फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कहानी
एक था कागा
दीर्द्घ नारायण

जन्म : १९६८

महत्वपूर्ण पत्रा-पत्रिाकाओं में कहानियां प्रकाशित।
रक्षा संपदा कार्यालय, ११६, ताज रोड, आगरा छावनी
मो. ०९४११११५१११

मध्य नवंबर का यह समय, दिल्ली में तो जैसे शाम को आसमान से गुलाब की वर्षा होती हो। ऐसे में अपने जे.एन.यू. कैंपस का समां ही जुदा है। आठ महीने की शरीर थकाऊ और मन ऊबाऊ उष्ण कटिबंधीय दीर्द्घकालीन गर्मी के बाद ही तो इस निरालेपन का शुभ आगमन हुआ है। ऐसा गुलाबी मौसम छोड़कर कौन जाए चंद्रेश के गांव, वह भी बिहार के सुदूरवर्ती क्षेत्रा में, नेपाल और बंगाल की सीमा से लगे कहीं द्घोर देहात में। वैसे भी मुझे आगामी मार्च तक 'पर्यावरण और पक्षी' विषय पर विभाग में थीसिस जमा करना है, मेरी गाड़ी तो पहले से ही एक साल लेट है। कृपया यह ख्वाब-खयाली बिलकुल मत पालिए कि कैंपस की रंगीनियां मुझे चंद्रेश के गांव जाने से रोक रही हैं, तदनुरूप यह कहानी भी कैंपस आशिकी में सराबोर होने का भ्रम मत पाले। समझदार के लिए इशारा ही कापफी होता है, 'पर्यावरण और पक्षी' जैसे शुष्क टॉपिक पर रिसर्च करने वाले को कौन भला लिफ्रट देगी! दरअसल वह दो दिनों तक मेरे पीछे पड़ा रहा, मुझे अपने गांव ले जाने की अनवरत जिद लिए-'तुम विश्वास करो मेरे गांव में एक अजीब बात हो गई है, मेरे साथ तुम भी चलो, देखें तो हकीकत क्या है।' मेरे दो बार मना करने के बाद तो वह 'बेस्ट ेंड' की नाव पर सवार हो लिया-'हो सके तुम्हारे टॉपिक पर एकाध पेज जोड़ दे यह अजीब सी द्घटना...' द्घटना चाहे जो भी हो मेरे टॉपिक पर वह क्या खाक हेल्प करेगी, चंद्रेश के टॉपिक 'इक्कीसवीं सदी में सामाजिक जागरूकता की दिशा' में भले ही कुछ एड हो जाए। गांव-समाज में द्घटी कोई द्घटना, परिवर्तन आदि समाजशास्त्रा के आलिंगन में ही तो जाएगा!
वैसे भी चंद्रेश का 'अजीब' शब्द पर दबाव बनाकर बोलना मेरे अंदर कौतूहल कम, गुदगुदी ज्यादा पैदा कर गया, ग्रामीण भारत में हो रहे परिवर्तन के बारे में सुनी-कही गई बातें मेरे मन में गुदगुदी का संजाल और कर्ण व नेत्रा स्वाद की अपार संभावनाएं उछाल रही थीं कि आजकल गांव में तो पंचायतें लगती रहती हैं, खासकर छोरा-छोरी के मुद्दे पर, रस ले-लेकर, कोई लड़का-लड़की अरहर के खेत में लिपटे हुए रंगे हाथ पकड़े गए होंगे, पिफर पंचायत हुई होगी और अब दोनों पक्ष आमने-सामने होंगे, एक दूसरे के खून के प्यासे... या पिफर किसी युवक-युवती में महीनों-वर्षों से लुका-छिपी, गुत्थम-गुत्थी चल रही होगी, अब तो युवती कुछ 'महीने से' होगी, शादी को लेकर रस्साकस्सी पंचायत दर पंचायत चल रही होगी, लड़की ऊंचे द्घराने की होगी तो लड़के वाले शादी के पक्ष में गोलबंद होंगे जबकि लड़की वाले लड़के को कठोर दंड के लिए ऐड़ी-चोटी एक किए होंगे या अगर लड़का उच्च कुल का होगा तो लड़की वाले शादी के लिए अड़े होंगे जबकि लड़के वाला ले-देकर मामला रपफा-दपफा करने का तिकड़म भिड़ा रहा होगा... सो पूर्णियां-अररिया के लिए सीमांचल ट्रेन में बैठते ही अपनी उत्सुकता काबू में न रख पाने के वशीभूत मैंने पूछ ही लिया-'रे चंद्रेश, उस अजीब सी बात का थोड़ा क्लू तो बताओ, मैं जान तो सकूं कि आखिर मामला क्या है...' मुझे जरा भी शक नहीं था कि मामला छोरा-छोरी से हट कर होगा-'देखो यार, बात ऐसी है कि मेरे गांव बकैनियां में दो टोला है-पूरब टोला और पश्चिम टोला, दोनों टोला के बीच कापफी मतभेद, तनातनी है और हिंसक वारदात तक हो चुकी है, पुलिस...।' 'अच्छा-अच्छा, ठीक-ठीक है, मैं समझ गया'-मैं अंदर से कांप उठा था, न जाने ये चंद्रेश मुझे भी कहीं पुलिस के लपफड़े में न द्घसीट ले। मेरे बोलने के अंदाज से वह समझ गया कि मामले की प्रकृति को जैसे मैंने समझ लिया है, इसके बाद वह चुप लगा गया। ट्रेन अलीगढ़ पार कर चुकी थी, मैं चुपचाप अपनी बर्थ पर सांस अंदर-बाहर करने लगा...।
'बस अब आधा किलोमीटर ही रह गया है, वह देखो सामने बांस-बिट्टी, उसी के पार तो है मेरा गांव बकैनियां'-पांच किलोमीटर पैदल चलते-चलते थक जाने की शिकायत का सम्मान करते हुए चंद्रेश ने उंगली के इशारे से आस बंधाई, जैसे बच्चे को लड्डू देकर दौड़ा रहा हो। नजर उठाकर आंखें गोल करके मैंने पाया सामने बांसों के झुरमुट की लंबी श्रृंखला धरती के गर्भ से निकल रही है, जैसे-जैसे नजदीक आते गए बांस के झुरमुट धरती से निकलकर थोड़ा-थोड़ा बड़े होते गए। दूर से सपाट और काली दिखने वाली झुरमुट की श्रृंखला नजदीक आने पर सद्घन और हरित पट्टी सी दिखने लगी। झुरमुट में प्रवेश करते ही मुझे संकल्प लेना पड़ा, दिल्ली वापस लौटते ही बांस के इस कदर सद्घन और दीर्द्घतम झुरमुट को गिनीज बुक ऑपफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज कराने के लिए वृत्तचित्रा बनाऊंगा। बांस-बिट्टी के बीच-बीच में सेमल के विशालकाय पेड़ आसमान