फरवरी २०१३
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कहानी
पाप
कविता वाचक्नवी

 

कुछ महत्वपूर्ण पत्रा पत्रिाकाओं में रचनाएं व लेख
प्रकाशित। इंटरनेट पर लेखन में सक्रिय। ांअपजं.अंबीांदंअमम
/हउंपस.बवउ ीजजचरूध्ध्ूूूण्हववहसमण्बवउध्चतवपिसमेध
ंअपजंण्अंबीांदंअममध्ंइवनज मो. ४४-७५१७८८२७२५

'सोलह बरस की उम्र क्या होती है?' ...अब वह सब किताबी बातें आप मत उछालने लगिएगा जो सपनों के संसार में खोए नवयौवन की उनींदी पलकों में केवल सपने ही सपने भरे देखती हैं, या जिनकी कही मानें तो देह अलसायी रहती और आस पास पफूल ही पफूल चटखते दीखते हैं। ये सब बड़ी काल्पनिक और सपनीली दुनिया के झूठ होंगे। असल जीवन इससे एकदम उलटा और व्यावहारिक होता है। इसमें सपनों के आने-जाने पर पहरे हो सकते हैं, होते ही हैं। और यदि कहीं आप लड़की हुए तो आंख मींचने न देंगे लोग आपको, कि कहीं पलक पीछे से सपना पुतली पर आ बिराजा तो...? खुली आंख के आगे का संसार इतना कसैला कर देंगे कि आंख में बस तिरे तो पानी ही पानी, कहीं कुछ और बस-बच न जाए।'

क्या दबंग स्त्राी है!
मुझे एन.जी.ओ. के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में जांच के लिए वहां जाना पड़ा था। तभी एक हॉल में कानूनी सहायता दिलवाने वाले समूह की ओर से उसे नीचे दरी पर बैठे बोलते पाया था। उसके तीन ओर १०-२० स्त्रिायों का जमद्घट सा बैठा था। जब तक मुझे दरवाजे से लग खड़े उसने नहीं देखा, तब तक अनवरत इतना वह बोल चुकी थी। धड़े की शेष स्त्रिायों ने मुझे भी सहायता के क्रम में कोई नई आई स्त्राी मान, देखकर भी कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं की थी, इसलिए उसका वक्तव्य बाधित होने का प्रश्न नहीं था। संस्था की मुखिया को मैंने पहले ही अपने साथ भीतर चलने से रोक दिया था, ताकि जो जैसा है, उसे उसी ढर्रे पर देखा जा सके। मेरी ओर दृष्टि जाने पर उसने प्रश्नवाचक-सी अपनी दाहिनी भौंह उठाई व बाईं ओर को गर्दन तनिक झुकाकर पूछा-'कहिए!'
यह थी उससे पहली बार की मिला-जुली। बाद में संस्था के बजट आदि जमा कराने के लिए उसके आने पर और ऐसी ही कुछ अन्य औपचारिकताओं के कारण हम लोग मिले और मित्रा बन बैठे। वह अक्सर अपने कठोर अनुशासन में बीते बचपन के संस्मरण सुनाती। मेरे लिए वे सब के सब एक अलग प्रकार के संसार की आपबीती जैसे थे। मैं जिस सामान्य जीवनशैली में पले परिवार से हूं, वहां बेटियां मां का पल्ला पकड़कर पलती-बढ़ती हैं और पति को हाथ पकड़ाकर बाहर कर दी जाती हैं। हमारे द्घरों में पिता का बेटियों से वास्ता ही नहीं पड़ता, न बेटियों का पिता से। बस, अम्मा ही से कह-सुनकर दिन बिता दिए जाते हैं। बाबा भी अधिक से अधिक हुआ तो पास आकर कभी सिर पर हाथ रख चुप खड़े दुलार देते थे। न उनका दबदबा बना, न रौब, न मां का रौब। सब जैसे एक चुप्पी में दिन बिताती जिंदगी में अपने-अपने हिस्से के काम किए जिए जाते थे। हम लड़कियों ने न कभी लड़ाई देखी, न डपटी गईं। इसीलिए अपनी इस नई परिचिता से मिलने से पूर्व तक मेरे लिए यह समझ पाना सरल नहीं था कि कोई स्त्राी
ललकारने, तर्क करने, विरोध करने, यहां तक कि सामना करने, अधिकार के लिए साहस करने की आवश्यकता क्यों अनुभव करती है।
अपने लड़की होने के दिनों और संध्या ;इस मित्राद्ध के लड़की होने के दिनों का अंतर तो जैसे दो दूर-दूर बसी सभ्यताओं के अंतर जैसा था। उससे न मिलती तो असली जीवन का पता ही न पड़ता, कई बार ऐसा लगता।

वह कड़े अनुशासन वाले पिता की एकमात्रा बेटी थी। पिता क्रूर तो न थे, हां कठोर अवश्य थे। यह कठोरता ऐसी थी जिसमें उनकी प्रबल भावुकता बेटी के हित की चिंता में जिद्दी व निर्मम हो चुकी थी। बेटी के भविष्य को सुखी और उसे सर्वगुणसंपन्न बनाने के लिए पिता उसे कठोरतम जीवन की सीख व अनुभव अपने कड़े से कड़े निर्देशन में दे-दिला रहे थे। जन्मते ही मां का तज चले जाना बेटी का इतना जी न दुखाता था, जितना कि वात्सल्यमय पिता का निरंतर कर्कश होते चले जाना। 'सादा जीवन, उच्च विचार...' गांधी जी के उपदेशों की पग-पग व्यावहारिक जीवन में परिणति के परिणाम उसने १० वर्ष का होने के बाद से जो देखने-झेलने के उदाहरण सुनाए, वे मेरे लिए कल्पनातीत थे। पिता ने द्घरेलू सुविधाओं का नितांत अभाव बनाए रखा ताकि बेटी कहीं आरामतलब न बन जाए, भरी दुपहरी में द्घर के दूसरे सिरे पर लगे नल पर बर्तन मांजने जाने व नल को रसोई तक न लाने के पीछे परिश्रम व कड़े जीवनसंद्घर्ष के अभ्यास की इच्छा थी। पिता के प्यार और प्यार के कारण भविष्य की सुरक्षा व ससुराल सुख की चिंता व कामना में पिता का अपनी ही बेटी के मिलने, उठने, बोलने, जाने, खाने, सोने, पीने, हंसने, बरतने, कहने जैसी हर प्रकार की क्रिया और व्यवहार पर प्रतिबंध और सारे के सारे अनुभवों को निरंतर तिक्त बनाने पर बल रहता, ताकि बेटी कठोर जीवन की अभ्यस्त हो सके। वे मानो बेटी को एक 'परपफेक्ट सुपर वुमन' या कहें कि सर्वगुणसंपन्न युवती के रूप में गढ़ना चाहते थे। लड़कों से परिचय होना तो दूर की बात है, वहां तो लड़कियों तक से बतियाने की आजादी न थी। देखने-सोचने और कल्पना तक की आजादी न थी, न पफुर्सत थी। अपनी इस इकलौती बेटी को प्रखर मेधावी और तर्कपूर्वक निर्णय लेने में सक्षम बनाना भी पिता की जिद का हिस्सा था। द्घर में नियमित गहन व गंभीर शास्त्राीय चर्चाओं वाले दार्शनिक ग्रंथों का पढ़ना और चर्चा करना अनिवार्य चर्या का बड़ा हिस्सा थे।
वह बताती कि १८-१९ वर्ष की आयु तक भी उसे किसी आयुजन्य काल्पनिक संसार का आभास तक न था। वह जीवन और जगत के दार्शनिक रहस्यों के साथ-साथ दिन भर द्घर से जूझती व पिता द्वारा जीवन की कठोरताओं के वर्णन सुनती। अपनी १८-२० की वय तक उसे न देह में, न मन में किसी सुर-ताल के बजने का आभास तक मिला। परिवार के शादी-विवाह तक में खादी चप्पल व सपफेद खादी के सलवार कुर्ते में लिपटी उस निराभूषण, श्रृंगारविहीन विचारमग्न लड़की से न कोई मित्राता करता, न काम की बात से अधिक बात।
एक दिन अचानक पिता के किसी पुराने मित्रा ने उन्हें युवा हुई बेटी के साथ द्घर में अकेले रहने के अनौचित्य की बात समझाई कि 'देखो सांतनु! या तो तुम बेटी के हाथ पीले कर दो या इसे कहीं भेज दो, जहां यह लड़कियों के बीच में रहे। इस आयु की ;१७ साल कीद्ध जवान बेटी यों पिता के साथ अकेले में सोती-उठती है, सो अच्छी बात नहीं है।'
