फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कहानी
 
मां तुम्हें कुछ नहीं आता
 
अनिता गोपेश
 

जन्म : २४ अगस्त १९५४

शुरुआत कविता लिखने से। एक कहानी संग्रह 'कित्ता पानी' प्रकाशित। कई नाटकों में अभिनय भी।
६/१, बैंक रोड, इलाहाबाद-२११००२
मो. ०९३३५१०७१६८

'मांतुम्हारी बहुत इच्छा थी न कि अर्जित कुछ दिन तुम्हारे पास रहे? सो, उसे भेज रहा हूं। वह दस दिन तक तुम्हारे और पापा के साथ रहेगा। अब तो खुश?' अमित का पफोन नंबर, मोबाइल पर देखते ही शकुन हमेशा डर जाया करती है। लेकिन आज का पफोन उसे खुश कर गया। जबसे पैदा हुआ था अर्जित, बस एक दो दिन को अपने मां-बाप के साथ ही आता-जाता रहा था। 'मूल से ब्याज ज्यादा प्यारा' उसकी बाल-सुलभ हरकतों पर शकुन कितना भी मन कड़ा करे, रीझ ही जाती थी। साथ-साथ और समय बिताने का मन करता तो हमेशा खीझ उठती- 'कैसी जिंदगी हो गई है आज। सब अपने-अपने जीवन में अति व्यस्त! कभी भी पोता अपने दादा-दादी के पास लगकर रह ही नहीं पाता।' क्या जानेगा बेचारा अपने बाबा-दादी को।' उसके जाने पर वह हमेशा दुखी हो जाती थी, गोकि अमित और रेखा को कोई पफर्क नहीं पड़ता था। चलो आज अमित को इस बात का खयाल तो आया। शकुन को लगा- 'जो भी हो बेटा तो उन्हीं का है। सोचता है हमारी ही तरह। कुछ कर नहीं पाता बेचारा। क्या करे! आखिर को पत्नी से भी तो निभाना होता है।'
आ''लादित शकुन ने तैयारियां शुरू कर दीं। सबसे पहले तो संगोष्ठी के आयोजकों को बीमारी का बहाना कर मना किया। 'मोतियाबिंद के ऑपरेशन के चलते वह संगोष्ठी की अध्यक्षता करने में अक्षम हैं।' ऐसा कह दिया उनसे। पिफर जुटी द्घर को अमित की अपेक्षाओं के हिसाब से ठीक-ठाक करने में। पिछली बार आया था तो जाते-जाते धमका गया था- 'मां द्घर को रहने लायक बनवाओ, वर्ना मैं अगली बार से होटल में रुक जाऊंगा। किसी कमरे में ए.सी. नहीं है। बाथरूम में गीजर नहीं है। कहीं द्घर में एक बड़ा आदमकद शीशा तक नहीं है कि इंसान देख सके।' अपने पीछे के छोटे से कमरे में उन्होंने ए.सी. लगवाया हुआ था। लेकिन वह कमरा अमित को दड़बा लगता था। रिटायर्ड शकुन और राजीव सीधी-सादी जिंदगी के आदी। उन्हें अधिक सुविधाएं बटोरना अश्लील लगता था। दिल्ली जैसे शहर के पॉश इलाके में यह छोटा सा द्घर अपफोर्ड कर पाना भी उन्हें कापफी महंगा लगता था। रिटायरमेंट के बाद राजीव को नौकरी मिल जाएगी। साथ ही उसी जगह पर शकुन को भी। दोनों को यही बहुत बड़ी बात लगती थी। अमित ने उस समय भी कहा था-'अपनी पूरी प्रतिभा और अनुभव के बाद किसी संस्था के मिनिमम ऑपफर पर तैयार हो जाना, अपनी औकात को कम आंकना है मां। आज की दुनिया में हर चीज का एक दाम होता है और जितना आप डिजर्व करते हो उससे कम में तैयार हो जाना अपने आपको डिवैल्यूएट करना है।' राजीव ने तुरंत जवाब देकर चुप करा दिया था अमित को। 'किसी बाजार में नहीं बैठे हैं हम अमित। वह तुम्हारी दुनिया है, हमारी नहीं। अपनी दुनिया का पफलसपफा हमारी दुनिया पर मत लगाओ। हमारा काम इतने से चल जाता है।' अपने बाप से ज्यादा बहस नहीं करता अमित-मां से ही सारे शिकवे-शिकायत करता है।