से बातें करने में मशगूल, जैसे धरती से आकाश तक गांव की कड़ी पहरेदारी कर रहा हो। झुरमुट खत्म होते ही पीपल के उर्ध्वगामी और बरगद के क्षितिजगामी प्रकृति के दसियों पेड़ हवा के साथ अठखेली करने में मग्न थे, जैसे हवा में ऑक्सीजन का स्प्रे कर रहा हो। गांव की सीमा पर तैनात बलशाली पेड़ गदाधारी सदृश्य दिख रहे थे। आगे बढ़ने पर आम के कई बगीचे सड़क के किनारे-किनारे शांतचित्त पड़े हैं, जैसे इनकी तैनाती हुई हो। सड़क के एक ओर बच्चों के बालसखा जामुन और बेर के अनगिनत पेड़ अपने कोमल पत्ते लहरा रहे हैं, जैसे ग्राम-आगंतुकों का गर्मजोशी से स्वागत कर रहे हों, उसके बाद मंदिर जैसे गांव का रक्षक, मंदिर से लगे विशाल तालाब जैसे गांव का पोषक, पिफर कुछ आगे ऐतिहासिक कुआं जैसे गांव का पालक! अब मैं बीच गांव में... झोपड़ियां, पुआल के, टीन के ऊंचे-ऊंचे द्घर और इक्के-दुक्के पक्के मकान! कुल-मिलाकर पफकीरी-गरीबी और कामचलाऊ आय वर्ग का बेजोड़ कोलाज... थोड़ा आगे बढ़ने पर सामने विद्यालय भवन '...स्वाहा...'-कानों में नारे जैसा मंत्राधारित समवेत स्वर पड़ा। 'स्कूल में कुछ हो रहा है क्या' -मेरी कौतूहल की पोटली खुलने लगी। ;गांव की सीमा में प्रवेश करते ही वातावरण की पिफजा ने गुदगुदी की हर संभावना मिटा डाली थीद्ध चंदे्रश ने गर्व से कहा-'अजीब बात का परिणाम दिख रहा है।' सामने से आती हुई दो बुजुर्ग महिला के मुंह से चंद्रेश के लिए आशीर्वाद झरने लगा- 'जुग-जुग जियो बेटा, अच्छा हुआ तुम आ गए बेटा, दुनिया की भलाई में भागीदार बनो।' पिफर तो चौराहे से मेरे कदम तेजी से स्कूल प्रांगण की तरपफ बढ़ने लगे, मानो द्घटना स्थल पर तरंग गति से पहुंच चुका मेरा मन अदृश्य डोरी से मुझे खींच रहा हो। लेकिन उसने मुझे पीछे से खींच लिया-'अरे बु(ू, पहले द्घर चलो नहा-धोकर शु( होकर ही वहां चलना ठीक रहेगा।' तब कहीं मन की डोर छूटी-'लगता है मामला धर्म-प्रकृति से जुड़ा है।'
आधा-पौने द्घंटे बाद हम दोनों स्कूल प्रांगण में भारी भीड़ के भाग थे। एक खास केंद्र की ओर मुंह किए हजारों लोगों की वृत्ताकार भीड़ जोश से लबालब थी या गुस्से से सराबोर थी, यह निश्चय कर पाना दुविधापूर्ण था। उस खास केंद्र से आकाश की ओर धुएं के साथ मंत्राोच्चारण का अविरल प्रवाह न जाने कब से जारी था- ...ए.सी. वाले स्वाहा... वाशिंग मशीन वाले स्वाहा... सी.एपफ.सी. पर जिंदा रहने वाले स्वाहा... ओजोन परत खाने वाले स्वाहा... कार्बन बढ़ाने वाले स्वाहा... तापमान बढ़ाने वाले स्वाहा... प्रदूषण पफैलाने वाले स्वाहा... धरती मां का भक्षण करने वाले स्वाहा... मैंने गौर किया, मंत्राोच्चारण सुनकर चंद्रेश के रोंगटे खड़े होने लगे थे। वह न उछलते हुए भी मुझे उछलता हुआ दिखने लगा, वृत्ताकार भीड़ के वलय में वह तेजी से द्घूमने लगा, मुझे शक होने लगा क्या वह जे.एन.यू. में शोध करने वाला वही चंद्रेश है, मुझसे रहा न गया-'अरे चंद्रेश यह क्या ड्रामा चल रहा है, 'सी.एपफ.सी. स्वाहा' ये सब क्या है।' वह खुद आश्चर्यचकित था-'मुझे भी पूरी बात नहीं पता, सिपर्फ इतना पता था कि गांव के दोनों टोलों के बीच उसी कागा को लेकर संद्घर्षपूर्ण स्थिति आ गई थी...' मेरे मुंह से आश्चर्यपूरित शब्द निकल पड़ा-'काअ गाआ... कैसा कागा...' इतने में चंद्रेश भीड़ में एक सुराग पाकर अंदर समाने लगा, भीड़ में खोने से पहले वह बोलता गया-'तुम बाहर ही रुको, मैं अंदर जाकर देखता हूं क्या बात है।' उस भीड़ के बाहर मैं अकेला व्यक्ति था जो न तो खास केंद्र की ओर उन्मुख था और न ही मंत्राोच्चारण में शामिल था। लेकिन इस वातावरण ने शीद्घ्र ही मुझे भी अपने आवरण में ले लिया, मैंने पाया मेरे शरीर के रोंगटे भी अपनी पोजीशन छोड़ने लगे हैं... अब मैं उस वातावरण में सम्मिलित हो चुका था, मैंने अपने-आपको अभागा पाया जो भीड़ में एक सुराग तक नहीं खोज पा रहा था। हारा हुआ सा चारों ओर नजरें दौड़ाने लगा, कोई दयावान तो मिले जो मुझे 'स्वाहा' केंद्र तक ले जाकर मुझे अधोगति से उबारे... 'रे उस टीले में पिरामिड सा क्या बन रहा है'-मैंने देखा, उत्तर की ओर कोई डेढ़-दो सौ मीटर की दूरी पर बरगद पेड़ से सटी कोई आकृति खड़ी हो रही है, निर्माण कार्य में लगे सैकड़ों लोग कोई नारा भी बुदबुदाए जा रहे हैं। मैंने पाया, मैं तेज कदमों से उधर ही जा रहा हूं, नजदीक आते जाने पर नारा बिलकुल स्पष्ट होता गया... कागा अमर रहे... कागा विलुप्त कराने वाले जागो... पक्षियों को नष्ट करने वाले मुर्दाबाद... कागा अमर रहे... जब तक सूरज चांद रहेगा, कागा तेरा नाम रहेगा... नजदीक आकर मैंने पाया, तीन तिरछी दीवारों को जोड़कर पिरामिड आकृति ऊपर उठ रही है। उधर सी.एपफ.सी. स्वाहा इधर कागा अमर रहे, मुझे लगा मैं धरती नामक ग्रह पर न होकर किसी अन्य खगोलीय ग्रह पर पहुंच गया हूं। मैं टकटकी लगाए कभी वृत्ताकार भीड़ को देखता, कभी उठते पिरामिड को...
