फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कहानी
 
पुरानी तोप
 
दीपक शर्मा
 

जन्म : ३० नवंबर १९४६

पंद्रह कहानी संग्रह प्रकाशित। लखनऊ क्रिशिचियन कॉलेज के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग के रीडर के पद से
सेवानिवृत्त।
बी-३५, सेक्टर- सी,
अलीगंज, लखनऊ-२२०६२४

चतुर्थ श्रेणी के रेलवे क्वार्टर नंबर छियालीस पर पहुंचते ही मैंने अपनी स्कूटी पर ब्रेक लगा ली।
'निरंजन यहीं रहता है क्या?' उसके सामने खड़े ठेले पर सब्जी खरीद रही स्त्राी से मैंने अपना हेलमेट उतारकर पूछा।

'हां। मैं निरंजन की मां हूं।' हाथ का मटर सब्जी के ठेले ही में छोड़कर वह मेरी ओर मुड़ ली।
'मैं निरंजन की एम.ए. टीचर हूं और मुझे आप लोगों से कुछ काम है।' मैं अपनी स्कूटी से उतर ली।
'इस छोटी उम्र में इतनी बड़ी क्लास की टीचर?' सब्जी वाले ने मुझे अपने साथ वार्तालाप में उलझाना चाहा।
'मेरी उम्र छोटी नहीं। तेईस वर्ष है। और एम.ए. पढ़ाने के लिए एम.ए. में पफर्स्ट क्लास पफर्स्ट भी हूं।' मैंने निरंजन की मां की ओर देखा।
'कोई रेलवे रिजर्वेशन चाहिए?' उसने पूछा।
अपने कॉलेज के दफ्रतर से निरंजन का पता लेते समय मैं जान चुकी थी कि निरंजन की मां अपने पति के आकस्मिक देहांत के परिणामस्वरूप उनके चपरासी वाले पद पर स्थानीय रेलवे स्टेशन पर तैनाती पाए हुए थीं।
'नहीं। कॉलेज का काम है, रेलवे रिजर्वेशन का नहीं।' मैंने कहा, 'आप सब्जी खरीद लीजिए। मैं बाद में कहूंगी...।'
'ठीक है।' स्त्राी ने ठेले पर अपने हाथ पुनः जा टिकाए, 'यह मटर पांच रुपए में दो मुट्ठी तो आ ही जाएंगे?'
'निरंजन भइया जी के लिए तो तीन मुट्ठी भी दे सकते हैं', ठेले वाला मुस्कराया।
'अब पैसे जोड़ के बताओ...'
'सत्तरह रुपए। दो का यह एक टमाटर, सात के ये तीन सौ ग्राम आलू, एक का धनिया, दो का खीरा और अब पांच के ये मटर...'
'लो, यह बीस रुपए। कल का तीन रुपया बकाया आज खत्म...'
'हां, हिसाब बराबर है अब...'
'क्या मैं आप के साथ अंदर आ सकती हूं?' अपनी स्कूटी मैंने उसके दरवाजे पर खड़ी कर दी।
'ठीक है', अपनी अनिच्छा उसने मुझसे छिपाई नहीं।
दरवाजे के पार छोटा, खाली गलियारा था जिसके छोर पर एक बाथरूम था और दूसरे पर एक रसोई।
दोनों के कपाट खुले थे।
खुले वे दोनों कपाट भी थे जो गलियारे के बीच के भाग में स्थित थे।
उन दोनों कमरों को उद्घाड़ते हुए जो उस परिवार की पूरी गृहस्थी समेटे थे।
'बताइए', स्त्राी गलियारे में पहुंचकर रुक गई।
'क्या मैं कहीं बैठ सकती हूं?' मैंने कमरों की दिशा में अपनी नजर द्घुमाई।
दोनों में अलग-अलग दुनिया बसी पड़ी थी। हां, सम्मिलित रूप में जो साझा था वह थी बेतरतीबी और बेढंगापन। एक कमरे की दीवार पर माला लिए निरंजन के पिता की तस्वीर टंगी थी और दूसरे कमरे की दीवार पर कैटरीना कैपफ का एक उत्तेजक पोस्टर जिसके ऐन नीचे एक छोटा जि धरा था।
'बैठने की पफुर्सत आपके पास होगी मगर मेरे पास नहीं', उन्होंने बेरुखी दिखलाई, 'बारह बज रहा है और मुझे अपनी ड्यूटी के लिए एक बजे द्घर से निकल लेना है। इस बीच मुझे निरंजन के लिए दोपहर का भोजन भी तैयार करना है...।'
उसके स्वर में लगभग वही तेजी एवं कोप था जो मुझे कॉलेज में निरंजन के स्वर में मिला करता था जब कभी भी मैं अराजक हाव-भाव एवं टीका-टिप्पणी का कड़ा विरोध किया करती। क्लास के अंदर भी और क्लास के बाहर भी।