पिफलहाल, ड्राइंगरूम में पफटापफट ए.सी. लगवाया गया, गीजर भी लग गया। पीछे के कमरे को बच्चे के हिसाब से बदल दिया गया। कम्प्यूटर भी ले लिया। अमित का काम लैपटॉप से चल जाता था। लेकिन अर्जित तो सुना है कि सारे समय कम्प्यूटर पर ही रहता है। द्घर से किताबें थोड़ी कम कर दी गई, जगह बढ़ाने के लिए। जि में जगह कर खाने-पीने के सामानों से भर दिया गया। अमित के पसंद की ड्रिंक्स लाकर रखी गई। पर आद्घात लगा शकुन को जब अमित ने उसे बताया कि वह अर्जित को अकेले प्लेन से भेज रहा है। उसे एयरपोर्ट पर रिसीव करना पड़ेगा। रेखा को अपनी कंपनी की किसी इंटरनेशनल कोंस में गोवा जाना है और अमित को अपनी कंपनी के काम से यूरोप के दौरे पर। समय नहीं है, उनके पास उसे पहुंचाने का।
शकुन को अकेले ही एयरपोर्ट तक जाना पड़ा। राजीव ने सापफ कह दिया कि वह अपने काम के बीच समय नहीं निकाल पाएगा। टैक्सी के आने-जाने का खर्च पहली बार खल गया शकुन को। शकुन के आने-जाने का खर्च ज्यादातर आयोजक ही दे देते हैं।
बाहर निकलती भीड़ के बीच खोया-खोया सा अर्जित उसे इतना निरीह लगा कि उसका मन ममता से उमड़ आया, इतना सा बच्चा! दस-बारह की उम्र ही क्या होती है? हवाई जहाज में अकेला चला आया। वाकई आज के बच्चे ज्यादा होशियार और समझदार होने लगे हैं। ममता से उसे सीने से लगाने की कोशिश की, पर दूसरी तरपफ एक अजब सा अवरोध महसूस किया शकुन ने। 'कोई नहीं, साथ ही कितना रहा है हमारे, जो हमसे गर्माहट से मिले। धीरे-धीरे खुल जाएगा तो यह ठंडक आप ही खत्म हो जाएगी।' समझाया था अपने आपको शकुन ने। द्घर पर बाबा से मिलने में भी वही ठंडापन। अमित का पफोन आया पूछने को कि ठीक से पहुंच गया क्या, हामी भरने में भी वही भाव। मां का पफोन आया गोवा से तो थोड़ा सा उल्लसित हुआ। पर बाद के उसके निर्देशों के जवाब में पिफर वही 'हां' 'हूं' 'ओ.के.' मां ने उधर से कहा होगा 'ममा लव्स यू' उसके जवाब में बोला, बिना किसी भाव के 'मी टू। बाय मां' और पफोन रखकर हवा में न जाने क्या देखने लगा। 'आओ बेटा, तुम्हें तुम्हारा कमरा दिखाएं।'
शकुन उसे लेकर अंदर गई- 'यह तुम्हारा कमरा है बेटा, अच्छा लगा?' संक्षिप्त सा 'हूं', शकुन ने सोचा थोड़ी देर को उसे अपने-आप में छोड़ दे। सहज होने दे उसे। वह कमरे से बाहर निकल आई।