'ओजोन परत खाने वाले स्वाहा... तापमान बढ़ाने वाले स्वाहा... पक्षियों को नष्ट करने वाले मुर्दाबाद... कागा अमर रहे... धरती मां का भक्षण करने वाले स्वाहा... कागा को लुप्त करने वाले जागो... कार्बन बढ़ाने वाले स्वाहा... कागा अमर रहे...' जैसे मंत्राोच्चारण और नारा अब क्रम-भंग होकर मेरे कानों में पड़ने लगा... इधर सभी लोग पिरामिड निर्माण में लगे थे और उधर वृत्ताकार भीड़ का हर व्यक्ति स्वाहा-केंद्र की ओर उन्मुख था, एक भी व्यक्ति अकारण नहीं था जो मेरी जिज्ञासा ;बल्कि द्घबराहटद्ध शांत कर सके... 'ओ गॉड'-मेरी जान में जान आई, पीछे सड़क के किनारे पीपल पेड़ के नीचे बैठे एक बुजुर्ग ने मुझे दोनों हथेलियों के इशारे से बुलाया। मैं आजाद कैदी सा उधर भागा।
'बेटा, तुम्ही चंद्रेश के साथ दिल्ली से आए हो, बहुत बड़े विद्वान लग रहे हो, आओ बैठो...' मुझे अवाक देखकर वह हंस पड़ा-'अरे बेटा, यहां पर इसी खादी के गमछे पर ही बैठना होता है, समझो धरती मां का आसन है।' मैं उसी गमछे में उससे सटकर बैठ गया, लेकिन मेरी नजरें स्वाहा केंद्र और बढ़ते जा रहे पिरामिड के बीच दौड़ रही थीं, अजनबी को जिज्ञासु जान वह बुजुर्ग शोकजनक अंदाज में बोल उठा-'यह तो हम गांव वालों का दुर्भाग्य है, हमारे गांव तो क्या पूरी धरती का संकट है, इस गांव का एकमात्रा कागा था, उसने भी शनिवार को प्राण त्याग दिए, पता नहीं इस दुनिया में और कितने कागा बचे हैं-बचे भी हैं कि नहीं, अगर हैं भी तो न जाने कहां
होंगे'-बोलते-बोलते वह आसमान की ओर ताकने लगा। उस अजूबेपन की अबूझ पहेली मुझ पर टनों वजन डालती जा रही थी, सो मैं बीच में ही हड़बड़ाकर टपक पड़ा, बुर्जुग के बोलने के अंदाज से बिलकुल अलग-'उधर कागा, इधर स्वाहा, आखिर माजरा क्या है...।'
'क्या तुम्हें चंद्रेश ने नहीं बताया'-वह मेरी आंखों में डूबता हुआ जान पड़ा।
'मुझे सिपर्फ इतना भर पता है कि कोई अजीब सी बात हो गई है'- मैं सचमुच अबूझ और भोला सा बना हुआ था।
'अजीब सी बात नहीं, पूरी धरती में गजब होने वाला है...।' वह उदास सा हो गया, पिफर स्वतः लंबी सांस ली-'इस गांव के दो टोले हैं, एक पश्चिमी बकैनियां और एक पूर्वी बकैनियां पूरे गांव में वर्षों पहले तक रंग-बिरंगे पक्षियों के साथ-साथ कई कागा भी थे... पर पिछले दो-ढाई साल से सिपर्र्फ एक ही कागा पूरे गांव की मान-मर्यादा, इज्जत-प्रतिष्ठा को बचाए हुए था... विस्तार से तो नहीं, संक्षिप्त में ही कागा कथा सुन लो...।'
पूर्वोत्तर बिहार का अररिया जिला, यानी रेणु जी का 'मैला आंचल' आज तक वैसा का वैसा ही, धरी चदरिया। इसी आंचल का एक गांव बकैनियां, दो टोलों में विभाजित-पूर्वी टोला और पश्चिमी टोला, दोनों के बीच विभाजक रेखा-एक मृत और उथली धार जो अब धान का कटोरा है, कहते हैं दो सौ साल पहले यहां भयावह नदी बहती थी। यूं तो इस गांव तक कोई सड़क नहीं, बिजली नहीं, टेलीपफोन नहीं, ऊपर से नीम करेला-वृहद ग्राम पंचायत के एक किनारे होने के कारण ग्राम पंचायत में कोई प्रभाव नहीं, पर प्रकृति मेहरबान रही है-उपजाऊ जमीन, जमीन के मात्रा बीस पफीट नीचे अगाध जल, जमीन के ऊपर स्वच्छ आकाश, गांव के चारों ओर बड़े-बड़े हरे-भरे पीपल, पाकड़, सेमल, बरगद, जामुन के पेड़, बांस की लंबी हरित पट्टी, बीच-बीच में आम-अमरूद के बगीचे, प्रकृति के गीत गाते मैना, गौरैक्षया, कचबचिया, तोता, कबूतर, कौवा, कोयल, कठपफोड़वा, बगुला, नीलकंठ... पर्व-त्योहार, रीति-रिवाज की अटूट श्रृंखला यानी संपूर्ण सुख, भरपूर उल्लास, अनंत उमंग में डूबा गांव बकैनियां। कोई दस वर्ष पूर्व गांव की दुनिया से गरुड़ धीरे-धीरे विलुप्त हो गया, सारे गांव में कोलाहल-शोक की अव्यक्त धारा, पर गांव वालों ने प्रकृति की माया समझ गरुड़ की विदाई को पचा लिया। पिफर गांव और गांव के लोग चलते रहे अपनी धुन में।
दो साल पहले तक गांव में असंख्य कौवों के साथ कागा की भी पर्याप्त संख्या थी, कागा यानी पौराणिक पक्षियों में से एक, गांव की आत्मा का एक अभिन्न अंग। किसी के श्रा( के दिन तालाब किनारे क्रिया-कर्म संपन्न होने के बाद पितर को लगाया हुआ दही-चूड़ा-लावा का भोग कौवा-कागा के माध्यम से ही तो मृतात्मा तक पहुंचता है। पितृ पक्ष में तो कौवा-कागा हमारे पितर के एकमात्रा दूत, संवादक, और भोज्य पदार्थ चढ़ावा वाहक होते हैं। लेकिन नमान तो कौआ से नहीं हो सकता न! वह तो सिपर्फ कागा के लिए सुरक्षित-संरक्षित है, कौवा तो इस कार्य के लिए कतई स्वीकार्य नहीं है।
