फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
सृजन-संदर्भ
साहित्य सर्वेक्षण पर क्षण भर
 
भारत भारद्वाज

 

वर्ष भर में देश के कोने-अंतरे से हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में प्रकाशित पुस्तकों की संख्या का अनुमान लगाना अब कठिन है। पिफर भी इनकी संख्या हजार से ऊपर तो होगी ही। खुद मेरे पास साल भर में करीब छह-सात सौ पुस्तकें आती हैं। साहित्यिक गुणवत्ता की दृष्टि से इनमें मुश्किल से १०० पुस्तकें ही उलटने-पलटने लायक होती हैं। उन उल्लेखनीय पुस्तकों की संख्या ५० से ज्यादा नहीं होती, जो साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी सृजनात्मक रचनाशीलता के कारण समीक्षा योग्य होती हैं या खरीदने लायक। पुस्तकों के प्रकाशन में संख्या की अपार वृ(ि साहित्यिक गुणवत्ता के हृास का स्पष्ट कारण हैं। जहां आजादी के पूर्व देश भर में कुल मिलाकर २५ स्तरीय प्रकाशक भी नहीं थे, वहीं आज उनकी संख्या लगभग पांच-सात सौ से ऊपर है। सिपर्फ अकेले देश की राजधानी दिल्ली में हिंदी के लगभग २५० से ज्यादा प्रकाशक हैं। अब तो अंग्रेजी प्रकाशक पेंग्विन, हार्पर कॉलिंस, यात्राा बुक्स भी हिंदी पुस्तकें छापते हैं। क्योंकि आज हिंदी का बड़ा बाजार है। मुझे हैरानी प्रकाशकों की संख्या में वृ(ि देखकर नहीं हुई है, क्योंकि इससे तो हिंदी का प्रचार-प्रसार ही होता है। मेरी हैरानी का असल कारण है कि आज हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशक भी पुस्तक की गुणवत्ता तो दूर, तथ्यात्मक भूलों और पू्रपफ की अशु(यिों तक पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। पुस्तकों में पुनरावृत्तियों की बात मैं नहीं कर रहा। आज हालत यह है कि प्रतिष्ठित प्रकाशकों के पास भी कायदे का संपादक नहीं है। यही कारण है कि हिंदी के एक प्रतिष्ठित प्रकाशक की महत्वपूर्ण पुस्तकों-'आधुनिक हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली ;अमरनाथद्ध और व्योमकेश दरवेश ;हजारीप्रसाद द्विवेदी की जीवनी-विश्वनाथ त्रिापाठीद्ध में संकेतित तथ्यापरक भूलें, प्रूपफ की अशु(यिां, गलत प्रविष्टियां और पुनरावृत्तियां तो अगले संस्करण में दुरुस्त कर लेते हैं, लेकिन भूलकर भी कभी कृतज्ञता ज्ञापित नहीं करते।
विश्वनाथ त्रिापाठी ने 'व्योमकेश दरवेश' के दूसरे संस्करण में जिस तरह मेरा नामोल्लेख किया है, मुझे हैरानी हुई है। एक बड़े आलोचक की यह असावधानी और लापरवाही मुझे अच्छी नहीं लगी। हमें याद रखना चाहिए कि आजादी के पूर्व क्या, आजादी के बाद के दशकों-यानी लगभग १९७० तक छपी
पुस्तकें मुद्रण की अशु(यिों और तथ्यात्मक भूलों से प्रायः दोषमुक्त हुआ करती थीं। आप १९५८ ई. में लखनऊ में स्थापित मुंशी नवल किशोर प्रेस को देखें। इस प्रकाशन से हिंदी की लगभग कई हजार पुस्तकें छपीं, लेकिन मुद्रण की अशु(यिों से रहित। मुंशी नवल किशोर एक बेहद सावधान प्रकाशक थे और अपने प्रकाशन की पुस्तकों में एक अशु(ि निकालने का तब एक रुपए देते थे, अपने कर्मचारी या किसी व्यक्ति को। लेकिन धीरे-धीरे हमने अपने पूर्वज प्रकाशकों की परंपरा को भुला दिया। यह अच्छा नहीं हुआ।