लौटकर जब कमरे में आई तो वह कम्प्यूटर पर बैठा था। अच्छा लगा शकुन को, लगा शायद अब वह सहज हो रहा था। कम्प्यूटर लाना सार्थक हो गया। लेकिन खाने की टेबिल पर अमित की तरह उसने भी उसका प्रयास पफेल करना शुरू कर दिया 'दादी कम्प्यूटर में कोई गेम नहीं लोड किया है', इतने कम्प्यूटर सेवी शकुन और राजीव नहीं थे। कैसे क्या होता है कम्प्यूटर में, शकुन को पता नहीं था। वह पहली बार पड़ोस के द्घर में गई जहां अर्जित से थोड़ा बड़ा बच्चा रहता है। उससे रिक्वेस्ट किया कि उसका यह काम करवा दे! अर्जित थोड़ा खुश हुआ नजर आया।
खाने की टेबिल पर राजीव ने उससे बात करनी शुरू की तो थोड़ा अच्छा लगा। अब खुलने लगा था। शकुन ने उसकी पसंद का खाना बनाया था। उसने मन से खाया, शकुन ने पूछा-बेटा खाना कैसा लगा? 'बहुत अच्छा। मुझे तो गरम-गरम खाना बहुत अच्छा लगता है। वहां तो मिलता नहीं न। टिपिफन का ठंडा खाना ठंडा-ठंडा। वही खाता हूं, स्कूल में भी और क्रैच में भी। 'ममा रात में तो गरम खाना बनाती होंगी।' शकुन ने पूछा 'नहीं न! दिन में बाई जो बनाकर रख जाती है वही माइक्रोवेव में गर्म करके खाते हैं हम और पापा। ममा बहुत देर में द्घर आती हैं। थक जाती हैं न!' शकुन को अपना समय याद आया, कॉलेज से लौटती, बाजार से सब्जी और द्घर के तमाम जरूरी-गैरजरूरी सामानों से लदी। द्घर पहुंचते ही बैग पफेंकती एक तरपफ और चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा देती।

माता जी को चाय थमाती उनके कमरे में। राजीव को उनके कमरे में और बच्चों को दूध का गिलास जहां वे होते वहां, और लग जाती शाम का खाना बनाने में। कितनी भी व्यस्त रही हो शकुन, राजीव को खाना अपने ही हाथों बनाकर खिलाया। बीच में राजीव के ही कहने पर एक हेल्पर रखी थी। पर उसके हाथ का बनाया खाना राजीव ऐसे खाते जैसे बीमारी में अस्पताल का खाना खा रहे हो। हारकर शकुन ने द्घर के और काम उसके सुपुर्द किए और खाने का काम अपने ही पास सुरक्षित रखा, जोकि आज तक उसी के पास है।
राजीव ने शकुन को आंखों से बरजा-'इस तरह की बातें न करो बच्चे से। अपनी तुलना भी क्यों करती हो रेखा से। डोंट बिहेव लाइक ए टिपिकल सास।' शकुन क्या करती, अकेले बच्चे का मन लगाना भी एक मुश्किल काम था। बात न करती तो करती क्या? और बातों का कोई तयशुदा कोर्स तो हो नहीं सकता।
उसका मन लगाने को उसे द्घुमाने ले गई दिल्ली की सभी मशहूर जगहें-लोटस टेंपल, लाल किला, कुतुब मीनार, लोधी गार्डेन, दिल्ली हाट। पर अर्जित को गर्मी में बाहर द्घूमना
बिलकुल अच्छा नहीं लगता। ऐसा समझ में आया शकुन को। एक दिन अर्जित ने सापफ-सापफ कह ही दिया कि वह द्घूमने में इंट्रेस्टेड नहीं है। 'यह सब तो मैं नेट पर देख लेता हूं। यहां मॉल्स नहीं हैं क्या?' मॉल कोई द्घूमने की जगह हो सकती है ऐसा अभी तक उसने सोचा नहीं था। सोच में अब परिवर्तन करना जरूरी लगा। शकुन उसे मॉल ले गई। दिन भर मॉल में गुजारकर अर्जित खुश तो हुआ लेकिन शकुन के रिटायर्ड बजट को थोड़ा भारी पड़ा। पिफर भी उसे पैसा खर्चना अच्छा लगा। बच्चे का एक दिन तो खुश-खुश बीता। चैन की सांस ली। 