बस, सप्ताह भर के भीतर ही भीतर संध्या को वहां से किसी उचित सुरक्षित जगह पर भेजने की भाग-दौड़ में जुटे पिता ने बताया-'देखो बेटे! इस साल की पढ़ाई के लिए तुम्हें एक आश्रम में भेज रहे हैं। वहां तुम्हारी तरह की छह-आठ सौ छोटी-बड़ी लड़कियां ही लड़कियां रहती हैं। तुम्हें वहां जाने से खूब अच्छा लगेगा और अब तुम्हारी पढ़ाई भी पहले से कापफी बढ़ गई है। यहां द्घर संभालने से पढ़ाई में बाधा आती है, लेकिन वहां आराम से पूरा दिन पढ़ना। वहां आचार्य जी आदि लोग बड़े-बड़े पारंगत विद्वान हैं। पढ़ाई के बाद के द्घंटे व्यायाम, पूजा, ध्यान और वैसी ही दूसरी चीजों के लिए सब नियमानुसार तय हैं वहां, तो तुम्हारा संपूर्ण विकास वहीं संभव है।' १५-२० दिन की तैयारी में लड़की ने डाक से आई नियमावली को २५-३० बार पढ़ा। एक लोहे के संदूक में सामान बांध व बिस्तर और थाली-कटोरी का 'सेट' लेकर पिता उसे आश्रम पहुंचाने गए। विदा के समय से कई द्घंटे पहले से ही उसने पिता को बिलखते देखा। पर चुपचाप रही। न चुप कराया, न रोई।
दोपहर को उसे आश्रम के बाहरी परिसर के भीतर बने एक और बड़े से दो पल्ले के द्घटक के एक पल्ले में बने छोटे से दरवाजे के अंदर अपना सामान लेकर चले जाना था। यह पफाटक सदा बंद ही रहता था और इसमें बाहर के किसी भी व्यक्ति का प्रवेश निषि( था। संध्या के पिता ने साल भर की रहने, पढ़ने, खाने की राशि दफ्रतर के बाबू के पास जमा कर रसीद ली और खाने-पीने में बेटी को कोई कमी न हो इसके लिए कई बार प्रार्थना की। सुबह के दूध के अतिरिक्त रात के दूध की अलग व्यवस्था के लिए हर महीने अलग से पैसा देने की रस्म पूरी की और 'दोनों समय एक-एक चम्मच शु( द्घी भी खाने में ऊपर से दिया जाए' इसका भी शुल्क जमा करा दिया। दफ्रतर से बाहर निकल पिता ने बेटी के सिर पर हाथ रखकर बाईं बांह में द्घेर उसे गले लगा लिया। दाहिने हाथ से लगातार सिर थपकाते वे १०-१५ मिनट यों ही खड़े चुपचाप अपने आंसू पोंछते उसे दुलराते रहे और पिफर दोनों कंधों से पकड़कर बोले-'संधि बेटा! प्यार का अर्थ होता है अपनों के हित की चिंता, न कि पास-पास या साथ-साथ रहना। बेटियां तो वैसे भी साथ नहीं रहती हैं, एक दिन जाना ही है तुम्हें अपने इस पिता को छोड़कर। तो तुम्हारा हित इसी में है कि जो कुछ तुम मुझसे नहीं सीख सकीं, वह यहां ये लोग सिखाएंगे और तुम पूरी तरह अपनी पढ़ाई में ही जुट सकोगी'।
संध्या यह सब बताते हुए बहुत भावुक हो गई थी उस दिन। अपने पिता की इतनी कड़ाइयों के बाद भी उसके मन में अपने पिता के प्यार की इतनी आस्था देख मुझे आश्चर्य हुआ। मेरे पिता ने हमसे न कभी कड़ाई की, न डांटा-डपटा। पर पिफर भी मेरे पास ऐसा कोई संस्मरण नहीं, जिसे याद कर या बांटते समय मैं उनके अपने प्रति किसी भावुक क्षण को यादकर आज आंखें भिगो सकूं। एक बार को लगा कि किस मिट्टी की बनी है यह, जिस लड़की को उसकी युवावस्था तक में अनुशासनहीनता देखकर पिता पीट देते हों, वह कैसे पिता के लाड की स्मृति में गद्गद् हो सकती है?
इसी तरह के अनेक रोमांचकारी व अविश्वसनीय से लगते उसके संस्मरण मेरे लिए जीवन की लाल किताब जैसे सि( हुए, जिन्होंने मेरे आज पर मानो कोई जादू कर दिया हो, या मुझे मानो कोई सि(ि मिल गई हो। आज तुम्हें यह पत्रा लिखते हुए मुझे उसकी बेहद याद आ रही है। तुमने अगर अपनी पिफल्म के लिए कहानी की ख्ाोज में मुझे मेरे स्त्राी जीवन की कोई सनसनीखेज याद ताजा करने या जानने की हठ उस समय न की होती तो शायद मैं उसका यह संस्मरण सुनने से चूक गई होती। तुम्हारे प्रोजेक्ट के विषय में उससे जानकारियां बांटते समय मैंने यों तो अपने सपाट जीवन की एकरस कथा पर उचाट सी बतकही की थी, कि भला है क्या टटोलने-खोजने को! कुछ याद न पड़ता हो ऐसा नहीं, अपितु कुछ है ही नहीं ऐसा इस नई व यकायक तेजी से कायाकल्प हो गई दुनिया के खुलेपन में लोगों के आश्चर्य का कारण बन सकने योग्य। गत ३०-४० वर्ष के परिवर्तन का अनुपात देखें तो ५०० वर्ष के अनुपात से भी अधिक है। ऐसे में चौंकाने वाली द्घटना हमारे समय के लोगों के पास कुछ हो नहीं सकती। इस खीझ में मेरे मुंह से निकला कि 'सिंधु! तुम कितनी भाग्यशाली हो, मेरी तुलना में तुम्हारे पास तो अकूत खजाना है।'
वह अपने उजले रूप के दमक भरे क्षणों में और भी सिमट जाया करती थी। साक्षात्‌ वाग्देवी जिसकी वाणी पर विराजती थी, उसका यों मौन में कुहुक तक न भरना उसके व्यक्तित्व का अत्यंत गोपन पथ था। मुझे ऐसे क्षणों में उसकी भंगिमाओं में, गोते खाती झरने की धारा के बजने की प्रतीति ही सदा हुआ करती थी, मानो मैं किसी अनंत सूनेपन और एकांत में झरने के इस पार किसी शिला पर बैठी लहरों के गिरने के क्रंदन पर ध्यान लगाऊं। लेकिन मेरी भाषा की ध्वनियों और धारा की ध्वनियों का अंतर मेरे लिए सदा अबूझ रहा। वह भाषा मेरे संसार के लिए कभी न संप्रेषित होने वाली स्वर ध्वनियों का विकट संसार थी। अपनी लाचारी और संध्या के डूबने के क्षणों में मैं अवश कसमसाती भर रह-रह जाती। ऐसे में किसी पहले सुनी द्घटना के क्रम के किसी एक बिंदु पर प्रश्न उठाकर उसके मौन में एक कंकर पफेंकने का यत्न किया करती।
हां, एक बात जो तुम्हें लिखनी रह गई, वह यह कि वह अपने पूर्व जीवन की उस बच्ची, लड़की और युवती को मानो अपने से अलग किसी व्यक्ति के रूप में ही संबोधित करती, अलगाए सी देखती-दिखाती थी। लगता है, इसे मैं ठीक से समझा नहीं पा रही। एक उदाहरण से शायद स्पष्ट हो, जैसे उसका कहन ऐसा होता- 'वह लड़की जिसने सप्ताह भर दिन-रात बिना चीनी-नमक का पफीका-उबला दलिया खा-खा बिताया हो, उसे तो द्घर से बेहतर वह आश्रम लगता था, जहां दो समय रोटी-सब्जी-दाल तो सलीके की मिल जाया करती थी। वह लड़की चार-चार, पांच-पांच दिन भुनी हुई गर्म गेहूं में गुड़ डाल तैयार किया, पोटली में रखा अनाज एक गिलास दूध के साथ चबेने की तरह खाती दिन बिताती थी, उस लड़की का मन तो कब का मर चुका था।'
मेरे लिए दो जीवनों की समानांतर कथाएं एकदम विपरीत परिस्थितियों में एक देह में उतरी हुई होतीं। इसी प्रकार दो पार एक साथ चलते उसके मन को टोहते क्षणों में, वह आश्रम पहुंचने के बाद के दिनों के कई अनुभव बांट चुकी थी।
...
