फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
आपका पन्ना
गुरु हो तो काशी जैसा
 
'पाखी' का करीब पांच वर्ष पुराना पाठक हूं। संकोचवश पत्रा नहीं लिख सका। वैसे तो 'पाखी' की उड़ान साहित्य की दुनिया में किसी पहचान की मोहताज नहीं है, लिहाजा प्रकाशित सामग्री पर टिप्पणी करना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। आज जिस वजह से यह पत्रा लिख रहा हूं, इसकी वजह है एक शिष्य द्वारा अपने गुरु को उनके ७५वें जन्मदिन पर दी गई संस्मरणात्मक बधाई। माता-पिता के बाद गुरु-शिष्य के बीच एक ऐसा पवित्रा रिश्ता होता है, जो भावनाओं के ऐसे धागों से बंधा होता है, जिसके लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। 'जान दी, दी हुई उसी की थी' में दिनेश कुशवाह ने अपने गुरु और प्रगतिशील आंदोलन की
जानी-मानी शख्सियत, पफक्कड़ कबीर काशीनाथ सिंह के विषय में लिखकर भावनाओं की ऐसी
पिचकारी छोड़ी कि आंखें गीली हो गईं। वाह गुरु हो तो काशीनाथ जी जैसा और शिष्य हो तो दिनेश जी जैसा। प्रगतिशील लेखक संद्घ के अनेकों कार्यक्रमों में काशीनाथ जी से कई मुलाकातें हुई हैं। उनकी सरसता, सरलता, सहजता के क्या कहने। गुरुवर चौथीराम जी तो और ही बाल-गोपाल सुलभ स्वभाव वाले हैं। हाल ही में लखनऊ में उनके साथी व सुप्रसि( कथाकार देवेंद्र जी से भी भेंट हुई थी। जो संस्मरण दिनेश जी ने लिखा है, उसके लिए 'पाखी' के माध्यम से उन्हें ढेरों बधाई। 'पाखी' को भी बधाई, जो उन्होंने संपादकीय के तुरंत बाद दिनेश जी को स्थान दिया और साथ ही काशीनाथ जी के स्वस्थ, सुखद, शतायु व मंगलमय जीवन की कामना।
मुहम्मद नईम, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी
 
सटीक स्टैंड लेती है 'पाखी'
 
मैं 'पाखी' के साथ शुरू से ही जुड़े रहे साहित्यिक
सरोकारों की निष्पक्ष प्रतिब(ता का कायल हूं। 'पाखी' एक सटीक स्टैंड लेने वाली और नीर-क्षीर विवेक की परंपरा पर चलने वाली पत्रिाका रही है। महुआ-गोस्वामी प्रकरण में भी यह देखने में आ रहा है। आज हमारी युवा पीढ़ी में लापरवाही और 'यूज एंड थ्रो' की जो अपसंस्कृति पनप रही है वह नहीं होनी चाहिए, कम से कम लेखकों में। साथ ही जो मौकापरस्त गुट हैं वह अपनी आदतों से बाज आएं और इस तरह बिना वजह विवाद खड़े न करें। आपको चाहिए कि आप नए विषयों पर अपने गांव, अपने बचपन, अपनी बोल्डनेस, अपने सेक्स संबंधों से निकल कुछ ऐसी नई रचना करें जिसमें आज का सच धड़कता हो। नक्सलवाद, खनन, एपफडीआई कितने कितने सारे विषय हैं। लेकिन नहीं, ये चुके हुए कारतूस, सत्ता की रेवड़ी के लालच में द्घिरे, खाए-पीए, रसरंजन करके अद्घाए हुए लोग इन विषयों पर ध्यान नहीं देते।
संदीप अवस्थी, अजमेर, राजस्थान
 