'कम से कम आज की रिपोर्टिंग तो उसकी ठीक-ठाक होगी।' उसके मां-पापा रोज दिन में जब खाली होते तब पफोन मिला लेते हैं, हाल-चाल पूछने को और हर बार शकुन का दिल धड़कने लगता है यह जानने को कि उसे कितने नंबर मिले। आज वह पफेल हुई या पास। यह एक विचित्रा किस्म का डर था जिसे आज तक महसूस नहीं किया था शकुन ने। हर वक्त कसौटी पर कसे जाते रहने-सा, एक अजब सा तनाव हर समय तारी रहता उसके ऊपर। जैसे कि वह किसी इम्तिहान में हो।
बच्चे के साथ बच्चा बनना कठिन था, पिफर आज का बच्चा। अपने काम का हर्जा कर शकुन ने उसके साथ वीडियो गेम खेला, पिफल्में देखी, राजीव ने समय निकालकर 'स्क्रैबल' और 'क्रासवर्ड पजल' खेला। पर कुल मिलाकर हालत यह हो गई कि शकुन बाहर तो अर्जित भीतर, शकुन भीतर तो अर्जित बाहर बालकनी में। शकुन से बच्चे की उदासी और अनमनापन देखा नहीं जा रहा था। मन किया पफोन करके अमित से कह दे कि वह उसे वापस ले जाए। लेकिन ऐसा वह कर नहीं सकी। पता नहीं अपने ही बेटे से यह कैसा भय?
आए हुए पफोन पर सीधे अर्जित के बारे में पूछे जाने पर शकुन ताज्जुब में पड़ गई। 'यहां इस शहर में अर्जित को जानने वाला कौन हो गया!' उससे भी ज्यादा आश्चर्य हुआ जब शकुन ने अर्जित को हुलसकर पफोन पर बात करते सुना। शकुन ने पहली बार देखा, बच्चे का बच्चे की तरह बात करना। लंबी बात की अर्जित ने और पफोन रखकर बताया। 'मेरा कजिन है न पन्नू, प्रणय।' शकुन को समझ में आया, रेखा का भाई शहर में ही है। रेखा जब भी आती है तो यहां तो सिपर्फ विजिट करती है, रहती है वहीं अपने भाई के द्घर। कोई संवाद या संपर्क न होने से शकुन की मानसिक दुनिया में उनकी कोई उपस्थिति दर्ज नहीं थी। समझने में इतनी देर लगी। 'दादी, हम मामा के द्घर जाएंगे।' प्रश्न नहीं था यह, अपने पिता की तरह ही एक उद्द्घोषणा थी अर्जित की। बच्चे कैसे जींस में अपने मां-बाप के हाव-भाव, स्वभाव और तेवर पाते हैं, देखकर हैरानी होती है।
शकुन का पिफलवक्त मिशन बच्चे को खुश रखने का था। अनाहूत, अनामंत्रिात अर्जित के मामा के द्घर पहुंच गई। बिना लिफ्रट के तीसरे माले पर पहुंचते-पहुंचते बेतरह हांपफ गई। 'सांस ठहरने पर बेल बजाए', अभी सोच ही रही थी कि अर्जित ने बेल बजा दी। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत उनका आना किसी उत्तेजना या आश्चर्य का कारण नहीं बन सकता था। भावरहित औपचारिक स्वागत-सत्कार। अर्जित तो अंदर द्घुसते ही यह जा कि वह जा, दिखाई ही नहीं दिया उसके लौटने तक। अर्जित इस पूरे माहौल और पारिवारिकता से पूर्व परिचित ही नहीं, अति अंतरंग नजर आया। समझ नहीं सकी शकुन कि इनके होते हुए अमित ने बच्चे को उसके पास क्यों भेजा? सोचकर खुश हुई कि अमित शायद शकुन पर अपना अधिकार अधिक समझता हो और उस अधिकार को सुरक्षित रखना चाहता हो! पर इतना सीधा-सरल तो अमित रहा नहीं कभी, अपने बच्चे की रग-रग से वाकिपफ थी शकुन।