२०१२ में प्रकाशित विभिन्न विधाओं की हिंदी पुस्तकों पर अनेक पत्रा-पत्रिाकाओं में भरपूर टिप्पणी हुई है। यह अच्छी बात है, लेकिन हमें मालूम होना चाहिए कि वर्ष भर में
प्रकाशित हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों का सर्वेक्षण कैसे आरंभ हुआ और इसका उद्देश्य क्या था। जहां तक मुझे मालूम है, सर्वप्रथम लेखक मन्मथनाथ गुप्त ने मासिक 'सरिता' के जनवरी १९५५ अंक में १९५४ में प्रकाशित पुस्तकों के सर्वेक्षण का सिलसिला शुरू किया। 'सरिता' का उक्त अंक मेरा देखा हुआ है। बाद में यह सिलसिला रुक-रुककर चला। लेकिन बंद नहीं हुआ। चक्रधर ;मार्कंडेयद्ध ने 'कल्पना' के अपने स्तंभ 'साहित्यधारा' में जब-तब सर्वेक्षण किया और पिफर दिल्ली से अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित साप्ताहिक 'दिनमान' में कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने सर्वेक्षण शुरू किया। लेकिन वे एक वर्ष विशेष में प्रकाशित पुस्तकों की सूची मात्रा देते थे, उस पर टिप्पणी नहीं करते थे। लेकिन इससे हिंदी पाठकों को पता चल जाता था कि कौन सी महत्वपूर्ण पुस्तकें निकलीं। वस्तुतः सर्वेक्षण का उद्देश्य हिंदी के सुधी पाठकों को हिंदी की उत्कृष्ट पुस्तकों के बारे में सूचना देना भर नहीं था। बल्कि अच्छे साहित्य के प्रति उनकी सुरुचि का विकास भी करना था। वहां पुस्तकों के चुनाव के पीछे एक दृष्टि हुआ करती थी। वह सूची पत्रा नहीं होता था। सर्वेश्वर ने 'दिनमान' में १९७८ में प्रकाशित जिन पुस्तकों का उल्लेख किया है, उनमें कुछ उल्लेखनीय हैं, कविता संग्रहों में-'त्रिाकाल संध्या' ;भवानीप्रसाद मिश्रद्ध, खुद अपनी आंख से ;विष्णु खरेद्ध, लुकमान अली तथा अन्य कविताएं ;सौमित्रा मोहनद्ध आदि, उपन्यासों में-गोबर गणेश ;रमेशचंद्र शाहद्ध, नाच्यौ बहुत गोपाल ;अमृतलाल नागरद्ध, कटरा बी आरजू ;राही मासूम रजाद्ध, अग्नि स्नान ;राजकमल चौधरीद्ध और कहानी संग्रह में 'दूसरी दुनिया' ;निर्मल वर्माद्ध। उन्होंने अन्य विधाओं की अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का भी उल्लेख किया। बेहिचक मैं स्वीकार करता हूं कि जब १९९१ में मैंने 'हंस' में स्तंभ लिखना शुरू किया तो, पहली बार १९९१ में प्रकाशित हिंदी साहित्य का सर्वेक्षण 'हंस' के जनवरी १९९२ अंक में किया। तबसे निरंतर यह सिलसिला जारी है। वस्तुतः सर्वेक्षण एक उत्तरदायित्वपूर्ण काम है। इसे औपचारिक ढंग से नहीं, बल्कि गंभीरतापूर्वक लेने की जरूरत है। क्योंकि सुधी पाठक या पुस्तकालय अध्यक्ष इसी सूची से पुस्तकें खरीदते हैं। अब सर्वेक्षण पर क्षण भर। दैनिक 'जनसत्ता' को अब तक मैं साहित्य का गजेटियर मानता रहा हूं। लेकिन इधर 'जनसत्ता' कभी-कभार साहित्यिक दुनिया से मुझे लापरवाह लगा। हिंदी-उर्दू के महत्वपूर्ण साहित्यकार देवेंद्र इस्सर नहीं रहे। इस पर 'जनसत्ता' का मौन मुझे अच्छा नहीं लगा। पिफर भी 'जनसत्ता' के कार्यकारी संपादक ओम थानवी में संपूर्ण हिंदी संसार की दुनिया में प्रकाशित असंख्य समाचार पत्राों के संपादकों से ज्यादा साहित्यिक विवेक है। 