छटपटाती स्थापित मान्यताएं-स्थापनाएं
 
आत्महत्या अथवा पलायन मनुष्य के सूक्ष्म होने की निशानी है। जीवन एक सतत सिलसिला है इससे कोई भी मुक्त नहीं हो सकता। इतिहास का अंत, ईश्वर की मृत्यु और कविता के अंत तक की द्घोषणा की जा चुकी है, इसके बावजूद मनुष्य चलायमान होकर सृजनरत है। अप्रांसगिक हुईं विचारधाराएं, प्रवृत्तियां और धर्म चूककर असपफल हो गए हैं। प्रश्न उठता है कि अब आगे क्या होगा? लौकिक और अलौकिक स्तर पर स्थापित मान्यताएं-स्थापनाएं अब छटपटा रही हैं। मनुष्य मुक्ति और शांति की कामना कर रहा है। पारलौकिकता में मनुष्य को एक प्रकाश स्तंभ अवश्य ही प्राप्त होगा समस्या बस यह है कि मनुष्य अति मानसिक चेतना को ही नहीं जान पाया है तो वह पारलौकिकता तक कैसे पहुंच पाएगा। इतिहास में ईश्वर हमेशा से असुरक्षित रहा है साहित्य में भी वह समाप्त नहीं हुआ है। 'पाखी' दिसंबर-२०१२ अंक में श्रवण कुमार गोस्वामी की डायरी विधा के सहारे की गई जांच-पड़ताल चौंकाने वाली है। कुछ रचनाकार सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए कैसे लालायित रहते हैं इसमें बतलाया गया है।
के.के. सिंह, नारायणपुर, छत्तीसगढ़
 
बाजारू होने का खतरा
 
'पाखी' का दिसंबर-२०१२ अंक सदा की ही भांति समय पर मिला। सत्यनारायण पटेल की लंबी कहानी 'कापिफर बिजूका उपर्फ इब्लीस' के लिए तारीपफ के शब्द नहीं मिल पाए। अजय मेहताब और ज्योति कुमारी की कहानियां भी मन छू गईं। सारा का सारा अंक पठनीय रहा पर 'कटद्घरे में' स्तंभ के अंतर्गत श्रवण कुमार गोस्वामी का लेख 'महान लेखक बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं' पर शेष मित्राों की तरह प्रतिक्रिया देने से स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूं।
'कुछ लोग जो ज्यादा जानते हैं, इंसान को कम पहचानते हैं...' झरिया प्रेस क्लब में मित्राों के साथ खड़ा दूर से आते गीत के मुखड़े को सुन मन व्यग्र-सा हो उठा। पास ही कुछ स्थानीय वरिष्ठ रचनाकार-आलोचक जन 'पाखी' में प्रकाशित गोस्वामी जी के लेख में महुआ माजी पर की गई टिप्पणियों पर कुछ आक्रोशित थे।
लेकिन गोस्वामी जी एक विद्वान की तरह आप भी 'नीलकंठ' नहीं हो पाए। मन के दुख-विषाद को उगलकर विवाद की जमीं पर बहस की खर-पतवार बो बैठे। झारखंड की एक होनहार लेखिका पर अकाट्य से आरोपों की तीखी बौछार भले ही कई पाठकों को रुचिकर न लगे पर 'साहित्य की मंडी' में चल रहे व्याभिचार की तरपफ कुछ संकेत देने में जरूर सपफल दिखे आप। इसमें दो राय नहीं कि यह
'बाजारवाद' एक दिन सब कुछ बाजारू कर डालेगा। लेखिका के मार्गदर्शक होकर भी गोस्वामी जी को उसे कुछ ओछी उपाधियां देने से बचना चाहिए था, लेकिन बेचारा आहत मन 'मरता क्या न करता' के तट पर जा बैठा।
गंगाशरण शर्मा, धनबाद, झारखंड
 
