फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
गजल
 
प्रेम रंजन अनिमेष

जन्म : १९६८

तीन काव्य संग्रह 'मिट्टी के पफल', 'कोई नया समाचार' और 'संगत'। कुछ कहानियां भी
प्रकाशित। भारत भूषण अग्रवाल स्मृति कविता पुरस्कार।
एस-३/२२६, रिजर्व बैंक अधिकारी आवास,
गोकुलधाम, गोरेगांव ;पूर्वद्ध, मुंबई-४०००६३
मो. ०९०३०४५३७११

एक जाूद है जो उतरता ही नहीं
 
 

;एकद्ध

गया है यूं वो कभी लौटकर न आएगा
रहेगा आंख में मेरी नजर न आएगा

मेरे लिए वो करे खत्म सिलसिले सब क्यों
गली में आएगा पर मेरे द्घर न आएगा

वो रोशनी की तरह खुशबुओं सा दुनिया में
बिखर भी जाएगा लेकिन इधर न आएगा

हुई है शाम चलो डूब जाऊं सूरज सा
रहूंगा मैं तो वो पिफर बाम पर न आएगा

थपेड़े प्यार के झेले न गम की आंच सही
तुझे क्या कब उसे बनना संवरना आएगा

इसी दरख्त के नीचे मिले थे पहली बार
ये रोक लेता है अब भी ठहर न आएगा

तुम्हें भी शौक-ए-तगापफुल है गालिबन लेकिन
कोई तो ले के हमारी खबर न आएगा

न आरजू न कोई आस किसी से 'अनिमेष'
ये जिंदगी जरा सी जी तो मरना आएगा

;दोद्ध

कह के पिफर उसका तो आना रह गया
द्घर में दो लोगों का खाना रह गया

धीरे धीरे देह चादर हो गई
और पिफर बस ताना बाना रह गया

उसके दिल से खत-ओ-किताबत रुक गई
उसके द्घर में आना जाना रह गया

वो वपफाएं खत्म कब की हो चुकीं
रिश्ता अब खाली निभाना रह गया

पहली उस बारिश में जी भर जी लिए
गीले कपड़ों को सुखाना रह गया

जाने आया आज कैसे वक्त पर
एक अच्छा सा बहाना रह गया

पल में मीलों चलने वाले रास्ते
दिल को दिल के पास लाना रह गया

जिंदगी चुपचाप कर दी उसके नाम
उसको लेकिन ये बताना रह गया

आबोदाना उठ गया अपने वतन से
यादों का मगर इक आशियाना रह गया

हमसे कब छूटा मदरसा इश्क का
नाम हां अपना लिखाना रह गया

रात दिन आंसू पसीना एक कर
द्घर बना द्घर को बसाना रह गया

औरों की खातिर जिए ताजिंदगी
अपनों को अपना बनाना रह गया

जश्न का दिन था सभी से मिल लिए
एक अपने पास आना रह गया

राह जिसको दी उसे मंजिल मिली
क्या हुआ खुद बेठिकाना रह गया

पलकों में तारे संजोए जागना
ख्वाब वो इक शायराना रह गया

तेज तेगों की निशानी मिट गई
नर्म होंठों का तराना रह गया

सोंधी खुशबू की तरह दिल में कहीं
गीत इक बरसों पुराना रह गया

धोखा ये इक दिन तो होना था कभी
अबकी जो रूठा मनाना रह गया

पहले सी वो बातें कहां 'अनिमेष'
बस पहले जैसा मुस्कुराना रह गया

;तीनद्ध


 

रंग में रौशन पफौव्वारे हैं
किसके लहू के ये धारे हैं

खेल है ये आपसदारी का
हम जीते हम ही हारे हैं

द्घर का सुख तो दुख ही देगा
सुख पिफतरत के बंजारे हैं

राह में झुककर चलते बच्चे
कह दो वक्त के ये मारे हैं

तेरे लबों से तपे हुओं को
क्या जीवन के अंगारे हैं

 

इसी दिए से रोशनी की है
और कारे काजल पारे हैं

रात जगी इन सुर्ख आंखों ने
भोर के ये डोरे डारे हैं

गलत सही है जिनकी खातिर
उनके ही वारे न्यारे हैं

सच को थोड़ी ताब भी तो दे
जो अच्छे क्यों बेचारे हैं

आसमान देना है उनको
हम जिन आंखों के तारे हैं

रूह भिगो कर ही मानेंगी
ये जो तिरछी बौछारे हैं

मांएं भरी हुई छाती ज्यों
हम अपनी पलकें गारे हैं

हाथ की दूरी पर है दुनिया
बढ़ के मिलो अपने सारे हैं

गीत लबों पर रचते मीठे
आंखों के आंसू खारे हैं

दिल से दिल तक जा प्यारे
क्या मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे हैं

प्यार कहां 'अनिमेष' मिल सका
हम यूं ही सबके प्यारे ह

 
भरत तिवारी
 

जन्म : २६ अप्रैल १९७३

समाचार पत्रा-पत्रिाकाओं में कविताएं, गजलें व लेख प्रकाशित। लेकिन किसी साहित्यिक पत्रिाका में प्रकाशन का यह पहला अवसर।
बी-७१, शेख सराय, पफेस-१, नई दिल्ली
मो. ०९८११६६४७९६

;एकद्ध

ये कैसा मौसम बना रहे हो
गुलों में दहशत उगा रहे हो

धर्म को पासा बना रहे हो
ये खेल कैसा खिला रहे हो

खुद तो द्घुटनों पर चल रहे हो
संभलना हमको सिखा रहे हो

जमीर जाहिल बना हुआ है
ये इल्म कैसा सिखा रहे हो

हक तो ये है तुम आज नाहक
गुलों पर ये हक जमा रहे हो

खुली हैं आंखें 'शजर' है जिंदा
क्यों अपनी शामत बुला रहे हो

;दोद्ध

अपनी मिट्टी भुला के कहां जाओगे
सपफर है लंबा अकेले कहां जाओगे

बहुत करीब होता है मिट्टी से रिश्ता
सिलसिला तोड़कर ये कहां जाओगे

न समझो सिपर्फ धूल-ओ-गर्द मिट्टी को
इसी में आखिर मिलोगे कहां जाओगे

द्घड़ा है एक बस तू भी मिट्टी का 'शजर'
न धूप में जो तपोगे कहां जाओगे

;तीनद्ध

किसको नजर करें अपनी नजर यहां
इक ख्वाब जो सजाया बरपा कहर यहां

हमने मकान की इक ईंट थी रखी
बदला तेरा इरादा, छूटा शहर यहां

मजबूत है अकीदा रब इश्क में मिला
मजबूरी-ओ चलाकी है बेअसर यहां

वो दोस्ती न करना जो न निभा सको
आसां नहीं परखना सबका जिगर यहां

तुम खेल खूब खेलो वाकिपफ रहो मगर
आशिक नहीं रहा अब तेरा 'शजर' यहां

;चारद्ध

सियासत से बच न पाई
खबरनवीसों की खुदाई

हाथ जिसके कलम थमाई
उसने सच को आग लगाई

हुक्मरां के खून की अब
लालिमा है धुंधलाई

वक्त की कहते खता वो
ले रहे जैसे जमुहाई

देश का प्रेमी बना वो
इक मुहर नकली लगाई

सोन चिड़िया पिफर लुटी है
सब विभीषण हुए भाई

चोर की दाढ़ी जिगर में
अब 'शजर सब ने छुपाई

 
 
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