भीतरी पफाटक के अंदर का संसार सपफेद धोतियों में लिपटी युवा, पर म्लान मुख लड़कियों का संसार था। जहां बीचोंचीच एक बड़े ही विस्तृत आंगन, बगीचों, चबूतरों व स्थान-स्थान पर बनी पत्थर की पाटियों से खुलेपन में जीने की चाहत का मोह जगता । उस चौकोर मैदानाकार आंगन के चारों ओर कतार में कमरे ही कमरे थे। अनंत छोटे-बड़े कमरे। उनके आगे ढलवां छत का बरामदा चारों ओर एक सा न था। पफाटक में प्रवेश कर दाहिनी ओर बढ़ते ही पहला कमरा वार्डन का था। 'लड़की' का सारा सामान वहां उलीचा गया, जिसमें सूची की चीजों के अतिरिक्त लड़की की खाली डायरियां और कई जीवनियां तथा दार्शनिक विषयों की पुस्तकें थीं, जिनकी अनुमति की वहां व्यवस्था यद्यपि नहीं थी, पर कुछ भी आपत्तिजनक न होने के कारण व लड़की के गरिमापूर्ण, उजले व्यक्तित्व के दबदबे के कारण वॉर्डन ने आश्रम की आचार्या के आदेश से सब सामान रखने की व्यवस्था देते हुए एक कमरे में एक तख्त और अलमारी के आधे निचले भाग का अधिकार लड़की के नाम कर दिया। उसने संदूक का सामान निकाल अलमारी में जमाया, बिस्तर बिछाया और संदूक को तख्त के नीचे ठेल दिया। पुस्तकों के रखने जितनी जगह अलमारी में थी नहीं।
वॉर्डन एक २८-३० बरस की अविवाहित, वाचाल, कालेपन की सीमा तक सांवली, लगभग छह पफीट लंबी, पर चारों ओर थुलथुल झूलते चमड़े में अटी, चोहरे बदन की महिला थी, जो अपनी उम्र के गणित से लड़कियों से बराबरी की सी मैत्राी दिखाती, बतियाती थी, लेकिन अपनी विराटता और वाचालता में नितांत वक्री थी।
आश्रम में कड़ा अनुशासन व सोने से लेकर उठने तक, पिफर उठने से सोने तक द्घंटी बजाए जाने पर सधे कदमों से काम करते चले जाने का नियम था। हर कमरे का द्वार आंगन की ओर ही खुलता था, तो किसी भी कोने में खड़े होकर हर कमरे की चौकसी बड़ी आसानी से की जा सकती थी। कुछ सबसे बडे़ आयु वर्ग की २३-२४ वर्षीय छात्रााओं को मिडिल स्कूल की लड़कियों की डॉरमेट्री के संरक्षण की जिम्मेदारी थी। जो बहुत छोटी लड़कियां थीं, उनके लिए कुछ बुढ़िया सी आयाएं थीं। प्राइमरी वर्ग की लड़कियों के लिए ३५-४० वर्षीय पुरानी अध्यापिकाओं के द्वारा संरक्षण की व्यवस्था डॉरमेट्री के साथ वाले कमरे में आवास के रूप में थी।
शुरू में वार्डन से लेकर सभी छोटी-बड़ी लड़कियों के प्यार का केंद्र संधि ही संधि बनी रही। उजले रूप व मीठे बोल की धनी संध्या मानो आत्मीयता के लिए सदा से ही वंचित रही हो। सभी के प्रति उसकी सहज निश्छल आत्मीयता, मुस्कुराते रहने की अथक आदत व सुलझ स्पष्ट विचार, अपनी बात को रोचक शैली में सौम्यता से प्रस्तुत करने का उसका अंदाज हर किसी को लुभा लेता, लुभाए ही रखता। जहां एक ओर छोटी कक्षाओं की लड़कियां उसे छू कर चहक उठतीं, उसकी गोद में लिपट जाने में सार्थकता अनुभव करतीं, वहीं दूसरी ओर संधि से बड़ी सभी लड़कियों के लिए वह उनके सहज स्नेह व आत्मीयता की अधिकारी बन गई।
'बिंदु दी' के साथ पहले-पहल उसे कमरा दिया गया था। वे बेहद प्यारी व संधि से साल भर बड़ी होंगी। बड़ी उद्दाम सी हंसी वाली बिंदु का बेलागपन संधि को बहुत भाता। दोनों में अच्छी पटती। 'बिंदु दी' की और दो बहने भी वहां रहा करती थीं, एक बड़ी और एक छोटी। तीनों शायद आश्रम की सर्वाधिक मोहक और शालीन लड़कियां थीं। सबसे बड़ी 'मंजुला दी' तो अनुशासन के मामले में कापफी कड़ाई भी बरतती थीं, पर सबसे बड़ी होने का परिणाम था कि उनके व्यक्तित्व में एक अजब मातृत्व की छाया का स्पर्श सा बसता था। वे ८वीं और ९वीं कक्षा की लड़कियों की डॉरमेट्री के साथ सटे कमरे में एक और अन्य इंचार्ज युवती के साथ रहती थीं। उनके उस कमरे का एक दरवाजा लड़कियों के हॉल में खुलता और दूसरा बाहर बरामदे में। मुख्य दरवाजे के एकदम सामने कमरे की पिछली दीवार पर एक बड़ी खिड़की थी। मुख्य द्वार आगे की दीवार के एकदम मध्य में होने के कारण प्रवेश करते ही दरवाजे के दोनों ओर एक-एक तख्त लगा था और तीसरा तख्त पीछे की दीवार वाली खिड़की के एकदम आगे चौड़ाई में।
संधि जब इन यादों में उतरी थी तो कई दिन इन संस्मरणों के मोह में लबालब मीठे अमृतपान सा भाव उसके तीखे चेहरे-मोहरे वाले दिप-दिप करते रूप पर व्याप्त रहा। उसने सारे आश्रम वालों के द्वारा उसे विशिष्ट व अतिरिक्त महत्व और लाड़ दिए जाने की बात जाने कितनी तरह व कितने उदाहरणों से बताई थी।
उसके कमरे में बिंदु के कारण शालिनी ;छोटी बहनद्ध और मंजुला आ जाया करतीं और अक्सर गोला बांध गप्प-गोष्ठी का अवसर भी निकाल लिया जाता। मंजुला क्योंकि अध्यापिका थीं, अतः वॉर्डन का उनके वर्ग की ४-६ अध्यापिकाओं के साथ सहलापा सा लगा करता था। गप्प-गोष्ठी में अक्सर थोड़े-बहुत समय के लिए वॉर्डन भी आ जाया करती। इस प्रकार संधि, आश्रम के आवासीय परिसर की लगभग मुखिया टोली के साथ उठने-बैठने लगी। मंजुला में अपनी बहनों के लिए जो मातृत्व ;स्नेहद्ध व पितृत्व ;संरक्षण व सुरक्षाद्ध का सम्मिश्रण था, वह उसे और भी आत्मीय बना देता था।