'जनसत्ता' के ३० दिसंबर अंक में राजेंद्र उपाध्याय ने कविता इस बरस के अंतर्गत 'ठहराव के बावजूद' से टिप्पणी की है, लेकिन यह टिप्पणी उन्होंने पूरी तैयारी के साथ वर्ष २०१२ में प्रकाशित महत्वपूर्ण कविता संग्रहों पर नहीं की। और २०११ के कुछ संग्रह भी गिना दिए। दिनेश कुमार का 'कथा-अकथा इस बरस' ठीक है, लेकिन उन्होंने भी वस्तुतः सूची पत्रा प्रस्तुत किया है। दैनिक जागरण के 'सप्तरंग' में वरिष्ठ आलोचक पुष्पपाल सिंह ने वर्ष २०१२ के महत्वपूर्ण साहित्य का तीन किस्तों में सिंहावलोकन किया है। उनका सिंहावलोकन ठीक-ठाक है। लेकिन वर्ष २०१२ में प्रकाशित साहित्य-विशेषतः आलोचना के प्रसंग में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हिंदी के वरिष्ठ आलोचक नंदकिशोर नवल की पुस्तक 'आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास' पर जिस तरह की टिप्पणी की है, वह बिना पुस्तक देखे एक आलोचक की बेहद सतही टिप्पणी है। यदि वे पुस्तक देख लेते तो यह नहीं लिखते कि 'इसमें एक अध्याय बाद की युवा पीढ़ी के कवियों पर भी होता।' दैनिक राष्ट्रीय सहारा का 'उमंग' सर्वेक्षण के प्रति इस वर्ष अत्यंत जागृत हुआ। उसमें उमंग के अनेक पृष्ठों में वर्ष २०१२ के हिंदी साहित्य का सर्वेक्षण किया। उपन्यास, कहानी, आलोचना और कविता का। कृष्णा शर्मा ने सब कुछ पर लिखा, लेकिन हासिल कुछ नहीं। प्रेम भारद्वाज ने भी 'प्रभात खबर' में वर्ष २०१२ में प्रकाशित कहानी संग्रहों की स्तरीयता के बारे में अपना असंतोष दर्ज किया। उदय प्रकाश ने दाएं-बाएं परिक्रमा की। अशोक वाजपेयी, विश्वनाथ त्रिापाठी और मैनेजर पांडेय ने भी वर्ष २०१२ में प्रकाशित अनेक विधाओं की पुस्तकों पर चलते-चलते टिप्पणी की, लेकिन इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अब साहित्य की इनकी समकालीनता ही नहीं, प्रासंगिकता भी संदिग्ध है। वे अब कुछ पढ़ते-लिखते नहीं, अपना यश-कीर्तन चाहते हैं। राष्ट्रीय सहारा में साधना अग्रवाल ने वर्ष २०१२ में प्रकाशित कविता संग्रहों की उर्वरता को दर्ज किया। कुलमिलाकर राष्ट्रीय सहारा ने वर्ष २०१२ में प्रकाशित हिंदी साहित्य को एक बड़ा स्पेस दिया है, जिसके लिए सुषमा जुगरान बधाई की पात्रा हैं। पाक्षिक 'द पब्लिक एजेंडा' में कवि मदन कश्यप ने पत्रिाका के १५ जनवरी २०१३ अंक में 'बस कविता कथा आलोचना' शीर्षक से सर्वेक्षण किया। वे साहित्य की एक छोटी दुनिया 'जसम' में सिमटे हुए हैं। उन्हें ठीक से पता नहीं कि आधुनिक हिंदी साहित्य का आकाश बड़ा है। वस्तुतः उनका सर्वेक्षण भी मात्रा सूची पत्रा है।
