फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
देशांतर
क्या कुछ भी नया द्घटित नहीं हो रहा
 

लेखक द्वय ने जीवविज्ञान में अंतरराष्ट्रीय महत्व का काम किया है और उस विचार-वलय के भीतर निरंतर जनोन्मुखी संद्घर्ष किया है जहां विज्ञान के प्रश्न सामाजिक प्रश्नों से मुखातिब होते हैं। ये दोनों हार्वर्ड में पढ़ाते हैं। यह लेख इनकी पुस्तक ठपवसवहल नदकमत जीम प्दसिनमदबम में शामिल है। इसमें ये सूक्ष्म अंतर्दृष्टि के सहारे बताते हैं कि विज्ञान उस समाज व्यवस्था से असंपृक्त नहीं रह सकता जो प्रत्यक्ष या प्रच्छन्न रूप से निर्धारित करता है कि विज्ञान कैसे और किस तरह का सवाल उठाए।
इस लेख में नएपन के प्रश्न पर बात की गई है। जयंत भट्ट तो कह ही गए हैं कि 'कुतो वा नूतनम वस्तु।' नूतनता की असंभाव्यता की पूरब और पश्चिम के दार्शनिक बार-बार तस्दीक करते रहे हैं। इस दार्शनिक अवस्थिति के भी राजनैतिक सामाजिक निहितार्थ हैं। लालची वृ( पूंजीवाद की एक आदत यह भी है कि यह किसी भी अवस्थिति के दोनों पहलुओं का अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहता है, जोकि इस लेख के माध्यम से भी खुलेगा। बहरहाल, सचमुच का 'असली नया' तो तब द्घटित होगा जब समतामूलक समाज का लक्ष्य हासिल हो जाए। यह लेख किसी रैखिक तर्क प्रणाली के द्वारा निष्कर्षों को सामने लाने के बजाए एक ऐसे विचार-स्तवक की प्रस्तुति करता है, जो हमारी चिंतन-प्रक्रिया में हस्तक्षेप करे।

 
ईसा पूर्व दूसरी या तीसरी शताब्दी की किताब 'एक्लेससिएटिस' के थक चुके और हतोत्साहित लेखक ने दर्ज किया था कि 'इस धरा पर नया कुछ भी नहीं है, सब कुछ मिथ्याभिमान है।' बहुत समय नहीं बीता जब ांसिस पफुकोयामा ने कहा था कि पहले नई चीजें शायद द्घटित हो लिया करती थीं, लेकिन अब इतिहास का अंत हो चुका है। इन दोनों के बीच की अवधि में चातुर्यपूर्ण भाषा में अनेकों बार यह दोहराया गया कि आप मानवीय स्वभाव को नहीं बदल सकते। यह दावा कि कोई परिद्घटना मूलगामी रूप से नई है या कुल जमा वही पुरानी दास्तान है, यह किसी सामान्य विचारधारा से जन्म नहीं लेती बल्कि हर मामले में कुछ विशिष्ट कार्य करती है। कुछ मामलों में जो लोग परिवर्तन नहीं होने को श्रेयस्कर समझते हैं या कुछ लोग जो परिवर्तन के पक्ष में सिपर्फ इसलिए होते हैं कि प्रयासों को निष्पफल होते देखें, ऐसे लोग अलग-अलग समय के ऐसे पहलुओं की तलाश में रहते हैं जो समान दिखें ताकि ये पफर्क को झुठला सकें। मसलन इस बात को सि( करने के लिए कि उद्यमिता मानवीय स्वभाव का मूलभूत एवं अपरिवर्तनीय गुण है, ये लोग वस्तुओं के किसी तरह के आदान-प्रदान को 'व्यापार' कह बैठते हैं और सभी तरह के व्यापार को पूंजीवादी विनिमय मान लेते हैं। इस तरह आल्प्स पर्वत पर किसी नर कंकाल के पास उसकी जरूरत की तुलना में ज्यादा चकमक पत्थर मिल जाने को या दो क्यूबाई नागरिकों के द्वारा राशन से मिले सामान को अपनी जरूरत के हिसाब से अदल-बदल लेने को व्यापार के प्रति मनुष्य की