धीरे-धीरे मंजुला ने संधि को भी अपने संरक्षण में ले लिया। संधि के लिए आश्रम में समाज से दूर रहना कतई कष्टप्रद न लग रहा था, लेकिन धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाहटें उसे प्रश्नों में द्घेर लेतीं या वॉर्डन की अतिरिक्त वाचालता, आश्रम के कॉलेज की प्राचार्या व उपप्राचार्या, दोनों का ४५-५० की वय तक भी अविवाहित होना या आश्रम के चारों ओर के कमरों से लड़कियों का पफाटक पर नजर गड़ाए रखना कि कौन कब पफाटक से बाहर बने कुलपति दंपति ;स्वामित्वद्ध के आवास पर कब गया, कब लौटा, कुछ पुराने किस्से... कि कौन लड़की कब और किन परिस्थितियों में छोड़कर गई... आदि-आदि।
४ बजे सुबह उठकर एक बड़े हॉल जैसे बने स्नानद्घर म सबको एक साथ नहाना होता था और वहीं कपड़े धोने का काम भी तभी निपटाना होता। पशुओं के रहने और चारा खाने वाले बड़े हॉल जैसा यह था, जिसमें दीवारों के आगे २-३ पफीट की चौड़ाई छोड़कर एक डेढ़ पफीट ऊंची मेढ़ सी बनी थी। दीवारों में जगह-जगह ;४-६ जगह, हर दिशा मेंद्ध नल के स्थान पर मोटे पाइप से बाहर की ओर निकले थे, बालिश्त भर द्घेरे वाले। यही पानी आने की नालियां थीं, जिनसे पानी आगे के मेढ़ वाले चौड़े नाले में आता-भरता रहता और लड़कियां अंधेरे में चारों ओर तीन-तीन किलोमीटर तक खेतों की ही परिधि से द्घिरे उस सामूहिक स्नानागार के हॉल में झुंड के झुंड एक साथ अधढंपी नहाने का कार्यक्रम निपटा लेतीं। संधि शायद दो या तीन बार ही वहां नहाने का साहस जुटा पाई। पिफर जाने क्यों उसे अक्सर तेज बुखार रहने लगा था। ४-६ महीने पाली के बुखार में मंजुला का उसकी मां सा बनकर दिया दुलार, उसके जीवन की शायद सबसे मीठी द्घटना थी।
शाम को द्घंटी बजने पर सबको आंगन में इकट्ठा होना पड़ता। उससे पहले नाश्ते की द्घंटी बजने पर मंजुला या कभी-कभी बिंदु ही उसके लिए खाने वाले हॉल में बंटते नाश्ते को कभी गिलास या कभी कटोरी में ला दिया करतीं। एक अजब बात, जिस पर संधि खूब चकित होती, बताती थी, वह यह कि कमरों में रहते-बैठते हुए कभी दरवाजा बंद न करने का कड़ा आदेश था।
तुम्हें, १९९८ में पिफल्म की कहानी की खोज करने पर संधि की ३५ वर्ष पुरानी यह कहानी 'पुराने जमाने में यही सब होता था' जैसी लगी थी, यहां तक सुनकर। इसके आगे का किस्सा सुनकर तुमने सीधे-सीधे मुझे इसी को पिफल्माने का अपना निर्णय सुना दिया था।
हॉस्टल ;आश्रमद्ध में वॉर्डन का पेड़ की हरी शाख से बनी लचीली देह वाली छड़ लिए जिस-तिस लड़की पर बरसाते आगे बढ़ना, संधि को अक्सर सहमा दिया करता। वॉर्डन के कमरे से एक कमरा छोड़ कर संधि का कमरा था। वॉर्डन शाम से रात तक दो चक्कर बरामदे-बरामदे चलती हुई चारों छोर मापती थी। हर कमरे में द्घुस आदेश देना, डांटना, छड़ लहरना और थुलथुल झूलते हुए आगे बढ़ना, रोज का यही नियम होता। शाम को व रात को पढ़ाई के द्घंटों में लड़कियां अपने कमरों में गुपचुप बतियातीं या लेटीं या कई बार तो मोमबत्ती के ऊपर कटोरी में तेल गर्म कर उसमें पोर-पोर भर माप की पूड़ी तक सेंकती पकड़ी जातीं और झमाझम गर्दन के नीचे पीछे की ओर वॉर्डन के भारी हाथ का तड़ाका छूटता। लेकिन इसके बाद भी ऐसे पराक्रम न तो बंद होते, न ठहरते। किसी एक लड़की के तख्त पर दूसरी लड़की का पाया जाना जद्घन्यतम अपराध की श्रेणी में आता था। संधि को कभी रहस्य समझ न आया कि इसमें क्या पाप कर दिया किसी ने। अंत में उसने निष्कर्ष निकाला कि पास बैठकर गपियाने के अवसर से बचाने की ही यह जुगत होगी शायद कोई।
समय-समय पर, बिना पूर्वसूचना के, यकायक चारों ओर से दरवाजे बंद करते हुए लड़कियों के सामान की तलाशी का अभियान भी चलाया जाता था। जिनके परिवार वाले मिलने आने पर पैसा, मिठाई या नियमेतर कोई वस्तु दे जाते थे, वे सब पिंजरे में गर्दन मरोड़ दिए जाने की द्घड़ी भांपकर पंख पफड़पफड़ाते पंछी की तरह थर-थर कांप रही होतीं। कोई-कोई तो चाबी खो जाने का बहाना कर देती, ऐसे में पत्थर से ताले तोड़कर तलाशी ली जाती। वह आतंकवादियों का बस्ती में द्घुसकर द्घरों को कंगाल व बर्बाद कर देने जैसा दिन होता था। सब लड़कियों को आंगन में रहना होता था और अपने-अपने लोहे के संदूक सार्वजनिक उद्घाड़ने होते थे।
संधि का चेहरा इस द्घटना को सुनाते समय भी उन त्रास्त द्घड़ियों के तनाव से खिंच गया था।