सर्वेक्षण एक गंभीर काम है। लेकिन हिंदी के चालू-लेखक-
पत्राकार इसे दोयम दर्जे का मानते हैं और वर्ष के अंत में प्रकाशकों से पूछकर सर्वेक्षण के नाम पर सूची पत्रा प्रस्तुत करते हैं। साप्ताहिक 'शुक्रवार' ने साहित्य वार्षिकी २०१३ में भी सर्वेक्षण किया है। कविता पर ओम निश्चल का सर्वेक्षण मुझे अच्छी लगा। अवनीश मिश्रा का भी। स्वतंत्रा मिश्र भी ठीक-ठाक लगे। लेकिन सर्वेक्षण में हिंदी आलोचना की अनुपस्थिति मुझे अच्छा नहीं लगी। विमल कुमार ने 'आउटलुक' में सर्वेक्षण नहीं किया, बल्कि वर्ष २०१३ में प्रकाशन पुस्तकों की सूची गलत-सही पेश कर दी। पाक्षिक 'लोकायत' के संपादक बलराम के साहित्य-संपर्क का दायरा और द्घेरा बड़ा है। उन्होंने पत्रिाका के वर्षांत अंक में निर्ममतापूर्वक न केवल प्रकाशकों को ठिकाने लगाया है, बल्कि कुछ लेखकों को भी। मैं नाम नहीं ले रहा हूं क्योंकि गोलियां इधर भी चलेंगी। मासिक 'समयमान' में साधना अग्रवाल ने २०१२ में प्रकाशित सिपर्फ १० पुस्तकों की शॉर्ट लिस्टिंग की है। मुझे लगता है कि इसमें दो-तीन पुस्तकें और जोड़नी चाहिए थीं। अनिल यादव की पुस्तक-'वह भी कोई देस है महराज' और कुलदीप नैक्षयर की आत्मकथा-'एक जन्म कापफी नहीं।'
पत्रिाकाएं
उद्भावना : ;रामविलास शर्मा महाविशेषांकद्ध, अतिथि संपादक-प्रदीप सक्सेना, संपर्क-ए-२१, झिलमिल इंडस्ट्रीयल एरिया, जी.टी. रोड, शाहदरा, दिल्ली-११००९५, मूल्य : २०० रुपए।
यह हिंदी के प्रतिष्ठित समालोचक रामविलास शर्मा का जन्मशती वर्ष है। 'उद्भावना' का उन पर केंद्रित यह महाविशेषांक इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि इसमें उन पर पूर्व प्रकाशित पुरानी सामग्री नहीं है, बल्कि नई सामग्री है और खासकर युवा लेखकों द्वारा लिखित। आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी के अन्य आलोचकों का क्रम हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह से बनता है। इस अंक में रामविलास शर्मा पर विपुल सामग्री है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है वेंकटेश द्वारा लिए गए नामवर सिंह और नंदकिशोर नवल के साक्षात्कार। जहां नामवर जी उनकी हिंदी जाति की अवधारणा को ध्वस्त करते हैं तो नवल उनकी हिंदी नवजागरण की उनकी कल्पना को। पिफर भी इस विशेषांक से रामविलास शर्मा को समझने में मदद मिलेगी, यह निस्संकोच कहा जा सकता है।
पहल : ९१ संपादक-ज्ञानरंजन, संपर्क : १०१, रामनगर, आधार ताल, जबलपुर-४८२००४, मूल्य ५० रुपए।