सार्वभौमिक प्रवृत्ति से जोड़ दिया जाता है। ;मैं यह भी अनुमानित करना चाहूंगा कि इसके लिए जीन के उसी क्रोमोसोम को दोषी ठहराया जाएगा, जिसे परीक्षा में चोरी करने या अजनबियों पर अविश्वास करने के लिए दोषी ठहराया जाता है।द्ध इस परिप्रेक्ष्य में सोवियत रूस और कुछ नहीं था, वह जार के साम्राज्य की निरंतरता में ही था, और सारी क्रांतियां बराबर होती हैं, क्योंकि वे शासकों के एक समूह को दूसरे समूह के द्वारा पदच्युत करती हैं। पिफर भी यह प्रतीत होता है कि बुर्जुआ मंडनकर्ताओं ने अपनी विचारधारा के बरखिलापफ यह बात स्वीकार की है कि पूंजीवाद क्रांतिकारी परिवर्तन से गुजर चुका है जिसके तहत प्रबंधकीय क्रांति के प्रतिपफल के रूप में पूंजी के मालिकों को टेक्नोक्रेटों के द्वारा पदच्युत कर दिया गया है।
बेशक, यह हमेशा संभव है कि परिद्घटनाओं के बीच समरूपता या असमानता में से क्या देखा जाए। डार्विन के उद्विकास का सि(ांतीकरण इन दोनों के आधार पर होता है जहां समरूपता एक समान पूर्वज परंपरा को प्रगट करती है एवं उन सीमाओं को निर्धारित करती है जिसके भीतर विभेदन संभव हुआ, वहीं असमानता ऐतिहासिक पफर्क को व्यक्त करती है। यदि केवल भिन्नताएं ही रहतीं और सभी जीव इतने अलग होते कि कोई भी सामान्य लक्षण नहीं दिखते तो निरीक्षणों के परिणामस्वरूप उद्विकास की अवधारणा के बजाए 'विशिष्ट सृष्टि' की अवधारणा पुष्ट होती।
हमें जो काम करना है उस आधार पर उपयुक्त सि( होता है कि हम समरूपता या परिवर्तन में से किस पर बल दें। हम समकालीन पूंजीवाद पर गौर करते हैं तो शोषण एवं लाभ के दोहन का और उत्पादन के साधनों को बदलने को संपत्ति निर्माण का मुख्य स्रोत पाते हैं एवं सर्वत्रा वस्तु-विनिमयमूलक संबंध की व्याप्ति देखते हैं। पूरी व्यवस्था को चुनौती देने के परिप्रेक्ष्य में देखें तो निरंतरता के ये तत्व द्घटित हो रही नइर् द्घटनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। नई द्घटित हो रही द्घटनाओं में सूचना उद्योग का उत्थान एवं पारराष्ट्रीय निगमों का उद्भव आदि है। लेकिन जब हम रणनीतियां तैयार करेंगे तो हमें अपने विस्तार कौशल को बढ़ाना होगा एवं संगठन निर्माण के नए अभिलक्षणों पर ध्यान देना होगा जैसे कि सीमाओं के आर-पार एकात्मकता की आवश्यकता को ध्यान में रखना होगा। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि अमेरिका कमजोर हो रही आर्थिक शक्ति लेकिन प्रथम स्थान रखने वाली सैन्य शक्ति है जो इस समस्या से जूझ रही है कि अपनी सैन्य शक्ति को अपनी अर्थव्यवस्था की सेवा में कैसे इस्तेमाल करे।
यह दावा कि कुछ नया द्घटित नहीं हो रहा है, सामाजिक एवं राजनैतिक कार्रवाई के विरोध में इस्तेमाल की जाने वाली सामान्य युक्ति है। इसके तहत कहा जाता है कि वर्तमान स्थिति प्रकृति का नहीं बदलने वाला तत्व है या पिफर यह कहा जाता है कि किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है क्योंकि चीजें भौतिक रूप से अलग नहीं हुई हैं, जैसा कि वे पहले थीं। इन संकीर्णतावादी खयालों का सबसे सक्रिय असर इन दो क्षेत्राों में देखा जा सकता है, जिसके बारे में जनता की चेतना क्रांतिकारी ढंग से बढ़ रही है। ये दो हैं- सामाजिक असमानता और पर्यावरण की क्षति। असमानता की समस्या ेंच क्रांति के समय से ही बुर्जुआ जीवन विधि से उत्पन्न असल सामाजिक वेदना का स्रोत रहा है। इसके प्रतिपक्ष में उठाई जाने वाली मांगों को बुर्जुआ समाज असंभव करता आ रहा है और दावा करता रहा है कि नए ढंग के सामाजिक संबंध जैविक रूप से असंभव हैं, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव ही प्रतियोगिता मूलक, आक्रामक एवं आत्मकेंद्रित रहा है और यह इसने उद्विकास के क्रम में मानवेतर पूर्वजों से प्राप्त किया है।