नमान पर्व से कागा मौलिक रूप से जुड़ा है, यह इतिहास के किस काल से चली आ रही है पता करना मुमकिन नहीं। नमान पर्व या प्रथा अगहन महीने में मनाई जाती है इस क्षेत्रा में। इसे शु( रूप में लवण ही कहते हैं, धान की नई पफसल कटने के बाद नए चावल के साथ नमक मिला कोई भी व्यंजन खाना वर्जित है जब तक कि अगहन में नमान यानी लवण पर्व या अनुष्ठान संपन्न न कर लिया जाए। यह एकमात्रा ऐसा वार्षिक पर्व या अनुष्ठान है जिसकी कोई निश्चित तिथि नहीं होती, बल्कि अगहन महीने में हर परिवार अपनी सुविधानुसार किसी भी तिथि में यह अनुष्ठान संपन्न करता है। दिन भर विभिन्न चरणों में चलने वाली मनोरंजक व उल्लासमय प्रक्रिया के बाद रात को देवी-देवता को नए चावल का प्रसाद चढ़ाते हैं, पिफर नमकयुक्त भोजन ग्रहण करते हैं, सामूहिक रूप से। सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है प्रातःकाल वाला जब कुंवारी कन्याएं केले के पत्ते में दही-चूड़ा व प्रसाद लेकर कागा के लिए भोजन रखती हैं, द्घर के पिछवाड़े में या बगीचे में! न जाने प्रकृति में वह कौन सी अंजान शक्ति है जिसने कागा में एक अनिवार्य व्यवहार या आचरण उत्पन्न कर रखा था, कागा उस पत्तल में रखे प्रसाद और भोजन ग्रहण करता ही करता है, तब कहीं गृह स्वामी निश्चिंत हो पाता है कि अगले वर्ष भी धरती मां अन्न भंडार पूर्ण करेगी।
दो साल पहले तक इस इलाके के साथ-साथ इस गांव में भी सैकड़ों कागा थे, जैसे मनुष्य के साथ उसका भी पूरा हक हो गांव में, लेकिन धीरे-धीरे कागा की संख्या द्घटती गई। जब तक कागा की संख्या पर्याप्त थी गांव का नमान सुचारू रूप से निभता रहा। कागा की संख्या कापफी कम होते जाने से नमान की सुबह लोगों की बेचैनी बढ़ने लगी। दो साल पहले कागा की संख्या मात्रा एक रह गई, जैसे प्राणी जगत की धरती की तीर्थ यात्राा में अपनी प्रजाति की तीर्थ यात्राा निपटाकर अकेला रह गया हो। धरती मां का शुक्रिया अदा करने। भूल-चूक मापफ करना हे माते। हे मां, जब इस अंतरिक्ष में तुम्हारा दोबारा जन्म होगा, तुम्हारे पास स्वच्छ पर्यावरण होगा, तुम्हारी इजाजत होगी तो दोबारा जन्म लेंगे! कागा की संख्या मात्रा एक रह गई है इसका पता भी लोगों को महीनों बाद लगा, जिस दिन कागा दो से एक रह गया उसकी बेचैनी बढ़ती गई, वह गांव के इस किनारे से उस किनारे तक मंडराता रहा, काआंव-काआंव करते-करते। शुरू में लोगों का ध्यान आकृष्ट नहीं हुआ, गांव वालों के लिए यह कागा का सामान्य व्यवहार था कि कागा जब काआंव-काआंव करे तो समझो किसी के द्घर मेहमान आने वाले हैं, और एक बड़े गांव में तो लगभग हर दिन कोई न कोई मेहमान आता ही है। लेकिन आषाढ़-सावन-भादो में तो मेहमानबाजी बिलकुल बंद ही हो जाती है, जब सारा इलाका पटुआ काटने और धान रोंपने में मशगूल रहता है। उन महीनों में भी जब कागा बेचैनी से काआंव-काआंव करने लगा तो
लोगों को शक हुआ कि कोई बात जरूर है इस कागा के साथ। पिफर तो सुबह ही बच्चे उस कागा के पीछे पड़ गए, शाम तक आविष्कार कर डाला कि इस गांव में अब एक ही कागा बचा है और इतनी बड़ी धरती में अकेला होने के कारण वह डर खा गया है।
गांव में एकमात्रा कागा होना नमान के लिए आपफत से कम न था। सौ परिवारों के गांव में सदियों से पूरे अगहन में चार-पांच तिथियों में नमान संपन्न होता रहता था। एक दिन में यदि बीस-पचीस परिवार भी नमान संपन्न करते थे तो सुबह सभी के पत्तल में कागा मिल जाता था, कागा की संख्या कम होती भी गई तो बगल वाले कागा से काम चलाया जाने लगा, अब एक कागा भला एक ही दिन में कितने परिवारों के पत्तल का भोज्य प्रसाद चखेगा! लेकिन बकैनियां वालों को अपने ऐतिहासिक शांतिपूर्ण ग्राम्य संस्कार पर गर्व रहा है, सो कई दौर की आपसी बातचीत, विचार-विमर्श के बाद गांव वालों ने नायाब कागा प्रबंध पेश किया, जैसे महान मानवशास्त्राी ेंच बोआस के सांस्कृतिक सापेक्षवाद में संस्कृतियां अपने-आप स्वतंत्रा होकर आगे बढ़ती हैं, वैसे ही अब पूरे अगहन बिना नागा किए हर दिन नमान संपन्न होगा, एक दिन में सिपर्फ तीन-चार द्घर ही