पूरी पत्रिाका ही पठनीय
 
'पाखी' अक्टूबर-नवंबर अंक में 'एक आदमी का हलपफनामा' पढ़ा। पढ़ते ही मुझे बंगाल में तीन साल पहले राज्य सरकार द्वारा पारित कानून की याद आई कि किसी भी व्यक्ति को शक के आधार पर जेल में डाल दो। उसे माओवादी बता दो, पिफर बेल की कोई गुंजाइश ही नहीं। जेल में रहकर वह कैसे प्रमाणित कर पाएगा कि मैं निर्दोष हूं? मैं एक समाजिक कार्यकर्ता संगठन का सदस्य भी हूं पर तीन साल पहले ही कानून के चलते आज आदिवासियों की सहायता करने जाने में लोग डर रहे हैं कि कहीं माओवादी कहकर जंगल महल ;पश्चिम मिदनापुरद्ध की पुलिस अंदर न कर दे। हम लोग निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाते थे। अब यह बंद है। आप के विचार से सहमत हूं। 'पाखी' में कुसुम खेमानी जी की कहानी 'कहानी श्रवण कुमार की' और संतोष श्रीवास्तव की कहानी 'तुम हो तो...' अच्छी लगी। सबसे अधिक तो जकिया जुबेरी की कहानी 'बाबुल मोरा' ने प्रभावित किया। भोगवादी मां अपनी बेटियां भी दरिंदे को सौंपती है। और क्या कहूं, पूरी पत्रिाका ही पठनीय है।
रणजीत कुमार सिन्हा, पश्चिम मिदनापुर, प. बंगाल
 
संपादकीय में कलम का जादू
 
'पाखी' का हर अंक पठनीय, ध्यान देने योग्य रहता है। एक-एक रचना विशिष्ट होती है। शब्द स्थिर नहीं, गतिशील होते हैं। रूढ़ नहीं, लचीले होते हैं। प्रयोगकर्ता पर निर्भर है कि वह उसे किस-किस रूप में देखता है। दिसंबर-२०१२ का संपादकीय 'दुनिया तो बदली नहीं, अब भागो!' इस बात को सि( करता है। 'भागो' शब्द को आपने जिन अर्थों में सतर्क और सोदाहरण प्रयुक्त किया है, वह अपने विरोधी शब्द 'संद्घर्ष' और 'बदलाव' के निकट जाकर उनसे दोस्ती करता प्रतीत होता है, अपनी जगह से हटकर ही सही। इसे ही कहते हैं कलम का जादू। श्रवण कुमार गोस्वामी का विवादास्पद आलेख, सत्यनारायण पटेल, मधुकर सिंह, हेतु भारद्वाज और गीताश्री की कहानियां। लैंग्सटन ह्‌यूज, श्याम कश्यप, दुर्गाप्रसाद गुप्त और द्घनश्याम श्रीवास्तव की कविताएं। रोहित पगारे की डायरी, भारत भारद्वाज, अशोक गुजराती और पवन कुमार की रचनाएं विशेष रूप से मन खींचती हैं।
शंभु बादल, हजारीबाग, झारखंड
 
...पिफर भागने के लिए
 
जीवंत संपादकीय के लिए बधाई। इस पर कापफी बातें की जा सकती हैं। इतिहास से लेकर आज के बाजार तक के संदर्भ लिए हैं आपने। छत्तीसगढ़ से हर वर्ष हजारों लोग काम करने देश भर में जाते हैं। पलायन... भागना। पूरा गांव खाली हो जाता है। सिपर्फ जानवर और बूढ़े मां-बाप रह जाते हैं। ये भागने वाले लौटते हैं अगले वर्ष पिफर भागने के लिए। और हां, पफूकोयामा के आह्वान को तिलांजलि दे दी जाए। इतिहास का अंत नहीं होता, विचार मरते नहीं। दरअसल विचार के साथ नहीं बोलना और नहीं लिखना ही भागना है और आज कि यही सबसे बड़ी त्राासदी है।
नाथमल शर्मा, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
 
कटद्घरे में
 
श्रवण कुमार गोस्वामी के लेख 'महान लेखक बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं' ने महुआ माजी की दोनों कृतियों 'मैं बोरिशाइल्ला' और 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' को और इनकी लेखिका दोनों को कटद्घरे में खड़ा कर दिया है। कुछेक लेखकों की आपसी चर्चा में मैंने सुना है कि 'मैं बोरिशाइल्ला' को प्रकाशन योग्य औपन्यासिक रूप देने में संजीव का हाथ भी रहा है। इस काम के लिए उन्हें अच्छा-खासा मुद्रा-लाभ भी हुआ और यह काम राजेंद्र यादव की मध्यस्थता से हुआ।
बकुल, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
 