पूरा दिन निष्प्राण आवभगत में बिताकर शकुन चलने को हुई तो अर्जित अटक गया-'दादी मैं यही रह जाऊं।' दुविधा में शकुन-बच्चे के विषय में अमित से बिना पूछे कोई निर्णय लेने का अवसर कभी आया नहीं था। हां कहने पर अमित क्या
सोचेगा? कैसे रिएक्ट करेगा-सोचने का समय नहीं दिया अर्जित ने। प्रणय ने भी उसके साथ रुकने की रट लगा दी। अर्जित के मामा-मामी ने भी जोर दिया 'आज शनिवार है और कल रविवार, हम समय दे पाएंगे बच्चों को। परसों हॉस्पिटल जाते समय मैं अर्जित को वापस छोड़ दूंगा।' आग्रह को अस्वीकार करने का कोई कारण तत्काल शकुन के हाथ न आया। वैसे भी किसी का आग्रह निर्मम तरीके से ठुकरा देने की आज की पीढ़ी की मानसिकता उसके पास थी नहीं। बच्चे की खुशी उसके लिए, बच्चे को अपने पास रखने के मोह से ऊपर थी और बच्चा यहां बहुत खुश हैं, सापफ दिख रहा था। अकेले लौट आने के सिवाए उसके पास कोई चारा नहीं था।
'अर्जित कहां है?' द्घर में कदम रखते ही राजीव ने पूछा।
'मामा के द्घर' शकुन ने बताया। बहुत दिनों बाद आज जैसे एक मानसिक दबाव से मुक्त थी। 'कपड़े बदलोगे या तुरंत चाय बना लूं' राजीव ने जैसे सुना ही नहीं, वहां छोड़ आईं? 'तुमने ठीक नहीं किया शकुन। अमित का पता नहीं क्या मन होता।'
'अब। बस भी करो। तुम बाप-बेटे दोनों एक जैसे। चैन से जीने नहीं देते, एक पल को भी। खुद कोई निर्णय करोगे नहीं, मैं कर लूं तो हमेशा तीर-तलवार लेकर खड़े हो
जाओगे।'
'मेरी बात अलग है, पर अमित को जानती हो तुम। हमेशा अपने निर्णयों का आदी रहा है। शादी से लेकर, बच्चे कब करे, कितने करे, बच्चे का क्या करे किसी चीज में उसने राय ली कभी हमारी?'
बच्चे के माध्यम से अमित-रेखा का, अदृश्य सा दबाव अपने ऊपर महसूस करते शकुन को एक हफ्रते से ऊपर हो गया था। दरअसल, वह भी अकेले जिंदगी जीने की आदी हो गई थी किसी तरह का अतिरिक्त दबाव झेलने की सहनशक्ति और धैर्य अब कम होता जा रहा था। खीझ गई एकदम 'अमित की राय और अमित का मन, मेरी राय और मेरे मन से ऊपर है, मेरे लिए बच्चे की खुशी। हद हो गई है, खिलते हुए पफूल को आदेश करो यहां खिलो, वहां खिलो, ऐसे झुको, ऐसे बढ़ो। मैं नहीं मानती इस आचार संहिता को।'
'तुम जानो, अमित चिल्लाएगा तो जवाब तुम ही देना।' राजीव ने हमेशा की तरह पल्ला झाड़ लिया था।
'ठीक है, मैं दे लूंगी जवाब।' कहकर शकुन ने चाय की एक लंबी सिप ली और जीभ जला ली।
जैसा कि अंदेशा था, खाली होते ही अमित ने पफोन किया 'मां जरा अर्जित से बात करा दो।' सीधे मांग रखी, इधर-उधर बात करने का समय उसके पास नहीं। 'बेटा तुम रेखा के भाई के द्घर पफोन मिला लो। अर्जित वहीं है।' जैसे आसमान से गिरा हो अमित-'क्या? उसे भास्कर के द्घर छोड़ आई! क्यों मां?' जैसे कि क्लास में मास्टर सपफाई मांग रहा था।