नमान कराएगा, इस प्रकार एक ही कागा से पूरे अगहन भर सभी द्घर में नमान संपन्न हो सकेगा। लेकिन नमान शुरू किस द्घर से हो? लॉटरी निकाली गई-पूर्वी टोला के उत्तर से या दक्षिण से या पिफर पश्चिम टोला के उत्तर से या दक्षिण से। लॉटरी में पर्ची निकली पश्चिम टोला के दक्षिण से, यानी संत लाल विश्वास के द्घर से शुरू होकर अगहन के अंत में पूर्वी टोला के दक्षिण में रद्घुवर दास के द्घर समाप्त होगा। पिफर तो पहले वर्ष पूरे अगहन पूरे गांव में भोज सा माहौल रहा, जिस-जिस परिवार में नमान हो वे अपने-अपने सन्निकट को नमान भोज में शामिल करते। पूरे महीने कागा बिना किसी रोक-टोक के नमान संपन्न करता रहा, जैसे बैट्री चालित कोई खिलौना हो। उस वर्ष के नमान से उत्साहित हो गांव वाले गर्व से बोल उठे-बदलते जमाने के साथ हम भी तालमेल बिठा सकते हैं। चक्रीय नियम के तहत अगले वर्ष नमान पूर्वी टोला के रद्घुवर दास के द्घर शुरू होकर अगहन के अंत में पश्चिम टोला के संत लाल विश्वास के द्घर समाप्त होना था...।
पूरे एक साल गांव में और आस-पास के गांवों में गेहूं, पटुआ, धान, दलहन की बहार रही, हरे-हरे खेत, पूरे-पूरे खलिहान, भरे-भरे द्घर-आंगन! नमान आते-आते लोगों का हर्षित मन हंसते, खिलखिलाते चेहरे से बाहर झांकने लगा, उमंग आंखों में तैरती दिखने लगी और पूरे गांव का जोश ढोलक-मृदंग-मंजीरे पर थाप देने लगा। नमान आते-आते कागा तैंतीस करोड़ में से अनाम-अंजान देवी-देवता के दूत की पदवी पाता गया-'आखिर सोचो जरा, सारे कागा मर-खप गए, यही एकमात्रा कैसे बचा है! जरूर किसी न किसी देवता का दूत होगा।' मौका पाकर भक्त हंसदास ने जोड़ ही दिया-तैंतीस करोड़ में से एक है दाना देव और कागा है उसी का दूत। पिफर तो इस बार का नमान छोटा पर्व-अनुष्ठान न रहकर अन्न-
महोत्सव का रूप-रंग धरने लगा। नवयुवकों की टोली ने गांव में एक महीने तक कागा मेला आयोजित करने की भी द्घोषणा कर डाली। पिफर तो आस-पास के गांवों से भी जन-जोर हिलोर मारने लगा। देखते ही देखते गांव के पूरब धान कटान से खाली पचास एकड़ खेतों में कागा मेला उछल-कूद करने लगा। नमान की पूर्व संध्या आते-आते रद्घुवर दास का द्घर तो द्घर न रहा, इसने नमान-मठ की पदवी हासिल कर ली, रद्घुवर अचानक रद्घुनाथ कहलाने लगा-'रद्घुकुल नंदन रद्घुनाथ धन्य हो, नवयुग का नमान तुम्हारे द्घर से यात्राा आरंभ करेगा! नमान के दिन गांव में हंसता हुआ सूरज उगा, अगहन की मीठी-मीठी ठंड में पसरती धूप की उष्मा इस वर्ष शरीर में मन में, अनंत सुखद स्पर्श का आभास दे रही थी। दिन भर संपन्न होने वाले अनुष्ठान वृहद रूप-रंग में उतरता-सिमटता रहा। सांध्यकालीन अन्न-पूजन तो रात्रिा-विस्तार हेतु अंधकार को याचक बनाए रखा। दिन की तो बात छोड़िए, कुंवारी कन्याओं का अभिनंदन दल तो मध्य रात्रिा तक कागा पर टकटकी लगाए रहा, जैसे स्वर्ग से उतरकर सीधे इसी गांव में पधारा हो। पूर्णियां कॉलेज में जंतु विज्ञान का छात्रा नवीन व्याख्या पर उतर आया-अगर पक्षी विज्ञानी इस कागा का परीक्षण करे तो बेशक यह तथ्य मिलेगा कि इसमें कुछ विशिष्ट लक्षण या जीव द्रव्य है जो सामान्यतः पृथ्वी के पक्षियों में नहीं पाया जाता है और यदि नासा वाले इस गांव में आ सकें तो साबित हो सकता है कि किसी दूर ग्रह या तारा से उड़नतस्तरी द्वारा इस पक्षी को भारत वर्ष में उतारा गया है, पृथ्वी लोक से मैत्राी हेतु, पिफर तो इसे बु( भूमि में ही उतरना था। वह रात गांव में सबसे लंबी रात थी, कागा के दीदार के इंतजार में, स्पष्टतः असंख्य कागा महायुग का अंत और एकल कागा युग की शुरुआत...।
अगली सुबह धरती में सूरज की रोशनी पहुंचने से पहले ही कुंवारी कन्याओं के किशोरवय की कलकल से गांव रोशन हो उठा... कागा-कागा-कागा-कागाअअ -काआगाआ... कहां है कागा-कहां है काआ-गाआ... हो कागा देव, मत करो देर... पश्चिम टोला से पूरब टोला तक बालिकाओं का हुजूम हवा में तैरने लगा, पर कागा? न कागा और न उसका काआंव! पिफर तो औरत-मर्द- बच्चे-बूढ़े-जवान सभी की आंखें दूरबीन बन गईं कागा खोज अभियान में। उनके बीच उत्साह-उत्सुकता जवान हो उठी, जो सबसे पहले कागा देखेगा अगले साल उसके द्घर से नमान शुरू होगा। लेकिन कागा का कोई अता-पता नहीं, जैसे दैवीय शक्ति से अंतर्धान हो गया हो, बडे-बुजुर्ग दर्शन पर उतर आए-'अरे! अब यह कोई साधारण कागा थोड़े न है, देव-दूत है तो गांव वालों की परीक्षा तो लेगा ही लेगा, धीरज धारण करो, प्रसन्न होकर अपने-आप प्रकट होंगे।' पिफर तो पल भर में ही पूरा गांव मौनी मठ लगने लगा, ...जैसे कोई अवतार लेने वाला हो...।