'पहल' का पुनर्प्रकाशन अप्रत्याशित नहीं है। पता नहीं कैसे ज्ञानरंजन ने तीन वर्ष पहले अचानक इसका प्रकाशन स्थगित किया। 'पहल' हमारे समय की एक जरूरी पत्रिाका थी और साहित्य में इसकी भूमिका भी थी। अब पिफर उन्होंने इस पत्रिाका को पुनर्जीवित किया है। मुझे लगता है कि ज्ञानरंजन सचमुच 'पहल' को लेकर 'पफेंस के इधर और उधर' थे। लेकिन 'पहल' का यह अंक मुझे बहुत अच्छा नहीं लगा। इस अंक में अच्छी रचनाएं कम ही हैं, जिनका उल्लेख किया जा सके। पता नहीं ज्ञानरंजन के सामने कैसे 'कसौटी' नहीं थी। पिफर भी 'पहल' यदि अब ज्ञानरंजन के जीने का एकमात्रा संबल है, तो हमें इसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
शुक्रवार : साहित्य वार्षिकी २०१३, संपादक-विष्णु नागर,
'इंडिया टुडे' द्वारा प्रकाशित साहित्य वार्षिकी की खाली जगह को शुक्रवार पिफर 'साहित्य वार्षिकी' निकालकर भर रहा है। वैसे २०१३ की इस साहित्य वार्षिकी में अनेक महत्वपूर्ण सामग्री है, लेकिन पिफर भी यह आधा-अधूरा है, क्योंकि संपादक विष्णु नागर के अपने पूर्वाग्रह हैं।
संबोधन : अक्टूबर २०१२-जनवरी २०१३, ;काशीनाथ सिंह पर केंद्रितद्ध, संपादक-कमर मेवाड़ी, पो.-कांकरोली, -३१३३२४, जिला-राजसमंद ;राजस्थानद्ध 'संबोधन' का हिंदी के प्रतिष्ठित कथा लेखक काशीनाथ सिंह पर केंद्रित यह अंक मुझे अच्छा लगा है। खासकर इसलिए भी कि उन पर नए ढंग से युवा लेखकों ने लिखा है।
पत्रिाकाओं के नए अंक
१. नया ज्ञानोदय : जनवरी २०१३ ;गजल महाविशेषांकद्ध संपादक-रवींद्र कालिया, संपर्क : भारतीय ज्ञानपीठ, १८, इंस्टीटयूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली-११००३, मूल्य : ७० रुपए।
२. पक्षध्र : ;जुलाई २०१२द्ध, सं. विनोद तिवारी, संपर्कः बी-२, तीसरी मंजिल महेंद्र एंक्लेव स्टेडियम रोड, दिल्ली-११००३३, मूल्य : ५० रुपए।
३. समकालीन भारतीय साहित्य : ;नवंबर-दिसंबर २०१२, पूर्वोत्तर भारत विशेषांकद्ध, अतिथि संपादक-रणजीत साहा, संपर्क-साहित्य अकादेमी, रवींद्र भवन, ३५, पिफरोजशाह रोड, नई दिल्ली-११०००१, मूल्य २५ रुपए।
४. जनपथ : अक्टूबर २०१२ ;मधुकर सिंह पर केंद्रितद्ध, संपादक-अनंत कुमार सिंह, संपर्क : सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक, मंगल पांडेय पथ, आरा-८०२३०१, भोजपुर ;बिहारद्ध, मूल्य ३० रुपए।
५. तनाव : अक्टूबर-दिसंबर २०१२ ;हालीना पोस्वियातो व्सका की कविताएं-अंग्रेजी से अनुवाद-अशोक पांडेय, संपादक वंशी माहेश्वरी, संपर्क-५७, मंगलवारा, पिपरिया ;म.प्र.द्ध-४६१७७५, मूल्य १० रुपए।
६. ओर : जुलाई-सितंबर २०१२, सं. रमाकांत शर्मा, संपर्क : 'संकेत', ब्रह्मपुरी प्रतापमंडल, जोधपुर-३४२००१ ;राजस्थानद्ध, मूल्य : २० रुपए।
७. देशज : दिसंबर-जनवरी २०१३ ;स्त्राी की जमीनद्ध, सं.-अरुण शीतांशु, संपर्क- पूनम कुमारी, मणिमनज, संकटमोचन नगर, आरा-८०२३०१, मूल्य : २० रुपए।
८. संवदिया : अक्टूबर २०१२-मार्च २०१३ ;युवा हिंदी कविता अंकद्ध, अतिथि संपादक-देवेंद्र कुमार देवेश, संपर्क- संवदिया प्रकाशन, जय प्रकाश नगर, वार्ड-नं.-७, अररिया-८५४३११ ;बिहारद्ध, मूल्य : ४० रुपए।
९. क : ;मई-अगस्त २०१२द्ध-भवानी प्रसाद मिश्र पर केंद्रित, सं.-विजय शंकर संपर्क-४३४, गणेश नगर-२, गली नं. २, शकरपुर, दिल्ली-११००९२, मूल्य : ४० रुपए।
