहीं आते थे। पिताजी इस मिट्टी के बने ही नहीं थे कि वो पैसा लेकर किसी की मर्जी की कर दें, या कुछ लिख छाप दें। वे चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकते थे, क्योंकि ऐसा करना उनकी प्रवृत्ति नहीं थी। ऐसे में गोयनका के पास दूसरा रास्ता था कि वो पिताजी की मर्जी को स्वीकार करते। एक अर्थ में उनके ताप को झेलते और उन्होंने झेला। शुरुआती दौर में एक्सप्रेस समूह ज्वाइन करने से पहले पिताजी ने गोयनका को मनाकर दिया था। यह कहकर कि आप जिस तरह से दूसरों के साथ ट्रीट करते हैं, अपन के साथ वो नहीं चलेगा। गोयनका ने पिताजी की हर शर्त मान ली थी। वहाँ काम करते हुए भी कई बार पिताजी गुस्से में आकर द्घर बैठे जाते थे।
गोयनका उन्हें मनाने कई दपफा द्घर आए। एक बार पिताजी ने उन्हें लिखा-'बहुत दिन हुए आप मिलते नहीं।' जवाब आया, 'मिलकर पफायदा क्या- तुम करते तो हो अपनी मर्जी की।' गोयनका ने पिताजी के ही नहीं उनके पहले एक्सप्रेस के संपादक रहे श्रीश मुलगांवकर के नाज-नखरे को भी झेला। मुलगांवकर काबिल थे मगर बहुत टपफ भी। आज कोई मालिक ऐसा नहीं कर सकता। अब मालिक न वैसे मालिक रहे, न उस स्तर के संपादक। दुनिया का सबसे बड़ा अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स इस मायने में उदाहरण है, जहाँ संपादक का महत्व आज भी बरकरार है।
पिताजी किसी का दिल नहीं दुखाते। वे बहुत भावुक थे। किसी को ना करना उनके स्वभाव में नहीं था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वो गलत करने पर किसी को बख्श दें। उन्होंने राजेन्द्र माथुर, अटल बिहारी वाजपेयी समेत अपने कई प्रिय को नहीं बख्शा। यहाँ तक कि जनसत्ता में उनको जो सबसे प्रिय थे आलोक तोमर, उनको भी किसी वजह से अखबार छोड़ देने के लिए कहा। बावजूद इसके तोमर जी आज भी पिताजी का उतना ही सम्मान करते हैं। पिताजी और माँ में गजब की अंडरस्टेंडिंग रही। पिताजी संबंध बनाते थे। मगर उन संबंधों को निभाने का काम माँ ने ही किया। मुझे याद नहीं आता कभी दोनों एक साथ गुस्सा किये हों। पिताजी के गुस्सा करने पर माँ शांत रहती थी। जब माँ को क्रोध आता था तो पिताजी चुप रहते।
पिताजी हमसे अपना काम भी करवाते थे, जिसने मेरे भीतर अखबार की समझ पैदा की। जब हमारे पढ़ने का समय होता था तो वे दफ्रतर में अखबार बना रहे होते थे। हम तो होम वर्क करने से रहे। अलबत्ता हमसे ही अखबार में खबर ढूंढ़ने का काम करवाते। भले ही अगले दिन परीक्षा क्यों न हो? मैं सातवीं कक्षा में था। अगले दिन पफाइनल एग्जाम था। शाम को अखबार का बंडल थमा दिया और कहा पफलां विषय से संबंधित तमाम खबरों की क्लिपिंग दो। ऐसा करने में सुबह के दो बज गए। माँ के एतराज करने पर कहा- साल भर क्या करता है, जो परीक्षा के एक दिन पहले ही पढ़कर पण्डित बनेगा?
पूर्वजों का आदर करना बड़ी बात होती है। यही चीज कई बार आदमी को कापफी आगे ले जाती है। कम से कम मेरा तो यही मानना है। पिताजी अपने पूर्वजों का खूब सम्मान करते थे। आप जो यह बड़ी मेज ;जनसत्ता अपार्टमेंट वाले फ्रलैट मेंद्ध देख रहे हैं इसे मैं इस छोटी जगह पर रखने के पक्ष में नहीं था। वे अड़ गए। वजह यह थी कि यह वो मेज है जिस पर कभी श्रीश मुलगांवकर और बीजी वर्गीज जैसे देश के शीर्ष संपादक बैठकर लिखा करते थे। इस मेज को पिताजी एक्सप्रेस छोड़ते वक्त साथ लाए थे। इसी पर बैठकर वो लिखा करते थे।
मैं मानता हूँ कि संपादक केवल स्किल से नहीं बनता। इसके लिए 'एथिकल' भी होना पड़ता है। उसे कई निर्णय लेने पड़ते हैं। बनते-बनते ही कोई संपादक बनता है। मेरे पिता बतौर संपादक कैसे थे ये दूसरे लोग ज्यादा बता सकते हैं। मैं तो इतना ही कहूँगा कि आज जिस 'प्रभाष परंपरा' की बात हो रही है, वो आगे चलने वाली नहीं है। जब बरपुते, मुलगांवकर, राजेन्द्र माथुर परंपरा नहीं चली तो प्रभाष परंपरा कैसे चलेगी।
गोविन्दाचार्य का पिताजी के निधन पर दिया गया वक्तव्य मुझे सबसे ज्यादा पसंद आया और अर्थवान लगा। गोविन्दाचार्य ने कहा है-'अब हम अभाव में जिंदगी को जिएँगे।
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