'मुन्नर काका के खेत में कागाआआ अ...' हीरेन चौधरी की छोटी लड़की सुधा एकाएक चीख उठी तो जन समूह मुन्नर यादव के खेसारी खेत की तरपफ दौड़ पड़ा, जैसे भूकंप से अचानक उत्पन्न हुई बड़ी खाईं की ओर आस-पास की जलराशि प्रवाहित हो उठती है... खेसारी की पफसल के रंग का ही तो होता है कागा। भीड़ के पद-थाप से पूरे खेत की पफसल का वजूद मिटता गया... खेत के लगभग मध्य-उत्तर में कागा पड़ा था, निस्तेज-अक्रिय। भीड़ में कोहराम मच गया, समवेत स्वर पफूट पड़ा-पानी का छींटा मारो पिफर पंख उठाकर हवा में लहराओ, पक्षी में जान ऐसे ही वापस आती है। जीतमन वैद्य भीड़ चीरकर आगे आए, कागा को टटोला, आंख की पुतली उलटाई-चोंच पफैलाई... उनका चेहरा दयामय हो उठा, आवाज करुणापूर्ण-'इसके प्राण तो चार-पांच द्घंटे पहले ही निकल गए जान पड़ते हैं।' पिफर तो भीड़ वृत्त के केंद्र से पफुसपफुसाहट तरल वलय भांति शोर में बदलती गई, कागा मर गया... कागा नहीं रहे... कागा स्वर्ग सिधार गए...।
'यह पश्चिम टोला की साजिश है' भीड़ के बाहरी भाग से दो-तीन लोगों का मिश्रित उद्गार ;इसलिए न पहचाना जाने वालाद्ध पफूटते ही विस्मित-करुणामय-उदास भीड़ के चेहरे पर उबाल, क्रोध और द्घृणा तैरने लगी, जैसे कोई तैलीय पदार्थ अपना आवरण्ा तोड़कर पफैलने लगा हो। 'पश्चिम टोला की
साजिश क्यों होगी, पूरब टोला की क्यों नहीं'-लहटन यादव के टोकते ही पूरब टोला का साधु दास उखड़ गया-'क्योंकि मुन्नर यादव पश्चिम टोला का है, वैसे भी इस बार के महा नमान की शुरुआत पूरब टोला से हो रही है, इसलिए आप लोग मन ही मन जल रहे हैं, पूरब टोला का भाग्य आप लोग पचा नहीं पाए तो कागा ही मरोड़ डाले...' इतने में तो पश्चिम टोला के दसियों लोग उबल पड़े-'अरे पकड़ो स्साले को, हमारे टोला पर कागा हत्या का आरोप लगा रहा है, जबकि पूरब टोला वालों ने ही मारा है...' इतना सुनते ही पूरब टोला के नवयुवक भीड़ से अलग होकर धोती-लुंगी कमर में लपेटते हुए यु(ातुर दिखने लगे-'रे कागाखोर! हमारे टोला से तो नमान युग शुरू हो रहा है, तो हम भला क्यों मारेंगे कागा को, चुप हो जाओ नहीं तो जो आज तक नहीं हुआ है वह हो जाएगा।' पिफर तो पश्चिम टोला के नवयुवक भी भीड़ से अलग होकर अपने टोला की तरपफ खड़े होकर कमर कसने लगे, बाजू लहराने लगे- कागा मेला और नए-नमान के चलते तुम्हारे द्घरों में मेहमानों की भीड़ बढ़ने लगी है, तुम्हें भारी पड़ने लगा तो कागा ही खा डाला...' आग में द्घी पड़ चुका था, पूरब टोला के बड़े-बुजुर्गों ने द्घोषणा कर डाली-'अपने-अपने द्घरों से निकालो लाठी, आज पश्चिम टोला से निपटना ही पड़ेगा, शुरू से ही ये लोग पूरे गांव में दादागीरी करते आए हैं।' चंद मिनटों में ही सारी भीड़ द्घरों में कैद हो गई... आधे द्घंटे के अंदर ही दोनों टोला के बलिष्ठ लोग हाथों में लाठी लिए अपने-अपने टोले के आगे कतारब( खड़े हो गए, लाल-लाल आंखें, पफड़कती भुजाएं,
क्रोधपूर्ण चेहरे पहले आक्रमण के इंतजार में उबलने लगे। जिस गांव में आज तक कोई हिंसक द्घटना नहीं हुई, जिस गांव से आज तक थाने में कोई रिपोर्ट नहीं लिखी गई ;इसलिए पुलिस की नजर में सड़ा-गला गांवद्ध वहां अब खून की नदी अपना प्रवाह और दिशा तय करने लगी... इस बीच भक्त अद्घोड़ी दास बदन उद्घाड़कर गेरुआ वस्त्रा लहराते हुए हौले-हौले गांव के मध्य बने ग्राम देव के स्थान तक पहुंचने लगे, उनकी मंथर गति से प्रतीत हो रहा था, जैसे हवा में दोनों टोलों के दबाव से अवरोध की मोटी-मोटी अदृश्य बल्लियां बिछी हों, स्थान पर पहुंचकर दोनों हाथ उठाकर बारी-बारी से दोनों टोलों की तरपफ मुंह पफेरकर वह अपना पफेपफड़ा खाली करने लगा, स्वर थैली भरते हुए-'आज तक इस गांव का भगवान रही है शांति, गांव वालों ने आज तक एक चींटी तक नहीं मारी है तो पक्षी क्या मारेंगे, मेरी विनती है कि शाम को स्कूल प्रांगण में पंचायत बैठे... बोलो मंजूर है?' दोनों टोला से पफुसपफुसाहट और बुदबुदाने का अस्पष्ट शोरगुल आने लगा...