इस तलाशी के बाद और कई बार तो यों ही लड़कियों को उनका कमरा छोड़, किसी ओर कमरे में रहने की व्यवस्था सुना दी जाती। कई बार तो ११वीं की लड़की को ७५-८० वर्ष की आया वाले कमरे में उसके साथ रहने का आदेश दे दिया जाता। किसी भी लड़की का किसी की सहेली होना, उसकी अकाल मृत्यु की द्घड़ी की द्घोषणा होने जैसा होता। २४-२५ बरस की चंचल, हंसती व सभी को प्रिय लगने वाली अध्यापिकाओं ;वहीं की पूर्व छात्रााओंद्ध तथा बूढ़ी आयाओं के बीच एक वर्ग और भी था। वह था ३५ से ५५ के आस-पास की खुपिफया निगाह वाली, पांच मिनट में सामने खड़े-खड़े सिर, ऊंगली, चप्पल, धोती की किनारी व हंसने की मात्राा तक का दोष पकड़ती, कौन लड़की किसके साथ कितनी बार हंसी, किस कमरे से निकली, किस में कितनी देर के लिए गई, चार बार होने वाली हाजिरी में कितना पहले व कितना पीछे पहुंची, आंगन में कितनी देर बिताई... जैसी चीजों पर पैनी पकड़ रखने वाली अविवाहित अध्यापिकाओं का, जो पल-पल की सूचना बाहर कुलपति आवास तक दिया करतीं। कुछ चतुर लड़कियों ने इन्हें अपनी सेवा से इतना प्रसन्न किया हुआ था कि स्वयं को सदा के लिए सभी तरह से दोषमुक्त हो चुकी थीं और उनके लिए खुपिफया तंत्रा का काम करती थीं, ताकि बदले में वे सारी सुविधाएं ले सकें जो अन्यों को लेने का नियम नहीं था।
२४-२५ बरस की आयु के आसपास वाली स्नातिकाएं, सभी जीवन से भरपूर, हंसी में डूबीं और एक-एक कर विवाह तय होने की द्घड़ी की प्रतीक्षा करतीं अपने द्घर लौट जाने की आशा में निश्चिंत थीं। कुछेक तो बीच में इसी तरह चली भी गईं। उनके परिवार के साथ वरपक्ष उन्हें यहीं मिलने आया, पसंद किया, तय हुआ और विवाह के महीने भर पहले वे सदा के लिए चली गईं। सभी छोटी व किशोर लड़कियां इन
स्नातिकाओं के स्नेह व हंसमुख भाव पर लुभी रहतीं। अक्सर रविवार की शाम लड़कियां गुट बनाकर बतियातीं। अनायास ही संधि स्नातिकाओं वाले गुट का हिस्सा बन गई। यों भी अपने व्यवहार की गंभीरता के चलते वह अपनी आयु की लड़कियों में बाहरी जैसी और बहुत बड़ी जैसी मान ली गई थी।
स्नातिकाएं कभी हाजिरी लगाने, देने कोठी ;कुलपति निवासद्ध नहीं जाती थीं। यदि संदेश आता कि कोठी पर बुलाया गया है, तो न वे सहमतीं, न भागी चली जातीं, न खुश होतीं। मंजुला तो उलटे ऐसे समय अजब-गजब तेवर से भर कर्कशपन की प्रतिमूर्ति हो जाती। उसके लिए दरबार में हाजिरी देना बड़ा अपमान था। ऐसे समय में कई नई-पुरानी दबी-पड़ी द्घटनाएं और बातें उलझे सूत-सी गुंजल बन हाथ आतीं, जिनका न ओर संधि को पता होता न छोर। अपने इस बुलावे पर मंजुला दी उन्हें कोसती और संधि को दुलारती कोठी जातीं। जहां से १० मिनट में लौटकर रिपोर्ट मांगे जाने की खीझ से भरी होतीं।
वॉर्डन अक्सर ही इस जमावड़े में आ बैठा करती थी।
मंजुला दी संधि के लिए बुखार में खाने को दाल में रोटी सानकर गिलास में सबसे छिपाकर लाया करतीं। धीरे-धीरे यह आत्मीयता ऐसी बढ़ी कि पल भर भी दोनों एक दूसरे को न पाएं तो चैन न पड़ता था।
एक दिन संधि से कहा गया कि उसे सबसे बूढ़ी आया ;ताई जीद्ध के साथ अब से रहना होगा। जहां से इस कमरे का अंतर आग्नेय और वायव्य का होता अर्थात्‌ आंगन और बगीचे के बाईं ओर की पंक्ति का अंतिम कमरा। संधि के लिए समझना कठिन था कि ऐसा क्यों किया गया। पिफर ७५-८० बरस की किसी महिला के साथ १७ बरस की किशोरी! ऊपर से आंगन से आर-पार जाते भी देखने वाली पल-पल की कड़ी निगरानी। वह एक आंगन में रहते हुए भी बढ़ने जा रही दूरी व अपनी मित्राों से दूर चले जाने की चिंता में रो पड़ी। मंजुला, बिंदु और मंजुला की साथी स्नातिकाओं ने प्रशासन को जी भर गालियां दीं। प्रभा, पुष्पा, सरिता, विभा और विमलेश सभी का यही कहना था कि कोठी के किसी ने कान भरे होंगे कि मंजुला और संधि सहेली हैं। 'सहेली' होने का पाप संधि की समझ से परे था और मंजुला की सहनशक्ति से परे। वह प्रश्नवाचक वाक्यों में कोठी वालों को कोस रही थी। इस बीच बिंदु का ऐसा प्रभावों में न आना यह भी बता रहा था कि अपनी बहन का स्नेह अपने अलावा किसी से बंटता देखना उसे बुरा लगता आया था, इस कारण आज वह राहत में थी।
संधि ताई के कमरे में चली तो गई पर अपने विशिष्टपन का लाभ लेते हुए वह शाम को अक्सर मंजुला और विमलेश के कमरे में आ जाती। बिंदु वाले कमरे में उसकी जगह किसी और कन्नड़ लड़की को ठहरा दिया गया था। वहां बैठके बंद हो गईं। अब टोली का केंद्र या तो मंजुला वाला कमरा या पुष्पा और प्रभा वाला कमरा होता। आश्रम में हर छोटा-बड़ा संधि को समझाता कि तू मंजुला दी के साथ मत रहा कर वर्ना तुम लोग 'सहेली' मानी-कही जाओगी। संधि का एक ही उत्तर होता-'सहेली भी तो बहन जैसी ही होती है, बस रिश्तेदारी नहीं है, प्यार तो उतना ही है, शायद उससे बढ़कर ही होगा।' साथी या जरा छोटी लड़कियां जो सदा उसके बड़प्पन और प्रचंड
मेधावीपन से आक्रांत रहती थीं, वे आपस में एक दूसरे को समझातीं कि 'छोड़ो इस संधि को कुछ कहना, इसे अक्ल-वक्ल तो है नहीं, कोरी है।' ३५ से ५५ वय वाली अध्यापिकाओं का गैंग यदा-कदा उसे बुलाकर समझाता कि 'मंजुला और तुम क्यों मरने पर तुली हो! यहां सहेली होना बड़ी गंदी बात है, गंदा काम है, जैसे लड़का-लड़की होना।' संधि खीझती-'अरे तो दीदी लड़का थोड़े ही हैं। न मैं लड़का हूूं। सबको पता नहीं क्या? दिखता नहीं क्या?'