१०. माटी : मई-जुलाई २०१२, सं.-नरेंद्र पंडरीक, संपर्क-डी.एम. कॉलोनी, सिविल लाइंस, बांदा-२१०००१, मूल्य : २५ रुपए।
११. प्रगतिवार्ता : सितंबर २०१३ ;पफादर कामिल बुल्के पर विशेषद्ध, संपादक-राम जन्म मिश्र, संपर्क प्रगति भवन,
साहिबगंज-८१६१०९ ;साराखंडद्ध, मूल्य : २० रुपए।
१२. परिकथा : नवंबर-दिसंबर २०१२, संपादक-शंकर, संपक-९६, बेसमेंट, पफेज-३, इरोज गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली-११००४४, मूल्य ३० रुपए।
१३. शैक्षिक दखल : ;प्रवेशांक-दिसंबर २०१२द्ध, सं.-महेश पुनेठा, दिनेश कर्नाटक, संपर्क-दिनेश कर्नाटक, ग्राम+पो.-रानीबाग, जिला-नैनीताल-२६३१२६ ;उत्तराखंडद्ध, मूल्य : २० रुपए।
१४. अक्सर : अक्टूबर-दिसंबर २०१२, सं.-गोविंद माथुर, संपर्क-ए-२४३, त्रिावेणी नगर, गोपालपुरा बाईपास, जयपुर-३०२०१८, मूल्य : २५ रुपए।
नए प्रकाशन ;चयनद्ध
१. सूरदास ;आलोचनाद्ध, लेखक-नंदकिशोर नवल,
प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन, १-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२,
२. शब्द और देशकाल ;लेखद्ध, ले.-कुंवर नारायण,
प्रकाशक-वही, मूल्य २५० रुपए।
३. कहीं कोई आवाज नहीं ;कविताद्ध, ले.-अशोक वाजपेयी, प्रका.-वही, मूल्य २५० रुपए।
४. डेमोक्रेसिया ;कहानीद्ध, ले.-असगर वजाहत, प्रका.-वही, मूल्य : २५० रुपए।
५. जितने लोग, उतने प्रेम ;कविताद्ध, ले.-लीलाधर जगूड़ी, प्रका.-वही, मूल्य : २५० रुपए।
६. शती से शेष-पंकज बिष्ट की कहानियां-प्रका.वही, मूल्य : ५५० रुपए।
७. रामचंद्र शुक्ल का पहला हिंदी साहित्य का इतिहास हिंदी साहित्य का विकास, सं.-रामनिरंजन परिमलेंदू, प्रकाशक-साहित्य भंडार, ५०, चाहचंद, इलाहाबाद-२११००३, मूल्य ७५० रुपए।
८. आलोचना का अदृश्य पक्ष ;नंदकिशोर नवल के लेखन पर केंद्रितद्ध, संपादक-भारत यायावर, प्रकाशक-प्रकाशन संस्थान,-४२६८-बी/३, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, मूल्य : ४५० रुपए।
९. आलोचना की चुनौतियां ;मैनेजर पांडेय के लेखन परद्ध, सं.-दीपक प्रकाश त्यागी/राजेंद्र प्रसाद चतुर्वेदी, प्रका.-नई किताब, १/११८२९, ;प्रथम तलद्ध, नवीन शाहदरा, दिल्ली-११००३२, मूल्य : ७०० रुपए।
१०. गालिब छुटी शराब ;संस्मरण, नया संस्करणद्ध-ले.-रवींद्र कालिया, प्रका.-भारतीय ज्ञानपीठ, १८, इंस्ट्ीटयूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली-११०००३, मूल्य : १५० रुपए ;पेपर बैकद्ध।
११. विरासत ;विविधद्ध, लेखक-भारत यायावर, प्रकाशक-शिल्पायन, १०२९५, लेन नं. १, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-११००३२, मूल्य : २०० रुपए।
१२. जनसत्ता ;वार्षिकी अंकद्ध कार्यकारी संपादक-ओम थानवी, संपादक ;कोलकाता क्षेत्राद्ध शैलेंद्र, संपादन सहयोग- पफजल इमाम मल्लिक, मूल्य : २० रुपए।

 
 
 
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