सूरज ढलान की ओर बढ़ रहा था, पंचायत में नया सवेरा हो रहा था। तभी थानाध्यक्ष मय दलबल आ धमका, मोबाइल युग है, जाहिर सी बात है गांव में तनाव की खबर जिला प्रशासन तक पहुंच चुकी थी। दरोगा की अप्रिय आवाज पर सवार होकर कानूनी धाराओं के डरावने तीर छूटने लगे-'यहां बैठे सभी लोग धारा तीन सौ सात, तीन सौ तेईस, तीन सौ
तिरेपन, पांच सौ छह... में अंदर जाने के लिए तैयार रहो।' पूरी तरह सन्नाटा छा गया, जैसे अचानक मध्य रात्रिा टपक पड़ी हो, सिपर्फ तनी ग्रीवा पर दरोगा का सिर अनियमित गति से चारों दिशाओं में द्घूर्णन कर रहा था... भीड़ से कृत्रिाम रूप से खांसने की आवाज आई शायद किसी के अंदर दरोगा से बात करने का साहस जन्म ले रहा था, सो हल्का खांसकर साहस बटोरने की पूर्व सूचना देना चाह रहा था। राधेश्याम यादव ;दोनों टोलों में सर्वाधिक धनी आदमीद्ध का दंडवत शरीर दिखने से पहले उसके दोनों हाथ जुड़े हुए ऊपर आए उसके शब्द अवर्णनीय रूप से याचनापूर्ण थे, जैसे मुंह से विनती सागर बह रहा हो-'हुजूर हमारे गांव में ऐसी कोई बात नहीं हुई है, एक अदना कागा को लेकर कुछ गलतपफहमी जरूर हुई थी, पर हम लोगों ने उसे भी सुलझा लिया...' उसको चुप कराते हुए दरोगा दहाड़ पड़ा-'बिना कानून पढ़े पंचायत मत किया करो, यदि आपसी समझौता कानून की नजर में गलत हुआ तो पंचायत कराने वालों तैयार रहना... डॉक्टर साहब मृत कागा का परीक्षण कीजिए, रिपोर्ट बनाकर जिले में भेजना पड़ेगा' साथ आए पशु चिकित्सक से बात करते हुए दरोगा जी सहज हो गए थे।
मृत कागा का परीक्षण निपटाकर पशु चिकित्सक और
दरोगा की टीम जीप में बैठने लगी, हिम्मत जुटाकर कुछ नवयुवक जीप तक प्रश्नवाचक मुद्रा लिए बढ़े, पिफर तो दोनों टोलों के बहुतेरे युवकों और बड़े बुजुर्गों ने जीप को गोल द्घेरे में बदल डाला। लोगों की कौतूहल से भरी नजरों की प्यास बुझाने के गरज से डॉक्टर अब्दुल सलीम पर्यावरणविद नजर आए-'देखिए मेन पफैक्टर है इन्वायरनमेंट में डिटेरियोशन! इसी का रिजल्ट है कि पिछले दो दशक में चिड़ियों की दसियों प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं, यह जो चिड़िया है वह पोरस बोन वाला पफीदर्ड क्रिएचर है, हवा में कार्बन की मात्राा बढ़ते रहने और धरती का तापमान बढ़ने से इनका वजूद खतरे में है, वैसे भी कीड़े-मकौड़े कम होते जाने के कारण पक्षी वर्ग का बचना मुश्किल है, पहले कागा की लाइपफ दो साल से ज्यादा होती थी, अब तो कापफी कम हो गई है...' पीछे खड़ी दसवीं की छात्राा नीता अधैर्य हो उठी-'मरने की बात तो समझ में आई, आदमी की जनसंख्या इतनी बढ़ रही है तो नए-नए कागा का जन्म क्यों नहीं हो रहा है।' डॉक्टर साहब गंभीर होकर बोले-'क्योंकि मानव जाति की पफर्टीलिटी को इन्वायरनमेंट ने अभी उतना प्रभावित नहीं किया है, जबकि कागा वर्ग की पफर्टीलिटी कैपेसिटी कापफी कम हुई है, साथ ही प्रजनन स्थल लगभग खत्म हो रहे हैं...' गांव वालों को अवाक-विस्मित हालत में डालते हुए जीप आगे निकल गई। वहां पर खड़े किसी के मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था जैसे सभी गूंगे हो गए हों। यह स्थिति गांव वालों के लिए बिजली गिरने से कम नहीं थी... अंधेरे को अपनी आंखों में कैद करते हुए लोग स्कूल प्रांगण में हो रही शोक सभा में भाव विह्वल हुए... भावनापूर्ण ढंग से निर्णय हुआ कि पक्षी वर्ग के ऊपर उत्पन्न खतरे के प्रति दुनिया को चेताने के लिए हवन किया जाए और कागा स्मारक बनाया जाए ताकि नमान का दही-चूहा-गुड़-प्रसाद का पत्तल स्मारक में ही चढ़ाकर नमान चालू रखा जा सके...।