लेकिन इस तनाव व अपने प्रति निरंतर कड़े होते नियमों के कारण वह भयभीत व द्घर जाने को उतावली हो उठी थी। ऐसे अनुत्तरित प्रश्नों के तनाव ने उसे कभी व्याकुल नहीं किया था, जिनका कोई तार्किक समाधान न हो सकता हो। अपनी वैचारिक प्रखरता, स्वाध्याय और बौ(कि क्षमता ने उसे दार्शनिक प्रश्नों के समाधान की कुंजी और विधि सिखा दी थी। लेकिन ये नए प्रश्न हल नहीं होते थे, न कोई विधि और कुंजी काम करती थी। वह अक्सर ऐसी प्रश्नाकुलता से द्घबराकर अवश और लाचार हो जाती। यकायक १०००-१२०० की भीड़ में दिन-रात रहते हुए भी अकेलेपन से भर गई। पिता के पास लौट जाने की व्यग्रता या मंजुला का आंचल पकड़ लाड़-मनुहार की लालसा उसे बांध लेती।
द्घटना के इस क्षण पर आकर संधि ने भरी आंखों से गर्दन उठा मेरी ओर ताका था और पूछा था-'उस बच्ची का मन समझ सकोगी? क्या कसूर था उस लड़की का? कोई अपराध नहीं किया था उसने जिसकी सजा दी जातीं।' यह कह सिर नीचे झुकाया। कुछ क्षण मौन रही, पिफर धीरे से आप ही बोली थी-'मुझे आज भी वह रोती सुनाई देती है, पुकारती है।' उसकी नाक का अगला सिरा कांप रहा था, आवाज रुंधी हुई और ओंठ पफड़पफड़ा रहे थे। हम लोग उस पूरी दोपहर धूप से बचते-बचाते यहां-तहां बैठते, बातें करते रहे। उसे तेज बुखार था।
असल में मैंने पफोन किया तो पता चलने पर छुट्टी लेकर उससे मिलने जाने का सोचा था। वह ऐसे में भी कहीं निकलने की तैयारी में थी। रोकने पर भी न मानती थी। अंत में मैंने उसके साथ चलने को उसे मना लिया था। गाड़ी वही चलाती थी। उसके बुखार से ही बात शुरू हुई थी जिस पर उसने कहा था-'चार साल लगातार बुखार झेल चुकी हूं। यह तो कुछ भी नहीं।'
यहीं से पिफर क्रम चल निकला था, कुछ इस प्रकार कि ...
...संधि का बुखार १०६ डिग्री से ऊपर ही रहने लगा। डॉक्टर सप्ताह में एक बार आता था। वॉर्डन के कमरे व उपस्थिति में एक-एक बीमार लड़की वहां लाई जाती अंदर।
संधि सड़क के एक ओर कार पार्क कर कुछ देर बैठी रही थी मेरे साथ, और बड़ी उत्तेजना से बोलते हुए बताया कि जब उस लड़की ने सहेली होने को गंदी बात और लड़का-लड़की होना बताया था तो संधि ने अबोध भाव, लेकिन तर्क से दो टूक इसे गलत कहा था। उस गलत कहने का कारण 'संबंध में कुछ गलत है' का विरोध नहीं बल्कि प्रत्यक्ष दिख रही दो लड़कियों को लड़का-लड़की द्घोषित करने जैसे झूठ का विरोध था। संधि को तो दो लड़कियां क्या, लड़का-लड़की तक के संबंध में किसी 'गंदी बात' का लेश भर आभास न था। उसकी शास्त्राीय बु(ि की पहुंच से बहुत परे की बातें थीं वे। उसके तब तक के जीवन में इन बातों, ऐसे अनुभवों व ऐसे संबंधों का कल्पना में भी आना या पता लगना तक संभव नहीं हुआ था। सो, ऐसी बातें उसकी समझ की पकड़ से बहुत परे की थीं।
केवल आवाज और होंठों से हंसती हुई सी हुई वॉर्डन दोस्ताने में बतियाते हुए, जीजी ;मंजुलाद्ध और अन्य स्नातिकाओं से कोठी वालों के दिमागी कीड़े और पिफतूर पर ताने कसती। पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि संधि के सम्मुख या संधि को सीधे-सीधे किसी ने एक शब्द भी कड़ा कहा हो। इसलिए वह पूर्ववत्‌ बिना किसी पूर्वाग्रह या कुंठा के स्नातिकाओं वाले धड़े के साथ उठती-बैठती। उसके भावुक व कोमल लेकिन सतर्क और स्वाभिमानी मन में आशंका और विरक्ति ने भी द्घर बनाना शुरू कर दिया। उसके बुखार के कारण उसे आश्रम के कई नियमों से छूट मिली हुई थी और निरंतर पूर्ववत्‌ वह विशेष भाव सबके व्यवहार में पाती रही। चहकती तो वह यों भी कम थी, उस पर कई अनसुलझे प्रश्नों व तनावों से वह व्यग्र मन और उदास सी हो गई। इसी बीच मंजुला के विवाह संबंध के लिए उसके परिवार वाले एक दिन सेना के एक उच्चाधिकारी और उसकी बहन व परिवार के साथ आए।
कोठी में ही मंजुला और उनका औपचारिक मिलना होना था। स्नातिकाएं और मंजुला की बहनें उस दिन खूब चहकती दिख रही थीं। मंजुला को उस दिन रंगीन साड़ी में सादगी से बदली-बदली देख छोटी लड़कियां कमरे के बाहर दरवाजे पर झुंड बना झांकने का अवसर नहीं खोना चाहती थीं। वार्डन वाले कमरे में ये सब तैयारियां चल रही थीं। संधि के लिए इस अवसर का अर्थ था, मंजुला का सदा के लिए उसे छोड़कर चले जाना। वह कातर सी न हंसती, न बोलती, दीवार पर बाईं कनपटी टिकाए बस उस अंतर को रेखांकित होते कल्पना में देख रही थी, जिसमें जीजी और उसके बीच बातों, विषयों, स्थान, व्यक्ति आदि-आदि के अंतराल खड़े होने जा रहे थे। जहां मंजुला के भविष्य में उसकी कोई भूमिका न शेष रहने वाली थी। मंजुला ने दो-तीन बार उसकी उदासी को अपने भीतर भर लेने वाली निगाह से उसे देखा भी।
मंजुला का विवाह तय हो गया। दो महीने बाद की तिथि निकली। अर्थात्‌ मंजुला को महीने भर ही अब यहां और रहना था। शाम को संधि के कमरे में आकर मंजुला उसे अपने साथ लिवा ले गई। उसके लिए छिपाकर नाश्ता भी वहीं लाई। विमलेश ने भी कमरे में बैठी संधि को ढांढस दी, गाल थपथपाया और हंसाने के लिए गुदगुदी सी की। जीजी ने भी गले लगाकर थपकियां दीं। हल्के गाजरी रंग की साड़ी में उनका सापफ रंग गमक रहा था। पैर लटकाए बैठी जीजी संधि का सिर अपनी गोद में रखते हुए तख्त के एक सिरे पर सरक गईं ताकि वह लेटी रह सके। बहुत सी उनकी साथिनें बाईं ओर पड़ते खिड़की के नीचे रखे और सामने वाले तख्त पर बैठी हुईं पता करने में लगी रहीं कि उसके होने वाले साहब कैसे हैं, क्या पूछा, क्या कहा, किसने क्या-क्या किया, क्या लिया-दिया गया, सास कैसी लग रही थी, ननद तेज तो नहीं लगी? वॉर्डन भी राउंड के क्रम को वहां समाप्त करती हुई, छड़ हाथ में लिए जगह बनाकर वहीं पड़ गई। मंजुला का हाथ कई द्घंटे तक की इस पूरी बैठक में अनायास और अनजाने में भी संधि के बालों में सिर पर पिफरता रहा।