ये दावा करते हैं कि मानव जाति के उद्विकास के दौरान कुछ भी नया नहीं द्घटा। वे तब भी कहते हैं कि कुछ भी नया नहीं हो रहा है, जब हम इस पर चिंता जाहिर करते हैं कि जिस रूप में और जिस पैमाने पर संसाधनों का दोहन हो रहा है वह भविष्य में मानव जाति के लिए भौतिक रूप से उपयुक्त जीवन को असंभव बना देगा। इनके द्वारा यह भी कहा जाता है कि दूसरी प्रजातियां भी अपने जीवन के लिए आवश्यक संसाधनों का उपयोग करती हैं, सभी जीव वर्ज्य पदार्थ उत्पादित करते हैं जो कि इनके लिए द्घातक होता है। पिफर विलोप को लेकर इतना शोर-शराबा क्यों? आखिर जीवों की इस पृथ्वी पर उपस्थित ९९.९९ प्रतिशत प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और अंततः सभी को विलुप्त हो जाना है।
तर्कों की ये दोनों श्रृंखलाएं उन कुछ आधारभूत ताकतों के वर्तमान क्रिया-कलाप पर अतिरिक्त बल देती हैं जो कि विगत इतिहास की भी चालक तत्व रही हैं और अतीत के साथ वर्तमान के सातत्य को रेखांकित करती हैं। इन बातों को जोर देकर कहने के क्रम में उन गतिशील व्यवस्थाओं के सारभूत लक्षणों को भुला दिया जाता है जो कि सातत्य एवं अंतर्निहित समरूपता के बावजूद नवीनताओं के द्घटने की संभावना को अक्षुण्ण रखते हैं। माना सभी प्रजातियां संसाधनों का उपयोग करती हैं, लेकिन मनुष्य का वंश इस रूप में अलग है कि इसके उपभोग के केंद्र में ऐसे ईंधन और खनिज हैं जो एक बार उपभुक्त हो जाने के बाद पुनः मूलरूप में नहीं आ सकते। यहां यह कहना होगा कि आजकल जीवन जगत के उन क्षेत्राों को भी शामिल किया जा रहा है जो अब तक अछूते थे, जीवन जगत के वे क्षेत्रा जो कभी संपर्क में नहीं आए थे, वे भी मनुष्य के द्वारा एक दूसरे के सम्मुख रख दिए जाते हैं एवं आंतरिक क्रिया करते हैं।
मनुष्य के द्वारा संचालित अधिकांश रासायनिक प्रक्रियाएं पहले द्घटित नहीं हुई थीं, क्योंकि प्रतिक्रियाओं में भाग लेने वाले अभिकारक पहले संपर्क में नहीं आए थे। पिफर गतिशील व्यवस्थाएं एक खास बिंदु के बाद उस अवस्था को प्राप्त कर लेती हैं, जहां सामान्य नियम बदल जाते हैं। जैसे कि एक छड़ी पर लगाए जाने वाले बल को लगातार बढ़ाया जाए तो पहले तो वह मुड़ेगी लेकिन बाद में टूट जाएगी। इसलिए नवीकरणीय संसाधन भी उत्पादन और उपभोग की निम्न दर पर व्यवस्था के संतुलन को बनाए रख सकते हैं, लेकिन अत्यधिक उपयोग विनाश को जन्म दे सकता है। वैसे कभी-कभी क्रांतिक बिन्दु पर द्घटने वाली द्घटनाएं रोचक नवोन्मेषों को भी जन्म देती हैं, जैसे कि हमारे प्राक्‌ मानवी पूर्वजों के केंद्रीय स्नायुतंत्रा में लगातार वृ(ि होती गई और स्नायुतंत्रा का जाल और सद्घन होता गया तो मस्तिष्क कुछ नए कार्य करने में सक्षम हुए जैसे कि वे भाषाई क्रिया-कलाप भी करने लगे जो हमारे मानवेतर पूर्वजों को हासिल नहीं था।
कहा जाता है कि जब गैलीलियो को अभियोग लगाने वालों के समक्ष लाया गया तो उन्होंने धीरे से बुदबुदाया कि 'पृथ्वी अब भी द्घूमती है।' पता नहीं उन्होंने वास्तव में ऐसा कहा या नहीं, या ऐसा मानना प्रगतिशील परिवर्तन की गाथा को बल देता है। द्वंद्वात्मकतावादी बेहतर जानते हैं।
 
 
 
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