एकांकी भी प्रकाशित करें
 
'पाखी' के दिसंबर अंक में श्रवण कुमार गोस्वामी का महुआ माजी पर केंद्रित आलेख 'महान लेखक बनते नहीं बनाए भी जाते हैं' पढ़ने को मिला। महुआ माजी का उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' और 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' मुझे पढ़ने का अवसर तो अभी तक नहीं मिला, लेकिन महुआ माजी की कहानियों एवं उपन्यासों की समीक्षा मुझे पढ़ने का मौका मिला है। महुआ माजी के प्रति मेरे दिल में एक लेखिका के नाते जो स्नेह था वह श्रवण कुमार गोस्वामी का आलेख पढ़ने के बाद समाप्त हो गया। सत्यनारायण पटेल की लंबी कहानी 'कापिफर बिजूका उपर्फ इब्लीस' और मधुकर सिंह की 'पहाड़' कहानी बहुत अच्छी लगी। हर बार की तरह इस बार भी संपादकीय धारदार लगा। 'पाख्ाी' में प्रकाशित सभी रचनाएं स्तरीय एवं पढ़ने योग्य होती हैं। एकांकी भी प्रकाशित करने की कृपा करें।
शंभू शरण 'सत्यार्थी', औरंगाबाद, बिहार
 
...बांग्ला भी नहीं आती?
 
बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के अधिकृत विशद विवरण कितनी ही बांग्ला पुस्तकों में मिलते हैं। पश्चिम बंगाल ;भारतद्ध और बांग्लादेश में छपे कितने ही उपन्यासों, कहानियों आदि के साथ ही ऐतिहासिक दस्तावेजों में मुक्तिसंग्राम के प्रामाणिक तथ्य दिनांकों सहित मिलते हैं। स्व. सुनील गंगोपाध्याय के दो वृहद उपन्यासों 'एका एवं कयेकजन' और 'पूर्व-पश्चिम' में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के प्रामाणिक तथ्यों की अत्यंत ही मार्मिक, कलात्मक, सृजनात्मक अभिव्यक्ति हुई है। बांग्ला भाषा के जानकार किसी भी व्यक्ति के लिए यह सब प्राप्त करना सहज है।
हां, बंगालियों में 'माजी' कोई जातिनाम-वंशनाम ;ेनतदंउमद्ध नहीं है। 'मांझी' जरूर है, जरूरी नहीं कि वे मल्लाह-मांझी ही हों। बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल दोनों ही जगहों में मांझी सरनेम वाले लोग मिलते हैं। मैंने महुआ के अलावा किसी बंगाली को 'माजी' सरनेम लगाते-लिखते नहीं देखा। बंगाली होने के नाते अहिंदी भाषी हिंदी रचनाकार होने का सहानुभूतिपूर्ण लाभ लेने से नहीं चूकने वाली महुआ को बांग्ला कितनी आती है, यह जानने की बड़ी उत्सुकता है। कहीं वह मांझी को ही माजी तो नहीं लिख रहीं! वैसे उनका नाम, उनका जातिनाम वह किसी भी तरह लिखने को स्वतंत्रा हैं।
आलोक भट्टाचार्य, डोंबिवली, पश्चिम बंगाल
 