अचानक तेज शोर-शराबे और दरवाजे के पीटे जाने की आवाजें आने लगीं। संधि हड़बड़ाकर जग गई। इस द्घबराहट में तेज बुखार से उस तरह उठने में वह पसीने से तरबतर हो गई। अंधेरे में तेजी से आस-पास टटोलते समय तक भी उसकी तंद्रा ने विचार का रूप न लिया था कि वह इस पर सोच पाती कि कहां है वह। अंधेरे में ही वह दोनों ओर की दीवार पर टिकी, टूटते और तपते शरीर को निढाल सा डाल, बैठी सी हो गई। 'रात के कितने बजे हैं और वह कहां है' तक की अभी उसकी सुध नहीं लौटी थी। दो-चार मिनट में उसे समझ लगा कि उसी का दरवाजा पीटा जा रहा है और बाहर कॉलेज की प्राचार्या ;बड़ी जीद्ध सहित कोठी का कुछ स्टॉपफ और वॉर्डन के साथ कुछ भीड़ जुटी है और डंडे से 'डॉरमेट्री' में खुलने वाले कमरे के दरवाजे को पीटा जा रहा है। इसके साथ ही उसे यकायक सारी द्घटनाएं याद आ गईं कि शाम को वहीं जीजी की गोद में शायद वह सो गई थी। उसके बाद का उसे कुछ पता न था। अब उसका विमलेश और मंजुला के कमरे में रात में पाया जाना, उसकी खाल उधेड़ने को पर्याप्त पाप की तरह था। कांपते हाथों से तख्त का किनारा पकड़ वह अंधेरे में नीचे उतर खड़ी हुई। पैर कंपकंपा रहे थे, बुखार और डर से पसीने के पफव्वारे छूट रहे थे, खड़ा होने की सामर्थ्य तक उसमें न थी। अब वह क्या करे, यही बात उसे सता रही थी। बाहर से बड़ी जी और वॉर्डन के चिल्लाने व दरवाजा खोलने की दहाड़ों के बीच उसने अंततः बदहवास हो बहुत देर से हॉल में खुलने वाला दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही चटाक-चटाक चार-छह हाथ उसके सिर, गालों और यहां-वहां जोर-जोर से बरसे। वह गचका खाकर पीछे की ओर गिरी। हॉल के प्रकाश में उसने देखा कि वॉर्डन ने तुरंत आगे बढ़कर पेड़ की मोटी टहनी वाली अपनी छड़ उस पर बरसाने को हाथ उठाया है और...। जाने गिरती संधि में इतनी शक्ति कहां से आ गई कि गिरे-गिरे ही उसकी कांपती, तपती, मुर्दा बांहों ने बाएं हाथ से वॉर्डन की साड़ी नीचे से खींचकर निकाल दी और सिर की मार से वॉर्डन को परे धकेलते हुए वह तख्त से पीठ सटाती ऊपर बैठ गई। इस औचक हमले के लिए कोई तैयार न था। सब उस ओर लपके। इतने में बरामदे की ओर के दरवाजे के खुलने की आहट के साथ ही मंजुला दी, विमलेश और अन्य कई स्नातिकाओं ने एक साथ झुंड की तरह कमरे में प्रवेश किया और छत से लंबी तार में नीचे तक लटका बल्ब जला दिया।
मंजुला का चेहरा तमतमा रहा था। वह अपनी छाती की ओर उंगली करते हुए लगातार सबकी परवाह किए बिना चीख-चीखकर प्राचार्या, वॉर्डन और कोठी के स्टॉपफ के सामने ललकार रही थीं। संधि की हिचकियां बंधी थीं, उसे कुछ पता नहीं कि मंजुला ने क्या कहा, सिवाए इसके कि बोलते-बोलते वह संधि के पास आ खड़ी हुईं और संधि का सिर अपने से सटा लिया। संधि पर पिफर बेहोशी छाने लगी थी... कुछ आवाजें उसके कान में लगातार पड़ रही थीं या अवचेतन में कोई स्वप्न सा रूपाकार ले रहा हो... जैसे उसे अपने से चिपकाए मंजुला उस दिन इतना गरजी कि सब चुपचाप सरक गए...। बाद में दो-तीन द्घंटे बाद होश आने पर देखा तो पाया कि तब तक अपने सब वहीं जमा थे। संधि समझ नहीं पाई कि मामला शांत हुआ तो कैसे? उसे बिना उस कमरे से निकाले सब चले कैसे गए! मंजुला दी ने आखिर कैसे और क्या डपटा होगा उन्हें। उद्विग्नता से उठ वह बाहर जाना चाहती रही, लेकिन सबने रोक लिया। बस इतना पता चला कि अब कोई कुछ न कहेगा उसे। लेकिन वह शाम संधि के भीतर आतंक की द्घोर छाया बन कहां-कहां से कौन सा उजाला छीन ले गई... इसका पता जीवन की किसी किताब में दर्ज न हुआ।
हुआ यों था कि शाम को संधि मंजुला दी की गोद ही में सो गई। जब खाने की द्घंटी बजी तो उसे वहीं सोता छोड़कर सब खाना खाने चले गए। सदा की तरह जाते समय बाहर से ताला भी लगा दिया गया, जैसा कि हर कमरे वाले सदा से करते आए थे। अब किसी ने कोठी तक खबर पहुंचा दी कि अंधेरे में मंजुला वाले कमरे के अंदर संधि है। कमरे के दो दरवाजे होने के कारण खुद को बाहर ताला लगाकर भी अंदर बंद कर लेना बहुत आसान था कि बरामदे वाले दरवाजे को बाहर से ताला लगाकर कोई हॉल वाले दरवाजे से अंदर आ जाए और पिफर उस दरवाजे को अंदर से बंद कर ले। देखने वालों को पहली नजर में कमरे में किसी के न होने का ही प्रमाण मिलेगा। दूसरी तरपफ डायनिंग में रोज की तरह बाकी स्नातिकाओं के साथ मंजुला को खान-पान व्यवस्था का निरीक्षण करते न पाने पर वॉर्डन ने संधि के साथ अंधेरे में मंजुला का कमरे में बंद होकर छिपे होने का अनुमान लगा लिया था। जबकि मंजुला अपनी उदासी के कारण उस दिन व्यवस्था देखने वालों में खड़ी ही नहीं थी, वह जमीन पर बिछी जूट की पट्टियों में लड़कियों की भीड़ के साथ ही बैठी रही थी। वॉर्डन की किसी ईर्ष्या ने तुरंत बदला लेने की योजना बना डाली थी। बातों-बातों में प्रसंग छिड़ने पर ३५ से ५५ वर्षीय अध्यापिकाओं में से एक ने बाद में बताया था कि उसकी
उपस्थिति में ही वॉर्डन ने कोठी में कहा था-'हम तो एक तख्त पर भी आराम से नींद नहीं निकाल पाते, पर पता नहीं मंजुला और संधि एक तख्त को कैसे साझा करती हैं... और यह कह वह खिलखिला पड़ी थी।
संधि ने मुझे हॉस्टल की इस द्घटना के बाद अपने निरंतर दुःख और चिंता में डूबते जाने की कई बातें सुनाईं। सबसे अधिक डर उसे अपने अकेले हो जाने वाली संभावना से लगने लगा था। साथ ही मंजुला के चले जाने पर सहारा छिन जाने की पीड़ा से भी वह भरती चली जा रही थी। इन आशंकाओं, तनाव, भय, पीड़ा जैसी अलग-अलग कई तरह की मनःस्थितियों से त्रास्त वह केवल आंसू बहाया करती और छटपटाती।