'निरंजन की तरह मेरे पिता भी नहीं हैं', मैंने अपनी आंखों से आंसू ढलकाए, 'बल्कि मेरे साथ तो और भी कई मुश्किलें हैं। पांच बहनों वाले अपने परिवार में सबसे बड़ी होने के नाते कमाने वाली मैं अकेली हाथ हूं और...'
'तो क्या आप सोचती हो हमारे पास कमाने वाले सौ हाथ हैं?'
'सौ हाथ न होंगे मगर निरंजन के ऐसे हाथ तो हैं जो चाहे तो अपने एक हाथ की चुटकी से दूसरे के हाथ को बे-हाथ कर दें और चाहे तो उसे अपना हाथ देकर उसके हाथ ऊंचे कर दें।'
'कैसे?' वह थोड़ी उत्सुक हो आई।
'अभी आधा द्घंटा पहले मेरे प्रिंसिपल ने मुझे अपने दफ्रतर में बुलाकर एक पत्रा दिखाया है जिस में एम.ए. के साठ छात्रा-छात्रााओं के हस्ताक्षरों के साथ मुझे कॉलेज से हटा देने की मांग रखी गई है। पत्रा में पहला हस्ताक्षर निरंजन का है और मुझे बताया गया है कि मुझे उसे अपने पक्ष में लाना होगा...।'
यूं तो प्रिंसिपल ने मुझे यह भी बताया था कि निरंजन कॉलेज के छात्रासंद्घ के महामंत्राी कुंदन का विशेष कृपा पात्रा है, बल्कि हमारे इस एम.ए. के सेल्पफ पफाइनेंसिंग कोर्स की पफीस का दस हजार भी कुंदन ही ने निरंजन के नाम पर लगाया है और निरंजन की इस मांग को लेकर कॉलेज भर में बखेड़ा खड़ा किया जा सकता है, मगर मैंने प्रिंसिपल का वह कथन अपने पास रोके रखा। मैं उसे नीचा नहीं दिखाना चाहती थी। लेकिन इस नौकरी की मुझे सख्त जरूरत थी।
'निरंजन के किसी भी मामले में मेरा कोई दखल नहीं रहा करता', वह तनिक नहीं पसीजी। 'मैं अपने काम से काम रखती हूं और इस समय मुझे रसोई का काम निपटाने की बेहद जल्दी है। निरंजन से आप कॉलेज में मिलो...।'
'आपका काम आज मैं बांट सकती हूं। आप आज्ञा दें। तो आपकी सब्जी तैयार कर दूं, चपाती सेंक दूं, खीरा काट दूं', मैंने उसके सामने अपना नया प्रस्ताव रख दिया। उसके बेटे की ताक में मैं उसी के द्घर पर उसकी बाट जोहना चाहती थी।
हालांकि रसोईदारी के मेरे प्रयास अधिक सुखद परिणाम नहीं ला पाते। उधर मेरे द्घर पर भी मुझसे रसोई का काम कोई नहीं लेता। कारण शायद अपने तेरहवें वर्ष ही में पिता को मृत्यु के हाथों खो देने का रहा। जब उसी वर्ष से मैंने मां की देखा-देखी पास-पड़ोस के बच्चों की ट्यूशन लेनी प्रारंभ कर दी थी।
'ठीक है, चली आओ', निरंजन की मां ने मेरा प्रस्ताव
स्वीकार लिया।
बेशक रसोईदारी के दौरान उसका ध्यान मेरे हाथों पर अधिक रहा और मेरी बातों पर कम, लेकिन वह मेरे संकल्प को लाभ पहुंचाने के लिए पर्याप्त रहा।
मैं अभी दूसरी रोटी बेल ही रही थी कि बाहर एक मोटर साइकिल के रुकने की आवाज हम तक चली आई।
'निरंजन आ गया लगता है', निरंजन की मां के हाथों में अतिरिक्त पफुर्ती आन प्रकट हुई, 'यह कुंदन की मोटर साइकिल है...'
'भूगोल वाली मैम इधर आई हैं क्या?' कुंदन दरवाजे ही से चिल्लाया।
अपने ठाट-बाट एवं टीम-टाम की तुरही बजाता हुआ।
'आप कहें तो मैं इन लोग से सीधी बात कर लूं?'
उत्तेजना से मैं लगभग कांपने लगी। कुंदन के पद और सामर्थ्य से मैं भली-भांति परिचित थी! पूरा छात्रासंद्घ उसकी मुट्ठी में रहा करता। लगभग सभी निर्वाचित सदस्य उसी के चुने हुए प्रत्याशियों में से होते और पूरे चुनाव की दौड़-धूप भी उसी के संचालन में हुआ करती। वह हमारे कॉलेज के एम.पी.एड. विभाग का विद्यार्थी था। उम्र में निरंजन से पांच वर्ष और मुझसे चार वर्ष बड़ा। खूब हट्टा-कट्टा और ऊंचा-लंबा।
'जाओ, जरूर जाओ', निरंजन की मां अधूरी बेली हुई रोटी बेलने लगी।
मैं गलियारे में जा खड़ी हुई।