भावनाओं को समझो
 
'पाखी' जनवरी २०१३ अंक में आपने नव वर्ष के 'साहित्यिक भोज' में ऐसी मसालेदार सामग्री परोसी कि बदहजमी थम नहीं रही। श्रवण कुमार गोस्वामी और महुआ माजी को व्यक्तिगत रूप से मैं नहीं जानता। लेकिन इस बात पर गर्व है कि दोनों विद्वान हमारे झारखंड के है। इस अंक में यदि आप कहानियां और अन्य सामग्री न भी देते तो हम साहित्यिक भुक्खड़ों के लिए इतनी जायकेदार प्लेट कापफी थी। आज के बपफे संस्कृति की परंपरा के तहत मैं सिपर्फ इन्हीं ेंसामग्रियों को ग्रहण कर पाया हूं। कहानियां तथा अन्य सामग्री हाशिए पर चली गई। जिस चौतरपफे हमले से महुआ माजी और उनकी कृतियों की साहित्य जगत के द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा सरीखे महारथियों ने चक्रव्यूह रचकर द्घेराबंदी की है, महुआ की कृतियों की श्रेष्ठता को ही दर्शाता है। अब जबकि महुआ जी के खिलापफ उनके पड़ोसी साहित्यकारों ने अपनी तरकशें खाली कर दी हैं, वे ;पड़ोसीद्ध पाठकों के समक्ष असहाय और निहत्थे हो गए हैं। महुआ जी की कृतियों पर पक्ष-विपक्ष, परिचर्चा आदि पढ़कर अपनी सीमित समझ में सिपर्फ इतना भर आया कि महुआ के पड़ोसी विद्वान कहीं न कहीं पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं। महुआ जी की कृतियों के सम्मानित होने के कारण स्वयं को उपेक्षित और हीन महसूस कर रहे हैं। मूर्ति कला, शिल्प कला, चित्रा कला आदि की तरह साहित्य सृजन भी एक कला है। मूर्तिकार ने मिट्टी, पुआल, काठ आदि कहां से लाए, चित्राकार ने रंग, कूची कहां से लिया सरीखे प्रश्न पिफजूल हैं। हां, किसी की तैयार कलाकृति में अपना नाम जोड़ देना निश्चय ही गलत है। जबकि महुआ जी का कहना है कि उन्होंने ऐसी कोई गुस्ताखी नहीं की है। महुआ जी ने यदि अपनी कृति के सृजनकाल में प्रेरणा स्वरूप कहीं से सामग्री ली भी होगी तो इस पर इतना बवाल गले नहीं उतरता। प्रकरण के बाद महुआ जी से पफोन पर हुई बातचीत के दौरान उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ दृढ़तापूर्वक इस 'यदि' का खंडन किया। महुआ माजी के विपक्ष में बोलने वाले भी इस तथ्य को स्वीकार रहे हैं कि उन्होंने अपने वरिष्ठों से सलाह ली है। अब यदि महुआ जी ने उनका एक-एक करके नाम गिनाने की बजाए सामूहिक रूप से आभार प्रकट कर दिया तो आसमान क्यों पफट पड़ा? 'मैं बोरिशाइल्ला' और 'मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ' के चर्चित और पुरस्कृत न होने की स्थिति में भी क्या वरिष्ठों की ऐसी ही अपेक्षाएं होतीं कि उनके नाम सलाहकारों में क्यों नहीं आए? यह तो ठीक वैसी बात हुई कि मोहल्ले का कोई बच्चा सबको पछाड़कर अव्वल आ गया हो और उसकी उपलब्धि पर अन्य बच्चे शोर कर रहे हों कि अमुक प्रश्न को हल करने में उसने मदद की... ऐसी हरकतें बचकानी हैं। ताज्जुब तो इस बात का है कि ऐसी बचकानी हरकतें साहित्य के दिग्गजों द्वारा की जा रही है। लेखिका के रूपवती होने, अपनी लोकप्रियता के लिए हथकंडे अपनाने जैसे आरोप, आरोपकर्ता की मानसिक हताशा, निराशा एवं कुंठा को दर्शाते हैं। जिनकी कलाई में महुआ जी ने राखी बांधी, जिन्हें पिता तुल्य समझा, जिनसे ट्यूशंस लीं उनका वमन हमारी समझ से परे हैं। इस जगह लेखिका की भावनाओं की कद्र नहीं की गई।
प्रशांत कुमार सिन्हा, देवद्घर, झारखंड
 
भूल-सुधार
 
जनवरी अंक में प्रकाशित परिचर्चा में चित्राा मुद्गल जी द्वारा की गइर् टिप्पणी 'नई पीढ़ी स्वार्थी हो गई है' को 'नई पीढ़ी आत्मकेंद्रित हो गई है' पढ़ें- सं.
 
 
 
 
 
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