अंततः मंजुला के जाने का दिन भी आ गया। उसका भाई उसे लिवाने आ पहुंचा था। अगले दिन मंजुला दी को लेकर उसे लौटना था। मंजुला ने संधि को ढांढस बंधाती चली आने वाली बातों के अपने क्रम में दोपहर में उसे पफाटक के बाहर ;पर आश्रम के परिसर में ही बनेद्ध कॉलेज में बुला लिया। दोपहर की दो कक्षाओं के बाद, जब सब लड़कियां पफाटक के अंदर लौट गईं, तब मंजुला और संधि वहीं बगीचे में पेड़ की ओट में बैठ गईं। आज सखियों की विदाई का दिन था। संधि को जीवन में अब कभी इस तरह साथ न रह पाने का दुःख साल रहा था, उसके लिए उसके जीवन के एक चरण का अंत था वह दिन। दोनों गले लगी द्घंटों रोती रहीं।
उनका भाई चार बजे के आस-पास एक बार बहन से मिलने पता करता वहां तक आया तो उसके बाद जीजी ने संधि को सावधान होकर एक बात सुनने को तैयार किया। जो कुछ जीजी ने संधि को अपना ध्यान रखने का निर्देश देते हुए बताना चाहा वह संधि की समझ से ऊपर की चीज थी। तब उन्होंने सापफ-सापफ शब्दों में एक द्घटना का उदाहरण दिया। वॉर्डन अक्सर उनके कमरे में सामने वाली खिड़की के नीचे पड़े तख्त पर सो जाया करती थी, अक्सर यह कहती हुई कि 'चलो, अब ४-५ द्घंटे की तो बात है, तड़के उठकर चार बजे द्घंटी बजवानी है, तो अब क्या अपने कमरे में बोर होने जाया जाए, यहीं सो जाती हूं, बिस्तर तो खाली पड़ा ही है यहां।' सप्ताह में दो-तीन बार से भी ज्यादा ऐसा होता रहता अक्सर। विमलेश के छुट्टी लेकर द्घर चले जाने वाले १५ दिन तो लगातार वॉर्डन वहीं सोती रही। एक दिन नींद में दम द्घुटने जैसा लगने पर मंजुला की अपने बिस्तर पर वॉर्डन को पा, नींद टूटी। वह बड़े पागलपन में मंजुला के होंठ अपने होंठों में जोर से दबाए उसकी देह से लिपटी लगातार उसे भींच रही थी। एक टांग सोती मंजुला की उद्घाड़ दी गई टांगों पर, और दूसरी टांगों के नीचे पफंसाने की बेचैन जिद में, उसने तुरंत अपना बायां हाथ मंजुला के होंठों पर रखकर मुंह दबा दिया। ऐसा करते हुए
वॉर्डन ने अपनी गर्दन उठाई व कुहनी पर टिक सारा हाथ का जोर मुंह दबाने में लगा दिया, उस पर उसकी देह के बोझ से भी सांस लेने तक को तड़पफड़ाती मंजुला न डरी, न कांपी, बस आगबबूला होकर द्घुटने को तेजी से मोड़ उसने वॉर्डन की पकड़ को टांगों से ढीला किया तो वॉर्डन ने झटके से मंजुला की कुर्ती ;ढीला कुर्तेनुमा ब्लाउजद्ध में दाहिना हाथ डाल दिया। यही वह क्षण था जब उसकी कोहनी की टेक कमजोर हुई और मंजुला ने उसे परे धकेल दिया और स्वयं दरवाजा खोल बाहर की ओर भाग ली। आंगन में पत्थर के बिछे पाट पर हांपफती आकर बैठ गई। तभी कुछ देर बाद पीछे से वॉर्डन ने सामने खड़े हो हाथ जोड़कर कहा-'मापफ कर देना, पता नहीं कैसे मुझे होश नहीं रहा। किसी से कहना मत, पैर पड़ती हूं, मारी जाऊंगी, कोई नहीं है बाहर संसार में मेरा, निकाल दी गई तो कहीं जाने की जगह नहीं, मापफी दे दे।' यह कह तत्क्षण वहां से चली गई।
संधि ने मुझे बताया कि मंजुला से इस द्घटना को जानकर भी उसके अर्थ से वह एकदम अंजान और कोरी रही। हां, मंजुला के किसी को पास न पफटकने देने के आदेश के प्रति संधि ने उसे निश्चिंत कर दिया। इस द्घटना को सुनने-सुनाने के बाद मंजुला और संधि दोनों अपने आंसू भूल गईं। मंजुला का मन एक रूखेपन व कड़ाई से भर चुका था और संधि का तो वहां से तुरंत भाग जाने की जुगत लगाती स्तब्धता में। अंत में मंजुला ने उसके बाबा को तुरंत पत्रा लिखकर उसे आश्रम से वापिस बुला लेने के अपने निश्चय की बात बताई और संधि से वादा लिया कि बाबा या किसी और को कभी मत कुछ बताना। 'मैं तुम्हारे बुखार के कारण वहां से ले जाने को उन्हें कहूंगी और कोठी वालों से भी ऐसा पत्रा अपनी उसी धमकी के जोर पर लिखवाने की बात करती हूं।' दोनों पिफर गले मिलीं और हाथ थामे आश्रम के अंदर लौट आईं।
रात भर जीजी का सामान बांधे जाता देखती संधि की विस्पफारित आंखें सूखी पड़ी थीं। वह निरंतर मानो अपने ऊपर होने वाले किसी शिकारी के आक्रमण की आशंका में बचाव के तरीके सोचने में जुटी थी। तड़के जीजी ने उसका माथा चूमा और गले मिल सदा के लिए छोड़ चली गईं। महीने भर बाद उनके विवाह के आस-पास की तिथियों में संधि अपने तेज बुखार में तपती वॉर्डन के कमरे में बैठे डॉक्टर को दिखाने ले जाई गई। थर्मामीटर में बुखार १०७ डिग्री से ऊपर निकला। उसे थामकर लड़कियों ने बिस्तर पर लिटाया तो आठवें दिन उसने होश आने पर आंखें खोलीं। बाबा तीन दिन से उसके होश में आने पर उसे सदा के लिए साथ ले जाने आ पहुंचे थे। उन्हें संधि के बेसुध हो जाने पर तार देकर बुलवा लिया गया था और मंजुला का पत्रा भी उससे कुछ दिन पहले उन्हें मिल गया था।
संध्या ;संधिद्ध के जीवन का यह प्रकरण यहीं पूरा हुआ। इतना भर तुम्हारी पिफल्म की कथा के लिए पिफल्माया जाना तय हुआ था। मुझे तो क्योंकि आश्रम के पहरावे आदि का कोई अनुमान तक नहीं था, इसलिए संधि को ही उसके अपने निरीक्षण में तैयार करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी जिसे उसने बड़े यत्न से पूरा भी किया। ...लेकिन इसी बीच बुखार में कार चलाते हुए हुई दुर्द्घटना में उसका न रहना, शायद उस वचन का पूरा होना था कि 'वह किसी को कभी कुछ नहीं बताएगी।'
तुम्हारे पिछले पत्रा से पता चला था कि पिफल्म की शूटिंग पूरी हो गई है और स्टूडियो में एडिटिंग, डबिंग और ऑडियो आदि के काम अपने अंतिम चरण में है। तुमने मुझसे संधि का चित्रा भी मांगा था, ताकि पिफल्म उसकी स्मृति को समर्पित की जा सके। उसका चित्रा डाक से भेज रही हूं। और 'इंट्रो' में संधि पर पांच मिनट कुछ कहने के लिए मैं अपनी आवाज भी देने की तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगी। लिखना कि मुझे कब लंदन पहुंचना होगा?

 
 
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