'मैम आप यहां कैसे आईं?' सवाल कुंदन ने किया, निरंजन ने नहीं।
'हमारे प्रिंसिपल ने मुझे एक पत्रा दिखाया है जिसमें निरंजन का हस्ताक्षर भी है...'
'तो?' इस बार भी प्रतिक्रिया कुंदन ही ने दी, निरंजन ने नहीं।
'मैं चाहती हूं निरंजन अपना हस्ताक्षर वापिस ले ले ताकि मेरी नौकरी सुरक्षित रहे...।'
'ले सकता है मगर हमारी कुछ शर्तें हैं', कुंदन ने निरंजन की पीठ द्घेर ली।
'क्या क्या?' मेरा दिल डूबने लगा।
'आपको अपने क्लास रजिस्टर में निरंजन को हमेशा हाजिर दिखाना होगा, यह ध्यान दिए बिना कि वह क्लास में हाजिर है या नहीं...'
'और?' मेरा गला द्घुटने लगा।
'आप उसके शोध-निबंध, डिजर्टेशन वाले पेपर में उसका पूरा काम स्वयं करेंगी, लिखने से लेकर छपवाने तक...।'
'और अगर मैं ये शर्तें न मानूं तो?' मैंने थूक निगली।
'तो हम आपकी जगह अपना बंदा ले आएंगे...।'
'क्या कोई तैयार बैठा है? मुझसे ज्यादा दरिद्र और लाचार?' दिखावटी अविश्वास प्रकट करने के पीछे मेरी चुनौती छिपी थी।
'है तो', निष्ठुर लापरवाही से उसने ठीं-ठीं छोड़ी और
निरंजन की पीठ से अपने हाथ अलग कर उन्हें हवा में लहरा दिया।
'और प्रिंसिपल साहब भी उसे मेरी जगह देने के लिए तैयार हैं?' मेरा दिल उलट लिया।
'हां। अपने उस चेले को हम उनसे मिलवा चुके हैं। और उनकी ओर से ओ.के. पूरी है...'
'मैं समझ रही हूं', स्पष्ट था मेरे विरु( प्रिंसिपल के नाम लिखे गए उस पत्रा का मसौदा कुंदन ही ने तैयार किया था, निरंजन और उसके सहपाठियों ने नहीं।
'हम जानते हैं कि मैम, आप बहुत समझदार हैं और अभी ही से अपने लिए नई जगह खोजनी शुरू कर देंगी...'
'अभी से क्यों?' मैं चमक ली, 'अभी तो मुझे अपने इन प्रिंसिपल साहब से मिलना बाकी है। उन्हें कह देना बाकी है कि उन्हीं के कालेज के इंटरव्यू बोर्ड द्वारा किया गया मेरा चुनाव वे आपकी विवादास्पद आपत्तियों के आधार पर रद्द नहीं कर सकते...।'
'वे आपको आपके नियुक्ति पत्रा की कॉपी दिखला देंगे जिसमें यह सापफ लिखा है कि आपकी नियुक्ति बिना कारण बताए कभी भी रद्द की जा सकती है...।'
'मेरे पास उनकी 'हां' समेटने का भी उतना ही साहस है जितनी उनकी 'न'...।'
अपनी हतबु(ि से मैं अब बाहर निकल चुकी थी और अपनी मान-मर्यादा के प्रति पूर्णतः सचेत हो ली थी।
'हम जानते हैं, मैम', 'कुंदन ने नाटकीय अंदाज में अपने दोनों हाथ मेरे सम्मुख ला जोड़े', 'और इसीलिए आपको पूज्य मानते हैं... और निवेदन करते हैं कि आप हम दोनों का प्रणाम स्वीकारें...।'
प्रतिक्रिया स्वरूप उसकी दिशा में अपने हाथ जोड़ देने की बजाए मैं उन्हें अपने बटुए में ले गई।
मैंने पहले उसमें रखी अपनी स्कूटी की चाभी निकाली और पिफर वह अभियोगात्मक पत्रा जिसकी एक कॉपी प्रिंसिपल ने मेरे हाथ में थमा दी थी।
'आपकी श्र(ा का यह प्रमाण पत्रा मैं अपने पास रखे हूं...।'
दोनों ने लज्जित ही-ही छोड़ी।
अब आप जान ही गए होंगे कि आगामी संभाव्य द्घटना उस कॉलेज के प्रिंसिपल द्वारा जारी किए गए प्रमाण आदेश थे।
कुंदन के नाम नहीं।
निरंजन के नाम नहीं।
मेरे नाम।

मैं उत्तेजना से लगभग कांपने लगी। कुंदन के पद और सामर्थ्य से मैं भली-भांति परिचित थी! पूरा छात्रासंद्घ उसकी मुट्ठी में रहा करता। लगभग सभी निर्वाचित सदस्य उसी के चुने हुए प्रत्याशियों में से होते और पूरे चुनाव की दौड़-धूप भी उसी के संचालन में हुआ करती। वह हमारे कॉलेज के एम.पी.एड. विभाग का विद्यार्थी था

 
 
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