'बेटा उनका पफोन आया था, अर्जित एकदम से खुश हो गया। मैं मिलाने को खुद साथ लेकर गई थ्ाी। उसका मन कर गया। भास्कर भी रोकने लग पड़ा, मैं मना नहीं कर सकी।' शकुन ने बिना किसी संकोच के जवाब दिया।
'एक बार मुझसे पूछने की जरूरत नहीं समझी तुमने मां, ऑफ्रटरआल वह मेरा बेटा है।'
'हां और तुम मेरे बेटे हो, वह मेरे बेटे का बेटा, लॉजिकली मेरे पास दुगुना अधिकार होना चाहिए था न।' अपनी बात में उलझ गया था अमित। तुम नहीं जानती मां, तुमने मुझे कितना लेट डाउन करा दिया। 'किससे बेटा? हार-जीत का यह समीकरण एकदम समझ में नहीं आया शकुन को।'
'रेखा से। और किससे? हमेशा कहती आई थी वह कि मां के पास अर्जित खुश नहीं रहेगा उन्हें बच्चे रखना नहीं आता। मेरे भाई के द्घर ज्यादा खुश रहेगा वह। इसीलिए तुम्हारे पास नहीं छोड़ना चाहती थी। और तुमने वही साबित करके रख दिया।'
'तुम्हारी और रेखा की सोच और तुम्हारे डिपफरेंसेस तुम जानो। बच्चों की खुशी के ऊपर अपने दंभ और मतभेद को रख सकूं, ऐसी निर्मम नहीं हो सकती मैं। यह मेरी कमजोरी हो सकती है, बनावट भी।' थोड़ा कठोर हुई पिफर तुरंत मुलायम पड़ी। वही एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाला पुराना रवैया।
'बेटा, अर्जित यहां बोर हो रहा था, हमने बहुत कोशिश की उसका जी लगाने की, पर वह खिलकर नहीं रह रहा था। हम बूढ़ों के साथ वह बेचारा करता भी क्या?' अपनी तरपफ से बहुत मुलामियत से काम किया शकुन ने। लेकिन उस तरपफ कहीं कोई लिहाज, कोई मुलायमियत नहीं। एकदम उखड़ गया अमित-'क्या करती हो मां? इतनी काबिल बनती हो, पर एक बच्चा नहीं संभला तुमसे। सिपर्फ दस दिन, सिपर्फ दस दिन के लिए तुम नहीं रख पाईं उसे अपने साथ?'
'ऐसी बात नहीं है बेटा, समझने की कोशिश करो। आज के बच्चों की अपेक्षाओं से हम कापफी दूर हो गए हैं, हमारे उनके बीच कोई संवाद का पुल नहीं बचा है, नए सिरे से बनाने के लिए समय चाहिए। वर्ना तुम दोनों को क्या नहीं पाला हमने?'
'पता नहीं कैसे पाला है मां! हमें तो अचरज होता है कभी-कभी। कोई भी काम होता है तुमसे कायदे से? मैं जानता था इसीलिए आज तक कभी नहीं छोड़ा था। यह तो हम दोनों की व्यस्तता और क्रेव बंद हो गया छुट्टियों में वर्ना हम कभी न भेजते उसको तुम्हारे पास।' आसमान से धम्म से गिरी शकुन। ओह, तो इसलिए भेजा था अर्जित को। अब तक लाड़ लड़ाती, पोते के सारे नाज-नखरे उठाती दादी जैसे कहीं, जैसे कहीं खो गई। कड़वाहट रोकते-रोकते भी स्वरों तक आ ही गई-'हां, बेटा सच कहते हो, हमें कुछ भी नहीं आता। आता होता तो तुम्हारी मंशा समझ न गए होते। पिफलहाल अपनी अमानत को सही सलामत यहां से ले जाओ। तब तक हम उसे महपफूज रखने की पूरी कोशिश करेंगे।' यह कहकर शकुन ने पफोन रख दिया।

 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)