'...दिल्ली वाले बाबू साहब!! एक था कागा और यह थी उसकी कहानी, अब तो गांव में कोई कागा न रहा, कोई बात नहीं अब हम लोग उसके स्मारक को ही कागा मानकर नमान का अनुष्ठान पूरा करेंगे और देश-दुनिया के गैर-खेतिहर के लिए अन्न पैदा करते रहेंगे।' मैं अभी भी अपने-आपको अधिक समझदार-बु(मिान समझता था, सो मुझसे रहा न गया-'माना कि कागा अब नहीं बचा है, लेकिन आपका नमान तो कौवा से भी चल सकता है।' बुजुर्ग निर्विकार भाव से बोल पड़ा-'इस प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई थी, पर लड़कियों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि हम लोग कौवा को पत्तल नहीं देंगे, धर्मजीत मास्टर ने समझाया कि गांव से लेकर पूर्णियां-पटना-दिल्ली हर जगह अब तो कौवा ही राजपाट चला रहा, तो नमान भी कौवा से पूरा करो, पर लड़कियों ने काट दिया-नमान तो पवित्रा होता है कौवा से कैसे चलेगा भला, राजपाट पवित्रा है कि अपवित्रा हमें क्या पता' ...पिफर तो स्मारक बनते देर नहीं लगी, सामने देखा, कल यह स्मारक होकर दुनिया को पशु-पक्षी बचाने का संदेश देगा।' उस बुजुर्ग से बात करते-करते मेरी पर्यावरण विशेषज्ञता जाग रही थी-'मेरी बात का बुरा मत मानिएगा अंकल, मैं कहता हूं आज आपका कागा मर गया तो आप लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक दिख रहे हैं और उसे क्षति पहुंचाने वाली चीजों-तत्वों को स्वाहा कर रहे हैं, अब तक तो पर्यावरण को कापफी क्षति पहुंच चुकी है, गांवों में आबादी का बड़ा हिस्सा रहता है, लेकिन पर्यावरण के लिए आप कभी आगे नहीं आए।' मुझे लगा इस बुजुर्ग बेचारे के पास मेरे तर्कपूर्ण प्रश्न का कोई जवाब नहीं होगा, लेकिन वह तो सहज भाव से बोलता गया-'देखो बेटा, तुम शहरी लोग कापफी पढ़े-लिखे हो और पर्यावरण के अच्छे जानकार हो, लेकिन पर्यावरण के लिए दिल से तो कुछ करते नहीं हो, सिपर्फ भाषण देते हो और पर्यावरण रक्षक होने का झंडा उठाए पिफरते हो, हम देहाती लोग कम पढ़े-लिखे हैं और पर्यावरण की कोई किताबी जानकारी हमें नहीं है, लेकिन हम लोगों से तुम लोग पर्यावरण बचाने की उम्मीद रखते हो। दिल्ली वाले बाबू साहब जरा इस बात पर गौर तो करो, भले ही हम लोगों को पर्यावरण की गहरी
जानकारी न हो पर चारों तरपफ नजर उठाकर तो देखो कितने बड़े-बडे पुराने पेड़ हैं हमारे गांव में, हम बरगद पूजते हैं, पीपल पूजते हैं, पाकड़ पूजते हैं, जामुन पूजते हैं, आम पूजते हैं...।' मेरे दिल के कोने से आवाज आई-'ये सच्चे पर्यावरणवादी हैं।' मैं उसे नमस्कार कर स्मारक स्थल की ओर बढ़ गया।
कल संध्या कटिहार जंक्शन पर नार्थ-ईस्ट एक्सप्रेस में अपनी बर्थ पर आते ही नींद ने अपने आगोश में ले लिया, ;चंद्रेश गांव में ही कुछ दिनों के लिए रुक गया थाद्ध ...सुबह को नींद खुली है, टे्रन अब यमुना ब्रिज पार कर चुकी है, खिड़की से बाहर झांकता हूं, दिल्ली की झलक पाने, नीचे चार पहिए-दुपहिए वाहनों की अंतहीन श्रृंखला, उस पर सवार सिपर्फ खुद के लिए जीने वाली मानव जाति, सभी के सभी

 
'अधिकतम' नामक दुर्लभ लक्ष्य की ओर विक्षिप्त होकर भागते हुए, दिन-रात पर्यावरण से उधार लेने वाले, लेकिन कभी न चुकता करने वाले 'डिपफॉल्टर'। मैंने खिड़की से मुंह पफेरकर आंखें बंद कर ली, सुकून के लिए, लेकिन बंद आंखों की पुतली के पीछे भयावह चलचित्रा उभरने लगे हैं-इन महामानव के द्घर में बड़ी-बड़ी थालियां सजी हुइर् हैं, पर्यावरण नामक कल्पतरू से तोड़कर झपटकर सुख-सुविधाओं के
अनेकानेक व्यंजन इन थालियों में परोसे जा रहे हैं... शोर-शराबे से आंखें खुलीं... टे्रन से बाहर आ गया हूं, सामने जन सैलाब बढ़ता जा रहा है, सिर के पिछले हिस्से से मुझे वे गांव वाले दिखाई देने लगे हैं, अनजाने ही सही, पर्यावरण पालक हैं ये, सदियों से लगे, पूरी की पूरी दिल्ली तराजू पर पासंग भर भी नहीं है इन गांव वालों के सामने... जन समूह का दबाव बढ़ता ही जा रहा है, मैंने गौर किया, वे गांव वाले तो यहां कुली बने मेरा बैग उठाने को आतुर हैं, थोड़ा आगे बढ़ा, वही लोग प्लेटपफार्म सापफ करते दिख रहे हैं, अरे ये तो रिक्शा लिए खड़े हैं मेरे इंतजार में!... तो क्या कागा के बाद इन गांव वालों का नंबर है! मेरे अंदर से एक आवाज विपरीत दिशा तय करते हुए कानों के रास्ते बाहर आई- एक था कागा, अब बचा है एक
गांव...।
 
 
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